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केरल के मुन्नार से भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ेगी ये ‘सोनिया गांधी’

वामपंथियों के गढ़ केरल में मुन्नार के शांत पहाड़ी इलाके में इस बार पंचायत चुनाव दिलचस्पी का केंद्र बना हुआ है। वजह है भाजपा की वह उम्मीदवार जिसका नाम सुनकर लोग चौंक जाते हैं, सोनिया गाँधी। 34 वर्षीय यह सोनिया गाँधी नल्लथन्नी कल्लर की रहने वाली हैं और पहली बार नल्लथन्नी के वॉर्ड 16 से पंचायत चुनाव में किस्मत आजमा रही हैं।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, सोनिया के पिता भी कॉन्ग्रेस से जुड़े रहे थे और उन्होंने पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी से प्रभावित होकर अपनी बेटी को यह नाम दिया था। माना जाता है कि उनका परिवार आज भी कॉन्ग्रेस का ही समर्थक है। हालाँकि, शादी के बाद सोनिया गाँधी की किस्मत बदल गई।

सोनिया के पति सुभाष बीजेपी के पंचायत महासचिव हैं और उन्होंने ओल्ड मुन्नार मुलक्कड़ से पहले उपचुनाव भी लड़ चुके हैं। समय के साथ, सोनिया भी भाजपा में शामिल हो गईं। सोनिया का कहना है कि उनके पति बीजेपी में हैं और वह हमेशा से उनका समर्थन करती रही हैं। बकौल सोनिया, पति के समर्थन के कारण ही वह बीजेपी से चुनाव मैदान में उतरी हैं।

बीजेपी की सोनिया गाँधी का इस सीट पर मुकाबला कॉन्ग्रेस की मंजुला रमेश और CPM की वलारमती से है। केरल में 9 और 11 दिसंबर को दो चरणों में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव होने हैं। राज्य की 941 ग्राम पंचायतों, 152 ब्लॉक पंचायतों, 14 जिला पंचायतों, 87 नगर पालिकाओं और 6 नगर निगमों में होने हैं। इनमें 21,000 से अधिक वार्ड में 75,000 से अधिक उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

जापान के लिए सिरदर्द बनी बढ़ती मुस्लिम आबादी, 45 साल में 40 गुना बढ़ी मस्जिदें

यूरोप में आर्थिक विकास के साथ साथ प्रवासी मुस्लिमों की संख्या लगातार बढ़ी। ऐसा ही हाल जापान का हो गया है। पाकिस्तान, ईरान, इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक देशों से मुस्लिम कामगार के रूप में यहाँ आ रहे हैं और बस रहे हैं। यही वजह है कि जापान में मस्जिदों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई है। जून 2024 तक यहाँ 149 मस्जिदें बनीं।

जापान में मुस्लिम आबादी की बेतहाशा वृद्धि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। यहाँ बड़े-बड़े मस्जिद बन गए हैं। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद देखा जा सकता है। जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी इस्लाम को मानने वालों की है। हाल ही में कब्रिस्तान को बनाने के लिए जगह देने को लेकर जापानी संसद में सवाल पूछे गए। इसके बाद मुस्लिम आबादी का मामला सुर्खियों में आ गया।

दुनियाभर में मुस्लिम आबादी बेहताशा बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक, इस सदी के अंत तक ईसाइयों को पीछे छोड़ते हुए इस्लाम मानने वालों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी।

दुनिया में 200 से ज्यादा देशों में इनकी अच्छी खासी आबादी है। इन देशों में इस्लामी गतिविधियाँ तेजी से बढ़ी हैं। 2013 में विश्व जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 1.6 अरब थी और 2050 तक 2.9 अरब यानी विश्व जनसंख्या का करीब 26% तक पहुँचने का अनुमान है। यही वजह से की विश्व के छोटे-छोटे देशों में भी इनकी संख्या दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ रही है।

छोटा सा एशियाई देश जापान भी इससे अछूता नहीं है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में मुस्लिम आबादी करीब 1.30 लाख थी। इनमें से 1.20 लाख विदेशी मुस्लिम और 10 हजार जापानी मुस्लिम रहते थे। लेकिन अब इस्लाम को माननेवालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी है। मुस्लिमों की कुल आबादी जापान की आबादी का 0.18 फीसदी से 0.33 फीसदी है, जो साल-दर-साल बढ़ रही हैं।

ये लोग ज्यादातर प्रवासी कामगार हैं, जो टेक्नोलॉजी, बिजनेस और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। जापान में मुसलमानों पर स्टडी करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तनाडा के एक सर्वे के मुताबिक, इनकी संख्या 200,000 से ज़्यादा होने का अनुमान है। मार्च 2021 तक, देश भर में मस्जिदों, यानी पूजा की जगहों की संख्या 1999 में 15 से बढ़कर 113 हो गई है।

जापानी की अधिकांश मुस्लिम आबादी (लगभग 80%) ग्रेटर टोक्यो क्षेत्र, चुक्यो महानगरीय क्षेत्र और किन्ही क्षेत्र में रहते हैं। अब इनका विस्तार दूसरे क्षेत्रों में भी हो रहा है।

ईरान और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों से मजदूरों के बढ़ते इमिग्रेशन और धर्मांतरण की वजह से जून 2024 तक यहाँ 149 मस्जिदें बन गई हैं। यानी इनकी संख्या 10 गुणा बढ़ गई हैं। कई मस्जिदों को बड़ा बनाया गया है।

टोक्यो में टोक्यो कैमी मस्जिद को हाल ही में बहुमंजिला बनाया गया है और समय-समय पर आम जनता को लुभाने के लिए इस्लामिक गतिविधियाँ चलाई जाती हैं। दिसंबर 2012 के मध्य में एक शुक्रवार को दोपहर के आसपास, टोक्यो के शिबुया वार्ड में टोक्यो कैमी मस्जिद में एक खास आवाज में आदमी ने अज़ान दिया और नमाज का समय बताया। उसने कहा, “मस्जिद घर जैसी है। अल्लाहु अकबर।”

यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद बन चुकी है। जैसे- वासेदा विश्वविद्यालय के टोकोरोजावा परिसर के पास एक इमारत बनी थी, जिसे मस्जिद के रूप में उपयोग करने के लिए पुनर्निर्मित किया गया है।

1990 के दशक में यहाँ मस्जिदों की संख्या तेजी से बढ़ी। 1980 में जहाँ सिर्फ 4 मस्जिदें थी, वहीं 1990 के दशक में ये बढ़ कर 90 से ज्यादा हो गई। इन वर्षों में इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए बाहरी देशों से कई लोग आए और मस्जिदों में कार्यक्रम आयोजित कर जापानियों को लुभाने की कोशिश की गई यानी जापानियों के धर्मांतरण में इन कार्यक्रमों की अहम भूमिका रही।

अब हालात ये हैं कि न सिर्फ प्रवासी मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, बल्कि जापान की मूल आबादी का धर्मांतरण तेजी से हुआ है। जापान में प्रवासी मुस्लिमों के बसने और परिवार बसाने की वजह से एक ‘हाइब्रिड मुस्लिम’ आबादी तैयार हो गई है। नमाज पढ़ना और रोजा रखना जैसे रीति रिवाज का पालन बड़ी आबादी करती है। इनमें कट्टरता भी देखी जाती है।

जापान में हाल ही में ये खबर भी सामने आई कि सरकार ने शव दफनाने के लिए कब्रिस्तान बनाने के लिए जमीन देने से इनकार कर दिया है और प्रवासी मुस्लिमों को शव अपने देश लेकर दफनाने को कहा है। हालाँकि सरकार ने जापानी संसद में इसको लेकर स्पष्टीकरण दिया है।

दरअसल हाउस ऑफ काउंसिलर्स की प्रतिनिधि उमेमुरा मिजुहो ने कहा कि जापान में छोटा भू भाग है। प्राकृतिक आपदाएँ यहाँ होती रहती हैं, ऐसे में किसी बड़ी आपदा की स्थिति में दफनाने पर शवों के बाहर निकलने की संभावना है। साथ ही 99 फीसदी आबादी यहाँ दाह संस्कार करती है, इसलिए जापान की स्थिति को देखते हुए दफनाने से जुड़े नियम कड़े किए जाने चाहिए।

इसको लेकर सरकार ने स्थानीय सरकार को इसके बारे में विचार करने को कहा है। साथ ही स्थानीय रीति रिवाजों, नियमों और पर्यावरण को भी ध्यान में रखने को कहा है। क्योडो न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में मुस्लिम आबादी बढ़ने के बाद जापानी मुस्लिमों को दफनाने के लिए नई जगहों की जरूरत है।

एजेंसी का कहना है कि कुछ लोकल सरकारें बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए नए कब्रिस्तानों के लिए ज़मीन अलग रखने को तैयार हैं, जबकि दूसरी सरकारें इतनी मदद नहीं कर रही हैं।

जापान में दाह संस्कार आम बात है और 99.9% शवों का दाह संस्कार किया जाता है। इससे मुसलमान अपने दफ़नाने के तरीकों को लेकर परेशान हैं।

उत्तर-पूर्वी जापान में मौजूद मियागी प्रांत के गवर्नर ने दिसंबर में कहा था कि 2023 में इंडोनेशिया के साथ लोकल इलाकों के लिए मज़दूर देने के लिए मेमोरेंडम साइन करने के बाद एक नए कब्रिस्तान पर विचार किया जा रहा है।

जापान शांति पसंद देश माना जाता है। अनुशासन प्रिय इस देश की बड़ी आबादी बुजुर्ग हो चुकी है। ऐसे में कामगार की जरूरत को पूरा करने के लिए विदेशों से लोग यहाँ आकर बस रहे हैं। इनमें मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है। खासकर ईरान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया जैसे देशों से कामगार आकर यहाँ स्थायी रूप से बस रहे हैं। इसका असर जापान में दिखने लगा है।

साभार- https://hindi.opindia.com/ से

‘मो माः मो प्रेरणा’(मेरी माँ-मेरी प्रेरणा) पुस्तक का लोकार्पण

भुवनेश्वर: मातृत्व और प्रेरणा को समर्पित डॉ. अच्युत सामंत की नवीनतम कृति ‘मेरी मां: मेरी प्रेरणा’ का लोकार्पण सोमवार को एक विशेष समारोह में हुआ।  कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ओडिशा के पूर्व राज्यपाल प्रो. गणेशी लाल ने पुस्तक का अनावरण किया।  इस अवसर पर पाँच अन्य पुस्तकों का भी विमोचन किया गया।  प्रो. गणेशीलाल  ने कहा, “मां ही हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाती है” —

अंग्रेज़ी संस्करण के विमोचन में उपराष्ट्रपति के साथ उपस्थित रहे प्रो. गणेशी लाल ने मातृत्व की महिमा पर एक भावपूर्ण संबोधन दिया।

उन्होंने कहा,“प्रकृति के तीन गुणों—सहित अज्ञान—से कोई मुक्त नहीं है। पर माँ ही हमें इनसे ऊपर उठाती है।”उन्होंने ओडिशा में बिताए अपने वर्षों को स्मरण करते हुए कहा,“यहीं आकर मैंने ‘माँ’ शब्द का अर्थ पहले से कहीं अधिक गहराई से समझा।”

उन्होंने डॉ. सामंत की माता की महानता को रेखांकित करते हुए कहा,“उन्होंने देवकी की तरह महान त्याग किए—एक कृष्ण को इस धरती पर लाने के लिए। माँ अनिवार्य है। यदि ईश्वर तक पहुँचना है, तो पहले माँ को सम्मान देना होगा।”“मां सबसे शक्तिशाली शब्द है”—मनीष सिंगला,सुपुत्र प्रोफेसर गणेशीलाल

प्रो. गणेशीलाल के पुत्र मनीष ने भी कार्यक्रम में भावपूर्ण वक्तव्य दिया और मां सं संबंधित सुमधुर गीत गाये। उन्होंने कहा,“‘माँ’ सबसे शक्तिशाली शब्द है। अच्युत सामंत ने मन भी पाया है और माया भी।”

उन्होंने माँ पर एक भक्तिपूर्ण गीत भी प्रस्तुत किया, जिसने सभी को भाव-विभोर कर दिया।

“प्रेम और स्नेह ही मेरा संबल”—डॉ. सामंत

समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. अच्युत सामंत ने एक पुरानी भावुक स्मृति का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा,“मुझे याद है जब प्रो. गणेशी लाल ने, राज्यपाल रहते हुए, मुझे मेरे कामों के कारण ‘किसी दूसरे ग्रह से आया व्यक्ति’ कहा था। उनका स्नेह हमेशा मुझे ऊर्जा देता आया है।”

गीता जयंती और मोक्षदा एकादशी के अवसर का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि पुस्तक में गीता के संदेश और भगवान कृष्ण के ‘दिव्य वत्स’ रूप से एक सांकेतिक जुड़ाव भी है।उन्होंने कहा कि ओड़िया संस्करण अंग्रेज़ी संस्करण का सीधा अनुवाद नहीं है, बल्कि इसमें उनके जीवन के कई गहरे अनुभव और अतिरिक्त प्रसंग शामिल हैं।

उन्होंने कहा,“मैं लोगों के प्रेम और सम्मान के कारण कड़ी मेहनत करता हूँ। माँ ने सिखाया था—यदि तुमने कोई गलत काम नहीं किया है, तो किसी से डरने की ज़रूरत नहीं।”उन्होंने दोहराया कि कीट और कीस आज ओडिशा और उसके लोगों के संरक्षक बन चुके हैं।

साहित्य, अध्यात्म और पत्रकारिता जगत की हस्तियों ने की सराहना कार्यक्रम में साहित्य, आध्यात्मिकता और पत्रकारिता जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियाँ मौजूद थीं।

वरिष्ठ लेखक रक्षक नायक ने पुस्तक को “अच्छे और कठिन समयों का संतुलित चित्रण, साहस और प्रेरणा से भरी हुई” बताया।

प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो. हरिकृष्ण सतपथी ने प्रो. गणेशी लाल को “ओडिशा का सर्वश्रेष्ठ नागरिक” बताया—ओड़िया भाषा, संस्कृति और साहित्य के प्रति उनके प्रेम के कारण।

उन्होंने कहा कि वे “जन-जन के राज्यपाल” हैं, जिन्हें राज्य सदैव याद रखेगा।

डॉ. सामंत को उन्होंने “सर्वोत्तम साधक” बताते हुए कहा कि उन्हें अब तक 70 से अधिक विश्वविद्यालयों ने मानद उपाधि प्रदान की है।

“वे अपने संस्थानों के प्रति समर्पण और अपने लोगों के प्रति करुणा के प्रतीक हैं।”

वरिष्ठ पत्रकार उमापद बोस ने कहा कि यह पुस्तक “इतिहास, अर्थशास्त्र और गीता के एक नए अध्याय का अद्भुत मिश्रण” है।

इस अवसर पर आध्यात्मिक गुरु बाबा रामनारायण दास और साहित्यकार प्रो. शशांक चूड़ामणि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

‘भाजपा के 11 साल एएसआई के लिए अंधकार युग’- के के मुहम्मद

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक केके मुहम्मद ने रोकी गई खुदाई और सांस्कृतिक विरासत की उपेक्षा की आलोचना की। अनुभवी पुरातत्वविद् ने कहा कि सांस्कृतिक संरक्षण के संबंध में उनकी और अन्य लोगों की सरकार से जो अपेक्षाएं थीं, वे “पूरी नहीं हुईं”।

उन्होंने  भाजपा सरकार के पिछले ग्यारह वर्षों को देश के इस प्रमुख धरोहर निकाय के लिए “अंधकार युग” बताया है। उन्होंने केंद्र पर संरक्षण की उपेक्षा करने, महत्वपूर्ण उत्खनन में देरी करने और भारत की सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करने में विफल रहने का आरोप लगाया।

इंडिया टुडे से बात करते हुए, वरिष्ठ पुरातत्वविद् ने कहा कि सांस्कृतिक संरक्षण के संबंध में सरकार से उनकी और अन्य लोगों की जो अपेक्षाएं थीं, वे “पूरी नहीं हुईं”। उन्होंने कहा, “जब भाजपा सरकार सत्ता में आई तो हम सभी को उससे बहुत उम्मीदें थीं। इसलिए, हमने सोचा था कि इन लोगों की तरफ से एक तरह की… सुरक्षा ज़्यादा होगी, और वे संस्कृति में काफ़ी रुचि लेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।” उन्होंने आगे कहा, “हम इसे पिछले 11 सालों के भाजपा काल का अंधकार युग कहते हैं। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का अंधकार युग है।”
जब उनसे पूछा गया कि ऐसा क्यों हुआ, तो मुहम्मद ने रुके हुए संरक्षण कार्य की ओर इशारा किया, जिसमें चंबल स्थित बटेश्वर मंदिर परिसर भी शामिल है, जहां उन्होंने पहले एक बड़े पुनरुद्धार कार्य का निरीक्षण किया था।

 “उदाहरण के लिए, मेरा अपना बटेश्वर मंदिर, जहाँ मैंने काम किया था। वहाँ चंबल के काटो के साथ-साथ हम लगभग 90 मंदिरों का पुनर्निर्माण करने में सक्षम रहे हैं। लेकिन भाजपा के 11 वर्षों के दौरान, केवल 10 मंदिरों का पुनर्निर्माण किया गया, और वह भी बहुत प्रयास करने के बाद। मुझे उसके लिए बहुत अभ्यास करना पड़ा, अन्यथा वह भी नहीं हो पाता।”

उन्होंने दिल्ली के पुराना किला समेत कई जगहों पर महत्वपूर्ण खुदाई रोकने के लिए सरकार की आलोचना की। मुहम्मद ने कहा, “पुराना किला में खुदाई जारी रहनी चाहिए थी। डॉ. वसंत कुमार स्वर्णकार इसकी खुदाई कर रहे थे। उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली थी। ऐसा होना चाहिए था।” उन्होंने आगे कहा, “और इसी तरह, कई अन्य जगहों पर भी खुदाई होनी चाहिए थी। सरकार को इसे अपने हाथ में लेना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।”

उनके अनुसार, सत्तारूढ़ दल के “संस्कृति के असली मालिक” होने के दावे ने एक ऐसा माहौल बनाया है जहाँ निगरानी और आलोचना कमज़ोर हो गई है। उन्होंने कहा, “क्योंकि वे दावा करते हैं कि वे संस्कृति के असली मालिक हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।” हालाँकि, उन्होंने स्वीकार किया कि कई जगहों पर यह काम हो रहा है, जो कांग्रेस के ज़माने में नहीं था।

के के मुहम्मद का व्यक्तित्व और कृतित्व

करिंगमन्नु कुझियिल मुहम्मद (जन्म 1 जुलाई 1952) एक भारतीय पुरातत्वविद् हैं, जिन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के क्षेत्रीय निदेशक (उत्तर) के रूप में कार्य किया । मुहम्मद को इबादत खाना के साथ-साथ विभिन्न प्रमुख बौद्ध स्तूपों और स्मारकों की खोज का श्रेय दिया जाता है । अपने करियर के दौरान, उन्होंने बटेश्वर परिसर के जीर्णोद्धार का कार्य किया , नक्सल विद्रोहियों और डकैतों को सहयोग के लिए सफलतापूर्वक राजी किया , साथ ही दंतेवाड़ा और भोजेश्वर मंदिरों का जीर्णोद्धार और जीर्णोद्धार भी किया ।

जीवन परिचय
के.के. मोहम्मद केरल के कालीकट में एक माध्यम वर्गीय परिवार में पैदा हुए थे. बीयरन कुट्टी हाजी और मारीयाम् की पांच संतानों में वे दुसरी संतान है. सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय, कोदवली से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में अपनी मास्टर डिग्री और स्नातकोत्तर डिप्लोमा इन पुरातत्व : स्कुल ऑफ़ पुरातत्व सर्वेक्षण, पुरातात्विक सर्वेक्षण भारत, नई दिल्ली, भारत से किया। केके मुहम्मद ने 29 जुलाई 1983 को कालिकट की निवासी राबिया से शादी की। उनके दो संतानें हैं, जमशेद और शाहीन।

प्रमुख पुरातात्विक खोज
इबादत खाना ,जिस संरचना में अकबर ने समग्र धर्म का निर्माण किया जिसे दीन-ए -इलाही (भारतीय धर्मनिरपेक्षता की नर्सरी) कहा जाता है।
फतेहपुर सीकरी में अकबर द्वारा निर्मित उत्तर भारत के पहले ईसाई चैपल की खोज की।
बटेश्वर परिसर का पुनरुथान
सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए केसरी के बौद्ध स्तूप का उत्खनन किया।
राजगीर में बौद्ध स्तूप की खोज और उत्खनन किया।
कोलहु, वैशाली में बौद्ध पुरातात्विक स्थल का उत्खनन किया।
कालीकट और केरल के मलापुरम जिलों में रॉक कट की गुफाएं, छाता पत्थरों, सिस्ट्स और डोलमेंस की खोज और खुदाई की।

के.के. मोहम्मद ने अपनी आत्मकथा में मलयालम भाषा में (नजान एनना भरेथीयन – पृष्ठ 114, मी भरेथीय) ने कहा कि बाबरी मस्जिद के तहत एक मंदिर (11-12 वीं शताब्दी ईस्वी) के अस्तित्व के लिए ठोस सबूत थे। उत्खनन के पहले के दिनों में भारतीय मुस्लिम समुदाय हिंदुओं को जमीन सौंपने के लिए उत्सुक था, लेकिन कम्यूनिस्ट (वामपंथी) इतिहासकारों जैसे अलीगढ़ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर इरफान हबीब और जेएनयू के अन्य इतिहासकारों ने इस विवाद का समाधान होने से रोका।

दंतेवाड़ा मंदिर
के के मुहम्मद ने छत्तीसगढ़ के जगदलपुर के पास दंतेवाड़ा जिले में बारसुअर और समलुर मंदिरों को संरक्षित किया। यह क्षेत्र इस क्षेत्र में नक्सल गतिविधियों के गढ़ के रूप में जाना जाता है। २००३ में, के के मोहम्मद नक्सल कार्यकर्ताओं को समझने में सक्षम हुए और उनके सहयोग के साथ, मंदिरों को आज के वर्तमान राज्य में संरक्षित कर दिया।

बटेश्वर परिसर का पुनरुथान
बटेश्वर, मुरैना व ग्वालियर से ४० किमी दूर स्थित लगभग २०० प्राचीन शिव और विष्णु मंदिरों का परिसर है। खजुराहो से २०० साल पहले गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के दौरान ९ वें और ११ वीं शताब्दी के बीच इन मंदिरों का निर्माण हुआ था। यह क्षेत्र निर्भय सिंह गुज्जर और गड़रिया डाकुओं के नियंत्रण में था। केके मुहम्मद डकैतों को समझाने में सफल रहे ताकि वे इन मंदिरों को पुनर्स्थापित कर सकें। वह क्षेत्र में अपने कार्यकाल के दौरान ८० मंदिरों को पुनर्स्थापित करने में सक्षम हुए । पुलिस द्वारा डकैतों का सफाया होने के बाद, इस क्षेत्र को खनन माफिया द्वारा घेर लिया गया।

संपर्क सूत्र : +91 88868 13447

प्रस्तुति: आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

पुतिन की भारत यात्रा: नई विश्व राजनीति की आहट

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा एक साधारण कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इतिहास के सात दशकों में बुनी एवं गढ़ी गई मित्रता का नवीन उद्घोष है। कहा जाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र और शत्रु नहीं, स्थायी हित होते हैं, किंतु भारत-रूस संबंध इस कथन की परिधि से आगे जाकर स्थायी भरोसे, नैतिक दायित्व और पारस्परिक सम्मान के प्रतीक बने हुए हैं। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब पश्चिमी देश विशेषकर अमेरिका, यूरोप एवं नाटो गठबंधन रूस पर कठोर आर्थिक और रणनीतिक प्रतिबंध लगाए हुए हैं। इसके बावजूद भारत ने रूस को न केवल कूटनीतिक स्तर पर सम्मान-साथ दिया बल्कि ऊर्जा व रक्षा क्षेत्र में उसे सबसे भरोसेमंद साझेदार माना। इसलिए यह वार्ता केवल दो नेताओं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एवं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मुलाकात नहीं, बल्कि एक नए युग के सूत्रपात का संकेत है, नयी विश्व राजनीतिक समीकरण की आहट है।
भारत और रूस की मित्रता का इतिहास लगभग 70 वर्षों का है। शीतयुद्ध काल में रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की संप्रभुता और सुरक्षा हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से लेकर पोखरण परमाणु परीक्षणों तक, रूस ने भारत का साथ दिया। आज जब यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक राजनीति को धू्रवीकृत कर दिया है, अमेरिका ने भारत पर रूस से दूरी बनाने का दबाव बनाया, किंतु भारत ने सामरिक स्वायत्तता की नीति को बनाए रखते हुए रूस का साथ निभाया। पश्चिम के प्रतिबंधों के बीच भारत ने भारी मात्रा में रूसी पेट्रोलियम और गैस खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की तथा रूस को आर्थिक सहारा दिया।
यह निर्णय महज एक वाणिज्यिक लाभ का मामला नहीं था, बल्कि भारतीय विदेश नीति की स्वयंभूता का प्रदर्शन था। दूसरी ओर, रूस ने भी भारत को कभी निराश नहीं किया। चाहे एस-400 वायु रक्षा प्रणाली हो, टी-90 टैंक हों, ब्रह्मोस मिसाइल परियोजना हो या पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान सुयू-57 से जुड़ा सहयोग, भारत की सैन्य क्षमता में रूस का योगदान निर्णायक रहा है। वहीं पाकिस्तान की शत्रुता के खिलाफ भारत के हितों को रूस का अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता रहा। हाल ही में दक्षिण एशिया की बदलती सुरक्षा परिस्थितियों में रूस ने भारत की सामरिक चिंता को समझा और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे अभियानों में सहयोग की भूमिका निभाई। यह तथ्य भारत-रूस संबंधों की गहराई और विश्वास को दर्शाता है।
पुतिन और मोदी की वार्ता ऐसे समय आयोजित हो रही है, जब वैशिक शक्ति-संतुलन परिवर्तन के दौर में है। अमेरिका-चीन तनाव, यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंध, ऊर्जा बाजारों की अस्थिरता और पश्चिमी देशों की रूस के विरुद्ध एकजुटता, इन परिस्थितियों में भारत की भूमिका मध्यस्थ, संतुलक तथा स्वतंत्र धुरी के रूप में उभर रही है। पुतिन भारत को न केवल रक्षा सहयोगी मानते हैं, बल्कि एशियाई भू-राजनीति में संतुलन का स्तंभ भी। वहीं मोदी की विदेश नीति बहुधू्रवीय विश्व की अवधारणा पर आधारित है, जिसमें रूस का स्थान केंद्रीय है। इस यात्रा से ऊर्जा सहयोग और बढ़ेगा। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है और रूस उसके लिए सस्ता, विश्वसनीय तथा दीर्घकालिक आपूर्तिकर्ता। प्रतिबंधों के बावजूद रूस ने भारत को कच्चे तेल के साथ ही कोयला, गैस और परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में सहयोग दिया। भारत को सस्ती ऊर्जा देने के पीछे केवल व्यावसायिक हित नहीं बल्कि मित्रता और सामरिक साझेदारी भी निहित है। रक्षा क्षेत्र में सहयोग और विस्तृत होने की उम्मीद है। भारत का लक्ष्य ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा उत्पादन है और रूस इसके लिए सबसे बड़ा भागीदार बना हुआ है। ब्रह्मोस मिसाइल, राइफल निर्माण, स्पेयर पार्ट सप्लाई और संयुक्त विकास कार्यक्रमों के नए विकल्प वार्ता में उभरेंगे। रूस भारत को केवल उपभोक्ता नहीं, निर्माता के रूप में स्थापित करने में सहभागी है, जो संबंधों की परिपक्वता को दर्शाता है।
भारत-रूस दोस्ती अब एक नया अध्याय लिखने को तत्पर है।  दोनों देशों की दोस्ती किसी से छिपी नहीं है, यहां तक की अमेरिका के साथ बेहतर हुए संबंधों के दौर में भी रूस हमारा विश्वस्त साझीदार बना रहा है, प्रगाढ़ दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ा है। अब रूस के राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा से दोनों देशों की दोस्ती में नई गरमाहट की संभावना के साथ दोस्ती के नये स्वस्तिक उकेरने की बात सामने आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के वर्षों में अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है, लेकिन रूस के साथ देश के दशकों पुराने रक्षा संबंध भी बरकरार हैं। भारत ने अमेरिका और यूरोप से हथियारों की खरीद बढ़ाकर रूस पर निर्भरता को संतुलित बनाया है, लेकिन मॉस्को अभी भी भारत का सबसे बड़ा हथियार सप्लायर है। रूस दोस्ती की ओर आगे बढ़ते हुए भारत के लोगों को रोजगार देने के लिये भी एक समझौता मसौदा तैयार किया है। रूस अपने उद्योगों के लिए 10 लाख भारतीय कुशल श्रमिकों को काम पर रखना चाहता है।
भारत-रूस संबंधों का सबसे मजबूत आधार है-कूटनीतिक विश्वास और सम्मान।
 रूस ने कभी भारतीय आंतरिक राजनीति या नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया। उसने कश्मीर, परमाणु नीति, रणनीतिक साझेदारी और पड़ोसी विवादों पर भारत की संप्रभुता का समर्थन किया। वहीं भारत ने भी रूस की सुरक्षा चिंताओं को समझाकृचाहे नाटो विस्तार का मुद्दा हो या यूक्रेन का संघर्ष। इसलिए भारत ने पश्चिमी दबावों की उपेक्षा करते हुए संवाद और शांतिपूर्ण समाधान की वकालत की। अंतरिक्ष विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, अनुसंधान और चिकित्सा के क्षेत्र में भी रूस की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में रूस सहयोगी रहा है और भविष्य की यात्री-वाहक मिशनों में भी सहयोग की संभावनाएँ हैं। दोनों देशों की सांस्कृतिक साझेदारी भी विशेष हैरू योग, आयुर्वेद, साहित्य, रूसी नाट्यकला और भारतीय कलाकृसबने एक-दूसरे समाज में स्थान पाया। फिर भी यह संबंध चुनौतियों से खाली नहीं। चीन-रूस साझेदारी और भारत-अमेरिका निकटता के बीच संतुलन बनाए रखना दोनों देशों के लिए चुनौतीपूर्ण है। रूस चाहता है कि एशिया में भारत संतुलक भूमिका निभाए, वहीं भारत नहीं चाहता कि रूस का झुकाव चीन की ओर अत्यधिक बढ़े। इसी प्रकार रक्षा सहयोग में तकनीक हस्तांतरण, उत्पादन विलंब और आर्थिक भुगतान व्यवस्थाओं पर भी मतभेद रहे हैं। किंतु इन मतभेदों को वार्ता द्वारा समाधान के प्रयास दोनों राष्ट्रों की परिपक्वता को दर्शाते हैं।
पुतिन की इस यात्रा का महत्व इसलिए भी है कि यह बताती है कि भारत किसी वैश्विक शक्ति के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर संबंध तय करता है। ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा आत्मनिर्भरता, बहुधू्रवीय वैश्विक व्यवस्था और एशियाई सामरिक संतुलन की दृष्टि से भारत-रूस साझेदारी अपरिहार्य है। मोदी और पुतिन की मुलाकात इस विश्वास की प्रमाणिकता है कि संबंध केवल शीत युद्ध की स्मृतियों पर नहीं, बल्कि समकालीन हितों और भविष्य की रणनीति पर आधारित हैं। यह यात्रा एक प्रतीक है-स्वतंत्र विदेश नीति, सामरिक साझेदारी और सांस्कृतिक सम्मान की। भारत-रूस संबंध केवल दो राष्ट्रों की निकटता का परिचय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में एक विशिष्ट वैकल्पिक शक्ति संरचना का निर्माण है। पश्चिमी देशों की आलोचना और प्रतिबंधों के बावजूद भारत और रूस ने अपने संबंधों को न केवल जीवित रखा बल्कि सुदृढ़ किया।
इस मुलाकात से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नई गति मिलेगी, रक्षा उत्पादन को स्वदेशीकरण का बल मिलेगा, व्यापार एवं तकनीकी सहयोग विस्तृत होगा और रणनीतिक विश्वास की डोर और मजबूत होगी। पुतिन और मोदी की यह वार्ता बताती है कि भूराजनीति केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि भरोसे और सहयोग पर भी टिकती है। अतः कहा जा सकता है कि पुतिन की भारत यात्रा एक नई ऊर्जा, नए दृष्टिकोण और नई साझेदारियों की शुरुआत है-जहाँ भारत और रूस न केवल मित्र हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर संतुलित, स्वाधीन और बहुधू्रवीय विश्व व्यवस्था के निर्माता भी हैं। यह यात्रा उसी निर्माण का नवीन अध्याय है, जिसमें पुराने भरोसे से जन्म ले रहा है एक नया भविष्य।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

4 दिसंबर को आसमान में दिखाई देगा सुपरमून

इस माह की 4 तारीख को आसमान में अनूठी खगोलीय घटना सुपरमून के रूप में देखने को मिलेगी। सुपरमून तो असमान में प्राय: दिखाई देता है लेकिन इस बार ये खास इसलिए है क्योंकि यह आसमान में सबसे अधिक ऊंचाई पर होगा और ऐसा आने वाले 17 साल तक नहीं होगा। आसमान साफ होने पर उज्जैन की जीवाजी वेधशाला और डोंगला वेधशाला से भी देखा जा सकेगा।

सुपरमून का मतलब है पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का पृथ्वी से सबसे करीब होना। दिसंबर 2025 का सुपरमून इस साल का अंतिम और बेहद खास चंद्र-दर्शन होने वाला है। वैज्ञानिक, धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण घटना है। यह साल 2025 की सबसे खास रातों में से एक होगी, जब चंद्रमा सबसे चमकीला, सबसे बड़ा और आकाश में सबसे ऊंचाई पर दिखाई देगा।

सुपरमून एक अद्भुत खगोलीय घटना है, जब पूर्णिमा की रात चंद्रमा सामान्य दिनों की तुलना में बड़ा और अधिक चमकीला दिखाई देता है। चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा अंडाकार कक्षा में करता है और इसी कारण कभी वह पास आता है तो कभी दूर चला जाता है। जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है, तो उसे पेरिजी कहते हैं।

जब पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पृथ्वी से सबसे करीब होता है, तो उसे विशेष ‘सुपरमून’ कहा जाता है। खगोलविदों के अनुसार 4 दिसंबर, 2025 को चंद्रमा आकाश में वर्ष की सबसे अधिक ऊंचाई पर दिखाई देगा। इतनी ऊंचाई पर दिखाई देने वाला चंद्रमा दोबारा 2042 से पहले नहीं दिखेगा। यह 2025 का अंतिम सुपरमून भी है।

कोल्ड मून भी कहते हैं, क्योंकि, दिसंबर में दिखाई देने वाली पूर्णिमा को दुनिया भर में ‘कोल्ड मून’ के नाम से भी जाना जाता है।  इसका कारण यह है कि दिसंबर का महीना उत्तरी गोलार्ध में अत्यधिक ठंड की शुरुआत का समय होता है।

इसी सर्द मौसम को दर्शाने के लिए प्राचीन मूल अमेरिकी मोहॉक जनजाति ने इसे ‘कोल्ड मून नाम दिया था। इसे लॉन्ग नाइट मून भी कहा जाता है क्योंकि यह पूर्णिमा अक्सर शीतकालीन संक्रांति के आसपास पड़ती है। 4 दिसंबर की सुबह 8.37 से 5 दिसंबर की शाम 4.43 बजे तक यह दृश्य देखा जा सकता है।

  • सुपरमून: यह तब होता है जब पूर्णिमा (full moon) चंद्रमा की पृथ्वी के सबसे निकटतम बिंदु, जिसे पेरिगी (perigee) कहा जाता है, के 90% के भीतर होती है। इस निकटता के कारण, चंद्रमा सामान्य से लगभग 14% बड़ा और 30% अधिक चमकीला दिखाई देता है।
  • कोल्ड मून: दिसंबर की पूर्णिमा को पारंपरिक रूप से उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों की शुरुआत के साथ मेल खाने के कारण “कोल्ड मून” (Cold Moon) कहा जाता है।
  • दुर्लभक्षण यह 2025 के लगातार चार सुपरमून की श्रृंखला का अंतिम सुपरमून है। इसके अलावा, यह एक दुर्लभ खगोलीय घटना ‘मेजर लूनर स्टैंडस्टिल’ (Major Lunar Standstill) के दौरान पड़ रहा है, जिससे यह 2042 तक फिर से इतना ऊंचा और चमकीला नहीं दिखाई देगा।
इसे कब और कैसे देखें
  • कब: सुपरमून 4 दिसंबर, 2025 को अपने चरम पर होगा, लेकिन यह बुधवार (3 दिसंबर) की रात से लेकर शुक्रवार (5 दिसंबर) की रात तक पूर्ण रूप से दिखाई देगा, जिससे आपके पास इसे देखने के कई अवसर होंगे।
  • कैसे: इसे देखने के लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं है; आप इसे नंगी आँखों से देख सकते हैं। सूर्यास्त के तुरंत बाद पूर्वी क्षितिज पर देखें, जब चंद्रमा ऊपर उठ रहा होता है, क्योंकि उस समय “मून इल्यूजन” (moon illusion) नामक प्रभाव के कारण यह सबसे बड़ा दिखाई देता है।
यह घटना वर्ष का एक शानदार खगोलीय समापन है और यह चिंतन (reflection) और नवीनीकरण (renewal) की अवधि का भी प्रतीक है, क्योंकि वर्ष समाप्त हो रहा है। यह उन खगोल विज्ञान प्रेमियों और फोटोग्राफरों के लिए एक अंतिम और विशेष अवसर है जो चमकीले और बड़े चंद्रमा को देखना चाहते हैं।

वैज्ञानिकों ने स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक उभरता हुआ पदार्थ विकसित किया

सबसे स्वच्छ ईंधनों में से एक-हाइड्रोजन- को उत्पन्न करने हेतु जल को विभाजित करने में प्रयुक्त उत्प्रेरकों की क्रियाशीलता को बढ़ाने के लिए एक नई रणनीति विकसित की गई है।

जल के विद्युत अपघटन में, जो स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन के लिए आवश्यक है, ऑक्सीजन अवकरण अभिक्रिया (OER) अपनी धीमी गतिकी और हाइड्रोजन अवकरण अभिक्रिया (HER) की तुलना में उच्च अधिविभव आवश्यकताओं के कारण लंबे समय से एक चुनौती बनी हुई है। इसी कारण, ऐसे धातु-मुक्त उत्प्रेरकों का विकास जो ओईआर को प्रभावी ढंग से संचालित कर सकें, आज शोध की प्राथमिकता बन गया है।

समन्वय बहुलक (सीओपी) धातु आयनों और कार्बनिक अणुओं के संयोजन से बनते हैं और वर्तमान में जल के विद्युत-अपघटन के लिए उपयोग किए जाते हैं। हालांकि, इनकी एक सीमा है। आमतौर पर, ऐसे सीओपी विलायक और जल के अणुओं द्वारा पूरी तरह से समन्वित होते हैं, जिससे विद्युत-उत्प्रेरक के लिए बहुत कम सक्रिय स्थल बचते हैं और इनका प्रत्यक्ष तौर पर उपयोग सीमित होता है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान, नैनो एवं मृदु पदार्थ विज्ञान केंद्र (सीईएनएस), बेंगलुरु के शोधकर्ताओं ने समन्वय बहुलक (सीओपी) की उत्प्रेरक गतिविधि को उसकी मूल संरचना से समझौता किए बिना महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाने के लिए एक नई रणनीति तैयार की है।

उन्होंने आर्गन प्लाज्मा का प्रयोग किया, जिससे COP सक्रिय हो गया। यह समन्वयात्मक असंतृप्त धातु स्थलों (CUMS) के निर्माण के कारण संभव हुआ। इस प्रक्रिया ने बहुलक की संरचनात्मक मजबूती और सम्पूर्ण संरचना को संरक्षित रखते हुए उत्प्रेरक प्रदर्शन को बढ़ाया।

विस्तृत संरचनात्मक अध्ययनों से पता चला है कि नव-विकसित Ni- और Co-आधारित COP एकल-क्रिस्टल और बल्क पाउडर एक्स-रे विवर्तन (XRD) विश्लेषणों में एकरूप थे। हालाँकि इन मूल पदार्थों ने क्षारीय माध्यम में ऑक्सीजन के विकास के लिए उच्च प्रारंभिक क्षमता और धीमी गति से प्रदर्शन किया, लेकिन आर्गन प्लाज्मा उपचार के बाद उनकी सक्रियता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। प्लाज्मा प्रक्रिया ने बल्क ढाँचे में कोई परिवर्तन किए बिना समन्वयात्मक रूप से असंतृप्त धातु स्थल (CUMS) बनाए, जिसकी पुष्टि पाउडर XRD, ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (TEM), एक्स-रे फोटोइलेक्ट्रॉन स्पेक्ट्रोस्कोपी (XPS), और संपर्क कोण माप द्वारा किया गया।

प्लाज़्मा-सक्रिय Ni- और Co-COPs ने अपने इलेक्ट्रोकैटालिटिक प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार दिखलाया है।

‘एसीएस एप्लाइड नैनो मैटेरियल्स’ पत्रिका में प्रकाशित इस शोध ने संरचनात्मक संशोधन के माध्यम से समन्वय-पॉलिमर-आधारित इलेक्ट्रोकैटेलिस्ट्स की आंतरिक गतिविधि को बढ़ाने और उनकी सम्पूर्ण संरचना को बनाए रखने की एक प्रभावी रणनीति का प्रदर्शन किया है। यह विज़न जल विखंडन के लिए लागत-प्रभावी और कुशल उत्प्रेरकों के डिज़ाइन की नई संभावनाओं के द्वार खोलता है, जो स्वच्छ और टिकाऊ हाइड्रोजन ऊर्जा प्राप्त करने के व्यापक लक्ष्य में योगदान देगा।

लिंक :https://doi.org/10.1021/acsanm.5c02951

“बाल मंडप” में रोचक पाठशाला: काशी–तमिल संस्कृति से बच्चों को जोड़ने की सृजनात्मक पहल

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की परिकल्पना ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ को साकार करने की दिशा में आयोजित काशी तमिल संगमम् 4.0 के अंतर्गत आध्यात्मिकता, संस्कृति और शिक्षा—तीनों स्तरों पर अत्यंत सार्थक और प्रेरक रहा। तमिलनाडु से आए प्रतिनिधिमंडलों ने हनुमान घाट पर पवित्र स्नान कर भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति अपनी आस्था प्रकट की, वहीं संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नमो घाट स्थित “बाल मंडप” में आयोजित विशेष पाठशाला ने बच्चों को काशी और तमिलनाडु की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

काशी तमिल संगमम् 4.0 के प्रतिभागियों ने हनुमान घाट पर विधिवत पवित्र स्नान किया। यह अनुष्ठान न केवल धर्म और परंपरा का अनुभव था, बल्कि तमिलनाडु और काशी के सदियों पुराने आध्यात्मिक संबंधों की पुनर्पुष्टि भी था। प्रतिभागियों ने गंगा की पावन धारा में स्नान कर भक्ति, साधना और संस्कृति की उस निरंतर धारा को आत्मसात किया, जिसने तमिल और काशी—दोनों को समान रूप से ऊर्जा प्रदान की है।

यह पवित्र स्नान भारतीय सभ्यता के उस मूल तत्व का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें विविधता के बीच एकता निहित है। प्रतिभागियों ने इसे एक ऐसे अनुभव के रूप में देखा, जिसने उन्हें न केवल काशी की आध्यात्मिक विरासत से जोड़ा, बल्कि संगमम् के मूल संदेश—एकत्व, सद्भाव और सांस्कृतिक आदान-प्रदान—को भी और गहराई से स्थापित किया।

काशी तमिल संगमम् 4.0 का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है—“बाल मंडप”। इसका उद्देश्य है बच्चों को काशी और तमिलनाडु की विशिष्ट सांस्कृतिक, भाषाई और कलात्मक परंपराओं से जोड़ना, ताकि वे भारत के सांस्कृतिक वैभव को बचपन से ही समझ सकें।
आज “बाल मंडप” में आयोजित विशेष पाठशाला में बच्चों ने सहभागिता आधारित गतिविधियों, कहानियों, संवाद और सांस्कृतिक प्रदर्शनियों के माध्यम से दोनों क्षेत्रों की विरासत के बारे में विस्तार से सीखा। इस अनूठी पहल ने बच्चों के मन में सांस्कृतिक विविधता, पारस्परिक सम्मान और साझा सीख की भावना को और मजबूत किया। कार्यक्रम में बच्चों ने न केवल तमिल और काशी की परंपराओं को जाना, बल्कि यह भी समझा कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है।

“बाल मंडप” का यह पाठ सत्र बच्चों को भविष्य में सांस्कृतिक दूत के रूप में विकसित करने की दिशा में एक सार्थक कदम माना जा रहा है। यह सीख, एकता और राष्ट्र निर्माण की भावना को नए युग की पीढ़ी में सुदृढ़ करता है।

हनुमान घाट पर स्नान से लेकर “बाल मंडप” की रचनात्मक पाठशाला तक—काशी तमिल संगमम् 4.0 का आज का आयोजन ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को जीवंत करता दिखाई दिया। यह कार्यक्रम काशी और तमिलनाडु के बीच आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का सेतु बनकर उभर रहा है।

ओटीटी की अश्लीलता – साहित्य परिषद् व सर्वोच्च न्यायालय गंभीर

नवम्बर माह में विमर्श क्षेत्र में दो बड़ी घटनाएँ घटी। दोनों अति महत्वपूर्ण हैं और दोनों ही में गहन अंतरसंबंध है।
घटना एक – नवंबर प्रारंभ मे अखिल भारतीय साहित्य परिषद् ने अपने 17 वें राष्ट्रीय अधिवेशन में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित हो रही अश्लील, संस्कृति विरोधी सामग्री के विरुद्ध अपनी चिंता प्रकट की और इसके विरुद्ध एक प्रस्ताव पारित कर राष्ट्र के शासन, प्रशासन, जनता के समक्ष अपनी चिंता को प्रकट किया है।

अभासाप अर्थात् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संवैचारिक संगठन, अखिल भारतीय साहित्य परिषद्। यह संगठन भारत में जन्मी सभी भाषा, बोलियों, लिपियों के सरंक्षण, संवर्धन, संवरण का कार्य करता है। अपने षष्ठिपूर्ति वर्ष की ओर बढ़ रहे इस संगठन का ताप, व्याप और आलाप समूचे विश्व में देखा-सुना जा सकता है।

घटना दो – नवम्बर के अंत में ही, देश के उच्चतम न्यायालय ने भी भारतीय ओटीटी नियमन, इस पर प्रसारित हो रही अश्लीलता व मूल्यहीनता पर चिंता प्रकट की है।

भारतीय समाज जैसे संज्ञावान, प्रज्ञावान समाज में ऐसी स्थिति बनी ही क्यों? इस प्रश्न का उत्तर स्वयं समाज को खोजना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संघ के संवैचारिक संगठन समाज की किसी भी समस्या के सदंर्भ में एक सीमा तक चुप ही रहते हैं किंतु समाज में ‘असंगत घटनाओं’ के संदर्भ में अदृश्य रूप से विमर्श अवश्य जागृत करते रहते हैं। जब इस विमर्श से भी काम नहीं चलता एवं समाज जागृत नहीं होता है तब ही संघ या संघ के संवैचारिक संगठन सार्वजनिक रूप से किसी कार्य के सूत्रों को अपने हाथों में लेते हैं। ऐसी स्थिति में भी संघ सूत्रधार तो रहता है किंतु उसे नेपथ्य में ही रहना रुचिकर लगता है। इस हेतु से ही साहित्य परिषद् ने ओटीटी की अश्लीलता, गेमिंग एप्स के घातक परिणामों के प्रति समाज जागरण का यह कार्य प्रारंभ किया है।

ये दोनों ही घटनाएँ एक स्वस्थ, संपन्न, व समृद्ध राष्ट्र हेतु एक शुभ लक्षण हैं। यद्यपि इस प्रकार का प्रसारण प्रारंभ ही नहीं होना चाहिए था। अब शीघ्र ही बंद हो ही जाना चाहिए।

साहित्य परिषद् ने समाज में भौतिकता वादी शक्तियों, बाजारवाद, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की नकारात्मकता, समाज विरोधी स्वरूप, जीवन मूल्य विहीन प्रसारण आदि पर अपनी चिंता, राष्ट्र के समक्ष प्रकट की है।

साहित्य परिषद् ने मनोरंजन के नाम पर प्रसारित इस गंदगी को अत्यंत लज्जास्पद एवं निंदनीय बताया है। परिषद् ने चेताया है कि, ये सामग्री युवावर्ग और बालमन व मस्तिष्क में उग्रता, अश्लीलता, विकृत यौनाचार और नशाखोरी जैसे दुराचारों को महिमा मंडित कर उन्हें अधोपतन की ओर अग्रसित कर रही है। इन माध्यमों में प्रदर्शित अधिकांश दृश्य व सामग्री नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाली होती है।

साहित्य परिषद् ने ओटीटी के माध्यम से चल रहे गेमिंग एप्स और उससे बढ़ रही आत्महत्या की प्रवृत्ति को भी राष्ट्र के संज्ञान में लाया है।

परिषद् ने अपने पारित प्रस्ताव में ओटीटी पर प्रसारित होने वाली अधिकांश सामग्री को भारतीय जीवन मूल्यों
पर आघात करने वाली, राष्ट्र के स्वरूप व छवि को विकृत करके प्रस्तुत करने वाली सामग्री बताते हुए अपनी चिंता प्रकट की है। परिषद् ने कहा है कि ऐसी सामग्री का अनियंत्रित प्रसारण समाज एवं राष्ट्र जीवन के लिए अत्यधिक घातक है।

विगत कुछ वर्षों में भारत राष्ट्र में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर कुछ भी वितंडा उत्पन्न किए जा रहे हैं। ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के पश्चिम कुबोध ने या यूँ कहे कि इसकी ‘पश्चिमी प्रेत छाया’ ने भारत में अभिव्यक्ति के अर्थों को पुनर्परिभाषित की आवश्यकता इंगित कर दी है। अब समाज इस अभिव्यक्ति को पुनर्परिभाषित करे या यूँ ही ओटीटी पर अश्लीलता व ऑनलाइन गेमिंग से बर्बाद होती अपनी पीढ़ी के प्रति आँखे मूँदे रहे; यही दो मार्ग हैं। एक मार्ग चुनना है, विकास या विनाश; यही युगधर्म है।

इस अनुरूप साहित्य परिषद् ने कहा है – “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि समाज की गरिमा और नैतिकता को नष्ट करने की छूट दी जाए। स्वतंत्रता और अनुशासन, सूजन और मर्यादा, ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।”

साहित्य परिषद् ने अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में आगामी तीन वर्षों हेतु ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ पर चिंतन, मनन, अध्ययन का वैचारिक मार्ग निश्चित किया है। आत्मबोध करते हुए ही यह विकृति ध्यान में आती है। भारत राष्ट्र की, जन-मन की विश्वबोध क्षमता के प्रकटीकरण, विश्वगुरु बनने के मार्ग पर अग्रसर होने के मध्य निश्चित ही यह चिंतनीय प्रस्ताव और यह मांगपत्र स्वयं में एक प्रकाशस्तम्भ की भाँति समाज का मार्ग आलोकित कर रहा है।

साहित्य परिषद् ने भारत सरकार से, राज्य सरकारों से माँग की है कि
1. ओ टी टी प्लेटफॉर्म एवं गेमिंग एप्पस पर प्रसारित होने वाली प्रत्येक सामग्री के परीक्षण, नियमन, और वर्गीकरण हेतु शासन द्वरा एक सशक्त, स्वायत्त विधायी नियामक संस्था का गठन किया जाए।

2. डिजिटल माध्यमों में प्रस्तुत किसी भी दृश्य संवाद याविवार को भारत की संविधानिक गरिमा, धार्मिक आस्था, सातकृतिक मूल्यों या सामाजिक मर्यादा और सनातन परंपरा को आहत करते हों, उन पर कड़ी निगरानी रखी जाए।

3. किशोरों और युवाओं के लिए उपयुक्त सामग्री के आयु आधारित नियंत्रण तंत्र को अनिवार्य बनाया जाए।

4. जो मंच या माध्यम अश्रीलता, हिंसा, नशाखोरी या विकृत जीवन मूल्यों का प्रचार करते हैं, उनके विरुद्ध कठोर कानूनी दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
5. भारतीय भाषाओं और संस्कृति के संवर्द्धन हेतु भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक मनोरंजन माध्यमों को प्रोत्साहित किया जाए।

इधर अखिल भारतीय साहित्य परिषद् ने यह प्रस्ताव पारित किया और उधर संयोगवश देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस संदर्भ में अपनी गहन चिंता का सार्वजनिक प्रकटीकरण कर दिया है।

माननीय मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने पॉडकास्टर रणवीर अल्लाहबादिया और अन्य द्वारा इंडियाज गॉट लेटेंट शो में कथित अश्लील कंटेंट से जुड़ी एफआईआर के संदर्भ में चल रहे केस के संदर्भ में यह बातें कहीं है।

न्यायालय ने ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अश्लील सामग्री को लेकर चिंता प्रकट करते हुए सरकार से इस पर प्रभावी नियंत्रण के लिए एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय बनाने या वर्तमान नियमों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बाल दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और अश्लील सामग्री के लिए हमेशा पहले से चेतावनी दी जानी चाहिए। मान. सर्वोच्च न्यायाधीश ने कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक अमूल्य अधिकार है किंतु यह विकृति का कारण नहीं बन सकती।

डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी

होली,ईद,दिवाली भारतीय त्यौहारों पर खूब लिखी बाल कविता और कहानियां

श्री भगवतीप्रसादजी देवपुरा स्मृति एवं बाल साहित्यकार समारोह -26 में होंगे 63 बाल रचनाकार पुरस्कृत
कोटा / होली,ईद,दिवाली आदि भारतीय त्यौहारों पर देश के 10 राज्यों के 204 रचनाकारों ने  खूब रूचि ले कर  बाल कविता और कहानियां लिखी।  साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा राजस्थान की ओर से भारतीय त्यौहारों पर बाल कविता और बाल कहानियां लेखन की राष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। विभिन्न वर्गों में विजेता रहे 63 बाल रचनाकारों को आगामी 5 से 7 जनवरी 26 को नाथद्वारा में आयोजित होने वाले तीन दिवसीय ” श्री भगवतीप्रसादजी देवपुरा स्मृति एवं बाल साहित्यकार समारोह –  2026″ के अवसर पर  प्रथम दिन  5 जनवरी 26 को प्रातः 9.00 बजे से शुरू होने वाले प्रथम सत्र में सम्मानित एवं पुरस्कृत किया जाएगा।
 यह जानकारी देते हुए साहित्य मंडल के प्रधानमंत्री श्यामप्रकाश देवपुरा ने बताया कि  बाल कहानी प्रतियोगिता के  बाल वर्ग में   प्रथम यतिका नेभनानी ,उदयपुर, द्वितीय मन कुमावत, नाथद्वारा,  तृतीय  मयंक माली, नाथद्वारा तथा प्रोत्साहन के लिए नाथद्वारा के माद्री सिंह,  भव्यराज जोशी, आरव उपाध्याय, हाथरस  एवं पोशिता माली चयनित किए गए हैं।  किशोर वर्ग में प्रथम कामरान, नवाबगंज, बहराइच एवं द्वितीय  भार्गव नारायण ,दौसा रहे हैं। युवा वर्ग में प्रथम उत्कर्ष नारायण , दौसा , द्वितीय अनन्या, दौसा एवं तृतीय  दूर्वा शर्मा, सोगरिया कोटा रहे हैं।
बाल कहानी के वयस्क वर्ग में प्रथम ऋतु भटनागर, बेंगलुरु , द्वितीय  रूपजी रूप, घाटोली – झालावाड़ एवं तृतीय  संयुक्त रूप से  अरणी राबर्ट धमतरी, एवं  प्रियंका गुप्ता, जयपुर रहे। इस वर्ग में प्रोत्साहन के लिए  डॉ.योगिता जोशी ,जयपुर, सुशीला शर्मा, जयपुर, डॉ. शील कौशिक, सिरसा,  डॉ. सुलोचना शर्मा बूंदी , शोभना श्याम, गाजियाबाद,सौम्या पाण्डेय ‘ पूर्ति ‘, ग्रेटर नोएडा, संतोष ‘ ऋचा ‘ राया, मथुरा , रतना कौशिक , जयपुर,,फारूक आफरीदी, जयपुर, डॉ. युगल सिंह, कोटा ,शैलेंद्र जैन गुनगुना झालावाड़ ,महेश पंचोली, कोटा, विमला रस्तोगी ‘ आयाम ‘, दिल्ली,सुधीर सक्सेना ‘ सुधि ‘, जयपुर,विजय कुमार शर्मा, कोटा, कन्हैया साहू ‘ अमित ‘, भाटापारा, श्रीमती विजय भारती, झुंझुनूं एवं लता अग्रवाल ‘ तुलजा ‘,भोपाल का चयन किया गया है।
बाल कविता प्रतियोगिता के किशोर वर्ग में  प्रथम  काव्या सोमानी,  नाथद्वारा ,द्वितीय : वसुश्रवा द्विवेदी,  कोटा युवा वर्ग में प्रथम  रत्नेश दाधीच , उदयपुर एवं द्वितीय   मुकुल चौहान,  जयपुर रहे। वयस्क वर्ग में प्रथम अदिति शर्मा ‘ सलोनी,’ झालावाड़,  द्वितीय  डॉ.राखी गोयल ‘ आकांक्षा ‘ सूरतगढ़ एवं  तृतीय  यशपाल शर्मा ‘यशस्वी’, चित्तौड़गढ रहे हैं। इस वर्ग में  प्रोत्साहन के लिए संतोष कुमार सिंह, मथुरा, डॉ. महेश मधुकर, बरेली, डॉ. संगीता सिंह , कोटा,सपना जैन शाह, उदयपुर,  योगीराज योगी, कोटा,रंजना माथुर, अजमेर , रेखा शर्मा, बूंदी ,  श्रीमती प्रेम लता साहू, देवरहा,  गोविन्द भारद्वाज, अजमेर , टीकम चन्दर ढोडरिया, छबड़ा,  सलीम स्वतंत्र, कोटा एवं अनीता गंगाधर शर्मा, अजमेर का चयन किया गया है। प्रतियोगिता का संयोजन कोटा के पूर्व संयुक्त निदेशक ( जनसंपर्क ) डॉ  प्रभात कुमार सिंघल द्वारा किया गया है।