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भारतीय मानस को औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त करने की आवश्यकता

समालखा ,पानीपत में आयोजित त्रयोदश राष्ट्रीय महाधिवेशन के समापन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के पालक अधिकारी आदरणीय सुरेश सोनीजी ने कहा कि,” पश्चिम केंद्रित प्रत्यय हमारे जीवन प्रणाली, शिक्षा प्रणाली, सामाजिक संरचनात्मक परिदृश्य, कार्य व्यवहार एवं राजनीतिक संस्कृति में  अति व्याप्त हैं,जबतक  औपनिवेशिक मानसिकता को विनष्ट नहीं करेंगे, तबतक  हम ‘ विकसित भारत’ एवं ‘ अग्रणी भारत’ की संकल्पना को गति नहीं दे पाएंगे”।  भारत में औपनिवेशिक मानसिकता ने राष्ट्रीय एकता, अखंडता एवं केंद्रीकरण की अवधारणा को बोझिल किया है, बल्कि सांस्कृतिक स्वतंत्रता में मंदक की भूमिका निभाया है। 1947 के पश्चात भी शिक्षा व्यवस्था, शासकीय संरचना, सामाजिक संरचना, विज्ञान एवं नवोन्मेष में  यूरोपियन दृष्टिकोण व्याप्त है। हम सभी भारतीयों को सन् 2035 तक इस औपनिवेशिक मानसिकता को त्याग करके भारतीय मानस को वीं- औपनिवेशीकरण की अवधारणा को आत्मसात करना होगा।
विभाजनकारी शक्तियां एवं औपनिवेशिक मानसिकता ‘ अग्रणी भारत’ एवं’ परम वैभव भारत’ के निर्माण में बाधक रही है। यह मूर्त शक्तियां भारत की एकता व अक्षुण्णता के लिए निरंतर   चुनौती रहे हैं । विभाजनकारी शक्तियों ने राष्ट्रीय एकता व अखंडता पर निरंतर प्रहार किया है, वही औपनिवेशिक मानसिकता ने भारत को उसकी परंपरागत प्रत्यय, धर्म की व्यापक अवधारणा एवं सनातन संस्कृति से जुड़ने नहीं दिया। सन् 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सत्ता अभिकरण में ‘ पाश्चात्य केंद्रित मानसिकता ‘ के कारण भारत के संस्कृति, विरासत ,लोकतांत्रिक संस्कृति एवं आदर्श के अनुरूप शिक्षा का  उन्नयन नहीं हो सका, शासकीय संरचना, वैज्ञानिक विकासात्मक  कारकों, नवोन्मेष ,चिकित्सा एवं विकास के ‘ नूतन प्रतिमान’ नहीं विकसित कर सका था। भारतीय मानस के विवेकी पटल पर ‘ वीं- औपनिवेशीकरण ‘ की अवधारणा का उन्नयन कर  2035 तक सशक्त करना होगा। हम सभी को हीनभावना त्यागना होगा, हमें अपने सांस्कृतिक विरासत पर  गर्व करना होगा ,अपने जीवन दर्शन में ‘ स्वदेशी’ एवं ‘ भारतीयता’ की भावना को सशक्त करना होगा ।हमें अपने संविधान को भारतीयता की भावना से आत्मसात करना होगा। भारत वैश्विक स्तर पर ‘ लोकतंत्र की जननी’ है। लोकतंत्र भारतीयों के’ डीएनए’ में  हैं।
सवाल यह है कि हम ” वि – औपनिवेशीकरण ” को कैसे भारतीय मानस के ढांचे में रूपांतरित करें ?
 भारतीय शोधार्थी एवं बुद्धिजीवी वर्ग में थॉमस बेडिंगटन मैकाले द्वारा स्थापित शिक्षा  – प्रणाली एवं औपनिवेशिक मानसिकता भारतीय मानस में गहरी जड़े जमा चुकी हैं ,जो प्रत्येक    ‘ इच्छित बदलाव’ में बाधा बनती हैं । सन् 2014 के शासकीय बदलाव एवं मजबूत इच्छा शक्ति की सरकार ने भारतीय मानस के” वि- औपनिवेशीकरण” के दिशा में कई पहल  किया है। नवोदित मेधा के लिए भारत सरकार ने   ‘ नई शिक्षा नीति- 2020 ‘ के सफल क्रियान्वयन के लिए प्रशासकीय स्तर पर सकारात्मक पहल किया है। नागरिक समाज एवं नागरिक सरकार ने भी” वि- औपनिवेशीकरण” के लिए राष्ट्रीय संकल्प लिया है। मैकाले के सोच एवं चिंतन को भारत के काल, ज्ञान ,इतिहास एवं संस्कृति से पूरी तरह  अनाछादित करना नागरिक सरकार के दूरदर्शी सोच है। नागरिक सरकार एवं सांस्कृतिक संगठनों के सद्प्रयासों से भारतीय ज्ञान- प्रणाली को पुन: स्थापित करना एवं भारतीय ज्ञान- परंपरा पर गर्व करने की आवश्यकता पर जोर दिया है, और इनका कहना है कि,”  वि- औपनिवेशीकरण “की मानसिकता भारत के विकास, आत्मनिर्भर भारत एवं विकसित भारत @ 2047 का आधार   – स्तंभ है।
 स्वतंत्रता के  पश्चात् भी सामाजिक, शैक्षणिक ,आर्थिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों पर  ‘ पश्चिमी कारकों’ का प्रभाव है, एवं भाषा, पोशाक, सांस्कृतिक पहचान एवं मूलभूत विज्ञान की अवधारणाओं की अनदेखी होती रही थीं। विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों ,बौद्धिक संस्थाओं एवं वैश्विक स्तर की विचार – विमर्श की संस्थाओं में ज्ञान एवं मेघा , योग्यता एवं  कार्य कुशलता की बजाय ‘ आंग्ल भाषा’ की जानकारी माना जाने लगा ,जिससे भारतीय युवाओं में अपने भाषा, ज्ञान ,प्रतिभा ,इतिहास एवं संस्कृति के प्रति  हीनभावना आने लगी थी।” वि – औपनिवेशीकरण” की संकल्पना को भारत सरकार ‘ राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020’ के द्वारा ‘ भाषाई समानता ‘ एवं ‘ मातृभाषा के महत्व ‘ के आधार पर उन्नयन  कर रहा है । भारतीय मानस में ” वि – औपनिवेशीकरण” के द्वारा सांस्कृतिक मूल्यों की महत्ता को बढ़ाकर भारतीय युवाओं में ‘ प्रोत्साहन’ ‘ पुरस्कार’ एवं    ‘ मनोबल ‘ के कारकों से उन्नयन करके भारत को  ‘ समग्र विकास’ एवं ‘ अग्रणी राष्ट्र ‘ के रूप में स्थापित करना होगा।
 वैश्विक स्तर पर विश्वविद्यालयों की संकल्पना भारतीय मनीषियों  एवं बौद्धिक  व्यक्तित्वों  का अनमोल देन है। योग की अवधारणा, आयुर्वेद की अवधारणा एवं वास्तु शास्त्र की अवधारणा भारतीय मेधा एवं चिंतन का देन है। वैश्विक स्तर पर काल   – गणना, ग्रह नक्षत्र पर पारंपरिक शोध एवं सांस्कृतिक विविधता में “तार्किकता” का प्रत्यय भारतीय मनीषियों  का देन है। समसामयिक स्तर पर इन अवधारणाओं का योगदान वैश्विक स्तर पर अधिक कलात्मक स्तर पर हो रहा है। यह भारत की ‘ समृद्ध गणना प्रणाली’ की  उपादेयता है। सिंधु घाटी की नगर  – नियोजन व्यवस्था ,सर्वोत्तम वस्तु कलाओं तथा मंदिरों की नक्काशी ,ऐतिहासिक विकासात्मक अवधारणा एवं सांस्कृतिक धरोहरों की समग्रता भारतीयों को वैश्विक राष्ट्र- राज्यों को  देन है।
हमारी विविधता पूर्ण सांस्कृतिक परंपरा में    ‘ सभी रंगों ‘ को सम्मान मिलता हैं।भारत के सांस्कृतिक प्रेरक व्यक्तित्व ,श्री राम जी एवं श्री कृष्ण जी श्याम वर्ण के थे, जो चारित्रिक सौंदर्य एवं  उदारता  के आदर्श थे। हमारे समाज का खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा एवं जीवन शैली प्रकृति के अनुकूल और पर्यावरण के प्रति   धारणीय है। इतिहास का काल विभाजन भी औपनिवेशिक मानसिकता का परिणाम है। हमें अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र को भी ” वि- औपनिवेशीकरण “की मानसिकता से देखना होगा। भारत ‘ सिरमौर राष्ट्र’ तभी होगा जब हम सभी अपनी संकल्पनाओं के प्रति पूरी तरह ‘ भारतीय दृष्टिकोण’ को आत्मसात करें।
भारत का विकास अंग्रेजों के आगमन से पहले हो चुका था। अंग्रेज अधिकारियों के संस्मरणों के अनुसार 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में भारत में 10000 से अधिक लौह- भट्ठियां थी, जहां तत्कालीन संयुक्त राज्य( ग्रेट ब्रिटेन) से उन्नत इस्पात बनाया जाता था। तत्कालीन भारत की शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था, कृषि, उद्योग एवं प्रौद्योगिकी विकसित थी। विद्वान इतिहासकार धर्मपाल जी ने अपने दो प्रसिद्ध पुस्तकों में  इन तथ्यों  को ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुत किया है। भारत की लोह – इस्पात तकनीकें अंग्रेजों से अधिक उन्नत थी। 18वीं एवं 10वीं सदी में  तत्कालीन समाज में  कृषि, उद्योग, सिंचाई, यातायात एवं सूती वस्त्रों के  उत्पादन के क्षेत्र में उन्नत एवं प्रगतिशील था। खाद्यान्न, दलहन, तिलहन ,फल, फूल, सब्जी, बागवानी एवं  दुग्ध उत्पादन में भारत की स्थिति तत्कालीन इंग्लैंड से बेहतर थीं। 18वीं शताब्दी के दौरान भारतीय खेती की उपज इंग्लैंड से लगभग” दोगुनी” थी। 18वीं सदी तक सूती वस्त्रो का निर्यात उच्चतर स्तर का था जिसके प्रतिक्रियास्वरूप  संयुक्त राज्य( ग्रेट ब्रिटेन) में भारतीय  वस्त्रों के निर्यात पर विरोध प्रारंभ हो गया था।18वीं सदी तक भारत में ‘ चेचक’ के टीके उपलब्ध थे।  शल्य चिकित्सा में भारत के वैद्य  यूरोपीय चिकित्सकों से बेहतर थे। इस तरह भारतीय मानस को गुलामी की मानसिकता से  मुक्ति की आवश्यकता है।
राष्ट्रपति भवन में “परमवीर दीर्घा” का निर्माण औपनिवेशिक मानसिकता के त्यागने एवं देश को मानवीय दृष्टिकोण से  जोड़ने का माध्यम है। राष्ट्रपति भवन की”  परमवीर गैलरी” में देश के नायकों  के चित्र हमारे राष्ट्र के रक्षकों  को हार्दिक श्रद्धांजलि है! वह नायक जिन्होंने अपने सर्वोच्च त्याग से  मातृ भूमि की रक्षा किए, जिन्होंने भारत की एकता व अखंडता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। राष्ट्र ने उनके अदम्य साहस एवं बलिदान के लिए कृतज्ञता व्यक्त कर रहा है।”
     मेरा सुझाव है –
1. अंतःकरण से भारतीय शिक्षा पद्धति, भारतीय चिंतकों एवं मनीषियों  के    ‘ विचारों’ को आत्मसात करना होगा;
2. प्रत्येक स्तर पर ‘ स्वदेशी शिक्षा ‘ को प्रोत्साहित करना होगा;
3. सामयिक  स्तर पर सरकार ‘ प्रतीकों ‘ को हटाकर “वि – औपनिवेशीकरण” का उन्नयन करें;
4. महामहिम ,लॉर्ड्स एवं अन्य औपनिवेशिक शब्दों को व्यक्तिगत स्तर एवं सार्वजनिक स्तर पर त्यागने की आवश्यकता है।
5. ‘ हिस मजेस्टी’ एवं ‘ हर मैजेस्टी  ‘ जैसे शब्दों की जगह  ‘ महोदय’ एवं  ‘ महोदया  ‘ का प्रयोग अंतःकरण की आवश्यकता है।
(लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना झंडेवालान, नई दिल्ली के राष्ट्रीय सचिव हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास एवं  सामयिक विषयों पर गंभीर चिंतन करते हैं )

एलोरा की गुफाओं के चित्रों में हजारों सालों से धड़क रही है भारतीय संस्कृति

एलोरा गुफाएँ भारत में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं , जिनमें हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म की चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं का समूह है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित एलोरा गुफाएं शहर से 29 किलोमीटर दूर हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े चट्टानों को काटकर बनाए गए गुफा मंदिर परिसरों में से एक है। प्राचीन समय में कई गुफाएं मंदिरों के रूप में उपयोग की जाती थीं, जबकि अन्य मठ और विश्राम स्थल थे। यह लगभग 100 गुफाओं का एक परिसर है जिनमें जटिल नक्काशी और मूर्तियां हैं। गुफाएँ प्राचीन भारतीय शिला- कट वास्तुकला के सबसे प्रभावशाली उदाहरणों में से एक हैं।खोजी गई 100 गुफाओं में से 34 गुफाएँ जनता के लिए खुली हैं। इनमें 12 बौद्ध गुफाएँ (1-12), 17 हिंदू गुफाएँ (13-29) और 5 जैन गुफाएँ (30-34) शामिल हैं। भारत के इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए ये गुफाएँ अवश्य देखने योग्य हैं।इन गुफाओं में सबसे प्रसिद्ध कैलाश मंदिर नामक एक स्मारक है। यह एक विशाल अखंड संरचना है जिसे एक ही चट्टान से तराशा गया है।

हिंदू बौद्ध और जैन धर्म के पवित्र कलाएं

गुफाएं हमेशा से ही पवित्र स्थल रही हैं, जिन्हें आमतौर पर वेरुल के नाम से जाना जाता है। सदियों से ये गुफाएं तीर्थयात्रियों को आकर्षित करती रही हैं और आज भी करती हैं। एलोरा गुफाओं में मौजूद शिलालेख और नक्काशी बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म और जैन धर्म के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं।माना जाता है कि इन गुफाओं का निर्माण बौद्ध धर्म के पतन के समय हुआ था। इनकी नक्काशी का काम लगभग उसी समय शुरू हुआ जब पास की अजंता गुफाओं को छोड़ दिया गया था। उस दौरान हिंदू धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा था। पूरे क्षेत्र में धार्मिक सद्भाव कायम था। गुफाओं का निर्माण एक-दूसरे के करीब किया गया था, जो इसी सद्भाव को दर्शाता है।

एलोरा गुफा का समय

गुफा स्मारकों की यह निरंतर श्रृंखला छठी से दसवीं शताब्दी के बीच की सभ्यता को जीवंत कर देती है। कुछ ग्रंथों से यह भी पता चलता है कि इसके बाद भी लंबे समय तक इन गुफाओं में लोग रहते रहे।

एलोरा गुफाओं का निर्माण 600 ईस्वी से 1000 ईस्वी के बीच,400 वर्षों की अवधि में हुआ था। जिसमें मुख्य रूप से कलचुरी, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों का योगदान था; इनमें बौद्ध (6वीं-8वीं सदी), हिंदू (6वीं-10वीं सदी) और जैन (9वीं- 12वीं सदी) धर्मों से संबंधित मंदिर और मठ शामिल हैं, जो प्राचीन भारत की धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाते हैं।

एलोरा गुफाओं में सहिष्णुता की भावना दिखती है

एलोरा गुफाएं बौद्ध, हिंदू और जैन गुफा मंदिरों का एक प्रभावशाली संगम हैं। इन गुफाओं में बौद्ध चैत्य और विहार, हिंदू मंदिर और जैन तीर्थस्थल शामिल हैं। इस प्रकार,एलोरा गुफाएं उस काल की धार्मिक सद्भाव, सामंजस्य और समकालिकता का प्रतीक हैं। एलोरा गुफा परिसर अपनी अनूठी कलात्मक कृतियों और तकनीकी बुद्धिमत्ता के लिए भी प्रसिद्ध है। इसी कारण एलोरा को 1983 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।

कैलाश मंदिर सबसे ज्यादा आकर्षक

एलोरा गुफाओं में स्थित कैलाश मंदिर यहाँ का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण है। कैलाश मंदिर (गुफा 16), जो एक ही चट्टान को तराशकर बनाया गया है, शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत के समान दिखता है। प्रारंभिक हिंदू गुफाओं में से अधिकांश भगवान शिव को समर्पित थीं।

एलोरा गुफाओं की वास्तुकला

एलोरा गुफाओं की वास्तुकला में विभिन्न प्रकार की शैलियाँ और तकनीकें देखने को मिलती हैं। पश्चिमी दक्कन के विभिन्न स्थानों पर चट्टानों को काटकर की जाने वाली कलाकृतियों पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव है, साथ ही दक्षिण भारत में संरचनात्मक गतिविधियों पर भी इसका प्रभाव है।

सामान्य तौर पर, एलोरा की गुफाएँ चट्टानों को काटकर बनाई गई वास्तुकला शैली के अंतिम चरण से उभरती हुई स्वतंत्र संरचना वास्तुकला की ओर संक्रमण का प्रतीक हैं। ये भारतीय मंदिर वास्तुकला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सबसे पुराने मंदिरों की संरचना सरल होती है। इनमें मंदिर के सामने स्तंभों के बिना छोटे-छोटे गलियारे होते हैं। और दरवाजों के फ्रेम और स्तंभ आमतौर पर सादे होते हैं। इसमें कैलाश मंदिर, छोटा कैलाश और इंद्र सभा जैसी अखंड संरचनाएं निर्मित इमारतों की नकल करती हुई प्रतीत होती हैं। ये स्वतंत्र रूप से खड़े मंदिर थे जिनमें खुले बरामदे और बंद मंडप थे, साथ ही गर्भगृह भी थे। यहां एक हिंदू मंदिर की विशिष्ट विशेषताएं दिखाई देंगी: गर्भगृह जिसमें लिंगम स्थापित है, परिक्रमा करने के लिए एक स्थान, एक सभा कक्ष और एक प्रवेश द्वार।

15 मीटर ऊंची प्रतिमा बुद्ध की प्रतिमा

एलोरा में स्थित जैन गुफाएं हिंदू और बौद्ध गुफाओं से छोटी हैं। इन गुफाओं में मंडप और स्तंभों वाला बरामदा जैसी स्थापत्य विशेषताएं मौजूद हैं।परिसर में स्थित बौद्ध गुफाओं में मठ और मंदिर हैं। विश्वकर्मा गुफा (गुफा 10) सबसे उल्लेखनीय है।इस स्थल पर और भी कई गुफाएँ और मूर्तियाँ हैं। भगवान बुद्ध की 15 मीटर ऊंची प्रतिमा भी यहाँ की एक और खास विशेषता है। यह एक समर्पित प्रार्थना स्थल है, और इसके अंदर आपको उपदेश देने की मुद्रा में विश्राम करते हुए बुद्ध की 15 फुट ऊंची प्रतिमा मिलेगी।

कैलाश मंदिर की शैली में निर्मित छोटा कैलाश (गुफा 30) एलोरा गुफाओं में सबसे अधिक दर्शनीय जैन मंदिर है। इंद्र सभा (गुफा 32) भी प्रसिद्ध है। यह सभी गुफाओं में सबसे बड़ी और सबसे उत्तम है।

एलोरा गुफाओं का इतिहास

एलोरा गुफाओं का इतिहास चार शताब्दियों पुराना है। हालांकि गुफाओं की खुदाई की समयरेखा स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना जाता है कि हिंदू और बौद्ध गुफाओं का कुछ हिस्सा राष्ट्रकूट राजवंश के दौरान बनाया गया था। जैन गुफाओं का निर्माण यादव शासनकाल में हुआ माना जाता है।

बौद्ध गुफाओं (1 से 12) की खुदाई छठी और आठवीं शताब्दी के बीच हुई मानी जाती है। और जैन गुफाओं (30 से 34) की खुदाई नौवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच हुई थी। हिंदू गुफाओं की खुदाई दो चरणों में की गई थी। इनमें से कुछ गुफाओं की खुदाई बौद्ध या जैन गुफाओं से भी पहले की गई थी। नौ गुफाओं (17 से 25) की खुदाई छठी शताब्दी के आरंभ में की गई थी, जिसके बाद चार और गुफाओं (26 से 29) की खुदाई की गई। अन्य हिंदू गुफाओं (13 से 16) का निर्माण सातवीं और दसवीं शताब्दी के बीच हुआ था।

एलोरा गुफाओं की महत्वपूर्ण बातें

भारत में एलोरा गुफाओं में 100 से अधिक चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएं हैं। हालांकि, इनमें से केवल 34 गुफाएं ही जनता के लिए खुली है।

1. हिंदू मंदिरों का भ्रमण – एलोरा गुफाओं की सूची में, गुफा संख्या 13 से 29 तक हिंदू गुफाएं हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं गुफा संख्या 15 (दशावतार), गुफा संख्या 16 (कैलासा मंदिर) और गुफा संख्या 21 (रामेश्वर)। कैलाश मंदिर अपनी भव्य नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है, दशावतार गुफा में मुख्य रूप से भगवान शिव और भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों को दर्शाया गया है, और रामेश्वर गुफा अपनी मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। गुफा संख्या 29 (दुमर लेना) भी लोकप्रिय है। यह सीता-की-नहानी के किनारे स्थित है, जो एलागंगा नदी के झरने से बना एक छोटा सा तालाब है।

2. बौद्ध मठों का भ्रमण – एलोरा गुफाएँ: गुफा संख्या 1 से 12 तक बौद्ध मठ स्थित हैं। इनमें से गुफा संख्या 10 (विश्वकर्मा), गुफा संख्या 11 (दो ताल) और गुफा संख्या 12 (तीन ताल) विशेष रूप से प्रभावशाली हैं। विश्वकर्मा गुफा में बुद्ध का एक विशाल स्तूप है, दो ताल दो मंजिला मठ है और तीन ताल तीन मंजिला मठ है। सभी बौद्ध गुफाओं में बुद्ध के चित्र और मूर्तियां तथा बौद्ध पौराणिक कथाओं के प्रतीक उकेरे गए हैं।

3. जैन तीर्थ स्थलों का भ्रमण – एलोरा में जैन गुफाएँ गुफा संख्या 30 से 34 तक हैं। इनमें से सबसे उल्लेखनीय हैं गुफा संख्या 30 (छोटा कैलाश), गुफा संख्या 32 (इंद्र सभा) और गुफा संख्या 33 (जगन्नाथ सभा)। छोटा कैलाश हिंदू कैलाश मंदिर की एक अधूरी प्रतिकृति जैसा है, इंद्र सभा जैन तीर्थ स्थलों की एक श्रृंखला है, और जगन्नाथ सभा में कुछ अच्छी तरह से संरक्षित मूर्तियाँ हैं। सभी जैन गुफाओं में सूक्ष्म और नाजुक नक्काशी की गई है और इनमें दिगंबर संप्रदाय को समर्पित चित्र हैं।

 

4. कैलाश मंदिर का भ्रमण – कैलाश मंदिर एक प्राचीन शिलाखंड काटकर निर्मित मंदिर परिसर है जिसमें भगवान शिव को समर्पित एक गर्भगृह है। इसमें एक विशाल अखंड शिवलिंग है। मंदिर में हिंदू महाकाव्यों रामायण और महाभारत की घटनाओं को दर्शाने वाली मूर्तियां हैं। पूरे मंदिर का आधार, दीवारें और छत सूक्ष्म और विस्तृत नक्काशी से सुशोभित हैं। और सभी शिव मंदिरों की तरह, केंद्रीय गर्भगृह के सामने बरामदे में नंदी की प्रतिमा स्थापित है। यह सारा काम छेनी और हथौड़े जैसे साधारण औजारों से किया गया था।यह मंडप द्रविड़ शैली के शिखर और 16 स्तंभों पर टिका हुआ है। मंदिर के सामने नंदी की प्रतिमा स्थापित है। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों के कारीगरों ने यहाँ काम किया है। कैलाश मंदिर भारतीय गुफा वास्तुकला का एक ज्ञानकोश है।

एलोरा-अजंता गुफाएं एक जैसी नहीं

अजंता पूरी तरह से बौद्ध हैं और अपने अद्भुत चित्रों (भित्तिचित्रों) के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि एलोरा में बौद्ध, हिंदू और जैन धर्मों का मिश्रण है और यह कैलास मंदिर जैसे विशाल रॉक-कट मंदिरों के लिए जाना जाता है, जो एक ही चट्टान को काटकर बनाए गए हैं, और एलोरा की गुफाएँ पास-पास हैं, जबकि अजंता की गुफाएँ थोड़ी दूर हैं। संक्षेप में, अजंता कला और चित्रों के लिए है, जबकि एलोरा विभिन्न धर्मों के अद्भुत वास्तुकला और धार्मिक सहिष्णुता का संगम है।

क्षति के कारक

एलोरा गुफाएँ पूरी तरह नष्ट नहीं हुईं, बल्कि दिल्ली सल्तनत और मुगल काल (15वीं-17वीं सदी) के दौरान मुस्लिम शासकों द्वारा मूर्तियों और चित्रों को नुकसान पहुँचाया गया, खासकर औरंगज़ेब ने कैलाश मंदिर को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन यह असफल रहा; आज भी प्राकृतिक कारणों : पानी का रिसाव और मानवीय उपेक्षा से इन्हें खतरा है, पर ये यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मौजूद हैं।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

साहित्यिक प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने दिखाया बौद्धिक कौशल

कोटा।  बसंत विहार स्थित अकलंक कॉलेज ऑफ एजुकेशन में आयोजित मुक्ताकाश सत्र ‘उमंग 2025’  में कविता पाठ, आशु भाषण एवं वाद–विवाद प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया।  प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर अपनी साहित्यिक, वक्तृत्व एवं तार्किक प्रतिभा का  प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ अकलंक विद्यालय एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री पियूष जैन, प्राचार्या डॉ. पिंकी श्रीवास्तव, उप-प्राचार्या श्रीमती नम्रता जैन,  सांस्कृतिक कार्यक्रम समन्वयक डॉ. किरण गुप्ता एवं डॉ. मिशा शर्मा, कार्यक्रम प्रभारी डॉ इंदु बाला शर्मा,श्री के. के. गोस्वामी एवं श्री हर्ष जैन तथा अन्य वरिष्ठ संकाय सदस्यों द्वारा माँ शारदे के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
 देशभक्ति  पर आयोजित कविता प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने शहीदों के बलिदान, राष्ट्र की एकता एवं संविधानिक मूल्यों को काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी। प्रतियोगिता में विशाल पॉटर ने प्रथम स्थान, अक्षिता गौतम ने द्वितीय स्थान एवं चिरायुशी सैनी ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। कविता पाठ प्रतियोगिता का संयोजन श्री के. के. गोस्वामी एवं श्री हर्ष जैन द्वारा किया गया।
डॉ. इंदु बाला शर्मा के संयोजन में आयोजित वाद–विवाद प्रतियोगिता का विषय “ए.आई. (कृत्रिम बुद्धिमत्ता): वरदान या अभिशाप” में विद्यार्थियों ने तकनीकी विकास के सकारात्मक–नकारात्मक पहलुओं एवं नैतिक प्रश्नों पर अपने तर्क प्रस्तुत किए। प्रतियोगिता में विभूति सिंह हाड़ा (बी.एससी. बी.एड.) ने प्रथम स्थान, प्रिंस जैन (बी.ए. बी.एड. प्रथम वर्ष) ने द्वितीय स्थान तथा वैष्णवी सिंह (बी.एड. प्रथम वर्ष) ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
आशु भाषण प्रतियोगिता का संयोजन श्रीमती कुसुम शर्मा द्वारा किया गया, जिसमें विद्यार्थियों ने आत्मविश्वास, विषय-ज्ञान एवं प्रभावी अभिव्यक्ति का परिचय दिया। प्रतियोगिता में कांची (बी.एड. प्रथम सेमेस्टर) ने प्रथम स्थान, विभूति सिंह हाड़ा (बी.एससी. बी.एड. तृतीय सेमेस्टर) ने द्वितीय स्थान तथा वैष्णवी सिंह (बी.एड. तृतीय सेमेस्टर) ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
प्रतियोगिताओं के निर्णायक मंडल के रूप में श्रीमती शुचि सेठी एवं श्रीमती लविशा सावलिया उपस्थित रहीं, जिन्होंने प्रस्तुतियों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया। कार्यक्रम का सशक्त मंच संचालन अहिंसा गोस्वामी एवं रक्षित प्रजापति द्वारा किया गया।
 कार्यक्रम के अंत में प्राचार्या डॉ. पिंकी श्रीवास्तव एवं उप-प्राचार्या श्रीमती नम्रता जैन द्वारा निर्णायक मंडल को स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया तथा सभी प्रतिभागियों को उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ दी गईं। समापन अवसर पर संयोजक डॉ. इंदु बाला शर्मा ने सभी अतिथियों, निर्णायकों, आयोजकों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

भारतीय नौसेना में तीसरी पनडुब्बी रोधी उथले पानी का जहाज ‘अंजदीप’ शामिल किया गया

गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई), कोलकाता द्वारा स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित आठ एएसडब्ल्यू एसडब्ल्यूसी पनडुब्बी रोधी उथले पानी के जहाजों में से एक यानी तीसरा अंजदीप जहाज, 22 दिसंबर 2025 को चेन्नई में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया।

एएसडब्ल्यू एसडब्ल्यूसी जहाजों को जीआरएसई और मेसर्स एल एंड टी शिपयार्ड, कट्टुपल्ली के सार्वजनिक-निजी-भागीदारी (पीपीपी) के तहत इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग (आईआरएस) के वर्गीकरण नियमों के अनुसार डिजाइन और निर्मित किया गया है। यह सहयोगी रक्षा विनिर्माण की सफलता को दर्शाता है।

लगभग 77 मीटर लंबाई वाले ये जहाज भारतीय नौसेना के सबसे बड़े वाटरजेट युद्धपोत हैं और अत्याधुनिक हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी रूप से निर्मित पनडुब्बी रोधी रॉकेट और उथले पानी के सोनार से सुसज्जित हैं।  यह पानी के नीचे के खतरों का प्रभावी ढंग से पता लगाने और उनसे निपटने में सक्षम हैं। ये जहाज नौसेना की पनडुब्बी रोधी, तटीय निगरानी और बारूदी सुरंग बिछाने की क्षमताओं को मजबूत करेंगे।

यह जहाज 2003 में सेवामुक्त पूर्ववर्ती पेट्या श्रेणी के युद्धपोत आईएनएस अंजदीप का पुनर्जन्म है। जहाज का नाम कर्नाटक के कारवार तट पर स्थित अंजदीप द्वीप से लिया गया है, जो भारत के विशाल समुद्री क्षेत्र की रक्षा की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।

अंजदीप का शामिल किया जाना भारतीय नौसेना के स्वदेशी जहाज निर्माण के प्रयासों में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विजन को साकार करती है। इसमें 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। यह जहाज घरेलू रक्षा विनिर्माण इको-सिस्टम के विकास और आयात पर निर्भरता कम करने का प्रमाण है।

साल 2025 की विशिष्ट भारतीय महिलाएँ

साल 2025 भारतीय महिलाओं के उदय, नेतृत्व, प्रतिभा और वैश्विक प्रभाव का अद्वितीय वर्ष रहा। राजनीति, प्रशासन, खेल, कला, साहित्य, विज्ञान और सामाजिक सेवा—हर क्षेत्र में महिलाओं ने ऐसी मिसालें कायम कीं, जिन्होंने राष्ट्र की दिशा और पहचान को नई ऊर्जा दी। यह वर्ष केवल उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि यह प्रमाण भी है कि भारत की महिलाएँ अब केवल सहभागिता ही नहीं, बल्कि निर्णायक नेतृत्व की भूमिका में भी अग्रसर हैं।

राजनीति और सार्वजनिक नेतृत्व

रेखा गुप्ता

दिल्ली की मुख्यमंत्री और शालीमार बाग से विधायक श्रीमती रेखा गुप्ता (51 वर्ष) वर्ष 2025 की अत्यंत चर्चित राजनीतिक हस्तियों में रहीं। भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को नई दिशा दी और दिल्ली के विकास एजेंडा में निर्णायक भूमिका निभाई। छात्र राजनीति से आरंभ हुआ उनका सफर—DUSU अध्यक्ष से लेकर नगर निगम की सफल पार्षद और फिर मुख्यमंत्री तक—उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और जनता-सेवा की निरंतर प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
AAS Foundation के माध्यम से वे शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उत्थान के क्षेत्रों में लगातार सक्रिय रही हैं।

मैथिली ठाकुर

25 वर्षीय मैथिली ठाकुर ने युवा कला-साधना और राजनीति का अद्भुत संयोजन प्रस्तुत किया। बिहार की अलीनगर सीट से वे राज्य की सबसे युवा विधायक बनीं और 8,245 वोटों से जीत दर्ज की। भाजपा के युवा-केन्द्रित अभियान में उनकी सक्रिय एवं प्रभावी भागीदारी ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। शास्त्रीय और लोक संगीत की लोकप्रिय कलाकार के रूप में उनके गीत सामाजिक मुद्दों को नई संवेदना देते रहे हैं। विधायक के रूप में, एनडीए की ‘मैय्या सम्मान’ योजना के प्रभावी क्रियान्वयन को उन्होंने अपनी प्राथमिकता बनाया है।

श्रेयसी सिंह

अर्जुन पुरस्कार विजेता अंतरराष्ट्रीय शूटर श्रेयसी सिंह ने जमुई सीट से भाजपा के टिकट पर 54,498 वोटों से जीतकर अपनी विरासत को आगे बढ़ाया। 20 नवंबर 2025 को उन्हें राज्य मंत्रिमंडल में शामिल किया गया और युवा मामलों का प्रभार सौंपा गया। रखी। वे पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व सांसद पुतुल कुमारी की पुत्री हैं। खेल एवं युवा विकास उनकी प्राथमिकताओं में रहे हैं, और वे प्रदेश में 50 ग्रामीण प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने की दिशा में कार्यरत हैं।

निर्मला सीतारमण

भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (66 वर्ष) 2025 में भी आर्थिक नेतृत्व की केंद्रीय आवाज़ रहीं। वैश्विक वित्तीय संस्थानों—G20, IMF और World Bank—पर उनकी प्रभावी उपस्थिति ने भारत को वैश्विक आर्थिक विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।

साहित्य, कला, संगीत, सामाजिक कार्य और संस्कृति

शारदा सिन्हा (1 अक्टूबर 1952 – 5 नवम्बर 2024)

भारतीय लोकसंगीत की अमर स्वर-प्रतिभा श्रीमती शारदा सिन्हा (1952–2024) का प्रभाव 2025 में भी उतना ही प्रखर रहा। मैथिली, भोजपुरी और मगही गीतों की यह कोकिला छठ पूजा के गीतों से हर घर में सम्मानित है। 2025 में उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया, जिसने उनके सांस्कृतिक योगदान की अमिट छाप को और गहरा कर दिया।

कुमुदिनी लाखिया (17 मई 1930 – 12 अप्रैल 2025)

कथक को आधुनिक विस्तार देने वाली श्रीमती कुमुदिनी लाखिया को 2025 में मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उन्होंने कथक के एकल स्वरूप को समूह-नृत्य में परिवर्तित कर अद्वितीय सौंदर्य रचा। समकालीन विषय, सरल परिधान, और अभिव्यक्ति की मौलिकता उनके नृत्य की पहचान रही। उनकी संस्था ‘कदम स्कूल ऑफ डांस’ (अहमदाबाद) कथक की नई पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित कर रही है।

साध्वी ऋतंभरा

उत्तर प्रदेश की प्रतिष्ठित आध्यात्मिक नेत्री साध्वी ऋतंभरा को 2025 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। वृंदावन स्थित वात्सल्य ग्राम और परमशक्ति पीठ के माध्यम से वे त्यागे गए बच्चों और परित्यक्त महिलाओं के पुनर्वास का अद्वितीय मॉडल प्रस्तुत करती हैं। श्रीराम मंदिर आंदोलन में उनकी प्रेरक भूमिका इतिहास के पन्नों में दर्ज है।

शोभना चंद्रकुमार

प्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना और कोरियोग्राफर श्रीमती शोभना चंद्रकुमार (जन्म 1970) को 2025 में पद्म भूषण प्राप्त हुआ। उनकी कोरियोग्राफी, नाट्य-रचनाएँ और मंच प्रस्तुति भारतीय शास्त्रीय नृत्य को समकालीन व्याख्याओं के साथ जोड़ती हैं। वे कला-साधना की अनुशासनयुक्त और उत्कृष्ट शिल्पकार हैं।

अश्विनी भिडे-देशपांडे

जयपुर-अतरौली घराने की प्रख्यात गायिका श्रीमती अश्विनी भिडे-देशपांडे को 2025 में पद्म श्री मिला। वे किशोरी आमोनकर की शिष्या और ठोस बंदिशकार हैं। उनकी रागरचना श्रृंखला संगीत-साधकों के लिए प्रेरणा है। भारत-विदेश में उनकी प्रस्तुतियाँ संगीत के उच्च धरातलों को स्पर्श करती हैं।

डॉ. नीरजा भटला

सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम एवं अनुसंधान में उल्लेखनीय योगदान देने वाली डॉ. नीरजा भटला को वर्ष 2025 में पद्म श्री मिला। AIIMS दिल्ली में उन्होंने एचपीवी परीक्षण, स्क्रीनिंग और स्वदेशी वैक्सीन निर्माण पर अग्रणी शोध किया। स्वास्थ्य नीति में उनका योगदान भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य-सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्थर है।

बानू मुश्ताक

कर्नाटक की प्रतिष्ठित लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता बानू मुश्ताक (जन्म 1948) की लघुकथाओं का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘Heart Lamp’ वर्ष 2025 के अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित हुआ।
उनकी साहित्यिक रचनाएँ सामाजिक न्याय, स्त्री-स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर केंद्रित हैं, जो आज के साहित्यिक विमर्श को समृद्ध कर रही हैं।

मानिका विश्वकर्मा

22 वर्षीय मानिका विश्वकर्मा, राजस्थान के श्रीगंगानगर से मिस यूनिवर्स इंडिया 2025 बनीं। थाईलैंड में आयोजित 74वीं मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया।

अनीत पड्डा

22 वर्षीय अभिनेत्री अनीत पड्डा ने 2025 में अपनी फिल्म Saiyaara से राष्ट्रीय लोकप्रियता अर्जित की। सलाम वेंकी और Big Girls Don’t Cry में उनकी भूमिका ने उन्हें युवा दर्शकों का प्रिय चेहरा बनाया।
उनकी यात्रा—अमृतसर से बॉलीवुड तक—नये ऊर्जावान अभिनय की मिसाल है।

खेल जगत की चमकती प्रतिभाएँ

हरमनप्रीत कौर

हरमनप्रीत कौर भुल्लर (जन्म: 8 मार्च 1989, मोगा, पंजाब) भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान हैं। वे शीर्ष क्रम की बल्लेबाज़ और दाएँ हाथ की ऑफ-स्पिन गेंदबाज़ हैं। उनकी कप्तानी में भारत ने 2025 महिला क्रिकेट विश्व कप जीता, जोकी ऐतिहासिक उपलब्धि है। हरमनप्रीत अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 8,000 से अधिक रन बना चुकी हैं।

 

स्मृति मंधाना

स्मृति मंधाना (जन्म: 18 जुलाई 1996, मुंबई) भारतीय महिला क्रिकेट टीम की प्रमुख बल्लेबाज़ हैं। उन्होंने आईसीसी महिला विश्व कप में न्यूज़ीलैंड के खिलाफ 88 गेंदों पर शानदार शतक जमाकर भारत को मजबूत स्थिति दिलाई। इस विश्व कप में वे 300 से अधिक रन बनाने वाली एकमात्र बल्लेबाज़ बनीं।

शैफाली वर्मा

शैफाली वर्मा (जन्म: 28 जनवरी 2004, हरियाणा) भारतीय महिला क्रिकेट टीम की आक्रामक बल्लेबाज़ हैं। वे टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली सबसे कम उम्र की खिलाड़ी बनीं। शैफाली ने 15 वर्ष की आयु में अंतरराष्ट्रीय अर्धशतक लगाकर सचिन तेंदुलकर का 30 वर्ष पुराना रिकॉर्ड तोड़ा। आईसीसी महिला विश्व कप फाइनल में भी उन्होंने सबसे कम उम्र में अर्धशतक जड़कर इतिहास रचा और ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ बनने वाली सबसे युवा क्रिकेटर बनीं।

दीप्ति शर्मा

दीप्ति भगवन शर्मा (जन्म: 24 अगस्त 1997) भारतीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर और प्रतिभाशाली ऑलराउंडर हैं। वे बाएँ हाथ से बल्लेबाज़ी तथा दाएँ हाथ से ऑफ-ब्रेक गेंदबाज़ी करती हैं। घरेलू क्रिकेट में वे उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करती हैं और विमेंस प्रीमियर लीग में UP Warriorz की खिलाड़ी हैं। वर्ष 2025 में उन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस में उप पुलिस अधीक्षक (DSP) नियुक्त किया गया।

2025 महिला क्रिकेट विश्व कप में वे प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट बनीं, जहाँ उन्होंने 215 रन और 22 विकेट लेकर इतिहास रच दिया, और विश्व कप के एक ही संस्करण में 200 रन और 20 विकेट का डबल बनाने वाली पहली क्रिकेटर (पुरुष या महिला) बनीं।

निकहत जरीन

विश्व बॉक्सिंग कप 2025 में 51 किग्रा वर्ग का स्वर्ण पदक जीतकर निकहत ने अपने करियर को नई ऊँचाई पर पहुँचाया। उनकी जुझारू शैली और फुर्ती उन्हें भारत की शीर्ष मुक्केबाज़ों में शामिल करती है।

जैसमीन लँबोरिया

जैसमीन लँबोरिया, भिवानी (हरियाणा) की 24 वर्षीय स्टार मुक्केबाज़, ने भारत के लिए इतिहास रचते हुए विश्व मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप 2025 का खिताब जीता। 57 किलोग्राम फीदरवेट वर्ग में खेलते हुए जैसमीन ने पेरिस ओलंपिक की सिल्वर पदक विजेता पोलैंड की जूलिया जेरेमेटा को हराकर चैंपियन बनीं।

मीनाक्षी हुड्डा

हरियाणा के रोहतक की मीनाक्षी हुड्डा ने लिवरपूल में आयोजित 2025 विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। 48 किग्रा भारवर्ग में उन्होंने कई बार की विश्व चैंपियन और पेरिस ओलंपिक की कांस्य विजेता नाजिम काइजेबे को 4-1 से हराया। ऑटोरिक्शा चालक की बेटी मीनाक्षी ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद विश्व विजेता बनने की अद्भुत यात्रा तय की।

नुपुर श्योराण

नुपुर श्योराण, हरियाणा के चरखी दादरी जिले के उमरवास गाँव की प्रतिभाशाली मुक्केबाज, ने कजाकिस्तान के अस्ताना में आयोजित वर्ल्ड बॉक्सिंग कप 2025 में स्वर्ण पदक जीतकर भारत को गौरवान्वित किया। फाइनल में उन्होंने कजाकिस्तान की मुक्केबाज को 5-0 से हराते हुए 80 किलोग्राम भार वर्ग में यह खिताब अपने नाम किया। नुपुर द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता स्वर्गीय कैप्टन हवा सिंह श्योराण की पोती हैं, जो स्वयं भारत के प्रसिद्ध हैवीवेट मुक्केबाज रहे हैं।

शीतल देवी

जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में 2007 में जन्मी शीतल देवी का जन्म फोकोमेलिया नामक दुर्लभ स्थिति के साथ हुआ, जिसके कारण उनके हाथ विकसित नहीं हो सके। इस शारीरिक चुनौती के बावजूद उन्होंने अद्भुत साहस और प्रतिभा से तीरंदाजी में अपना स्थान बनाया। मात्र 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने ग्वांग्जू, दक्षिण कोरिया में पैरा वर्ल्ड आर्चरी चैंपियनशिप में महिलाओं की कंपाउंड व्यक्तिगत श्रेणी का स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। विश्व नंबर-1 तुर्की की ओजनूर क्यूर गिर्डी को 146–143 से हराने वाली शीतल इस इवेंट की एकमात्र बिना हाथों वाली तीरंदाज थीं और यह उनका तीसरा पदक रहा।

आर. वैशाली

चेन्नई की आर वैशाली ने 2025 विश्व ब्लिट्ज शतरंज चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर भारतीय शतरंज को नई गति दी। वैशाली भारतीय ग्रैंड मास्टर रमेशबाबू प्रग्नानंदा की बड़ी बहन भी हैं, लेकिन अपनी अलग उपलब्धियों से पहचानी जाती हैं।

सिमरन शर्मा

जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, नई दिल्ली में आयोजित विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2025 में जन्म से दृष्टिबाधित भारत की बेटी सिमरन शर्मा ने देश का नाम गौरवान्वित किया। 25 वर्षीय सिमरन, जो गाजियाबाद के मोदीनगर की रहने वाली हैं, ने अपने अद्भुत साहस और दृढ़ संकल्प से सभी चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए टी-12, 100 मीटर स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। 11.95 सेकंड का समय उनकी प्रतिभा और परिश्रम का प्रतीक है।

दीपिका गांवकर

कप्तान दीपिका गांवकर (दीपिका टी.सी.) के नेतृत्व में कोलंबो में आयोजित महिला ब्लाइंड टी20 विश्व कप 2025 में भारत ने इतिहास रचते हुए नेपाल को सात विकेट से हराकर खिताब अपने नाम किया। यह जीत टीम के अटूट विश्वास, निरंतर मेहनत और कठिन परिस्थितियों पर विजय पाने की अद्भुत क्षमता का प्रतीक है।

शर्वरी शेंडे

महाराष्ट्र की 16 वर्षीय तीरंदाज शर्वरी सोमनाथ शेंडे ने 2025 में भारत के लिए नया इतिहास रच दिया। कनाडा के विनिपेग में आयोजित विश्व युवा तीरंदाजी चैम्पियनशिप 2025 में उन्होंने महिला अंडर-18 रिकर्व व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। रोमांचक फाइनल मुकाबले में शर्वरी ने दक्षिण कोरिया की किम येवोन को 6-5 से हराते हुए खिताब अपने नाम किया।

सिमरनप्रीत कौर ब्रार

21 वर्षीय पंजाब के फ़रीदकोट की निशानेबाज़ सिमरनप्रीत कौर ब्रार ने दिसंबर 2025 में दोहा, क़तर में आयोजित ISSF वर्ल्ड कप फ़ाइनल की महिला 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता। निर्णायक क्षणों में उनका अदम्य आत्मविश्वास और सटीक निशाना ही उन्हें इस प्रतिष्ठित खिताब तक ले गया।

कॉर्पोरेट नेतृत्व और प्रशासन

रोशनी नादर मल्होत्रा

एचसीएल टेक्नोलॉजीज़ की चेयरपर्सन रोशनी नादर मल्होत्रा भारत की सबसे धनी महिला बनकर 2025 की सबसे प्रभावशाली कॉर्पोरेट नेताओं में शामिल हुईं। ₹2.84 लाख करोड़ की संपत्ति के साथ वे देश के शीर्ष तीन धनी व्यक्तियों में स्थान पाने वाली पहली महिला बनीं।
यह उपलब्धि भारतीय अर्थव्यवस्था में महिला नेतृत्व की बदलती दिशा का सशक्त प्रतीक है।

अनुराधा ठाकुर

हिमाचल प्रदेश कैडर की IAS अधिकारी अनुराधा ठाकुर 2025 में आर्थिक मामलों विभाग (DEA) की पहली महिला सचिव बनीं। SEBI की अंशकालिक सदस्य के रूप में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
राजकोषीय नीति, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संवाद, सरकारी उधारी और भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग सुधार—इन सभी क्षेत्रों में उनका नेतृत्व 2025 की सबसे उल्लेखनीय प्रशासनिक उपलब्धियों में रहा।

सशक्त भविष्य की राह

साल 2025 प्रमाण है कि भारतीय महिलाएँ केवल अवसर प्राप्त नहीं कर रहीं, बल्कि अवसरों को उपलब्धियों में बदलने का सामर्थ्य भी रखती हैं। गाँव से लेकर वैश्विक मंच तक, खेल से लेकर प्रशासन तक, और कला से लेकर विज्ञान तक—हर क्षेत्र में उनका उभार भारत के भविष्य को नई दिशा दे रहा है। यह सभी महिलाओं की कहानियाँ केवल सफलता की गाथाएँ भर नहीं, बल्कि उदित होते नए भारत की वह प्रेरक पुकार हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को साहस, संकल्प और सृजन का मार्ग दिखाती हैं।

(लेखक दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पीएचडी हैं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं)

एकलव्य का अंगूठा और धनुर्वेद का “वर्ण-सिद्धांत”

“एकलव्य” को कौन नहीं जानता? हिन्दू जनमानस के अंत:स्तल में अशेष स्थान है उनका। निस्सन्देह, वे श्रेष्ठ योद्धा और गुरुभक्त थे।
किन्तु उनकी “गुरुभक्ति” और “गुरुदक्षिणा” की कहानियों को पुनः इस लेख में लिखने की आवश्यकता मुझे नहीं लगती।
अतः, मैं विमर्श के उस बिंदु पर आता हूँ, जिन्हें बड़ी चतुराई से छुपा लिया गया है।
महाभारत में “एकलव्य” नायक नहीं थे, सहनायक भी नहीं। किन्तु वे ऐसे पात्र थे, जिन्हें “वाइल्ड कार्ड” एंट्री के द्वारा मुख्य नायक “अर्जुन” के समक्ष खड़ा कर दिया जाता है।
वे ऐसे “प्रतिनायक” थे, जो बनते बनते रह गया!
एक ऐसा पात्र, जिसे आचार्य द्रोण ने “दूसरा” कर्ण बनने से सुरक्षित किया।
“कर्ण” होना एक भीषण दुर्घटना है, जो किसी के भी साथ घट सकती है। ये विषय फिर कभी, फ़िलहाल एकलव्य!
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“एकलव्य” मगध के निवासी थे। मगध की आदिवासी जाति “निषाद” के सामंत “हिरण्यधनु” के पुत्र। “हिरण्यधनु” अपने समग्र कबीले सहित मगध के राजा “जरासंध” को समर्पित थे।
वर्तमान देशकालपात्र की भाषा में कहें : “श्री “हिरण्यधनु” मगध के “निषाद” रेजिमेंट के सेना-नायक थे।”
कालांतर में, जब “एकलव्य” युवा होते, तो वे भी आर्यावर्त की परंपरा अनुसार अपने पिता के स्थान को ग्रहण करते।
उक्त सभी सूचनाएँ आचार्य द्रोण के पास थीं। अतः उन्होंने प्रथम भेंट में ही “एकलव्य” को धनुर्विद्या का दान देने से “ना” कह दिया।
और इसी बात पर उन्हें “क्रिटिसाइज” किया जाता है। क्यों भई, क्यों?
अब भला कोई मुझे ये बताये, कि “हस्तिनापुर” के प्रबल शत्रु राज्य “मगध” के भावी सेना-नायक को “हस्तिनापुर” का गुरु क्यों शिक्षा दे?
ये ठीक वैसे ही है, जैसे आज के समय “पाकिस्तान” का कोई युवा, भारत के कमांडो ट्रेनिंग सेंटर में सीखने की इच्छा करे और भारत इनकार कर दे।
ठीक यही बात गुरु द्रोण ने विचारी। महाभारत में लिखा है : “शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया”।
(अंतिम शब्द को कुछ यूँ पढ़ें : “धर्मज्ञ: तेषाम् एव अन्ववेक्षया।”)
श्लोक का अर्थ है : “आचार्य ने “कौरवों” के परिप्रेक्ष्य में विचार कर एकलव्य को “धनुर्विद्या” का शिष्य नहीं बनाया।”
यहां ध्यान दें, आचार्य ने उसे “धनुर्विद्या” का शिष्य बनाने से मना किया। “शिष्य” बनाने से नहीं। ये उनकी सहृदयता थी और आर्यवर्त के सैन्य-ग्रन्थ “धनुर्वेद” की रीति भी।
आइये, “धनुर्वेद” का वर्ण-सिद्धांत देखें!
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“धनुर्वेद” कहता है : “शस्त्र उठा कर समाज की रक्षा करना क्षत्रियों का कार्य है।”
किन्तु “धनुर्वेद” किसी भी स्थिति में, अन्य जातियों हेतु “शस्त्र” का निषेध नहीं करता। अक्सर टीवी सीरियल्स में ये निषेध प्रदर्शित किया जाता है।
बल्के, सत्य कुछ और है। “धनुर्वेद” में शिष्य चुनने की दो विधियां हैं।
(पहली विधि) : जब गुरु के सम्मुख उपास्थित सभी शिष्य “क्षत्रिय” हों। तो एक “परीक्षा” ली जाए और प्राप्तांक के अनुसार चार श्रेणी निर्मित हों : “क”, “ख”, “ग” और “घ”।
सभी विद्यार्थी सभी शस्त्र सीखेंगे, किन्तु श्रेणी के अनुसार उनका मुख्य शस्त्र निश्चित किया जाएगा।
यथा : “क” के लिए “धनुष”, “ख” के लिये “भाला”, “ग” के लिए “तलवार” और “घ” के लिए “गदा”।
(दूसरी विधि) : जब सम्मुख उपस्थित शिष्यों में सभी वर्णों के बालक हों। तब भी उन्हें समस्त शस्त्रों की शिक्षा दी जाए। किन्तु उनका मुख्य शस्त्र उनका वर्ण निश्चित करेगा।
यथा : ब्राह्मण हेतु धनुष, वैश्य हेतु भाला, क्षत्रिय हेतु तलवार और शूद्र हेतु गदा। (यही कारण है कि “क्षत्रिय” सदैव “तलवार” से ही चिन्हित किये जाते हैं।)
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अब पुनः कथा पर लौटें, आचार्य ने “एकलव्य” को धनुर्विद्या का शिष्य बनाने से “ना” कह दिया।
किन्तु “धनुर्वेद” के इन्हीं सूत्रों में अनुसार, आचार्य द्रोण ने “एकलव्य” को “गदा” शिक्षा का शिष्य बनने का अवसर दिया, किन्तु उसने अस्वीकार कर दिया।
मगध के भावी सेना-नायक को अपना शिष्य बनाने की गुरुता कोई श्रेष्ठ गुरु ही दिखा सकता है।
किन्तु, दुर्भाग्य थे “एकलव्य” के!
“कर्ण” भी आचार्य के गुरुकुल में “गदा” के विद्यार्थी थे, जो कालांतर में परशुराम जी से “धनुष” का ज्ञान लेने हेतु स्वयं को ब्राह्मण कहने का दुस्साहस कर बैठे!
[ कर्ण के द्रोण-शिष्यत्व को देखने हेतु महाभारत के आदिपर्व का सम्भपर्व देखें, एक सौ इकतीसवां अध्याय। ]
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कालांतर में, एक श्वान के बाणों से भरे मुख से आचार्य रहस्य को जान गए। कि उस बालक ने शिक्षा के साथ चौर्यकर्म किया है, गुरुकुल की भित्तियों के पार्श्व में छिपकर विद्या प्राप्त की है!
किन्तु फिर भी उन्होंने “एकलव्य” को जीवनदान देकर छोड़ दिया। केवल उसका दाहिने हाथ का अंगूठा लिया!
“धनुर्वेद” कहता है : “बाण को तर्जनी और मध्यमा के मध्य, दोनों उँगलियों की मध्य अस्थि से दबाएं और अंगूठे से केवल तर्जनी पर दबाब डालें। यही बाण संधान की श्रेष्ठ विधि है।”
अर्थात् “अंगूठे” का कुछ अधिक महत्त्व है नहीं धनुर्विद्या में! इसी कारण जब “अंगूठा” देकर “एकलव्य” जाने लगे, तो आचार्य में इशारे से उन्हें समझा दिया कि अब दोनों उँगलियों से बाण संधान करना, वत्स!
कितना सहृदय था वो आचार्य। (देखें : महाभारत के आदिपर्व का सम्भपर्व, एक सौ इकतीसवां अध्याय।)
तो आचार्य ने “अंगूठा” ही क्यों माँगा?
इसके पार्श्व में वैदिककाल की “एक्यूप्रेशर” चिकित्सा है। “अंगूठे” को “मस्तक” का प्रतीक माना जाता है।
वैसी स्थिति, जब आप पराजित बंदी शत्रु का वध न करना चाहते हों, किन्तु दंड भी देना चाहते हों तो प्रतीकात्मक रूप से उसका “मस्तक” (अंगूठा) काट लेना भी दंड ही है!
प्राच्य काल में ऐसे अंगूठा-रहित मनुष्यों को सदा सर्वदा के लिए पराजित होने का भार लेकर ही जीना होता था, समाज में तिरस्कृत होकर!
शत्रु का “अंगूठा” काट कर छोड़ देने की परंपरा प्राच्य यहूदियों में भी बहुधा पायी जाती है।
इसी बिना पर श्री दिलीप सी० मंडल, ब्राह्मणों को “यहूदी” कहते हैं। किन्तु वे स्वयं इस फैक्ट को नहीं जानते, अन्यथा उल्लेख अवश्य करते।
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अब आप स्वयं सोचें।
शत्रु-राज्य के सैनिक को वर्षों तक किये गए “गौप्तचर्य” हेतु क्या दंड मिलना चाहिए?
आप पकिस्तान के एक सैनिक को “उरी ट्रेनिंग सेंटर” में छिपकर गूढ़ विषय जानने के एवज में क्या सजा देंगे?
यदि अब भी आपकी संवेदनाएं “सैनिक” के साथ हैं, तो आप देशद्रोही हैं!

सशक्त उपभोक्ता ही सशक्त राष्ट्र की नींव

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस – 24 दिसम्बर, 2025

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस केवल एक उपभोक्ताओ से जुड़ी तिथि मात्र नहीं है, बल्कि यह उस मौलिक सत्य की स्मृति है कि किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, सामाजिक संतुलन और नैतिक स्वास्थ्य का केंद्र बिंदु उपभोक्ता ही होता है। उपभोक्ता वह व्यक्ति है जो अपने परिश्रम की कमाई को भरोसे, आवश्यकता और आशा के साथ बाज़ार में खर्च करता है। किंतु आज यही उपभोक्ता सबसे अधिक ठगा जा रहा है, भ्रमित किया जा रहा है और असुरक्षित महसूस कर रहा है। ठगी, बेईमानी, मिलावट और गुणवत्ता-विहीन उत्पादों ने उपभोक्ता अधिकारों की नींव को हिला दिया है। यह स्थिति केवल आर्थिक शोषण तक सीमित नहीं रही, बल्कि उपभोक्ताओं के मानसिक, शारीरिक और स्वास्थ्य संबंधी जीवन पर गहरे और स्थायी आघात पहुँचा रही है। इसलिये उपभोक्ता दिवस मनाते हुए बाजार को आदर्श एवं स्वस्थ कलेवर देने के साथ उपभोक्ता हितों का संरक्षण जरूरी है।
आज का बाज़ार पहले की तुलना में अधिक जटिल, तेज़ और आक्रामक हो चुका है। उपभोक्ता के सामने विकल्पों की भरमार है, किंतु जानकारी और पारदर्शिता का अभाव है। चमकदार विज्ञापन, आकर्षक पैकेजिंग और भ्रामक दावे उपभोक्ता को निर्णय के उस बिंदु तक ले जाते हैं, जहाँ वह अक्सर वास्तविक गुणवत्ता और सुरक्षा को पहचान ही नहीं पाता। परिणामस्वरूप वह ऐसी वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग करने को विवश होता है जो उसके स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आर्थिक स्थिरता को नुकसान पहुँचाती हैं। मिलावटी खाद्य पदार्थ, नकली दवाइयाँ, घटिया निर्माण सामग्री और डिजिटल ठगी के नए-नए रूप यह प्रमाणित करते हैं कि उपभोक्ता अधिकारों का हनन अब अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य प्रवृत्ति बनता जा रहा है।
यह विडंबना ही है कि जिस दौर में भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, उसी दौर में भारतीय उपभोक्ता गुणवत्ता और सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। आर्थिक प्रगति का वास्तविक अर्थ केवल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि नहीं होता, बल्कि यह भी होता है कि उस विकास का लाभ आम नागरिक तक कितनी ईमानदारी और सुरक्षा के साथ पहुँच रहा है। यदि उपभोक्ता को सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उत्पाद उपलब्ध नहीं हो पा रहे, तो यह विकास अधूरा और खोखला है। उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन केवल जेब पर चोट नहीं करता, वह राष्ट्र के आत्मविश्वास और नैतिक शक्ति को भी कमजोर करता है।
उपभोक्ता जब बार-बार ठगा जाता है, तो उसके मन में बाज़ार और व्यवस्था दोनों के प्रति अविश्वास जन्म लेता है। यह अविश्वास धीरे-धीरे मानसिक तनाव, चिंता और असुरक्षा की भावना में बदल जाता है। मिलावटी भोजन और नकली दवाइयों से उत्पन्न बीमारियाँ केवल शारीरिक कष्ट नहीं देतीं, बल्कि परिवार और समाज पर दीर्घकालिक आर्थिक बोझ भी डालती हैं। इस प्रकार उपभोक्ता अधिकारों का हनन एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, वह सामाजिक और राष्ट्रीय समस्या का रूप ले लेता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उपभोक्ता शोषण राष्ट्र की सामूहिक चेतना पर आघात है।
सरकार द्वारा बनाए गए उपभोक्ता संरक्षण कानून, मानक निर्धारण संस्थाएँ और शिकायत निवारण तंत्र अपने आप में महत्वपूर्ण हैं, किंतु उनकी प्रभावशीलता तब ही सिद्ध होगी जब वे काग़ज़ों से निकलकर ज़मीन पर दिखाई दें। आज आवश्यकता है अधिक सशक्त शासन की, अधिक सक्रिय निगरानी की और अधिक संवेदनशील प्रशासनिक दृष्टि की। उपभोक्ता संरक्षण केवल एक विभाग या मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं हो सकती, यह समग्र शासन व्यवस्था की प्राथमिकता होनी चाहिए। जब तक मिलावट, धोखाधड़ी और भ्रामक व्यापारिक प्रथाओं पर त्वरित और कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक उपभोक्ता अधिकारों की बात केवल औपचारिक भाषणों तक सीमित रह जाएगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यदि हम उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की ओर देखें, तो स्पष्ट होता है कि वहाँ उपभोक्ता अधिकारों को केवल कानून के रूप में नहीं, बल्कि संस्कृति के रूप में स्वीकार किया गया है। उत्पाद की गुणवत्ता, सुरक्षा मानक, पारदर्शी जानकारी और त्वरित न्याय वहाँ बाज़ार की अनिवार्य शर्तें हैं। भारत को भी इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा। वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए केवल सस्ता उत्पादन पर्याप्त नहीं है, बल्कि उच्च गुणवत्ता और उपभोक्ता संतुष्टि अनिवार्य है। भारतीय उपभोक्ता को यह महसूस होना चाहिए कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता से कम सुरक्षित या कम सम्मानित नहीं है।
इस वर्ष राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस की थीम सुरक्षा, गुणवत्ता और विश्वास की बात करती है, जो अपने आप में अत्यंत विचारोत्तेजक है। सुरक्षा केवल उत्पाद की नहीं, बल्कि उपभोक्ता के जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा है। गुणवत्ता केवल वस्तु की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की गुणवत्ता है जो उपभोक्ता को न्याय और सम्मान देती है। विश्वास केवल बाज़ार पर नहीं, बल्कि शासन और कानून पर विश्वास है। यदि ये तीनों तत्व सशक्त नहीं होंगे, तो उपभोक्ता दिवस का संदेश अधूरा रह जाएगा। उपभोक्ताओं के हितों की वकालत करता हुआ यह दिवस उपभोक्ताओं के अधिकारों, दायित्वों और संरक्षण की चेतना को सुदृढ़ करने का महत्वपूर्ण अवसर है। यह दिन याद दिलाता है कि उपभोक्ता केवल खरीददार नहीं, बल्कि बाजार व्यवस्था की आत्मा हैं, बाजार की शक्ति एवं गति है।। बदलते आर्थिक परिवेश में उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता, पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करना और भी आवश्यक हो गया है। उपभोक्ता संरक्षण कानूनों ने एक मजबूत आधार दिया है, किंतु उनके प्रभावी क्रियान्वयन, त्वरित न्याय और जन-जागरूकता के बिना उपभोक्ता सशक्तिकरण अधूरा रह जाता है। इसलिए राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस को औपचारिकता नहीं, बल्कि सतत जनआंदोलन के रूप में देखा जाना चाहिए।
डिजिटल मार्केटिंग की चुनौतियां आज उपभोक्ता हितों के लिए सबसे बड़ी कसौटी बनकर उभरी हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भ्रामक विज्ञापन, फर्जी रिव्यू, डेटा गोपनीयता का उल्लंघन, छिपी शर्तें और एल्गोरिद्म-आधारित मूल्य भेदभाव उपभोक्ता को असहाय बना रहे हैं। डिजिटल लेनदेन की सुविधा के साथ-साथ साइबर धोखाधड़ी और गलत सूचना का खतरा भी बढ़ा है। ऐसे में उपभोक्ताओं को डिजिटल साक्षर बनाना, प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करना और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र विकसित करना समय की मांग है, ताकि तकनीक उपभोक्ता के लिए सहायक बने, शोषण का साधन नहीं।
‘जागो ग्राहक जागो’ अभियान को आज क्रांतिकारी रूप देने की आवश्यकता है। यह अभियान केवल नारों और विज्ञापनों तक सीमित न रहकर व्यवहारिक प्रशिक्षण, स्कूल-कॉलेज पाठ्यक्रमों, स्थानीय भाषाओं और डिजिटल माध्यमों से जुड़ना चाहिए। साथ ही उपभोक्ता हितों को लेकर बने कानूनों को अधिक लचीला, सरल और व्यापक पहुंच वाला बनाना जरूरी है, ताकि आम उपभोक्ता बिना भय और जटिलता के न्याय पा सके। त्वरित अदालतें, ऑनलाइन सुनवाई और सामूहिक शिकायतों की प्रभावी व्यवस्था उपभोक्ता विश्वास को मजबूत करेगी। जब कानून संवेदनशील होंगे और जागरूकता व्यापक, तभी उपभोक्ता सशक्तिकरण वास्तविक अर्थों में संभव होगा। आज आवश्यकता है कि उपभोक्ता अधिकारों को राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बनाया जाए। उपभोक्ता को जागरूक करना, उसे उसके अधिकारों और दायित्वों की जानकारी देना और उसे यह विश्वास दिलाना कि व्यवस्था उसके साथ खड़ी है, यह शासन की नैतिक जिम्मेदारी है। साथ ही व्यापार जगत को यह समझना होगा कि अल्पकालिक लाभ के लिए उपभोक्ता के साथ किया गया अन्याय दीर्घकाल में स्वयं उनके अस्तित्व को भी संकट में डाल सकता है। एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था वही होती है जिसमें उपभोक्ता और उत्पादक के बीच भरोसे का संबंध हो।
अंततः यह स्पष्ट है कि उपभोक्ता अधिकारों का संरक्षण केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है। उपभोक्ता का सम्मान राष्ट्र का सम्मान है और उपभोक्ता की सुरक्षा राष्ट्र की सुरक्षा है। जब भारत विकास की नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहा है, तब यह अनिवार्य है कि यह विकास उपभोक्ता के स्वास्थ्य, मानसिक शांति और विश्वास की कीमत पर न हो। राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस हमें यही संदेश देता है कि सशक्त उपभोक्ता ही सशक्त राष्ट्र की नींव रख सकता है और इस नींव को मजबूत करने के लिए शासन, समाज और बाज़ार सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभानी होगी। इसी से नया भारत, सशक्त भारत एवं समृद्ध भारत बन सकेगा।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

दंडी_संन्यासी : भारतीय संस्कृति का चलता-फिरता उपनिषद

भारतीय सनातन संस्कृति में संन्यास केवल त्याग नहीं, बल्कि सर्वोच्च चेतना की साधना है। इसी संन्यास परंपरा का एक अत्यंत तेजस्वी, अनुशासित और शास्त्रनिष्ठ स्वरूप है — दंडी संन्यासी।
दंडी का अर्थ
‘दंडी’ शब्द का शास्त्रीय अर्थ
संस्कृत में दण्ड का अर्थ केवल लकड़ी नहीं, बल्कि—
दण्डः = नियम, संयम, अनुशासन, आत्मनियंत्रण
अतः दंडी का तात्पर्य है—
जिसका जीवन पूर्णतः अनुशासन और आत्मसंयम से संचालित हो।
संस्कृत में दण्ड केवल लकड़ी नहीं, बल्कि
संयम, नियम और आत्मानुशासन का प्रतीक है।
जो संन्यासी अपने काय, वाक् और मन को पूर्णतः अनुशासित कर लेता है, वही दंडी कहलाता है, भारतीय संस्कृति में संन्यास केवल जीवन का त्याग नहीं, बल्कि धर्म, ज्ञान और लोककल्याण का सर्वोच्च आदर्श है। इसी संन्यास परंपरा में दंडी संन्यासी एक विशिष्ट, अनुशासित और अत्यंत गंभीर संन्यास परंपरा के वाहक हैं। दंडी संन्यासी वह हैं जो एक, दो, तीन या चार दंड (दण्ड) धारण कर जीवन को वेदांतमय साधना में समर्पित कर देते हैं।
दंडी संन्यासियों की परंपरा विशेषतः शंकराचार्य परंपरा, वैष्णव दंडी संन्यास और स्मार्त परंपरा से जुड़ी हुई है।
शास्त्रीय प्रमाण
वेदों और उपनिषदों में संन्यास की अवधारणा
ऋग्वेद से ही संन्यास के बीज मिलते हैं—
“केशिनो दीर्घकेशा…”
(ऋग्वेद 10.136)
उपनिषदों में दंडी संन्यास की स्पष्ट भूमिका है—
जाबाल उपनिषद्
“यदा वैराग्यं जायते तदा दण्डं गृह्णीयात्”
(जब वैराग्य उत्पन्न हो, तब दंड धारण करे।)
नारद परिव्राजकोपनिषद्
यह ग्रंथ दंडी संन्यासियों के—
आचार
व्रत
भिक्षा
मौन
ब्रह्मज्ञान
—का विस्तृत विधान करता है।
जाबाल उपनिषद् कहता है —
“यदा वैराग्यं जायते तदा दण्डं गृह्णीयात्”
(जब वैराग्य उत्पन्न हो, तभी दण्ड धारण करे)
नारद परिव्राजकोपनिषद् में दंडी संन्यासी के
आचार
भिक्षा
मौन
ब्रह्मज्ञान
—का स्पष्ट विधान है।
#भागवत_पुराण (11वाँ स्कंध) में ऐसे संन्यासी को परमहंस की अवस्था कहा गया है।
#आदि_शंकराचार्य और दंडी परंपरा
आदि शंकराचार्य ने दशनामी संन्यास परंपरा की स्थापना कर दंडी संन्यास को व्यवस्थित स्वरूप दिया।
आदि शंकराचार्य ने दशनामी संन्यास परंपरा की स्थापना की—
तीर्थ
आश्रम
गिरी
पुरी
भारती
सरस्वती आदि
चारों पीठों के संन्यासी आज भी—
के अद्वैत दर्शन का प्रचार करते हैं।
“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या”
यह दंडी संन्यासी का केवल वाक्य नहीं, जीवन है।
दंडी संन्यास कैसे आरंभ होता है?
यह कोई भावावेश नहीं, बल्कि कठोर साधना का परिणाम है—
1️⃣ ब्रह्मचर्य और वैराग्य
2️⃣ गुरु के सान्निध्य में वेदांत अध्ययन
3️⃣ वीरजा होम द्वारा संन्यास दीक्षा
4️⃣ एक, तीन या चार दण्ड का ग्रहण
(काय-वाक्-मन-आत्मसंयम के प्रतीक)
दंडी संन्यास कैसे प्रारंभ होता है?
दंडी संन्यास कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं होता। इसके चरण—
1. ब्रहमचर्य और वैराग्य
दीर्घकालीन संयम और अध्ययन।
2. गुरु-दीक्षा
योग्य गुरु से—
वेद
उपनिषद
ब्रह्मसूत्र
गीता
का अध्ययन।
3. वीरजा होम
संन्यास दीक्षा का अग्निकर्म।
4. दण्ड ग्रहण
एक, तीन या चार दंड—
काय
वाक्
मन
आत्मा
के प्रतीक।
ब्रह्ममुहूर्त जागरण
जप-तप-स्वाध्याय
अल्प भिक्षा
पदयात्रा
मौन और ध्यान
“भिक्षामात्रेण तुष्येत्” — मनुस्मृति
उनका जीवन स्वयं एक शिक्षा होता है।
समाज में भूमिका
✔️ धर्म और संस्कृति के रक्षक
✔️ शास्त्रों के शिक्षक
✔️ समाज को नीति देने वाले मार्गदर्शक
✔️ कुप्रथाओं के विरुद्ध शांत क्रांति
राजा हो या सामान्य जन —
दंडी संन्यासी सबको धर्म की कसौटी दिखाते हैं।
भारतीय संस्कृति में योगदान
मठ परंपरा
गुरुकुल व्यवस्था
संस्कृत संरक्षण
अद्वैत दर्शन
लोकजागरण
दंडी संन्यासी न बोलकर भी बहुत कुछ कह जाते हैं।
उपसंहार
दंडी संन्यासी भारत की आत्मा के मौन प्रहरी हैं।
वे बताते हैं कि—
त्याग से ही समाज में मर्यादा जीवित रहती है।
जब तक भारत में दंडी संन्यासी हैं,
तब तक भारत केवल देश नहीं —
धर्म और चेतना की जीवित परंपरा है।
आधुनिक युग में दंडी संन्यासी
आज भी—चार शंकराचार्य पीठ
वैष्णव दंडी संन्यास
—भारतीय आध्यात्मिक चेतना को जीवित रखे हुए हैं।
वे न मीडिया के लिए जीते हैं,
न सत्ता के लिए—
वे सत्य के लिए जीते हैं।

भारतीय संस्कृति से ही विश्व में शांति संभव

कहा जाता है कि सतयुग में समाज पूर्णत: एकरस था और उस समय के समाज में भारतीय संस्कृति की झलक स्पष्टत: दिखाई देती थी। एक कहानी के माध्यम से इस बात को बहुत आसानी से समझा जा सकता है। सतयुग के खंडकाल में एक किसान ने अपनी जमीन बेची। जिस व्यक्ति ने वह जमीन खरीदी थी, उसे, उस जमीन की खुदाई के दौरान सोने के सिक्कों से भरा हुआ एक घड़ा मिला। उस घड़े को लेकर वह किसान जमीन के विक्रेता के पास पहुंचा और बोला कि आपकी जमीन में से यह सोने के सिक्कों से भरा हुआ घड़ा मिला है, चूंकि मैंने आपसे केवल जमीन खरीदी है अतः इन सोने के सिक्कों पर मेरा अधिकार नहीं है और आप यह घड़ा अपने पास रख लें, सोने के इन सिक्कों पर आपका अधिकार है। जमीन के विक्रेता ने सोने के सिक्कों से भरे उस घड़े को लेने से यह कहकर साफ इनकार कर दिया कि मैंने तो वह जमीन आपको बेच दी है, अतः बाद में उस जमीन से जो भी वस्तु आप प्राप्त करते हैं उस पर आपका ही अधिकार हैं। उस वस्तु पर मेरा अधिकार कैसे हो सकता है? जब उस जमीन के क्रेता एवं विक्रेता के बीच कोई समझौता नहीं हो सका तो वे सोने के सिक्कों से भरे उस घड़े को लेकर अपने राज्य के राजा के पास पहुंचे और दोनों ने राजा को पूरी बात बताई तथा राजा से आग्रह किया कि सोने के सिक्कों को राजा साहब राज्य के खजाने में जमा करा दें। राजा ने भी सोने के सिक्कों से भरे उस घड़े को राज्य के खजाने में जमा करने से यह कहकर इंकार कर दिया कि राज्य के नियमों में इस प्रकार का कोई प्रावधान नहीं है कि बगैर किसी उचित कारण के प्राप्त धन को राज्य के खजाने में जमा कर दिया जाय। इस सम्बंध में जो नियम निर्धारित हैं उन नियमों के आधार पर यह सोने के सिक्के राज्य के खजाने में जमा नहीं किये जा सकते हैं। ऐसा था, सतयुग का खंडकाल। जो वस्तु हमारी नहीं है उस वस्तु को हम कैसे अपने पास रख सकते हैं? प्रत्येक नागरिक इस भावना के साथ समाज में एकरस भाव से रहता था।

सतयुग के बाद आया त्रेतायुग, इस युग में समाज में समरसता के भाव में कुछ कमी दिखाई दी थी। जैसे एक समाज (दानव) के राजा रावण ने दूसरे समाज (देव) की माता सीता का अपहरण किया और अपने राज्य में कैद कर लिया। प्रभु श्रीराम ने आदिवासियों और वानरों के समूह को एक कर, इन सभी में समरसता का भाव जागृत करते हुए, रावण के राज्य पर आक्रमण किया एवं माता सीता को उस राज्य के चंगुल से छुड़ाकर सकुशल अयोध्या लाने में सफल हुए। प्रभु श्रीराम ने त्रेतायुग में यह संदेश दिया कि सर्व समाज यदि संगठित रहता है तो किसी भी बुराई से पार पाया जा सकता है। अतः त्रेतायुग में संगठन की महत्ता सिद्ध हुई थी।

त्रेतायुग के बाद द्वापर युग आया, इस खंडकाल में तो समाज क्या, बल्कि दो परिवारों के बीच की एकता भी समाप्त हो चुकी थी। कौरव परिवार ने अपने ही पांडव भाईयों को केवल 5 गांव देने से साफ इंकार कर दिया। जिसके कारण आगे चलकर कौरव एवं पांडवों की बीच महाभारत युद्ध हुआ। आज के खंडकाल कलयुग की तो बात ही निराली है। आज पश्चिमी जगत में प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने सुख के लिए ही कार्य करता हुआ दिखाई देता है। परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति जैसे उसकी कोई जिम्मेदारी ही नहीं है। आज कलयुग में नागरिक अपने आप में केंद्रित हो गए हैं एवं उन्हें परिवार, समाज, राष्ट्र आदि के प्रति किसी जिम्मेदारी का भाव जागृत ही नहीं होता।

भारतीय संस्कृति में सामाजिक समरसता को अति महत्व दिया गया है। अतः स्वयं के साथ, परिवार, समाज, नगर, राष्ट्र एवं पूरे विश्व को समता के भाव के साथ देखा जाता है। पूरी सृष्टि ही हमारा परिवार है, इस भावना को “वसुधैव कुटुंबकम”; “सर्वे भवंतु सुखिन:”; “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” के माध्यम से झलकाया जाता है। पूरे विश्व में आज अशांति का माहौल है, कई देश आपस में लड़ रहे हैं तथा कई देशों के अंदर विभिन्न मत पंथों को मानने वाले नागरिक आपस में मार काट मचाए हुए हैं। ऐसे गम्भीर समय में केवल और केवल भारतीय संस्कृति ही इस पूरे विश्व में शांति का माहौल पुनः स्थापित कर सकती है।

विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी में सेवा कार्य में संलग्न आदरणीय दीदी निवेदिता रघुनाथ भिड़े ने “भारतीय संस्कृति – चुनौतियां एवं सम्भावनाएं” नामक पुस्तक में भारतीय संस्कृति के बारे में जीवन दर्शन की व्याख्या करते हुए बताया है कि “जिस ज्ञान के द्वारा साधक विभक्त प्राणियों में विभाग रहित एक अविनाशी भाव को देखता है, उस ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहा गया है। भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन या जीवन दृष्टि सात्विक ज्ञान से निर्धारित हुई है। ईश्वर, मानव, सृष्टि अलग अलग नहीं है। अतः भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन एकात्म है।”  इसके विपरीत, जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियों में अलग अलग अनेक भावों को अलग अलग रूप से जानता है, इस ज्ञान को राजस ज्ञान कहा गया है। क्रिशिचियन एवं इस्लाम पंथ इसी ज्ञान से प्रेरित है। साथ ही, जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य एक कार्य (शरीर) में ही आसक्त हो जाता है, मानों वह (कार्य ही) सब कुछ हो तथा जो (ज्ञान) हेतुरहित (आयुक्तिक), तत्तवार्थ से रहित तथा संकुचित (अल्प) है, वह (ज्ञान) तामस है। पूंजीवाद, कम्युनिजम, नक्सलवाद, साम्यवाद, मार्कस्वाद और माओवाद का जीवन दर्शन तामसिक ज्ञान से प्रेरित है।

उक्तवर्णित पुस्तक में यह भी बताया गया गई कि उक्त जीवन दर्शन के आधार पर ही राष्ट्र में जीवन मूल्य एवं जीवन तत्व निर्मित होते हैं, जिनका अनुपालन उस राष्ट्र के नागरिक करते हैं। भारतीय संस्कृति के कुल 12 जीवन मूल्य बताए गए हैं –

(1) सभी के प्रति आदर एवं सम्मान का भाव रखना;

(2) प्रत्येक जीव को ईश्वर का रूप माना जाना;

(3) इष्टदेव अर्थात ईश्वर अपने अंत:करण में खोज का विषय है, अतः ईश्वर को बाहर खोजने के स्थान पर अपने अंदर खोजा जाना;

(4) विविधता में एकता मानी गई है, जिसके चलते ही सर्व समाज एकरस रहने का प्रयास करता है;

(5) चतुर्विध पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, अर्थात काम एवं अर्थ सम्बंधी गतिविधियों को धर्म के आधार पर सम्पन्न किया जाता है एवं अंत में मोक्ष प्राप्ति की अपेक्षा की जाती है:

(6) महिलाओं का सम्मान – भारतीय संस्कृति में मातृशक्ति को देवी का दर्जा दिया जाता है;

(7) उदार एवं समावेशक – शक, हूण, कुषाण, पारसी, यहूदी आदि अन्य देशों से भारत में आए एवं भारत के ही होकर रह गए, भारतीय संस्कृति के संस्कारों को उन्होंने अपने आप में आत्मसात कर लिया। यह केवल भारत में ही सम्भव है;

(8) कर्म सिद्धांत – इस मानव जन्म में किए गए कर्मों के आधार पर ही मोक्ष की प्राप्ति अथवा 84 लाख योनियों के चक्र में फिर से फंसने की सम्भावना के बारे में निर्णय होता है;

(9) अवतार की संकल्पना – इस धरा पर जब जब पापों का घड़ा भर जाता है तब तब ईश्वर इस धरा पर अवतार लेकर अवतरित होते हैं;

(10) आध्यात्म विश्वास में नहीं, अनुभूति में और होने में है;

(11) यज्ञ का महत्व – समाज की सेवा के माध्यम से भी यज्ञ सम्पन्न किया जा सकता है, अन्य कई प्रकार के यज्ञों का वर्णन भी भारतीय संस्कृति में मिलता है;

(12) आत्म संयम – अपना जीवन संयम के साथ जीने की कला भारतीय संस्कृति के जीवन मूल्यों में शामिल है, इसके अंतर्गत किसी अन्य प्राणी का अहित करने के बारे में तो कभी सोचा भी नहीं जाता है।

भारतीय संस्कृति में जीवन दर्शन के आधार पर जीवन मूल्य एवं जीवन तत्व निर्धारित होते हैं और इसके बाद समाज की जीवन व्यवस्था भी निर्धारित हो जाती है। भारत में समस्त सांस्कृतिक विधियां, प्रथाएं, पद्धतियां एवं परम्पराएं जीवन व्यवस्था के भाग मानी जाती हैं। कुलधर्म, जातिधर्म, समाजधर्म, पंच महायज्ञ, चार आश्रम, चार वर्ण, जाति व्यवस्था, भारतीय शिक्षा पद्धति भी भारतीय संस्कृति में जीवन व्यवस्था का भाग ही माने जाते हैं। मुगल काल एवं ब्रिटिश शासन काल में भारतीय संस्कृति को नष्ट करने का बहुत प्रयास किया गया था। इस खंडकाल में भारतीय नागरिक अपनी महान परम्पराएं भूल गए थे। इसी खंडकाल में वैश्विक स्तर पर ग्रीक, रोमन, फारसी, मिस्त्र जैसी कई संस्कृतियां विलुप्त हो गईं परंतु भारतीय संस्कृति अभी भी कायम है और मुगल काल एवं ब्रिटिश शासन काल में भारतीय संस्कृति को समाप्त नहीं किया जा सका है। इन्हीं कारणों के चलते अब यह कहा जा रहा है कि समस्त विश्व में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति का उत्थान अति आवश्यक है।

भौगोलिक दूरी बदल सकती है, पर सांस्कृतिक दूरी कभी नहीं: स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में फ़िजी, न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से आए प्रवासी भारतीय परिवारों को अपनी जड़ों, मूल और मूल्यों के संरक्षण का संदेश देते हुए स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भौगोलिक दूरी बदल सकती है, पर सांस्कृतिक दूरी कभी नहीं होनी चाहिए। जहाँ भी रहें—संस्कार, परिवारभाव, सेवा, करुणा, कर्तव्य और आध्यात्मिकता जीवन का केंद्र बने, यही बच्चों को आत्मविश्वास, पहचान और गौरव देता है।
स्वामी जी ने सभी से आह्वान किया—जड़ों को पकड़ो, मूल्यों को जियो और भारत को हृदय में धारण करो। उन्होंने प्रवासी परिवारों को नीलकंठ महादेव मंदिर, उत्तराखंड के दिव्य तीर्थ, गुजरात के प्रमुख मंदिरों और भारत के पवित्र सांस्कृतिक स्थलों की यात्रा के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने कहा—विश्वभर में बसे भारतीय आज आर्थिक प्रगति, विज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा और प्रौद्योगिकी में अद्भुत योगदान दे रहे हैं, पर उनकी सबसे बड़ी शक्ति केवल कौशल नहीं—भारतीयता का संस्कार है, और उस संस्कार की पहली सीढ़ी है—मातृभाषा।
भाषा केवल संवाद नहीं—पहचान, स्मृति, परिवार, संस्कृति, भाव-संसार, परंपरा, आस्था और मूल्यों का आधार है। यदि नई पीढ़ी भाषा से दूर होती है, तो वह अपनी जड़ों और सांस्कृतिक चेतना से भी कटने लगती है। इसलिए आज प्रवासी भारतीय समाज की सबसे बड़ी चुनौती है—भारतीय भाषाओं का संरक्षण, संवर्धन और पुनर्जीवन।
मातृभाषा हमें बताती है—हम कौन हैं, किस भूमि से जुड़े हैं, और हमारे संस्कारों की जड़ कहाँ है। परिवार, श्रद्धा, कर्तव्य, मर्यादा, करुणा, त्याग, धैर्य और आध्यात्मिक अनुशासन—ये मूल्य मातृभाषा के माध्यम से ही हृदय में उतरते हैं। जिस भाषा में बच्चा सोचता है, उसी भाषा में रचनात्मकता, आत्मविश्वास और भावनात्मक स्थिरता विकसित होती है।
भारतीय ज्ञान–परंपरा का रस अनुवाद में नहीं—मूल भाषा में मिलता है। रामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता, वेदांत, उपनिषद, संत परंपरा, लोकरण, भक्तिधारा और लोकगीत—इनका तत्त्व तभी समझ आता है जब भाषा हृदय और संस्कार की हो।
स्वामी जी ने चिंता प्रकट की कि आज कई मातृभाषाएँ घर की चारदीवारी तक सीमित हो रही हैं, जबकि हमारी सांस्कृतिक शक्ति की जड़ें भाषा में ही हैं। यही कारण है कि हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, टोरंटो जैसी शीर्ष वैश्विक संस्थाएँ संस्कृत और भारतीय भाषाओं पर शोध कर रही हैं—क्योंकि भाषा मात्र संपर्क नहीं, बल्कि ज्ञान–विज्ञान, सभ्यता–विकास और दार्शनिक विचार का आधार है।
भारत विश्वगुरु बनने की राह पर है, पर विश्वगुरु वही बनेगा—जिसकी भाषा आत्मगौरव, नेतृत्व, विचार–सृजन और सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता की ध्वजा उठाए। इसलिए भाषा संरक्षण कोई विकल्प नहीं—अस्तित्व, अस्मिता और आत्मगौरव का आधार है।
स्वामी जी ने कहा—मातृभाषा को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना परिवारिक व्यवहार से अधिक, सांस्कृतिक उत्तराधिकार का पवित्र हस्तांतरण है—यही राष्ट्र चेतना और सभ्यता की सतत धारा है।
मातृभाषा की रक्षा — जड़ों से जुड़े रहना, पहचान को संरक्षित रखना और आने वाली पीढ़ी को आत्मबल व गौरव देना है।
यही भारतीय संस्कृति और मूल्यों की रक्षा का हमारा अटल, अखंड और पवित्र संकल्प है।