किस्से अब्दुल रहीम खानजादा के …
जिसने देश की खातिर अपना पूरा जीवन पाकिस्तान की जेल मेें गुजार दिया
इसरो के प्रमुख अंतरिक्ष मिशन
पिछले 5 वर्षों (दिसंबर 2020 से दिसंबर 2025) के दौरान इसरो द्वारा कुल 22 उपग्रह प्रक्षेपित किए गए हैं। इनमें से 7 पृथ्वी अवलोकन, 4 संचार, 2 नेविगेशन, 3
चंद्रयान-3 और आदित्य-एल1 उपग्रह परियोजनाओं में किसी प्रकार की लागत वृद्धि नहीं हुई है। हालांकि, चंद्रयान-3 और आदित्य-एल1 उपग्रहों के लिए क्रमशः 28 माह और 46 माह की समय-वृद्धि हुई है, जिसका मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
आदित्य-एल1: परियोजना में समय-वृद्धि का कारण कार्यक्षेत्र में परिवर्तन, कक्षा को निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) से लैग्रेंजियन बिंदु (L1) में बदलना रहा, जिसके चलते उपग्रह के विन्यास में बदलाव करना पड़ा। इसके अलावा, पेलोड के विकास में अधिक समय लगना तथा दीर्घ-अवधि वाले उपकरणों/सामग्रियों की खरीद में लगने वाला अतिरिक्त समय भी समय-वृद्धि के प्रमुख कारण रहे।
चंद्रयान-3: परियोजना में समय-वृद्धि चंद्रयान-2 विफलता विश्लेषण समिति द्वारा सुझाए गए सुधारों को शामिल करने के लिए प्रणालियों के पुनः विन्यास, कोविड-19 महामारी, नए विशेष परीक्षणों के संचालन तथा नए सेंसर के विकास के कारण हुई।
गगनयान कार्यक्रम का उद्देश्य निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) तक स्वदेशी मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता का प्रदर्शन करना है। इस कार्यक्रम को भारत सरकार द्वारा जनवरी 2019 में आधिकारिक स्वीकृति दी गई थी। इसके अंतर्गत समान विन्यास में दो मानव रहित मिशन और एक मानव सहित मिशन संचालित किए जाने का प्रावधान था। इस कार्यक्रम के लिए कुल ₹9,023 करोड़ के बजट को स्वीकृति दी गई थी तथा मानव सहित मिशन के प्रक्षेपण का लक्ष्य मई 2022 निर्धारित किया गया था।
हाल ही में अक्टूबर 2024 में गगनयान कार्यक्रम के दायरे में संशोधन किया गया, जिसके तहत मिशनों की संख्या तीन से बढ़ाकर आठ कर दी गई। इसमें एक अतिरिक्त मानव रहित मिशन (G1) तथा भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) के लिए चार अग्रदूत (प्रीकर्सर) मिशन शामिल किए गए हैं। संशोधित कार्यक्रम के लिए कुल बजट प्रावधान ₹20,193 करोड़ किया गया है। संशोधित स्वीकृति के अनुसार सभी गतिविधियां प्रगति पर हैं और पहले मानव सहित मिशन का लक्ष्य वर्ष 2027–28 रखा गया है।
गगनयान कार्यक्रम के अंतर्गत इसरो नियोजित मिशनों को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए विभिन्न प्रणालियों का विकास और निर्माण कर रहा है। मानव उड़ान के लिए निर्धारित कड़े ह्यूमन रेटिंग मानकों को ध्यान में रखते हुए, मानव-रेटेड प्रक्षेपण यान (HLVM3) की संरचनाओं, सर्विस मॉड्यूल प्रोपल्शन सिस्टम, क्रू मॉड्यूल प्रोपल्शन सिस्टम तथा पैराशूट आधारित अवरोह/धीमी गति प्रणाली के व्यापक परीक्षण पूरे कर लिए गए हैं। इसके अलावा, अत्यंत महत्वपूर्ण क्रू एस्केप सिस्टम के मोटरों का भी विकास कर लिया गया है और उनके स्थैतिक परीक्षण सफलतापूर्वक संपन्न हो चुके हैं। साथ ही, स्वदेशी पर्यावरण नियंत्रण एवं जीवन समर्थन प्रणाली के विकास का कार्य समानांतर रूप से प्रगति पर है।
प्रमुख अवसंरचनाएं जैसे ऑर्बिटल मॉड्यूल प्रिपरेशन फैसिलिटी, गगनयान कंट्रोल सेंटर तथा अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण सुविधा स्थापित की जा चुकी हैं। दूसरे लॉन्च पैड में आवश्यक संशोधन भी कर दिए गए हैं। टीवी-डी1 (TV-D1) और आईएडीटी-01 (IADT-01) जैसे अग्रदूत (प्रीकर्सर) मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं। ग्राउंड ट्रैकिंग नेटवर्क, स्थलीय संचार लिंक तथा आईडीआरएसएस-1 (IDRSS-1) फीडर स्टेशनों की स्थापना कर ली गई है। क्रू मॉड्यूल रिकवरी योजना तथा इसके लिए तैनात किए जाने वाले संसाधनों को अंतिम रूप दे दिया गया है। पहले मानव रहित मिशन (G1) के लिए HLVM3 के सभी चरण और क्रू एस्केप सिस्टम (CES) मोटर तैयार हैं। क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल की प्रणालियाँ विकसित कर ली गई हैं तथा उनके संयोजन और एकीकरण (असेंबली एवं इंटीग्रेशन) का कार्य अंतिम चरण में है। पहला मानव सहित मिशन वर्ष 2027–28 में लक्षित है।
भारत ने वर्तमान में संचालित पीएसएलवी, जीएसएलवी और एलवीएम-3 प्रक्षेपण यानों के माध्यम से निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में 10 टन तक तथा भू-समकालिक ट्रांसफर कक्षा (GTO) में 4.2 टन तक के उपग्रह प्रक्षेपित करने की क्षमता के साथ अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है। इन प्रक्षेपण यानों ने पृथ्वी अवलोकन, संचार, नेविगेशन और अंतरिक्ष अन्वेषण से जुड़े उपग्रहों के लिए स्वतंत्र अंतरिक्ष पहुँच सुनिश्चित की है। विस्तारित अंतरिक्ष दृष्टि को पूरा करने हेतु प्रक्षेपण यान क्षमताओं को और सशक्त बनाने के लिए सरकार ने नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) के विकास को मंजूरी दी है, जो निम्न पृथ्वी कक्षा में 30 टन तक की अधिकतम पेलोड क्षमता प्रदान करेगा। अंतरिक्ष तक कम लागत में पहुँच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकियों का भी विकास किया जा रहा है, जिसमें आंशिक रूप से पुन: प्रयोज्य NGLV शामिल है, जिसकी LEO में 14 टन पेलोड क्षमता होगी। इसके अतिरिक्त, एक पंखयुक्त बॉडी अपर स्टेज का भी विकास किया जा रहा है, जो कक्षा से पृथ्वी पर वापस लौटेगा और स्वचालित रूप से रनवे पर उतरने में सक्षम होगा।
अधिक शक्तिशाली और अधिक दक्ष प्रोपल्शन प्रणालियों के विकास के संबंध में, इसरो ने एलवीएम-3 प्रक्षेपण यान में शामिल किए जाने हेतु उच्च-थ्रस्ट (2000 kN) अर्ध-क्रायोजेनिक इंजन के विकास का कार्य शुरू किया है। इसके साथ ही, नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) के लिए उच्च-थ्रस्ट इंजन हेतु एक पर्यावरण-अनुकूल मीथेन आधारित प्रोपल्शन प्रणाली की भी परिकल्पना की जा रही है, जिससे प्रस्तावित मानवयुक्त चंद्र मिशन के लिए प्रक्षेपण यान की प्रौद्योगिकीय तत्परता सुनिश्चित की जा सके। इनके अतिरिक्त, ड्यूल-फ्यूल स्क्रैमजेट इंजन की दिशा में एक एयर-ब्रीदिंग प्रोपल्शन प्रणाली का विकास भी प्रगति पर है।
सरकार ने अंतरिक्ष विभाग की महत्वपूर्ण अंतरिक्ष अवसंरचना तथा अनुसंधान एवं विकास (R&D) परियोजनाओं के लिए बजट आवंटन बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। सरकार की स्पेस विज़न 2047 के अंतर्गत वर्ष 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना तथा वर्ष 2040 तक एक भारतीय को चंद्रमा पर उतारने का लक्ष्य रखा गया है। इस दिशा में सरकार ने अनुसंधान एवं विकास पर आधारित पांच प्रमुख परियोजनाओं को स्वीकृति दी है। इनमें गगनयान का फॉलो-ऑन मिशन; चंद्रयान के फॉलो-ऑन मिशन, जिनमें चंद्रयान-4 (चंद्र नमूना वापसी मिशन) तथा चंद्रयान-5/लूपेक्स मिशन शामिल हैं; शुक्र कक्षीय मिशन (वीनस ऑर्बिटर मिशन); और नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) का विकास शामिल है। स्पेस विज़न को साकार करने के लिए जमीनी अवसंरचना के विस्तार के तहत सरकार ने दो नए लॉन्च पैड को भी मंजूरी दी है—एक तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में तथा दूसरा अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यानों के लिए तीसरा लॉन्च पैड।
मप्र में नवाचार का 70वाँ ‘विधान’
मध्यप्रदेश की पहचान एक उत्सवी प्रदेश की रही है लेकिन वह नवाचार का प्रदेश भी रहा है. अनेक ऐसे मौके और प्रसंग आए हैं, जब मध्यप्रदेश का नवाचार देश के लिए आदर्श बना हुआ है. मध्यप्रदेश विधानसभा ने अपना 69वाँ स्थापना दिवस मनाकर अगले वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर आयोजित विशेष सत्र में यह देखने को मिला. मध्य प्रदेश विधानसभा में लगभग एक दशक बाद विशेष सत्र बुलाया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में विशेष सत्र आयोजित किया गया था। इसके अलावा वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ के गठन के समय और 1997 में आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर भी विशेष सत्र बुलाया गया था। विधानसभा अध्यक्ष के नवाचार पहल के अंतर्गत यह आयोजन किया गया. हालाँकि इसके पूर्व हर वर्ष प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती पर उनका पुण्य स्मरण करने की परम्परा का श्रीगणेश भी किया गया।
भारत ने पॉक्सो के लंबित मामलों का बोझ किया कम: पहली बार दर्ज मामलों से ज्यादा मामलों का हुआ निपटारा
• भारत में पॉक्सो मामलों की निपटान दर अब 109 प्रतिशत हुई। यानी एक वर्ष में दर्ज होने वाले मामलों से अधिक मामलों का हुआ निपटारा
• एक शोध के अनुसार 4 वर्षों में सभी लंबित मामलों को खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की जरूरत
• यह अध्ययन इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की पहल पर सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज फॉर चिल्ड्रेन ने तैयार किया
पहली बार भारत ने एक वर्ष में दर्ज होने वाले पॉक्सो मामलों से अधिक मामलों का निपटारा किया है। यह न्यायिक प्रणाली में वर्षों से चले आ रहे लंबित मामलों के खिलाफ एक ऐतिहासिक बदलाव है। सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज (सी-लैब) फॉर चिल्ड्रन की रिपोर्ट ‘पेंडेंसी टू प्रोटेक्शन: अचीविंग द टिपिंग पॉइंट टू जस्टिस फॉर चाइल्ड विक्टिम्स ऑफ सेक्सुअल एब्यूज’ के अनुसार वर्ष 2025 में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े 80,320 मामले दर्ज हुए, जबकि 87,754 मामलों का अदालती सुनवाई के बाद निपटारा किया गया। इससे निपटाने की दर 109 प्रतिशत तक पहुंच गई। खास बात यह है कि 24 राज्यों में भी पॉक्सो मामलों की निपटान दर 100 प्रतिशत से अधिक रही है। रिपोर्ट में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस (पॉक्सो) के तहत सभी लंबित मामलों को चार वर्षों के भीतर खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की स्थापना करने की सिफारिश की गई है।
मुकदमों को लेकर अक्सर “तारीख पर तारीख” की छवि से बदनाम भारत में 2023 तक पॉक्सो के 2,62,089 मामले लंबित थे। लेकिन अब एक अहम बदलाव देखने को मिला है क्योंकि निपटाए गए मामलों की संख्या दर्ज किए गए मामलों से ज्यादा हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार देश एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां न्यायिक व्यवस्था अब सिर्फ लंबित मामलों को संभालने के बजाय उन्हें सक्रिय रूप से कम करना शुरू कर रही है। साथ ही रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि लंबित पॉक्सो मामलों को पूरी तरह खत्म करने के लिए चार साल की अवधि में 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतें स्थापित की जाएं। इसके लिए लगभग 1,977 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिसमें निर्भया फंड का भी उपयोग किया जा सकता है।
रिपोर्ट कुछ गंभीर चिंताओं की ओर भी ध्यान दिलाती है। लगभग आधे लंबित मामले दो साल से ज्यादा समय से लंबित हैं। दोषसिद्धि की दरों में भी लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है और अलग-अलग राज्यों में मामलों की स्थिति में बड़ा अंतर दिखाई देता है। उदाहरण के तौर पर, पांच साल से ज्यादा समय से लंबित पॉक्सो के सभी मामलों में अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत के चलते सबसे बड़ी भागीदारी है। इसके बाद महाराष्ट्र (24 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल (11 प्रतिशत) का स्थान है। कुल मिलाकर देखा जाए तो पांच साल से अधिक समय से लंबित मामलों में लगभग तीन-चौथाई अकेले सिर्फ इन्हीं तीन राज्यों में है।
न्यायिक व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में इन आंकड़ों के दूरगामी असर पर बात करते हुए इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन के निदेशक (शोध) पुरुजीत प्रहराज ने कहा, “भारत आज बाल यौन शोषण के खिलाफ अपने संघर्ष में एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जब न्यायिक व्यवस्था दर्ज किए जाने वाले मामलों से अधिक पॉक्सो मामलों का निपटारा करने लगती है, तब यह सिर्फ आंकड़ों की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि यह उस भरोसे की वापसी होती है, जो बच्चों ने व्यवस्था पर खो दिया था। हमारा शोध बार-बार यह दिखाता है कि न्याय में हर दिन की देरी, बच्चे के मानसिक आघात को और गहरा करती है। इसलिए इस गति को बनाए रखना केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। ताकि हर बच्चे के लिए समय पर संवेदनशील और बाल-केंद्रित न्याय अपवाद नहीं, बल्कि हक़ीक़त बन सके।” इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन, बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) का सहयोगी है। जेआरसी 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ देश के 451 जिलों में बाल अधिकारों के लिए काम कर रहा है।
राज्यों में देखें, तो सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पॉक्सो के मामलों के निपटान की दर 150 प्रतिशत से अधिक रही है। वहीं, अन्य सात राज्यों में यह निपटान दर 121 से 150 प्रतिशत के बीच रही, जबकि 10 राज्यों ने 100 से 120 प्रतिशत तक की निपटान दर हासिल की। इन 24 राज्यों ने न सिर्फ 2025 में दर्ज हुए मामलों का निपटारा किया, बल्कि पिछले वर्षों से लंबित मामलों को भी काफी हद तक समाप्त करने में सफलता पाई। ये आंकड़े उन मामलों को दिखाते हैं जो कई साल पहले न्याय प्रणाली में दर्ज हुए थे, लेकिन अब तक उनमें कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई है। रिपोर्ट बताती है, “किसी मामले की प्रक्रिया के शुरुआती दौर से ही लंबित रहने की समस्या शुरू हो जाती है और व्यवस्था को तय समय सीमा के भीतर मामलों को आगे बढ़ाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।”
रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि पॉक्सो के लंबित मामलों को शीघ्र निपटाने के मकसद से प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हर साल मामलों के निपटान की दर 100 प्रतिशत से अधिक बनाए रखें। इसके साथ ही जो राज्य न्यायिक प्रक्रिया में पीछे हैं, उन्हें तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग दिया जाए। साथ ही दोषसिद्धि और बरी होने की दरों की नियमित और बारीकी से निगरानी की जाए। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि मामलों के बेहतर विश्लेषण और दस्तावेजों की त्वरित उपलब्धता के लिए एआई आधारित कानूनी शोध उपकरणों और दस्तावेज प्रबंधन प्रणालियों का उपयोग किया जाए, ताकि न्याय प्रक्रिया और अदालती कार्यवाही अधिक तेज व प्रभावी हो सके।
यह रिपोर्ट 2 दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है, जिन्हें नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी), नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और लोकसभा में पूछे गए सवालों और उनके जवाबों से लिया गया है।
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जितेंद्र परमार
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रेल निबंध प्रतियोगिता के पुरस्कार वितरित
विकसित देशों के सम्पन्न नागरिक भारत में बसना चाहते हैं
भारत की तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था, भारत में तुलनात्मक रूप से सस्ती दरों पर विभिन्न उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता, अति सस्ती दरों पर सेवा भावना के साथ उच्च स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं भारत की महान संस्कृति के साथ साथ साकार अवसर अमेरिका सहित विकसित देशों के नागरिकों को भारत की ओर आकर्षित कर रहे हैं। आज भारत का फलता फूलता तकनीकी उद्योग उच्च स्तर की तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है जो किसी भी तरह विकसित देशों में उपलब्ध कराई जा जा रही तकनीकी सुविधाओं से कम नहीं हैं। भारत में नागरिकों को मानसिक शांति उपलब्ध है क्योंकि भारतीय नागरिक, सनातन संस्कृति का अनुपालन करते हैं। जबकि विकसित देशों के नागरिकों में मानसिक शांति का पूर्णत: अभाव है। विकसित देशों के नागरिक पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करते हैं जिसके चलते संयुक्त परिवारों का पूर्णत: अभाव है। इन देशों में पश्चिमी संस्कृति का अनुसरण करते हुए परिवारों में बच्चे 18 वर्ष की आयु प्राप्त करते ही वे अपना अलग घर बसा लेते हैं और माता पिता अकेले रह जाते हैं। जिससे, माता पिता अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं और इनकी देखभाल के लिए सरकार को व्यवस्था करनी होती है। इसके ठीक विपरीत भारतीय संस्कृति नागरिकों को आपस में जोड़ती है एवं संयुक्त परिवार भारतीय समाज की विशेषता है। बुजुर्ग नागरिकों को अपने संयुक्त परिवार में ही रहना होता है। अतः भारत में बुजुर्गों की देखभाल के लिए सरकार को अलग से कोई व्यवस्था नहीं करनी होती है।
हाल ही के वर्षों में अमेरिकी नागरिकों द्वारा भारत के लिए वीजा प्राप्त करने वालों की संख्या वर्ष 2021 के बाद से दुगुनी हो गई है। अमेरिकी नागरिक अब भारत में शांति की तलाश में आ रहे हैं। अमेरिका सहित विकसित देशों में अधिकतम नागरिकों को मानसिक बीमारियों ने घेर रखा है। इन मानसिक बीमारियों से मुक्ति पाने के उद्देश्य से कई विदेशी नागरिक तो भारत के हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड जैसे राज्यों के हिमालय क्षेत्र में बस्ते जा रहे हैं। उन्हें वहां पर आध्यात्म का सुख प्राप्त हो रहा है। भारत की तेजी से बढ़ रही डिजिटल अर्थव्यवस्था से भी अमेरिका का पढ़ा लिखा वर्ग आकर्षित हो रहा है, क्योंकि उन्हें अमेरिका जैसी ही उच्चस्तरीय सुविधाएं भारत में भी उपलब्ध हो रही हैं। भारत का स्टार्टअप इको सिस्टम भी भारत में नित नए नवाचार उपलब्ध करा रहा है इससे अमेरिका में पूर्व से ही सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों को भी भारत में रोजगार के नए अवसर दिखाई दे रहे हैं।
साथ ही, भारत में प्रतिभावान इंजीनीयरों की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता है जिससे अमेरिका की कई कम्पनियां अब अपने तकनीकी कार्य को भारत में स्थानांतरित कर रही हैं। कई अमेरिकी कम्पनियां अब यह महसूस करने लगी हैं कि भारत में कम खर्चों में अधिक उत्पादकता मिल सकती है, क्योंकि भारत में उत्पादों की लागतें एवं कार्यबल की लागतें बहुत कम हैं, जिससे तुलनात्मक रूप से इन कम्पनियों की लाभप्रदता में सुधार दिखाई दे रहा है। अमेरिका में उत्पादों की लागतें बहुत ऊंचें स्तर पर पहुंच चुकी हैं, जो कम्पनियों की लाभप्रदता को विपरीत रूप से प्रभावित कर रही हैं। और फिर, भारतीय महानगरों में अमेरिकी महानगरों की तुलना में बेहतर एवं टक्कर की सुविधाएं उपलब्ध हैं। भारत में विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार भी उपलब्ध है जिससे उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में उत्पादन करने वाली विश्व की लगभग समस्त बड़ी कंपनियां अब भारत में अपनी विनिर्माण इकाईयों की स्थापना करने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रही हैं। ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में सस्ती उत्पादन लागत पर उत्पादों का निर्माण कर भारत में ही इन उत्पादों को बेच सकती हैं क्योंकि स्थानीय स्तर पर ही इन उत्पादों के लिए विशाल बाजार उपलब्ध है। अन्य कई कम्पनियां तो भारत में स्थापित विनिर्माण इकाईयों में उत्पादों का निर्माण कर अन्य देशों को निर्यात भी करने लगी हैं।
भारत में आधुनिकतम तकनीकी उपलब्ध है, रहन सहन की लागतें बहुत कम हैं, युवा एवं प्रतिभावान कार्यबल सस्ती दरों पर उपलब्ध है, भारत में मुद्रा स्फीति की दर सबसे कम है, उत्पादों का बड़ा बाजार उपलब्ध है, इन उपलब्धियों की चलते अब विदेशी निवेशक भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। अमेरिका सहित विकसित देशों में आज मुद्रा स्फीति की समस्या विकराल रूप धारण किए हुए है एवं इसका हल ये देश निकाल नहीं पा रहे हैं इससे इन देशों में पेंशन पाने वाले नागरिक इन देशों में रहन सहन की उच्च लागत को वहन नहीं कर पा रहे हैं। जबकि भारत में इन देशों के नागरिकों का गुजारा बहुत आसानी से हो सकता है। साथ ही, भारत में हाल ही के समय में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धि में अकल्पनीय सुधार हुआ है। भारत में ही अब विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं तुलनात्मक रूप से बहुत ही सस्ती दरों पर उपलब्ध हैं। अन्य देशों की तुलना में केवल 25/30 प्रतिशत खर्च पर भारत में अत्याधुनिक तकनीकी आधारित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। अतः आज न केवल विकसित देशों बल्कि अरब देशों से भी नागरिक भारत में अपना इलाज कराने के लिए बहुत बड़ी संख्या में आने लगे हैं।
भारतीय संस्कृति भी विदेशी नागरिकों को अपनी ओर आकर्षित करती हुई दिखाई दे रही है। मन की शांति तो भारत के आध्यात्म में अंतर्निहित है। “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना, “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” एवं “सर्वे भवंतु सुखिन:” जैसी भावना तो केवल और केवल भारत में ही पाई जाती है। भारत में योगा एवं आयुर्वेदिक जैसी सुविधाएं भी स्वास्थ्य को ठीक बनाए रखने में सहयोग करते हुए दिखाई दे रही हैं। पश्चिम के केवल “मैं” के भाव से भी नागरिक अब ऊब चुके हैं एवं वहां पर छिन्न-भिन्न हुए सामाजिक ताने-बाने से भी बहुत परेशान हैं अतः वे आत्मिक सुख की तलाश में भारत के सामाजिक ताने बाने में रचना बसना चाह रहे हैं। अमेरिका एवं अन्य देशों के नागरिक महाकुम्भ के समय लाखों की संख्या में भारत में प्रयागराज में पवित्र त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाने के उद्देश्य से आए थे, यहां का धार्मिक माहौल देखकर ये लोग अब भारत में बसने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं। विकसित देशों की तुलना में भारत में उन्हें आत्मिक शांति प्राप्त होती हुई दिखाई दे रहे हैं। आज भारत पूरे मनोयोग एवं आत्म विश्वास के साथ अपने पैरों पर खड़ा है।
भारत में समाज बहुत लचीला है एवं अन्य देशों से भारत आ रहे नागरिकों का स्वागत करता हुआ दिखाई दे रहा हैं। अतः भारत में उनका हार्दिक स्वागत हो रहा है तथा भारत में इनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। इस प्रकार इन विदेशी नागरिकों को भारत में स्थापित होने में किसी भी प्रकार की परेशानी दिखाई नहीं दे रही है। भारतीय समाज उन्हें न केवल स्वीकार रहा है बल्कि समस्त प्रकार की सुविधाएं एवं सहयोग भी उपलब्ध करा रहा है।
भारत में बुजुर्गों को दिए जाने वाले आदर सत्कार से भी अमेरिका का बुजुर्ग नागरिक अत्यधिक प्रभावित हैं। अमेरिका में इस प्रकार का माहौल उन्हें नहीं मिलता है। वहां तो बुजुर्गों को सामान्यतः उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है तथा इन बुजुर्गों की देखरेख सरकार को करनी होती है। आज अमेरिका में लगभग 6 लाख बुजुर्ग खुले में, पार्कों में, अपना जीवन जीने को मजबूर हैं। संयुक्त परिवार तो केवल भारत में सम्भव है अमेरिका में तो संयुक्त परिवार दिखाई ही नहीं देते हैं। भारत के केरल, गोवा, पोंडिचेरी, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड राज्य अमेरिका में सेवानिवृत्त हुए नागरिकों के लिए किसी स्वर्ग से कम सिद्ध नहीं हो रहे हैं।
प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com
अंग्रेजों को चकमा देकर 300 साल तक गाँवों में छुपकर कैसे जीवित रही संस्कृत!
अमीरी की जीवनशैली, प्रदूषण का बोझ और गरीब की त्रासदी

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133
शताब्दी वर्ष पर मोहन राकेश को याद किया ‘बतरस’ ने
मुंबई के ‘केशव गोरे ट्रस्ट’ सभागार में शहर की सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस’ के दूसरे दौर का २७वां मासिक आयोजन सम्पन्न हुआ। प्रमुख वक्तव्य देते हुए डॉ. दयानंद तिवारी ने मोहन राकेश को अपने समय का सशक्त रचनाकार कहा, जिन्होंने साठ के दशक में प्राध्यापक की सुरक्षित नौकरी को छोड़कर पूर्णकालिक लेखक बनने का फ़ैसला किया। डॉ तिवारी ने एक साक्षात्कार के हवाले से बताया कि अपनी तीसरी पत्नी अनिता के पूछने पर उन्हें बताया था कि उनके जीवन में पहला स्थान लेखन का, दूसरा स्थान मित्रों का और पत्नी कहीं तीसरे स्थान पर आती थीं। यह बात एक सच्चे लेखक के विशिष्ट और स्वतंत्र व्यक्तित्व को उजागर करती है। राकेशजी द्वारा साहित्य की लगभग सभी विधाओं में सशक्त लेखन का उल्लेख करते हुए तिवारीजी ने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए ‘मलबे का मालिक’ जैसी प्रासंगिक कहानी के बार-बार लिखे जाने की आवश्यकता बतायी। इसी तरह नाट्य परंपरा की चर्चा करते हुए डॉ. तिवारी ने भारतेंदु हरिश्चंद्र एवं जयशंकर प्रसाद के बाद मोहन राकेश को आधुनिक हिंदी नाटक का तीसरा सशक्त पड़ाव बताया। उन्होंने निष्कर्ष रूप में कहा कि मोहन राकेश का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने रचना-काल में था।
वक्तव्यों के सिलसिले में कवि एवं विचारक डॉ. अनिल गौड़ ने ‘मोहन राकेश की रचनात्मकता के उत्स’ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राकेशजी थे तो सिंधी, लेकिन अमृतसर में जन्म होने से वे पंजाबी सांस्कृतिक परिवेश में पले-बढ़े॰॰॰। उस वक्त के संक्रमण क़ालीन दौर में, जब विभाजन की त्रासदी झेलता समाज बड़ी तेजी से बदल रहा था, मोहन राकेश एक सशक्त रचनाकार के रूप में उभरते हैं। अनिल जी ने रेखांकित किया कि मोहन राकेश की किसी भी कहानी को पढ़ते समय पाठक को एक ऐसा रचनाकार स्पष्ट रूप से दिखाई देगा, जो बाह्य यथार्थ का सशक्त और सूक्ष्म चित्रण करता है, तो आंतरिक यथार्थ को भी उतनी ही गहनता से व्यक्त करता है। उनकी रचनाओं में करुणा का एक अथाह सागर लहराता है। यद्यपि उसकी अभिव्यक्ति की ध्वनियाँ और चिंताएँ अलग-अलग हो सकती हैं, किंतु उसका प्रभाव सदैव गहरा और दीर्घकालिक रहता है। इसे उन्होंने ‘गिरगिट का सपना’ कहानी के ज़रिए सिद्ध भी किया, जो एक ऐसी व्यंग्यात्मक कथा है, जिसमें ऊपर से करुणा कम दिखाई देती है, परंतु आंतरिक स्तर पर इसका पूरा ताना-बाना बेहद कारुणिक है।
‘सीमाएँ’, ‘उसकी रोटी’ और ‘मलबे का मालिक’ जैसी कहानियों का हवाला देते हुए वक्ता ने कहा कि मोहन राकेश ने जीवन की जिस बेचैनी को सीधे-सीधे पकड़ा है, वह आसान नहीं थी। प्रश्न यह है कि यह बेचैनी उनके भीतर आई कैसे? इस संदर्भ में अनिलजी ने मोहन राकेश के जीवन की एक मार्मिक घटना बतायी, जिसमें पिता के देहांत पर अंत्येष्टि के लिए घर में पैसे न थे। उनकी माता ने अपनी सोने की चूड़ियाँ बेचकर यह संस्कार पूरा कराया। तब मोहन राकेश की आयु लगभग पंद्रह वर्ष रही होगी। इस घटना ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया और ऐसे अनुभव उनके साहित्य की मूल संवेदना बन गये।
रचनाओं के साथ मोहन राकेश द्वारा अनूदित ग्रंथों—‘मृच्छकटिकम्’ और ‘शाकुन्तलम्’॰॰॰आदि- के उल्लेख से गौड़जी ने कहा कि उनके उपजीव्य के तीन स्तर थे। एक ओर आधुनिक हिंदी साहित्य, दूसरी ओर ऊँचाई पर खड़ा अंग्रेज़ी साहित्य, और तीसरी ओर क्लासिक संस्कृत साहित्य। किन्तु वास्तविकता यह थी कि उनके पीछे खड़े थे भारतेंदु हरिश्चंद्र और एक प्रकार से प्रयोग-दूभर नाटक वाले जयशंकर प्रसाद। इन सभी सीमाओं को तोड़ते हुए मोहन राकेश के भीतर की बेचैनी ने उन्हें एक अनूठा और नायक रचनाकार बना दिया।
डॉ. गौड़ ने यह प्रश्न भी उठाया कि कहानी लिखते-लिखते मोहन राकेश नाटक विधा की ओर क्यों मुड़ गये? और इसका उत्तर देते हुए आगे कहा कि क्लासिक साहित्य में कथा की अपेक्षा नाटक अधिक समग्र विधा है। नाटक में कहानी, कविता, संवाद, कथन और उपकथन—सब कुछ समाहित होता है। इसके माध्यम से रचनाकार अपनी बात अधिक व्यापक और प्रभावशाली ढंग से कह सकता है। डॉ. गौड़ ने कहा कि कुल मिलाकर मोहन राकेश एक विशिष्ट और चिरस्थायी रचनाकार हैं, जिनकी रचनाएँ चाँद की तरह प्रकाशमान होकर आज भी पाठकों को भीतर तक स्पर्श करती हैं।
कवि रासबिहारी पांडेय जी ने मोहन राकेश द्वारा रचित नाटक ‘लहरों के राजहंस’ के मर्म पर बात करते हुए कहा- महाकवि अश्वघोष के महाकाव्य ‘सौन्दरानंद’ पर आधारित इस नाटक में नाटककार ने मूल कथा के पात्रों और प्रसंगों को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए उनमें अपेक्षित परिवर्तन किये हैं, जिससे यह रचना केवल ऐतिहासिक या पौराणिक न रहकर समकालीन जीवन की संवेदनाओं से जुड़ जाती है। नाटक का ताना-बाना लौकिक सुखों और आध्यात्मिक शांति की खोज के बीच फँसे नंद और सुंदरी के संवादों के माध्यम से निर्मित होता है। दोनों पात्र अनिर्णय की स्थिति में हैं—नंद का मन वैराग्य और अध्यात्म की ओर आकृष्ट है, जबकि सुंदरी लौकिक जीवन और सांसारिक सुखों के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करती है। किंतु यह द्वंद्व किसी स्पष्ट निर्णय तक नहीं पहुँच पाता, जिससे नाटक की वैचारिकी और गहराती है। मोहन राकेश अपनी रचनाओं के माध्यम से स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न उठाते हैं। नंद और सुंदरी के संवादों के माध्यम से सांसारिक सुखों के पक्ष और विपक्ष में दिये गये तर्क यह स्पष्ट करते हैं कि भोगों से तृप्ति संभव नहीं है। अंततः ‘लहरों के राजहंस’ लौकिक सुखों और आध्यात्मिक शांति के बीच चलने वाले अंतर्द्वंद्व की कथा है, जो मन की शांति के लिए अध्यात्म-मार्ग को अपरिहार्य बताती है।
कलाविद एवं नाट्य समीक्षक प्रो॰ सत्यदेव त्रिपाठी ने ‘मोहन राकेश के नाटकों में स्त्री-पुरूष संबंध’ पर अपनी बात रखते हुए कहा – मोहन राकेश के तीनों नाटक मुख्यतः स्त्री केंद्रित हैं। सबके मूल में पुरुष के समक्ष उनमें द्वन्द्व व टकराहट है। पहले में दो स्त्री एक पुरुष, तो दूसरे में स्त्री-पुरुष के बीच दर्शन होता है, लेकिन दोनों में पुरुष चला जाता है घर छोड़कर…। बस, तीसरे में चार पुरुष हैं और सामने है सावित्री… जो नाम में सतीत्व का मिथक लिये हुए है, पर काम में उत्तर आधुनिक-सी है – चारों पुरुषों में अत्यधिक सुख की तलाश करती है। लेकिन अंत में इस तलाश की त्रासदी भी खूब स्पष्ट होती है, जो भोगवादी लिप्सा पर कड़ा तमाचा यूँ मारती है कि सबसे ठुकरायी जाकर सावित्री को लौटके उसी घर में आना पड़ता है, जिसे हरचंद छोड़ने को तत्पर है। त्रस्त होकर बाहर गये पति को भी बच्चा लेके आता है और इस तरह सिद्ध होता है कि ‘मजबूर हूँ मैं, मजबूर हो तुम, मजबूर ये दुनिया सारी है, तन का दुख मन पर भारी है’। याने सुख भौतिकता के पीछे भागने में नही है। क्या यही अंतिम हल है?
प्रकाशक एवं कवि रमन मिश्र जी ने ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर १९७१ में मणि कौल द्वारा इसी नाम से बनायी फ़िल्म के प्रीमियर शो को देखने का हाल बताते हुए कहा कि यह आलोचकों द्वारा बेहद सराही गई और इसे ‘फ़िल्मफ़ेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड’ भी मिला। यह अंग्रेज़ी में भी डब होकर ‘वन डे बिफ़ोर द रेनी सीजन’ नाम से प्रदर्शित हुई। रमनजी के मुताबिक़ इस फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता रहा – भारतीय कला-सिनेमा के प्रतिष्ठित कैमरा-मैन के॰के॰ महाजन का छायांकन। फिल्म में पेंटरली मिनिमलिस्ट़ फ्रेम्स का उपयोग किया गया।
हर शॉट को बेहद सूक्ष्म, संतुलित और भाव-भरा निरूपित करने के लिए, जिसका मकसद था – नाटकीय संघर्ष और पात्रों की भावनाओं की उथल-पुथल को दृश्य भाषा के ज़रिये स्पष्ट करना। अधिकांश दृश्यों को हिमालय के पर्वतीय इलाके में शूट किया गया, जिसमें पृष्ठभूमि को धवल बनाकर दर्शाया गया। इसमें बाहरी वातावरण को धुंधला करने से पात्रों और उनके संवादों पर ध्यान केन्द्रित होता है। अधिकांश संवाद और भाव-भंगिमा एक झोपड़ी के भीतर होती है, जहाँ कैमरा स्थिर-संतुलित और धीरे चलने वाले शॉट्स का प्रयोग करता है।
यह परंपरागत नाट्य रूप से हटकर सिनेमाई प्रयोगशीलता को दर्शाता है। इस फ़िल्म के निर्माण में संवादों को पहले रिकॉर्ड कर लेने का भी एक विरल प्रयोग हुआ। फिर उनसे बनते दृश्यों को शूट किया गया— जिससे पात्रों के चेहरे, भावों और वातावरण पर अधिक स्वतंत्र रूप से कैमरा केंद्रित हो सके। यह फिल्म श्वेत-श्याम रूप में बनाई गई थी, जिससे दृश्य रूप में एक क्लासिकल मौन और दार्शनिक अनुभव मिल सके और जो नाटकीय भावनाओं को प्रभावी ढंग से व्यक्त करता रहे।
‘बतरस’ की नियमित प्रतिभागी प्रज्ञा मिश्र, जो एक कवयित्री होने के साथ-साथ पॉडकास्ट से भी जुड़ी हैं, ने मोहन
राकेश की रचना ‘गिरगिट का सपना’ (बाल साहित्य) को ऐसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया कि इसकी संवेदनात्मक गहराई विशेष रूप से उभर कर असरकारक बन गयी। मोहन राकेश को कथाकार रवींद्र कालिया अपना कथा-गुरु मानते थे और दोनों के अत्यंत घनिष्ठ संबंध भी रहे। इनसे प्रभावित होकर ही कालियाजी ने साहित्यिक संसार में प्रवेश किया। समय-समय पर राकेश जी ने उनका मार्गदर्शन भी किया। ऐसे रवींद्र कालिया द्वारा लिखी हुई भूमिका को रंगकर्मी दिनेश कुमार ने मंच पर अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। राजेंद्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश की मित्रता को साहित्यिक जगत में ‘तिगड़ी’ के नाम से जाना जाता है। राजेंद्र यादव के दूसरे उपन्यास को पढ़कर मोहन राकेश ने जो पत्र लिखा था राजेंद्र यादव को, उसे रंगकर्मी आलोक शुक्ला ने मंच पर अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया। रंगकर्मी एवं सिने अभिनेता सौरभ बंसल ने मोहन राकेश पर लिखी अपनी कविता का सशक्त पाठ किया, जिसे श्रोताओं ने सराहा।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित निधि मिश्र एवं सुशील बौंठियाल ने वर्ष २००२ में रामगोपाल बजाज के निर्देशन में ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक में क्रमशः मल्लिका और कालिदास की प्रमुख भूमिकाएँ निभाई थीं। दोनों ने भूमिकाओँ के लिए अपने चयन की मार्मिक प्रक्रिया के साथ ही उस दौरान हुए कठिन-सहज अनुभवों को भी साझा किया और नाटक के एक अंश का पाठ भी किया। रंगकर्मी विजयकुमार ने थोड़े ही दिनों पहले तैयार करके ढेरों शोज़ किये नाटक ‘आधे अधूरे’ से काले शूट वाले आदमी को बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश किया। अनुभवी रंगकर्मी एवं अभिनेता प्रमोद सचान ने अपने कलाकार साथियों (प्रतिमा सिन्हा, मधुबाला शुक्ला और सौरभ बंसल) के साथ मिलकर ‘आषाढ़ का एक दिन’ के मातुल को बड़े लहक़दार अंदाज में जीवंत कर दिया, जो खूब सराहा भी गया।
कार्यक्रम के कुशल संचालन के दौरान विजयजी पंडित ने समय-समय पर मोहन राकेश से जुड़े महत्वपूर्ण संदर्भों का उल्लेख करते हुए कार्यक्रम को समृद्ध भी किया और रोचक भी बनाये रखा। उनकी टिप्पणयों का सार यूँ रहा कि राकेशजी ने आधुनिकता को भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझा था। उन्होंने उस कालखंड में इसके लिए चुस्त मोहरी की पतलूनें नहीं पहनीं, व्यवस्था को गालियाँ नहीं दीं, परंपरा को वक़्त-बेवक़्त कोसने का काम नहीं किया, बल्कि चली आती हुई परंपरा को कहीं मोड़कर, कहीं तोड़कर और कहीं बदलकर उसे अपने और समय के अनुरूप बना लिया। उनके आदर्श विदेशी लेखक नहीं रहे। उन्होंने फैशन के तौर पर भी विदेशी मान्यताएँ नहीं ओढीं। उनकी अपनी मान्यताएँ सहज जीवन की आवश्यकताओं के अनुरूप थीं और उनके मामले में यह किसी किस्म की दखलंदाजी बरदाश्त नहीं करते थे॰॰॰।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगीत के साथ हुआ।

(लेखिका हिंदी की प्राध्यापक हैं और साहित्यिक विषयों पर लेखन करती हैं)