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कंटेट क्रिएटर नहीं, कंटेट रिफार्मर बनें- प्रो.संजय द्विवेदी

कंटेट वायरल ही नहीं मूल्यवान भी हो
‘वेब मीडिया समागम-2025’ में देश भर से जुटे डिजिटल दिग्गज

भागलपुर (बिहार)। भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक प्रो.संजय द्विवेदी का कहना है डिजिटल मीडिया के व्यापक प्रभाव के कारण बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ जाती है। इसलिए जरुरी है कि हम सिर्फ कंटेंट क्रिएटर नहीं, उससे आगे कंटेंट लीडर और कंटेंट रिर्फामर बनें। करोड़ों लोगों तक पहुँचने वाला प्रत्येक शब्द, प्रत्येक विचार और प्रत्येक दृश्य अपने आप में एक संदेश है। इसलिए यह सिर्फ वायरल नहीं बल्कि मूल्यवान भी होना चाहिए।

वे वेब जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा भागलपुर में आयोजित ‘वेब मीडिया समागम-2025’ को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री अश्विनी कुमार चौबे, वरिष्ठ पत्रकार डॉ.बृजेश कुमार सिंह,संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आनंद कौशल, राष्ट्रीय महासचिव डा. अमित रंजन विशेष रूप से सहभागी रहे। समागम में देश भर के डिजिटल मीडिया दिग्गजों ने कई सत्रों में विमर्श किया और संगठन विस्तार पर भी चर्चा की।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि लोकप्रियता से अधिक जरूरी यह है कि सामग्री समाज को बेहतर बनाए, नागरिक विवेक को विकसित करे और संवाद की संस्कृति को मजबूत करे। फेक न्यूज़, तथ्यहीन दावे और सनसनीखेज प्रस्तुति विश्वसनीयता के संकट को जन्म दे रहे हैं। एल्गोरिद्म की मजबूरी क्रिएटर्स को रचनात्मकता से दूर ले जाकर केवल ट्रेंड के पीछे भागने के लिए विवश कर रही है। उन्होंने कहा कि लाइक्स, फॉलोअर्स और व्यूज़ की अनवरत दौड़ मानसिक तनाव और आत्मसम्मान के संकट को बढ़ा रही है। ध्रुवीकरण और ट्रोल संस्कृति समाज के ताने-बाने को कमजोर कर रही है। प्रोफेसर द्विवेदी ने कहा कि जिम्मेदार क्रिएटर की पहचान सत्य, संवेदना और सामाजिक हित से होती है। विश्वसनीय जानकारी देना, सकारात्मक संवाद स्थापित करना, आंचलिक भाषाओं और स्थानीय मुद्दों को महत्व देना, जनता की समस्याओं को स्वर देना और स्वस्थ हास्य तथा मानवीय संवेदनाओं को बनाए रखना आज की डिजिटल नैतिकता के प्रमुख तत्व हैं।

उन्होंने वेब पत्रकारों का आह्वान करते हुए कहा कि आपके पास केवल कैमरा या रिंग लाइट नहीं है; आपके पास समाज को रोशन करने की रोशनी है। आप वह पीढ़ी हैं जो बिना न्यूज़रूम के पत्रकार, बिना स्टूडियो के कलाकार और बिना मंच के विचारक हैं। जाहिर है तोड़ने वाले बहुत हैं अब कुछ ऐसे लोग चाहिए जो देश और दिलों को जोड़ने का काम करें।

जड़ों से जुड़ी रहे पत्रकारिता : अश्विनी चौबे
पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने अपने संबोधन में कहा कि हर युग में पत्रकारों ने अपनी लेखनी से क्रांति लाई है। अब तकनीक से चलने वाली मीडिया का समय है। बावजूद इसके अपनी जड़ों से जुड़े रहकर हम बेहतर पत्रकारिता कर सकते हैं। भाजपा नेता प्रीति शेखर ने कहा कि जिस तरह से संचार क्रांति आई है उससे युवाओं के बेहतर अवसर मिले हैं। स्थानीय भाषाओं में सामग्री पहुंचाने के द्वार खुले हैं।

सूचनाओं को दबाना असंभव:डा.बृजेश कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार डा. बृजेश कुमार सिंह ने कहा कि पिछले 15 वर्षों के अंदर बहुत बड़ा बदलाव आया है। इसकी वजह इंटरनेट का डाटा सस्ता होना और हर व्यक्ति तक पहुंच बढ़ना है। अब सूचना को दबाए रखने की व्यवस्था खत्म हो चुकी है और इसका लोकतंत्रीकरण हुआ है। उन्होंने कहा कि समाज का भरोसा अर्जित करें क्योंकि प्रायः वेब पत्रकारों के पास बड़ी टीम नहीं होती किंतु सूचना का सत्यापन जरूरी है। इसलिए बड़े मीडिया हाउस की तुलना में वेब पत्रकारों की चुनौतियां ज्यादा हैं।

ग्रामीण पुस्तकालय स्थापना दिवस पर सम्मान समारोह और कविता पाठ का आयोजन

जनपक्षधर लेखन के उत्तरदायित्व का बोध कराता रहेगा रामदेव सिंह ‘कलाधर’ सम्मान : डॉ. रमाशंकर सिंह
उक्त विचार चर्चित लेखक डॉ. रामशंकर सिंह ने दिनांक 28 दिसंबर 2025 को ग्राम भलुआ, जनपद देवरिया, उत्तर प्रदेश में स्व. विंध्याचल स्मारक न्यास द्वारा संचालित ग्रामीण पुस्तकालय के स्थापना दिवस पर सम्मान समारोह, परिचर्चा और कविता पाठ के आयोजन के अवसर पर व्यक्त किया।
इस कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों को असमिया अंगवस्त्रम  और भारतीय संविधान की प्रस्तावना भेंट कर किया। ग्रामीण पुस्तकालय के उदेश्य, इसकी संकल्पना को साकार करने की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए न्यास के अध्यक्ष, परिवर्तन पत्रिका के सम्पादक एवं शिक्षक डॉ. महेश सिंह बताया कि मेरे जीवन में पुस्तकालयों ने क्रन्तिकारी भूमिका निभाई है। मैं एसी कारीगर बनने गोवा गया और वहाँ विश्वविद्यालय पुस्तकालय में एसी का काम करने के दौरान पढ़ने के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ी फलस्वरुप मैंने परास्नातक और पीएचडी की उपाधि हासिल की और आज शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा हूँ। इसी सोच के साथ कि पुस्तक और प्रेरणा के अभाव में कोई पढ़ाई से वंचित न होने पाए हमने गाँव, क्षेत्रवासियों और मित्रों के सहयोग से यह पुस्तकालय मूर्त रूप में आपकी समक्ष है। इसका उद्देश्य मात्र पुस्तकें उपलब्ध करवाना नहीं वरन एक ऐसा मंच प्रदान करना है जो हमारी तार्किक और वैज्ञानिक सोच का विस्तार करे और हमारी वैचारिकी को एक आकर दे सके। इसी क्रम में हम समय-समय पर विभिन्न वैचारिक कार्यक्रम आयोजित करते रहते हैं और शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले युवाओं एवं जन पक्षधर वैचारिकी के संवाहक रचनाकारों को सम्मानित भी करते रहते हैं।
अतिथि परिचय और उनके योगदानों पर प्रकाश कार्यक्रम के संचालक डॉ. रवीन्द्र पीएस ने डाला।
डॉ. महेश सिंह ने न्यास द्वारा प्रति वर्ष दिए जाने वाले तीनों सम्मान रामदेव सिंह ‘कलाधर’ साहित्य सम्मान, बोधिसत्व लोक-कला एवं संस्कृति सम्मान तथा प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान के बारें में बताया। उन्होंने कहा कि रामदेव सिंह ‘कलाधर’ राष्ट्रीय चेतना, लोक संस्कृति एवं बाल साहित्य के स्थापित रचनाकार रहे हैं। इसका प्रमाण न केवल उनके प्रकाशित, अप्रकाशित पाण्डुलिपियों से मिलता है बल्कि उनके समकालीन राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त आदि से हुए पत्रों से भी मिलता है। यह भूमि तथागत बुद्ध के कार्यस्थल का केंद्रीय क्षेत्र रही है और इसी रूप में इसकी वैश्विक पहचान है इसलिए हम गोरखपुर मंडल स्तर का ‘बोधिसत्व लोक-कला एवं संस्कृति सम्मान’ उनकी स्मृति में देते हैं। भलुआ गाँव के ही गाँव-गवईं, सामाजिक रूढ़ि और किसान के प्रति अत्यधिक संवेदनशील कवि रहे प्रेमचंद श्रीवास्तव की स्मृति में जनपद देवरिया के उदीयमान कवि को ‘प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान’ प्रदान करते हैं।
डॉ. महेश सिंह ने न्यास की ओर से वर्ष 2025 के रामदेव सिंह ‘कलाधर’ साहित्य सम्मान के लिये शोधार्थी एवं लेखक चर्च क्राइस्ट महाविद्यालय कानपुर के सहायक प्रोफेसर डॉ. रमाशंकर सिंह, बोधिसत्व लोक-कला एवं संस्कृति सम्मान के लिये प्रसिद्ध लेखक और पुरातत्त्वविद डॉ. रमाकांत कुशवाहा ‘कुशाग्र’ तथा प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान के लिये देवरिया जनपद के उदीयमान कवि सच्चिदानंद पाण्डेय के नामों की घोषणा की।
कार्यक्रम संचालक डॉ. रवीन्द्र पीएस ने इन तीनों रचनाकारों के योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। बांस पर आश्रित जातियों, घुमन्तु एवं विमुक्त समुदायों के इतिहास, संस्कृति, राजनीति और जीवन बोध तथा इनके चर्चित शोध ग्रन्थ ‘नदी पुत्र’ की चर्चा किया। डॉ. रामाकांत कुशवाहा की बुद्ध सम्बंधी पुस्तकों बुद्ध के वंशज, बुद्ध और सम्राट अशोक, खत्तिय जातियाँ एवं बौद्ध स्थलों की पुरातत्व विभाग की सहायता से पहचान और संरक्षण के विशेष प्रयास पर चर्चा किया गया।
सम्मान समारोह के उपरांत आयोजित वैचारिक सत्र में सम्मानित विभूतियों डॉ. रमाशंकर सिंह, डॉ. रमाकान्त कुशवाहा और श्री सच्चिदानन्द पांडेय के वक्तव्यों से परिचर्चा का मार्ग प्रशस्त हुआ। प्रो. असीम सत्यदेव की अध्यक्षता में आयोजित इस सत्र में प्रो. अनिल राय, शिवाजी राय, मनोज कुमार सिंह, डॉ. राम नरेश राम, डॉ. चतुरानन ओझा, जय प्रकाश मल्ल, अशोक चौधरी, डॉ. हितेश सिंह और अरविंद सिंह जैसे प्रबुद्ध विचारकों ने ग्रामीण पुस्तकालयों की प्रासंगिकता पर गंभीर विमर्श किया। विद्वानों ने एकमत से स्वीकार किया कि ग्रामीण पुस्तकालय किसी भी समाज के बौद्धिक और नैतिक स्वास्थ्य के वास्तविक सूचक हैं; ये वे कारखाने हैं जहाँ जागरूक, तर्कशील और लोकतांत्रिक नागरिकों का निर्माण होता है।
चर्चा का मुख्य केंद्र पुस्तकालयों की वह भूमिका रही, जिसके माध्यम से गाँव केवल साक्षरता तक सीमित न रहकर एक न्यायपूर्ण समाज में रूपांतरित होते हैं। वक्ताओं ने जोर दिया कि अफवाहों और अंधविश्वास के इस दौर में पुस्तकालय ही वह सुरक्षा कवच हैं, जहाँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सत्य को परखने की शक्ति विकसित होती है। यह आयोजन एक समानांतर वैचारिक आंदोलन के रूप में देखा गया, जो रूढ़िवादिता की जंजीरों को तोड़ने और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने का कार्य कर रहा है। यहाँ जाति, वर्ग और लिंग के भेद मिट जाते हैं और साझा ज्ञानार्जन से लोकतांत्रिक मूल्यों को बल मिलता है। युवाओं के लिए ये संस्थान सीमित संसाधनों के बीच प्रतियोगिता परीक्षाओं के द्वार खोलने वाले वरदान सिद्ध हो रहे हैं।
साहित्यिक ऊर्जा को विस्तार देते हुए कार्यक्रम के द्वितीय चरण में काव्य पाठ का भव्य आयोजन हुआ, जिसका कुशल संचालन डॉ. रवींद्र पीएस ने किया। वरिष्ठ कवि एवं जलेस गोरखपुर के अध्यक्ष जय प्रकाश मल्ल, पिछले वर्ष ‘रामदेव सिंह ‘कलाधर’ साहित्य सम्मान से सम्मानित ‘बदल की अलगनी पर’ के रचयिता अभिषेक कुमार सिंह, प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान से सम्मानित कवि योगेंद्र पाण्डेय, डॉ. अचल पुलस्तेय, प्रवीण त्रिपाठी, कौशलेंद्र मिश्र, डॉ. रवींद्र सिंह और स्वयं डॉ. महेश सिंह जैसे रचनाकारों ने अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार किया और मानवीय संवेदनाओं को स्वर दिया। इन रचनाओं में जहाँ गाँव की सोंधी मिट्टी की महक थी, वहीं व्यवस्था के प्रति तीखे प्रश्न भी थे, जिन्होंने श्रोताओं को वैचारिक ऊर्जा से सराबोर कर दिया। अंततः, डॉ. महेश सिंह के उस भागीरथ प्रयास की मुक्तकंठ से सराहना की गई, जिसके माध्यम से उन्होंने अज्ञानता की धुंध को चीरते हुए ज्ञान की दीपशिखा प्रज्वलित की है।

बनास जन के पंकज मित्र विशेषांक का लोकार्पण

नई दिल्ली। तकनीकी विकास और बाज़ार की व्यवस्था ने कुछ हद तक मुक्ति भी दी है और एक अलग तरीके से अन्यायपूर्ण व्यवस्था भी बनाई है। मनुष्य की गरिमा, नया अभी भी कोसों दूर है और लेखक का स्वप्न है कि ऐसा समाज बन सके जो न्याय आधारित हो। मेरा कहानी लेखन इसी दिशा में एक विनम्र प्रयास है कि हमारा समाज अधिक मानवीय बन सके।

सुप्रसिद्ध कथाकार पंकज मित्र ने अपने पर केंद्रित विख्यात लघु पत्रिका बनास जन के लोकार्पण के अवसर पर अपने पाठकों का सबसे अधिक ऋण स्वीकार किया जिनके कारण वे लगातार सक्रिय रह सके। हरकिशन सिंह सुरजीत भवन में एक सादे समारोह में वरिष्ठ उपन्यासकार रणेन्द्र, लेखक-अनुवादक दिगम्बर, चर्चित कथाकार कविता और अरुण कुमार असफल ने बनास जन के उक्त विशेषांक का लोकार्पण किया। आलोचक-कथाकार राजीव कुमार के सम्पादन में आए इस विशेषांक में लगभग एक दर्जन आलोचकों ने विस्तार से पंकज मित्र की कहानियों का विश्लेषण-मूल्यांकन किया है। मित्र के संगी- साथियों संजय कुमार कुंदन और राजेश करमहे के संस्मरणों के साथ उनका लम्बा साक्षात्कार भी अंक में है। मूलत: झारखंड निवासी पंकज मित्र 1996 से कहानियाँ लिख रहे हैं और पेशे से भारतीय प्रसारण सेवा में अधिकारी रहे हैं।

आयोजन में साहित्यकार रणेन्द्र ने कहा कि हिंदी के लघु पत्रिका आंदोलन का विशिष्ट स्वर बन चुकी बनास जन का पंकज मित्र पर विशेषांक का प्रकाशन इस बात का प्रमाण है कि हिंदी साहित्य समाज ने गंभीर और जनपक्षधर लेखकों का महत्व स्वीकार किया है। कथाकार कविता ने पंकज मित्र को बधाई दी और कहा कि अपनी पीढ़ी के श्रेष्ठ कहानी सर्जक के रूप में वे जाने जाते रहेंगे। बनास जन के सम्पादक पल्लव ने बनास जन की सत्रह वर्षीय यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि पंकज मित्र पर आया अंक तरासीवाँ अंक है। चित्तौड़गढ़ से प्रारम्भ हुई इस पत्रिका ने अब तक हिंदी के अनेक रचनाकारों पर अपने अंकों का प्रकाशन किया है जिनमें मीराँ, नज़ीर अकबराबादी, भीष्म साहनी, नामवर सिंह, फणीश्वरनाथ रेणु,अमरकान्त, मृणाल पांडे, स्वयं प्रकाश, असग़र वजाहत, ओमप्रकाश वाल्मीकि,अखिलेश पर अंक सम्मिलित हैं। पल्लव ने लघु पत्रिकाओं की प्रकाशन यात्रा को भूमंडलीकरण के प्रतिपक्ष में भारतीय संस्कृति और साहित्य का संघर्ष बताया।

Banaas Jan

गुुरु गोविन्द सिंहः हिन्दू धर्म और संस्कृति के रक्षक

गुुरु गोविन्द सिंह जयन्ती  -27 दिसम्बर 2025

भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में गुरु गोविंद सिंह जी का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण और प्रेरणादायी है। वे केवल सिख धर्म के दसवें गुरु ही नहीं थे, बल्कि एक महान योद्धा, दार्शनिक, समाज-सुधारक, हिन्दू धर्म-संस्कृति के रक्षक और राष्ट्र-चेतना के जाग्रत प्रतीक थे। उनकी महान् तपस्वी, महान् कवि, महान् योद्धा, महान् संत सिपाही साहिब आदि स्वरूपों में पहचान होती है। गुरु गोविंद सिंह की जयंती केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि मानवता को साहस, न्याय, आत्मसम्मान और धर्मरक्षा का संदेश देने वाला पर्व है। उनकी जीवन-यात्रा अन्याय के प्रतिकार, सत्य की स्थापना और मानव गरिमा की रक्षा के लिए समर्पित रही। वे संपूर्ण भारतीय समाज के आस्था के केंद्र हैं, उनके जीवन से हमें राष्ट्रप्रेम और मानवतावादी धर्म की प्रेरणा मिलती है।

गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 को पटना साहिब (वर्तमान बिहार) में हुआ। उनके पिता गुरु तेग बहादुर जी सिखों के नौवें गुरु थे, जिन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की रक्षा के लिए अपना सर्वाेच्च बलिदान दिया। पिता के इस अद्वितीय त्याग ने गुरु गोविंद सिंह जी के व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। बहुत कम आयु में ही उन्होंने यह समझ लिया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी है। उनका संपूर्ण जीवन संघर्ष, तपस्या और सेवा का अद्भुत संगम रहा। उन्होंने धर्म को कर्म से जोड़ा और आध्यात्मिकता को सामाजिक उत्तरदायित्व का रूप दिया। उनका स्पष्ट संदेश था कि सच्चा धर्म वह है जो निर्बलों की रक्षा करे, अत्याचार का विरोध करे और मानव को आत्मसम्मान के साथ जीना सिखाए। वे कहते थे कि भय से मुक्त होकर सत्य के मार्ग पर चलना ही सच्ची भक्ति है।
1699 में बैसाखी के पावन अवसर पर गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर इतिहास की दिशा ही बदल दी। खालसा का अर्थ है-शुद्ध, निर्भीक और समर्पित जीवन। उन्होंने पाँच प्यारे बनाकर समानता, भाईचारे और त्याग का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। खालसा की दीक्षा के माध्यम से उन्होंने जाति, वर्ग और ऊँच-नीच के भेद को समाप्त कर दिया। उन्होंने खालसा पंथ के अनुयायियों को पंच ककार केश, कड़ा, कंघा, कृपाण, कच्छा धारण करने का निर्देश दिया। ये शौर्य, शुचिता तथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के संकल्प के प्रतीक हैं। गुरु ने सिखाया कि सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं और सबका सम्मान समान है। गुरु गोविंद सिंह की शिक्षाओं का केंद्रबिंदु साहस और करुणा का संतुलन है। वे एक ओर शस्त्र धारण करने की प्रेरणा देते हैं, तो दूसरी ओर दया, प्रेम और सेवा को जीवन का आधार बताते हैं। उनका प्रसिद्ध कथन-“जब सब उपाय विफल हो जाएँ, तब धर्म के लिए तलवार उठाना न्यायोचित है”-यह स्पष्ट करता है कि हिंसा उनका उद्देश्य नहीं थी, बल्कि अत्याचार के विरुद्ध अंतिम विकल्प थी।
गुरु गोविंद सिंह भारतीय जीवन मूल्यों की रक्षा और समाज को नए सिरे से संगठित एवं सशक्त करने वाले एक महापुरुष हैं, उनका व्यक्तित्व अलौकिक, साहसी एवं भारतीयता से ओतप्रोत था। उन्होंने आनंदपुर का सुख, माता पिता की छांव और बच्चों का मोह छोड़कर धर्म रक्षा का मार्ग चुना। उन्होंने दमन, अन्याय, अधर्म के खिलाफ लड़ाई लड़ी। गुरु तेग बहादुर के बलिदान के बाद 11 नवंबर 1675 को नौ साल की उम्र में गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें गुरु बने। दुनिया में देश व धर्म की रक्षार्थ अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले महापुरुष तो अनेक मिलेंगे किन्तु अपनी तीन पीढ़ियों, बल्कि यों कहें कि अपने पूरे वंश को इस पुनीत कार्य हेतु बलिदान करने वाले विश्व में शायद एकमेव महापुरुष गुरु गोविन्द सिंहजी ही है। जिन्होंने त्याग, बलिदान एवं कर्तृत्ववाद का संदेश दिया। भाग्य की रेखाएं स्वयं निर्मित की। स्वयं की अनन्त शक्तियों पर भरोसा और आस्था जागृत की। सभ्यता और संस्कृति के प्रतीकपुरुष के रूप में जिन्होंने एक नया जीवन-दर्शन दिया, जीने की कला सिखलाई। जिनको बहुत ही श्रद्धा व प्यार से कलगीयां, सरबंस दानी, नीले वाला, बाला प्रीतम, दशमेश पिता आदि नामों से पुकारा जाता है। भारत में फैली दहशत, डर और जनता का हारा हुआ मनोबल देखकर उन्होंने कहा ‘‘मैं एक ऐसे पंथ का सृजन करूँगा जो सारे विश्व में विलक्षण होगा। जिससे मेरे शिष्य संसार के असंख्य लोगों में पहली ही नजर में पहचाने जा सकेंगे। जैसे हिरनों के झुंड में शेर और बगुलों के झुंड में हंस। वह केवल बाहर से अलग न दिखे बल्कि आंतरिक रूप में भी ऊँचे, साहसी और सच्चे विचारों वाले हों।
गुरु गोविंद सिंह एक महान कवि और विद्वान भी थे। उनकी रचनाएँ ‘दसम ग्रंथ’ में संकलित हैं, जिनमें वीर रस, भक्ति, नीति और दर्शन का अद्भुत समन्वय मिलता है। उनकी कविताएँ आत्मबल जगाती हैं और जीवन में धर्म व मर्यादा का बोध कराती हैं। उन्होंने भाषा, साहित्य और संस्कृति के माध्यम से समाज में जागरण का कार्य किया। उनका पारिवारिक जीवन भी त्याग और बलिदान की अनुपम गाथा है। उनके चारों पुत्र-साहिबजादे, धर्म और सत्य की रक्षा करते हुए शहीद हुए। छोटे साहिबजादों को दीवार में चुनवा दिया गया, फिर भी गुरु गोविंद सिंह जी विचलित नहीं हुए। उन्होंने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर मानवता को यह संदेश दिया कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए व्यक्तिगत दुख भी स्वीकार्य है। यह जीवन-चरित्र मानव इतिहास में दुर्लभ उदाहरण है।
गुरु गोविंद सिंह जी ने न केवल सिख समुदाय, बल्कि संपूर्ण मानवता को आत्मसम्मान और निर्भीकता का पाठ पढ़ाया। उन्होंने स्त्रियों को समान सम्मान दिया और सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। उनका जीवन बताता है कि आध्यात्मिक व्यक्ति समाज से पलायन नहीं करता, बल्कि समाज को न्यायपूर्ण बनाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाता है। उनका एक अत्यंत क्रांतिकारी निर्णय था-गुरुगद्दी को किसी व्यक्ति के स्थान पर गुरु ग्रंथ साहिब को सौंपना। इससे उन्होंने यह स्पष्ट किया कि गुरु का स्वरूप शाश्वत ज्ञान है, न कि देह। यह निर्णय लोकतांत्रिक चेतना, विनम्रता और आध्यात्मिक परिपक्वता का प्रतीक है। आज जब विश्व हिंसा, असहिष्णुता, भेदभाव और नैतिक संकटों से जूझ रहा है, गुरु गोविंद सिंह की शिक्षाएँ पहले से अधिक प्रासंगिक हो गई हैं। वे हमें सिखाते हैं कि साहस के बिना सत्य अधूरा है और करुणा के बिना शक्ति विनाशकारी। उनका जीवन संतुलित, मूल्यनिष्ठ और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
गुरु गोविन्द सिंहजी का जीवन एक कर्मवीर की तरह था। भगवान श्रीकृष्ण की तरह उन्होंने भी समय को अच्छी तरह परखा और तदनुसार कार्य आरम्भ किया। उनकी प्रमुख शिक्षाओं में ब्रह्मचर्य, नशामुक्त जीवन, युद्ध-विद्या, सदा शस्त्र पास रखने और हिम्मत न हारने की शिक्षाएँ मुख्य हैं। उनकी नजर में सत्ता से ऊंचा स्वराष्ट्र, स्व-अस्तित्व, समाज एवं मानवता का हित सर्वाेपरि था। यूं लगता है वे हिन्दू जीवन-दर्शन के पुरोधा बन कर आए थे। उनकी इच्छा थी कि प्रत्येक भारतवासी सिंह की तरह एक प्रबल प्रतापी जाति में परिणत हो जाये और भारत का उद्धार करें। गुरु गोविन्द सिंह जैसे महापुरुष इस धरती पर आये जिन्होंने सबको बदल देने का दंभ तो नहीं भरा पर अपने जीवन के साहस एवं शौर्य से डर एवं दहशत की जिन्दगी को विराम दिया। उनके कारण ही हिन्दू अपने अस्तित्व एवं अस्मिता को कायम रख पाए।
गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती पर देश और दुनिया के लिए उनका संदेश स्पष्ट है-डरो मत, झुको मत और अन्याय के सामने कभी समझौता मत करो। अपने भीतर की शक्ति को पहचानो, पर उसका प्रयोग सदैव धर्म, मानवता और न्याय के लिए करो। सत्य के मार्ग पर चलने वाले को ईश्वर स्वयं शक्ति देता है। आज आवश्यकता है कि हम उनकी शिक्षाओं को केवल स्मरण न करें, बल्कि अपने जीवन में उतारें। सत्यनिष्ठा, सेवा, साहस, समानता और त्याग-यदि ये मूल्य हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाएँ, तो समाज में स्वतः ही शांति और सद्भाव का वातावरण निर्मित होगा। उनकी जयंती हमें यह संकल्प लेने का अवसर देती है कि हम एक ऐसे विश्व के निर्माण में सहभागी बनें, जहाँ भय नहीं, बल्कि न्याय का शासन हो। उनका जीवन दीपस्तंभ की तरह है, जो अंधकार में भी मार्ग दिखाता है। उनकी शिक्षाएँ समय, देश और सीमाओं से परे हैं।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

बांग्लादेशः सत्ता-संघर्ष, कट्टरपंथ और लोकतंत्र की अनिश्चित राह

बांग्लादेश एक बार फिर इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ लोकतंत्र, सत्ता और कट्टरपंथ के बीच की रेखाएँ धुंधली होती जा रही हैं। 17 वर्षों के स्वनिर्वासन के बाद बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र और बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान की स्वदेश वापसी केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि उस अस्थिरता का प्रतीक है, जो शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद देश की राजनीति में लगातार गहराती चली गई है। यह वापसी ऐसे समय में हुई है जब अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस स्वयं कई मोर्चों पर घिरते नजर आ रहे हैं और जिन ताकतों को उन्होंने व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद में अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से स्थान दिया, वही आज शांति, सौहार्द और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी हैं।
शेख हसीना की अवामी लीग सरकार के पतन के बाद जिस छात्र आंदोलन को ‘जुलाई क्रांति’ के रूप में प्रस्तुत किया गया था, उससे देश में यह उम्मीद जगी थी कि एक नई, पारदर्शी और समावेशी व्यवस्था की नींव रखी जाएगी। इसी उम्मीद के साथ छात्र नेताओं और नागरिक समाज के एक बड़े वर्ग ने मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार की कमान सौंपी। लेकिन कुछ ही महीनों में यह भ्रम टूटने लगा कि यह संघर्ष व्यवस्था परिवर्तन का है। चुनाव को लेकर बढ़ती खींचतान, स्पष्ट रोडमैप का अभाव और सत्ता के इर्द-गिर्द सिमटती निर्णय प्रक्रिया ने यह संकेत दे दिया कि अब लड़ाई लोकतंत्र को मजबूत करने की नहीं, बल्कि सत्ता पर कब्जे की है।
इस संदर्भ में कट्टरपंथी विचारधारा से जुड़े युवा नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया है। हादी जुलाई आंदोलन से उभरे उन चेहरों में थे, जिनका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। उनकी हत्या के बाद उनके भाई द्वारा लगाए गए आरोप कि यह हत्या अंतरिम सरकार से जुड़े तत्वों की साजिश है ताकि चुनाव टाले जा सकें, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार की नैतिकता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। यदि यह आरोप सही हैं, तो इसका अर्थ यह होगा कि सत्ता में शामिल कुछ शक्तियां जानबूझकर देश को अस्थिरता एवं घोर अशांति की ओर धकेल रही हैं, ताकि चुनावी प्रक्रिया को अपने अनुकूल मोड़ा जा सके।
कट्टरपंथी संगठनों की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में सबसे चिंताजनक है। जमात-ए-इस्लामी जैसी ताकतों का अंतरिम सरकार पर बढ़ता दबाव, सड़कों पर बढ़ती हिंसा और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि कानून-व्यवस्था तेजी से कमजोर हुई है। विडंबना यह है कि जिन कट्टरपंथी तत्वों को शेख हसीना सरकार के विरोध में ‘लोकतांत्रिक सहयोगी’ के रूप में देखा गया, वही आज बांग्लादेश की सामाजिक संरचना को भीतर से खोखला कर रहे हैं। यह वही ऐतिहासिक भूल है, जो दक्षिण एशिया के कई देशों में पहले भी की जा चुकी है-जहां अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए कट्टरपंथ को जगह दी गई और परिणाम दीर्घकालिक अस्थिरता के रूप में सामने आया।
तारिक रहमान की वापसी को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। ब्रिटेन में 17 वर्षों से अधिक समय बिताने के बाद उनका लौटना केवल व्यक्तिगत निर्वासन की समाप्ति नहीं है, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति में एक नए शक्ति-संतुलन का संकेत है। यह तथ्य भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि जिन मुकदमों के कारण वे देश से बाहर थे, उनमें अंतरिम सरकार के दौरान राहत मिली और उनकी वापसी का रास्ता साफ हुआ। जिस दिन तारिक रहमान ढाका लौटे, उसी दिन यह संकेत भी सामने आया कि शेख हसीना की अवामी लीग को आगामी चुनावों से बाहर रखा जा सकता है। यह संयोग कम और रणनीति अधिक प्रतीत होता है। बीएनपी इस समय चुनावी गणित के लिहाज से सबसे मजबूत स्थिति में है और तारिक रहमान को देश का अगला प्रधानमंत्री माने जाने की चर्चा तेज है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या अवामी लीग के बिना होने वाला चुनाव बांग्लादेश की जनता की वास्तविक इच्छा को प्रतिबिंबित कर पाएगा? लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि सभी प्रमुख राजनीतिक धाराओं को समान अवसर देने की प्रक्रिया है।
यदि किसी एक बड़े दल को सुनियोजित ढंग से बाहर रखा जाता है, तो चुनाव की वैधता पर संदेह स्वाभाविक है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मोहम्मद यूनुस की सरकार पर दबाव बढ़ रहा है। अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले और कानून-व्यवस्था की बदहाली को लेकर मानवाधिकार संगठनों की चिंताएं लगातार सामने आ रही हैं। इसके बावजूद यह आश्चर्यजनक है कि भारत जैसे पड़ोसी देश से, जहाँ बांग्लादेश के घटनाक्रम का सीधा प्रभाव पड़ता है, अपेक्षित स्तर की कूटनीतिक और नैतिक प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खालिदा जिया के स्वास्थ्य पर चिंता जताते हुए भारत की ओर से सहयोग की पेशकश करना एक सकारात्मक संकेत है, और बीएनपी द्वारा उसका स्वीकार किया जाना दोनों देशों के बीच नए समीकरणों की ओर इशारा करता है।
लेकिन यह भी सच है कि यह निकटता स्वार्थों की राजनीति से पूरी तरह मुक्त नहीं है। बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर लगातार हो रहे हमले अब केवल आंतरिक कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह गए हैं, बल्कि यह भारत की सुरक्षा, कूटनीतिक जिम्मेदारी और नैतिक सरोकार से सीधे जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। हाल ही में अमृत मंडल नामक एक हिंदू नागरिक की पीट-पीटकर हत्या की घटना इस बात का प्रमाण है कि अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति थमने के बजाय और अधिक निर्भीक होती जा रही है। धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा, मंदिरों पर हमले, जबरन पलायन और भय का वातावरण बांग्लादेश की लोकतांत्रिक
साख को गहरा आघात पहुँचा रहे हैं। भारत सरकार के लिए अब यह अनदेखा करने का विषय नहीं रह गया है; आवश्यकता है कि वह कूटनीतिक स्तर पर सख्त संदेश दे, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाए और यह स्पष्ट करे कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है।
आगामी चुनावों के संदर्भ में इस तरह की सांप्रदायिक हिंसा को एक केंद्रीय मुद्दा बनाया जाना चाहिए, क्योंकि भय और असुरक्षा के वातावरण में निष्पक्ष चुनाव की कल्पना ही बेमानी है। बांग्लादेश में यदि वास्तव में लोकतंत्र की बहाली का दावा किया जा रहा है, तो वहां ऐसी सरकार का गठन आवश्यक है जो अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सम्मान की गारंटी दे सके। हिंदुओं सहित सभी धार्मिक समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना न तो राजनीतिक स्थिरता संभव है और न ही क्षेत्रीय शांति। भारत की भूमिका इस संदर्भ में केवल पड़ोसी देश की नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार क्षेत्रीय शक्ति की है, जिसे मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण के लिए आवश्यक कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटना होगा।
बांग्लादेश आज जिस मुसीबत के भंवर में फँसा है, उसके पीछे आंतरिक कारकों के साथ-साथ बाहरी प्रभावों की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान की ऐतिहासिक भूमिका और कट्टरपंथी नेटवर्कों के साथ उसके संबंधों को देखते हुए यह आशंका निराधार नहीं कि बांग्लादेश की अस्थिरता में परोक्ष योगदान बाहरी शक्तियों का भी हो सकता है। ऐसे में मोहम्मद यूनुस की यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे अंतरिम सरकार को निष्पक्ष, पारदर्शी और लोकतांत्रिक दिशा में ले जाएँ। लेकिन अब तक के घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि वे हालात को संभालने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं। फिर भी, इस निराशाजनक परिदृश्य के बीच तारिक रहमान के बयानों और राजनीतिक स्वरों में कुछ लोग समाधान की झलक देखते हैं। यह उम्मीद इस विश्वास पर टिकी है कि बीएनपी, चाहे उसका अतीत विवादास्पद रहा हो, सत्ता में आकर कट्टरपंथी दबावों को संतुलित कर सकेगी और लोकतांत्रिक संस्थाओं को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करेगी। किंतु यह भी एक कड़वा सत्य है कि कट्टरपंथी ताकतों से लोकतंत्र बहाल होने की उम्मीद अपने आप में एक विरोधाभास है।
अंततः बांग्लादेश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है-क्या वह एक समावेशी, बहुदलीय और संवैधानिक लोकतंत्र की राह चुनेगा या फिर सत्ता-संघर्ष और कट्टरपंथ की दलदल में और गहराता जाएगा? इसका उत्तर केवल किसी एक नेता या दल के हाथ में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विवेक में है, जो आने वाले महीनों में देश की दिशा तय करेगा। यदि निष्पक्ष चुनाव, कानून का राज और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई, तो तारिक रहमान की वापसी भी इतिहास में एक और चूके हुए अवसर के रूप में दर्ज हो सकती है।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

स्मृति शेष: साहित्य मनीषी कर्मयोगी स्व. भगवती प्रसाद देवपुरा

जीवन की पगडंडी बहुत लंबी है। बहुत उबाऊ और थकान भरी भी। छोटे-छोटे कदमों से आदमी उस पगडंडी को लंबे से लंबा नापने का प्रयास करता है। इस पगडंडी पर उसे जीवन के अनेक दृश्य दिखाई देते हैं। कभी रमणीक खुशियों से भरे तो कभी दुःखद नीरसता और निराशा देने वाले। इन्हीं दृश्यों के मध्य कुछ आकृतियाँ भी स्वयं की उपस्थिति उस पगडंडी पर कदम-से-कदम मिलाते हुए अनुभव कराती हैं। वे आकृतियाँ दूर लक्ष्य दिखाते हुए उस मनुष्य के सफर की कठिनाइयों को कभी-कभी बहुत सरल और सहज बना देती  हैं। लेकिन न जाने वे आकृतियाँ उस पगडंडी पर कब कहाँ किस मोड़ विलीन हो जाती हैं और उसे अकेला छोड़ जाती हैं। वे आकृतियाँ अपने गुणों को नाव की पतवार की तरह मनुष्य के हाथों में थमा जीवन की पर बहती नाव के रूप में उसके निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचाती हैं।
सच कितने ही दृश्यों के साथ मैंने अपने जीवन को निर्धारित किया है। जीवन की पगडंडी पर कितनी ही आकृतियों के साथ कदम-से-कदम मिलाए हैं। न जाने कितनी ही आकृतियों के गुणों का ग्राहक बना आज भी अपनी जीवनधारा पर बह रहा हूँ। अनेक नई आकृतियाँ जहाँ आज मेरे साथ हैं, वहीं अनेक पुरानी आकृतियाँ इस पगडंडी पर मुझे छोड़कर अनंत में विलीन हो गई या कहूँ मुझे रास्ता दिखाकर अपनी राह चल पड़ीं। आज भी ये आकृतियाँ मेरे साथ नियमित कदमताल करती दिखाई देती हैं। मेरी आँखों में मेरे मन में अनेक यादों के साथ।
एक ऐसी आकृति मेरे जीवन में अनायास आई और एक अमिट छाप बनकर हृदय पर अंकित हो गई। भगवती प्रसाद देवपुरा बाबूजी ऐसी ही आकृति थे, जिनके साथ जीवन की कुछ मुलाकातें अक्षुण्ण हैं। जो सदैव नवीनता को जन्म देती हैं। मझले कद की तपी कुंदन सी देह, न स्थूल न क्षीण। न वृहदाकार न वामना कृति। लगता जैसे बुद्ध के मध्यम मार्ग का अनुसरण ही नहीं प्रतिनिधित्व करने वाली इकाई हों। उन्नत माथे के शिखर से तेलासिक्त चमकते श्याम श्वेत केशों की पटुलियाँ सिर के पीछे की ओर अनुशासनबद्ध हो सधी होतीं। उन्नत भाल पर ऊर्ध्वाकार खिंची रेखाएँ मस्तक पर एक तिलक सजाती थीं, ऐसा लगता था, मानो स्वयं श्रीनाथजी ने अपने भक्त के मस्तक पर तिलक खींच दिया हो।
मस्तक के नीचे छोटी-छोटी भौंहों पर मोटे फ्रेम के चश्मे में गहनता से लवरेज आँखों में पूरे परिवेश को समेटने की एक चाहत नजर आती। पूरे पर्यावरण को स्वयं में समाहित करने की ललक उन आँखों में दिखाई पड़ती। गालों के चिकने उभारों के किनारों से उतरती हुई लकीरें उस व्यक्तित्व के स्वरूप को अनुभव युक्त बनाती थीं। एक सधी नासिका के आधार पर उठा काला मस्सा एवं मुखारविंद को सुंदरता प्रदान करते रक्तवर्णी मुसकान बिखेरते पतले होंठ उस चेहरे की सुंदरता को बढ़ा देते। संपूर्ण मुख-मंडल पर मुसकान के पर चिंतन की मुद्रा वे अकसर दिखाई देते। लंबे सफेद कुरते और सूती धोती के बाने में लिपटी उस बुजुर्ग काया को देखकर कोई भी कह सकता था, धारा हिंदी भाषा का वह कर्मयोगी श्रीनाथजी का अनन्य उपासक और कर्मठता की प्रतिमूर्ति देवपुरा जी यही हैं। साथ-साथ स्वयं में मग्न एक योगी संत-मुनि के दर्शन होते।
देवपुरा बाबूजी से प्रथम मुलाकात ब्रज भाषा अकादमी की साधारण बैठक में हुई। मुख पर अतुल्य आभा के साथ मुसकान। वही ऐनक के शीशे में सभी कुछ समेटने को लालायित गंभीर चिंतन दृष्टि वही कुरता-धोती में सीधी-सादी सरल वेशभूषा। मिलने में सभी से प्रसन्नतापूर्वक मधुर मुसकान के साथ अर्थपूर्ण वार्तालाप को मैंने उनमें पाया। मैंने चरण स्पर्श किए तो उन्होंने अपना धर्म निभाते हुए मुझे आशीर्वाद दिया। मेरा परिचय जानकर कुशल-क्षेम इसी प्रकार पूछी जैसे मेरा उनसे बहुत पुराना परिचय हो। तब उन्होंने मेरे साहित्य के बारे में जाना। उन्हें बहुत खुशी हुई, जब उन्हें पता चला मैं छंद भी लिखता हूँ, तब उन्होंने मुझे फरवरी में होने वाले पाटोत्सव समारोह के लिए आमंत्रित भी कर डाला। मैंने भी बिना क्षण गँवाए सहर्ष स्वीकृति दे दी।
कुछ समय पश्चात् बैठक हुई। मैंने बाबूजी के विषय में जैसा सुना था, उस दिन वैसा ही पाया। अकादमी उपाध्यक्ष के चुनाव के लिए बाबूजी ने वरिष्ठ साहित्यकार रामशरण पीतलियाजी का नाम प्रस्तावित किया। एक योग्यता के साथ निर्भीकता, स्पष्टवादिता और स्वाभिमान को लोक मर्यादा के निर्वहन के साथ मैंने बाबूजी में पाया। उस दिन जहाँ सभी एक ओर थे, वहीं अकेले बाबूजी के अपने जीवन-मूल्यों और सिद्धांतों को मैंने सभी के समक्ष अडिग देखा।
उस दिन मैंने माना कि प्रेमचंद द्वारा लिखा वह वाक्य सौ प्रतिशत सत्य है। प्रेमचंद ने कभी लिखा था-साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। आज बाबूजी स्वयं एक मशाल बनकर सामने खड़े थे। निडर और बेखौफ। एक महापुरुष की तरह वह सबकुछ कर गए, जो भी वे कर सकते थे। इस समय कुछ बहसें भी हुईं। कुछ बातें भी हुईं। लेकिन अंगद के पाँव की भाँति बाबूजी अपने प्रस्ताव पर अडिग थे। वहीं संख्या में ज्यादा होकर भी दूसरा पलड़ा हलके से हलका होता चला गया और बाबूजी के आगे झुक गया। उनका प्रस्ताव पारित हुआ। सत्य की जीत हुई या बाबूजी की, यह तो मुझे पता नहीं, लेकिन बाबूजी को न तो इस जीत से कोई उत्साह व उल्लास था, न ही कोई खुशी। बस उनका कहना था, उपयुक्त पात्र ही इन पदों पर होना चाहिए।
पाटोत्सव ब्रजभाषा आयोजन में समस्या पूर्ति कार्यक्रम में मेरा जाना तय हुआ। सुबह का चला हुआ मैं बस से संझा समय नाथद्वारा पहुँचा। अँधेरे में चमचमाते बाजार और दुकानों के आगे से मैं साहित्य मंडल के धुँधले में लिपटे प्रांगण में पहुँचा। सघन वृच्छादित वाटिका के मध्य बने इस खूबसूरत इमारत और उसके सामने बने प्रांगण में उस विराट् व्यक्तित्व को उसी सीधे-साधे लिवास में मैंने देखा। वे कुछ आवश्यक कार्यों को पूर्ण कर रहे थे। उस शाम जहाँ में युवा होकर भी एक थकान का अनुभव कर रहा था, वहीं बाबूजी पर अनवरत श्रम के पश्चात् भी थकावट का एक निशान भी दिखाई नहीं दिया। उन्होंने बड़ी गर्मजोशी के साथ मेरा स्वागत किया। चेहरे पर आत्मीयता के भावों के साथ मैंने उनका प्रेम भी पाया। शायद उस दो दिवसीय कार्यक्रम में बाबूजी सर्वाधिक वरिष्ठ थे तो मैं सबसे युवा था। अतः उनका प्रेम मुझ पर सर्वाधिक रहा।
 दूसरे दिन पत्र-पत्रिकाओं की प्रदर्शनी के समय सिर्फ एक मैं ही वहाँ अनायास उपस्थित हो गया था। बाबूजी मेरे निकट आए और बोले, देखिए, यहाँ पधारे साहित्यिकों में से कोई भी अभी तक इस प्रदर्शनी को देखने नहीं आया। ये साहित्य की सेवा कैसे करेंगे ?
बाबूजी को यह ज्यादा रुचिकर नहीं लगा। वह दुःखी मन से प्रेक्षागार की तरफ बढ़ गए। लेकिन उन्होंने यह शिकायत किसी भी साहित्यकार विद्वान् से नहीं की। उस कार्यक्रम में मैंने उनका प्रबंधन कौशल देखा। सभी को पृथक् पृथक् जिम्मेदारियाँ सौंपी थीं। सभी कुशलतापूर्वक उन का निर्वहन कर रहे थे। अपने कार्य के प्रति गहरी निष्ठा, विनम्रता और उदारता को मैंने बाबूजी में देखी। लेकिन जो गुण बाबूजी का मुझे प्रभावित कर गया, वह था समय का अनुशासन।
समय  के महत्त्व को बाबूजी बखूबी जानते थे। प्रातः नौ बजते ही कार्यक्रम की शुरुआत कर देना। माइक पर आवाज लगाकर अतिथियों को मंच पर आमंत्रित करना। चाहे प्रेक्षागार में तीन-चार श्रोता ही क्यों न बैठे हों। समयावधि से वक्ता को एक सेकंड भी आगे बढ़ते ही वे अपनी घड़ी को देखने लगते। वक्ता के न हटने पर कठोर होते हुए उन्हें अपना वक्तव्य खत्म करने का आदेश भी दे देते। मैंने बाबूजी को स्वयं समय अनुशासन की परिधि में देखा। मैंने देखा नियत समय पर कार्यक्रम का शुरू होना और नियत समय पर ही कार्यक्रम का समापन करना उनकी विशेषता थी।
 उनकी बोली में मेवाड़ी पुट होता था। अतः शुरुआत में उनका व्यवहार मुझे कुछ कठोर लगा। लेकिन सच में बाबूजी के मन में बहुत ही प्रेम था, विनम्रता थी और अपनों के प्रति लगाव था। एक बार सलूंबर से लौटते हुए मैं नाथद्वारा आया। मंदिर दर्शन कर मैं और मेरे साथी निश्चल बाबूजी से मिलने उनकी दुकान पर पहुँचे। उस समय बाबूजी अपने प्रतिष्ठान में अध्ययनरत थे। मुझे देखते ही उनके चेहरे पर मुसकान आ गई। कोई अपना मिला हो, वह इस प्रकार स्वागत के लिए खड़े हो गए। मैंने चरण स्पर्श किए थे, तो उन्होंने हमेशा कि तरह मेरे सिर पर अपना हाथ रख दिया। जलपान और कुछ साहित्यिक चर्चा के बाद निश्चलजी उदयपुर लौट गए। मैं करीब दो घंटे तक बाबूजी के साथ ही रहा।
बाबूजी के अकसर पैरों में दर्द होता था। लेकिन उनके मन और तन में एक फुर्ती सदैव दिखाई देती थी। मुझे वह आज भी थके हुए नहीं लगे। लगन और कर्तव्यनिष्ठा में उनके कोई कमी नहीं थी। मैं जब चलने को हुआ तो बाबूजी मुझे विदा करने दुकान से बाहर आए। श्रीनाथजी के प्रसाद का लड्डू मेरे हाथ में रखते हुए बोले, “यह बींदणी और बच्चों के लिए है। मथुरा ले जाना।” मैंने प्रसाद रख लिया और आगे बढ़ गया। बाबूजी वहीं मूर्तिवत् खड़े रहे। एक प्रेम की डोर बाबूजी ने उस दिन ऐसी बाँधी, जिसमें मैं साहित्य मंडल से बँध गया। श्रीनाथजी से बंध गया और श्यामजी से बँध गया।
यह बंधन अपनों को पहचान लेता है। यह बंधन अपनों की खुशबू में सबकुछ पा जाता है। मोहनस्वरूपजी भाटिया के अभिनंदन ग्रंथों के विमोचन के अवसर पर मेरा और पत्नी रिचा का उस कार्यक्रम में पहुँचना हुआ। हम दोनों देरी से पहुँचे थे। वैसे भी न मेरा वहाँ आमंत्रण था और न ही मेरा उस कार्यक्रम से कोई प्रयोजन। सिर्फ मुद्गल बाबा ने मुझे किसी कार्य के लिए बुलाया था। बाबा से मुलाकात हो चुकी थी और हम बाहर निकलने को थे।
      तभी रिचा की नजर दूर मंच पर आसीन बाबूजी पर पड़ी। “बाबूजी आए हैं।”
       मैंने कहा, “वे भला क्यों आएँगे !”
    “नहीं मुझे तो वही लग रहे हैं।” उसने पूर्ण विश्वास से कहा।
 मैंने कहा, “बाबूजी मुश्किल ही आएँगे। उनकी तबीयत भी इतनी अच्छी नहीं है कि वे इस कार्यक्रम में आएँ।” लेकिन रिचा के अति विश्वास के आगे मैं नत हो गया। कार्यक्रम खत्म करने तक हम दोनों ने इंतजार किया। कार्यक्रम के समापन पर उस भीड़ में मैंने श्याम भैया के हाथ को पकड़े हुए उस संकल्पित कर्मयोगी को धीरे-धीरे प्रेक्षागार से बाहर आते हुए देखा।
मन में अपार हर्ष था तो चेहरे पर खुशी का समंदर लहरें लेने लगा। चरण स्पर्श के पश्चात् एक खुशी, श्याम भैया से मुलाकात, बाबूजी का प्रेम पुनः पाया। अपनी कुछ असमर्थता जताते हुए बाबूजी ने मेरे साथ घर आने के अनुरोध को अगली बार पर टाल दिया। हमने एक छोटी मुलाकात की, लेकिन वह मुलाकात बहुत आत्मीय मुलाकात थी।
इस मुलाकात के पश्चात् बाबूजी ने मथुरा आने का मुझे वचन भी दिया। लेकिन दो महीने पश्चात् छह जनवरी को मुद्गल बाबा के फोन से मुझे पता चला, देवपुरा बाबूजी अब इस दुनिया में नहीं रहे।
हिंदी साहित्य का वह महान् पुरोधा आज अपनी संपूर्ण यात्रा पूर्ण कर इस दुनिया से विदा हो चला था। बिंदु से सिंधु बना वह व्यक्तित्व आज सिंधु से बिंदु में समाहित हो गया था। आँखों के आगे बाबूजी के भी समस्त चित्र एक फिल्म की तरह घूमने लगे। उनका वही मुसकान बिखेरता चेहरा बार-बार आँखों के आगे घूमने लगा।
 बाबूजी चले गए। मेरे जीवन की पगडंडी को थोड़ा और विस्तार देकर। कुछ नए तरीके से जीवन को सजाकर। आज भी बाबूजी को याद करता हूँ, तो पाता हूँ, प्रत्येक मनुष्य इस जीवन में अपने तरीके से प्रगति करता है। अपने तरीके से जीवन को जीता है। कभी-कभी अपनी क्षमता से अधिक करता है तो कभी अपनी क्षमताओं को खो देता है। आयु के हर पड़ाव पर उसी क्षमता के साथ बढ़ते जाना, किसी के लिए संभव नहीं होता। लेकिन मैंने बाबूजी में इस असंभव को भी संभव होते देखा। उनमें वही जोश, जुनून, वही जज्बात देखे, जो शुरू में थे और अंत तक यथावत् रहे। कितने ही तनाव और दबाव उनके जीवन में आए, लेकिन उनके मध्य बड़ी जीवटता के साथ वे मुसकराते हुए अपने कर्तव्यों के प्रति सदैव समर्पित रहे।
तभी तो वे आज इसी जीवटता का पाठ हमें पढ़ाते दिखाई देते हैं। उनकी यादों का एक-एक पल, एक कक्षा-कक्ष बनकर सामने आ खुलता है। जिसमें जीवन की पगडंडी पर एक आकृति कुछ पढ़ाती है और शायद मैं हाँ मैं ही वहाँ कुछ सीखता दिखाई देता हूँ।
लेखक परिचय
लेखक  सुपरिचित साहित्यकार। गीत, गजल, कविता, दोहा, कहानी, लघुकथा, संस्मरणात्मक रेखाचित्र आदि अनेक विधाओं में १५२ कृतियाँ प्रकाशित। राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी, जयपुर की त्रैमासिकी ‘ब्रजशतदल’ एवं साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा की पत्रिका ‘हरसिंगार’ का सहयोगी संपादन कार्य। अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित ।
राधा कोल्ड के पीछे, सादाबाद रोड,
राया, मथुरा-२८१२०४ (उ.प्र.)
दूरभाष: ७०१७३२८२११

पं.चन्द्रशेखर मिश्र की निर्गुण रचना ” झुलनी का रंग सांचा हमार पिया”

कवि परिचय

भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम, तिलठी (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। कुंवर सिंह, भीषम बाबा, सीता और द्रौपदी उनकी खास रचनाएं हैं। उन्होंने लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहलासिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि ग्रंथ भी दिए हैं। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली।कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।

 

क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण

आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया।

 

एक युग का अवसान

17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाह संस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।

 

पुरस्कार एवं सम्मान –

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको 2002 में ‘अवन्तिबाई सम्मान’ से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है।

 

“झुलनी का रंग सांचा हमार पिया”

निर्गुण भक्ति की काल जयी रचना

 

झूलनी का रंग सांचा हमार पिया चंद्रशेखर मिसिर रचित निरगुणिया गीत भोजपुरी के महाकवि चंद्रशेखर मिश्र की यह कालजयी रचना है। निर्गुणिया भाव की यह रचना वर्षों से लोकप्रिय है।इसका इस्तेमाल लोक जीवन और फिल्मों में भी हुआ। चंद्रशेखर मिसिर ने शरीर को झूलनी का रूप देते हुए जितने कमाल तरीके से माया,ईश्वर आदि के संबंधों को जोड़ा है, वह कमाल है। भाव सहज है कि यह झूलनी एक बार मिला है. इसे बनानेवाला सुनार जब एक बार बना देता है, तो उसका दूसरा सांचा नहीं रखता. यह पांच तत्वों से बना हुआ है।

 

निहितार्थ –

झुलनी का रंग सांचा हमार पिया” का निहितार्थ यह है कि शरीर (झुलनी) नश्वर है और इसे बनाने वाला (सुनार, यानी ईश्वर) एक ही होता है, जिसका साँचा (शरीर) बार-बार नहीं बनता; यह भोजपुरी निर्गुण गीत आत्मा और परमात्मा के रिश्ते, जीवन की क्षण भंगुरता, और शरीर को एक अनमोल रचना मानकर उसका सही उपयोग करने का गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है। यह गीत बताता है कि यह शरीर क्षणभंगुर है, और इसे बनाने वाला सुनार (ईश्वर) इसे एक ही बार बनाता है। इसलिए, इसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। संक्षेप में, यह एक निर्गुण गीत है जो जीवन की सच्चाई, शरीर की नश्वरता और ईश्वर के प्रति समर्पण का गहरा दार्शनिक संदेश देता है।अवधी के  निर्गुण लोकगीत भौतिक अवलंबों पर आधारित आध्यात्मिक रचनाएँ है।जिसे भोजपुरी के महाकवि चंद्रशेखर मिश्र ने रचा है ।एसा ही एक मनोहारी युगल  गीत पंडित चन्द्र शेखर मिश्र जी ने इस प्रकार व्यक्त किया है –

 

              मूल गीत

 

झुलनी का रंग साँचा हमार पिया ।।

कवन सोनरवा बनायो रे झुलनिया,

रंग पड़े नहीं कांचा हमार जिया।

सुघड़ सोनरवा रचि रचि के बनवै ,

दै अगनी  का  आँचा हमार पिया।

छिति जल पावक गगन समीरा ,

तत्व मिलाइ दियो पाँचा हमार पिया।

रतन से बनी रे झुलनिया ,

जोइ पहिरा सोइ नाचा हमार पिया।

जतन से रखियो गोरी झुलनिया ,

गूँजे चहूँ दिसि साँचा हमार पिया।

टूटी  झुलनिया बहुरि नहिं बनिहैं ,

फिर न मिलै अइसा साँचा हमार पिया।

सुर मुनि रिसी देखि रीझैं झुलनिया ,

केहु न जग में रे बाँचा हमार जिया।

एहि झुलनी का सकल जग मोहे ,

इतना सांई मोहे राचा हमार पिया।

 

(स्पष्टीकरण : सोनार ईश्वर, झुलनी मानव शरीर तथा रतन इंद्रियों के रूपक के तौर पर प्रयुक्त किया गया है।)

 

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लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

शायद कल हम यहाँ नहीं हों, आज हमें यादों में भर लो…

कोटा। समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत के तत्वावधान में वर्ष 2025 की अंतिम ऑनलाइन विशेष काव्य गोष्ठी का भव्य एवं गरिमामय आयोजन शुक्रवार को सम्पन्न हुआ। यह गोष्ठी साहित्यिक संवेदनाओं, राष्ट्रीय चेतना और रचनात्मक ऊर्जा से ओतप्रोत रही।
काव्य गोष्ठी का कुशल, सौम्य एवं प्रभावी संचालन संस्थान के संचालक एवं संस्थापक डॉ. मुकेश कुमार व्यास ‘स्नेहिल’ जी द्वारा किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता नवगठित जालौर इकाई के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन लाल बौहरा जी ने की, जिनकी अध्यक्षीय उद्बोधन ने गोष्ठी को वैचारिक ऊँचाई प्रदान की।
गोष्ठी का शुभारंभ श्री राजेश शर्मा जी द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण सरस्वती वंदना से हुआ, जिसने संपूर्ण वातावरण को सरस, पवित्र और सृजनात्मक बना दिया।
इस साहित्यिक संगम में देश के विभिन्न राज्यों- राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक, झारखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र एवं गुजरात  से पधारे लगभग 30 साहित्यकारों ने अपनी प्रतिनिधि रचनाओं के माध्यम से काव्य पाठ किया। कवियों ने नूतन वर्ष के स्वागत और विदा होते वर्ष की स्मृतियों,जीवन की क्षणभंगुरता,समाज और सत्ता से उठते प्रश्न,प्रेम, पीड़ा और मानवीय संवेदनाओं को अपनी सशक्त पंक्तियों में स्वर दिया-
“शायद कल हम यहाँ नहीं हों, आज हमें यादों में भर लो…”,
“कब उठेगा सवाल दिल्ली में…”,
“प्रेम के प्यालों से ज़हर पी रहा हूँ मैं,
ग़म की सुई से ज़ख़्म सी रहा हूँ मैं…”
जैसी पंक्तियों ने श्रोताओं को गहराई से आंदोलित किया।
इस अवसर पर  राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती शशि जैन जी ने नवगठित जालौर इकाई का हार्दिक स्वागत करते हुए साहित्यिक एकता एवं सृजनशीलता के विस्तार की शुभकामनाएँ प्रदान कीं। राजस्थान प्रांतीय प्रभारी डॉ वैदेही गौतम ने नवगठित इकाई के साहित्यकारों से परिचय करवाया।
कार्यक्रम के समापन सत्र में राष्ट्रीय महामंत्री श्री आनंद जैन जी ने सभी कवियों, अध्यक्ष, संचालक एवं सहभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए गोष्ठी को स्मरणीय बनाने के लिए सभी का हृदय से धन्यवाद ज्ञापित किया।
यह काव्य गोष्ठी निश्चय ही साहित्यिक सौहार्द, भावनात्मक अभिव्यक्ति और राष्ट्रीय साहित्यिक चेतना का एक उज्ज्वल उदाहरण बनकर स्मृतियों में अंकित हो गई।

राष्ट्र के लिए जातीय गोलबंदियों से ऊपर उठने का समय !

अद्यतन उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति विशेष के विधायकों के द्वारा ‘ सहभोज’ करना पार्टी के शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व एवं प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व  द्वारा ‘ गंभीरता’ से लेकर विधायकों को’ पार्टी के मौलिक सिद्धांतों’ को आत्मसात  करके चलने को कहना’ भारतीय राजनीति में जातिवाद ‘ पर अंकुश का संकेत है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का यह कहना कि……. सिद्धांतों एवं  राष्ट्रवाद पर आधारित राजनीतिक दल हैं। राजनीति का आधार सेवा, कर्तव्य एवं लोक कल्याण होता हैं उस राष्ट्र का  चतुर्दिक/ सर्वांगीण विकास होता है। भारतीय राजनीति में ऐसे राजनीतिक नेतृत्व की आवश्यकता है जो परिवार, वर्ग एवं जाति  के बजाय  राष्ट्र, एवं  जातिविहीन तत्वों को स्तुति करके’ राष्ट्र के  सर्वोपरि विकास’ एवं ‘ राष्ट्र- प्रथम’ के मौलिक अवधारणा का उन्नयन करें। भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जिन राजनीतिक दलों, सुधारवादी आंदोलन एवं सुधारवादी  व्यक्तियों का योगदान था उनके कार्यक्रमों, विचारधाराओं एवं प्रसार कार्यक्रमों का मूलाधार ‘ राष्ट्रवाद’ एवं ‘ राष्ट्र प्रथम’ की नीति थी। इसका सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि जिस  ग्रेट- ब्रिटेन (अब इंग्लैंड) को अजेय ‘ ‘ सूर्यास्त ना होना’ एवं ‘ शक्तिशाली सैन्य संरचना’ के द्वारा जाना जाता था, उस बनियों के देश को’ सत्याग्रह’ ‘ इंकलाब ‘ एवं ‘ वंदे मातरम् ‘ जैसे पवित्र एवं आध्यात्मिक अस्त्रों  के सामने घुटने देखना पड़ा।’ साध्य’ की पवित्रता एवं नैतिकता’ साधन’ की पवित्रता पर  उत्तरदाई होती है।
सामयिक राजनीतिक परिदृश्य में  ‘ जातिवाद ‘ भारतीय राजनीतिक दलों के लिए एक ऐसी “टोपी” हैं ,जिसको हर राजनीतिक दल पहनकर राजनीतिक समीकरण को अपने विचार  एवं राजनीतिक दलों में  बढ़ाना चाहता है। प्रारंभिक वर्षों में राजनीति सेवा का साधन था, लेकिन प्रतिस्पर्धा, सत्ता की मलाईदार पद एवं नौकरशाही को अपने आगे पीछे घूमने के लिए ‘ बहुमत ‘ के साध्य  को प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दलों के लिए जाति कामधेनु होने लगीं जिसका राजनीतिक जिन्न अपने जाति बिरादरी के पास संकेंद्रित होने लगी थीं। सन् 1990 से सन् 1997 तक एवं सन् 2004 से सन् 2014 तक की राजनीति में जाति महत्वपूर्ण कारक बना, जिससे राजनीति राजनीतिक दलों की जन्मजात कमाई का केंद्र हो गई थी।’ विवेक’ की आम अवधारणा है कि इसको जिस क्षेत्र में संकेंद्रित करेंगे, वह उसे उस क्षेत्र का विशेषज्ञ बना देती है । जाति व्यवस्था नागरिक समाज एवं नागरिक सरकार की अटूट अंग रही है एवं इसने जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित किया है। स्वतंत्रता के पश्चात सत्ता प्रतिष्ठानों में जाति व्यवस्था का प्रतिशत बढ़ता गया एवं राजनीतिक जीवन एवं सार्वजनिक जीवन से सत्यता, नैतिकता, चरित्र,  आदर्श व्यवहार एवं ईमानदारी व्यक्ति के विभिन्न चेहरों (मुखौटा) का अभ्युदय, राजनीतिक चरित्र ,मूल्य एवं आदर्श का पतन ,विश्वास का गलघोंटू राजनीति एवं राजनीतिक मूल्यों का बंजर भूमि के चरवाहा की तरह प्रयोग किया जाता रहा है।
विगत 78 वर्षों में राजनीतिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली और सामान्य राजनीतिक जीवन के अनुभव से यह संकेत मिलता है कि भारत की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर जातिवाद का “अति संवेदनशील” प्रभाव हैं।भारतीय समाज से जाति का उन्मूलन नहीं हो सकता, जाति का स्वरूप अवश्य परिवर्तित होता रहेगा। राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक समाजीकरण एवं आधुनिकरण के मूल्यों के अनुरूप होने के कारण जाति के बदलते स्वरूप को’ परंपराओं की आधुनिकता ‘ कहा जाने लगा है। भारत की राजनीति का दुर्भाग्य है कि “संसद”( देश की सर्वोच्च पंचायत, राष्ट्र की आत्मा, जनप्रतिनिधियों का सदन एवं  लोकतंत्र के मंदिर) में जाति के लिए ‘ वाक्युद्ध ‘ का अखाड़ा बनता जा रहा है न कि विकास के विमर्श के लिए।
विचारकों एवं चिंतकों का आंकड़ों के अध्ययन से मानना था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के मजबूती के पश्चात’ जाति व्यवस्था के जाल ‘ का उन्मूलन हो जाएगा, एक अवैज्ञानिक, भ्रामक एवं त्रुटिपूर्ण अध्ययन था। भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के मजबूती के पश्चात ‘ जाति की राजनीति’ का राजनीतिक तापमान बढ़ता ही जा रहा  हैं ।राजनीति में ‘ राजनीतिक सेंसेक्स’ का बढ़ना जातिवादी राजनीति का नकारात्मक प्रभाव है। भारत में जाति राजनीतिक संस्कृति का केंद्र होता जा रहा हैं ,खास तौर पर उन नेताओं की जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि  ‘ जातिवाद’ के कारण उदित हुआ था। उत्तर प्रदेश में’ सपा’ (समाजवादी पार्टी), ‘ बीएसपी’ (बहुजन समाजवादी पार्टी) बिहार में ‘ राजद ‘ (राष्ट्रीय जनता दल)’ डीएमके’ एवं ‘ एडीएमके’ का राजनीति में  उभार  का एकमात्र कारण ‘ जाति कार्ड ‘ एवं’ जातियों के  हितैषी ‘ की छवि। एक अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों से उत्तर प्रदेश के ‘ बाराबंकी’ जनपद के जिन क्षेत्रों में’ वर्मा’ (कोइरी ,कुशवाहा एवं मौर्य ) की संख्या अधिक हैं,  वहां स्व. बेनी प्रसाद वर्मा के परिवार के हिमायती ज्यादें हैं। यही कारण है कि स्व. मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में बेनी प्रसाद वर्मा  राज्यकर्ता ( स्टेट एक्टर) की हैसियत से काम करते थे। वर्तमान में भी हर दल टिकटों के बंटवारे में ‘ जाति अभियांत्रिकी’ (Cast engineering) को प्रमुखता देते हैं। भारतीय राजनीति में ‘ जाति कार्ड’ सत्ता प्राप्ति में महत्वपूर्ण नहीं, लेकिन ‘ आवश्यक’ तत्व है।
भारत में 1990 के दौर  में उदारीकरण, निजीकरण एवं भूमंडलीकरण( LPG ) के दौर में राज्य के नियंत्रण को कम करना (आ हस्तक्षेप की नीति ‘ Laizzez fair ‘  आर्थिक क्षेत्र में व्यक्ति को “अकेले” छोड़ दो) सशक्त बनाने पर केंद्रित एवं जाति  केंद्रित राजनीतिक दलों के अभ्युदय को संबल मिला। नवोदित क्षेत्रीय दलों को जनमत, उत्तरदायित्व एवं जवाब देही का “कोई नियंत्रक केंद्र ” नहीं होने के कारण उनके भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद एवं  लूट खसोट के कार्यों में सक्रियता होती गई……। लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर बी.के तिवारी जी ने इस पर  ‘ क्षेत्र अध्ययन’ (केस स्टडी) किए  तो पाएं कि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के सत्ता में उभार से राजनीति का अपराधीकरण ,जाति विशेष के लोगों में अराजकता का दृष्टिकोण एवं इस वर्ग को मलाईदार पदों पर पुरस्कृत करना हैं ,जिस जाति के कारण उनका राजनीतिक कैरियर सफल हुआ है।
‘जाति माफिया’ के रूप में जाने वाले राजनीतिक नेताओं ने ऊंची जातियों के व्यक्तियों को संस्थाओं के प्रति निचली जातियों के असंतोष का भरपूर फायदा उठाएं एवं खुलेआम राज्य के संस्थानों को लूटा ।एक अध्ययन के प्रतिवेदन से स्पष्ट हुआ है कि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का राजनीति में ‘ सौदेबाजी’ एवं’ भ्रष्टाचार’ को बढ़ाने में उत्प्रेरक की भूमिका रही है। आयोगों के अध्यक्ष एवं विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने  ‘ नियुक्तियों ‘  में पारदर्शिता के बजाय’ जी हजूरी’ की भूमिका में काम कर रहे होते हैं। एक क्षेत्रीय दल के कार्यकाल में प्रतिष्ठित उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष गले में सोने के चेन एवं नीचे के जेब में रिवाल्वर लगाकर बैठते थे। अध्यक्ष पद के पहले उनके ऊपर   ‘ 57FIR ‘ था। माननीय उच्च न्यायालय के न्यायिक निर्णय से तत्कालीन अध्यक्ष जी त्यागपत्र दिए। तत्कालीन राज्य के मुख्यमंत्री जी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनको ‘ योग्य अध्यक्ष’ कह रहे थे। इससे पहले भी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का सत्ता में वापसी ‘ सौदेबाजी’ ‘ अपने बिरादरी के लोगों को ऊंचे पदों पर पुरस्कृत करना’ एवं’ अपने परिवार की राजनीतिक हैसियत को  उच्चीकरण करना’ रहा है। राजनीतिक असमतल को सुशासन, विकास, समावेशी शासन एवं सत्ता में सभी के भागीदारी से दूर किया जा सकता है। जातिवादी व्यवस्था को ‘ सबका साथ, सबका विकास एवं सबके विश्वास’ के अमृत मंत्र से दूर किया जा सकता है। राज्य का विकास सबका समाजीकरण, राजनीतिक  संस्कृति का उच्चीकरण ,समावेशी शासकीय नीतियों के क्रियान्वयन, अपराध अराजकता एवं माफिया संस्कृति के प्रति’ शून्य सहिष्णुता’ की नीति का क्रियान्वयन करना होगा।
राजनीति एक प्रतियोगी विमर्श है। इसका लक्ष्य” निश्चित उद्देश्यों के पूर्ति के लिए राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति है।” नागरिक समाज जिसमें सामाजिक ,आर्थिक एवं राजनीतिक समानता को संवैधानिक आवरण प्राप्त है एवं इस समाज में सरकार का निर्माण व परिवर्तन ‘ बहुमत की इच्छा’ के द्वारा होता है। संवैधानिक सरकार के निर्माण के लिए अन्य समूहों की सहायता अति आवश्यक है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के द्वारा राज्य के प्रत्येक नागरिक को व्यवस्था में सहभागिता धर्म, मूल, वंश एवं जाति के भेदभाव को वर्जित किया है। राजनीतिक व्यवस्था में जाति की राजनीति इस तरह हावी है कि  सुशासन, विकास, उत्तम विधि और व्यवस्था  का नागरिक समाज में औचित्य शून्य होती जा रही हैं। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में बिहार की जनता जाति के बजाय सुशासन,  पारदर्शी शासन एवं विकास को प्राथमिकता दी है। राज्यों के उपचुनावों के  आंकड़ों से स्पष्ट है कि जनता सुशासन एवं विकास को प्राथमिकता दे रही हैं।
संसद (भारत की सर्वोच्च पंचायत, लोकतंत्र की आत्मा एवं विचार – विमर्श का केंद्र) को “सामूहिक विचार- विमर्श” एवं  “विकासोन्मुखी सदन” के रूप में प्रासंगिकता को उन्नयन किया  जाएं। हर राजनीतिक दल को राष्ट्रीय विषयों, मुद्दों एवं समावेशी विकास पर ध्यान देना चाहिए जिससे भारत ‘ सर्वोच्च महाशक्ति’ ‘ विश्व गुरु’ एवं’ विकसित भारत @2047′ के लक्ष्य को प्राप्त कर सके।
मेरा  मानना है कि …
1. जाति की राजनीति विकास, सुशासन, विधि एवं व्यवस्था को क्षीण कर रही है;
2. जाति की राजनीति समावेशी राजनीति एवं विकास की राजनीति के लिए मंदक है;
3. जाति की राजनीति प्रतिभा, कार्य उत्पादकता एवं ऊर्जावान विधायकों एवं सांसदों को हतोत्साहित  कर रही है;एवं
4. जाति की राजनीति दलगत राजनीति को बढ़ावा दे रही है।
(अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, केशवकुंज, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं) 

घृष्णेश्वर और घुश्मा के ईश्वर नाम वाला बारहवां ज्योतिर्लिंग

घृणेश्वर शब्द का अर्थ है घृणा पर करुणा करना होता है और जो इसे नियंत्रित करने वाले स्वामी को घृष्णेश्वर कहते हैं। इस ज्योतिर्लिंग की कहानी परम शिव भक्त घुश्मा नामक महिला और उनकी निस्वार्थ भक्ति से जुड़ी है, जिन्होंने अपनी बहन के पति से विवाह के बाद, ईर्ष्यालु सौतन द्वारा मारे गए अपने बेटे को भगवान शिव की कृपा से पुनर्जीवित करवाया था और शिवजी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में वास किया। जिससे यह स्थान घृष्णेश्वर कहलाया, जहाँ हर संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। शिवजी ने भक्त घुश्मा की प्रार्थना स्वीकार की और उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए. घुश्मा के नाम से ही यह ज्योतिर्लिंग ‘घृष्णेश्वर’ (घुश्मा के ईश्वर) कहलाया।

 

घृष्णेश्वर मंदिर की अवस्थिति

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र केऔरंगाबाद   (संभाजी नगर) जिले के वेरुल गाँव में स्थित शिव का एक हिंदू मंदिर है ।  यह एक राष्ट्रीय संरक्षित स्थल है, जो एलोरा गुफाओं से डेढ़ किलोमीटर दूर औरंगाबाद शहर से 30 किलोमीटर उत्तर- पश्चिम में और मुंबई से 300 किलोमीटर पूर्व-उत्तर- पूर्व में स्थित है ।

 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि/ ज्योतिर्लिंग की कथा

घृष्णेश्वर का उल्लेख शिव पुराण स्कंद पुराण , रामायण और महाभारत में मिलता है । यह सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है जो  भगवान शंकर को समर्पित है और इसे बारह ज्योतिर्लिंगों में अंतिम (बारहवां) ज्योतिर्लिंग माना जाता है।

दक्षिण देश में, देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नाम का एक बहुत ही तेजस्वी तपस्वी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। सुदेहा संतानोत्पत्ति के लिए बहुत उत्सुक थी। ज्योतिषीय गणनाओं से पता चला कि सुदेहा के गर्भ से संतानोत्पत्ति संभव नहीं थी।

निःसंतान रहने के भय से सुदेहा ने सुधर्मा से अपनी छोटी बहन घुश्मा से विवाह करने का आग्रह किया। उन्होंने घुश्मा को भगवान शिव की आराधना करने, 101 शिवलिंग बनाने और उन्हें जल में विसर्जित करने की सलाह भी दी।

पहले तो सुधर्मा ऐसा नहीं करना चाहते थे, लेकिन अंत में उन्हें अपनी पत्नी के आग्रह के आगे झुकना पड़ा और अपनी पत्नी की छोटी बहन घुष्मा से विवाह कर उन्हें घर ले आए। घुष्मा अत्यंत विनम्र और गुणी स्त्री थीं। वे शिव की परम भक्त थीं। प्रतिदिन वे एक सौ एक शिवलिंग बनातीं और सच्ची श्रद्धा से उनकी पूजा करतीं।

कुछ दिनों बाद शिव ने घुश्मा के गर्भ से एक बेहद सुंदर और स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। बच्चे के जन्म से सुदेहा और घुश्मा दोनों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उनके दिन बड़े आराम से बीत रहे थे।      कुछ समय बाद सुदेहा के मन में एक बुरा विचार आया। उसने सोचा, “इस घर में मेरा कुछ नहीं है। यहाँ सब कुछ किसी और के वश में हो गया है। उसने मेरे पति पर भी अपना अधिकार जमा लिया है। बच्चा भी उसी का है।” यह बुरा विचार धीरे-धीरे उसके मन में घर करने लगा। इसी बीच घुश्मा का बच्चा भी बड़ा हो रहा था। धीरे-धीरे वह जवान हो गया। उसकी शादी भी हो गई और बहू भी घर आ गई।

एक दिन, सुदेहा ने रात में सोते समय घुष्मा के  बेटे की हत्या कर दी। उसने उसके शव को उठाया और उसी तालाब में फेंक दिया जिसमें घुष्मा प्रतिदिन शिवलिंग विसर्जित किया करती थी। सुबह सबको इस बात का पता चला। पूरे घर में अफरा- तफरी मच गई। सुधर्मा और उनकी बहू दोनों सिर पीटते हुए फूट-फूट कर रोने लगे।

अगले दिन, पुत्र की पत्नी ने पलंग पर खून के धब्बे देखे और पाया कि उसका पति गायब है। घुश्मा अपनी प्रार्थना कर रही थीं, तभी उनकी बहू ने आकर उन्हें अपने पुत्र के बारे में बताया। घुश्मा ने उसकी बातों को अनसुना कर अपनी प्रार्थना जारी रखी। उन्हें विश्वास था कि भगवान शिव उनके पुत्र की रक्षा करेंगे। उसने मंत्रो का उच्चारण शुरू किया और प्रार्थना के बाद वह शिवलिंग को जल में विसर्जित करने के लिए चली। जब वह तालाब से लौटने लगीं, तो उन्होंने अपने प्रिय पुत्र को तालाब के अंदर से निकलते हुए देखा। वह घुष्मा के चरणों में गिर पड़ा।

उसी समय शिवजी भी पास ही में प्रकट हुए। वे सुदेहा के जघन्य कृत्य से बहुत क्रोधित थे। वे अपने त्रिशूल से उसका गला काटने को उतावले थे। घुश्मा ने हाथ जोड़कर शिव से कहा, ‘प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी उस अभागी बहन को क्षमा कर दीजिए। उसने घोर पाप किया है, लेकिन आपकी कृपा से मुझे मेरा पुत्र वापस मिल गया। अब हे प्रभु, उसे क्षमा कर दीजिए! घुश्मा की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने एक और बरदान मांगने को कहा। इस पर घुश्मा ने कहा,मेरी एक यही प्रार्थना है, जन कल्याण के लिए आप सदा यहीं निवास करें।’

शिव ने इन दोनों बातों को स्वीकार कर लिया। ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर वे वहीं निवास करने लगे। सती शिव भक्त घुश्मा की पूजा के कारण वे यहाँ घुश्मेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

 

वर्तमान मन्दिर का इतिहास

यह मंदिर कई बार बना और बिगड़ा है; मूल मंदिर 13वीं-14वीं शताब्दी में बना ।  13वीं और 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत द्वारा मंदिर की संरचना को नष्ट कर दिया गया था । मुगल- मराठा संघर्ष के दौरान मंदिर का कई बार पुनर्निर्माण हुआ और फिर से नष्ट हो गया।इसका शुरुआती पुनर्निर्माण शिवाजी के दादा मालोजी भोसले ने 16वीं सदी में कराया था। मुगल साम्राज्य के पतन के बाद इंदौर की रानी गौतमा अहिल्या बाई होलकर के संरक्षण में 1729 में इसे इसके वर्तमान स्वरूप में पुनर्निर्मित किया । यह वर्तमान में हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण और सक्रिय तीर्थ स्थल है और प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। यद्यपि इसके प्राचीन अवशेष शिव पुराण और पद्म पुराण में भी मिलते हैं।

 

सर्व प्रवेश की अनुमति

घृष्णेश्वर मंदिर में सभी का प्रवेश खुला है। कोई भी व्यक्ति मंदिर परिसर और उसके भीतरी कक्षों में प्रवेश कर सकता है, लेकिन मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए, स्थानीय हिंदू परंपरा के अनुसार पुरुषों को नंगे बदन जाना आवश्यक है।यह भारत के उन चुनिंदा ज्योतिर्लिंगों में से एक है जहाँ भक्त नंगे हाथों से शिवलिंग को स्पर्श कर सकते हैं।

 

घृष्णेश्वर मंदिर की वास्तुकला

मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली में बनी है और यह औरंगाबाद के सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। घृष्णेश्वर मंदिर का पांच मंजिला शिखर पारंपरिक मंदिर वास्तुकला शैली में शानदार ढंग से तराशा और निर्मित किया गया है। मंदिर परिसर में आंतरिक कक्ष और एक गर्भगृह शामिल हैं।यह संरचना लाल रंग के पत्थरों से बनी है। पूरा परिसर  44,400 वर्ग फुट के क्षेत्र में फैली हुआ है। इन आयामों के साथ भी, घृष्णेश्वर मंदिर सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग मंदिर है।

 

विविध नक्काशियां

यह भारत का एकमात्र ज्योतिर्लिंग मंदिर है जहाँ भगवान शंकर का पूरा परिवार एक ही मूर्ति में विराजमान है, जिसमें भगवान शिव, देवी पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय नंदी पर विराजमान हैं, और भगवान शंकर ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया हुआ है। यह नक्काशीदार मूर्ति मंदिर के शिखर पर शीर्ष भाग में सफेद पत्थर में उकेरी गई है, और मंदिर के दक्षिण प्रवेश द्वार से स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।मंदिर के एक स्तंभ पर हाथी और नंदी की नक्काशीदार मूर्ति बनी हुई है। इस नक्काशी को हरी-हर मिलन (भगवान विष्णु और भगवान शंकर की भेंट) का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा, मंदिर के 24 स्तंभों पर यक्षों की आड़ी मूर्तियाँ उत्कीर्णन गई हैं, जो यह दर्शाती हैं कि यक्षों ने पूरे मंदिर का भार अपने कंधों और पीठ पर उठाया है।

इसकी आंतरिक और बाहरी दीवारों पर विभिन्न मूर्तियां और सुंदर डिज़ाइन हैं। मंदिर के गर्भगृह में एक ज्योतिर्लिंग मूर्ति स्थित है और मुख्य द्वार के सामने भगवान शिव के प्रिय भक्त नंदी की एक विशाल मूर्ति है। इस मंदिर में पांच मंजिला ऊंचा शिखर और कई स्तंभ हैं जिन पर जटिल पौराणिक नक्काशी की गई है। लाल पत्थर की दीवारों पर अधिकतर भगवान शिव और भगवान विष्णु के दस अवतारों की कथाएँ चित्रित हैं। गर्भगृह या पवित्रतम स्थान में शिवलिंग पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए है। गर्भ गृह का क्षेत्रफल लगभग 289 वर्ग फुट है और गलियारे में नंदी की प्रतिमा स्थापित है।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। लेखक ने स्वयं इस स्मारक का अवलोकन किया है। वॉट्सप नं.+919412300183)