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विवाह के बाद नर्मदा यात्रा का संकल्प करने वाला जोड़ा

विवाह संस्कार भोग नहीं संयम और साधना का पथ है…दुनियां के कई देशों बांग्लादेश,नेपाल  आदि में जेन जी के चर्चे ,उपद्रव स्वतंत्रता की लड़ाई ,अधिकारों के लिए संघर्ष  आदि की चर्चायें सुनते सुनते मन को ऐसा लगता था कि भारत का युवा ऐसा करने लगा तो क्या होगा..?
समाज के अन्यान्य प्रबुद्ध लोगों की चर्चाओं में भी ये बात चल पड़ी थी कि भारत की Gen Z भी विद्रोह के तरफ़ बढ़ रही है.. मन चिंतित भी था कि भारत में ऐसा हुआ.तो…! पर मन ने कभी स्वीकार ही नहीं किया कि भारत का युवा ऐसा कैसे कर सकता है…? भारत तो त्याग , समर्पण और साधना का देश है..यहाँ अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों की मान्यता के स्थान पर कर्तव्य बोध पर जीने वालों की मान्यता अधिक है।
यह भारत भूमि है ही ऐसी ..यहाँ राम ,कृष्ण ध्रुव,प्रह्लाद , गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी,भगत सिंह ,आजाद , बंकिम चंद्र चटर्जी , डॉ हेडगेवार की धरती है..यहाँ तो लोगों ने अपनी मातृभूमि की सेवा में जीवन का सर्वस्व समर्पण किया है..हमारी प्रेरणा कर्तव्य है..अधिकार नहीं..!
 मध्यप्रदेश के देवास जिले के खातेगांव का एक युवा शिवम यादव .. पिताजी शासकीय शिक्षक माँ एक कुशल गृहणी .. बेटा घर और नगर का होनहार जिसने अच्छी पढ़ाई की …  अकेला बेटा… माँ पिताजी की देखभाल के कारण बाहर कहीं नौकरी नहीं की … माँ- बाबूजी की सहमती से विवाह तय हुआ … बड़े ही धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ..सारे मित्र रिश्तेदार सब प्रसन्नचित्त थे और वो दोनों पति पत्नी भी अत्यंत आनंदित थे … संवाद में उन्होंने बताया कि विवाह के दस दिन बाद हम दोनों ने माँ नर्मदा की पैदल परिक्रमा का संकल्प लिया है.. यह सुनकर मन स्तब्ध रह गया।
माँ नर्मदा की परिक्रमा  ..वो भी पैदल.. मौसम की ठंडक और रास्ता भी दुर्गम … कई संत / महात्मा इस परिक्रमा को ३ साल,३ महीने १३ दिन में  पूर्ण करते है… ये सब सोचते सोचते मन ठिठक गया कि इतने कष्ट सहकर ये यात्रा क्यों कर रहे होंगे.. लाखों रुपए खर्च करके किसी देश मे हनीमून पर जा सकते थे। खूब मौज मस्ती करते सुंदर तस्वीरें वायरल होती युवाओं में कौतूहल होता अच्छा लगता घर के अकेले बेटे थे कोई कष्ट नहीं था पर इन्होंने तो कंटकाकीर्ण मार्ग चुना   एक तरफ़ दुनिया के अन्य देशों के युवा अपने अधिकारों के लिए किसी के अधिकार छीनने के लिए तैयार खड़ा है वहीं अपने भारत के युवा नदी की पैदल परिक्रमा ..क्या मिलेगा इससे..?
 धर्म के कार्य से क्या मिलेगा..? क्या नहीं मिलेगा ये चिंतन भारत का नहीं है पर बहुत कुछ मिलेगा … सैकड़ों दिनों तक नर्मदा मैया का सानिध्य … दुनियाँ में केवल एक ही नदी है नर्मदा जिसकी परिक्रमा की जाती है. हमारा विश्वास है नर्मदा मैया के दर्शन मात्र से कल्याण होता है … जीवन में आत्मविश्वास,सात्विकता.. संतुष्टि.. किसी को जीतने की जगह अपने मन पर विजय प्राप्त करना और पता नहीं क्या क्या मिलेगा..? जिसकी कल्पना नहीं केवल अनुभूति ही की जा सकती है..इसी कामना से सुदूर जंगलों में अत्यंत अभाव में रहने वाले से लेकर बड़े बड़े धनाढ्य , ज्ञानी , ध्यानी ,साधु ,संत, महात्मा लाखों की संख्या में नर्मदा परिक्रमा करते है..भारत भोग की नहीं त्याग की परंपरा का देश है .. माता भूमि पुत्रोंअहम पृथिव्य: को जीवन में धारण करने वाला अपना देश है।
वंदेमातरम्  मंत्र को संकल्प मानकर साधना करने वाला देश है..जिसकी साधना से अंग्रेजों के बंगभंग का षड्यंत्र भी विफल हो जाता है..वंदेमातरम् भारत के जन जन की प्रेरणा है… आज भी भारत का युवा अपनी मातृभूमि के सर्वस्व न्योछावर करने को अपना सौभाग्य मानता है … यही है भारत का चिंतन..।
ये कहानी केवल शिवम् की नहीं है उससे कहीं अधिक शिवम् के साथ पाणिग्रहण करने वाली बेटी रोशनी की भी है…जिसने घर की सुख सुविधा का त्याग कर महीनों कष्ट सहकर पदयात्रा का संकल्प स्वीकार किया… कोई तथाकथित बुद्धिजीवी इस पर महिला स्वतंत्रता और अधिकार के नाम पर मिथ्या भ्रम फैला सकता है पर ये सीता के चरित्र को हृदयंगम कर जीने वाली बेटियों का भारत है.. और यही भारतवर्ष में स्त्री चरित्र भी है ।
जिस भारत की युवा पीढ़ी शिवम् -रोशनी जैसी हो तो फिर कैसी चिंता .. ? और कैसा भय … ? सारे संशय मिट गए दुनियाँ के देशों में कितने भी तख्त पलट हों सकते है पर भारत का संस्कृतिक तख्त बहुत मजबूती से खड़ा है जो अभी तक न डिगा है न कभी डिगेगा..।बस प्रभु से एक ही कामना है की इनकी नर्मदा परिक्रमा सकुशल पूर्ण हो मुझे विश्वास है भारत की भावी पीढ़ी को परिक्रमा में नर्मदा मैया दर्शन अवश्य देंगी.. यात्रा शुभ हो.. सफल हो.. सार्थक हो..  नर्मदा मैया की जय।

यूनेस्को ने दीपावली को विश्व धरोहर घोषित किया

यूनेस्को द्वारा दीपावली को अमूर्त विश्व धरोहर घोषित किया जाना भारत की सांस्कृतिक चेतना का ऐसा महत्त्वपूर्ण क्षण है, जो न केवल भारतीयों को गौरवान्वित करता है बल्कि यह सिद्ध करता है कि भारतीय सभ्यता की आत्मा आज भी मानवता का मार्गदर्शन करने की क्षमता रखती है।
दीपावली मात्र एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन, आत्मा, संबंध, समरसता और विश्वबंधुत्व का प्रकाशग्रंथ है। यह वह विरासत है जो हजारों वर्षों से मानव को अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान, ईष्र्या से प्रेम और भय से विश्वास की यात्रा पर ले जाती रही है।
दीपावली की महिमा को समझना अर्थात भारतीय संस्कृति की गहराई को समझना। यह संस्कृति केवल मंदिरों, शास्त्रों, उत्सवों और अनुष्ठानों में नहीं बसती, बल्कि मनुष्य की स्मृति, संवेदना, आस्था और जीवन व्यवहार में प्रवाहित होती है। इसीलिए इसे ‘अमूर्त’ कहा जाता है, क्योंकि यह मूर्त नहीं, परंतु सबसे अधिक जीवंत है। दीपावली इसी जीवंतता का सर्वोच्च उत्सव है।
जब अयोध्या की रामपैड़ी पर 26.17 लाख दीपकों ने एक साथ जगमग कर दुनिया को चमत्कृत किया, तब वह दृश्य सिर्फ दीयों का समुद्र नहीं था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक रोशनी का वैश्विक उद्घोष था, एक ऐसा उद्घोष जिसने दुनिया को यह विश्वास कराया कि भारत की परंपराएं आज भी सार्वभौमिक प्रेरणा शक्ति हैं। यूनेस्को का निर्णय इसी चमत्कार की परिणति है।
दीपावली के केंद्र में केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। यह पर्व मनुष्य को याद दिलाता है कि हर कठिनाई, हर पीड़ा, हर अंधकार के भीतर एक दीप जलने की संभावना छिपी होती है। हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख परंपराओं में दीपावली का अलग-अलग महत्व है, मगर संदेश एक ही है, प्रकाश का मार्ग ही मानवता का मार्ग है। यही अखंड संदेश अब विश्व स्तर पर मान्यता पा रहा है।
भारत की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहरें सदैव मानव-कल्याण की प्रेरक रही हैं। कुंभ, वैदिक मंत्रोच्चार, रामलीला, योग, दुर्गा पूजा जैसी परंपराएँ पहले से विश्व धरोहर सूची में शामिल रही हैं। दीपावली के जुड़ने से यह सूची और उज्जवल हुई है। दीपावली यूनेस्को के उस उद्देश्य को पूर्ण रूप देती है जिसमें कहा गया है कि मानवता की सबसे बड़ी शक्तियाँ वे परंपराएँ हैं जो समय के साथ खो न जाएँ।
दीपावली भारतीय समाज की आर्थिक, सामाजिक और मानवीय संरचना को एक गहरा संदेश देती है। एक छोटा कुम्हार, जो अपने हाथों से दीए बनाता है, उसी दीये की रोशनी से करोड़ों घर रोशन होते हैं। एक छोटे व्यापारी की दुकान भी दीपावली पर उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी एक बड़ी कंपनी की। यह त्योहार बताता है कि समाज प्रकाश तभी बनता है जब हर व्यक्ति के जीवन में रोशनी पहुंचे। इसीलिए यह उत्सव भारतीय सामुदायिक चेतना का उत्सव है, समता और समान अवसरों का उत्सव है।
दुनिया आज विभाजन, युद्ध, तनाव, भौतिक लालच और मानसिक अंधकार से जूझ रही है। ऐसे समय में दीपावली का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक है कि एक दीप की लौ किसी भी गहन अंधकार को चुनौती दे सकती है। भारत ने सदियों से दुनिया को यही बताया है कि नैतिक साहस, सद्भाव, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा ही सभ्यताओं को टिकाऊ बनाती है। दीपावली इस सत्य का प्रत्यक्ष प्रतीक है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधुनिक सोच और सांस्कृतिक कूटनीति ने भारत की इन अवधारणाओं को दुनिया के सामने नई ऊर्जा के साथ स्थापित किया है। योग की वैश्विक मान्यता हो, आयुर्वेद का उभार हो, रामायण सम्मेलन हों या भारतीय त्योहारों का अंतरराष्ट्रीयकरण, यह सब भारत की सॉफ्ट पावर की विजय है। दीपावली को यूनेस्को सूची में शामिल किया जाना इसी सॉफ्ट पावर की अगली खूबसूरत सीढ़ी है।
मोदी का “वसुधैव कुटुंबकम” का मंत्र अब भारत की विदेश नीति ही नहीं, बल्कि विश्व-दृष्टि बन चुका है। इसी भावना ने जी20 से लेकर वैश्विक मंचों पर भारत की पहचान को मजबूत किया है। दीपावली का वैश्विक सम्मान इसी मंत्र का विस्तार है, क्योंकि यह त्योहार हर मानव को यह याद दिलाता है कि दुनिया एक है, पीड़ा साझा है, और आनंद भी साझा होना चाहिए।
दीपावली केवल आध्यात्मिक पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मनोविज्ञान भी है। यह मन को खाली नहीं करती, उसे भरती है, उसे बुझाती नहीं, उसे जगाती है। दीपावली मन की धूल झाड़ने, जीवन के प्रति नई आशा जगाने और अपने भीतर छिपे प्रकाश को पहचानने का अवसर है। यही कारण है कि इसे विश्व धरोहर घोषित करना पूरी मानवता के आध्यात्मिक भविष्य को मान्यता देना है।
वैश्वीकरण के प्रभाव ने दुनिया को तकनीकी रूप से भले ही जोड़ा हो, पर मानसिक रूप से विभाजन बढ़ा दिया है। ऐसे में भारत की सांस्कृतिक विविधता, विशेषकर दीपावली जैसी परंपराएँ, सभ्यताओं के बीच एक दार्शनिक पुल का काम करती हैं। ये त्योहार दुनिया को यह बताते हैं कि जीवन केवल उपभोग नहीं, संवेदना है, केवल प्रगति नहीं, समरसता है, केवल विकास नहीं, मूल्य भी हैं।
यूनेस्को की घोषणा के बाद अब दुनिया दीपावली को केवल भारतीय या धार्मिक त्योहार के रूप में नहीं देखेगी, बल्कि इसे वैश्विक नैतिक चेतना के रूप में स्वीकार करेगी। यह उस विरासत का सम्मान है जो अतीत से चली आ रही है पर भविष्य को दिशा देती है। यह भारत की उस आध्यात्मिक शक्ति का प्रमाण है जिसे दुनिया युगों से सम्मान देती आई है।
अब यह भी हमारा दायित्व है कि दीपावली की इस उज्ज्वल विरासत को हम और अधिक संवारे, संजोएं और इसे केवल उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन के रूप में अपनाएं। जब हम अपने भीतर एक दीप जलाते हैं, तो उसके प्रकाश में पूरी दुनिया का मार्गदर्शन संभव होता है, यही भारतीय संस्कृति की शक्ति है, यही दीपावली की महिमा है।
निस्संदेह, दीपावली का वैश्विक होना भारत की सांस्कृतिक आत्मा की विजय है। यह वह क्षण है जो बताता है कि भारत केवल एक भू-राजनीतिक शक्ति नहीं, बल्कि मानवता का आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी है। आने वाले समय में यह प्रकाश दुनिया के हर कोने तक पहुंचे, यही दीपावली का संदेश और भारत की सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।
दीपों का यह उत्सव अब केवल भारत का नहीं रहाकृअब यह मानवता का उत्सव है, और भारत की यह रोशनी आने वाले समय में वैश्विक चेतना का नया सूरज बनकर उदित होगी।
(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज,
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

चित्रकला, निबंध, विचित्र वेशभूषा, हस्तशिल्प बाल प्रतियोगिताओं में एक हजार बच्चों ने भाग लिया

कोटा । बच्चों को साहित्य और संस्कृति से जोड़ने के लिए कोटा संभाग में संस्कृति, साहित्य,मीडिया फोरम द्वारा मिशन बाल मन तक के अंतर्गत हाल ही में न्यू पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल समूह के चेयरमैन आर. के. शर्मा द्वारा गहरी रुचि लेकर सम्बद्ध विद्यालयों में बाल साहित्य मेलों का व्यापक रूप से आयोजन किया गया जिनमें एक हजार बच्चों ने  विभिन्न प्रतियोगिताओं भाग लिया।
  शर्मा ने बताया कि बाल साहित्य मेलों के आयोजन में साहित्य और संस्कृति से बच्चों को जोड़ने का प्रयास किया गया। साहित्यिक प्रतियोगिताओं में सुलेख लेखन, पहाड़ा बोलना, कविता पाठ, निबंध लेखन और चित्रकला प्रतियोगिताएं की गई। बच्चों की कल्पनाशीलता को बढ़ावा देने के लिए हस्तशिल्प के अंतर्गत दीपक, गणेश,राखी बनाना, थाली सजना प्रतियोगिताएं की गई।
संस्कृति से जोड़ने के लिए मेहंदी मांडना, रंगोली, नृत्य, विचित्र वेशभूषा और प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताएं की गई। इस आयोजन की रूपरेखा संयोजक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल से विचार विमर्श कर तैयार की गई।
    इन प्रतियोगिताओं में  कविश ,द्दिव्यांश यादव ,  मिशिता , प्रावि,  हद्विता, विवेक, ,गोविंद, प्रिंस, लैकिशा  , युविका , पहेल राठौर , लक्ष्य , खुशी राजावत ,तीसरी कक्षा के ऋषिका , नायरा , सारिका,  सरिश्मा ,जसमीत , निहारिका केवट   प्रियल मेहरा , वंशिका ,अभिजीत, इकरा , ईरम, निखिल तंवर , गर्वित कसेरा , मुस्कान प्रजापति,आयोनिजा गौतम ,
स्मृति  थापा , एकता केवट,  राधिका मीणा,  संध्या पटेल , अनुष्का , यशवनी,  उर्वशी, नैंसी मीणा,  गरिमा नागर  जिक्रा , कृष्णा वर्मा,उमा पटेल , निकिता प्रजापति , किरण हाडा ,बरसाना मीणा , ज्योति तंवर एवं  मैथिली साहू विजेता रहे।

मोइनुद्दीन चिश्ती की असलियत और हिन्दू समाज

हिन्दू समाज में शौर्य की कमी कभी भी नहीं थी। महमूद गजनवी बार-बार लूटपाट मचाकर गजनी लौट जाता था, सो इसलिए नहीं कि वह भारतवर्ष पर आधिपत्य जमाने के प्रति उदासिन था। इस देश में, पंजाब और सिन्धु देश के कुछ अंचलों को छोडकर, किसी जनपद पर अधिकार करने में वह इसलिए समर्थ नहीं हो सका कि चारों ओर से उठने वाली हिन्दू प्रत्याक्रमणों की आंधी उसे उल्टे पांव लौट जाने पर विवश करती रही। यह स्मरण रहे कि गजनवी अपने समय का अनुपम सेनानी था और उसने भारत के बाहर दूर-दूर तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया था, किन्तु बाहुबल के होते हुए भी हिन्दू समाज ने बुद्धिबल से काम नहीं लिया।

हिन्दू मनीषियों द्वारा रचित उस काल के प्रचुर साहित्य में कोई संकेत नहीं मिलता कि इस्लाम के स्वरूप को किसी ने पहचाना हो। न ही कोई ऐसा संकेत मिलता है कि ‘सूफी’ नामधारी बगुलाभगतों को उनकी करतूतों के कारण किसी ने धिक्कारा हो। सूफियों द्वारा बुलाया गया इस्लाम का ‘गाजी’ हार मानकर हट गया, किन्तु सुफी सिलसिले जमे रहे, बढते रहे और उनको धन तथा मान भारत के भीतर से मिलता रहा। इन सूफियों कि खानकाहों में बहुधा वे अबलाएं मिलती थी जिनका अपहरण गजनवी द्वारा हुआ था और जिनको उपहार के रूप में सूफियों को सौपां गया था। गजनवी द्वारा लूटा गया भारत का धन भी सूफियों ने प्रचुर मात्रा में पाया था। सूफी लोग आनन्द-विभोर होकर इस कामिनी-कांचन का उपभोग करते रहे। उन अबलाओं का आर्तनाद हिन्दू समाज ने नहीं सुना. इसके विपरीत, म्लेच्छों के हाथ पड़ जाने के कारण उन अबलाओं को त्याज्य मान लिया गया।

इसीलिए १५० वर्ष बाद मोहम्मद गौरी फिर इस्लाम के नारे लगाता हुआ भारतवर्ष की ओर बढ़ आया। अजमेर में गडा हुआ मुइनुद्दीन चिश्ती नाम का सूफी भी उसके साथ हो लिया। गौरी ११७८ ईसवी में आबू के निकट उस सेना से पिट कर भागा जिसका संचालन चौलुक्य-पति की विधवा साम्राज्ञी कर रही थी। दूसरी बार ११९१ में वही गौरी पृथ्वीराज चौहाण से पिट कर भागा। उस समय भारतवर्ष के चौलुक्य तथा चौहाण साम्राज्यों में इतना सामर्थ्य था कि वे गौरी का पीछा करते हुए इस्लाम द्वारा हस्तगत उत्तरांचल को लौटा लेते और गौरी तथा गजनी को रौंदते हुए उस काबे तक मार करते जहाँ से इस्लाम की महामारी बार-बार बढ़कर भारत के लिए विभीषिका बन जाती थी। इस्लाम का दावा था कि हिन्दूओं के मंदिर ईंट-चूने के बने हुए है, हिन्दूओं की देवमूर्तियां कोरे पाषाण-खण्ड हैं और उन मंदिरों तथा मूर्तियों में आत्मत्राण की कोई सामर्थ्य नहीं। इस तर्क का प्रत्युत्तर एक ही हो सकता था – लाहौर से लेकर काबे तक समस्त मस्जिदों का ध्वंस। तब इस्लाम की समझ में यह बात तुरन्त आ जाती कि उसके काबा में भी आत्मत्राण की कोई सामर्थ्य नहीं, वह भी ईंट-चूने का बना है, और उसके भीतर विद्यमान काले पत्थर का टुकडा केवल पत्थर का टुकडा ही है। बुद्धि द्वारा स्थिति का विश्लेषणन करने के कारण हिन्दू शौर्य निष्फल रहा। चिश्ती ने अजमेर में आकर अड्डा जमाया और गौरी को कहलवाया कि हिन्दू सेना को बल से नहीं, छल से ही जीता जा सकता है।

गौरी ने चिश्ती का हुक्म बजाया। ११९२ में वह जब फिर तरावडी के मैदान में आया तो चौहाण ने उस भगोडे को धिक्कारा। गौरी ने उत्तर दिया कि वह अपने बडे भाई मुइनुद्दीन के आदेश पार आया है और उसका आदेश पाए बिना नहीं लौट सकता। साथ ही उसने कहा कि पृथ्वीराज का संदेश उसने अपने बडे भाई के पास भेज दिया है तथा उस ओर से आदेश आने तक वह युद्ध से विरत रहेगा। राजपूत सेना ने शस्त्र खोल दिए और उसी रात को गौरी की सेना ने राजपूत सेना को छिन्न-भिन्न कर डाला, किन्तु किसी हिन्दू ने यह समझने का कष्ट नहीं किया कि काफिर के साथ छल करना इस्लाम के शास्त्र में विहित है। इस काल का साहित्य राजपूतों के शौर्य की गाथा सुनाता है, किन्तु इस्लाम के शास्त्र के विषय में वहाँ एक शब्द भी नहीं मिलता। फलस्वरूप चिश्ती आनन्द से अजमेर में बैठकर अपने ‘चमत्कार’ दिखलाता रहा। अजमेर के मंदिरों को ध्वस्त होते देखकर उसने अल्लाह का शुक्र बजाया। अल्लाह की फतह हुई थी। कुफ्र का मुँह काला। कोई आश्चर्य नहीं कि अल्लाह ने अजमेर को इस्लाम कि एक प्रमुख जियारत-गाह बना दिया। चिश्ती की मजार पर उबलते चावल, चढ़ने वाले फूल तथा संचित होने वाला धन अशंतः हिन्दूओं की देन है, किन्तु किसी हिन्दू ने आज तक यह जानने का कष्ट नहीं किया कि वहाँ पर गडा हुआ सूफी वस्तुतः क्या चीज़ था और उसने भारतभूमि के प्रति कितना बडा द्रोह किया था। इसका कारण यही है कि हिन्दू समाज ने इस्लाम को एक ‘धर्म’ मान लिया है।

(स्रोत: स्व. सीताराम गोयल की पुस्तक ‘सैक्युलरिज्म: राष्ट्रद्रोह का दूसरा नाम’, पृ. ४५-४७)

टिकारी रानी के मन्दिर पर देवरहा हंस बाबा का “भक्ति धाम” स्थापित

सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में अग्रगण्य रहा टिकारी राज:-

टिकारी  दक्षिण बिहार के गया जिले की एक ऐतिहासिक जमींदारी थी, जिसे भूमिहार समुदाय के राजा वीर सिंह ने स्थापित किया जो 2,046 गांवों में फैला हुआ था। यह  18वीं और 19वीं सदी में काफी प्रभावशाली जागीर थी। इसके वास्तविक संस्थापक लाव गाव में जन्मे सुंदर सिंह (शाह) थे। इस राजा ने टिकारी राज का विस्तार नौ परगनों में किया था। बुनियाद सिंह, अमर जीत सिंह, हित नारायण सिंह, मोद नारायन सिंह, महाराजा कैप्टन गोपाल शरण सिंह आदि टिकारी राज के प्रमुख राजा-महाराजा थे। जबकि इंद्रजीत कुअंर, राजरूप कुअंर, रामेश्वरी कुअंर टिकारी राज की प्रतापी महारानी हुईं।

     टिकारी के तीसरे राजा हित नारायण सिंह का जन्म 1801 में हुआ था। अंग्रेजों ने  उनको महाराजा की उपाधि और उसके प्रतीकों का उपयोग करने की अनुमति दी थी । उनका झुकाव अध्यात्म की ओर था और वे एक तपस्वी बन गए थे । उन्होंने अपनी विशाल संपत्ति का प्रबंधन अपनी पत्नी  को सौंप दिया था। उनकी पत्नी ने 29 अक्टूबर 1877 की वसीयत के तहत इसे अपनी बेटी महारानी राजरूप कुँअर को हस्तांतरित कर दिया।

     स्वतंत्रता आंदोलन की कमान टिकारी राज की महारानी इंद्रजीत कुंवर ने संभाली थी। महाराजा हितनारायण सिंह की पत्नी महारानी इंद्रजीत कुंवर धर्मपरायण के साथ एक देशभक्त महिला थीं। उनमें राष्ट्र भावना का विचार कूट-कूटकर भरा हुआ था। महारानी  ने वृंदावन में उससे सटे  मंदिर और एक विशाल भवन का निर्माण कराया था। उन्होंने अकाल ग्रस्त लोगों के भोजन और सहायता पर भी बड़ी राशि खर्च की। टिकारी रानी मंदिर को इसके संस्थापक के कारण ‘राधा इंद्र किशोर’ के मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। वृन्दावन के डांगोली में  यमुना नदी के पार, परिक्रमा मार्ग पर गोदा विहार के यमुना नदी तट पर यह मन्दिर स्थित है।

यह वास्तव में वृंदावन में सबसे बेहतरीन स्मारकों में से एक है जिसे राजस्थानी वास्तुकला में बनाया गया था।

डाकुओं से सुरक्षा मिली थी इस जगह:-

लगभग 200 साल पहले जब टिकारी की रानी वृंदावन की यात्रा के लिए जा रही थीं, तो उन पर कुछ पिंडारी डकैतों ने उन पर हमला कर दिया था और वे उनका सामान लूटना चाहते थे। रानी इंद्रजीत कुंवर यमुना नदी के किनारे अपने प्राण प्यारे भगवान गोपाल की रक्षा करने के लिए भागी और सुरक्षित रूप से यमुना के दूसरे तट पर पहुँच गयीं।

छःसाल में साढ़े तीन लाख लागत लगी:-

यह वह स्थान है जहाँ पर टिकारी रानी मंदिर का निर्माण हुआ था। मंदिर के निर्माण में लगभग 6 साल का समय लगा और 1871 में यह बन कर पूरा हुआ। मंदिर के शिखर को भारी मात्रा में तांबे के पंखों और सोने के पत्तल से सजाया गया है। मंदिर एक ऊंचे और समृद्ध चबूतरे पर बना हुआ है और मंदिर की पूरी बनावट अपनी असाधारण राजस्थानी वास्तुकला के साथ सरल और सुंदर है। मंदिर में श्री राधा कृष्ण राधा राजेंद्र सरकार के रूप में, राधा गोपाल, और श्री लड्डू गोपाल के एक छोटे श्रीविग्रह विराजमान हैं। मूर्ति को कलकत्ता के प्रसिद्ध मूर्तिकार राजेंद्र सरकार ने बनाया था। वर्तमान में ये मंदिर देवरहा हंस बाबा के भक्तों द्वारा संभाले जा रहे हैं। वृंदावन में टिकारी राज के कई अन्य स्थान भी हैं जो धार्मिक महत्व रखते हैं। इस मंदिर को टिकारी  राजा हित नारायण सिंह की विधवा रानी इन्द्रजीत कुंवर ने सन 1865 में बनवाना शुरू किया था और लगातार छ वर्ष तक निर्माण कार्य जारी रहने के बाद, यह मंदिर पूर्ण रूप से सन 1871 में बन कर तैयार हो गया था।

 इस मंदिर को दूर से देखने में भव्य दिखाई पड़ता है। इसकी स्थापत्य कला के बारें में आज भी लोगों के लिए आकर्षण बना हुआ है। इस मंदिर के इतिहास और महत्व के बारे में भी कम लोगों को ही जानकारी है। पत्थरों पर किये गए नक्काशी और विशालकाय प्रवेश द्वार लोगों को स्वत: ही आकर्षित करते हैं। यह मन्दिर अपने ज़माने में अतिथि-सेवा के लिए भी प्रसिद्ध था।

     उस समय इस मंदिर के निर्माण में 3,50,000  रूपया खर्च हुआ था। इसमें विराजमान देवी देवता के पूजा में वार्षिक तौर पर खर्च इत्यादि के लिए महारानी इन्द्रजीत कुंवर ने 15,000 रूपया के साथ अपने राज के कुछ ज़मीन भी मंदिर के नाम से दान में दे दी थी।

टिकारी घाट भी है:-

यमुना नदी के किनारे केशीघाट से अगर परिक्रमा शुरू करें तो चंद कदम दूर आगे बढ़ते ही वंशीवट, सुदामा कुटी के आगे भव्य टिकारी घाट भी बना हुआ है।टिकारी घाट के निर्माण में उस समय 30,000 रूपया लागत आया था। महारानी इन्द्रजीत कुंवर ने उस समय पिंडारा लूटेरा गिरोह से बच कर यमुना नदी को पार करते हुए वृन्दावन में इसी स्थान पर आई थी, बाद में इसी स्थान पर उन्होंने टिकारी घाट का निर्माण करवाया था।

रानी का महल अतिथि गृह बना :-

इस मंदिर से सटे एक भव्य भवन का भी निर्माण किया गया था। जो उस समय महारानी इन्द्रजीत कुंवर का निवास स्थान था और इसी भवन में महारानी की मृत्यु 26 जनवरी 1878 को हुई थी। उनके मृत्यु के बाद यह भवन “अतिथि गृह” के रूप में जाना जाता है।

अब देवरहा हंसबाबा का भक्ति धाम :-

कालान्तर में मंदिर को रानी इंद्रजीत कुंवर द्वारा देवरहा बाबा को दान कर दिया गया। अब मंदिर को देवरहा बाबा भक्ति धाम के नाम से भी जाना जाता है। यह आश्रम 1990 में देवरहा बाबा के वृंदावन में यमुना तट पर समाधि लेने के बाद उनकी स्मृति में स्थापित किया गया है। यह टिकारी मंदिर परिसर में ही चल रहा है, जिसमें मंदिर, भक्त निवास, गौशाला और टिकारी घाट शामिल है।

विशाल गौशाला :-

यहां गौवंशों की सेवा भी की जाती है। यह शांतिपूर्ण वातावरण और आध्यात्मिक कार्यक्रमों के लिए जाना जाता है। यह 1850 के दशक से संचालित है, 2002 से ब्रह्मवेता श्री देवरहा हंस बाबा द्वारा ट्रस्ट और श्रद्धालुओं द्वारा इसका प्रबन्ध किया जा रहा है।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

किस्सा भारत की पहली बोलती फिल्म का

“थिएटर में बेतहाशा भीड़ लगी थी। कई हफ्तों तक के टिकट्स बुक हो गए थे। लोग टिकट खरीदने के लिए बेताब थे। लेकिन टिकट मिल ही नहीं पा रहे थे। नतीजा, लोगों ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया। ऐसे में बेकाबू हो चुकी भीड़ को काबू में करने के लिए पुलिस की मदद लेनी पड़ी।” फिल्म हिस्टोरियन बी.डी.गर्ग ने अपनी किताब “आर्ट ऑफ सिनेमा” में आलम आरा की रिलीज़ का ज़िक्र करते हुए लिखा।
भारत की पहली साउंड फिल्म आलम आरा, जो साल 1931 में रिलीज़ हुई थी, उसने भारतीय सिनेमा और भारत, दोनों को हमेशा के लिए बदल दिया। और एक इंसान जो इस पूरे बदलाव का अगुआ, या कहना चाहिए कि सूत्रधार बना, वो थे अर्देशिर ईरानी। आज अर्देशिर ईरानी जी का जन्मदिन है। 5 दिसंबर 1886 को एक पारसी परिवार में अर्देशिर ईरानी का जन्म हुआ था। वो कभी स्कूल टीचर हुआ करते थे। केरोसीन इंस्पैक्टर के तौर पर भी उन्होंने काम किया था।
लेकिन वो जीवन में कुछ अलग, कुछ बड़ा करना चाहते थे। इसलिए जे.जे.आर्ट्स स्कूल से उन्होंने ग्रेजुएशन किया। इसके बाद वो अपने पिता के फोनोग्राफिर इक्विपमेंट्स और म्यूज़िक इंस्ट्रूमेंट्स के बिजनेस में हाथ बंटाने लगे। इसी दौरान ही उन्हें फिल्म बिजनेस से जुड़ने का आईडिया आया।
इसलिए अपने दोस्त और बिजनेसमैन अब्दुल अली ईसुफअली के साथ मिलकर अर्देशिर ईरानी ने “टैंट सिनेमा” के ज़रिए फिल्में दिखाने का काम शुरू किया। उस ज़माने में हर जगह आज के जैसे सिनेमाहॉल्स नहीं हुआ करते थे। तब बहुत से लोग टैंट में प्रोजेक्टर लगाकर पब्लिक से पैसे लेकर उन्हें फिल्म दिखाते थे।
टैंट सिनेमा के बिजनेस में अर्देशिर ईरानी को कामयाबी मिली। उनकी जान-पहचान का दायरा बढ़ा। और साल 1905 में वो “यूनिवर्सल स्टूडियोज़” के भारत के प्रतिनिधि बन गए। 1914 में अर्देशिर ईरानी ने ईसुफअली के साथ मिलकर मुंबई का एलेक्ज़ेंडर थिएटर खरीद लिया। साल 1920 में उन्होंने भोगीलाल दवे के साथ मिलकर अपनी पहली प्रोडक्शन कंपनी “स्टार फिल्म्स लिमिटेड” की स्थापना की।
भोगीलाल दवे अमेरिका के “न्यूयॉर्क स्कूल ऑफ फोटोग्राफी” से ग्रेजुएशन करके लौटे थे। उनके साथ मिलकर अर्देशिर ईरानी ने अपनी पहली फिल्म “वीर अभिमन्यू” का निर्माण किया। 1922 में रिलीज़ हुई ये साइलेंट फिल्म अर्देशिर ईरानी की डायरेक्टोरियल डेब्यू थी। इस फिल्म में लीड हीरोइन थी एक्ट्रेस फातिमा बेगम। ये वही फातिमा हैं जिनकी बेटी ज़ुबैदा ने आगे चलकर अर्देशिर ईरानी द्वारा निर्मित भारत की पहली टॉकी फिल्म आलम आरा में काम किया था।
लगभग 15 साइलेंट फिल्मों का निर्माण करने के बाद अर्देशिर ईरानी “स्टार फिल्म्स लिमिटेड” से अलग हो गए और उन्होंने “रॉयल आर्ट स्टूडियो” की स्थापना की। इस नई फिल्म कंपनी के बैनर तले भी उन्होंने कुछ फिल्मों का निर्माण किया। आखिरकार 1926 में उन्होंने स्थापित किया “इम्पीरियल फिल्म्स।”
यही वो बैनर था जिसके अंडर में उन्होंने भारत की पहली टॉकी फिल्म “आलम आरा” का निर्माण किया था। आलम आरा बनाने की प्रेरणा अर्देशिर ईरानी को मिली थी “शो बोट” नाम की एक अमेरिकन फिल्म देखकर जो 40 प्रतिशत टॉकी थी। वो फिल्म अर्देशिर ईरानी ने 1930 में मुंबई के “एक्सेलसियर सिनेमा” में देखी थी।
उस ज़माने में भारतीय बाज़ार में साइलेंट फिल्मों का ही दबदबा था। उस वक्त अमेरिका में बनी टॉकी फिल्में ही अवेलेबल होती थी। मगर जब अर्देशिर ईरानी ने “आलम आरा” बनाई तो दौर पूरी तरह से बदल गया। “आलम आरा” में ही पहला फिल्मी गीत था जिसे “वज़ीर मोहम्मद खान” ने गाया था। उन्होंने एक अहम किरदार भी “आलम आरा” में निभाया था।
इम्पीरियल फिल्म कंपनी जिस जगह मौजूद थी वहां पास ही एक रेलवे ट्रैक था। दिन भर वहां से रेलगाड़ियों का आना-जाना लगा रहता था। इसलिए एक साउंड फिल्म को वहां बनाना बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य था। ऐसे में अर्देशिर ईरानी ने फैसला किया कि वो रात में शूटिंग करेंगे। इस तरह रात के एक बजे से लेकर सुबह तीन बजे तक आलम आरा की शूटिंग की जाती थी।
यानि मात्र तीन घंटे की ही शूटिंग हो पाती थी। यही वजह है कि इस फिल्म को कंप्लीट करने में बहुत वक्त लग गया था। उस ज़माने में ये फिल्म बनाने में चालीस हज़ार रुपए खर्च हुए थे। लेकिन जब ये फिल्म मैजेस्टिक सिनेमा हॉल में रिलीज़ हुई तो लोग इसे देखने के लिए लोग टूट पड़े। फिल्म ने बहुत शानदार बिजनेस किया। कुल 29 लाख रुपए का कलैक्शन इस फिल्म ने किया था।
साल 1934 में अर्देशिर ईरानी ने पहली पर्शियन टॉकी फिल्म भी बनाई थी जिसका नाम था “द लोर गर्ल।” ये फिल्म भी खूब चली थी। उस ज़माने में ईरान में भी इस फिल्म को प्रदर्शित किया गया था। और वहां भी “द लोर गर्ल” को बहुत पसंद किया गया था। 14 अक्टूबर को साल 1969 में 82 साल की उम्र में अर्देशिर ईरानी जी का निधन हो गया था। आर्देशिर ईरानी जी को किस्सा टीवी का सैल्यूट। बिग सैल्यूट।
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मौलाना मदनी विवाद: आतंक और काफिरों का माल लूटना इस्लाम का राजनीतिक सिद्धांत

जमाते उलेमा के नेता मौलाना महमूद मदनी ने गत ३० नवंबर को भोपाल में एक सभा में कहा कि *‘इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मनों ने “जिहाद” जैसी इस्लाम की पवित्र धारणा को दुर्व्यवहार, अव्यवस्था और हिंसा से जुड़े शब्दों में बदल दिया है। … कहीं पर कोई आतंकवादी घटना हो जाती है तो उसको “जिहाद” बता दिया जाता है। मुसलमानों के ऊपर गलत आरोप लगाए जाते हैं।  जब-जब जुल्म होगा तब-तब जिहाद होगा।’
उस पर भाजपा नेता, और बिहार के राज्यपाल, आरिफ मुहम्मद खान ने कहा कि मौलाना मदनी के देवबंदी मदरसे में पढ़ाया जाता है कि “दीन ए हक की तरफ बुलाने और जो उसे कुबूल ना करे उससे जंग करने को ‘जिहाद’ कहते हैं।” यानी *जो मुसलमान बनने के लिए कहे जाने पर मना कर दे, उस से लड़ना जिहाद है।
यह प्रसंग “जिहाद” को ठीक से समझने की माँग करता है। विशेषकर हिन्दुओं को, जो इसे उतना ही जानते हैं जितना वृन्दावन की गाय। भाजपा नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी यह दिखाती हैं। किसी ने जिहाद पर कुछ न कहा, केवल मदनी को बुरा-भला कहने बैठ गये! यानी, साँप छोड़ बस लकीर पीटते रहना।
पहली बात, मदनी किन्हें ‘इस्लाम और मुसलमान के दुश्मन’ बता रहे हैं?
*मूल इस्लामी किताबें — कुरान, हदीस (मुहम्मद के कथन) और सीरा (मुहम्मद की जीवनी) — ही दूसरे सब को “दुश्मन” बताती है।* कुरान (2:98) के अनुसार ‘जो अल्लाह के कहे से इन्कार करते हैं’ वे काफिर हैं, और ‘अल्लाह काफिरों का दुश्मन है’। सो *इस्लाम ही गैर-मुस्लिमों को दुश्मन कह कर उन्हें मिटाने, अपमानित करने की खुली घोषणा करता है।* इस अपनी ठानी दुश्मनी को स्थाई भी बताता है। (कुरान, 60:4)
तब दुश्मनी का दोषी कौन है, मौलाना?
कुरान की लगभग चार सौ आयतों में काफिरों, यानी गैर-मुस्लिमों, का जिक्र है। सभी में मानो पानी पी-पीकर ‘मूर्तिपूजा’, ‘झूठे ईश्वर’, ‘बहुदेवपूजा’, आदि दूसरे धर्मों और उन्हें मानने वालों को कोसा गया है; उन्हें मिटा देने के निर्देश हैं। यही ‘अल्लाह का काम’ यानी जिहाद है। इस का अर्थ मुहम्मद के शब्दों में: ‘जो इस्लाम का वर्चस्व बनाने के लिए लड़ता है, वही अल्लाह के लिए लड़ता है।’ (सहीह बुखारी, 1:3:125)
*यह जिहाद मुस्लिम समाज के लिए बाध्यकारी भी है, ‘जब तक कि पूरी दुनिया अल्लाह की नहीं हो जाती।’* (कुरान, 8:39) मुहम्मद के अनुसार, *यदि कोई मुसलमान ‘बिना जिहाद में हिस्सा लिए मर जाता है, जिस ने जिहाद में हिस्सा लेने की ख्वाहिश नहीं की, वह एक मुनाफिक (पाखंडी) की मौत मरता है।’* (सहीह मुस्लिम, 20:4696) मुहम्मद ने मुनाफिक को घृणित कहा है। यानी, जिहाद लड़ना न चाहने वाला भी हेय है। सो उन मुसलमानों को भी धमकाया गया है जो जिहाद लड़ने से बचना चाहें।
तब ‘मूर्तिपूजकों और ‘कई देवी-देवताओं को पूजने वाले’ हिन्दुओं, बौद्धों, जैनियों, आदि को इस्लाम के प्रति क्या रुख रखना चाहिए? यह मदनी ही बताएं।‌
असल में, *इस्लाम केवल रिलीजन नहीं है; वह मुख्यत: राजनीति है। उस की तीनों मूल किताबें आधे से अधिक बस दूसरों को मुस्लिम बनाने या मिटाने की फिक्र से भरी हैं। इस प्रकार, राजनीतिक इस्लाम से सभी प्रभावित होते हैं। इसीलिए उस की आलोचना सब का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है।* हिन्दुओं, बौद्धों, सिखों, जैनियों व नास्तिकों के लिए भी अपने धर्म, संस्कृति, विचार-विश्वास, समाज और कानूनों की रक्षा का कर्तव्य।
फिर, इस्लामी शब्दावली में *‘जुल्म’* का भी अलग ही अर्थ है! यह संकेत आरिफ मुहम्मद खान की टिप्पणी में भी है। *कुरान में ‘सब से बड़ा जुल्म’ है — मूर्तिपूजा करना!* कुरान की आयतें 31:13, 4:48, 4:116 आदि कहती हैं कि *मूर्तिपूजा सब से बड़ा जुल्म, ‘जुल्मो-अजीम’ है। इस हद तक कि बाकी सब माफ हो सकता है, परन्तु शिर्क या मूर्तिपूजा नहीं। विविध देवी-देवताओं या उनकी मूर्ति की पूजा करना सब से बड़ा ‘जुल्म’ है।* इस प्रकार, मदनी की बात का इस्लामी अर्थ है कि *जब तक मूर्तिपूजा रहेगी तब तक उसे मिटाने को जिहाद चलता रहेगा। महमूद गजनवी से लेकर तालिबान तक सतत इतिहास भी यही है। काशी, मथुरा, अयोध्या में और क्या हुआ था? जिहादियों ने ‘जुल्म’ ही खत्म किया था!!*
इसलिए, देवबंदी मदरसों द्वारा ‘जुल्म’ का अर्थ इस्लाम में आने का निमंत्रण अस्वीकार करना बताना सही है। यानी *जब तक मूर्तिपूजा, बहुदेवपूजा करने वाले लोग मुसलमान नहीं बन जाते तब तक उनके खिलाफ जिहाद रहेगा। यह केवल कोरा सिद्धांत नहीं, वरन पूरी चौदह सदियों का इस्लामी व्यवहार भी है।
 पिछले सात-आठ दशकों में ही पूर्वी बंगाल, कश्मीर और पश्चिमी पंजाब के हजारों मंदिरों व देवमूर्तियों का क्या हुआ? उनका अस्तित्व ही ‘जुल्म’ था — यह बात हिन्दू नेता न समझना चाहें, पर तमाम इस्लामी समझते हैं।‌ इसलिए उन्हें नेस्तनाबूद करना वे अपना फर्ज मानते हैं।‌ *यह किसी मौलाना की निजी राय नहीं, बल्कि इस्लाम का उसूल है। यही है मौलाना मदनी का: ‘जुल्म के खिलाफ जिहाद।’
मदनी यह सब बेहतर जानते हैं। पर तेवर दिखाते हैं मानो मुसलमानों पर ही अत्याचार हो रहा हो! जिहाद की असलियत छिपा कर किसी तरह मुसलमानों को भड़काना चाहते है। क्योंकि बड़ी संख्या में मुसलमान भी दूसरे धर्म वालों का खात्मा करना बेजा समझते हैं, पर जिहाद को ‘पवित्र’ बताकर, ‘वन्दे मातरम्’ का बहाना गढ़कर मदनी अपनी ओर से मुसलमानों को ललकार रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट को धमका रहे हैं। जबकि कोई किसी को ‘वन्दे मातरम्’ कहने के लिए मजबूर नहीं करता। सो, मदनी सिर्फ उत्तेजना और डर पैदा करना चाहते हैं। ताकि हिन्दू असहज और आतंकित हों, और जिहाद को ‘पवित्र’ मान कर उस पर चुप रहें। यह राजनीतिक इस्लाम का‌ क्लासिक तेवर है।
यह कुरान में  लिखा है कि काफिर को आतंकित किया जा सकता है (8:12) —  “याद करो तुम्हारे अल्लाह ने फरिश्तों को कहा, ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ। सो तुम मोमिनो को मजबूती से खड़ा रखो। मैं काफिरों के दिल में आतंक भर दूँगा। फिर तुम उन की गर्दनों पर मारो और उन की हर ऊँगलियों को।’”
अब सोचें, किसी मुस्लिम द्वारा काफिरों की गर्दन और ऊँगलियाँ काट देना आतंकवाद है, या जिहाद?
इसी तरह, कुरान दूसरों को अपमानित करने भी कहता है (9:29) — ‘‘किताब वाले लोग जो अल्लाह पर ईमान नहीं लाते, न अखीरत को मानते हैं, न वे चीजें छोड़ते हैं जिसे अल्लाह ने अपने रसूल के माध्यम से हराम ठहराया, उन से तब तक लड़ो जब तक वे अपमानित हो कर जजिया (टैक्स) देने के लिए तैयार नहीं हो जाते।’’
विचार करें — ऐसे निर्देश रिलीजन है या पॉलिटिक्स? कुरान ऐसे निर्देशों से ओत-प्रोत है।
तब मदनी जिसे ‘आतंकवादी घटना’ कहकर अपने ‘पवित्र जिहाद’ से अलग दिखाना चाहते हैं, उस का मतलब क्या है? क्योंकि जिन भी कामों — किसी की गर्दन काट देना, किसी काफिले या गाँव पर हमलाकर लोगों से इस्लाम कबूल करवाने, गुलाम बनकर बेचने, जिम्मी बना कर अपमानित, नीच दरजे का जीवन जीने को मजबूर करना, उन की स्त्रियों-बच्चों को ‘लूट का माल’ मान कर मुस्लिम लड़ाकों में बाँटना, आदि — को आतंकवाद कहा जाता है, वह मुहम्मद ने स्वयं किए थे। यह सब सीरा में बारं-बार दर्ज है। इन सब कामों को मुहम्मद ने जिहाद कहा था। अतः इसे ‘आतंकवादी घटना’ नहीं कहा जा सकता। यह राजनीतिक इस्लाम की सामान्य गतिविधि है।
मुहम्मद ने खुद कहा था कि, ‘’मुझे पाँच चीजें मिली हैं जो पहले किसी और को नहीं मिली थी।’ जिस में पहली ही चीज यह थी:  ‘अल्लाह ने आतंक द्वारा मुझे जीत दिलाई… मेरे दुश्मनों को आतंकित करके।’ तीसरी चीज थी: ‘लड़ाई में लूटा गया माल मेरे लिए जायज बनाया, जो कि मुझसे पहले किसी और के लिए जायज नहीं था।’ (सहीह बुखारी, 1:7:301)।
सो, आतंक का उपयोग करना, और काफिरों का माल लूटना इस्लाम के राजनीतिक सिद्धांत का अंग है। क्योंकि इस्लाम पूरी तरह मुहम्मद के वचन और कर्म से बना है, जिन्होंने काफिरों पर अक्सर आकस्मिक, छिप कर अनेक हमले किए थे। अपने जीवन के अंतिम नौ वर्षों में मुहम्मद ने औसतन हर छः सप्ताह एक हिंसक घटना को अंजाम दिया। इसलिए मुसलमान द्वारा आतंक का उपयोग करना एक मजहबी कार्य है। वे इस का गर्व भी करते हैं कि काफिर उन से डरते हैं।
कोई भी वैज्ञानिक सर्वेक्षण पुष्टि करेगा कि लोकतांत्रिक देशों में इस्लामी माँगों के सामने झुकना, और मुस्लिम नेताओं की उग्र बयानबाजी और जबरदस्ती (जैसे सड़कों को घेर कर नमाज पढ़ना) को बर्दाश्त करना, मुख्यतः डर से होता है। यह डर राजनीति का है, रिलीजन का नहीं। वह राजनीति ही इस्लाम का प्रमुख रूप है।
मौलाना मदनी जैसे अधिकांश मुस्लिम नेताओं का अंदाज भी इस की पुष्टि करता है। वे मीडिया, सरकार, और सुप्रीम कोर्ट पर धौंस-धमकी की भाषा का प्रयोग मजे से करते हैं। देश का राष्ट्रगान ‘वन्दे मातरम्’ नहीं गाने के लिए मुसलमानों को ललकारते हैं। जबकि कहीं जबरिया ‘वन्दे मातरम्’ गवाने का, या ‘मुसलमानों पर गलत आरोप लगाने’ का उदाहरण नहीं देते। किसी ‘आतंकवादी घटना’ का ठोस उल्लेख नहीं करते, ‘जिसे जिहाद कह दिया’ जाता है।
यह सब साफ-साफ हुज्जत, धमकी और धौंस की भाषा है। जिहाद के स्थाई निशाने पर काफिरों को ही अपराध-बोध से भरना कि वही मुसलमानों पर ‘जुल्म’ कर रहे हैं। जैसे, विगत दशकों में कश्मीरी हिन्दुओं ने मुसलमानों पर ‘जुल्म’ किया था — जिस कारण मुसलमानों को जिहाद करके उन का खात्मा करना पड़ा।
इस स्थाई शिकायती, हुज्जती भंगिमा और उग्र बयानबाजी में कोई ईश्वरीय बात नहीं है। कोई रिलीजियस तत्व नहीं है। यह सब शुद्ध राजनीति है। आक्रामक राजनीति। मौलाना मदनी अभी मौखिक हिंसा का ही उपयोग कर रहे हैं जो जिहाद का ही रूप है। (साभार- जारी)
  साभार नया इंडिया से

‘ वंदे मातरम् ‘ पर विमर्श !

लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले जब भारत औपनिवेशिक दासता के अंधकार में डूबा हुआ था, तब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंदमठ में “वंदे मातरम्” की रचना की। यह केवल एक गीत नहीं था, बल्कि वह भावनात्मक शक्ति व ऊर्जा थी जिसने गुलाम भारत को अपनी माता, अपनी पहचान और अपने स्वाभिमान से फिर जोड़ा। 1870 के दशक में रचित  यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ चलता हुआ आज 21वीं सदी के भारत की संसद तक आ पहुँचा है। 8 दिसंबर, 2025 को लोकसभा में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर हुई विशेष बहस ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह रचना आज भी केवल इतिहास ही नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय  सामाजिक एवं राजनीतिक की भावना का उद्घोषऔर राष्ट्रचेतना का जीवंत प्रतीक बनी हुई है।
गुलामी के दौर में “वंदे मातरम्” का  उदघोष केवल भावनात्मक नारा नहीं था, बल्कि वह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध का स्वर था। लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, अरविंदो घोष,केशव बलिराम हेडगेवार , लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, विपिनचंद्र पाल जैसे नेताओं ने इसे जन-जन की चेतना से जोड़ा। “सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्” के माध्यम से भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक जीवित माता के रूप में प्रस्तुत हुआ। रवींद्रनाथ ठाकुर ने ठीक ही कहा था कि इस गीत में भारत की आत्मा बोलती है। इसीलिए यह गीत केवल राजनीतिक क्रांति नहीं, बल्कि’ सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ का आधार बना।
आज जब संसद में इस गीत को लेकर तीखी बहस हुई, तो वह केवल अतीत की व्याख्या पर नहीं, बल्कि वर्तमान राष्ट्रबोध और भविष्य की दिशा पर भी केंद्रित थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि 1937 के कालखंड में ‘वंदे मातरम्’ के कुछ अंशों को राजनीतिक दबाव में हटाकर राष्ट्रचेतना को खंडित किया गया। विपक्ष ने इसे इतिहास को अपने अनुकूल मोड़ने का प्रयास बताया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और डीएमके के नेताओं ने यह तर्क दिया कि इस गीत को विभाजनकारी राजनीति से अलग रखकर राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। यह टकराव दरअसल इस बात का संकेत है कि ‘वंदे मातरम्’ आज भी राजनीतिक बहस के केंद्र में है और इसकी व्याख्या को लेकर राष्ट्र की वैचारिक दिशा तय करने की कोशिशें जारी हैं।
” ‘ वंदे   मातरम् ‘ को लेकर मुस्लिम लीग की विरोध की राजनीति शुरू होती जा रही थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्टूबर, 1937 को’ वंदे मातरम’ के खिलाफ नारा बुलंद किया । कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा,इसलिए   की मुस्लिम लीग के आधारहीन दावों  को करारा जवाब देते, इसके उलट उन्होंने’ वंदे मातरम’  की पड़ताल  शुरू कर दी।”
यह बहस ऐसे समय में हुई है जब भारत ‘विकसित भारत ,2047’ की ओर कदम बढ़ाने का संकल्प दोहरा रहा है। आज का भारत केवल भावनात्मक राष्ट्रवाद से नहीं, बल्कि नीति, तकनीक, सुरक्षा और वैश्विक भूमिका से भी संचालित हो रहा है। संसद में जब डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप, रक्षा, आत्मनिर्भरता, सीमाओं की सुरक्षा और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर चर्चा होती है, तो वह आधुनिक भारत के उस स्वरूप को रेखांकित करती है, जिसमें विकास और राष्ट्र- बोध साथ-साथ चल रहे हैं। इस संदर्भ में ‘वंदे मातरम्’ केवल अतीत का गीत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा भी बनता दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में उभरा राष्ट्रवाद स्वयं को सांस्कृतिक और विकासोन्मुख राष्ट्रवाद के रूप में प्रस्तुत करता है। ‘वंदे भारत’ ट्रेनें, जल जीवन मिशन, हर घर नल योजना, डिजिटल भुगतान प्रणाली, स्वदेशी रक्षा उत्पादन और अंतरिक्ष अभियानों को इस सोच के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। ‘वंदे मातरम्’ का “सुजलाम्–सुफलाम्” आज जल संरक्षण, कृषि सुधार और हरित ऊर्जा के नए संदर्भों में व्याख्यायित किया जा रहा है। चंद्रयान, गगनयान और अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका उस आत्मविश्वास का संकेत है जिसे स्वतंत्रता संग्राम के समय इस गीत ने जन्म दिया था।
हालाँकि ‘वंदे मातरम्’ की समकालीन व्याख्या को लेकर असहमति भी उतनी ही गहरी है। एक पक्ष इसे सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रगौरव का प्रतीक मानता है, तो दूसरा पक्ष इसके राजनीतिक उपयोग पर सवाल उठाता है। यह बहस अपने आप में भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है, जहाँ प्रतीकों की व्याख्या भी खुली बहस के दायरे में होती है। संसद की हालिया बहस ने यह साफ कर दिया कि राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति के तरीकों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र की एकीकरण  से कोई विमुख नहीं है!
आज भारत की वैश्विक भूमिका भी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की सोच से जुड़ती दिखाई देती है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सक्रियता, रूस-यूक्रेन संकट में संतुलित कूटनीति, जी-20 की अध्यक्षता और वैश्विक आर्थिक मंचों पर भारत की भूमिका—ये सभी उस आत्मविश्वासी भारत की छवि निर्मित करते हैं जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा है, लेकिन वैश्विक जिम्मेदारियों से भी पीछे नहीं हटता। इस दृष्टि से ‘वंदे मातरम्’ केवल राष्ट्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक नैतिकता से भी जुड़ता है।
‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य केवल आर्थिक उन्नति तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक समरसता, तकनीकी नवाचार, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक चेतना के संतुलन का भी संकल्प है। स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, हरित ऊर्जा, नेट-जीरो 2070 का लक्ष्य और एक पेड़ माँ के नाम जैसे कार्यक्रम इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा हैं। इन सभी प्रयासों में ‘वंदे मातरम्’ की वह भावना अंतर्निहित है जिसमें मातृभूमि की सेवा सर्वोच्च कर्तव्य मानी जाती है।
सवाल यह है कि क्या ‘वंदे मातरम्’ आज भी उसी तरह एकजुट करने वाली शक्ति बना रह सकता है, जैसे वह स्वतंत्रता संग्राम के दौर में था? संसद की ताज़ा बहस इसका आंशिक उत्तर देती है। आरोप-प्रत्यारोप, वैचारिक संघर्ष और राजनीतिक मतभेदों के बावजूद यह स्पष्ट है कि राष्ट्र की केंद्रीय अवधारणा सभी राजनीतिक धाराओं के लिए अभी भी अपरिहार्य बनी हुई है। इसी अर्थ में ‘वंदे मातरम्’ एक सांस्कृतिक धरोहर के साथ-साथ एक जीवंत राजनीतिक प्रतीक भी है।
डेढ़ सौ वर्षों की यात्रा के बाद ‘वंदे मातरम्’ जिस मोड़ पर खड़ा है, वहाँ वह केवल स्मृति का विषय नहीं, बल्कि सतत पुनर्व्याख्या की मांग भी करता है। यह गीत हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि साझा चेतना, साझी जिम्मेदारी और सामूहिक भविष्य का नाम है। संसद में हुई बहस ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रप्रेम की भावना आज भी उतनी ही प्रबल है, भले ही उसके स्वर और रूप बदल गए हों।
भारतीय कांग्रेस के 1896 के अधिवेशन में रविंद्र नाथ टैगोर ने गीत को स्वर दिया। फिर, 7 अगस्त, 1905 को  बंगाल विभाजन के विरुद्ध कोलकाता के टाउन हॉल में बहिष्कार सभा में इसे गाया गया था।  दिसंबर,1905 में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में  ‘ वंदे मातरम ‘ को राष्ट्रगीत का दर्जा मिला। अरविंदो घोष ने गीत  का अंग्रेजी में अनुवाद किया एवं केरल के राज्यपाल मोहम्मद आरिफ खान(वर्तमान बिहार के राज्यपाल) ने ‘ उर्दू ‘ में अनुवाद किए ।1906 में ‘ वंदे मातरम ‘ देवनागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया  कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में रविंद्र नाथ ठाकुर ने इसका संशोधित रूप प्रस्तुत किया। 1906 में लाला लाजपत राय ने ‘ वंदे मातरम’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। 1907 में भीकाजी कामा ने स्टटगार्ड में पहला भारतीय ध्वज फहराया, जिस पर  स्वर्णाक्षरों में लिखा था ‘ वंदे मातरम’ । सितंबर, 1909 में पेरिस में वंदे मातरम का सचित्र  मैडम भीकाजी कामा द्वारा स्थापित “पेरिस इंडियन सोसाइटी” में मदन लाल ढींगरा के फांसी के चित्र के साथ किया था।
14 अगस्त, 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का आरंभ  ‘ वंदे मातरम ‘ एवं समापन  ‘ जन गण मन’ के साथ हुआ था। 15 अगस्त ,1947 को प्रातः 6:30 बजे आकाशवाणी से पंडित ओंकार नाथ ठाकुर के  राग( स्वर) में  गान ‘ वंदे मातरम’ के गायन का सीधा प्रसारण किया था। 24 जनवरी, 1950 को’ वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गीत  एवं ‘ जन गण मन ‘ राष्ट्रीय गान बना था। 15 सितंबर, 1959 में दूरदर्शन प्रारंभ हुआ, तब से सुबह की शुरुआत’ वंदे मातरम’ से  होती रही हैं। सन् 2025 में’ वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूर्ण होने पर देश भर में विशेष आयोजन और सामूहिक गायन हुआ, जिसमें आकाशवाणी की भूमिका महत्वपूर्ण रही ।वर्तमान में भी दूरदर्शन पर ‘ वंदे मातरम’ का धुन बजता है। राष्ट्रीय उत्सव, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर दूरदर्शन ने ‘ वंदे मातरम ‘ की नई और  सुंदर धुन प्रस्तुत की है, जो राष्ट्रभक्ति की भावना को प्रबल करती है। वर्ष ,2002 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस में वैश्विक स्तर के सबसे लोकप्रिय 10 गीतों को चुनने के लिए एक ऑनलाइन सर्वेक्षण कराया था, इसमें वैश्विक  स्तर के 150 देशों  के इंटरनेट यूजर्स ने  ‘ वंदे मातरम ‘ को दूसरा सबसे लोकप्रिय गीत चयनित किया था।
सन् ,2005 में वंदे मातरम के 100 वर्ष पूरे होने पर  वर्षभर समारोह हुआ था। 17 सितंबर, 2006 को समारोह  के समापन पर मानव संसाधन मंत्रालय( अब  केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय) ने गीत को विद्यालयों में गाने पर जोर दिया, लेकिन  विरोध होने पर तत्कालीन  संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ( यूपीए)  सरकार ने कहा कि,” यह अनिवार्य नहीं, स्वेच्छा पर निर्भर करता है।”
आज जब भारत विश्व मंच पर अपनी नई पहचान गढ़ रहा है, तब यह आवश्यक है कि ‘वंदे मातरम्’ को केवल राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मा के प्रतीक के रूप में देखा जाए। यही इसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता है—तब भी, अब भी और आने वाले समय में भी।
(लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना झंडेवालान, नई दिल्ली
राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं)

बाल साहित्यकार डॉ. विकास दवे का समरस संस्थान द्वारा अभिनंदन

कोटा ।  समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत गांधीनगर, गुजरात के पदाधिकारियों ने रविवार को कोटा में आयोजित एक कार्यक्रम में मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे को अभिनंदन किया। संस्थान के संस्थापक एवं संयोजक डॉ. मुकेश कुमार व्यास की ओर से राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शशि जैन एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने डॉ. दवे को माल्यार्पण कर , संस्था का उपराना और शाल ओढ़ा कर अभिनंदन पत्र भेंट किया। राजस्थान प्रांत प्रभारी डॉ. वैदेही गौतम, संभागीय अध्यक्ष महेश पंचोली, जितेंद्र निर्मोही, रीता गुप्ता, साधना शर्मा ,विजय जोशी मौजूद रहे।
अभिनंदन पत्र का वाचन करते हुए डॉ. प्रभात सिंघल ने कहा विस्तृत आभामंडल वाले देव बाल साहित्य के फलक को अपनी चन्द्र किरणों से आलोकित कर रहे हैं। हंसमुख, सरल , सहज स्वभाव वाले देव ज्ञानवान हैं, कर्मयोगी हैं, क्षीण विचारों से मुक्त हैं। आपको राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी से अनुमोदित, डॉ. मृदुला सिन्हा (महामहिम राज्यपाल, गोआ) द्वारा अभियान का ब्रांड एम्बेसेडर मनोनित किया जाना गर्व की बात है।
अहर्निश बाल साहित्य सृजन के साथ-साथ डॉ. दवे कर्त्तव्य परायणता, आस्था, निष्ठा एवं नैतिकता के साथ मध्यप्रदेश सरकार की साहित्य अकादमी में निदेशक के रूप में अपनी रचनात्मक भूमिका का निर्वाह कर हिंदी, साहित्य और संस्कृति की सेवा कर रहे हैं। सृजन और सेवा से आपने साहित्य जगत में अपना विशिष्ठ स्थान बनाया है। आपके मार्गदर्शन, मूल्यवान परामर्श एवं प्ररेणा से साहित्य अकादमी देशभर में अग्रणीय पंक्ति में है।
भारतीय पौराणिक संस्कृति और राष्ट्र भक्ति के साथ-साथ बाल मनोविज्ञान से प्रेरित बाल साहित्यकार डॉ. विकास दवे राजस्थान और मालवा के गौरव हैं और साहित्य जगत में उनका कद व व्यक्तित्व समस्त सीमाओं से परे है । इन्होंने विश्व की सर्वाधिक प्रसार संख्या वाली पत्रिका ‘देवपुत्र’ का 32 वर्ष तक संपादन किया और वर्तमान में मानद संपादक के रूप बाल-साहित्य के उत्थान के लिए कटिबद्ध हैं। आपने ‘समकालीन बाल साहित्य’ (भारत की प्रथम बाल साहित्य शोध पत्रिका), ‘हरिद्रा’ अंतराष्ट्रीय शोध पत्रिका तथा साहित्य अकादमी म. प्र. की पत्रिका ‘साक्षात्कार’ का संपादन भी किया है। विविध विषयों पर इनके 50 से अधिक शोध आलेख प्रकाशित हो चुके हैं।
आपने देशभर की प्रतिष्ठित व्याख्यान मालाओं, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में बाल साहित्य सहित अनेक विषयों पर तीन हजार से अधिक व्याख्यान दिए हैं। पाठ्यक्रमों में आपकी रचनाएं शामिल हैं। आपको 150 से अधिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय  सम्मान प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है।
चंबल से श्रृंगारित कोटा नगर में स्वागत करते हुए बाल साहित्य में विराट व्यक्तित्व के धनी डॉ. विकास दवे को उनके  सहिष्णु स्वभाव, जन हितैषी, साहित्यिक और राष्ट्रीय  महत्त्व के कार्यों में अनुपम योगदान करने वाले व्यक्तित्व को यह अभिनंदन पत्र समर्पित करते हुए हम हर्ष और गौरव का अनुभव कर रहे हैं। हम आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।
 इस अवसर  बाल साहित्यकार दिविक रमेश, , बलदाऊ राम साहू, ओमप्रकाश क्षत्रिय एवं बड़ी संख्या में हाड़ोती अंचल के बाल साहित्यकार उपस्थित रहे। सभी ने उनके उनके बाल साहित्यिक कार्यों को प्रेरक और अनुकरणीय बताया।

भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान द्वारा केवल अंग्रेज़ी में जारी अवैध, असंवैधानिक एवं शून्य भर्ती सूचनाओं के विरुद्ध शिकायत

सेवा में,
माननीय सचिव महोदय,
कार्पोरेट कार्य मंत्रालय,
भारत सरकार,
शास्त्री भवन,
नई दिल्ली – 110001।

विषय:
राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) एवं संविधान के अनुच्छेद 14 का घोर उल्लंघन – भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान द्वारा केवल अंग्रेज़ी में जारी अवैध, असंवैधानिक एवं शून्य भर्ती सूचनाओं के विरुद्ध शिकायत।

महोदय,

राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) के अनुसार केंद्र सरकार के अधीन सभी संस्थानों द्वारा जारी किए गए भर्ती सूचनाएँ, आवेदन प्रपत्र, निविदाएँ आदि दस्तावेज़ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में एक साथ समकालिक रूप से जारी किए जाएँ।

यह द्विभाषिक समकालिकता वैधता की अपरिहार्य शर्त है। केवल अंग्रेज़ी में जारी कोई भी भर्ती सूचना/आवेदन प्रपत्र प्रारंभ से ही अवैध एवं शून्य (void ab initio) है तथा उसे जारी करने की कोई अनुमति नहीं दी जा सकती।


संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन

अनुच्छेद 14 के अनुसार कानून के समक्ष सभी नागरिकों को समान अधिकार हैं। भाषा-आधारित भेदभाव अस्वीकार्य है।

केवल अंग्रेज़ी में भर्ती सूचना जारी करना हिंदी-भाषी आवेदकों के साथ घोर भेदभाव है। वे अपनी मातृभाषा में नौकरी की जानकारी न पाने से रोज़गार के अवसरों से वंचित हो जाते हैं, जो अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन है।


उल्लंघन के तथ्य

दस्तावेज़ का नाम:
भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान मानेसर द्वारा विभिन्न संविदा पदों हेतु भर्ती परिपत्र।
(Vacancy Circular No. IICA-2-44/2012 dated 01.12.2025 regarding vacancies for various contractual positions in Indian Institute of Corporate Affairs)

पत्रांक: IICA-2-44/2012
दिनांक: 01 दिसंबर 2025
वर्तमान उपलब्धता: केवल अंग्रेज़ी में


उल्लंघन के बिंदु

  1. धारा 3(3) का उल्लंघन:
    भर्ती सूचना/वैकेंसी परिपत्र धारा 3(3) के अंतर्गत “नोटिस/भर्ती अधिसूचना” की श्रेणी में आता है, अतः द्विभाषिक होना अनिवार्य है। इसे केवल अंग्रेज़ी में जारी करना प्रत्यक्ष उल्लंघन है।

  2. अनुच्छेद 14 का उल्लंघन:
    केवल अंग्रेज़ी में सूचना देने से हिंदी-भाषी भारतीय नागरिकों को रोज़गार के समान अवसर नहीं मिलते, जो उनके संवैधानिक अधिकार का हनन है।

  3. रोज़गार में भेदभाव:
    हिंदी-भाषी प्रतिभावान उम्मीदवार अंग्रेज़ी भाषा की बाधा के कारण नौकरी के अवसर से वंचित रह जाते हैं, भले ही वे पद के लिए योग्य हों।

  4. आवेदन प्रपत्र पूर्णतः अंग्रेज़ी में:
    संस्थान द्वारा जारी किया गया आवेदन प्रपत्र (Application Form) भी पूर्णतः अंग्रेज़ी में है, जिससे हिंदी-भाषी आवेदक निर्देशों को सही तरीके से नहीं समझ पाते।

  5. द्विभाषिक समकालिकता का अभाव:
    न तो हिन्दी संस्करण साथ-साथ जारी किया गया, न ही मंत्रालय/संस्थान की हिन्दी वेबसाइट पर उपलब्ध है, जिससे धारा 3(3) की “समकालिकता” की शर्त पूर्ण नहीं होती।

  6. संविदा पदों की सूची:
    IICA द्वारा यह भर्ती परिपत्र संविदा पदों के लिए है, जहाँ भाषाई बाधा के कारण प्रतिभा का बहिष्करण होता है।


उपर्युक्त वैकेंसी परिपत्र एवं आवेदन प्रपत्र निम्नलिखित कारणों से प्रारंभ से ही अवैध एवं शून्य है:

  • धारा 3(3) की अनिवार्य द्विभाषिक समकालिकता का उल्लंघन।

  • संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत रोज़गार के अवसरों में भाषाई भेदभाव।

  • राष्ट्रपति महोदय के 02-07-2008 के आदेशों की खुली अवहेलना।

  • भाषाई आधार पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन।

इस अवैध एवं शून्य भर्ती सूचना को जारी करने की कोई अनुमति नहीं दी जा सकती।


अपेक्षित तत्काल कार्रवाई

  1. भर्ती सूचना का तत्काल निरस्त करें:
    उपर्युक्त अवैध एवं शून्य वैकेंसी परिपत्र तत्काल निरस्त किया जाए।

  2. द्विभाषिक पुनः-जारी:
    उसी भर्ती सूचना को हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में एकसाथ एक ही समय में पुनः जारी किया जाए।

  3. आवेदन अवधि का विस्तार:
    आवेदन के लिए पर्याप्त नई अवधि दी जाए ताकि हिंदी-भाषी भी आवेदन कर सकें।

  4. आवेदन प्रपत्र द्विभाषिक बनाएँ:
    भविष्य में सभी आवेदन प्रपत्र हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में उपलब्ध कराए जाएँ।

  5. अनुशासनात्मक जाँच:
    IICA के निदेशन में राजभाषा अधिकारी एवं संबंधित अधिकारियों पर जाँच कराई जाए, जिन्होंने धारा 3(3) एवं राष्ट्रपति के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना की है।

  6. भविष्य के लिए आदेश:
    आदेश जारी किया जाए कि IICA द्वारा भविष्य में कोई भी भर्ती सूचना केवल द्विभाषिक रूप में ही जारी होगी, अन्यथा वह स्वतः अवैध मानी जाएगी।

  7. राजभाषा कार्यान्वयन:
    IICA में राजभाषा कार्यान्वयन समिति गठित की जाए तथा त्रैमासिक रिपोर्ट तैयार की जाए।

  8. सूचना का अधिकार:
    इस शिकायत पर की गई समस्त कार्यवाही, जाँच-रिपोर्ट, निर्णय आदि की प्रतियाँ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में मुझे प्रेषित की जाएँ।


संलग्नक

  1. दिनांकित 01-12-2025 का अवैध भर्ती परिपत्र (अंग्रेज़ी में)

  2. आवेदन प्रपत्र की पीडीएफ़ (अंग्रेज़ी में)

  3. राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) की लिंक


प्रतिलिपि:

  1. माननीय गृहमंत्री, गृह मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली।

  2. सचिव व संयुक्त सचिव, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली।

  3. सचिव, संसदीय राजभाषा समिति, लोकसभा सचिवालय, नई दिल्ली।

  4. निदेशक, भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान, गुड़गाँव।

  5. प्रभारी, कार्पोरेट कार्य मंत्रालय, राजभाषा प्रकोष्ठ, नई दिल्ली।

  6. सार्वजनिक शिकायत निवारण पोर्टल (पीजी पोर्टल), भारत सरकार।

  7. निदेशक, भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान, गुड़गाँव।