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फिल्मी दुनिया ने हमारे पंडितों, महान चरित्रों और देवी-देवताओं का फूहड़ मजाक बनायाः डॉ. कुमार विश्वास

मुंबई। गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब द्वारा आयोजित ड़ॉ. कुमार विश्वास के अपने अपने राम कार्यक्रम के दूसरे और तीसरे दिन पूरा कार्यक्रम स्थल खचाखच भरा रहा। कार्यक्रम में ऐसे ऐसे बुजुर्ग भी पहुँचे जो चल पाने में असमर्थ थे, और कई दिव्यांग जन भी पूरे उत्साह और श्रध्दा के साथ कार्यक्रम में पहुँचे। क्लब की ओर से इन सभी के लिए व्हील चेअर की व्यवस्था की गई थी।  क्लब के चारों ओर अवयवस्थित और आयोजन स्थल पर उमड़ी भीड़ के बावजूद इन सबकी श्रध्दा देखने लायक थी। कार्यक्रम में फिल्मी दुनिया के निर्माता-निर्देशक, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सहित समाज के विभिन्न क्षेत्रों के कई प्रबुध्द लोग उपस्थित थे।

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इस अवसर पर उन्होंने गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब द्वारा प्रकाशित कॉफी टेबल बुक का भी विमोचन किया। इस पुस्तक में क्लब के 40 वर्षों के गौरवशाली इतिहास, इस क्लब के निर्माण में अपना योगदान देने वाले लोगों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है।

कार्यक्रम के समापन पर प्रभु श्री रामचन्द्र जी का राजतिलक भी किया गया। कार्यक्रम के अंत में काशी से आए पंडितों द्वारा प्रस्तुत  भव्य गंगा आरती ने उपस्थित दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

अपने अपने राम पर व्याख्यान  प्रारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि फिल्मी दुनिया ने हमारे देवताओं से लेकर धर्मग्रंथों और महर्षि नारद जैसे विद्वान को उपहास का पात्र बना दि

या, इसका एक पूरी पीढ़ी पर घातक असर पड़ा।

डॉ. कुमार विश्वास ने रामकथा के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से राम के चरित्र के कई आयामों को एक नई अवधारणा, वैज्ञानिकता और आज के दौर की प्रासंगिकता के साथ इतने तर्कयुक्त और सारगर्भित ढंग से प्रस्तुत किया कि  उपस्थित श्रोताओं को रामचरित मानस के अनसमझे और अनकहे प्रसंगों की जानकारी मिली।

उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति है। हमने कभी किसी देश  पर आक्रमण कर उसे जीतने का प्रयास नहीं किया। राम ने अहंकारी रावण को मारकर लंका का राज्य विभिषण को सौंप दिया। हम पिछले सैकड़ों वर्षों से हमारे बारे में लिखे गए झूठे इतिहास और काल्पनिक कथाओं के माध्यम से हमारे गौरवशाली इतिहास को, हमारे धर्मग्रंथों को निंदित किया गया। लेकिन, अब परा दौर बदल चुका है, आज की नई पीढ़ी सत्य जानना चाहती है और सत्य हर तरह से बाहर आ रहा है।

उन्होंने ऐतिहासिक साक्ष्यों की चर्चा करते हुए कहा कि पटना के चन्द्रगुप्त, मलयदेश (मलयदेश प्राचीन भारत में दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया (आज का मलेशिया, इंडोनेशिया) के लिए प्रयुक्त सांस्कृतिक-भौगोलिक शब्द था) का सिंहरण, चीन व्हेनसांग जैसे लोगों को आचार्य शीलभद्र ने शिक्षा दी।

शंकराचार्य ने पूरे देश में पैदल भ्रमण कर हमारी संस्कृति को बचाया और अपने धर्म के प्रति लोगों में आत्मविश्वास पैदा किया।

उन्होंने कहा कि भारत के बाहर पढ़ने जाना गलत नहीं, लेकिन वहाँ जाकर अपने देश के बारे में गलत सोचना और बुरा कहना गलत है। ज्ञान की सीमाएँ पूरे विश्व को छूती है। इसे देश की भौगोलिक सीमा में नहीं बाँधा जा सकता।

राम का वन जाना ऋषि संस्कृति का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि विद्वान व संस्कारवान व्यक्ति के साथ बैठने मात्र से ही सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

हमारे देश का नाम भारत बहुत गूढ़ अर्थ रखता है भा का अर्थ होता है प्रकाश और रत का मतलब जो उसमें निरंतर रत है या लगा हुआ है-इसी का नाम भारत है।

आज पूरा विश्व एआई के खतरे से जूझ रहा है और इस खतरे से भारत ही निपट सकता है क्योंकि हमारी संस्कृति में शक्ति में विकृति नहीं बल्कि सकारात्मकता का भाव होता है।

उन्होंने इस बात पर दुःख व्यक्त किया कि हम अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, पैर छूने जैसे कार्य को अब घुटना छूने तक सीमित कर दिया गया है।

डॉ. कुमार विश्वास ने कहा कि रामचरित मानस प्रबंधन, राजनीति, कूटनीति से लेकर समाज व्यवस्था को चलाने और समझने का अद्भुत ग्रंथ है।

राम ने रावण से चर्चा करने अपने दूत के रूप में दोबारा हनुमान को नहीं भेजा क्योंकि ने लंका दहन कर चुके थे। दूसरी बार उन्होंने बाली के पुत्र अंगद को भेजा, क्योंकि बाली ने रावण को पराजित कर उसे अपनी बगल में दबाकर पृथ्वी का चक्कर लगाया था। इसका कारण था कि रावण को ये अहसास हो जाए कि राम के पास कितने शूरवीर योध्दा हैं। इसी तरह मेघनाथ के मरने के बाद ही उन्होंने विभीषण को युध्द में अपने साथ लिया, अगर वो पहले ही युध्द में विभीषण को अपने साथ ले लेते तो हो सकता है रावण व विभिषण भावुक हो कर युध्दभूमि में गले मिल लेते। लेकिन रावण को यह पता लग गया था कि मेघनाथ की मृत्यु का कारण विभिषण है, इसलिए वह विभिषण के प्रति भी क्रोध व बदले से भरा रहा।

रावण विद्वान होकर भी अनियंत्रित ज्ञान का प्रतीक था, जबकि राम नियंत्रित ज्ञान के प्रतीक थे। कुमार विश्वास ने कहा अकि उत्तम कुल में जन्म लेना इस बात की गारंटी नहीं है कि व्यक्ति संस्कारवान होगा। रावण तो ब्रह्मा का नाती और ऋषि पुलत्स्य का पुत्र था फिर भी वह अपने अहंकार की वजह से दुष्टता का प्रतीक बना।

उन्होंने कहा कि सफल व्यक्ति की सफलता उसका गुण नहीं बल्कि सफल होकर विनम्र बने रहना उसकी सफलता का शीर्ष है।

राम की पदयात्रा -पद की यात्रा नहीं थी जैसे कि आजकल के नेता पदयात्रा करते हैं।

हमने अपने दुश्मन देश से तीन युध्द लड़े, हम विजयी रहे मगर हमने उस पर कब्जा नहीं किया, जबकि युध्द हमने नहीं किया हम पर थोपा गया था।

राम ने वनवास के माध्यम से देश केछ वनवासी लोगों से मिलने, उनकी समस्याओँ को जानने और अपनी वनवासी संस्कृति को समझने का प्रयास किया। अगर राम चाहते तो अयोध्या के बाहर जंगल में कुटी बनाकर 14 वर्ष वहीं बिता देते।

नीति लोगों की राय से ज्यादा महत्व रखती है, राम ने अयोध्या नगरी के लोगों की इच्छा के विपरीत नीति का पालन करते हुए वनयात्रा स्वीकार की, अगर वे भीड़ और लोगों की मांग का अनुसरण करते तो कोई उनका विरोध भी नहीं करता। इसी तरह राजा को नीति का पालन करना चाहिए, भीड़ या जनता की राय का नहीं। नीति राष्ट्र हित में होती है, जबकि लोगों की मांग एक तरह से स्वार्थ का प्रतीक होती है।

रामचरित मानस के विविध प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि शबरी के झूटे बेर राम को इसलिए स्वादिष्ट लगे कि उनकी माता कौशल्या स्वयं छत्तीसगढ की थी और वो बचपन में उन्हें वही बेर खिलाती थी। उन्होंने कहा कि हमारे परिवारों में यही समस्या है कि हर बेटे को माँ के हाथ का खाना ही अच्छा लगता है, पत्नी के हाथ का नहीं, क्योंकि पहली बार जो स्वाद मिलता है वह आजीवन याद रहता है।

शबरी की भक्ति को लेकर राम ने कहा कि शबरी ने विवाह करने से इसलिए इँकार कर दिया था क्योंकि विवाह के लिए हजारों भेड़ों और बकरियों की बलि दी जा रही थी। बाद में उसने युवावस्था में  मतंग ऋछि के आश्रम को संवारने की सेवा देती रही। जब ऋषि का अंतिम समय आया तो शबरी ने उनसे कहा कि आपके शिष्यों ने तो ज्ञान पाया है, यज्ञ किये हैं उनको तो भगवान मिल जाएंगे लेकिन मुझे कैसे मिलेंगे, तो मतंग ऋषि ने उसे वरदान दिया कि तुझसे मिलने तो भगवान खुद आएँगे और तू भगवान को राह दिखाएगी।

शबरी की भक्ति पर उन्होंने कवि रामप्रकाश आकुल की इस कविता से उन्होंने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया

पथरीली गीली आँखों में भावों की सरयू लहराई

जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई

हमका भूख लगी है माई !

छोटा सा पलाश का दाेना

दोने में अधखाये फल हैं

खाने और खिलाने वाले

दोनों के ही नयन सजल हैं

मेवे पकवानों ने बेरों के जैसी किस्मत कब पाई

जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई

हमका भूख लगी है माई !

आज ज़रा सी पर्णकुटी से

कंचन जड़े महल जलते हैं

जंगल के फूलों की माला

से सब नीलकमल जलते हैं

एक भीलनी की सेवा से भावविभोर हुयी ठकुराई

जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई

हमका भूख लगी है माई !

सत्य सनातन समानता का

वैसा नाम नहीं हो पाया

और राम के बाद धरा पर

कोई राम नहीं हो पाया

किसने इतनी मर्यादा से ऊँच नीच की रेख मिटाई

जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई

हमका भूख लगी है माई !

वाल्मिकी रामायण में राम के वनवास से आने के बाद पूरी कथा का विराम हो जाता है, लेकिन कुछ लोगों ने षड़यंत्र करके रामकथा में सीता के परित्याग की झूठी कहानी चलाई  और हमने सच मान ली।

उन्होंने श्रोताओं द्वारा पूछे गए सवालों का स्वागत करते हुए कहा कि सवाल पूछना हमारी परंपरा  का गौरव रहा है, जबकि दूसरे धर्म के लोग सवाल पूछने पर सिर तन से जुदा करने की बात करते हैं।

एक श्रोता के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि बुराई पर नियंत्रण तभी हो सकता है जब आपको पता चल जाए कि आपके अंदर बुराई क्या है। बुराई को जान लेने के बाद भी उसके हिसाब से जीते रहे तो वही बुराई आपको नष्ट कर देगी, रावण इसका प्रत्.क्ष उदाहरण है।

उन्होंने रमेश सान के शेर की दो पंक्तियाँ प्रस्तुत की-

एक मुठ्टी राख में तब्दील होना है, किस करीने से चिता पर लाद दिया है।

उन्होंने कहा कि जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है। आत्मा से हमेशा सच निकलता है और मन भटकाता है, जो आत्मा की सुनता है वह कभी कोई गलत काम नहीं कर सकता। मन की इच्छा अनंत है, लेकिन शरीर की सीमा निश्चित है।

अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने गीता और रामचरित मानस के कई रोचक प्रसंगों के माध्यम से इन ग्रंथों की आज के दौर में उपयोगिता पर चर्चा की और नई पीढ़ी को इसको समझने पर जेर दिया।

कुमार विश्वास के ‘अपने अपने राम’ की ‘रस गंगा’ में भीगकर तृप्त होकर भी अतृप्त रह गए हजारों श्रोता

मुंबई। मुंबई शहर में ऐसे तो हर दिन राष्ट्रीय व अतंरराष्ट्रीय स्तर  के कई आयोजन होते हैं, लेकिन कुछ ही आयोजन ऐसे होते हैं जो इतिहास बना देते हैं। जाने माने कवि और रामकथा के मर्मज्ञ  डॉ. कुमार विश्वास द्वारा मुंबई के प्रतिष्ठित गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब में अपने अपने राम के माध्यम से जब रामकथा के विविध प्रसंगों का वर्णन किया गया तो उपस्थित हजारों श्रोताओं की भावदशा और रोमांच देखने लायक था। उनके एक एक वाक्य श्रोताओं ने करतल ध्वनि से अपना अहोभाव व्यक्त किया।

गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब के विशाल परिसर में बने भव्य पांडाल में हजारों श्रोताओं में रामकथा की इस रसगंगा में डुबकी लगाई। इस आयोजन को सफल बनाने में क्लब के अध्यक्ष श्री विनय जैन व सचिव श्री संजय मालू के निर्देशन में श्री चन्द्रकांत अग्रवाल-बाबू भैया, श्री रमाकांत परसरामपुरिया, श्री सुनील काबरा, श्री प्रदीप जैन व श्री ललित जैन सहित क्लब की विभिन्न कमेटियों के सदस्यों ने अथक प्रयास किए।

डॉ. कुमार विश्वास के अपने अपने राम के आयोजन का यह पहला दिन था। कार्यक्रम प्रारंभ होने के एक घंटे पहले ही पूरा पंडाल रसिक श्रोताओं से भर चुका था। यह कार्यक्रम 10 व 11 जनवरी को भी होगा।

उन्होंने अपने व्याख्यान का प्रारंभ रामचरित मानस के बाल कांड के मंगलाचरण से किया।

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥1॥

भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्‌॥2॥

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्‌।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥3॥

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥4॥

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्‌।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्‌॥5॥

यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्‌॥6॥

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा
भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति॥7॥

अपने व्याख्यान का प्रारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि राम मनुष्य के स्वाभिमान के प्रतीक हैं और इस प्रतीक को सार्थक किया महाराष्ट्र की धरती पर जन्मे वीर शिवाजी ने। उन्होंने शिवाजी के जीवन के कई प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख किया और महाकवि भूषण द्वारा शिवाजी के चरित्र पर लिखी गई अमर कविता की व्याख्या कर उसका स्वसर पाठ किया। श्रोताओं के लिए इस कविता को लय में सुनना एक अद्भुत अनुभव था।

इन्द्र जिमि जंभ पर, बाडब सुअंभ पर,
रावन सदंभ पर, रघुकुल राज हैं।

पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर,
ज्यौं सहस्रबाह पर राम-द्विजराज हैं॥

दावा द्रुम दंड पर, चीता मृगझुंड पर,
‘भूषन वितुंड पर, जैसे मृगराज हैं।

तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर,
त्यौं मलिच्छ बंस पर, सेर शिवराज हैं॥

ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी,
ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं।

कंद मूल भोग करैं, कंद मूल भोग करैं,
तीन बेर खातीं, ते वे तीन बेर खाती हैं॥

भूषन शिथिल अंग, भूषन शिथिल अंग,
बिजन डुलातीं ते वे बिजन डुलाती हैं।

‘भूषन भनत सिवराज बीर तेरे त्रास,
नगन जडातीं ते वे नगन जडाती हैं॥

छूटत कमान और तीर गोली बानन के,
मुसकिल होति मुरचान की ओट मैं।

ताही समय सिवराज हुकुम कै हल्ला कियो,
दावा बांधि परा हल्ला बीर भट जोट मैं॥

‘भूषन’ भनत तेरी हिम्मति कहां लौं कहौं
किम्मति इहां लगि है जाकी भट झोट मैं।

ताव दै दै मूंछन, कंगूरन पै पांव दै दै,
अरि मुख घाव दै-दै, कूदि परैं कोट मैं॥

बेद राखे बिदित, पुरान राखे सारयुत,
रामनाम राख्यो अति रसना सुघर मैं।

हिंदुन की चोटी, रोटी राखी हैं सिपाहिन की,
कांधे मैं जनेऊ राख्यो, माला राखी गर मैं॥

मीडि राखे मुगल, मरोडि राखे पातसाह,
बैरी पीसि राखे, बरदान राख्यो कर मैं।

राजन की हद्द राखी, तेग-बल सिवराज,
देव राखे देवल, स्वधर्म राख्यो घर मैं॥

उन्होंने कहा कि रामचरित मानस एक विश्व ग्रंथ है जो हमारी सांस्कृतिक, अध्यात्मिक व धार्मिक धरोहर है। आज दुनिया को ये तय करना होगा कि वो किस संस्कृति को अपनाना चाहती है। एक हमारी संस्कृति है जो लोगों को जोड़ने का काम करती है और पाश्चात्य संस्कृति है जो लोगों पर कब्जा करके लूटने का काम करती है।

उन्होंने विवेकानंद के जीवन के एक मार्मिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जब विवेकानंद शिकागो की धर्म सभा से अपनान व्याख्यान देकर नीचे उतरे तो एक विदेशी महिला ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि मेरा सौंदर्य और आपके अध्यात्मिक ज्ञान से हमें जो संतान मिलेगी वो विलक्षण होगी। इस पर विवेकानंद ने जो उत्तर दिया, वो हमारी संस्क़ति का प्रतिनिधित्व करता है, उन्होंने कहा कि मैं आज से ही अआपको अपनी माँ मान लेता हूँ और मुझे अपना बेटा समझें।

राम के चरित्र का उल्लेख करते हुए डॉ. कुमार विश्वास ने कहा कि शक्ति तभी सुरक्षित रहेगी जब तक सके साथ मर्यादा रहेगी। हमारा इतिहास गवाह है कि श्री राम से लेकर वीर शिवाजी तक जितने भी योद्धा हुए हैं उन्होंने शक्ति के साथ संस्कृति और मर्यादा का भी पालन किया।

उन्होंने कहा कि फिल्मी दुनिया ने हमारी संस्कृति को हर तरह से विकृत करने का कुत्सित प्रयास किया इसीका नतीजा है कि हमारी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से विमुख होती रही, लेकिन अब यह दौर बदल रहा है। हम देखते हैं कि 31 दिसंबर और 1 जनवरी जो कैलेंडर की एक तारीख मात्र है, इस मौके पर भी युवा पीढ़ी सहित लाखों लोग मंदिरों में दर्शन करने पहुँचते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति की यही विशेषता है कि वह हर जगह अपनी राह बना लेती है।

वह एक दौर था जब हमें ऐसी फिल्में और गीत देखने सुनने को मिलते थे।

उन्होंने  1954 में बनी जागृति’ फिल्म का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके निर्देशक और मुख्य कलाकार सत्येन बोस व अभि भट्टाचार्य बंगाल के थे मुख्य नायिका मुमताज़ बेग़म थी।

संगीतकार हेमंत कुमार थे. गीतकार थे कवि प्रदीप और इसके गीत के बोल थे।

ये है अपना राजपूताना नाज इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे

ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे
देखो, मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था

मुगलों की ताक़त को जिसने तलवारों पे तोला था
हर पर्वत पे आग जली थी हर पत्थर एक शोला था

बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था
शेर शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

अब एक बार फिर वह दौर बदल रहा है, अब छावा और धुरंधर जैसी फिल्मों ने एक नया विमर्श पैदा किया है।

उन्होंने औरंगजेब का उल्लेख करते हुए कहा कि वो जिस संस्कृति का प्रतीक था उसमें उसने अपने पिता  शाहजहाँ को कैद कर उसके खाने और पानी पीने तक पर पाबंदी लगा दी थी। इस पर शाहजहाँ ने औरंगजेब को लिखकर भेजा कि एक तरफ हिंदू हैं जो अपने पुरखों को भी श्राध्द पक्ष में पानी पिलाते हैं और  दूसरी तरफ तू मेरा बेटा होकर भी मुझे खाना और पानी तक नहीं देता है।

ऐ पिसर तू अजब मुसलमानी,

ब पिदरे जिंदा आब तरसानी

आफरीन बाद हिंदवान सद बार,

मैं देहंद पिदरे मुर्दारावा दायम आब।

कुमार विश्वास ने कहा कि तुलसी दास जी ने लिखा है-

राम कथा सुंदर कर तारी।

संसय बिहग उडा़वनिहारी।।

राम की कथा हाथ की सुंदर ताली है, जो संदेहरूपी पक्षियों को उड़ा देती है।

कुमार विश्वास ने कहा कि राम मनुष्यों के ही नहीं देवताओं के भी पूज्य हैं। एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देवताओं के राजा इन्द्र के पुत्र जयंत न् जब इन्द्र से पूछा कि सबसे पूज्यनीय कौन हैं तो इन्देर ने जवाब दिया कि राम सबसे पूज्यनीय हैं, तो जयंत ने पूछा कि राम कहाँ मिलेंगे तो इन्द्र ने जवाब दिया वे पृथ्वी पर मिलेंगे। इस पर जयंट कौए का रूप बनाकर वनवासी राम को देखने गया, राम उस समय सीता जी क पैरों में महराब लगा रहे थे. तो कौआ बने जयंत ने सीता माता के पैरों पर चोंच मारकर खून निकाल दिया, इस पर राम को क्रोध आया तो उन्होंने उसके पीछे लक्ष्यबेधी बाण चला दिया अब कौआ बना जयंत अपनी जान बचाने को अपने पिता इन्द्र, भगवान शंकर, ब्रह्मा जी से लेकर विष्णुजी के पास गया उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई तो नारद जी ने उसे समझाया कि तुझे राम ही बचा सकते हैं।

जब रामजी नीची गर्दन किए थे तो जयंत ने उनसे चिंरजीव होने का आशीर्वाद ले लिया। फिर जयंत ने कहा कि आपने तो मुझ पर तीर छोड़ रखा है, इससे कैसे बचूँ। इस पर रामजी ने कहा कि तीर तो अपना काम करेगा ही। तुझे इससे बचना हो तो अपने शरीर का कोई एक अंग इसके आगे समर्पित करना होगा। तब कौए ने अपनी एक आँख को तीर से घायल कर लिया और तबसे कोए की एक ही  आँख रह गई। आज विज्ञान भी ये मानता है कौए की एक ही आँख होती है और वह उसी आँख से गर्दन घुमाकर एक से दूसरी ओर देखता है।

रामकथा की व्याख्या करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि ये मात्र रामजी की जीवनी नहीं हमारे जीवन की संजीवनी है।  जो इसे पिएगा वो जीवन के हर कष्ट का सामना कर लेगा।

उन्होंने कहा कि हमारे देश को वामपंथ पर ले जाने की साजिशें हो रही है, लेकिन अब देश रामपंथ पर चल पड़ा है।

हमारी संस्कृति शास्त्रार्थ और उत्तरों से निकली संस्कृति है।

गीता विषाद मुक्त करने का ग्रंथ है। कृष्ण ने अर्जुन का विषाद से मुक्त कर पूरी मनुष्यता को विषाद मुक्त होने की राह दिखाई है।

उन्होंने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि फिल्मी दुनिया के लोगों से कोई पूछता है कि कौनसी पुस्तक पढ़ी तो वो किसी विदेश पुस्तक का नाम बताकर गौरव महसूस करते हैं। लेकिन गीता रामाचरित मानस जैसे ग्रंथों का फिल्मों में मजाक उड़ाते हैं।

कुमार विश्वास ने कहा कि फिल्मी धुनों पर भगवान के भजन बजाना बंद कीजिये। जब आप किसी फिल्मी धुन पर भजन सुनते हैं तो आप भक्ति में नहीं डूबते बल्कि फिल्मी दृश्य से जुड़ जाते हैं।

उन्होंने कहा कि मैंने माँ वैष्णो देवी के दर्शन के लिए कई बार प्रयास किए मगर माँ का बुलावा ही नहीं आय। एक दिन ऐसा अवसर आया कि मुझे माँ के चरणों मैं बैठकर कविता सुनाने को कहा गया और मात्र 45 मिनट दिए गए, लेकिन मैने लगातार डेढ़ घंटे तक अपनी कविता माँ के चरणों में प्रस्तुत की।

मैं क्या गाऊं तेरा यश मैया यश,

यश रस शंकर गजानन ने शारदा ने गाया है।

सब सुख संपदा या विपदा हरण मात जानता हूं

सब तेरे इंगितों की छाया है।

आधी सदी इंतजार में बिताई मैंने मैया।

क्यों नहीं बुलाया तू ही जाने तेरी माया है

देर तक देर तक देर तक तेरे दर पे नवाऊंगा मैं सर

क्योंकि मैया तूने मुझे देर से बुलाया है

कुमार विश्वास ने अपने प्रवचन में कई प्रमुख अध्यात्मिक व धार्मिक उध्दरणों के साथ युवी पीढ़ी से आव्हान किया कि वो पैसा खूब कमाएँ मगर अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कतई ना भूलें।

उन्होंने पंजाब के एक व्यापारी लाला का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने व्यापार कारोबार सब छोड़कर अपना पूरा जीवन धार्मिक कार्यों में लगा दिया और इसकी प्रेरणा उन्हें घर की सफाई करने वाली महिला से मिली।

उन्होंने कहा कि संसद से लेकर न्यायलय और सड़क पर जो लोग राम को काल्पनिक कहते थे वे आज खुद काल्पनिक होने के कगार पर हैं।

उन्होंने कहा कि बच्चों को हैरी पॉटर की नहीं अपने धर्म और अध्यात्म की कहानियाँ सुनाईये। हम उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जिनको बचपन में ध्रुव, प्रहलाद और छढि मुनियों की कहानियाँ सुनाई जाती थी।

कुमार विश्वास ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि आज विवाह के आयोजन पर करोडों रुपये खर्च किए जाते हैं लेकिन जिस ब्राह्मण ने हजारों साल से वैदिक परंपरा को जीवित रखा उसे दक्षिणा के नाम पर नाममात्र की राशि दी जाती है और उसे कहा जाता है कि पंडितजी जल्दी कीजिए। इस जल्दी का नतीजा बहुत खतरनाक होता है। एक घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि विवाह में करोडों रुपये खर्च करने के बाद भी एक पति -पत्नी का संबंध विच्छेद हो गया । मैं उनके विवाह में गया था। उनके पिता ने मुझसे पूछा कि ये कैसे हो गया तो मैने कहा कि आप विवाह की रस्म कराने वाले पंडितजी को जल्दी कीजिये ..जल्दी कीजिये कह रहे थे इसलिए ये भी जल्दी हो गया …

उन्होंने कहा कि मेरी बेटी के विवाह का मुहुर्त 5.16 बजे शाम का था मैने वर पक्ष से साफ कह दिया था कि अगर इस समय तक दुल्हा लग्न मंडप में नहीं पहुँचा तो मैं बलपूर्वक उसे मंगवा लूंगा।

उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति है पत्थर में भगवान को देख लेना और इसीलिए हम जब मूर्ति विराजित करते हैं तो उसमें प्राण प्रतिष्ठा करते हैं और वह मूर्ति विग्रह हो जाती है। दूसरी ओर ऐसी संस्कृति है जो इंसान को पत्थर समझती है।

अपने खास अंदाज में श्री राम की महिमा का बखान करते हुए कहा, “राम केवल एक राजा नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की आस्था और विश्वास के केंद्र हैं।”

कुमार विश्वास ने कहा कि अगर कोई चीज इस समय प्रासंगिक है तो हमारे धर्म जगत की महत्वपूर्ण कहानियां हैं।

उन्होंने कहा, जीवन में अपने सभी कर्म ईमानदारी से पूरे करते हुए शरीर छूटता है तो समझिए मोक्ष मिल गया। शरीर छूटते समय कुछ चिंता रही व कुछ काम न करने का मलाल रहा तो नर्क मिलता है। इसलिए चाहे जैसी स्थित हो कर्म करते रहना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज  परिवारों में संवाद खत्म हो रहे हैं। सात जन्मों तक साथ निभाने का वाद कर सात फेरे लेने वाली पत्नी कोर्ट में इसलिए तलाक मांगने लगती हैं कि पति खर्राटे भरता है। छोटे भाई पर मुकदमा कर कथा सुनना किस काम का, ऐसे लोग तर्क देते हैं कि वह लक्ष्मण की तरह नहीं है। कभी खुद के मन में झांका है कि तुम भी तो राम की तरह नहीं हो। राम धर्म हैं तो सीता शांति है। बिना शांति के धर्म नहीं बचेगा।

भगवान श्री राम को ‘धर्मराज’ कहा जाता है। वे आदर्श पुरुष हैं, जिन्होंने अपने जीवन में उच्चतम नैतिकता और सिद्धांतों का पालन किया। श्री राम का जीवन एक सामान्य मानव के रूप में दिखाया गया है। उनका जन्म इस भूमि पर एक उद्देश्य के साथ हुआ था—धर्म की स्थापना करना और अधर्म का नाश करना।

उनके चरित्र में ये गुण हमें यह सिखाते हैं कि एक सच्चा इंसान कैसे बनें और जीवन की चुनौतियों का सामना कैसे करें।

भगवान श्री कृष्ण न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार और प्रेम का अवतार भी थे।

कृष्ण का मार्गदर्शन हमें सिखाता है कि जीवन में हर परिस्थिति में हमें कैसे अपनी बुद्धि और चातुर्य का प्रयोग करना चाहिए।

उन्होंने कहा यौवनं धनसम्पत्ति प्रभुत्वमविवेकित।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥

यौवन (जवानी), धन-संपत्ति और सत्ता/प्रभुत्व—यदि इनके साथ विवेक न हो—तो इनमें से एक-एक भी मनुष्य के लिए अनर्थ (विनाश) का कारण बन सकता है।
फिर जहाँ ये तीनों (या चारों गुण एक साथ) हों, वहाँ तो अनर्थ होना निश्चित ही है। इसलिए हमारी संस्कृति में शक्ति के साथ धर्म और विवेक को भी महत्तवपूर्ण माना गया है।

भूख लगने पर खाना प्रकृति है, जरूरत से ज्यादा खा लेना विकृति है और भूख लगने पर भी सामने आये हुए भूखे अतिथि को अपना खाना खिला देना संस्कृति है।

उन्होंने नई पीढ़ी द्वारा अपने माता-पिता और संस्कृति के प्रति उपेक्षा को इस शेर के साथ समझाया।

इस दौर-ए-तरक़्क़ी के अंदाज़ निराले हैं

ज़ेहनों में अँधेरे हैं सड़कों पे उजाले हैं।

आज के दौर के रिश्तों को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा-

“एक वक्त था सोचता था, मेहमान कोई आए तो खाना खाऊँ मैं।

लानत है इस दौर पर सोचता हूँ मैं, ये शख़्स चला जाए तो खाना खाऊँ मैं”

उन्होंने अपने प्रवचन का समापन कबीर के इस प्रसिध्द दोहों से किया-

घणा दिन सो लियो रे

घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।

पहलो सोयो मात गरभ में,
उल्टा पाव फ़सार। २
बोल वचन कर बहार आयो।
भूल गयो जगदीश।
जन्म थारो हो लियो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।

दूजो सोयो माँत गोद में ,
हस हस दांत दिखाय। २
बहन भुआ सब लाड लड़ावे।
हो रयो मंगला चार।
लाड थारो होरयो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।

तीजो सोयो स्त्रिया संग में ,
गले में बाहे डाल। २
किया भोग सब रोग से दुखिया।
तन हो गयो बेकार ,
विवाह थारो होरियो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।

चोथो सोयो शमशाना में ,
लम्बे पाँव फसार।२
कहे कबीर सुणो रे भई संतों।
जीव अग्नि में जाय,
प्रण थारो हो रियो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।

फिल्म जागृति का प्रसिध्द गीत जिसका उल्लेख कुमार विश्वास ने अपने व्याख्यान में किया

आओ बच्चो, तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!

उत्तर में रखवाली करता पर्वतराज विराट है

दक्षिण में चरणों को धोता सागर का सम्राट है

जमुना जी के तट को देखो गंगा का ये घाट है

बाट-बाट में हाट-हाट में यहाँ निराला ठाठ है देखो,

ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!

ये है अपना राजपूताना नाज इसे तलवारों पे

इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे

ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे

कूद पड़ी थी यहाँ हज़ारों पद्मिनियाँ अँगारों पे

बोल रही है कण-कण से क़ुर्बानी राजस्थान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!

देखो, मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था

मुगलों की ताक़त को जिसने तलवारों पे तोला था

हर पर्वत पे आग जली थी हर पत्थर एक शोला था

बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था

शेर शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!

जलियाँवाला बाग़ ये देखो, यहीं चली थी गोलियाँ

ये मत पूछो किसने खेली यहाँ ख़ून की होलियाँ

एक तरफ़ बंदूक़ें दन-दन एक तरफ़ थी टोलियाँ

मरनेवाले बोल रहे थे इंक़लाब की बोलियाँ

यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाज़ी अपनी जान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!

ये देखो बंगाल यहाँ का हर चप्पा हरियाला है

यहाँ का बच्चा-बच्चा अपने देश पे मरनेवाला है

ढाला है इसको बिजली ने भूचालों ने पाला है

मुट्ठी में तूफ़ान बँधा है और प्राण में ज्वाला है

जन्मभूमि है यही हमारे वीर सुभाष महान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

सप्तद्वीप का भौगोलिक और पुरातन आधार

हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान में सप्त द्वीप या सात महाद्वीपों की अवधारणा नई नहीं है। पुराणों और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में विश्व के सात महाद्वीपों का स्पष्ट उल्लेख है। सप्तद्वीप उन सात पौराणिक द्वीपों को कहा जाता है, जिनमें पृथ्वी बँटी हुई है। जो चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, इक्षुरस, मदिरा, घृत, दधि, दुग्ध और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं।

भूगोल के निर्माताओं ने सात वर्ष, सात पर्वत, सात समुद्र और सात द्वीपों की कल्पना करते हुए पृथ्वी के भूगोल का नया मानचित्र फैलाया। आज के युग में पृथ्वी को 7 महाद्वीपों में बंटा गया है। ये विचारधारा आधुनिक नहीं है बल्कि हमारे हिन्दू धर्म में इसकी अवधारणा प्राचीन काल से चली आ रही है। विश्व का जो नक्शा आज हमारे पास है वह महर्षि वेदव्यास की ही देन है। वेदव्यास सप्तद्वीप पर पृथ्वी की एक पौराणिक और व्यवस्थित संरचना का वर्णन करते हैं, जो भारतीय दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान में गहराई से निहित है।पृथ्वी को 7 महाद्वीपों में बाँटने का कारण ये है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी पृथ्वी को 7 द्वीपों में ही बांटा गया है। रामायण में वर्णन है कि रावण ने इन सातों द्वीपों को जीत लिया था इसीलिए उसे”सप्तद्वीपाधिपति” कहा जाता था। इन सभी द्वीपों में अलग-अलग देश, पर्वत, नदियां और लोग निवास किया करते थे और ये सातों द्वीप सात पौराणिक समुद्रों से घिरे थे।

      अगर हम केवल 50 वर्ष पीछे जाएं तो देखेंगे कि वैज्ञानिकों ने पहले 7 महासागरों की ही परिकल्पना की थी जिसे हाल के वर्षों में 5 तक सीमित कर दिया गया है।

सप्तद्वीप की रूपरेखा 

सबके बीच में स्वर्णमय मेरु पर्वत है। मेरु को आजकल पामीर का बड़ा पठार कहा जाता है, जिसे प्राचीन परिभाषा में परम मेरु और महामेरु कहते थे। यहां भी मेरु को पृथ्वी का मध्य भाग माना गया। मेरु जिस भूभाग में था, उसकी संज्ञा इलावृत वर्ष या ऐरावत वर्ष कहते हैं।

मेरु के उत्तर में तीन वर्ष और तीन पर्वत एवं दक्षिण में भी तीन वर्ष और तीन पर्वत माने गये हैं । इस परिमंडल में कुल सात वर्ष और सात पर्वत हैं। इन सबको मिलाकर जम्बूद्वीप कहा गया। इस नाम की व्याख्या में यह कल्पना की गई की बीचों बीच में कोई जम्बू नाम का महावृक्ष है, जिस कारण द्वीप का नाम जम्बू द्वीप प्रसिद्ध हुआ। उसके फलों का रस जिस नदी में मिलता है, वह जम्बू नदी हुई और वहां की खानों से अर्थात मध्य एशिया में जो स्वर्ण उत्पन्न होता था, वह जाम्बूनद स्वर्ण कहलाया गया है।

     मेरु के दक्षिण में सबसे पहले पूर्व से पश्चिम दिशा में निषध पर्वत फैला हुआ है। उसके बाद हरिवर्ष है, फिर हेमकूट पर्वत है, जिससे सटा हुआ प्रदेश किंपुरुषवर्ष है। किंपुरुष के दक्षिण में हिमवान पर्वत है, जिससे मिला हुआ भारतवर्ष है।

    अब मेरु के उत्तर की ओर क्रमश: चलें तो पहले नील पर्वत और रमणक वर्ष मिलेगा। रमणक वर्ष को रम्यक वर्ष भी कहा गया है। उसके उत्तर में दूसरे स्थान पर श्वेत पर्वत है, जिसके वर्ष का नाम हिरण्यमय वर्ष है। हिरण्यमय को हैरण्यवत भी कहा है और वहां की नदी हैरण्यवती कही गई है। उसके और उत्तर तीसरे स्थान पर श्रृंगवान पर्वत पूर्व से पश्चिम तक फैला हुआ है, जिसके वर्ष का नाम उत्तरकुरु है। उत्तरकुरु के बाद समुद्र है। वहां समुद्रान्त प्रदेश में शांडिली देवी का निवास है, जिसे सदा प्रकाशित रहने के कारण स्वयंप्रभा भी कहा जाता था।

आज हम जिस आर्यावर्त में बैठे हैं वह जम्बूद्वीप के अंतर्गत आता था। विद्वान आज के एशिया महाद्वीप को ही प्राचीन जम्बूद्वीप मानते हैं। उसी प्रकार अन्य 7 द्वीप भी थे जिनमे अलग-अलग देश थे ,जहाँ विभिन्न राजा शासन करते थे। आज भी बिलकुल वही स्थिति है। हरेक महाद्वीप में कई देश हैं और वहाँ उनकी सरकार का शासन है। पौराणिक मेरु पर्वत को पृथ्वी का केंद्र माना जाता था। आइये अब उन सात पौराणिक द्वीपों के विषय में जानते हैं। ये सात द्वीप थे-

जंबू प्लक्षाह्वयौ द्वीपौ शाल्मलश्चापरो द्विज

कुश: क्रौंच्स्तथा शाक: पुष्करश्चैव सप्तम:।।

इस द्वीप में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महानस। सात नदियाँ हैं – अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्रस्रुति और निजधृति। यहाँ के निवासी ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक चार वर्णों में विभाजित हैं। वे प्राणायाम के द्वारा अपने रजोगुण और तमोगुण को क्षीण कर, महान समाधि के द्वारा वायुरूप श्रीहरि की आराधना करते हैं।

सनातन कथा की थीम

सनातन कथा के अनुसार स्वयम्भुव मनु के दो पुत्र हुए – प्रियव्रत और उत्तानपाद। प्रियव्रत बड़े पुत्र थे। प्रियव्रत का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मति से हुआ। इनसे दस पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ था प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से तीन पुत्रों का जन्म हुआ था।

      कहते हैं कि जब प्रियव्रत को पता चला कि सूर्य पृथ्वी के सिर्फ आधे भाग को ही प्रकाशित करता है, तो उन्होंने बाकी भूभाग को भी प्रकाशमान करने की मनोवृति लिए ज्योर्तिमय रथ पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा की।

    इस तरह रथ के पहियों से जो लीक बना वे सात समुद्र बने तथा उससे संलग्न भूभाग सप्तद्वीप कहलाये। सातो द्वीप जिनका नाम जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर था, क्रमशः क्षार, इक्षुरस, मदिरा, घी, दूध, दधि और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे थे ।

1.जम्बू द्वीप: ये चारो ओर से लवण (खारे पानी) के सागर से घिरा है। आज का एशिया महाद्वीप इसे कहा जा सकता है।

2. प्लक्ष द्वीप: ये चारो ओर से इक्षुरस (गन्ने के रस) के सागर से घिरा है।आज के दक्षिण अमेरिका का भूभाग इसे कहा जा सकता है।

3. शाल्मल द्वीप: ये चारो ओर से मदिरा (शराब) के सागर से घिरा है। वर्तमान का ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप इसका प्रतिनिधित्व करता है।

4. कुश द्वीप: ये चारो ओर से घृत (घी) के सागर से घिरा है। यह प्रशांत महासागर के आस पास फैला हुआ भूखंड है जिसे हम ओशिआनिया के नाम से जानते हैं।

5. क्रौंच द्वीप: ये चारो ओर से दधि (दही) के सागर से घिरा है।  आज का अफ्रीका महाद्वीप इसे माना जा सकता है।

6. शाक द्वीप: ये चारो ओर से दुग्ध (दूध) के सागर से घिरा है। इसे आज का यूरोप महाद्वीप कहते हैं ।

7.पुष्कर द्वीप: ये चारो ओर से मीठे जल के सागर से घिरा है। यह आज के उत्तरी अमेरिका का भूभाग।

     पृथ्वी की इस संरचना का वर्णन महर्षि पराशर ने मैत्रेय ऋषि से किया था। इन सातों द्वीपों का सम्मलित फैलाव 50,00,00,000 (पचास करोड़) योजन माना गया है।

महर्षि व्यास की दूरदृष्टि की अवधारणा

श्रीमद्भागवत पुराण विश्व के भूगोल पर एक अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह हमारे ग्रह, वसुमती, जो सात महाद्वीपों या “सप्त द्वीप” से बना है, का वर्णन करता है। यह प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की एक आकर्षक झलक प्रदान करता है।

        श्रीमद्भागवत महा पुराण- स्कन्ध: 5 अध्याय: 20 के अनुसार कथा इस प्रकार है श्री शुकदेवजी ने पहले ही परीक्षित को मनु पुत्र प्रियव्रत के द्वारा भूलोक को सात द्वीपों में बाँटने की अद्भुत कथा सुनाई थी। एक बार इन्होंने जब यह देखा कि भगवान सूर्य सुमेरु की परिक्रमा करते हुए लोका लोक पर्यन्त पृथ्वी के जितने भागको आलोकित करते हैं, उसमेंसे आधा ही प्रकाशमें रहता है और आधेमें अन्धकार छाया रहता है, तो उन्होंने इसे पसंद नहीं किया। तब उन्होंने यह संकल्प लेकर कि ‘मैं रात को भी दिन बना दूंगा;’ सूर्य के समान ही वेगवान् एक ज्योतिर्मय रथपर चढ़कर द्वितीय सूर्य की ही भाँति उनके पीछे-पीछे पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर डालीं।भगवान् की उपासना से इनका अलौकिक प्रभाव बहुत बढ़ गया था । उस समय इनके रथ के पहियों से जो लीकें बनीं, वे ही सात समुद्र हुए; उनसे पृथ्वीमें सात द्वीप हो गये ।

सप्त विभाजन

हिंदू ब्रह्माण्ड विज्ञान में, विश्व को सात संकेंद्रित द्वीप- महाद्वीपों में विभाजित बताया गया है। इनका उल्लेख पुराणों और महाभारत जैसे ग्रंथों में मिलता है। हिंदू ब्रह्माण्ड विज्ञान के अनुसार, ये सप्तद्वीप मिलकर विश्व (भू-मंडल) बनाते हैं। इन द्वीपों के नाम क्रमशः जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर हैं। प्रत्येक द्वीप अपने से पूर्ववर्ती द्वीप की तुलना में आकार में दोगुना बड़ा होता है। ये सभी समुद्रों से घिरे हुए हैं। सात समुद्र क्रमशः खारे जल, ईख के रस, मदिरा, घी, दूध, मट्ठा और मीठे जल से परिपूर्ण हैं। ये समुद्र सातों द्वीपों की खाइयों के समान हैं और अपने भीतर स्थित द्वीप के बराबर विस्तार वाले हैं। प्रत्येक समुद्र एक-एक करके क्रमशः सातों द्वीपों को बाहर से घेरता है। इसके पश्चात महाराज प्रियव्रत भूलोक के सातों द्वीप अपने पुत्रों में विभाजित कर भगवान की भक्ति में लीन हो जाते हैं।

सप्तद्वीप की अवधारणा भागवत में 

श्रीमद्भागवतम् के अनुसार- श्रीशुकदेवजी परीक्षित से आगे भूमंडल के सातों द्वीपों का विस्तार से वर्णन करते हैं।

1. जम्बू द्वीपः जम्बू वृक्षों की भूमि

जम्बूद्वीप, जिसका शाब्दिक अर्थ “जम्बू वृक्षों की भूमि” है, एशिया महाद्वीप माना जाता है। ग्रंथों में इसका वर्णन कमल के फूल के आकार का है जिसके केंद्र में सुमेरु पर्वत (संभवतः हिमालय का प्रतीक) स्थित है।जम्बूद्वीप वह स्थान है, जिसमें हम निवास करते हैं। यह भूमंडल रूप कमल के सात द्वीपों में सबसे भीतरी कोश स्थानीय द्वीप है, जो एक लाख योजन के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसका आकार कमलपत्र के समान गोलाकार है। इसमें कुल नौ खंड (वर्ष) हैं, जिनका क्षेत्रफल समान रूप से नौ-नौ हजार योजन है। इन खंडों को आठ पर्वत अलग- अलग भागों में विभाजित करते हैं। इन नौ वर्षों में से इलावृत वर्ष सबसे प्रमुख और पवित्र है, क्योंकि इसके मध्य में दिव्य मेरु पर्वत स्थित है। मेरु पर्वत से प्रवाहित अनेक पवित्र नदियाँ पूरे जम्बूद्वीप को जीवनदायिनी जलधारा से सिंचित करती हैं।

      इन वर्षों में भारतवर्ष को छोड़कर शेष सभी वर्षों को भूलोक के स्वर्ग के रूप में वर्णित किया गया है। वहाँ के निवासी त्रेतायुग समान दिव्य जीवन जीते हैं, जहाँ सौंदर्य, शक्ति और आनंद का अनवरत प्रवाह है। पर्वतों की सुरम्य घाटियाँ, आश्रम, वन-उपवन, और पुष्पों से लदे वृक्ष देवताओं के विहार के लिए सुसज्जित हैं। जलाशयों में खिले कमल और पक्षियों की मधुर चहचहाहट वातावरण को दिव्यता से भर देती है। इन वर्षों में भगवान नारायण अपनी विभिन्न मूर्तियों से निवास करते हुए वहाँ के निवासियों पर कृपा बरसाते हैं। जम्बूद्वीप के ये नौ वर्ष हैं— इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, हरिवर्ष, केतुमालवर्ष, रम्यकवर्ष, हिरण्मयवर्ष, उत्तर कुरुवर्ष, किम्पुरुषवर्ष और भारतवर्ष हैं।

2. प्लाक्ष द्रीपः प्लक्ष वृक्ष की भूमि

यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।जिस प्रकार मेरु पर्वत जम्बूद्वीप से घिरा हुआ है, वैसे ही जम्बूद्वीप भी अपने समान आकार और विस्तार वाले खारे पानी के समुद्र से घिरा हुआ है। जैसे खाई के चारों ओर बगीचा होता है, वैसे ही यह क्षार समुद्र अपने से दोगुने बड़े प्लक्षद्वीप से घिरा हुआ है। जम्बूद्वीप में जितना विशाल जामुन का वृक्ष है, उतना ही बड़ा और स्वर्ण के समान चमकने वाला प्लक्ष (पाकर) का वृक्ष यहाँ स्थित है, इसी कारण इसका नाम प्लक्षद्वीप पड़ा।  यहां के स्वामी मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे – शान्तहय, शिशिर, सुखोदय, आनंद, शिव, क्षेमक और ध्रुव।यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर  शान्तहयवर्ष, इत्यादि नाम रखे गये थे।

      इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। इस द्वीप में सात जिह्वाओं वाले अग्निदेव निवास करते हैं। इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र इध्मजिह्व थे, जिन्होंने इसे सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों को सौंप दिया और स्वयं आध्यात्मिक साधना में लीन हो गए।

      इन सात वर्षों (भागों) के नाम शिव, यवस, सुभद्र, शांत, क्षेम, अमृत और अभय हैं। प्रत्येक वर्ष में सात प्रसिद्ध पर्वत और सात नदियाँ प्रवाहित होती हैं। सात पर्वत हैं – मणिकूट, वज्रकूट, इन्द्रसेन, ज्योतिष्मान्, सुपर्ण, हिरण्यष्ठीव और मेघमाल। सात नदियाँ हैं – अरुणा, नृम्णा, आंगिरसी, सावित्री, सुप्रभाता, ऋतम्भरा और सत्यम्भरा।

     यहाँ चार वर्ण होते हैं – हंस, पतंग, ऊर्ध्वायन और सत्यांग। इन नदियों के जल में स्नान करने से लोगों के रजोगुण और तमोगुण धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। यहाँ के लोगों की आयु एक हजार वर्ष होती है और इनके शरीर देवताओं की तरह थकान व पसीना रहित होते हैं। इनकी संतानोत्पत्ति भी देवताओं की भाँति होती है। ये सभी सूर्य भगवान की उपासना करते हैं और उनकी स्तुति करते हैं। प्लक्षद्वीप और अन्य पाँच द्वीपों में जन्म लेने वाले सभी मनुष्यों को समान आयु, इंद्रिय बल, मनोबल, शारीरिक शक्ति, बुद्धि और पराक्रम प्राप्त होता है।

3 .शाल्मली द्वीप: शाल्मली वृक्षों की भूमि

शाल्मली द्वीप उस महाद्वीप को संदर्भित करता है जिसे जम्बूद्वीप के दक्षिण में स्थित माना जाता है, जिसे अक्सर अफ्रीका भी कहा जाता है। शास्त्रों में इसे एक विशाल शाल्मली वृक्ष (रेशमी-कपास वृक्ष) के आकार का बताया गया है। प्लक्षद्वीप अपने ही समान विस्तार वाले इक्षुरस (गन्ने के रस) के समुद्र से घिरा हुआ है। इसके आगे इससे दोगुने आकार का शाल्मली द्वीप स्थित है, जो अपने ही समान विस्तार वाले मदिरा (शराब) के समुद्र से घिरा हुआ है। जैसे प्लक्षद्वीप में विशाल पाकर का वृक्ष है, वैसे ही शाल्मली द्वीप में उतना ही बड़ा शाल्मली (सेमर) का वृक्ष है। कहा जाता है कि यही वृक्ष अपने वेदमय पंखों से भगवान की स्तुति करने वाले पक्षिराज गरुड का निवास स्थान है, और इसी कारण इस द्वीप का नाम शाल्मली द्वीप पड़ा।

    इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र यज्ञबाहु थे। उन्होंने इसे सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों को सौंप दिया। इन भागों के नाम हैं – सुरोचन, सौमनस्य, रमणक, देववर्ष, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात। यहाँ भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – स्वरस, शतशृंग, वामदेव, कुन्द, मुकुन्द, पुष्पवर्ष और सहस्र श्रुति। सात नदियाँ हैं – अनुमति, सिनीवाली, सरस्वती, कुहू, रजनी, नन्दा और राका। इस द्वीप में श्रुतधर, वीर्यधर, वसुन्धर और इषन्धर नाम के चार वर्ण निवास करते हैं। ये सभी वेदमंत्रों के द्वारा चन्द्रदेव की उपासना करते हैं और उनकी स्तुति में स्तोत्र गाते हैं।

4. कुशद्वीप : कुश घास की भूमि

कुशद्वीप, जिसका अर्थ है “कुश घास की भूमि”, जम्बूद्वीप के पश्चिम में स्थित माना जाता है, जो संभवतः यूरोप के अनुरूप है। ग्रंथों में इसे त्रिभुजाकार और इस पवित्र घास से आच्छादित बताया गया है। मदिरा (शराब) के समुद्र से आगे, उससे दोगुने आकार का कुशद्वीप स्थित है। यह भी पहले बताए गए द्वीपों की तरह अपने ही समान विस्तार वाले घृत (घी) के समुद्र से घिरा हुआ है। इस द्वीप में भगवान द्वारा रचा गया एक कुश घास का झाड़ है, और इसी के कारण इसका नाम कुशद्वीप पड़ा। इसकी कोमल शिखाएँ इतनी तेजस्वी हैं कि दूसरे अग्निदेव की तरह अपनी आभा से सभी दिशाओं को प्रकाशित करती रहती हैं।

       इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र हिरण्यरेता थे। उन्होंने इस द्वीप को सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों – वसु, वसुदान, दृढ़रुचि, नाभिगुप्त, स्तुत्यव्रत, विविक्त और वामदेव को सौंप दिया और स्वयं तपस्या में लीन हो गए। इस द्वीप की सीमाओं को निर्धारित करने वाले सात पर्वत और सात नदियाँ हैं। सात पर्वत हैं – चक्र, चतुःशृंग, कपिल, चित्रकूट, देवानीक, ऊर्ध्वरोमा और द्रविण। सात नदियाँ हैं – रसकुल्या, मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतविन्दा, देवगर्भा, घृतच्युता और मन्त्रमाला। इन नदियों के जल में स्नान करके कुशद्वीप के निवासी – कुशल, कोविद, अभियुक्त और कुलक नाम के चार वर्ण, अग्निस्वरूप भगवान हरि की यज्ञ और अन्य धार्मिक कर्मकौशल के द्वारा उपासना करते हैं।

5.क्रौंचद्वीप

क्रौंच (सारस) पक्षी की भूमि क्रौंचद्वीप, या “क्रौंच पक्षी की भूमि”, जम्बूद्वीप के उत्तर में स्थित माना जाता है, जो संभवतः उत्तरी अमेरिका का प्रतिनिधित्व करता है। शास्त्रों में इसे सारस के आकार का और सुखद जलवायु वाला बताया गया है। घी के समुद्र से आगे, उससे दो गुने विस्तार वाला क्रौंचद्वीप स्थित है। जिस प्रकार कुशद्वीप घी के समुद्र से घिरा हुआ था, वैसे ही क्रौंचद्वीप अपने ही समान विस्तार वाले दूध के समुद्र से घिरा हुआ है। इस द्वीप में क्रौंच नाम का एक विशाल पर्वत स्थित है, और इसी के कारण इसका नाम क्रौंचद्वीप पड़ा। प्राचीन काल में श्री स्वामी कार्तिकेयजी के शस्त्र प्रहार से इस पर्वत का मध्य भाग तथा इसकी लताएँ, वन-उपवन क्षत-विक्षत हो गए थे। लेकिन बाद में, क्षीरसमुद्र (दूध के समुद्र) से सिंचित होकर और वरुणदेव की सुरक्षा से यह पुनः निर्भय हो गया।

     इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र घृतपृष्ठ थे। उन्होंने इस द्वीप को सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों— आम, मधुरुह, मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, लोहितार्ण और वनस्पति— को सौंप दिया और स्वयं सन्यास धारण कर लिया। इन सात क्षेत्रों में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – शुक्ल, वर्धमान, भोजन, उपबर्हिण, नन्द, नन्दन और सर्वतोभद्र। सात नदियाँ हैं – अभया, अमृतौघा, आर्यका, तीर्थवती, वृत्तिरूपवती, पवित्रवती और शुक्ला। इन नदियों के शुद्ध और पवित्र जल का सेवन करने वाले इस द्वीप के निवासी ऋषभ, द्रविण और देवक नाम के तीन वर्णों में विभाजित हैं। वे जल-देवता की उपासना करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करते हैं।

6. शाकद्वीप शक द्वीपः शकों की भूमि

शाकद्वीप का तात्पर्य जम्बूद्वीप के पूर्व में स्थित महाद्वीप से है, जो संभवतः दक्षिण-पूर्व एशिया और ओशिनिया से संबंधित है। ग्रंथों में इसका वर्णन शकों द्वारा निवासित बताया गया है, जिनका उल्लेख प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। क्षीरसमुद्र (दूध के समुद्र) के आगे, उससे भी दुगुने परिमाण वाला शाकद्वीप स्थित है। यह द्वीप अपने ही समान विस्तार वाले दही के समुद्र से घिरा हुआ है। इसमें शाक (सागौन) नामक एक विशाल वृक्ष है, जिसकी अत्यंत मनोहर सुगंध से संपूर्ण द्वीप महकता रहता है। यही वृक्ष इस द्वीप के नामकरण का कारण बना। इस द्वीप के अधिपति प्रियव्रत के पुत्र महाराज मेधातिथि थे। उन्होंने इसे सात वर्षों में विभक्त कर उन्हीं के समान नाम वाले अपने सात पुत्रों— पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप और विश्वधार— को सौंप दिया। फिर वे स्वयं भगवान अनन्त (शेषनाग) में दत्तचित्त होकर तपोवन चले गए।

    इस द्वीप में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महानस। सात नदियाँ हैं – अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्रस्रुति और निजधृति। यहाँ के निवासी ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक चार वर्णों में विभाजित हैं। वे प्राणायाम के द्वारा अपने रजोगुण और तमोगुण को क्षीण कर, महान समाधि के द्वारा वायुरूप श्रीहरि की आराधना करते हैं।

7. पुष्करद्वीप

इस प्रकार पुष्करद्वीप सातों द्वीपों में सबसे बड़ा है, जो दही के समुद्र से भी आगे, चारों ओर मीठे जल के समुद्र से घिरा हुआ है। यहाँ एक विशाल स्वर्णमय कमल (पुष्कर) स्थित है, जिसकी लाखों चमकदार पंखुड़ियाँ अग्नि की लौ जैसी देदीप्यमान हैं। इसी कारण इसे ब्रह्माजी का आसन माना जाता है।

    इस द्वीप के मध्य में मानसोत्तर नामक एक विशाल पर्वत है, जो इसके पूर्वी और पश्चिमी भागों को विभाजित करता है। यह पर्वत दस हजार योजन ऊँचा और उतना ही लंबा है। इसकी चारों दिशाओं में इन्द्र आदि लोक पालों की चार पुरियाँ स्थित हैं। इसी पर्वत के ऊपर मेरु पर्वत के चारों ओर परिक्रमा करने वाला सूर्य का रथ उत्तरायण और दक्षिणायन के क्रम में निरंतर गति करता है, जिससे देवताओं के दिन और रात बनते हैं।  प्रियव्रत के पुत्र वीतिहोत्र इस द्वीप के राजा थे। उन्होंने अपने दो पुत्रों— रमणक और धातकि— को द्वीप के दो भागों का अधिपति बना दिया और स्वयं भगवान की भक्ति में लीन हो गए। यहाँ के निवासी ब्रह्मस्वरूप भगवान श्रीहरि की आराधना करते हैं, जिससे वे ब्रह्मलोक की प्राप्ति कर सकते हैं। मेरु पर्वत से लेकर मानसोत्तर पर्वत तक जितना अंतर है, उतनी ही भूमि शुद्ध जल के समुद्र के उस पार स्थित है। वहां सुवर्णमयी भूमि है, जो दर्पण जैसी स्वच्छ है। इस भूमि में गिरा हुआ कोई भी पदार्थ फिर से नहीं मिलता, इसलिए वहां देवताओं के अलावा और कोई प्राणी नहीं रहता।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

पल्लवी दरक न्याती का त्रिवेणी पुस्तक लोकार्पण समारोह

अखिल भारतीय साहित्य परिषद कोटा इकाई के तत्वावधान में  पल्लवी दरक न्याती की तीन पुस्तकों नमक मीठा चीनी खारी – काव्य संग्रह, दर्शन वंदन – भक्ति गीत संग्रह और सागर सीप – आलेख संग्रह का लोकार्पण मौजी बाबा धाम पर किया गया। सभी साहित्यकारों ने  कृतियों की सराहना की । कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य परिषद के अध्यक्ष एवं पूर्व महापौर महेश विजय ने की। डॉ. बी. सी. तेलंग मुख्य अतिथि रहे जबकि कोटा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. आदित्य कुमार गुप्ता एवं साहित्यकार विष्णु शर्मा हरिहर विशिष्ठ अतिथि रहे। साहित्यकार रामेश्वर शर्मा रामू भैया ने  नमक मीठा चीनी खारी का परिचय देते हुए काव्य उद्धरण प्रस्तुत किया –
कोई ना किसी के साथ में
हर मानव अवसाद में
क्या जड़ क्या है चेतना
 शीला बनी संवेदना
 इच्छाएं जीवन पर भारी
 नमक है मीठा चीनी खारी
 डॉ. विजय न्याती ने दर्शन वंदन-भक्ति गीत संग्रह का परिचय देते हुए उद्धरण प्रस्तुत किया –
मैं ढूंढ रही जग में ऐसा गुरु मिल जाए
चंदा की किरण जैसे मन शीतलता पाए
मैं माया मोह फंसु  मन लालच डेरा है
 विषयों की वासना से चहुं और अंधेरा है
निर्मल हो जाए मन गंगाजल मिल जाए
चंदा की किरण जैसे मन शीतलता पाए
डॉ. इंदु बाला शर्मा ने सागर सीप आलेख संग्रह का परिचय देते हुए कहा कि कृति के आलेख बताते हैं मानव का धर्म है औरों के लिए जीना और परहित काम करना। स्वयं जलकर भी दूसरों के जीवन को रोशन करना। ऐसे अद्भुत मानवों की हर समाज को तलाश है, जो खुद दीया बनाकर जलता रहे ,परंतु हर अंधेरे मन में प्रकाश की किरणें फैलाएं।
  राम मोहन कौशिक ने आभार प्रदर्शन किया। साहित्यकार  राजेंद्र मोरप्पा ने सहयोग प्रदान किया। संचालन अनुराधा शर्मा ने किया। शहर के अनेक साहित्यकार उपस्थित रहे।

नदी-नाले पार कर बचाया गया भविष्य: ‘बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़’ अभियान को मिल रही जमीनी मजबूती

रायपुर/ मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा संचालित “बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़” अभियान जमीनी स्तर पर प्रभावी रूप से साकार होता नजर आ रहा है। महिला एवं बाल विकास विभाग एवं जिला प्रशासन की सतर्कता और संवेदनशीलता के चलते दुर्गम एवं पहुँचविहीन क्षेत्र में नदी-नाले पार कर 12 वर्षीय बालिका का बाल विवाह समय रहते रोका गया। इस त्वरित कार्रवाई से न केवल एक मासूम का भविष्य सुरक्षित हुआ, बल्कि समाज में बाल विवाह जैसी कुप्रथा के विरुद्ध सशक्त संदेश भी गया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार 02 जनवरी 2026 को प्रशासन को सूचना मिली कि सुकमा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत रामाराम के सुदूर गांव नाड़ीगुफा में एक नाबालिक बालिका का विवाह किया जा रहा है। सूचना को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर के मार्गदर्शन में तत्काल आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए गए। इसके पश्चात जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी के नेतृत्व में जिला बाल संरक्षण इकाई, चाइल्ड लाइन तथा विभागीय अमले की संयुक्त टीम गठित की गई। टीम ने उफनते नदी-नालों और अत्यंत दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद पैदल यात्रा कर गांव तक पहुँच बनाई और समय रहते विवाह प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया।

मौके पर यह पाया गया कि पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह की सभी तैयारियां पूर्ण हो चुकी थीं। अधिकारियों द्वारा संवेदनशीलता के साथ परिजनों एवं ग्रामीणों को बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के प्रावधानों, कानूनी दायित्वों तथा इसके गंभीर सामाजिक दुष्परिणामों की जानकारी दी गई। प्रशासन की समझाइश का सकारात्मक प्रभाव पड़ा और परिजनों ने स्वेच्छा से बाल विवाह रोकने का निर्णय लिया। ग्रामीणों की उपस्थिति में विधिवत पंचनामा तैयार कर कार्रवाई को औपचारिक रूप दिया गया।

कार्रवाई के दौरान बालिका को पुनः शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने तथा उसके सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य के लिए परिजनों को प्रेरित किया गया। साथ ही शासन की विभिन्न बाल संरक्षण एवं शिक्षा से संबंधित योजनाओं की जानकारी भी उपलब्ध कराई गई।

उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय द्वारा 10 मार्च 2024 को “बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़” अभियान का शुभारंभ किया गया था। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 की धारा 16 के अंतर्गत राज्य शासन द्वारा 13,823 बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों को अधिसूचित किया गया है। अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप नवंबर 2025 तक प्रदेश में 189 बाल विवाह रोके जा चुके हैं। राज्य सरकार के निरंतर प्रयासों एवं जनसहभागिता के चलते बालोद जिला पूर्णतः बाल विवाह मुक्त जिला घोषित किया जा चुका है, जो पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणास्रोत है। वर्ष 2025-26 के लिए राज्य शासन ने 31 मार्च 2026 तक राज्य की 50 प्रतिशत ग्राम पंचायतों एवं नगरीय निकायों को बाल विवाह मुक्त घोषित करने तथा 31 मार्च 2029 तक छत्तीसगढ़ को पूर्णतः बाल विवाह मुक्त राज्य बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय एवं महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े ने स्पष्ट किया है कि बच्चों का सुरक्षित, शिक्षित एवं गरिमामय भविष्य सुनिश्चित करना राज्य सरकार की सर्वाेच्च प्राथमिकता है। बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथाओं के उन्मूलन हेतु प्रशासनिक सतर्कता, जनजागरूकता एवं त्वरित कार्रवाई आगे भी निरंतर जारी रहेगी।

वेदांता के जनक अनिल अग्रवाल को बेटे की मौत से लगा गहरा सदमा, 75 प्रतिशत संपत्ति दान करेंगे

दिग्गज माइनिंग कंपनी वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल के बेटे अग्निवेश अग्रवाल अब नहीं रहे। अनिल अग्रवाल ने X (पूर्व नाम Twitter) पर 7 जनवरी को अपनी जिंदगी का सबसे अधिक अंधेरे वाला दिन कहा। उन्होंने बताया कि 49वर्षीय अग्निवेश का अमेरिका में स्कीइंग के दौरान एक्सीडेंट हो गया था और वह न्यूयॉर्क के माउंट सिनाई हॉस्पिटल में रिकवर हो रहे थे लेकिन एकाएक हार्ट अटैक के चलते उनका निधन हो गया। अग्निवेश की बात करें तो उनका परिचय सिर्फ वेदांता ग्रुप के फाउंडर और चेयरमैन का बेटा होना ही नहीं है बल्कि कॉरपोरेट इंडस्ट्री में उनकी अपनी एक अलग पहचान थी। वह तलवंडी साबो पावर लिमिटेड (TCPL) के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में एक थे।

अग्निवेश का जन्म 3 जून, 1976 को पटना में अनिल और किरण अग्रवाल की बिहारी मिडिल क्लास फैमिली में हुआ था। अग्निवेश ने अजमेर के मशहूर मेयो कॉलेज में अपनी शुरुआती शिक्षा हासिल की और बाद में मुंबई आकर मुंबई विश्वविद्यालय से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने एक सफल प्रोफेशनल करियर बनाया। ध्यान दें कि उन्हें सिर्फ विरासत ही नहीं मिली बल्कि उन्होंने खुद एक विरासत का निर्माण किया। कॉरपोरेट सेक्टर में उनके पास करीब दो दशकों का अनुभव था।

अनिल अग्रवाल और उनके परिवार की कुल संपत्ति करीब 4.2 अरब डॉलर यानी लगभग 35,000 करोड़ रुपये है.

अनिल अग्रवाल Vedanta Resources के फाउंडर और चेयरमैन हैं. उन्होंने 1976 में इस कंपनी की शुरुआत एक छोटी केबल कंपनी से की थी. बहुत कम उम्र में उन्होंने अपने पिता के साथ स्क्रैप के काम से बिजनेस की दुनिया में कदम रखा.कई बार असफल होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और धीरे धीरे Vedanta को मेटल, माइनिंग, पावर और ऑयल जैसे बड़े सेक्टर में खड़ा किया.एक साधारण परिवार से निकलकर अरबों की कंपनी बनाने वाले अनिल अग्रवाल की कहानी आम लोगों के लिए भी प्रेरणा है.

अनिल अग्रवाल का परिवार हमेशा से सादगी और संस्कारों  के लिए जाना जाता रहा है. परिवार में उनकी पत्नी किरण अग्रवाल हैं, जो लाइमलाइट से दूर रहकर परिवार की धुरी बनी रही हैं. उनके दो बच्चे थे. बेटे अग्निवेश अग्रवाल और बेटी प्रिया अग्रवाल. हाल ही में बेटे अग्निवेश का अमेरिका में इलाज के दौरान कार्डियक अरेस्ट से निधन हो गया, जिससे पूरा परिवार गहरे सदमे में है. बेटे के निधन के बाद अग्निवेश के बारे में बताते हुए अनिल अग्रवाल ने कहा कि वह सिर्फ एक बेटा नहीं, बल्कि उनका सबसे करीबी दोस्त और गर्व था।

अग्निवेश अग्रवाल ने बिजनेस  दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई थी. उन्होंने ‘Fujairah Gold’ जैसी कंपनी खड़ी की थी और Hindustan Zinc के चेयरमैन भी रहे. वह Vedanta Group की कंपनी Talwandi Sabo Power Limited के बोर्ड में शामिल थे.

उनकी बेटी प्रिया अग्रवाल वर्तमान में Vedanta और Hindustan Zinc के बोर्ड में शामिल हैं और हिंदुस्तान जिंक की चेयरपर्सन के तौर पर बड़ी जिम्मेदारियां संभाल रही हैं.  बिजनेस में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है और आने वाले समय में Vedanta की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर रहने की उम्मीद है.

एक स्क्रैप  यानी कबाड़ व्यापारी से अपना सफर शुरू करने वाले अनिल अग्रवाल आज भारत के सबसे अमीर व्यक्तियों में शुमार हैं. फोर्ब्स (Forbes) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, अनिल अग्रवाल और उनके परिवार की कुल संपत्ति करीब 4.2 अरब डॉलर यानी लगभग 35,000 करोड़ रुपये है.

वेदांता साल 2003 में London Stock Exchange में लिस्ट होने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी. बाद में 2019 में अनिल अग्रवाल ने कंपनी को फिर से प्राइवेट कर लिया. मेटल, माइनिंग, पावर और ऑयल एंड गैस जैसे बड़े सेक्टर में फैले वेदांता ग्रुप का कारोबार आज भारत ही नहीं बल्कि विदेशों तक फैला हुआ है.

75% दौलत दान करने का संकल्प

इतनी बड़ी संपत्ति के मालिक होने के बावजूद अनिल अग्रवाल अपनी सादगी और दानवीर स्वभाव के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने ‘Giving Pledge’ के तहत अपनी 75 फीसदी संपत्ति समाज सेवा के लिए दान करने का वादा किया है. अनिल अग्रवाल ने पहले ही ऐलान कर रखा है कि वह अपनी कमाई का 75 फीसदी हिस्सा समाज के कामों में लगाएंगे.बेटे के निधन के बाद उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि अब वह और भी सादगी से जीवन बिताएंगे और अग्निवेश के सपनों को पूरा करने के लिए समाज सेवा के कामों को और तेजी से आगे बढ़ाएंगे.

अग्निवेश अग्रवाल का 49 साल की उम्र में निधन परिवार के लिए सबसे बड़ा झटका है.अब जबकि वह इस दुनिया में नहीं हैं, अनिल अग्रवाल का पूरा ध्यान अपनी बेटी प्रिया अग्रवाल और उनके साथ मिलकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने के मिशन होगा. आने वाले समय में वह ग्रुप की बड़ी जिम्मेदरी संभालती नजर आ सकती हैं.

अनिल अग्रवाल ने बताया कि अग्निवेश का सपना था कि देश में कोई बच्चा भूखा न सोए और हर युवा को काम मिले, इसी संकल्प को और हर युवा को काम मिले, इसी संकल्प को लेकर अब अग्रवाल परिवार आगे बढ़ने जा रहा है.

बेटे के निधन के बाद वेदांता चेयरमैन अनिल अग्रवाल दान करेंगे 75% संपत्ति, बोले- ‘सादगी से जिउंगा, पूरी जिंदगी’Forbes के मुताबिक, अनिल अग्रवाल की कुल नेटवर्थ 4.2 अरब डॉलर है, जो भारतीय रुपये में लगभग 35,000 करोड़ रुपये के आसपास है. वेदांता, माइनिंग, पावर और ऑयल जैसे बड़े सेक्टर में काम करती है और भारत के साथ विदेशों में भी कंपनी की मौजूदगी है.

वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल इस वक्त अपनी जिंदगी के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. बेटे अग्निवेश अग्रवाल के अचानक निधन ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया है. इस गहरे दुख के बीच उन्होंने एक बड़ा फैसला दोहराया है, जिसने सबका ध्यान खींचा है. अनिल अग्रवाल ने कहा है कि वह अपनी कमाई का 75 फीसदी से ज्यादा हिस्सा दान करेंगे. इसे वह समाजिक कामों में लगाएंगे और आगे की जिंदगी और भी सादगी से जिएंगे.

अनिल अग्रवाल ने अपने भावुक पोस्ट में लिखा कि उन्होंने यह वादा अपने बेटे अग्निवेश से किया था. उन्होंने कहा कि जो भी कमाया है, उसका बड़ा हिस्सा समाज को लौटाया जाएगा. बेटे के जाने के बाद उन्होंने यह संकल्प और मजबूत किया है और कहा है कि अब उनकी बाकी जिंदगी इसी मकसद के लिए होगी.

आज मेरे जीवन का सबसे दर्दनाक दिन है।
मेरा अग्निवेश, मेरा 49 साल का बेटा, आज हमारे बीच नहीं रहा। एक बाप के कंधे पर बेटे की अर्थी जाये इससे बुरा और क्या हो सकता है। अग्निवेश अपने दोस्त के साथ अमेरिका में skiing करने गया था। वहां accident हो गया। वो Mount Sinai Hospital, New York में ठीक हो रहा था। हमें लगा सब ठीक हो जाएगा… लेकिन अचानक cardiac arrest हो गया। और हमारा बच्चा हमें छोड़कर चला गया।

3 जून 1976 को पटना में जब अग्नि हमारी दुनिया में आया, वो पल आज भी आंखों के सामने है। एक middle class Bihari परिवार में जन्मा था अग्नि।
तुम्हारे साथ बिताया गया हर एक पल आज बहुत याद आ रहा है बेटा।
अपनी माँ का दुलारा अग्नि बचपन में बेहद चंचल और शरारती था। हमेशा हँसता, हमेशा मुस्कुराता| यारों का यार था वो, और अपनी बहन Priya को लेकर सबसे प्रोटेक्टिव भी।
उसने Mayo College, Ajmer में पढ़ाई की। बेहद strong personality थी अग्नि की – boxing champion, horse riding का शौकीन, और कमाल का musician। उसने Fujairah Gold जैसी शानदार कंपनी खड़ी की, और Hindustan Zinc का Chairman भी बना।
लेकिन इन सबसे ऊपर अग्नि बेहद simple था। हमेशा अपने friends और colleagues के बीच में ही रहता था। जिससे भी मिलता, उसे अपना बना लेता था। वो हमेशा ज़मीन से जुड़ा रहा सीधा, सच्चा, जिंदादिली और इंसानियत से भरा।
वो सिर्फ बेटा नहीं था – वो मेरा दोस्त था, मेरी शान था, मेरी पूरी दुनिया था।
मैं और किरन टूट से गए हैं। बस यही सोच रहे हैं कि हमारा बेटा तो चला गया। लेकिन जो लोग हमारे वेदांता में काम करते हैं, वो सब अग्निवेश ही तो हैं। वो सब हमारे बेटे-बेटियां हैं।
अग्नि और मेरा सपना था, हिंदुस्तान को आत्मनिर्भर बनाना। वो हमेशा कहता था – “पापा, हमारे देश में क्या नहीं है? फिर हम किसी से पीछे क्यों रहें?”
हमारी दिली इच्छा यही रही कि देश का कोई बच्चा भूखा न सोए, कोई बच्चा अनपढ़ न रहे, हर महिला अपने पैरों पर खड़ी हो, और सभी युवाओं को रोज़गार मिले।
मैंने अग्निवेश से वादा किया था हमारे पास जितना भी धन आएगा, उसका 75% से ज्यादा समाज के काम में लगायेंगे। आज फिर वो वादा दोहराता हूँ। अब और भी सादगी से जीवन जीऊंगा। और अपनी बाकी जिंदगी इसी में लगा दूंगा।
हम उन सभी मित्रों, सहकर्मियों और शुभचिंतकों का दिल से धन्यवाद करते हैं जो हमेशा अग्निवेश के साथ रहे।
अभी तो साथ मिलकर बहुत कुछ करना था अग्नि। तुम्हें पूरी जिंदगी जीनी थी। कितने सपने थे, कितने अरमान थे, सब कुछ अधूरा ही रह गया। समझ नहीं आता, तुम्हारे बिना अब ज़िन्दगी कैसे कटेगी बेटा।
तुम्हारे बिना ज़िंदगी हमेशा अधूरी रहेगी, लेकिन तुम्हारे सपने अधूरे नहीं रहने दूंगा।

भूख से मुक्ति का राष्ट्रीय संकल्प है अटल कैंटीन योजना

भूख केवल एक शारीरिक पीड़ा नहीं है, वह सामाजिक असंतुलन, मानसिक कुंठा और नैतिक विचलन की जननी भी है। इतिहास साक्षी है कि जब पेट खाली होता है, तो विचार उग्र हो जाते हैं, व्यवस्था के प्रति विश्वास डगमगाने लगता है और विद्रोह की भावना पनपती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे पहली जिम्मेदारी यह होती है कि उसका कोई भी नागरिक भूखा न रहे। इसी बुनियादी और मानवीय सोच के साथ दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार द्वारा शुरू की गई रुपये 5 में भोजन उपलब्ध कराने की ‘अटल कैंटीन योजना’ निस्संदेह एक दूरदर्शी, करुणामय, मानवीय और जनकल्याणकारी पहल है। इस योजना का उद्देश्य अत्यंत स्पष्ट और मानवीय है कि दिल्ली में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। राजधानी जैसे महानगर में, जहाँ एक ओर समृद्धि और चमक-दमक है, वहीं दूसरी ओर असंगठित श्रमिक, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शाचालक, ठेला-पटरी वाले, घरेलू कामगार और बेघर लोग भी बड़ी संख्या में रहते हैं। इनके लिए दो वक्त का सम्मानजनक और पौष्टिक भोजन आज भी एक चुनौती बना हुआ है। अटल कैंटीन योजना इन्हीं वर्गों के लिए जीवनरेखा बनकर सामने आई है, जो ‘संकल्प से सिद्धि’ के लक्ष्य को दर्शाता है और इसे देश में भोजन सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
इस योजना का शुभारंभ भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती पर किया जाना केवल एक औपचारिक तिथि चयन नहीं, बल्कि एक वैचारिक निरंतरता का प्रतीक है। अटलजी का संपूर्ण राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन अंत्योदय अर्थात समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के विचार से प्रेरित रहा। वर्ष 2000 में शुरू की गई अंत्योदय अन्न योजना ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अटलजी के लिए गरीब केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि नीति का केंद्र था। उस योजना के अंतर्गत अत्यंत गरीब परिवारों को रियायती दरों पर अनाज उपलब्ध कराया गया, जिससे करोड़ों लोगों को भुखमरी से राहत मिली। अटल कैंटीन योजना उसी सोच का आधुनिक शहरी संस्करण है, जहाँ अनाज के बजाय तैयार, पौष्टिक और स्वच्छ भोजन सीधे थाली में परोसा जा रहा है। यह नीतिगत निरंतरता इस बात का प्रमाण है कि सुशासन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि संवेदनशील क्रियान्वयन से साकार होता है। अटल कैंटीन में भोजन की कीमत रुपये 5 रखी गई है, जबकि सरकार प्रत्येक थाली पर रुपये 25 की सब्सिडी दे रही है। यह मूल्य निर्धारण अत्यंत सोच-समझकर किया गया है। भोजन पूरी तरह मुफ्त न देकर एक न्यूनतम राशि तय करने का उद्देश्य यह है कि भोजन की कद्र बनी रहे और लाभार्थी इसे भीख नहीं, बल्कि अधिकार और सम्मान के रूप में ग्रहण करे। यह नीति सामाजिक मनोविज्ञान को समझने का उत्कृष्ट उदाहरण है।
रेखा गुप्ता सरकार ने सीमित संसाधनों के बावजूद जनकल्याण को प्राथमिकता देते हुए जिस संवेदनशीलता, निर्णय क्षमता और प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया है, वह उनके प्रभावी राजनीतिक नेतृत्व को रेखांकित करता है; अटल कैंटीन जैसी योजनाएँ बताती हैं कि वे शासन को सत्ता नहीं, सेवा का माध्यम मानती हैं। किंतु सर्दी के इस कठोर मौसम में दिल्ली की सड़कों, फुटपाथों और फ्लाईओवरों के नीचे ठिठुरती रातें काटने को विवश गरीब और बेघर लोगों के लिए केवल मौसमी रैन-बसेरे पर्याप्त नहीं हैं, आवश्यकता एक स्थायी, समन्वित और मानवीय शीत-रक्षा योजना की है, जिसमें अस्थायी आश्रय के साथ गरम वस्त्र, पौष्टिक भोजन, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा और पुनर्वास की स्पष्ट व्यवस्था हो, ताकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी की सड़कों पर कोई भी व्यक्ति सर्द रात में बेसहारा और अदृश्य न रहे; ऐसा कदम न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता का प्रमाण होगा, बल्कि लोकतंत्र की नैतिक जिम्मेदारी का भी सशक्त निर्वाह बनेगा।
महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि उपलब्ध कराया जा रहा भोजन पोषण मानकों के अनुरूप है। भोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए एफएसएसएआई मानकों का पालन किया जाता है, जिसमें प्रति थाली 700-800 कैलोरी और 20-25 ग्राम प्रोटीन होता है। डिजिटल टोकन, सीसीटीवी और निगरानी के साथ पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है। प्रत्येक कैंटीन प्रतिदिन लगभग 1000 लोगों को भोजन परोसने की क्षमता रखी है, और 100 कैंटीन खोलने का लक्ष्य है। दाल, सब्जी, रोटी/चावल जैसे संतुलित आहार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिसमें आरओ वाटर एवं अचार आदि भी परोसा जा रहा है ताकि यह योजना केवल पेट भरने तक सीमित न रहकर स्वास्थ्य सुधार में भी योगदान दे सके।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा गरीबों और निम्न आय वर्ग के लिए मुफ्त एवं रियायती अनाज योजनाएँ लगातार संचालित की जा रही हैं। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी पहलों ने संकट काल में करोड़ों परिवारों को राहत दी है। इन योजनाओं का मूल दर्शन यही है कि भूखा नागरिक न आत्मनिर्भर बन सकता है और न ही राष्ट्रनिर्माण में भागीदार। रेखा गुप्ता सरकार की अटल कैंटीन योजना इन राष्ट्रीय प्रयासों के साथ सामंजस्य स्थापित करती है। यह दर्शाती है कि केंद्र और राज्य, यदि समान मानवीय दृष्टि से काम करें, तो सामाजिक समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से संभव है। समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र दोनों ही इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि भुखमरी और अपराध के बीच गहरा संबंध होता है। जब व्यक्ति की मूल आवश्यकताएँ पूरी नहीं होतीं, तो वह व्यवस्था के प्रति विद्रोही दृष्टिकोण अपनाने लगता है। यही कारण है कि अनेक महान नेताओं ने यह कहा है कि गरीब को पहले रोटी दो, उपदेश बाद में।
भूखे को खिलाना किसी प्रकार का राजनीतिक प्रलोभन नहीं है। यह सच्ची राष्ट्रभक्ति, मानवीय कर्तव्य और सामाजिक सुरक्षा का आधार है। अटल कैंटीन जैसी योजनाएँ अपराध को नियंत्रित करने, सामाजिक असंतोष को कम करने और लोकतंत्र में विश्वास को मजबूत करने का कार्य करती हैं। हालाँकि, किसी भी जनकल्याणकारी योजना की सफलता केवल उसकी घोषणा से नहीं, बल्कि उसके पारदर्शी, निगरानी और ईमानदार क्रियान्वयन से तय होती है। यह अत्यंत आवश्यक है कि अटल कैंटीन योजना को भ्रष्टाचार, अपव्यय और लापरवाही से पूरी तरह मुक्त रखा जाए। खाद्य सामग्री की खरीद, भोजन की गुणवत्ता, लाभार्थियों की पहुँच, वित्तीय प्रबंधन और संचालन व्यवस्था-हर स्तर पर सख्त निगरानी, नियमित ऑडिट और सामाजिक सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। यदि इस योजना में किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार प्रवेश करता है, तो वह न केवल सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग होगा, बल्कि गरीब के विश्वास के साथ भी विश्वासघात होगा।
दिल्ली की यह पहल देश के अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकती है। शहरीकरण के इस दौर में लगभग हर बड़े शहर में श्रमिक और निम्न आय वर्ग भोजन संकट से जूझ रहा है। यदि प्रत्येक राज्य अपनी परिस्थितियों के अनुसार ऐसी योजनाएँ विकसित करे, तो देश से भुखमरी को काफी हद तक समाप्त किया जा सकता है। यह समझना आवश्यक है कि ऐसी योजनाएँ खर्च नहीं, बल्कि सामाजिक निवेश हैं। यह निवेश समाज को स्थिरता, शांति और विश्वास लौटाता है। अंततः रुपये 5 की थाली केवल भोजन नहीं है। यह करुणा, गरिमा और सामाजिक न्याय की अभिव्यक्ति है। यह अटल बिहारी वाजपेयी की अंत्योदय सोच और नरेन्द्र मोदी के वर्तमान नेतृत्व की मानवीय दृष्टि का सार्थक संगम है। रेखा गुप्ता सरकार की यह पहल यह संदेश देती है कि सुशासन वही है, जो सबसे पहले सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुँचे। यदि इस योजना को पारदर्शिता, ईमानदारी और निरंतरता के साथ आगे बढ़ाया गया, तो यह न केवल दिल्ली, बल्कि पूरे देश के लिए भूख-मुक्त भारत की दिशा में एक मजबूत कदम सिद्ध होगी।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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हिंदी भाषा, संस्कृति, परिवेश को संजोने के लिए एक जुट हो कर कार्य करना होगा

कोटा । आज हिंदी भाषा, हमारी संस्कृति और हमारे परिवेश को संजोने की महत्ती आवश्यकता है। इसके लिए हम समस्त भारतवासियों को एकजुट होकर कार्य करना पड़ेगा। यह विचार उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व राज्य मंत्री रविकांत गर्ग ने व्यक्त किए। वे नाथद्वारा में आयोजित भगवती प्रसाद देवपुरा स्मृति बाल साहित्य सम्मान समारोह के दूसरे दिन मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने हिंदी भाषा के विकास के सेनानी श्री भगवती प्रसाद को स्मरण करते हुए कहा  कि आज यदि हमारी भाषा जीवित रही तो हमारी संस्कृति भी जीवित रह सकेगी अन्यथा हम अपने लक्ष्य से भटक जाएंगे। उन्होंने हिंदी भाषा सेवियों को सम्मानित करते हुए कहा  कि आज हिंदी भाषा के साहित्यकार एवं विद्वानों को हिंदी के प्रति पूर्ण समर्पण रखना चाहिए। उन्हें हिंदी के विकास के लिए साहित्यकारों को कुछ इस तरह की सृजन करना चाहिए कि जिससे हिंदी का पाठक वर्ग समृद्ध हो।
कार्यक्रम के अध्यक्ष पंजाब चंडीगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अमर सिंह बधान ने कहा  कि साहित्य मंडल का प्रयास स्तुत्य है। हिंदी भाषा एवं हिंदी भाषा विदों और साहित्य सेवियों के लिए साहित्य मंडल प्रारंभ से ही समर्पित रहा है एवं आगे भी समर्पित रहेगा। दिल्ली के साहित्यकार डॉ. राहुल, उदयपुर  डॉ. जयप्रकाश शाकद्वीपीय, श्रीमती संतोष रिचा, जबलपुर की रचनाकार डॉ. गीत गीत ने बाबूजी स्मृति प्रसंग से बाबूजी के हिंदी विकास के प्रयासों की चर्चा कर उनके अध्यात्म और दर्शन पर प्रकाश डालते हुए अपने आलेख पत्र प्रस्तुत किए। गुना के महेश बोर , कोटा के रामेश्वर प्रसाद रामू भैया और राया मथुरा के अंजीव अंजुम ने अपनी काव्यात्मक  श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर पूर्व मंत्री  रविकांत गर्ग का अभिनंदन पत्र, शॉल, माला, उत्तरीय, श्रीफल, मेवाड़ी पगड़ी एवं श्रीनाथजी की छवि के साथ अभिनंदन किया गया। डॉ. फारुख आफरीदी जयपुर, राजेश भारती कैथल एवं डॉ . सुशीला जोशी कोटा को श्री पुरुषोत्तम पालीवाल स्मृति सम्मान, डॉ. भेरुलाल गर्ग भीलवाड़ा को श्रीमती पुष्पा देवी दुग्गड़ स्मृति सम्मान, श्रीमती वंदना यादव दिल्ली को श्री मोतीलाल प्रजापति स्मृति सम्मान, श्री अजय कुमार अनुरागी जयपुर को श्री श्याम सुंदर नागला स्मृति सम्मान, डॉ. दिनेश प्रसाद शाह दरभंगा को श्री बालकृष्ण अग्रवाल स्मृति सम्मान, डॉ गीता गीत को श्रीमती उर्मिला देवी अग्रवाल स्मृति सम्मान, डॉ अलका पांडे मुंबई को श्रीमती कमला देवी पुरोहित स्मृति सम्मान, श्री घनश्याम मैथिल अमित को श्री चमन लाल सिंघल स्मृति सम्मान, डॉ मंजू गुप्ता नवी मुंबई को श्रीमती सुमन लता सिंघल स्मृति सम्मान , डॉ. अजय शर्मा जालंधर को श्रीमती आशा शर्मा स्मृति सम्मान एवं श्री सत्येंद्र छब्बर जोधपुर, डॉ. ओमप्रकाश कादयान हिसार, डॉ. नीरू मित्तल नीर पंचकूला, श्रीमती इंदिरा त्रिवेदी भोपाल, श्रीमती नीता सोलंकी भोपाल, श्रीमती  योगिता जोशी जयपुर को  पुरुषोत्तम पालीवाल स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया।
समारोह में राया मथुरा की श्रीमती संतोष ऋचा ने बाल कहानियों में नैतिक मूल्य और भरतपुर के नरेंद्र निर्मल ने बाल कहानियां संस्कृति के संदर्भ में विषयों पर आलेख पत्रों का वाचन किया। समारोह में बीस साहित्यकारों की कृतियों का अतिथियों द्वारा लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ कवि एवं व्यंग्यकार श्री सुरेंद्र सार्थक ने सरस्वती वंदना से की है। श्रीनाथ वंदना मथुरा के साहित्यकार अंजीव अंजुम द्वारा की गई। कार्यक्रम का संचालन साहित्य मण्डल, प्रधानमंत्री श्री श्याम प्रकाश देवपुरा ने किया। कार्यक्रम में साहित्यकारों का गद्य एवं पद्य परिचय अंजीव अंजुम द्वारा किया गया।
इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कोटा के साहित्यकार रामेश्वर शर्मा रामू भैया ने की। कोटा के कवि महेश पंचोली ने अपनी आध्यात्मिक काव्य पाठ से कवि सम्मेलन की उत्साहवर्धक शुरुआत की। योगीराज योगी कोटा , मंजू गुप्ता ऋषिकेश, महेश पंवार गुनाडा.मनीषा गिरी दिल्ली, सुमन जी मथुरा,हेमराज हेम कोटा, वर्षा सिंह दिल्ली, देवकी दर्पण रोटेदा, पवन तिवारी मुम्बई, सुशीला जोशी कोटा, राजैन्द्र मोहन शर्मा जयपुर एवं डाॅ.आरती वर्मा कानपुर ने काव्य पाठ कर कवि सम्मेलन को ऊंचाइयाँ प्रदान की। संचालन डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने किया।

आधुनिक भवन निर्माण में वैदिक सिद्धांतों का प्रयोग

वर्तमान युग में भवन निर्माण केवल एक तकनीकी प्रक्रिया न होकर, मानवीय संवेदना, पर्यावरणीय संतुलन और आध्यात्मिक ऊर्जा का भी समन्वय बन चुका है। भारत की वैदिक परंपरा में स्थापत्य कला को दिव्य विज्ञान के रूप में स्वीकार किया गया है। इसमें दिशा, स्थान, ऊर्जा प्रवाह, पंचमहाभूत, सूर्य गति, जल निकास तथा मानवीय चेतना को ध्यान में रखकर निर्माण की संपूर्ण प्रणाली विकसित की गई थी। आज जब आधुनिक स्थापत्य (Modern Architecture) तकनीकी प्रगति, स्मार्ट कंस्ट्रक्शन (Smart Construction) और ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) की दिशा में अग्रसर है, तब वैदिक स्थापत्य के सिद्धांत पुन: प्रासंगिक हो उठे हैं। यह लेख वैदिक स्थापत्य के दार्शनिक आधार, वैज्ञानिक तर्क, तथा आधुनिक भवन निर्माण में उनके प्रयोग का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

भवन केवल ईंट, पत्थर और कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि वह जीवंत ऊर्जा-क्षेत्र है, जहाँ मानव जीवन और प्रकृति का संवाद होता है। वैदिक ऋषियों ने ‘वास्तु’ को जीवित ब्रह्मांडीय योजना माना, जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश— इन पंचमहाभूतों के संतुलन पर आधारित है। “यत्र ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे” — इस वैदिक वाक्य के अनुसार प्रत्येक भवन ब्रह्मांड का लघु रूप है। इसलिए स्थापत्य का उद्देश्य केवल निवास नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों का सामंजस्य स्थापित करना है। आधुनिक काल में भवन निर्माण मुख्यत: उपयोगिता, तकनीक और लागत-कुशलता पर केंद्रित हो गया है। किंतु ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन और मानसिक असंतुलन जैसी समस्याएँ यह संकेत देती हैं कि हमें पुन: अपने वैदिक स्थापत्य मूल्यों की ओर लौटने की आवश्यकता है।

वैदिक स्थापत्य के मूल सिद्धांत पंचमहाभूतों के संतुलन, दिशाओं की ऊर्जा और ब्रह्म स्थान की अवधारणा पर आधारित हैं। भवन निर्माण का आधार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — इन पाँच तत्वों के सामंजस्य में निहित है। पृथ्वी से स्थायित्व और स्थिरता प्राप्त होती है, जल से शीतलता और जीवन का प्रवाह, अग्नि से ऊर्जा और रूपांतरण की शक्ति, वायु से प्राणवायु और स्वास्थ्य तथा आकाश से विस्तार और चेतना का अनुभव होता है। वास्तु शास्त्र इन्हीं पंचतत्वों को दिशा और स्थान के अनुसार व्यवस्थित करने का विज्ञान है। दिशाओं के संदर्भ में वैदिक स्थापत्य यह मानता है कि प्रत्येक दिशा विशेष प्रकार की ऊर्जा वहन करती है — पूर्व दिशा सूर्य ऊर्जा और आध्यात्मिकता की प्रतीक है, उत्तर दिशा समृद्धि और जल प्रवाह का संकेत देती है, दक्षिण दिशा स्थायित्व और शक्ति की धुरी है, जबकि पश्चिम दिशा परिवर्तन और परिणाम की दिशा मानी जाती है। इन दिशाओं के अनुरूप भवन की योजना बनाने से ऊर्जा प्रवाह संतुलित रहता है। वैदिक स्थापत्य में भवन का केंद्र ब्रह्मस्थान कहलाता है, जो ऊर्जा-संचार का केंद्र होता है; इसे सदैव खुला, प्रकाशयुक्त और शांत रखना चाहिए। आधुनिक वास्तु-रूपांकन में भी केंद्रीय खुला आंगन या आत्रियम की अवधारणा इसी ब्रह्मस्थान सिद्धांत से प्रेरित है, जिससे भवन में प्राकृतिक प्रकाश, वायु प्रवाह और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है।

आधुनिक स्थापत्य या आधुनिक वास्तुकला 20वीं सदी के औद्योगिक और तकनीकी युग का परिणाम है, जिसमें निर्माण कला ने वैज्ञानिकता, गति और दक्षता का समन्वय किया। इसमें प्रबलित सीमेंट कंक्रीट संरचना, इस्पात ढांचा, बुद्धिमान निर्माण सामग्री, भवन सूचना नमूनीकरण प्रणाली तथा डिजिटल युग्म तकनीक जैसी उन्नत प्रणालियाँ प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य निर्माण की तीव्रता, लागत में कुशलता और कार्य में सटीकता को बढ़ाना है। किंतु इन वैज्ञानिक नवाचारों के साथ-साथ हरित भवन आंदोलन और सतत स्थापत्य की अवधारणाओं ने यह सिद्ध किया है कि तकनीकी उन्नति तभी सार्थक है जब वह प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करे। इस दृष्टि से वैदिक स्थापत्य की अवधारणाएँ आधुनिक स्थापत्य को न केवल एक पर्यावरणीय और ऊर्जा-कुशल दिशा प्रदान करती हैं, बल्कि उसे आध्यात्मिक गहराई भी देती हैं, जिससे निर्माण कार्य मात्र भौतिक विकास न होकर जीवन और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक बन जाता है।

आधुनिक स्थापत्य में वैदिक सिद्धांतों का समन्वय ऊर्जा, दिशा और तत्वों के संतुलन के माध्यम से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। आधुनिक वास्तुकार इमारतों को सौर अभिमुखता के अनुसार इस प्रकार रूपांकित करते हैं कि प्राकृतिक प्रकाश और वायु संचार अधिकतम हो सके, जो वैदिक वास्तु में ‘पूर्वाभिमुख भवन’ के सिद्धांत का ही आधुनिक रूप है। पंचमहाभूतों के संतुलन को ध्यान में रखते हुए जल तत्व के लिए वर्षा जल संचयन प्रणाली, वायु तत्व के लिए प्राकृतिक वायु संचार व्यवस्था, अग्नि तत्व के लिए सौर ऊर्जा प्रणाली, पृथ्वी तत्व के लिए हरित छत और प्रांगण उद्यान, तथा आकाश तत्व के लिए खुले आकाश द्वार और प्रकाश द्वार का समावेश किया जाता है। ये सभी तत्व वैदिक स्थापत्य के वैज्ञानिक रूप हैं, जिनमें प्रकृति और ऊर्जा का संतुलन साधा गया है। आधुनिक भवनों में केंद्रीय प्रांगण सिद्धांत अथवा केंद्रीय प्रकाश नलिका की व्यवस्था की जाती है, जिससे प्राकृतिक प्रकाश और वायु के प्रवाह में वृद्धि होती है; यह प्रत्यक्ष रूप से वैदिक स्थापत्य के ब्रह्मस्थान सिद्धांत का अनुप्रयोग है, जिसमें भवन के केंद्र को ऊर्जा-संचार का केंद्र माना गया है। वैदिक वास्तु में यह बल दिया गया है कि प्राकृतिक शक्तियों के प्रवाह में न्यूनतम अवरोध होना चाहिए, और यही विचार आज की निष्क्रिय शीतलन प्रणाली तथा ऊर्जा दक्ष रूपांकन की मूल प्रेरणा है। अनेक भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान तथा स्थापत्य संस्थान अब पुन: इन पारंपरिक तकनीकों जैसे मिट्टी की दीवारें, जल निकाय और प्राकृतिक वायु संचार के उपयोग को प्रोत्साहित कर रहे हैं, जिससे वैदिक स्थापत्य का वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व पुन: स्थापित हो रहा है।

वैदिक स्थापत्य केवल भवन निर्माण का विज्ञान नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और मानवीय संस्कृति के निर्माण की प्रक्रिया भी है। गृह, ग्राम, नगर और देवालय—इन चारों स्तरों के नियोजन में सामूहिकता और धर्माधारित जीवनशैली का दर्शन निहित था। आधुनिक नगर नियोजन में जब हम बुद्धिमान नगरों या स्मार्ट शहरों की बात करते हैं, तो उसमें भी वही भाव छिपा है— संतुलित यातायात व्यवस्था, हरित क्षेत्र और जन सुविधाओं का समुचित समन्वय। वास्तु शास्त्र का आदर्श वाक्य ”सर्वे भवन्तु सुखिन:” इसी विचार को मूर्त रूप देता है कि निर्माण केवल भौतिक संरचना न होकर ऐसा हो जो समाज के सामूहिक कल्याण, पर्यावरणीय संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति का साधन बने।

भारत में अनेक आधुनिक भवन ऐसे हैं जहाँ वैदिक स्थापत्य के सिद्धांतों को व्यवहार में अपनाया गया है। भारतीय अंतरराष्ट्रीय केंद्र, नई दिल्ली में केंद्रीय प्रांगण और जलाशय का सुंदर संयोजन किया गया है, जो ऊर्जा और शीतलता संतुलन का प्रतीक है। भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलुरु का वास्तु विन्यास दक्षिण भारतीय मंदिर स्थापत्य से प्रेरित खुले प्रांगणों पर आधारित है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, अहमदाबाद का कार्यालय भवन सूर्य ऊर्जा आधारित वास्तु योजना का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। वहीं टाटा परामर्श सेवा का हरित परिसर, हैदराबाद ऊर्जा दक्षता और दिशा-आधारित रूपांकन के सिद्धांतों का सजीव प्रमाण है। इन भवनों में प्राकृतिक प्रकाश, वायु प्रवाह और सौर ऊर्जा के उपयोग को वैदिक सिद्धांतों के अनुरूप व्यवस्थित किया गया है। इसके अतिरिक्त भारत के अनेक पर्यावरणीय ग्राम, ध्यान केंद्र और आयुर्वेदिक विश्रांति स्थल भी ऐसे हैं जहाँ वैदिक स्थापत्य को आधुनिक तकनीकों के साथ पुन: अपनाया जा रहा है, जिससे भारतीय स्थापत्य परंपरा और समकालीन तकनीक का सुंदर समन्वय स्थापित हो रहा है।

आधुनिक स्थापत्य यदि केवल तकनीकी दृष्टि से आगे बढ़ेगा तो वह अपनी जीवंतता खो देगा। वैदिक स्थापत्य हमें यह सिखाता है कि भवन निर्माण केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि यह एक साधना है— मानव और प्रकृति के मध्य समरसता का सेतु। वैदिक सिद्धांत भवन को ऊर्जा-संतुलित, पर्यावरण-मित्र और मानव-केंद्रित बनाते हैं, जबकि आधुनिक तकनीक इन सिद्धांतों को वैज्ञानिक और स्थायी रूप में लागू करने में सहायक हैं। वास्तु शास्त्र, हरित स्थापत्य और बुद्धिमान निर्माण प्रणाली— ये तीनों मिलकर भविष्य की सतत सभ्यता का आधार बन सकते हैं। स्थापत्य शिक्षा में वैदिक वास्तु शास्त्र का समावेश किया जाना चाहिए, सरकारी भवनों में सौर-वास्तु आधारित रूपांकन को बढ़ावा देना चाहिए तथा ग्रामीण आवास में प्राकृतिक निर्माण सामग्री और स्थानीय वास्तु सिद्धांतों का पुनरुद्धार किया जाना चाहिए। साथ ही, ‘वैदिक बुद्धिमान स्थापत्य अभियान’ जैसी पहलों के माध्यम से भारत को पुन: स्थापत्य नेतृत्व प्रदान करना चाहिए। वस्तुत: वास्तु केवल ईंट-पत्थर का विज्ञान नहीं, यह जीवन की लय है। जब आधुनिक स्थापत्य और वैदिक स्थापत्य का संगम होता है, तब निर्माण ”भवन” नहीं बल्कि ”आलय” बन जाता है, जहाँ केवल मनुष्य नहीं, बल्कि प्रकृति, देवत्व और चेतना भी निवास करती है।

( लेखक  सम्राट अशोक अभियांत्रिकी संस्थान, विदिशा में वरिष्ठ प्राध्यापक एवं पूर्व निदेशक हैं)
साभार- https://www.bhartiyadharohar.com/ से

एक जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और देश विरोधी गैंग सक्रिय

माननीय सुप्रीमकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में फरवरी  2020 में  उत्तर- पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के मुख्य आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी। इन दंगों में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक घायल हुए थे। इसी केस में उमर और शरजील के 5 साथियों को 12 कड़ी शर्तो के साथ जमानत मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उमर और  शरजील इमाम पर कड़ी टिप्पणियां करी हैं । अब ये दोनों अभियुक्त आने वाले एक साल में  जमानत के लिए अपील भी नहीं कर पाएंगे।

फरवरी  2020 के दिल्ली दंगे अत्यंत वीभत्स दंगो में से एक थे। इस दंगे में मारे गए 53 निर्दोष लोगों में एक युवा आईबी अधिकारी अंकित शर्मा, पौढ़ी  गढ़वाल से पांच महीने पहले आया गरीब माता का बेटा दिलबर नेगी  और दो पुलिस कर्मी भी शामिल थे। ऐसे कुख्यात दंगों के अपराधियों को जमानत न मिलने पर सर्व साधारण में संतोष का भाव है किन्तु कुछ लोग इस पर भी तुष्टीकरण की रोटियां सेंकते हुए उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए न केवल आंसू बहा रहे हैं वरन अनर्गल प्रलाप भी कर रहे हैं ।

शरजील इमाम केवल दिल्ली दंगों का ही अपराधी नहीं है वरन चिकन नेक तोड़कर पूर्वोत्तर भारत को देश से अलग करने कि बात करने वाला देशद्रोही है । शरजील इमाम भारत को खंड -खंड मे विभाजित देखना चाहता हैं। भारत के जो  विपक्षी दलो ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत ण मिलने पर उसको सांप्रदायिक रंग दे रहे हैं क्या वे इन विचारों से सहमत हैं?

दरअसल उमर व शरजील के साथ खड़े लोग अपनी कुंठा और  हताशा को ही जगजाहिर कर रहे हैं। इस  कुंठित टोली मे कोई जमानत न मिलने को  कायरता पूर्ण कार्रवाई कह रहा है तो कोई इसे बेतुका बता रहा है जबकि कोई इसे अत्याचार बता रहा है । एक ने तो सारी लज्जा त्यागते हुए इसे लोकतंत्र के लिए काला दिन बता दिया। एक व्यक्ति ने कहा कि 5 साल से अधिक बिना किसी दोष साबित हुए जेल में रखना  बर्बरता बता दिया। यह बात भारतीय जनमानस के समझने योग्य है कि इन सेक्युलर नेताओं को सुप्रीम कोर्ट का फैसला बर्बर लग रहा है। अमेरिकी अब्राहम लिंकन ने एक बार कहा था कि जो अदालतों के अधिकार  व उनके फैसलों को नकारता है  वह राष्ट्र की नींव को नकारता है ।

इस तुष्टीकरण गैंग से पूछा जाना चाहिए कि आज देश में 4 लाख 34 हजार 302 विचाराधीन कैदी हैं जो सजा पाए बिना जेल में बंद हैं। करीब 26 हजार ऐसे कैदी हैं जो 3 से 5 साल तक जेल में बंद हैं और करीब साढ़े 11 हजार ऐसे कैदी हैं जो 5 वर्षों से अधिक समय से जेल  में बंद हैं ।  यह आंकड़े  केवल 2020 तक के ही हैं । इंडिया  जस्टिस रिपोर्ट- 2025 के अनुसार यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है। इसमें भी अधिकांश बंदी जन गरीब, दलित अल्पसंख्यक व महिला समाज के हैं । इन कैदियों के लिए टुकड़े टुकड़े गैंग के समर्थकों का   मन कभी नहीं छटपटाता है। यह लोग उन उमर खलिद और शरजील इमाम के लिए रो रहे हैं जिनकी जमानत के फैसले से पूर्व ही न्यूयार्क के मेयर ममदानी का एक आपत्तिजनक पत्र सार्वजनिक हो गया था। ममदानी के पत्र से पता चलता है कि भारत के खिलाफ कितनी गहरी साजिशें रची जा रही हैं। यूएपीए कानून के तहत गिरफ्तार किया गया शरजील इमाम राष्ट्र द्रोही  व घातक व्यक्ति है।

चिंता का विषय है कि उमर खालिद और  शरजील इमाम के बचाव में अदालत में जो लोग खड़े हुए हैं वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं अपितु देश के पूर्व केंद्रीय मंत्री, वरिष्ठ काग्रेंस नेता और प्रभावशाली व्यक्ति हैं। इनमें  कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, अश्विनी कुमार जैसे नाम शामिल हैं जिन्होंने कांग्रेस सरकार मेंं बडे मंत्रालय संभाले। इसके अतिरिकत सिद्धार्थ दवे, सिद्धार्थ लूथरा, त्रिदीप पैइस भी इनके वकील रहे।प्रश्न यह उठता है कि ”क्या यह केवल कानूनी सहायता है” या ”किसी विशेष मानसिकता का स्पष्ट संकेत ?”

यह सब चल ही रहा था तभी बीच में जेएनयू के ढपली वालों ने आकर ताल से ताल मिला दी। दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की जमीन से एक बार फिर देश के विरुद्ध आपतिजनक नारे लगे। दस साल पूर्व भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह -इंशा अल्लाह के नारे लगाए गएा थे उसी जगह “मोदी तेरी कब्र खुदेगी , अमित शाह तेरी कब्र खुदेगी खुदेगी“ जैसे आपत्तिजनक नारे लगाए गए। इस गैंग की नारेबाजी की वजह थी दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम  की जमानत की अर्जी का खारिज होना। कांग्रेस व उसके अन्य  विरोधी दलों  के नेताओं ने इस प्रदर्शन व नारेबाजी को गुस्से ,नाराजगी के प्रकटीकरण का तरीका बता दिया।

दिल्ली दंगो से सम्बंधित  एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय दिल्ली में आप मुखिया अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री थे। दंगो की जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि हिंसा अचानक नहीं हुई थी आप पार्षद ताहिर हुसैन और विधायक अमानतुल्लाह खान की इसमें बड़ी भूमिका थी, इनकी जांच प्रगति पर है और अभी कोई बरी नहीं हुआ है। केजरीवाल मुख्यमंत्री रहते सरकारी तौर पर इन  तत्वों को बचाने का पूरा प्रयास किया गया और उन्हीं की वजह से आज भी वह जमानत पर घूम रहे  हैं । जब तक दिल्ली में केजरीवाल मुख्यमंत्री रहे तब तक उनकी ओर से दिल्ली दंगो की जांच में कोई सहयोग नहीं किया जा रहा था। अब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में संभव है फरवरी 2020 के पीड़ितों को न्याय मिल जाए ।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं. – 9198571540