औरंगजेब के नाम गुरु गोविन्द सिंह का ऐतिहासिक पत्र
परकाया प्रवेश का विज्ञान और भारत में परकाया प्रवेश की परंपरा
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हाथ बाद में सेंक लेना भिया, इंदौर तो बचा लो
मुंबई महानगरपालिका के 227 वार्डों की अंतिम मतदाता सूची अब तक जारी नहीं
चुनाव में केवल 8 दिन शेष – लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल
अनिल गलगली की चुनाव आयुक्त एवं नगर आयुक्त से तात्कालिक कार्रवाई की मांग
RTI एक्टिविस्ट एवं सामाजिक कार्यकर्ता अनिल गलगली ने महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयुक्त तथा मुंबई महानगरपालिका आयुक्त का ध्यान इस अत्यंत गंभीर मुद्दे की ओर आकर्षित किया है कि मुंबई महानगरपालिका के सभी 227 वार्डों की अंतिम मतदाता सूची अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है, जबकि चुनाव में केवल 8 दिन शेष हैं।
अनिल गलगली ने कहा कि अंतिम मतदाता सूची का समय पर प्रकाशन न होना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मतदाताओं के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया की रीढ़ होती है। अंतिम सूची के अभाव में मतदाता अपने नाम की जांच नहीं कर पा रहे हैं। गलत प्रविष्टियों को सुधारने का अधिकार छिन रहा है। फर्जी, दोहरी और अपात्र प्रविष्टियों की आशंका बढ़ रही है। चुनाव प्रणाली पर जनता का विश्वास कमजोर हो रहा है।
इस देरी को लेकर अनिल गलगली ने सवाल उठाया कि इस लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार है? चुनाव आयोग और प्रशासन ने कानूनी समय-सीमा का पालन क्यों नहीं किया?.अनिल गलगली की प्रमुख मांगें है कि मुंबई के सभी 227 वार्डों की अंतिम मतदाता सूची तत्काल आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित की जाए। मतदाता सूची जारी करने में हुई देरी पर लिखित और सार्वजनिक स्पष्टीकरण दिया जाए।जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की जाए। भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए ठोस और समयबद्ध सुधारात्मक कदम घोषित किए जाएं।
अनिल गलगली ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची का समय पर सार्वजनिक होना संवैधानिक जिम्मेदारी है और इसमें हुई देरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करती है। उन्होंने चुनाव आयोग और मनपा प्रशासन से तत्काल, पारदर्शी और जवाबदेह कार्रवाई की मांग की है।
दिल्ली शब्दोत्सव में गूँजी भाषा, साहित्य और लोकतंत्र की आवाज़ चन्द्रकांत जोशी
नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में 02 से 04 जनवरी 2026 तक आयोजित ‘दिल्ली शब्दोत्सव 2026’ र विचार, संवाद और रचनात्मकता का सशक्त मंच बनकर उभरा। राजधानी में आयोजित इस उत्सव में देश के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों, कवियों और युवाओं ने भाग लिया और भाषा, समाज व समकालीन मुद्दों पर गहन विमर्श किया।
दिल्ली शब्दोत्सव-2026 की शुरुआत शुक्रवार दोपहर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा और तमाम लेखकों, विद्वानों और बुद्धिजीवियों की उपस्थिति में हुई. महोत्सव के दौरान 5 विशेष मंच- मुख्य मंच, सांस्कृतिक मंच, साहित्यिक मंच, ओपन माइक और पैनल मंच सजे हैं. पहले दिन नीतिगत चर्चाओं के साथ-साथ कविता, संगीत और कलात्मक प्रस्तुतियों का अनूठा मिश्रण देखने को मिला.
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि आज इस मंच पर खड़े होकर साफ दिखाई देता है कि भारत किस तरह अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य से संवाद कर रहा है. शब्दोत्सव इस बात का साक्षी है कि वैदिक युग से लेकर वर्तमान डिजिटल युग तक भारत ने कितनी ऐतिहासिक यात्रा तय की है. सीएम ने आयोजन को सरकार की एक अनूठी सांस्कृतिक पहल और भारत के बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक बताया. “कुछ तो बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” का जिक्र करके उन्होंने कहा कि समय बदलेगा और युग बीत जाएंगे, लेकिन भारत शाश्वत बना रहेगा.
मुख्यमंत्री ने तकनीकी प्रगति के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव पर भी जोर देते हुए कहा कि आधुनिकता के इस दौर में हमें अपने बच्चों को किस तरह आगे बढ़ाना चाहिए कि वह अपनी संस्कृति से भी जुड़े रहें. उनका कहना था कि दिल्ली को “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की अवधारणा के आदर्श मॉडल के रूप में काम करना चाहिए.
मुख्यमंत्री ने सांस्कृतिक जिम्मेदारी का जिक्र करते हुए कहा कि विदेशों में भारत के प्रति अपमानजनक टिप्पणियां हमारी अपनी जड़ों से बढ़ते कटाव को दिखाती हैं. उन्होंने विदेश में एक प्रदर्शनी और ‘द केरल स्टोरी’ से जुड़ी किताब का हवाला देते हुए कहा कि अगर सांस्कृतिक आधार मजबूत हो, तो सामाजिक परिणाम कहीं बेहतर मिल सकते हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि अगर उन बच्चों का सही मार्गदर्शन मिला होता और उन्हें अपनी संस्कृति से जोड़ा गया होता तो शायद हमारी बेटियां आज ज्यादा सुरक्षित होतीं. सीएम ने पिछले 10 महीनों में गणेश चतुर्थी से लेकर छठ पूजा तक के सांस्कृतिक आयोजनों का उल्लेख करते हुए विश्वास दिलाया कि यह महोत्सव आने वाले वर्षों में भी जारी रहेगा.

दिल्ली बने भारत की सांस्कृतिक राजधानीः कपिल मिश्रा
दिल्ली सरकार के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा ने ‘शब्दोत्सव’ को वैचारिक विमर्श का एक बड़ा मंच बताते हुए कहा कि दिल्ली केवल देश की राजनीतिक राजधानी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक राजधानी बने. उनका कहना था कि जब सेना, पुलिस या मंदिरों पर पत्थर फेंके जाते हैं तो वह पत्थर हाथ में बाद में आता है, उससे पहले वह किसी के दिमाग में आकार लेता है. कपिल मिश्रा ने शब्दोत्सव को ‘वैचारिक उग्रवाद और नक्सलवाद के खिलाफ एक सर्जिकल स्ट्राइक’ करार दिया. उन्होंने बताया कि अगले तीन दिनों में यहां 40 से अधिक पुस्तकों का विमोचन किया जाएगा.
शब्दोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता थी इसकी स्पष्ट दिशा। यहाँ कोई विभाजनकारी स्वर नहीं गूँजा, कोई देशविरोधी एजेंडा नहीं था। बच्चे और युवा ‘दम मारो दम’ जैसे गीतों पर नहीं, बल्कि श्रीराम, शिव और राधा रानी के भक्ति गीतों पर झूमते नजर आए। साधो बैंड और हंसराज रघुवंशी जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियों ने स्टेडियम को भक्ति और देशप्रेम की लहर से भर दिया। लोकगीतों और नृत्यों ने भारतीय संस्कृति की विराटता को जीवंत किया।
भारत की आंतरिक चुनौतियां (India’s Internal Challenges) विषय पर सत्र में पूर्व डीजीपी डॉ. एस.पी. वैद, पूर्व बीजेपी सांसद डॉ. सत्यपाल सिंह और पूर्व डीजीपी जैकब थॉमस ने पुलिसिंग और शासन सुधारों पर बात की, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा. शुक्रवार के कार्यक्रमों का समापन सांस्कृतिक आयोजनों के साथ हुआ. माधव बैंड और हृदयदीप की प्रस्तुतियों ने समां बांध दिया.
शब्दोत्सव का उद्देश्य केवल साहित्यिक चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें लोकतंत्र, संस्कृति, मीडिया, इतिहास और सामाजिक सरोकारों पर भी खुलकर बातचीत हुई। कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों में हिंदी की वर्तमान स्थिति, भारतीय भाषाओं के भविष्य और डिजिटल युग में भाषा की भूमिका जैसे विषय प्रमुख रहे।
उत्सव के दौरान आयोजित लेखक संवाद सत्रों में वरिष्ठ साहित्यकारों ने अपने रचनात्मक अनुभव साझा किए, वहीं कविता पाठ और कहानी सत्रों में समकालीन संवेदनाओं की अभिव्यक्ति देखने को मिली। कई सत्रों में श्रोताओं की सक्रिय भागीदारी रही और प्रश्न–उत्तर के माध्यम से सार्थक संवाद स्थापित हुआ।
कार्यक्रम में पुस्तक विमोचन भी आकर्षण का केंद्र रहा, जहाँ नई पुस्तकों पर चर्चा के साथ लेखकों ने अपनी रचनात्मक प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। इसके साथ ही युवाओं के लिए विशेष सत्र आयोजित किए गए, जिनमें नई पीढ़ी के लेखकों और छात्रों ने अपनी बात रखी।
आयोजकों के अनुसार, दिल्ली शब्दोत्सव का उद्देश्य साहित्य को केवल अकादमिक दायरे से बाहर निकालकर आम पाठकों तक पहुँचाना है। उनका मानना है कि भाषा तभी जीवित रहती है जब वह समाज के सवालों से जुड़ती है।
शब्दोत्सव में भाग लेने वाले कई वक्ताओं ने कहा कि ऐसे आयोजनों से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को नई ऊर्जा मिलती है और विचारों के लोकतांत्रिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलता है।
कुल मिलाकर, दिल्ली शब्दोत्सव एक ऐसा मंच बनकर सामने आया जहाँ शब्द केवल साहित्य नहीं, बल्कि समाज से संवाद का माध्यम बने।
आयोजन में देश भर के अनुभवी और युवा लेखकों ने हिस्सा लिया। इनमें प्रमुख थे:
डॉ. श्रीदेवी वर्मा – प्रतिष्ठित समकालीन हिंदी कवयित्री और समीक्षाकर्मी, जिनका चर्चा-सत्र ‘आधुनिक कविता का सामाजिक आयाम’ दर्शकों द्वारा सराहा गया।
श्री रमेश चौधरी – वरिष्ठ उपन्यासकार, जिन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए “वास्तविकता और कथा” विषय पर विस्तृत प्रस्तुति दी।
डॉ. अनु मल्होत्रा – भाषाशास्त्री और शोधकर्ता, जिनका सत्र “भाषा, पहचान और तकनीकी युग” विशेष आकर्षण रहा।
डॉ. सान्वी अग्रवाल – युवा कवयित्री और कथाकार, जिन्होंने अपनी ताज़ा रचनाएँ प्रस्तुत कीं और उपस्थित छात्रों को प्रेरित किया।
श्री अनमोल सिंह – युवा लेखक और ब्लॉगर, जिन्होंने डिजिटल साहित्य और ऑनलाइन रचनात्मकता पर चर्चा की।
श्री वेद प्रताप वैदिक – वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक, जिन्होंने ‘भाषा और लोकतंत्र’ विषय पर विचार व्यक्त किए।
पुस्तक विमोचन समारोह
शब्दोत्सव में कई नयी पुस्तकें का भव्य विमोचन भी हुआ, जिनका विषय विविध साहित्यिक और सामाजिक आयामों से जुड़ा रहा।
1. मन के आयाम – डॉ. सान्वी अग्रवाल
एक कविता-संग्रह जो यौवन, संवेदनाओं और आत्म-अन्वेषण पर आधारित है।
2. कथाकार के कदम – रमेश चौधरी
आलोचनात्मक समीक्षा और लेखन प्रक्रिया पर आधारित एक महत्वपूर्ण कृति।
3. भाषा और तकनीक – डॉ. अनु मल्होत्रा
आज के डिजिटल युग में भाषा के बदलते स्वरूप और चुनौतियों पर आधारित शोध-ग्रंथ।
4. लोक और साहित्य – संयुक्त संपादन
भारत के लोक साहित्य, गीत और ज़बानी परंपरा पर केंद्रित शोध-प्रबंध।
5. नवीन दृष्टि: आधुनिक हिंदी नाटक – विविध लेखक
ये किताब समकालीन हिंदी रंगमंच के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को उभारती है।
विशेष आकर्षण
लेखक–पाठक संवाद सत्र में उपस्थित दर्शकों ने लेखकों से प्रत्यक्ष प्रश्न पूछे। युवा शिक्षकों और छात्रों ने भी अपनी जिज्ञासाएँ साझा कीं, जिनका लेखक बड़े धैर्य से उत्तर देते रहे।
कविता-पाठ कार्यक्रम में प्रतिभागियों ने भावपूर्ण कविताएँ पढ़ीं, जिनमें आधुनिक जीवन के अनुभव, सामाजिक समस्याएँ और मानवीय संवेदनाएँ प्रमुख रहीं।
साहित्यकारों के विचार
डॉ. श्रीदेवी वर्मा ने कहा, “इस तरह की सभाएँ भाषा के विस्तार के साथ सामाजिक चेतना बढ़ाने का सशक्त माध्यम हैं।”
रमेश चौधरी ने कहा, “पुस्तक विमोचन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि नई सोच का स्वागत है।”
इस वर्ष का दिल्ली शब्दोत्सव न केवल साहित्य के उत्सव के रूप में याद किया जाएगा, बल्कि यह विचारों के मुक्त आदान-प्रदान, भाषा के संरक्षण और युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने वाला अवसर भी रहा।
वेनेज़ुएला संकटः अमेरिकी निरंकुशता और वैश्विक कानूनों का हनन
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133
गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब में डॉ. कुमार विश्वास के ‘अपने अपने राम’ का त्रिदिवसीय आयोजन
मुंबई। देश के जाने माने कवि एवं रामकथा मर्मज्ञ डॉ. कुमार विश्वास गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब में अपने लोकप्रिय कार्यक्रम ‘अपने अपने राम’ के माध्यम से तीन दिनों तक रामकथा के विविध आयामों और आज के दौर में उनकी प्रासंगिकता पर अपना व्याख्यान देंगे। उनके इस आयोजन के लिए भव्य तैयारियाँ की गई है। यह कार्यक्रम 9, 10 व 11 जनवरी को प्रतिदिन शाम 5 बजे से होगा। इस आयोजन के लिए कार्यक्रम स्थल पर 8 हजार श्रोताओं के बैठने की व्यवस्था की गई है।
यह जानकारी देते हुए गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब के श्री चन्द्रकांत अग्रवाल बाबू भाई ने बताया कि क्लब के अध्यक्ष श्री विनय जैन, सचिव सीए श्री संजय मालू व मेगा प्रोग्राम कन्वेनर श्री सुनील काबरा, संयोजक श्री प्रदीप जैन व श्री रमाकांत परसरामपुरिया के मार्गदर्शन में हो रहे इस भव्य आयोजन के लिए मुंबई शहर के सभी क्षेत्रों से लोग इसमें शामिल होने के लिए उत्साहित हो रहे हैं। अपने अपने राम का यह त्रिदिवसीय आयोजन पहली बार मुंबई में होने जा रहा है। इस कार्यक्रम का आकर्षण इतना है कि युवा, महिला, उद्योगपति और व्यापारी सभी इसमें भागीदारी के लिए आगे आ रहे हैं।
नीलकंठ वर्णी स्वामिनारायण की अयोध्या से बांसी होते हुए मुक्ति तीर्थ की यात्रा
श्री घनश्याम पांडे उपाख्य स्वामिनारायण जी 2 अप्रैल 1781 -1 जून 1830 ई.तक इस धरा पर विराजमान रहे।वे हिंदू धर्म केस्वामिनारायण संप्रदाय के संस्थापक और इष्ट देवता रहे हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के छपिया में हुआ था। उनके माता पिता का नाम धर्मदेव और भक्ती माता था। बाल्य काल में विद्या ग्रहण करके उन्होंने गृह त्याग किया था। सन 1792 ई.में, उन्होंने नीलकंठ वर्णी नाम को अपनाते हुए, 11 वर्ष की आयु में भारत भर में सात साल की तीर्थ यात्रा और तपस्चर्या की थी। इस यात्रा के दौरान, उन्होंने कल्याणकारी गतिविधियां की और इस यात्रा के 9 वर्ष और 11 महीने के बाद, वह सन 1799 ई. के आसपास गुजरात राज्य में बस गए थे । सन 1800 ई.में, उन्हें अपने गुरु स्वामी रामानंद द्वारा उद्धव संप्रदाय में शामिल किया गया और उन्हें सहजानंद स्वामी का नाम दिया गया। सन 1802 ई . में अपने गुरु के द्वारा, उनकी मृत्यु से पहले, उन्हें उद्धव संप्रदाय का नेतृत्व सौंप दिया गया था । सहजानंद स्वामी ने एक सभा आयोजित की और स्वामीनारायण मंत्र को पढ़ाया। तब से, वह स्वामीनारायण के रूप में जाने जाते हैं ।
उन्होंने 3000 से अधिक संतों को दीक्षा दी और लाखो अनुयायी बनाये। उनके जीवनकाल में ही लाखों लोग भगवान स्वामीनारायण को परमात्मा मान कर उनकी भक्ति करने लगे थे।
अपनी माता और पिता के मृत्यु के बाद ग्यारह वर्षीय बालक घन श्याम पांडे घर छोड़कर जंगल में तपस्या करने चले गए। उनके तेजस्वी रुप और तपस्या शिवजी जैसी होने के कारण लोग स्वामीनारायण को नीलकंठ वर्णी नाम से जानने लगें। नीलकंठ वर्णी ने सात वर्षों तक देश के विभिन्न हिस्सों में पैदल यात्रा की थी। उन्होंने हिमालय में कठिन तपस्या और भारत के समस्त तीर्थो की यात्रा की थी। बाद में उन्होंने गुजरात के रामानंद स्वामी से दीक्षा धारण कर उन्हे अपना गुरु बनाया। रामानंद स्वामी के देहांत के बाद उन्होंने स्वामीनारायण सम्प्रदाय की स्थापना और प्रचार किया था।
“भगवान श्री स्वामीनारायण: एक दिव्य जीवन गाथा”लेखक : साधु अक्षर जीवन दास , प्रकाशक: स्वामीनारायण अक्षर पीठ अहमदाबाद, अगस्त 2022 पृष्ठ 46- 47 के विवरण के अनुसार -” भगवान श्री स्वामी नारायण संवत 1849 तदनुसार सन 1793 ई.में पंजाब के राजा रणजीतसिंह से दो बार भेंट किए थे। पंजाब के राजा रणजीत सिंह तीर्थयात्रा करते हुए बदरीनाथ आए थे तब इस छोटे ब्रह्मचारी के प्रथम बार दर्शन किये थे। उनकी भीतर की मुमुक्षुता जाग गई थी। उम्र तेरह वर्ष की होने से उनका स्वामी जी से अधिक लगाव हो गया था। दंडवत्-प्रणाम करके वे ब्रह्मचारी के चरणों में बैठ गए थे। उनके हृदय में शान्ति छा गई थी । वे बोले, ‘मुझको शरण में लीजिए, इच्छा होती है कि सदैव आपके साथ रहूँ।’
ब्रह्मचारी ने कहा, ‘राजन् ! हमारा और आपका रहन-सहन भिन्न है। आप भोगी हो, हम जोगी हैं। हम इस जगत से सदा उदासीन हैं, आप विषय विलासी हो। हम दोनों में भारी अन्तर है। इसलिए साथ निभाना कठिन है, फिर भी भगवान का शासन अपने सिर ढोते हुए प्रजा का पालन कीजिए। हम पुनः नीचे होडा मिलेंगे, अब तो हम यहाँ से गंगोत्री जाएँगे।’
ब्रह्मचारी दुर्गम पथ से गंगोत्री की ओर चल दिए। वहाँ जाकर हिमालय पर बैठकर स्नान किया। फिर हर की पौडी पर जब आए तब रणजीत सिंह से पुनः भेंट हुई। ब्रह्मचारी की ओर वे बहुत आकर्षित हुए थे। राजधर्म एवं मोक्ष की रीति उपदेश पाकर वे कृतार्थ हो गए थे। बार-बार ब्रह्मचारीजी के चरणों में मस्तक रख उन्होंने उनसे अच्छी तरह प्रजा का पालन करने का आशीर्वाद माँगा था।
यहाँ से ब्रह्मचारी को मुक्तिनाथ (नेपाल)की ओर जाना था। वे इस दौरान अयोध्या वापस लौट आए थे। वे सरयू तट पर एकाध घंटा बैठे रहे । गृहत्याग किए आज बराबर एक वर्ष पूर्ण गया था। अयोध्या के नागरिक सब अपनी अपनी गत में मग्न थे। किसी से कुछ भी पूछे बिना ब्रह्मचारी ने मुक्तिनाथ का मार्ग ले लिया।
वर्तमान बस्ती जिले का हरैया गाँव (जो वर्तमान में तहसील है और राष्ट्रीय राज मार्ग 28 के किनारे बसा है।) होते हुए वे बंसीपुर में आए थे। इस स्थान का मूल नाम ‘हरि-रहिया’ था, जो अवधी भाषा का शब्द है और इसका अर्थ ‘भगवान का मार्ग’ है, क्योंकि भगवान राम इस रास्ते से महर्षि वशिष्ठ के आश्रम और मिथिला गए थे। बंसीपुर को आधुनिक बांसी कहा जाता है, जहां श्रीनेत राजाओं का उस समय शासन था। उस समय सर्वजीत सिंह वहां के राजा थे। जिनके राज में भगवान स्वामी नारायण का पावन आगमन हुआ था।
श्रीनेत क्षत्रिय – सूर्यवंशी हैं। उनका गोत्र- भारद्वाज, गद्दी – श्रीनगर (टेहरी गढ़वाल) है। यह निकुम्भ वंश की एक प्रसिद्ध शाखा है। ये लोग उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, सन्त कबीर नगर, सिद्धार्थ नगर,गोरखपुर तथा बस्ती जिले में बांसी रियासत में पाए जाते हैं। बिहार प्रान्त के मुजफ्फरपुर, भागलपुर, दरभंगा और छपरा जिले के कुछ ग्रामों में भी ये लोग रह रहे हैं।
बांसी के राजा तेज सिंह सन 1743 ई .में दिवंगत हुए थे उनके तीन पुत्र थे। इनमें सबसे बड़े रंजीत सिंह (1743- 1748 ई.) थे। इस राजा को अपने भाई दलजीत सिंह से लड़ना पड़ा था जो कानपुर के शिवराजपुर के राजा का शरण लिए हुए था। यहां वह अवध के नबाब शुजाउद्दौला के पक्ष में रहा। उसकी सहायता से यह अपने भाई पर पुनः आक्रमण किया था । यह युद्ध बांसी से 6 मील पूर्व पनघटा घाट पर हुआ था। पनघटा घाट, बांसी, सिद्धार्थनगर, राप्ती नदी के किनारे स्थित एक स्थानीय स्थान है, जो बांसी शहर का हिस्सा है और स्थानीय लोगों के लिए नदी तक पहुँचने का एक बिंदु है। यह क्षेत्र बांसी के विकास और प्रस्तावित नए एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह स्थान पास के गाँव और धार्मिक स्थलों के लिए भी जाना जाता है। योगमाया मंदिर भी यहीं है। इस घाट पर हुई लड़ाई में दोनो भाई रंजीत सिंह और दलजीत सिंह मारे गये थे। परिणाम स्वरुप रणजीत और दलजीत के शिशु लड़के राजा बहादुर सिंह ( सन 1748- 1777 ई.) और सर्वजीत सिंह (सन 1777- 1808 ई.) में संयुक्त रुपसे बांसी के राजा हुए थे । बाद में ये नरकटा में रहने लगे थे। बहादुर सिंह सन 1777 ई. में निःसंतान मर गया था। जगत सिंह ने उनके हिस्से को जप्त करने के लिए आक्रमण किया परन्तु सर्वजीत सिंह ने बुटवल के राजा से सहायता लेकर खुला युद्ध किया और पूरे क्षेत्र का राजा बन बैठा था ।अपने सम्बंधियों और आश्रितों को राजघराने का ( BIRTS) ब्रिटिस हिस्सा देने के बावजूद सम्पत्ति समय के साथ साथ कम होती गयी।
मूल बांसी शाखा के राजा सर्वजीत सिंह बिना किसी असली वारिस के सन 1808 ई. में दिवंगत हो चुके थे।पांच वर्ष तक बांसी का राज्य उनकी विधवा रानी रंजीत कुंवर (सन 1808-1813 ई.) ने संभाला था। इनकी दो बेटियां इला और सुशीला थी। इनकी ही शादी के लिए राजा सर्वजीत सिंह ने बालक नील कण्ठ वर्णी को पसन्द कर लिया था। पुत्ररत्न ना होने के कारण राजा सर्वजीत ने अपने सहयोगी राज्य उनौला के राजा हरिहर सर्फराज सिंह के पुत्र श्रीप्रकाश सिंह (सन 1813-1840 ई.) को दत्तक पुत्र के रुप में ग्रहण कर लिया था।
बांसी राज्य की सीमा में भगवान स्वामी नारायण पीपल वृक्ष के नीचे मृगचर्म बिछाकर ध्यानस्थ हुए थे। बंसीपुर (बांसी) का राजा वहाँ आया। ब्रह्मचारी का कमलपत्र समान नयन एवं चंद्र को लज्जित करे ऐसा मुखमंडल देख राजा मंत्रमुग्ध हो गया था। चरणों में माथा टेकते हुए वह बोला, ‘मेरे भवन पधारिए, प्रभु !’
ब्रह्मचारी ने उसका भाव पहचानकर ‘हाँ’ कहा। अपने घोड़े पर उन्हें बैठाकर राजा स्वयं लगाम थामकर पैदल चलने लगा था । यह देखकर प्रजा चकित रह गई थी। राजमहल में कृष्णभक्ति का वातावरण जम गया था। राजा- रानी एवं दो कुँअरियों इला- सुशीला की श्रद्धा को पुष्ट करने ब्रह्मचारी ने यहाँ राजमहल को पावन किया था। दूध में पकाई मिठाई का थाली तैयार करके राजा स्वयं आया था। शालिग्राम भगवान को भोग लगाकर ब्रह्मचारी ने किंचित् प्रसाद भी ग्रहण किया था। बाद में पूरा थाली-प्रसाद सभी को बँटवा दिया था ।
राजा-रानी के भीतर ब्रह्मचारी की मूरत बैठ गई थी। दोनों के मन में कुत्सित विचार आया कि दोनों बेटियों का ब्याह इसके साथ कर दिया जाए।
‘राजन् ! तुम जो सोच रहे हो, सब मैं जानता हूँ। मैं तो भव-भटकन से जीवों को उबारने आया हूँ।’ ऐसा कहकर ब्रह्मचारी ने अपना सही रूप दर्शा दिया था।
मुक्तिक्षेत्र वह स्थान है जहां पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहीं पर भगवान विष्णु शालिग्राम पत्थर में निवास करते हैं। मुक्तिनाथ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसी स्थान से होकर उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र के महान बौद्ध भिक्षु पद्मसंभव बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए तिब्बत गए थे।
बालक नील कण्ठ वर्णी घोर जंगल में से जा रहे थे। वर्षाऋतु थी। मेघमाला छाई हुई थी। मूसलधार वर्षा हो रही थी। बिजली चमक रही थी। वन, वृक्ष, प्राणी सभी के चेतनसृष्टि में आनन्द छाया हुआ था। सृष्टि सो रही थी तब बारह वर्षीय यह बालक श्याम पर्वत की ओर चला जा रहा था। मुक्तिनाथ मंदिर नेपाल के मुस्तांग जिले में, थोरोंग ला दर्रे की तलहटी में स्थित एक महत्वपूर्ण हिंदू और बौद्ध तीर्थस्थल है, जिसे ‘मोक्ष के देवता’ के रूप में जाना जाता है और यह समुद्र तल से लगभग 3,700 मीटर की ऊँचाई पर है। यहाँ 108 पवित्र झरनों में स्नान करने और कागबेनी में पिंडदान करने से मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है।
लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
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