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फिजी से आए रविन्द्र दत्त ने 115 वर्ष बाद अपने परिवार को खोज निकाला

बस्ती (उत्तर प्रदेश)। खून के रिश्ते भी कितने अजीब होते हैं, वे वर्षो, दशकों क्या सैकड़ों वर्ष बाद भी अपनों के मिलने के लिए सात समुंदर पार की सीमा भी लांघ जाते हैं।अपनों से मिलने के लिये बेचैन रहते हैं। मन में एक अलग तरह की टीस बनी रहती है और अपने जड़ों से जुड़ने के लिए बेताब रहते हैं।

 

विश्व में बड़ी संख्या में भारतीय द्वीप: मेलानेशिया द्वीप

दुनिया के लगभग हर देश में, हर कोने में भारतीय रहते हैं। कुछ-कुछ देश तो ऐसे हैं जहां भारतीयों की आबादी बहुत ज्यादा है। ऐसे देशों को अगर हम ‘मिनी इण्डिया’ कहें तो गलत नहीं होगा। दक्षिण प्रशांत महासागर के मेलानेशिया में भी ऐसा ही एक द्वीपीय देश है, जहां की करीब 37 फीसदी आबादी भारतीय है और वो सैकड़ों साल से इस देश में रहते चले आ रहे हैं। यही वजह है कि यहां की राजभाषा में हिंदी भी शामिल है, जो अवधी के रूप में विकसित हुई है।

 

फ़िजी द्वीप : फ़िजी दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित एक सुंदर द्वीप देश है,जो 300 से अधिक द्वीपों से बना है और अपनी खूबसूरत समुद्र तटों, हरियाली और समृद्ध भारतीय संस्कृति के लिए जाना जाता है, इसे भी “मिनी इंडिया” कहते हैं, यहाँ बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं। फिजी में हिंदी (अवधी-भोजपुरी मिश्रित) बोली जाती है, और पर्यटन व चीनी निर्यात यहाँ अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार हैं, इसकी राजधानी सुवा है।

यहां भारतीय प्रवासियो की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं। ब्रिटेन ने वर्ष1874 में इस द्वीप को अपने नियंत्रण में लेकर इसे अपना उपनिवेश बना लिया था। इसके बाद वे हजारों भारतीय मजदूरों को यहां पांच साल केअनुबंध पर गन्ने के खेतों में काम करने के लिए ले आए थे, जो वापस नहीं जा सके। इनकी जड़ें 1879 में ब्रिटिश गिरमिटिया श्रम प्रणाली के तहत लाए गए मजदूरों से जुड़ी हैं, जिन्होंने गन्ने के खेतों  में काम किया और फिजी की संस्कृति व अर्थ व्यवस्था को समृद्ध किया।1920 और 1930 के दशक में हजारों भारतीय स्वेच्छा से आकर भी यहां बस गए थे।

आज वे फिजी के सामाजिक- आर्थिक ताने-बाने का अभिन्न अंग हैं, वे ‘फिजी हिंदी’ बोलते हैं, और ‘छोटा भारत’ के रूप में जाने जाते हैं, वे दिवाली और होली जैसे त्योहार मनाते हैं और देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

फिजी द्वीपसमूह में कुल 322 द्वीप हैं, जिनमें से 106 द्वीप ही स्थायी रूप से बसे हुए हैं। यहां के दो प्रमुख द्वीप विती लेवु और वनुआ लेवु हैं, जिन पर इस देश की लगभग 87 फीसदी आबादी निवास करती है। फिजी के अधिकांश द्वीपों का निर्माण 15 करोड़ साल पहले ज्वालामुखी के विस्फोटों के कारण हुआ है। यहां अभी भी कई ऐसे द्वीप हैं,जहां प्रायःज्वालामुखी विस्फोट होते रहते हैं। फिजी को मिनी इंडिया भी कहा जाता है, यहां करीब 37 प्रतिशत आबादी भारतीयों की है।

बस्ती के कबरा गांव के  राम गरीब की कहानी

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बस्ती सदर तहसील में बनकटी ब्लॉक में कबरा खास नामक एक गांव है,जो कुवानो नदी के किनारे बसा हुआ है। इस गांव में छोटी- बड़ी जाति सब तरह के लोग रहते थे और प्राय: सभी खेती-बाड़ी करते थे । उन दिनों अंग्रेज हुकूमत के विरुद्ध लोग कभी-कभी आवाज भी उठा देते थे।

भारतीय मूल के और वर्तमान में फिजी द्वीप के निवासी रविन्द्र दत्त बताते है कि उनके परदादा का नाम गरीब राम था, जो अंग्रेजों से लोहा लेकर सरकार के विरुद्ध कोई अपराध कर लिया था। 18 वर्ष के उनके परदादा जी को अंग्रेजी हुकूमत ने बन्दी बना लिया था। अन्य लोग कहते हैं कि उनके हाथ किसी की हत्या जैसी कोई वारदात हो गई थी , जिसमें उन्हें सजा हो गई थी और सजा के तौर पर गरीब राम को वर्ष 1910 जून में ब्रिटिश हुकूमत ने कोलकाता जेल में बंद कर दिया था। जहां उन जैसे हजारों कैदियों को रखा गया था।

इनसे बेगार कराया जाता थाऔर कभी- कभी इन्हें दंड के रूप में दूर-दराज के इलाके में काले पानी जैसे इतना दूर भेज दिया जाता था कि वे अपने मातृभूमि और अपने लोगों से हमेशा-हमेशा के लिए जुदा हो जाते थे। उन्हें कभी संपर्क में आने की संभावना भी नहीं रहती थी। इस तरह के सभी भारतीय बंदियों को पानी के जहाज से हिन्द- प्रशांत महासागर से होकर फिजी नामक एक टापू पर ले जाकर छोड़ दिया था। जहां इन्हें गिरगिटिया मजदूर के रूप में रखकर  बर्बर अत्याचार किया जाता था। उनसे वीरान द्वीप में गन्ने की खेती करवाई जाती थी। उन्हें भारत लौटने नहीं दिया जाता था। इन परिस्थिति में उस गरीब राम का परिवार वहीं बस गया था। गिरमिटिया किसान बहुत मेहनती होते थे और अपने मालिक के प्रति बहुत वफादार भी होते थे।  खुद का कष्ट झेल लेते लेकिन अपने मालिक को तनिक भी आंच नहीं आने देते थे।

 

भारतप्रेमी रविन्दर का जुनून परवान चढ़ा

बस्ती जनपद के बनकटी विकास खण्ड क्षेत्र के कबरा गांव में 115 साल बाद फिजी से अपने परिवार को ढूढने के लिए एक परिवार बहुत ही बेताब रहा। पीढ़ी दर पीढ़ी का फ़ासला भी उसके जुनून को कम ना कर सका। इन्हीं भारतीय फिजी के चौथी पीढ़ी के निवासी रवींद्र दत्त, और इनकी पत्नी केशनी जो फिजी देश के निवासी है,पिछले कई साल से भारत आ- जा रहे है।  इन्हें अपना मूल गांव और परिवार की खोज में लगे थे, जो अब तक नहीं मिल पाया था।

रविन्द्र दत्त ने बताया कि अंग्रेजी शासन काल के दौरान 1910 में भारत से कई लोगों को गिरमिटिया मजदूर बनाकर फिजी भेजा गया था। उनमें उनके परदादा गरीब राम भी शामिल थे। उनसे मजदूरी कराई गई और उन्हें भारत नहीं आने दिया गया। गरीब राम जैसे लोग काफी संघर्ष करने के बाद फिजी के आदिवासियों के साथ मिलकर अंग्रजों से लड़ाई लड़ी तो 1970 में फिजी को स्वतंत्र कराया और वहां ही बस गए थे।

 

राम लला के दरबार में अर्जी

कई साल तक अपने परिवार के सदस्यों को खोजते हुए यह परिवार वर्ष 2019 में अयोध्या आए हुए थे, जहां उन्होंने भगवान राम के दर्शन किए और मन्नत मांगी कि भगवान श्री राम उन्हें उनके बिछड़े परिवार से मिलने की मनोकामना पूरी करें।

 

2025 में रविन्द्र दत्त का दुबारा आये

2025 में रविन्द्र दुबारा भारत आए और अपने परिवार के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। इस बार फिर वे अयोध्या गए और भगवान राम से मन्नत मांगी कि उन्हें उनके बिछुड़े परिवार से मिला दें। तब तक कई सालों तक इंटरनेट से जानकारी इकठ्ठा कर भी लिए थे। वे लोगों से बात करने के बाद रविन्द्र 5 दिसंबर 2025 को बस्ती के कबरा गांव पहुंचे । 6 साल बाद राम की कृपा उन्हें प्राप्त हुई दिखी ।

 

कबरा के प्रधान का पूरा सहयोग

बस्ती के बनकटी ब्लॉक के कबरा गांव में उन्हें अपने परिवार का विश्वस्त सूत्र मिलता गया। खोजबीन करने के बाद रविन्द्र दत्त को अपने परदादा गरीब राम का एक इमिग्रेशन पास मिल गया था, जिसमें उनके बारे में काफी जानकारी लिखी थी। इस पास के मिलने के बाद से वे अपने परिवार के बारे में जानकारी जुटाना शुरू किया। कई साल तक इंटरनेट से जानकारी इकठ्ठा करने और लोगों से बात करने के बाद 5 दिसंबर 2025 को वे बस्ती जनपद के कबरा गांव आ गए।

काबरा के प्रधानअभिषेक चौधरी ने कबरा गांव को आदर्श गांव के रूप में विकसित किया है । लाइट, नालियां, खड़ंजा और बहुत कुछ नगर और शहर जैसा विकसित

किया है । इनके प्रतिनिधि रवि प्रकाश चौधरी भी बहुत कर्मठ व्यक्ति हैं। वे रविंद्र दत्त के आगमन पर उन्हें भरपूर सुविधा मुहैया कराया। उन्हें पता चला कि गरीब राम इसी गांव के निवासी थे, उनके पिता का नाम रामदत्त था, और उनका शेष परिवार आज भी इस गांव में निवास करता है।

कबरा भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बस्ती जिले के बनकटी ब्लॉक में एक गाँव और ग्राम पंचायत भी है। इस गांव के प्रधान श्री अभिषेक चौधरी हैं। इस गांव का पोस्ट मुंडेरवा है। यह  यह जिला मुख्यालय बस्ती से पूर्व में 17 किमी दूर स्थित है। बनकटी से गूगल मैप के अनुसार लगभग 12.6 किलोमीटर दूर है। राज्य की राजधानी लखनऊ से यह लगभग 224 किमी दूर स्थित है । कबरा गाँव की इस समय की जनसंख्या 1903 है और घरों की संख्या 272 है। वर्तमान समय में इस गांव के पास ही में महाराज पैलेस एक विवाह मंडप और विधान परिषद सदस्य माननीय श्री सुभाष रघुवंशी का आवास भी है। कुवानो नदी गांव के पास से ही बहती है। गांव में एक मन्दिर शेष बहादुर यादव के घर के पास स्थित भी है। यह स्थान बस्ती जिले और संत कबीर नगर जिले की सीमा पर है। पड़ोस के गांव सिसई बाबू में मॉडल प्राइमरी स्कूल भी है। काबरा में भी प्राइमरी विद्यालय है। बनकटी से मथौली देवीसांड मार्केट होकर यहां पहुंचने का रास्ता है।

राम गरीब के चार पुत्र थे जगन्नाथ, राम अवतार, बैजनाथ और गीता नारायण। बैजनाथ के पुत्र रविंद्र दत्त और उनके पुत्र कौशल दत्त और उनके पुत्र रोशनी दत्त हैं ये सब अब फिजी के निवासी हैं। वहां उनके लगभग 150 परिवारी जन भी निवास कर रहे हैं।

रवि की मुहिम रंग लाई

रविंद्र दत्त कुछ लोगों को साथ लेकर तहसील और ग्राम प्रधान और सम्भ्रांत लोगों से मिलकर गांव के लोगों का सजरा खोजवाया। वे गांव के बुजुर्गों से परदादा गरीब राम के बारे में जानकारी ली और उनके परदादा के नाम कुछ जमीन भी मिली। रविन्द्र दत्त को उनके परिवार से मिलाने में काफी अहम भूमिका निभाने वाले कबरा गांव के प्रधान प्रतिनिधि रवि प्रकाश चौधरी ने बताया कि जैसे ही उन्हें पता चला कि फिजी देश से दो प्रवासी बस्ती आए है और अपने परिवार को खोज रहे है। लालगंज के पास भी एक कबरा गांव है तथा दूसरा गांव बनकटी विकास खंड में है। फोन से कोई सूत्र उस गांव का नहीं मिला। उन्होंने रविंद्र दत्त तथा उनकी पत्नी केशनी हरे को गांव को ढूंढ़ने में मदद करने के साथ-साथ उनके परिजनों को तलाशने के लिए तहसील से लगायत अन्य दस्तावेजों को खंगाला।

रवि प्रकाश ने रविन्द्र दत्त से उनके खानदान का पूरा सेजरा समझने के बाद अपने गांव के रामदत्त के पूर्व परिवार के पास गए, जहां पर चला कि इस परिवार के पास एक बहुत पुराना दस्तावेज फारसी में है, उन्होंने उसका हिन्दी अनुवाद भी करा रखा था, जिसमें सभी नाम मिलने लगे। गरीब राम के पिता रामदत्त की पुष्टि होते ही रविन्द्र दत्त और केशनी को उनका परिवार के बारे में जानकारी मिली और उनका बिछड़ा परिवार मिल गया।

रविप्रकाश  ने अथक प्रयास कर वर्षो से बिछड़ों को अपनों से मिलाया। रामदत्त के परिवार के पास ले गए और उनका बिछुड़ा परिवार मिल गया। इस दौरान पता चला कि गरीब राम के परिवार से जुड़े हुए भोला चौधरी, गोरखनाथ, विश्वनाथ, दिनेश, उमेश राम उग्रह सहित परिवार के अन्य सदस्य गरीब राम के ही खानदान के हैं।

 

जड़ों से जुड़ने हुए खुशी

गरीब राम के काबरा निवासी रिश्ते में नाती भोला चौधरी, गोरखनाथ, विश्वनाथ, दिनेश, उमेश, रामउग्रह सहित परिवार के तमाम सदस्यों से दोनों ने मुलाकात की।

रविन्द्र दत्त जब गरीब राम  के काबरा निवासी नातियों से मिले तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था, आंखों में खुशी के आंसू थे। रविन्द्र और उनकी पत्नी केशनी इस कदर खुश थे कि जैसे उन्हें अपनी खोई हुई सबसे प्रिय चीज मिल गई हो। खुशी के मारे इनकी आंखें छलक गई और ये भाव बिभोर होकर अपनों के बीच नाचने लगे। वैसे तो यह कई सालों से अपनों से मिलने के लिए बेताब रहे लेकिन अभी हाल ही में यह भारत आकर अपनी जड़ों को खोजने में कामयाब हो पाये ।

 

यादों को कैमरे में कैद

इस दौरान उन्होंने गांव का एक-एक कोना देखा तथा अपने परिवार के बारे में अन्य जानकारियां लेने के साथ-साथ बहुत सारे फोटो को यादों के रूप में कमरे में कैद किया।

विद्यालय के बच्चों के साथ कुछ पल

रवीन्द्र दत्त और उनकी पत्नी केशनी ने प्राथमिक विद्यालय के बच्चों के साथ कुछ पल बिताया और बाबा साहब की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। जिसके बाद वे उनसे मिले और फोटो को यादों के रूप में कैमरे में कैद किया।

 

वृद्धा आश्रम खोलने का वादा

फिजी में रह रहे रविंद्र दत्त बनकटी ब्लॉक के कबरा गांव में अपनों से मिलने के बाद  अपनों से विदाई लेते के वक्त उनके तथा उनकी पत्नी केशनी की आंखों से आंसू छलक आए थे तो खानदानी भी फफक पड़े। जाते वक्त पुरखों की माटी में परदादा गरीब राम के नाम वृद्धा आश्रम खोलने

की इच्छा व्यक्त की।

 

परिवार को फिजी देश आने का न्योता

रविंद्र दत्त का कहना है कि अपने पुरखों के परिवार से मिलने से उन्हें काफी हर्ष है और अब मिलने जुलने का यह सिलसिला चलता रहेगा। हम चाहेंगे कि हमारे परिवार के लोग फिजी भी टहलने आएं। रविन्द्र दत्त ने अपने परिवार को फिजी देश आने का न्योता भी दे दिया और कहा अब भारत से उनका गहरा नाता बन गया है इसलिए हर सुख दुख में वे अपने परिवार के पास आते रहेंगे।

कबरा गांव से विदाई लेने के बाद वह दिल्ली में भी रुकने की योजना थी। वहां भी खानदान के लोग रहते हैं। इनसे मेल- मिलाप के बाद 9 दिसंबर 2025 को फिजी रवाना हो गए होगे।

लेखक :आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

मकान नम्बर 8/2785, निकट लिटिल फ्लावर स्कूल, आनन्द नगर कटरा बस्ती 272001, उत्तर प्रदेश, INDIA

मोबाइल नंबर 9412300183

उस युवा जोड़े को खुश देखकर रामानंद सागर ने भी अपनी मौत को मात दे दी

वो मई 1941 का कोई दिन था। 24 साल का एक नौजवान कश्मीर के टंगमर्ग में मौजूद एक टीबी हॉस्पिटल के बिस्तर पर लेटा अपनी मौत का इंतज़ार कर रहा था। टीबी उन दिनों एक लाइलाज बीमारी हुआ करती थी। और तंगमार्ग के उस टीबी अस्पताल में भर्ती अधिकतर मरीज़ जीवित वापस नहीं जा पाते थे। वो खामोशी और उदास मन से अपनी मौत का इंतज़ार करते थे। एक दिन वो नौजवान अस्पताल की खिड़की के बाहर झांक रहा था जब उसने देखा कि एक युवा जोड़ा टीबी अस्पातल से खुशी-खुशी बाहर जा रहा था। जानकारी की तो पता चला कि वो दोनों पति-पत्नी थे उन्हें टीबी से मुक्ति मिल गई थी। और वो अपने घर वापस जा रहे थे इसलिए बहुत खुश थे।
उस जोड़े को देखकर नौजवान की आंखों में आंसू आ गए। उस नौजवान ने खुद से वादा किया कि वो भी इस अस्पताल से सेहतमंद होकर वापस अपने घर जाएगा। उस वक्त उस नौजवान को भी पता नहीं था कि उसे तो वाकई में उस मौत के घर(टीबी अस्पताल) से ज़िंदा वापस जाना है। क्योंकि ईश्वर ने उसे रामायण को टीवी के ज़रिए भारत के घर-घर में पहुंचाने के लिए दुनिया में भेजा था। उस नौजवान का नाम था रामानंद सागर।
लेकिन रामानंद सागर को टीबी लगा कैसे? रामानंद सागर के पुत्र प्रेम सागर किताब “एन एपिक लाइफ- रामानंद सागर: फ्रॉम बरसात टू रामायण” में लिखते हैं कि 19-20 साल की उम्र में लाहौर में अपने संघर्ष के दिनों में रामानंद सागर क्लैपर बॉय की हैसियत से “रेडर्स ऑफ द रेल रोड” नामक एक फिल्म में काम कर रहे थे। वो फिल्म 1936 में रिलीज़ हुई थी। उस वक्त तक टॉकी फिल्मों का निर्माण बड़े पैमाने पर शुरू हो चुका था। मगर “रेडर्स ऑफ द रेल रोड” एक साइलेंट फिल्म थी। उसकी हीरोइन थी उषा।
फिर 1940 की फिल्म कोयल में बतौर हीरो रामानंद सागर ने काम किया। उनकी हीरोइन थी नीलम। वो फिल्म रोशनलाल शौरी ने डायरेक्ट की थी। उसके बाद दलसुख पंचोली की फिल्म कृष्णा में उन्होंने अभिमन्यू का किरदार निभाया। जहां पहली फिल्म कोयल फ्लॉप हो गई। तो वहीं कृष्णा कभी रिलीज़ ही नहीं हो सकी। माना जाता है कि एक्ट्रेस नीलम को टीबी था। उन्हीं से रामानंद सागर को भी टीबी लग गया।
उस वक्त रामानंद सागर को फिल्म इंडस्ट्री में कोई कामयाबी नहीं मिल सकी। नतीजा, उनके अगले दो साल बड़े कठिनाईयों में गुज़रे। फिल्म इंडस्ट्री छोड़नी पड़ गई। फिर तो कभी रामानंद सागर ने सुनार की दुकान पर काम किया, कभी एक ऑफिस में पियोन की नौकरी की, कभी साबुन बेचने का काम किया तो कभी ट्रक क्लीनर भी बने। ये सब काम करना उनकी मजबूरी थी। इस समय तक वो शादीशुदा थे और उनके घर एक बेटा(सुभाष सागर) भी जन्म ले चुका था। ऐसे में घर चलाने के लिए पैसा तो हर हाल में चाहिए ही था। दिन में रामानंद सागर काम करते थे। और रात को पढ़ाई करते थे। वो पंजाब यूनिवर्सिटी से मुंशी फज़ल की पढ़ाई कर रहे थे। मेहनत से पढ़ाई करते थे। इसलिए गोल्ड मेडल के साथ पास हुए थे।
एक दिन रामानंद सागर ने गौर किया कि थोड़ी सी मेहनत करने पर उनकी सांस फूलने लगती है। कमज़ोरी आ जाती है। मगर उनकी चिंता बढ़ी तब जब एक दिन उन्हें खांसी में ख़ून आया। वो डॉक्टर मल्होत्रा(जो उनके फैमिली डॉक्टर थे) से मिले। डॉक्टर मल्होत्रा ने उनका एक्स-रे कराया। पता चला कि रामानंद को टीबी हो गया है। परिवार में मातम पसर गया। टीबी के मरीज़ों की जान बचने की संभावना उन दिनों बहुत कम हुआ करती थी। टीबी के चंद ही अस्पताल थे तब देश में। जिनमें से एक कश्मीर के तंगमार्ग में मौजूद था। पिता लाला दीनानाथ चोपड़ा को बेटे रामानंद को लेकर वहां जाना ही पड़ा।
रामानंद सागर के पुरखे कश्मीर से ही थे। वो कश्मीर के धनाढ्य लोगों में से थे। ज़मींदार हुआ करते थे रामानंद सागर के पुरखे, जिनकी ज़मींदारी पांच सौ एकड़ ज़मीन पर थी। कई गांव उनकी ज़मीदारी में बसे हुए थे। रामानंद सागर के पड़दादा लाला शंकर दास श्रीनगर के सबसे रईस व्यक्ति हुआ करते थे। उन्हें नगर सेठ कहा जाता था। कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह के दरबार के वो अहम व्यक्ति थे। उनके पुत्र महाराजा प्रताप सिंह के दरबार में भी उनका रुतबा था। मगर रामानंद सागर के जन्म तक उनके पुरखों की अधिकांश ज़मीनें व वैभव खत्म हो चुका था।
टीबी अस्पताल में किसी वक्त पर अपनी मृत्यु का इंतज़ार कर रहे रामानंद सागर उस दिन उस युवा जोड़े को वहां से स्वस्थ होकर जाते देख उम्मीदों से भर गए थे। उन्होंने टीबी अस्पताल के अपने तजुर्बों को एक डायरी में लिखना शुरू कर दिया। 3 सितंबर 1941 को टीबी अस्पताल में ही रामानंद सागर को अपने घर से एक चिट्ठी मिली। चिट्ठी में लिखा था,”बुधवार के दिन तुम्हारे घर एक बुद्धू पैदा हुआ है।”
दरअसल, रामानंद सागर की पत्नी लीलावती ने उनके तीसरे बेटे आनंद सागर को जन्म दिया था। ये खबर टीबी अस्पताल में भर्ती अन्य मरीज़ों को भी पता चली। और सभी ने खुशी मनाई। दुनिया के एक बड़े हिस्से में तब दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था। मगर कश्मीर के तंगमार्ग के टीबी अस्पताल(जिसे मृत्यु का घर भी कहा जाता था।) में अपने साथी मरीज़ के घर बेटा पैदा होने की खुशी मनाई जा रही थी।
इलाज करा रहे कई लोग अस्पताल के पास के इलाकों में मौजूद गन्ने व मक्का के खेतों में गए। सभी ने अपने शरीर को कंबल से अच्छी तरह ढक रखा था। खेत में ही एक जगह आग जलाई गई और भुट्टे तोड़कर उन्हें भूना गया। गन्ने चबाए गए। इस तरह रामानंद सागर के तीसरे बेटे(सुभाष सागर व शांति सागर के बाद आनंद सागर का जन्म हुआ था।) के जन्म की खुशियां मनाई गई।
आज 12 दिसंबर को रामानंद सागर जी की पुण्यतिथि है। साल 2005 में आज ही के दिन रामानंद सागर जी का देहांत हुआ था। यानि आज 20 साल हो गए रामानंद सागर जी को इस दुनिया से गए।
नोट- ये पूरी कहानी रामानंद सागर जी के पुत्र प्रेम सागर जी द्वारा लिखित पुस्तक “एन एपिक लाइफ- रामानंद सागर: फ्रॉम बरसात टू रामायण” से ली गई है। प्रेम सागर जी भी अब इस दुनिया में नहीं रहे। इसी साल 31 अगस्त को प्रेम सागर जी का देहांत हो गया था। किस्सा टीवी उन्हें भी नमन करता है। #ramanandsagar #Premsagar

साभार- https://www.facebook.com/share/p/1AMh4J6tsi/ से

बाल मन भी मचल उठा कंप्यूटर पर खेलने के लिए – डॉ. वैदेही गौतम की पहल

कोटा से 30 किलोमीटर दूर छोटा से गांव का राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय । दृश्य था छोटी – छोटी बच्चियाँ कंप्यूटर कक्ष के बाहर कतार में लगी थी। जिज्ञासा वश एक बालिका से पूछ लिया तुम्हारा नाम क्या हैं ? बोली मेरा नाम आशिया है। फिर प्रश्न किया बिटिया यहां क्यों खड़े हो तुम  ? बोली हम यहां कंप्यूटर पर खेलते हैं। मुझे विद्यालय अवलोकन करवाने साथ गई प्रधानाचार्या डॉ. वैदेही गौतम ने बताया , ” हमारे विद्यालय में कंप्यूटर शिक्षा है। आपने कोटा में बच्चों को साहित्य से जोड़ने के लिए मिशन बाल मन चला रखा है। मैंने कुछ समय पूर्व यहां चार्ज संभाला है। मैने सोचा आज कम्प्यूटर भी साहित्य का अभिन्न हिस्सा बन गया है तो छोटी – छोटी बच्चियों  को भी क्यों न इस से जोड़ा जाए। यह विचार आया तो बच्चें प्रेरित हुए और इन कक्षा 3 की बच्चियों की कुछ ही समय में कंप्यूटर से दोस्ती हो गई है।
हमारी बात चल रही थी, इस बीच कंप्यूटर सीखने वाली टीचर गायत्री सुमन भी पास आ गई। मैंने उनको कहा चलो बच्चियों को कंप्यूटर पर बैठाओ देखते हैं क्या करती हैं ? अब क्या था कतार में खड़ी बच्चियां आगे बढ़ी और कंप्यूटर के सामने बैठ गई। अल्प समय में सीखे ज्ञान से उन्होंने नीचे झुक कर सीपीयू  का बटन दबा कर स्क्रीन चालू कर लिया। देखते – देखते देवा, अंतिमा, इशिका ने तो कमांड दे कर गेम खोल लिया और खेलना शुरू कर दिया। कृष्णा,हेमलता,आशिया को टीचर में कमांड दे कर आगे बढ़ने को कहा। कुछ बच्चियाँ वहीं कक्ष के मध्य बिछावन पर बैठ कर इन सब को देखने लगी।
नन्हीं-नन्हीं बच्चियों के नन्हें-नन्हें हाथ की बोर्ड पर मचल रहे थे और वे गेम खेलने लगे। मेरे मुंह से निकल पड़ा, वाह वैदेही जी बहुत खूब , खेल का खेल और इस उम्र में तकनीक से बच्चियों को जोड़ने की पहल।
सीढ़ियां उतर कर नीचे आए । कुछ ही देर में बच्चियाँ को मध्यान्ह पोषाहार परोसा गया। यह देख मेरे मन का जन संपर्क अधिकारी जाग उठा जब मैं विद्यालयों में बड़े अधिकारियों के साथ पोषाहार निरीक्षण के लिए जाता था। वैदेही जी से कहा मुझे भी पोषाहार चखाएं , देखता हूं यहां बच्चियों को कैसा भोजन दिया जाता है ?
पोषाहार पकाने वाली रेखा जी ने मुझे एक थाली में रोटी , दाल और रसे की आलू की सब्जी परोस दी।  पोषाहार चखा तो उसकी उसकी गुणवत्ता से गदगद हो गया। रेखा ने बताया साहब हम तो अपने बच्चे समझ कर अच्छे से पकाते हैं। हर दिन बदल-बदल कर मीनू के अनुसार पोषाहार बनाते हैं । जब से ये मैडम आई हैं पूरा ध्यान देती हैं और कहती है इन्हें अपने घर की बच्चियाँ समझें।
विद्यालय बहुत बड़ा नहीं पर दुमंजिला और साफ सुथरा है। भवन निर्माण में गढ़ेपान कंपनी का सहयोग प्राप्त हुआ है। यहां 350 बच्चियाँ शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। अधिकांश बच्चियाँ आर्थिक दृष्टि से कमजोर परिवारों की हैं। इन बच्चियों को साहित्य, संस्कृति और तकनीक से जोड़ने के वैदेही जी प्रयासरत हैं।
 आपके मन में विचार आना स्वाभाविक है मैं अचानक 10 दिसंबर को इस विद्यालय में कैसे पहुंच गया। प्रयोजन था मिशन बाल मन तक अभियान के समापन कार्यक्रम की रूपरेखा को अंतिम रूप प्रदान करना। कार्यक्रम पर विस्तार से विचार विमर्श हुआ, स्थान देखा और तय हुआ कि विद्यालय के सहयोग से 15 दिसंबर को परिसर में समापन कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। समारोह का नाम करण ” बाल रंगोत्सव ” तय किया गया।
डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
– डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार,कोटा

ये आकाशवाणी का उज्जैन केन्द्र है… मैं डॉ. मोहन यादव बोल रहा हूँ

ये आकाशवाणी का उज्जैन केन्द्र है… मैं डॉ. मोहन यादव बोल रहा हूँ.. यह उद्घोषणा सुनने में रूटीन सा लगता है लेकिन मध्यप्रदेश के लिए यह आवाज अहम है. जब देश भर में भारत सरकार आकाशवाणी केन्द्रों को समेट रही है तब उज्जैन में आकाशवाणी केन्द्र का आरंभ होना एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर गिना जाएगा. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन  यादव के अथक प्रयासों का सुपरिणाम है कि उज्जैन में आकाशवाणी केन्द्र को ना केवल मंजूरी मिली बल्कि अल्प समय में इसका प्रसारण शुरू हो गया. पूर्ववर्ती सरकारों से तुलना करें तो मध्यप्रदेश के कई आकाशवाणी केन्द्रों का आकार सीमित कर दिया गया है या बंद कर दिया गया है लेकिन इस पर कोई पहल नहीं की गई, तब मुख्यमंत्री डॉ. यादव की पहल ऐतिहासिक माना जाएगा. लगभग एक सप्ताह पश्चात जब डॉ. मोहन यादव के दो वर्ष के कार्यकाल की समीक्षा की जाएगी कि इन दो साल में प्रदेश की क्या उपलब्धि रही या क्या खोया तब ऐसे अनछुए कार्य उनके खाते में गिने जाएंगे. सामाजिक समरसता के साथ सामाजिक सद्भाव के साथ नवाचार के लिए मोहन सरकार ने स्वयं को रेखांकित किया है. कई मिथकों को तोड़ते हुए अनेक नए आयाम छूूने की कोशिश में डॉ. मोहन यादव आगे निकल गए हैं.

13 दिसम्बर, 2023 को जब डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो राजनीतिक विश्लेषकों के साथ स्वयं डॉ. यादव चौंक गए थे. वे कहते हैं कि उन्होंने कभी भी ऐसी बड़ी जवाबदारी के लिए खुद को तैयार नहीं किया था और ना ही उनकी अपेक्षा थी लेकिन जो कुछ होता है, वह भाग्य में लिखा होता है और इसे मंजूर भी करना पड़ता है. इसके बाद वे कहते हैं कि इससे आगे इस जिम्मेदारी के भरोसे को जितना सबसे बड़ी चुनौती होती है. बेशक, जैसी कामयाबी की उम्मीद उनसे हो, वह पूरी ना हो पायी हो लेकिन किसी भी मोर्चे पर वे असफल नहीं दिखते हैं. अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की तरह उनके काम करने का तरीका और सोच अलग था. वे परम्परागत सोच से बाहर नवाचार पर जोर देते रहे. आज जब पूरी दुनिया एआई के नक्शे पर है, डिजीटली दुनिया हो चुकी है तो वे अपने मध्यप्रदेश को भी इसी के साथ चलाने की मंशा रखते हैं. उनके कार्यकाल का संभवत: पहला प्रयोग साइबर तहसील का था. देश में पहली बार यह प्रयोग किया गया और जो जिस तहसील में है, उसके कार्य वही निपटा दिए गए. राजधानी या मुख्यालय की गणेश परिक्रमा से मुक्त कर दिया गया. यही कार्य उन्होंने संपदा-2 में किया. जमीन-जायदाद के मामले घर बैठे निपटने लगे. रजिस्ट्री से नामांकन तक की प्रक्रिया सहजता से आम आदमी का होनेे लगा. कुछ तकनीकी दिक्कत शुरू में आती है, सो आयी लेकिन बाद के दिनों में सहजता से आम आदमी का काम होने लगा.
रघुकुलवंश की ‘प्राण जाए पर वचन ना जाए’ कि भाँति उन्होंने लाडली बहनों से किया गया वायदा पूरा किया. नियत तय तारीख पर उन्हें बढ़ी हुई स्वाभिमान राशि बहनों के खाते में 1500 रुपये ट्रांसफर कर उनका भरोसा जीत लिया. विपक्ष तो उन्हें कटघरे में कटघरे में खड़ा कर ही रहा था, अपने भी उनके खिलाफ हो चले थे लेकिन वे अपनी नियत योजनाओं को मूर्त रूप देने में लगे रहे. सबका साथ, सबका विकास के तर्ज पर उन्होंने दशकों से उदास रूठे सैकड़ों मजदूरों के जीवन में खुशी की दस्तक देने में वक्त नहीं गंवाया. हुकूमचंद कपड़ा मिल इंदौर के सैकड़ों मजदूर अपना अधिकार पाने के लिए परेशानहाल थे जिन्हें मोहन सरकार ने राहत दी. डॉ. मोहन के नेतृत्व वाली सरकार ने प्रदेश के सभी मिलों का परीक्षण किया जा रहा है ताकि मजदूर परिवारों को राहत मिल सके. यह भी शायद पहली-पहली बार हो रहा है क्योंकि उनके पूर्ववर्ती सरकारों ने ऐसा कुछ नहीं किया था. किसान, महिला, पिछड़ा, आदिवासी वर्गों के लिए नित नए कल्याणकारी योजनाओं का आगाज हो रहा है. यह अतिशयोक्ति नहीं है बल्कि हकीकतबयानी है जो बीते दो वर्ष में हुआ और हो रहा है.
मध्यप्रदेश शांति का टापू कहलाता है और इस पर एक बार फिर डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मुहर लग गई है. स्मरण रहे कि उज्जैन नगर विकास के लिए अनेक धर्मस्थलों को हटाया जाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था लेकिन डॉ. मोहन यादव की सूझबूझ और समरसता के प्रयासों से यह कार्य भी सरलता से पूर्ण हो गया. यह संभवत: देश का पहला मसला रहा होगा जब बिना किसी हो-हल्ला यह काम पूर्ण हो गया. सनातनी परम्परा को एक नया आयाम देने के लिए डॉ. मोहन यादव ने प्रदेश के समस्त धर्मस्थलों को नवीन स्वरूप देने का प्रयास किया. इसी क्रम में मध्यप्रदेश में होने वाले प्रतिष्ठित सिंहस्थ के लिए लैंड पुलिंग एवं ममलेश्वर लोक निर्माण का प्रस्ताव सरकार ने किया था लेकिन विरोध के बाद सरकार ने पूरी सह्दयता के साथ दोनों ही प्रस्ताव को वापस कर लिया.
 सरकार को घेरने के इरादे से इसे बैकफुट पर जाना कहा गया लेकिन सत्यता है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन सरकार का यह फैसला बेकअप देना था. वे कोई भी फैसला जनमानस के समर्थन के बिना नहीं लेते हैं और लैंड पुलिंग तथा ममलेश्वर के मामले को इसी संदर्भ में देखा और समझा जाना चाहिए. वे सीधी बात पर यकीन करते हैं और ऑन द स्पॉट फैसला लेते हैं. इसलिए उनके लिए कहा गया-नो बकवास, सीधी बात. अपराधों के खिलाफ उनका रूख निर्मम प्रशासक का है तो आम आदमी के साथ संवेदनशील होना डॉ. मोहन यादव का गुण है. दो वर्ष का कार्यकाल बहुत छोटा होता है, खासतौर पर मध्यप्रदेश जैसे बड़े भौगोलिक प्रदेश के लिए लेकिन देखा जाए तो अनेक फैसलों ने अमलीजामा पहन लिया और आने वाले समय में परिणाम देखने को मिलेगा. डॉ. मोहन यादव के लिए विपक्ष तो परेशानी का सबब है ही, अपनों का साथ भी नहीं मिल पा रहा है. बावजूद इसके महाकाल के बेटे डॉ. मोहन यादव नित नयी कामयाबी गढ़ रहे हैं.
उन्होंने दशकों से स्थापित इस मिथक को चटका दिया है जिसमें कहा जाता था कि उज्जैन का राजा महाकाल है और कोई राजा उज्जैन में नहीं रूक सकता है. इस मिथक को दोहराने वाले भूल गए थे कि डॉ. मोहन यादव राजा नहीं, शासक नहीं अपितु महाकाल के बेटे हैं और महाकाल का उन पर आशीष है. नवीन मध्यप्रदेश से प्रवीण मध्यप्रदेश की ओर डॉ. मोहन सरकार की सवारी चल पड़ी है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबंद्ध हैं)

पाकिस्तान से आए 195 हिंदू परिवारों को गुजरात में नागरिकता मिली

गुजरात के अहमदाबाद में आयोजित एक खास कार्यक्रम में पाकिस्तान से आए कुल 195 हिंदू शरणार्थियों को भारत की नागरिकता प्रदान की गई। यह दिन उन परिवारों के लिए बेहद खास और भावुक रहा, जो लंबे समय से भारत में रह रहे थे।

इस कार्यक्रम में गुजरात के डिप्टी सीएम हर्ष संघवी और नगरीय विकास राज्यमंत्री दर्शनाबेन वाघेला मौजूद रहे। इन 195 लोगों में से 122 लोगों को नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत भारतीय नागरिकता मिली। 73 लोगों के आवेदन को जिला कलेक्टर कार्यालय ने मौजूदा नियमों के तहत मंज़ूरी दी।

डिप्टी सीएम हर्ष संघवी ने इस मौके पर कहा कि ‘एक साथ 195 लोगों को नागरिकता मिलना एक ऐसा दृश्य है जो अन्य राज्यों में कम ही देखने को मिलता है।’ उन्होंने कहा कि जो लोग वर्षों की कठिनाइयों के बाद भारत आए हैं, वे अब देश के विकास में सक्रिय रूप से हिस्सा ले सकेंगे। संघवी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का आभार जताया। उन्होंने कहा कि CAA के कारण पड़ोसी देशों में उत्पीड़न झेल रहे अल्पसंख्यकों को सम्मानजनक जीवन मिल रहा है।

डिप्टी सीएम ने अहमदाबाद जिला प्रशासन की तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि प्रशासन वर्षों से भारत में रह रहे वैध आवेदकों की फाइलों को तेजी से निपटा रहा है और उन्हें नागरिकता प्रमाणपत्र दिलाने में लगातार काम कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जिन लोगों को नागरिकता मिली है, उनमें स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ महेश पुरोहित भी शामिल हैं, जो साल 1956 से भारत में रह रहे थे।

सोशल मीडिया का बढ़ता वर्चस्व और खोता हुआ बचपन

पिछले एक दशक में जिस सोशल मीडिया को आधुनिकता की उपलब्धि, अभिव्यक्ति की आजादी और वैश्विक संपर्क का सबसे बड़ा माध्यम माना गया था, उसी सोशल मीडिया ने अब अपने छिपे डरावने एवं वीभत्स चेहरे दिखाने शुरू कर दिए हैं। पश्चिमी देश, जो कल तक इसके गुणगान करते नहीं थकते थे, अब उसके दुष्परिणामों से भयभीत होने लगे हैं। यह भय यूं ही नहीं है-अनेक देशों में बच्चों की आत्महत्याओं, हिंसक व्यवहार, मानसिक विकारों, नशे जैसे डिजिटल व्यसनों और सामाजिक विकृतियों के बढ़ते आंकड़ों ने सोशल मीडिया की वास्तविकता का पर्दाफाश किया है।

इसी पृष्ठभूमि में आस्ट्रेलिया की सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाकर विश्व-समुदाय को चेताया भी है और झकझोर भी दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया कंपनियों से वह अधिकार वापस ले लिए हैं, जिनके दुरुपयोग ने बच्चों के जीवन और अभिभावकों की मानसिक शांति को संकट में डाल दिया था। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह सुधार बच्चों को ‘बचपन जीने का अधिकार’ लौटाने के लिए है-उन जिंदगियों को नया मोड़ देने के लिए है जो सोशल मीडिया ने समय से पहले वयस्कता, अस्वस्थता, तनाव और विकृतियों में धकेल दी थीं। इतना ही नहीं, 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के अकाउंट नहीं हटाने पर लगभग पाँच करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान देश का रुख साफ करता है कि अब बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इस पहल के बाद पश्चिमी जगत में सुगबुगाहट बढ़ी है। ब्रिटेन से लेकर अमेरिका तक सवाल उठ रहे हैं कि यदि ऑस्ट्रेलिया यह साहस दिखा सकता है तो वे क्यों नहीं? यह सुगबुगाहट केवल सरकारों में ही नहीं है-उन अभिभावकों में भी है जिन्होंने सोशल मीडिया को अपने बच्चों की आत्महत्या, अवसाद और चरित्र-भंग का मूल कारण मानना शुरू कर दिया है। वास्तव में, इस संकट की शुरुआत तब हुई जब सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्मों ने बच्चों को आकर्षित करने के लिए ऐसे एल्गोरिद्म बनाए, जो उनका अधिकतम समय खाएं, उनकी जिज्ञासाओं को उकसाएं और उनके भीतर छिपी संवेदनशीलता का दोहन करके उन्हें सोशल मीडिया निर्भरता की स्थिति तक ले जाएं। इन प्लेटफॉर्मों पर वयस्क सामग्री, द्विअर्थी वीडियोज, हिंसक गेम्स, ‘लाइक-फॉलोअर’ जैसे डिजिटल भ्रमों का ऐसा सैलाब है जिसने बच्चों की मनोवैज्ञानिक संरचना को गहरी चोट पहुंचाई है। नतीजा यह है कि आज बच्चे समय से पहले वयस्क हो रहे हैं-शरीर से नहीं, मानसिकता से।
भारतीय परिवार-व्यवस्था, संस्कार और मूल्य-व्यवस्था इस संकट की चपेट में और तेजी से आए हैं। पहले जहां बच्चे माता-पिता, शिक्षक और संस्कारों से सीखते थे, आज वे ‘रील्स’ और ‘शॉर्ट वीडियोज’ एवं अश्लील सामग्री से सीख रहे हैं। जो सामग्री उनके सामने आ रही है, वह न भारतीय चरित्र से मेल खाती है न जीवन-मूल्यों से। निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा तैयार ये सामग्री बच्चों के मन में गलत आदर्श, गलत नायक और गलत आकांक्षाएं भर रही है। सवाल यह है कि क्या बच्चे स्वयं सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर रहे हैं, या सोशल मीडिया उन्हें एक सुनियोजित तरीके से अपनी गिरफ्त में ले रहा है? सच्चाई का उत्तर दूसरा है। इन प्लेटफॉर्मों पर अमर्यादित सामग्री की भरमार है-जिसे देखकर किशोरों में अपराधी प्रवृत्तियों की ओर उन्मुखता बढ़ रही है। ब्रह्मचर्य, संयम, अनुशासन और चरित्र जैसे भारतीय मूल्य हाशिये पर जा रहे हैं। इसके साथ-साथ एक गंभीर स्वास्थ्य-संकट जन्म ले रहा है। घंटों मोबाइल पकड़े बैठने से बच्चे शारीरिक सक्रियता से दूर हो रहे हैं। मोटापा, नींद की कमी, सिरदर्द, रीढ़ संबंधी विकार और यहां तक कि किशोरावस्था में मधुमेह जैसे रोगों के मामले बढ़ रहे हैं।
मानसिक रूप से स्थिति और भी भयावह है। लगातार स्क्रॉल करने की आदत बच्चों की एकाग्रता को चकनाचूर कर रही है। शिक्षा पर इसका सीधा दुष्प्रभाव दिखाई दे रहा है। जो बच्चे घंटों कल्पना-लोक में विचरण करते हैं, वे वास्तविकताओं से जूझते समय टूटने-बिखरने लगते हैं। उनकी सहनशक्ति कम हो रही है, आत्मविश्वास टूट रहा है, और असफलताओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ रही है-जो कई बार आत्महत्या जैसी भयावह प्रवृत्तियों को जन्म देती है। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। ऑनलाइन बुलिंग, ऑनलाइन ठगी, व्यभिचार से जुड़ी सामग्री, गुमराह करने वाले ‘इन्फ्लुएंसर’, फर्जी पहचान, ऑनलाइन हिंसा और डिजिटल व्यसन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कई बार बच्चे अपराधों में नहीं, बल्कि अपराधों के शिकार के रूप में फंसते हैं-लेकिन उन्हें बचाने वाला कोई नहीं दिखता। सोशल मीडिया कंपनियों का रवैया लापरवाह रहा है, क्योंकि उनका लक्ष्य बच्चों की सुरक्षा नहीं, बच्चों का उपयोग करके मुनाफा कमाना है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत में भी ऑस्ट्रेलिया जैसे कठोर कदम उठाए जाने चाहिए? उत्तर है-बिल्कुल होना चाहिए। और वह भी तुरंत।
भारत की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा किशोरों और युवाओं का है। यदि यह पीढ़ी सोशल मीडिया के अंधाधुंध प्रभाव में ढल गई, तो भविष्य में हमें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। भारत की वह पहचान, जहां दुनिया भर में भारतीय प्रतिभा, अनुशासन और बुद्धिमत्ता की मिसाल दी जाती थी, वह धूमिल पड़ने लगेगी। यह संकट केवल सरकार का नहीं है-यह समाज, विद्यालयों, अभिभावकों और मीडिया-संस्थानों का संयुक्त संकट है। अभिभावकों को बच्चों को मोबाइल देना उनकी ‘मांग’ समझ में आता है, लेकिन उनको दिशा देना उनका कर्तव्य है। विद्यालयों को बच्चों को डिजिटल शिष्टाचार, डिजिटल योग्यता और डिजिटल अनुशासन के बारे में शिक्षित करना चाहिए। सरकार को सामाजिक जिम्मेदारी के साथ ऐसे नियम बनाने चाहिए, जिनमें सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बनाना पड़े। ऑस्ट्रेलिया ने यह कर दिखाया। और दुनिया सहम गई। अब बारी भारत और अन्य देशों की है। क्योंकि बच्चों का बचपन सिर्फ उनका अधिकार नहीं-पूरे समाज का भविष्य है।
यदि यह बचपन सोशल मीडिया के हाथों बर्बाद होता रहा, तो आने वाले दौर में जो विकृतियां जन्म लेंगी, वे केवल सामाजिक नहीं, राष्ट्रीय संकट बन जाएंगी। यह समय निर्णायक है। थोड़ी-सी भी देर-और समाज को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। ऑस्ट्रेलियाई पहल ने दुनिया को एक संदेश दे दिया है कि बच्चों को बचाने का समय अब आ गया है। भारत को भी साहसिक कदम उठाकर यह साबित करना होगा कि वह डिजिटल युग के दुष्परिणामों को समझता है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, स्वस्थ और संस्कारित वातावरण तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है। बचपन को बचाइए-क्योंकि यही वह आधार है जिस पर समाज, संस्कृति और सभ्यता खड़ी होती है। और यदि यह आधार कमजोर पड़ गया, तो भविष्य की कोई भी इमारत स्थायी नहीं रह सकती।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज,
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

द अल्काईन वाटर कंपनी इंक ने रणनीतिक सलाहकार समझौता किया

ग्लेनडेल, एरिज़ोना, संयुक्त राज्य अमेरिका

प्रीमियम एल्केलाइन जल की अग्रणी उत्पादक The Alkaline Water Company, Inc. (OTCID:WTER) ने आज घोषणा की कि उसने The Bitcoin Group के साथ एक रणनीतिक सलाहकार समझौता किया है। The Bitcoin Group ब्लॉकचेन इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल एसेट मैनेजमेंट में एक मान्यता प्राप्त लीडर है। यह साझेदारी WTER के लिए एक अनुपालन-युक्त और तकनीकी रूप से मजबूत डिजिटल एसेट ट्रेजरी रणनीति के विकास का समर्थन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
समझौते के तहत The Bitcoin Group एक बिटकॉइन-संरेखित (Bitcoin-aligned) ट्रेजरी ढांचे की संरचना और कार्यान्वयन पर सलाह देगा। इसका उद्देश्य बैलेंस-शीट के लचीलेपन को बढ़ाना, पूंजी आवंटन में विविधता लाना और WTER को कार्यात्मक पेय (functional beverage) क्षेत्र के भीतर उभरते डिजिटल-एसेट वित्तपोषण तंत्र का लाभ उठाने के लिए तैयार करना है।
सलाहकार सेवाओं का दायरा

The Bitcoin Group कई प्रमुख क्षेत्रों में WTER को विशेष विशेषज्ञता प्रदान करेगा:

  • डिजिटल ट्रेजरी आर्किटेक्चर: सुरक्षित, ऑडिट योग्य और अनुपालन-युक्त संपत्ति प्रबंधन के लिए एक रणनीतिक बिटकॉइन आवंटन मॉडल, मल्टी-सिग्नेचर कस्टडी प्रोटोकॉल और एकीकृत रिपोर्टिंग सिस्टम का विकास।
  • नियामक और जोखिम नियंत्रण: SEC और FINRA-संरेखित अनुपालन प्रक्रियाओं का कार्यान्वयन, जिसमें सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाले जारीकर्ता (issuer) के लिए उपयुक्त शासन (governance), कस्टडी सुरक्षा उपाय, मूल्यांकन मानक और अस्थिरता-शमन तंत्र शामिल हैं।
  • वित्तपोषण और पूंजी संरचना नवाचार: परिचालन वृद्धि का समर्थन करने और पारंपरिक ऋण सुविधाओं पर निर्भरता कम करने के लिए ब्लॉकचेन-आधारित पूंजी समाधानों का मूल्यांकन, जैसे कि टोकेनाइज्ड रियल-वर्ल्ड एसेट्स (RWA), उत्पादन-लिंक्ड डिजिटल उपकरण और अन्य ब्लॉकचेन-सक्षम वित्तपोषण संरचनाएं।
  • बाजार अवसंरचना कनेक्टिविटी: व्यापक डिजिटल एसेट पारिस्थितिकी तंत्र के साथ सुरक्षित एकीकरण सुनिश्चित करने के लिए विनियमित RWA प्लेटफार्मों और संस्थागत-ग्रेड कस्टडी तथा तरलता (liquidity) नेटवर्क के साथ साझेदारी का मूल्यांकन।

The Alkaline Water Company के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), Ricky Wright ने कहा, “यह साझेदारी दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता को अनुकूलित करने और नवीन कैपिटल बाजारों तक हमारी पहुंच का विस्तार करने के हमारे उद्देश्य का समर्थन करता है। The Bitcoin Group गहरी तकनीकी और नियामक विशेषज्ञता लाता है जो हमें हमारे परिचालन लक्ष्यों और शेयरधारक हितों के अनुरूप एक डिजिटल एसेट ट्रेजरी रणनीति का मूल्यांकन और कार्यान्वयन करने में मदद करेगा।”
The Alkaline Water Company, Inc. के बारे में

2012 में स्थापित और ग्लेनडेल, एरिज़ोना में मुख्यालय वाली, The Alkaline Water Company, Inc. (OTCID:WTER) 8.8 pH प्रोफाइल देने के लिए मालिकाना इलेक्ट्रोलिसिस तकनीक और हिमालयन रॉक सॉल्ट का उपयोग करके प्रीमियम बोतलबंद क्षारीय पानी उत्पादों का विकास, निर्माण और वितरण करती है। कंपनी उत्तरी अमेरिका में प्रमुख खुदरा चैनलों पर काम करती है और टिकाऊ पैकेजिंग, परिचालन दक्षता और कार्यात्मक पेय नवाचार के लिए प्रतिबद्ध है।
The Bitcoin Group के बारे में

2014 से, Bitcoin Group डिजिटल एसेट ट्रेजरी मैनेजमेंट में अग्रणी रहा है, जिसने सार्वजनिक कंपनी की बैलेंस शीट में उच्च प्रदर्शन वाली ब्लॉकचेन संपत्तियों को एकीकृत करने के लिए एक सिद्ध ढांचा तैयार किया है। तेजी से विकसित हो रहे डिजिटल एसेट सेक्टर में संस्थागत अनुशासन लाकर, Bitcoin Group संगठनों को एंटरप्राइज़ मूल्य को भविष्य के लिए सुरक्षित (future-proof) करने, विकास के नए अवसरों को अनलॉक करने और अपने उद्योगों के भीतर नवप्रवर्तनकर्ताओं के रूप में अपनी स्थिति सुरक्षित करने में सक्षम बनाता है। एक दशक से अधिक की विशेष विशेषज्ञता के साथ, Bitcoin Group ने कॉर्पोरेट ब्लॉकचेन अपनाने में एक रणनीतिक लीडर के रूप में खुद को स्थापित किया है—जो आगे की सोच रखने वाली कंपनियों को विश्वास, अनुपालन और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ डिजिटल संपत्तियों का लाभ उठाने में मदद करता है।
एक अद्वितीय मिशन द्वारा निर्देशित, Bitcoin Group ब्लॉकचेन का BlackRock बनने के लिए अपनी क्षमताओं को बढ़ा रहा है: डिजिटल एसेट रणनीति के लिए विश्वसनीय, संस्थागत-ग्रेड भागीदार। कठोर कार्यप्रणाली, गहरी बाजार अंतर्दृष्टि और पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्धता के माध्यम से, Bitcoin Group ब्लॉकचेन युग में कॉर्पोरेट ट्रेजरी रणनीति के भविष्य को आकार दे रहा है।
The Bitcoin Group के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, Wesley Blom ने कहा, “हम गहरी तकनीकी, नियामक और संस्थागत-ग्रेड डिजिटल एसेट विशेषज्ञता लाते हैं जो आधुनिक ट्रेजरी रणनीति का मूल्यांकन और कार्यान्वयन करते समय महत्वपूर्ण होगी। हमारी विशेषज्ञता हमें अनुशासित, अनुपालन-युक्त और हमारे परिचालन उद्देश्यों तथा शेयरधारकों के लिए मूल्य प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धता के अनुरूप तरीके से डिजिटल एसेट एकीकरण का पता लगाने की अनुमति देगी।”
भविष्य-उन्मुख जानकारी (FORWARD-LOOKING INFORMATION)

इस प्रेस विज्ञप्ति में दी गई कुछ जानकारी में लागू प्रतिभूति कानूनों के अर्थ के भीतर “भविष्य-उन्मुख जानकारी” शामिल है, जिसमें “भविष्य-उन्मुख वित्तीय जानकारी” और “वित्तीय दृष्टिकोण” शामिल हैं (जिन्हें यहाँ सामूहिक रूप से भविष्य-उन्मुख कथन कहा गया है)। ऐतिहासिक तथ्य के बयानों को छोड़कर, यहाँ निहित जानकारी भविष्य-उन्मुख बयानों का गठन करती है और इसमें शामिल है, लेकिन यह सीमित नहीं है: (i) कंपनी का अनुमानित वित्तीय प्रदर्शन; (ii) इसके तहत पेश किए जा रहे शेयरों की बिक्री से प्राप्त आय का पूरा होना और उपयोग; (iii) कंपनी के व्यवसाय, परियोजनाओं और संयुक्त उद्यमों का अपेक्षित विकास; (iv) भविष्य की विलय और अधिग्रहण (M&A) गतिविधि और वैश्विक विकास के संबंध में कंपनी के दृष्टिकोण और विकास रणनीति का निष्पादन; (v) कंपनी की परियोजनाओं के लिए तीसरे पक्ष के वित्तपोषण के स्रोत और उपलब्धता; (vi) कंपनी की उन परियोजनाओं का पूरा होना जो वर्तमान में चल रही हैं, विकास में हैं या अन्यथा विचाराधीन हैं; (vii) कंपनी के वर्तमान ग्राहक, आपूर्तिकर्ता और अन्य सामग्री समझौतों का नवीनीकरण; और (viii) भविष्य की तरलता, कार्यशील पूंजी और पूंजी आवश्यकताएं।
संभावित निवेशकों को भविष्य के संबंध में प्रबंधन की मान्यताओं और राय को समझने का अवसर देने के लिए भविष्य-उन्मुख बयान प्रदान किए जाते हैं ताकि वे निवेश का मूल्यांकन करने में एक कारक के रूप में ऐसी मान्यताओं और राय का उपयोग कर सकें। ये कथन भविष्य के प्रदर्शन की गारंटी नहीं हैं और उन पर अनुचित भरोसा नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे भविष्य-उन्मुख बयानों में आवश्यक रूप से ज्ञात और अज्ञात जोखिम और अनिश्चितताएं शामिल होती हैं, जो भविष्य की अवधि में वास्तविक प्रदर्शन और वित्तीय परिणामों को ऐसे भविष्य-उन्मुख बयानों द्वारा व्यक्त या निहित भविष्य के प्रदर्शन या परिणामों के किसी भी अनुमान से भौतिक रूप से भिन्न होने का कारण बन सकती हैं।
हालाँकि इस प्रस्तुति में निहित भविष्य-उन्मुख बयान इस बात पर आधारित हैं कि कंपनी का प्रबंधन क्या उचित मानता है, लेकिन इस बात का कोई आश्वासन नहीं हो सकता है कि भविष्य-उन्मुख बयान सटीक साबित होंगे, क्योंकि वास्तविक परिणाम और भविष्य की घटनाएं ऐसे बयानों में प्रत्याशित से भौतिक रूप से भिन्न हो सकती हैं। कंपनी भविष्य-उन्मुख बयानों को अपडेट करने के लिए कोई दायित्व नहीं लेती है यदि परिस्थितियां या प्रबंधन के अनुमान या राय बदलते हैं, सिवाय इसके कि लागू प्रतिभूति कानूनों द्वारा आवश्यक हो। पाठक को चेतावनी दी जाती है कि वे भविष्य-उन्मुख बयानों पर अनुचित भरोसा न करें।
संयुक्त राज्य प्रतिभूति और विनिमय आयोग (SEC) ने जारीकर्ताओं को महत्वपूर्ण गैर-सार्वजनिक जानकारी का खुलासा करने के लिए सोशल मीडिया के उपयोग के संबंध में मार्गदर्शन प्रदान किया है। इस संबंध में, निवेशकों और अन्य लोगों को ध्यान देना चाहिए कि हम SEC फाइलिंग, प्रेस विज्ञप्ति, सार्वजनिक सम्मेलन कॉल और वेबकास्ट के अलावा, अपनी कंपनी की वेबसाइट, www.LelantosHoldings.io पर महत्वपूर्ण वित्तीय जानकारी की घोषणा करते हैं। हम अपनी कंपनी, हमारी सेवाओं और अन्य मुद्दों के बारे में जनता के साथ संवाद करने के लिए सोशल मीडिया का भी उपयोग करते हैं। यह संभव है कि हम सोशल मीडिया पर जो जानकारी पोस्ट करते हैं उसे महत्वपूर्ण जानकारी माना जा सकता है। इसलिए, SEC के मार्गदर्शन के आलोक में, हम निवेशकों, मीडिया और हमारी कंपनी में रुचि रखने वाले अन्य लोगों को कंपनी की वेबसाइट पर हमारे द्वारा पोस्ट की गई जानकारी की समीक्षा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
निवेशक संबंध (Investor Relations)

The Alkaline Water Company Inc. 5524 North 51st Avenue Glendale, Arizona 85301 टेलीफोन: 480-582-3600 वेबसाइट: www.thealkalinewaterco.com ईमेल: ir@thealkalinewaterco.com.

यातायात जागरुकता’ के लिए किया छात्रों से संवाद, कई छात्र बनें ट्रैफ़िक प्रहरी

इन्दौर। शहर की यातायात समस्याओं से छात्रों को परिचित करवाते हुए यातायात पुलिस व ख़बर हलचल न्यूज़ द्वारा प.म. ब. गुजराती वाणिज्य महाविद्यालय छात्र संवाद का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में यातायात आरक्षक सुमंत सिंह काछवा, सम्पादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’, सामाजिक कार्यकर्ता सौरव गौसर, महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. दिनेश माहेश्वरी, विभागाध्यक्ष मिलिंद कोठारी, एनएसएस कार्यक्रम अधिकारी डॉ. दीपक शर्मा का आतिथ्य रहा।
सुमंत सिंह ने संबोधित करते हुए कहा कि ‘यातायात पुलिस ने ट्रैफ़िक प्रहरी अभियान चलाया है, जिससे सभी छात्रों को जुड़कर इन्दौर के यातायात को दुरुस्त करने में सहभागी होना चाहिए। साथ ही, आप यातायात नियमों का पालन करें।’
ख़बर हलचल न्यूज़ के सम्पादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ ने कहा कि ‘घर पर आपकी कोई प्रतीक्षा कर रहा है, इस बात को ध्यान में रखकर हेलमेट लगाएँ, यातायात नियमों का पालन करें। यदि आप नियमों का उलंघन करेंगे तो ज़िम्मेदार नागरिक नहीं बन पाएँगे। संकल्प लें कि बिना हेलमेट गाड़ी नहीं चलाएँगे।’
आयोजन में सामाजिक कार्यकर्ता सौरव गौसर ने संबोधित कर छात्रों को ट्रैफ़िक प्रहरी बनने की शपथ दिलवाई, साथ ही कहा कि ‘हम युवा ही शहर के बड़े परिवर्तन का कारक बन सकते हैं, यदि हम जागरुक होंगे तो ही शहर को जागरुक कर पाएँगे।’
कार्यक्रम में महाविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना की इकाई के सौ से अधिक छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की और कई छात्रों ने हाथों-हाथ ट्रैफ़िक प्रहरी अभियान से जुड़ना सुनिश्चित किया।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. रिंकू गेहानी ने किया व आभार डॉ. कमलेश पाटोदी ने माना।

सुशील कुमार सायरा के सीईओ बनाए गए

दूरदर्शी AI और क्लाउड एग्जीक्यूटिव जिनके पास एंटरप्राइज़ प्लेटफॉर्म बनाने और उसे बड़े पैमाने पर (scale) ले जाने का सिद्ध रिकॉर्ड है, अब CX एश्योरेंस मार्केट लीडर के लिए इनोवेशन और वैश्विक विस्तार के अगले चरण का नेतृत्व करेंगे

ऑस्टिन, टेक्सास, संयुक्त राज्य अमेरिका

AI-संचालित कस्टमर एक्सपीरियंस (CX) एश्योरेंस में वैश्विक लीडर, Cyara, ने आज सुशील कुमार को अपना नया मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त करने की घोषणा की। उनकी नियुक्ति एंटरप्राइज़ AI CX इनोवेशन में तेजी लाने और हर चैनल पर अधिक विश्वसनीय, उत्तरदायी और भरोसेमंद इंटरैक्शन को सक्षम करके ग्राहक अनुभव को बेहतर बनाने के लिए Cyara की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। सुशील निवर्तमान CEO ऋषि राणा द्वारा रखी गई मजबूत नींव को आगे बढ़ाएंगे।

सुशील Cyara में उद्यमशीलता का दृष्टिकोण (entrepreneurial vision) और एंटरप्राइज़-स्तरीय नेतृत्व क्षमता लेकर आ रहे हैं। उन्होंने अपने करियर को श्रेणी-परिभाषित (category-defining) AI, DevOps व क्लाउड प्लेटफॉर्म बनाने पर केंद्रित किया है, एक संस्थापक के रूप में भी और बड़े वैश्विक संगठनों के नेता के रूप में भी। हाल ही में वे RelicX.ai के सह-संस्थापक और CEO थे जो एक जेनरेटिव AI टेस्ट ऑटोमेशन अग्रणी था जिसका अधिग्रहण Harness द्वारा किया गया। इससे पहले उन्होंने Oracle, CA Technologies और Broadcom में वरिष्ठ उत्पाद और सामान्य प्रबंधन जैसी भूमिकाएं निभाई। जहाँ उन्होंने वैश्विक टीमों और करोड़ों डॉलर के व्यवसायों का नेतृत्व किया जिसने डिजिटल प्रदर्शन और ग्राहक अनुभव को बड़े पैमाने पर बेहतर बनाया।

 

Cyara के सह-संस्थापक और निदेशक मंडल के नॉन-एक्सिकियूटिव आलोक कुलकर्णी ने कहा, “सुशील श्रेणी-परिभाषित प्लेटफॉर्म बनाने और उसे स्केल करने के लिए सिद्ध क्षमता और गहरी ग्राहक व उत्पाद अंतर्दृष्टि का एक दुर्लभ संयोजन लाते हैं। Cyara ने CX एश्योरेंस श्रेणी का निर्माण किया और अब इसका नेतृत्व करता है, जिसके पास मजबूत वैश्विक गति है। सुशील के नेतृत्व में हम उस बढ़त को विस्तार देने का महत्वपूर्ण अवसर देखते हैं क्योंकि उद्यम (enterprises) ग्राहक अनुभव को आधुनिक बनाने, GenAI को सुरक्षित रूप से तैनात करने और यह सुनिश्चित करने की होड़ में हैं कि हर ग्राहक इंटरैक्शन बिना किसी बाधा के काम करे।

 

Cyara का एकीकृत, AI-संचालित प्लेटफॉर्म वॉयस, डिजिटल, मैसेजिंग और कन्वर्सेशनल AI में ग्राहक यात्राओं (customer journeys) का निरंतर परीक्षण, सत्यापन और निगरानी करता है। हर साल 350 मिलियन से अधिक ग्राहक यात्राओं को सुनिश्चित करते हुए और दस लाख से अधिक AI-जनित प्रतिक्रियाओं को मान्य करते हुए, यह प्लेटफॉर्म उद्यमों को गुणवत्ता, विश्वसनीयता और जोखिम में पूर्ण दृश्यता (visibility) देता है। उभरती हुई Agentic AI क्षमताओं के साथ Cyara संगठनों को कार्यप्रवाह (workflows) में सुधार करने, सेवा की लागत कम करने और आत्मविश्वास के साथ नए अनुभव तैनात करने में मदद करने के लिए बुद्धिमान, निरंतर CX अनुकूलन (optimization) में विस्तार कर रहा है।

 

Cyara के CEO, सुशील कुमार ने कहा, “AI ग्राहक अनुभव को उस किसी भी तकनीकी बदलाव की तुलना में तेजी से बदल रहा है जो हमने दशकों में देखा है। जैसे-जैसे उद्यम अपने CX स्टैक पर पुनर्विचार करते हैं और एजेंटिक AI (Agentic AI) का पता लगाते हैं, उन्हें सबसे ज्यादा जिस चीज की जरूरत है, वह है आत्मविश्वास। यह आत्मविश्वास कि हर इंटरैक्शन सटीक, भरोसेमंद होगा और उस गति व गुणवत्ता पर दिया जाएगा जिसकी ग्राहक अपेक्षा करते हैं। Cyara पहले से ही उस बदलाव को सक्षम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह वह विश्वसनीयता और आश्वासन प्रदान करता है जिसकी संगठनों को AI को केवल प्रयोग (experimentation) से सार्थक, वास्तविक दुनिया के प्रभाव में बदलने के लिए आवश्यकता है। मैं इस नींव पर निर्माण करने और विश्व स्तर पर ग्राहक अनुभव के लिए मानक (bar) को ऊपर उठाने के लिए टीम के साथ काम करने के लिए उत्साहित हूँ।

 

Cyara ने एक केंद्रित विलय और अधिग्रहण (M&A) रणनीति अपनाई है; जिसमें उद्योग के सबसे व्यापक CX एश्योरेंस स्टैक में से एक को बनाने के लिए Botium और QBox (बोट और कन्वर्सेशनल AI टेस्टिंग), Spearline/testRTC (टेलीकॉम और WebRTC एश्योरेंस) और CentraCX (voice of the customer) का अधिग्रहण शामिल है।

 

सुशील AI-संचालित CX एश्योरेंस में उत्पाद नवाचार (product innovation) में तेजी लाने, CCaaS, CPaaS, UCaaS और AI भागीदारों के Cyara के पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) को गहरा करने और कंपनी के वैश्विक पदचिह्न (global footprint) का विस्तार करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जो 135 से अधिक देशों में ग्राहकों की सेवा करता है।

 

अतिरिक्त जानकारी के लिए, कृपया संपर्क करें: Janet Vito, janet.vito@cyara.com.

 

Cyara के बारे में

Cyara AI-संचालित कस्टमर एक्सपीरियंस एश्योरेंस में वैश्विक लीडर है। वॉयस, डिजिटल, मैसेजिंग और कन्वर्सेशनल AI चैनलों पर निरंतर परीक्षण और निगरानी के लिए एकमात्र एकीकृत प्लेटफॉर्म के रूप में, Cyara दुनिया के सैकड़ों अग्रणी ब्रांडों को हर साल एक चौथाई अरब से अधिक ग्राहक इंटरैक्शन को अनुकूलित (optimize) करने के लिए सशक्त बनाता है। पूर्ण ग्राहक यात्रा दृश्यता से लेकर AI गवर्नेंस और अनुपालन (compliance) तक, Cyara यह सुनिश्चित करता है कि हर टचपॉइंट त्रुटिहीन रूप से काम करे, जिससे व्यवसायों को सुरक्षित, घर्षण-मुक्त और उच्च गुणवत्ता वाला CX बड़े पैमाने पर देने में मदद मिलती है।

 

अधिक जानने के लिए, www.cyara.com पर जाएँ।

दुनिया के हर रिलीजन में ब्राह्मण होते है, नाम उनके अलग होते हैं

पादरी, बिशप, पोप ईसाईयों के ब्राह्मण है, मौलाना मौलवी मुसलमानों के है, बौद्धभिक्षु बौद्धों के है।
हर रिलीजन के ब्राह्मण सबसे ज्यादा सम्मान प्राप्त करते है जापान कोरिया वाले राजा भी दलाई लामा के सामने झुकते है, उनके धर्म गुरु के सामने
वैसे ही अमेरिका का राष्ट्रपति भी उनके पादरी पोप के सामने झुकते है
हर रिलीजन के ब्राह्मण दान पर निर्भर होते है, कोई मौलाना मौलवी नौकरी नहीं करता, दुकान नहीं चलाता, न कोई पादरी जॉब करता है, न कोई बौद्ध वाला, सब दान दक्षिणा पर ही चलते है
जो बात हिन्दू धर्म के ब्राह्मण को दूसरे से अलग करती है, वो है ज्ञान का स्तर। बाकी का ज्ञान केवल उनकी धार्मिक बातों तक सीमित होता है। बाकी सिर्फ एक किताब वाले है, हिन्दू धर्म वालों के पास पूरा पुस्तकालय है ।
हिन्दू धर्म का ब्राह्मण ज्ञानी इसलिए नहीं होता की वो ब्राह्मण है, वो ज्ञानी इसलिए होता है क्योंकि हिन्दू धर्म ही ज्ञान का महासागर है।
अगर कोई वेदों को पढ़ता है, तो वो ब्राह्मण होने के साथ साथ गणितज्ञ, ज्योतिषी, डॉक्टर, योद्धा, वैज्ञानिक सब हो सकता है जैसे आयुर्वेद ऋग्वेद का एक उपवेद है, तो ऋग्वेद पढ़ने वाला ब्राह्मण एक चिकित्सक भी हो जाता है
ज्योतिष, यजुर्वेद का हिस्सा है  तो यजुर्वेद पढ़ने वाला, गणित भी पढ़ता, Astronomy भी पढ़ लेता है
धनुर्वेद, युद्धशास्त्र, यजुर्वेद का हिस्सा है इसलिए कोई ब्राह्मण युद्ध कौशल में भी निपुण हो सकता है । संगीत की शिक्षा सामवेद में है, तो सामवेद का ज्ञाता अपने आप संगीत का ज्ञानी हो जाता है
अगर कोई महाभारत पढ़ता है वो वो राजनीति में कुशल हो जाता है, महाभारत से बड़ा राजनीति का ग्रंथ दुनिया में कोई नहीं
तो यही कारण है कि हिन्दू धर्म का ब्राह्मण आल राउंडर होता है, हर क्षेत्र मे झंडे गाड़ने वाला होता है। दूसरे वालों को अपनी किताब के बाहर कुछ नहीं आता।
ऐसे ग्रंथों के अध्ययन के कारण ब्राह्मण बौद्धिक रूप से बहुत आगे होता है दूसरे के मुकाबले और ब्राह्मण बुद्धिबल से देश की रक्षा सदियों से करता आ रहा है चाहे वो चाणक्य के रूप में, विश्वनाथ भट्ट के रूप में, बाजीराव पेशवा के रूप में, सावरकर के रूप में, शंकराचार्य के रूप में, बालगंगाधर तिलक, चंद्रशेखर आजाद के रूप में । इसलिए वो सबके निशाने पर भी होता है, मुगल अपने युद्ध की सफलता इससे नापते थे कि कितने किलो जनेऊ इकट्ठे हुए अंग्रेजों, पूर्तगालियों के निशाने पर होते थे,  इस्लामिक शासकों और फिरंगी फ्रांसिस जेवीयर ने कहा था, ब्राह्मण न होते तो मैं पूरे भारत को ईसाई बना देता।
लॉर्ड मैकाले ने भी बहुत कोशिश की थी भारत देश में ब्राह्मण समाज को खत्म करने की…
एक और बात समझने की है, हर धर्म पंथ रिलीजन से कनेक्ट होने का एक माध्यम भी ब्राह्मण होते है । बच्चे का जन्म हुआ आप चर्च, मस्जिद, मंदिर जाएंगे वहां के पादरी, मौलाना, पंडित से जो भी करवाएंगे विवाह हुआ तो भी उनकी उपस्थिति में करवाएंगे, मृत्यु हुई तो अंतिम क्रिया भी करवाएंगे
सोचिये कि अगर ऐसा दुष्प्रचार कर दिया जाए की, हर पादरी, मौलाना ठग है, ये लोग लूटते है, अंधविश्वास फैलाते है, भ्रष्ट है तो क्या होगा ? धीरे धीरे इनके लोग फिर चर्च मस्जिद जाना बंद कर देंगे, शादिया फिर सिर्फ कोर्ट में हो जाएंगी, मरने पर बॉडी ऐसे ही डिस्पोज़ कर दी जाएगी और इस सबके कारण धीरे धीरे वो रिलीजन ही खत्म हो जाएगी।
तो अब आप ये भी समझ गए होंगे कि क्यों पंडितों, मंदिरों का इतना दुष्प्रचार करवाया जाता है।
और इसलिए JNU में ब्राह्मण भारत छोड़ो के नारे लगते है, किसान आंदोलन में लगते है, CAA के विरोध में लगते है
और जहां मौका मिले वहां ब्राह्मण टारगेट किए जाते है और बहुत बड़ी फंडिंग आती है विदेशों से ये करने के लिए
जहां भी बात हिन्दू धर्म के ब्राह्मण की है, वो सब कर्म से ब्राह्मण लोगों की है सिर्फ नाम वालों की नहीं  ब्राह्मण कोई सिर्फ जाति से नहीं हो जाता, ज्ञान, आध्यात्म और त्याग न हो तो वो ब्राह्मण नहीं होता
दासीपुत्र विदुर एक महापंडित ब्राह्मण थे, अर्थशास्त्र के जनक चाणक्य भी एक ब्राह्मण थे, वेदों के ज्ञाता भक्त चर्मकार रविदास भी ब्राह्मण है, स्वामी विवेकन्द भी है संत कबीर कर्म से जुलाहा होने के बावजूद वर्ण से ब्राह्मण हैं।महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं।
 ऐसे सैकड़ों अनगिनत ब्राह्मणों ने सनातन हिंदू धर्म और संस्कृति की मशाल को विपरीत परिस्थितियों में भी प्रज्वलित रखा।