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तमिल साहित्य विशेषज्ञों, सांस्कृतिक प्रतिनिधियों व छात्रों सहित कुल 216 लोगों का दल काशी पहुंचा

बनारस।  काशी तमिल संगमम 4.0 की पहली विशेष ट्रेन 216 प्रतिनिधियों के साथ वाराणसी पहुंची। इस प्रतिनिधिमंडल में 50 तमिल साहित्य विशेषज्ञ, 54 सांस्कृतिक विद्वान, साथ ही छात्र, शिक्षक, कारीगर, शास्त्रीय गायक, तथा आध्यात्मिक ग्रंथों के आचार्य और विद्यार्थी शामिल हैं। काशी की पावन धरती पर कदम रखते ही सभी के चेहरे पर मुस्कान और उत्साह देखने को मिला। यह शुरुआत केटीएस 4.0 कार्यक्रम की व्यापक रूपरेखा का हिस्सा है, जो तमिलनाडु से लगभग 1400 प्रतिनिधियों को उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों के भ्रमण के लिए आमंत्रित करता है। जिस क्षण की हमें प्रतीक्षा थी, वह आ चुका है…काशी तमिल संगमम् आज से प्रारंभ हो रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान आज वाराणसी के नमो घाट से काशी-तमिल संगमम के इस चौथे संस्करण का संयुक्त रूप से उद्घाटन करेंगे।

वाराणसी प्रवास के दौरान ये छात्र गंगा घाटों, प्रमुख धार्मिक स्थलों, शैक्षणिक संस्थानों और स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधियों से संवाद के माध्यम से उत्तर और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक धरोहर, जीवन शैली और आध्यात्मिक विरासत का निकट से अनुभव करेंगे। इस कार्यक्रम के तहत सेमिनार, संवाद सत्र, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, साहित्यिक विमर्श, स्थानीय व्यंजन और हस्तशिल्प से परिचय जैसी विविध गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। छात्रों को काशी के महत्वपूर्ण तमिल धरोहर स्थलों का भी भ्रमण कराया जाएगा, जिसमें महाकवि सुब्रह्मण्य भारती का पैतृक निवास, काशी मदम, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर और माता अन्नपूर्णा मंदिर शामिल हैं।

इन प्रतिनिधियों के अलावा आज काशी तमिल संगमम् 4.0 के तहत तमिलनाडु से पत्रकारों का एक दल कवरेज के लिए भी वाराणसी पहुंचा। केटीएस 4.0 में शामिल होने पहुंचे तमिलनाडु की मीडिया टीम ने सुबह-सुबह काशी विश्वनाथ मंदिर में भी दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। काशी तमिल संगमम् 4.0 का यह आयोजन उत्तर और दक्षिण की सांस्कृतिक एकता को सशक्त रूप में आगे बढ़ा रहा है।

इस वर्ष के संगमम् का विषय है  “चलो तमिल सीखें – तमिल करकलाम” जो इस संदेश को रेखांकित करता है कि सभी भारतीय भाषाएँ एक ही परिवार की हैं। इस पहल का उद्देश्य तमिल भाषा और संस्कृति को देश के अन्य हिस्सों तक पहुँचाना है, जो एकता का प्रतीक है। साथ ही, प्राचीन तमिल ग्रंथों के प्रसार को अन्य भारतीय भाषाओं में प्रोत्साहित करके उनकी पहुँच का विस्तार करना भी इसका लक्ष्य है।

संस्कृत साहित्य का 200 वर्ष पुराना इतिहास जीवित कर दिया 19 वर्षीय देवव्रत महेश रेखे ने

देवव्रत रेखे ने ने 2 अक्टूबर 2025 से 30 नवंबर 2025 तक — लगभग  50 लगातार दिन — काशी (वाराणसी) के वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय में दंडक्रम पारायण किया।  देवव्रत महेश रेखे महाराष्ट्र के अहिल्यानगर के ब्राह्मण परिवार से हैं। उन्होंने लगभग 2000 मंत्रों वाला शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिनी पाठ — बिल्कुल स्मृति से, बिना किसी ग्रंथ देखे — शुद्ध स्वर, लय, उच्चारण, क्रमिकता एवं रिवर्स क्रम सहित पूर्ण किया।

देवव्रत रेखे की इस सफलता ने इस बात को सिध्द किया है कि संस्कृत विद्वानों और ब्राह्णणों ने तमाम उपेक्षाओं , अनादर व अपमान के बावजूद हमारे देश की हजारों साल पुरानी पंरपराओं को कितनी शुध्दता से बचाकर रखा है।

संस्कृत पंडितों का मानना है कि यह लगभग 200 वर्षों में पहली बार है, जब दंडक्रम पारायण “क्लासिकली प्यूअर” (शास्त्रीय शुद्धता के साथ) हुआ है। उनकी इस उपलब्धि के सम्मान में — उन्हें 5 लाख रुपये मूल्य के सोने का कंगन और ₹1,11,116 की राशि से सम्मानित किया गया। I देवव्रत महेश रेखे महाराष्ट्र के अहिल्यानगर के ब्राह्मण परिवार से हैं। उनके पिता और गुरु महेश चन्द्रकांत रेखे ( Mahesh Chandrakant Rekhe) स्वयं एक विद्वान हैं, जिन्होंने बेटे को श्रुति-स्मृति परंपरा अनुसार शास्त्रीय वेद पाठ में प्रशिक्षित किया।  मात्र 19 साल — में देवव्रत ने दंडक्रम पारायण सफलतापूर्वक सम्पन्न कर, “वेदमूर्ति” की उपाधि हासिल की है।
काशी के रामघाट स्थित सांगवेद विद्यालय में 13 अक्टूबर को  श्री गणेश पूजन, पुण्याह वाचन, नवग्रह पूजन तथा वेद पुस्तक पूजा एवं गुरु पूजा हुई। इसके साथ ही शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिन शाखा के दंडक्रम (विकृति ) के पारायण का शुभारंभ हुआ।

काशी के इतिहास में पहली बार शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिनी शाखा के दंडक्रम (विकृति ) के कंठस्थ पारायण की शुरूआत हुई।  दक्षिणामूर्ति मठ के अधिपति 1008 पुण्यानंद गिरि महाराज के शिष्य स्वामी 1008 स्वयंप्रकाश गिरि महाराज तथा 108 महेश चैतन्य ब्रह्मचारी महाराज ने आशीर्वाद दिया। विद्यालय, गीर्वार्णवागवर्धिनी सभा एवं महाराष्ट्र के अहिल्यानगर के श्रुति स्मृति ज्ञान मंदिर वेद पाठशाला ने स्वयंप्रकाश गिरि महाराज को अभिनंदन पत्र,माला महावस्त्र एवं श्रीफल अर्पित किया।  एक महीने 28 दिनों तक शुक्लयजुर्वेद माध्यंदिन शाखा का एकाकी संपूर्ण कंठस्थ दंडक्रम वेदपारायण अनवरत रोजाना साढ़े तीन घंटे तक चलता रहा।

सांगवेद विद्यालय के अध्यक्ष पं. विश्वेश्वर शास्त्री द्रविड़ ने वेद की विकृतियों की रक्षा के लिए ऐसे पारायण की आवश्यकता बतलाई। दक्षिणामूर्ति मठ के 1008 स्वयंप्रकाश गिरि महाराज ने गीता शांकर भाष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्राह्मणत्व की रक्षा वेद रक्षा से होती है। वेद जब सुरक्षित रहेगा तभी वैदिक धर्म सुरक्षित रहेगा।
दंडक्रम पारायण क्या है

  • दंडक्रम पारायण — पारंपरिक वैदिक recitation (उच्चारण) का एक अत्यंत जटिल रूप है। इसे “वैदिक पाठों का मुकुट (crown of Vedic recitation)” माना जाता है।
  • इसमें, शुक्ल यजुर्वेद (Shukla Yajurveda) की माध्यंदिनी शाखा के लगभग 2000 मंत्र (mantras) शामिल होते हैं, जिन्हें बेहद सख्त सरस्वरी (svara), लय, उच्चारण, क्रम (क्रम से तथा उल्टा — क्रमिक और “विकृति/वितक्रम” क्रम) में व्यवस्थित करके — सिर्फ स्मृति (कंठस्थ) से — पढ़ा जाता है।
  • दंडक्रम पारायण में गिनती, स्वर, लय, उच्चारण, क्रमिकता, रिवर्स क्रम (वितक्रम / विकृति) सभी का सम्यक पालन करना पड़ता है — यह स्मरण-शक्ति, उच्चारण-कुशलता, लय-बोध, मन-एकाग्रता, शारीरिक व मानसिक संयम जैसे गुणों की परीक्षा है।
  • इस वजह से यह पारायण बहुत दुर्लभ और कठिन माना जाता है — इतिहास में अब तक मात्र तीन–चार बार ही साफ-स्वरूप में इसकी रिकॉर्डेड पारायण हुई है।
    • डक्रम पारायण — केवल मंत्रों का पाठ नहीं, बल्कि संरक्षण (preservation): क्योंकि वैदिक मंत्र-पाठ की पारंपरिक oral स्मृति + उच्चारण + क्रम + स्वर — यह सब “पुस्तक” में नहीं, सिर्फ मानव स्मृति व गुरुबद्ध अनुशिक्षण (oral tradition + guru parampara) में सुरक्षित रहती है। देवव्रत की यह पारायण इस परंपरा को जीवंत रखने का प्रयास है।
    • इतिहास व संस्कृति के लिए: लगभग 200 वर्षों से इतनी शुद्धता के साथ दंडक्रम पारायण नहीं हुआ था — इसलिए इसे “वैदिक पुनरुत्थान (Veda revival)” की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
    • युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा: एक 19 वर्षीय युवा द्वारा यह कठिन तपस्या पूरी कर दी गई — इसे देख भारतभर के वेद-पाठ, संस्कृत, वैदिक अध्ययन में रुचि रखने वाले लोगों को प्रोत्साहन मिला है।
    • गुरु-परंपरा व पारिवारिक साधना की महत्ता स्पष्ट हुई: इस सफलता में उनके पिता गुरु महेश रेखे की दीक्षा, मार्गदर्शन व प्रशिक्षण अहम रहा — जो दिखाता है कि गुरु-शिष्य परंपरा व अनुशासन कितनी महत्वपूर्ण है।

    दंडक्रम पारायण वैदिक पद्धति में विकृति-पाठ (Varied Recensional Chant) की सबसे जटिल विधियों में से एक है।
    यह शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिनी शाखा (Madhyandina Shukla Yajurveda) के मंत्रों का एक विशिष्ट पाठ है, जिसकी रचना कई सौ वर्ष पूर्व हुई और यह अत्यंत दुर्लभ है।

  • यह संरचना क्यों कठिन है?

     

    1. प्रत्येक पंक्ति सही स्वर (उदात्त/अनुदात्त/स्वरित) में पढ़नी होती है।
    2. हर आरोहण और अवरोहण में मात्रा, संधि, गति, लय समान रखनी होती है।
    3. 2000+ मंत्रों के लिए यह क्रम पढ़ना — अत्यंत कठिन स्मृति एवं अनुशासन माँगता है।

इस परम साधना व उपलब्धि का महत्व — इसकी विशेषताएँ:

  1. इसमें लगभग 2000 मंत्र (Shukla Yajurveda Mantras) शामिल होते हैं।
  2. इन्हें एक विशेष दंड-आकार (Staff-like structure) के क्रम में पढ़ा जाता है।
  3. इसमें सीधा (Anuloma)उल्टा (Viloma), तथा संयुक्त (Samhita + Variational) क्रम शामिल हैं।
  4. हर मंत्र को
    • स्वर (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित)
    • लय
    • दीर्घ-ह्रस्व
    • शुद्ध सन्धि
    • विस्तारित क्रम
      के साथ सटीक पढ़ना पड़ता है।

दंडक्रम पारायण घन-पाठ से भी कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें क्रम की गहराई कई गुना अधिक होती है।

इतिहास ःप्राचीन काल

यह पद्धति 1500–2000 वर्ष पूर्व विकसित मानी जाती है, जब गुरुकुलों में वेद-संरक्षण के लिए कई “विकृति-पाठ” विधियाँ बनाई गई थीं।

🔹 मध्यकाल ः मुगल-काल से लेकर 1800 AD तक यह परंपरा बहुत दुर्लभ हो गई। कई शाखाओं में यह कला लगभग समाप्त हो गई।

  • पिछले 200 वर्षों में इसका पूर्ण शास्त्रीय रूप से किया गया पाठ दर्ज नहीं मिलता।
  • 2025 में वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे (19 वर्ष) ने Kashi में इसे पूरा कर इतिहास रचा।
  • विशेषज्ञों ने कहा कि यह “दंडक्रम का पुनर्जन्म (Revival)” है।

यह पाठ कितना जटिल है इसको आप नीचे दिए गए पिरामिड से समझ सकते हैं, इसमें ए और बी को आप संस्कृत के दो अलग अलग शब्द समझिये और यह समझने की कोशिश कीजिये कि इन संस्कृत शब्दों को बगैर देखे मुखाग्र कितने क्रमों में कितनी बार उच्चारित करना है। यह पढ़क ही आपका दिमाग घनचक्कर हो जाएगा लेकिन एक 19 वर्षीय किशोर ने ये चमत्कार कर दिखाया ।

नीचे “घन-पाठ (Ghanapātha) vs दंड-क्रम (Dandakrama)” का संयुक्त आरेख (Combined Diagram) अत्यंत सरल, साफ़ और शिक्षण-योग्य रूप में प्रस्तुत है — ताकि दोनों विधियों के अंतर एक नज़र में स्पष्ट हो जाएँ।


 भाग 1 — घन-पाठ (Ghanapātha) — आरेख

घन-पाठ में क्रम इस प्रकार चलता है:

A B = B A = A B
B C = C B = B C
C D = D C = C D

इसे पिरामिड या “त्रिक (Triplet)” पैटर्न कहा जाता है।

A B
B A
A B
---------
B C
C B
B C
---------
C D
D C
C D

✔ प्रत्येक युग्म (A-BB-CC-D) का “तीन बार उलट-सीधा दोहराव”
✔ यह एक “घंटी के उलटने जैसा” rhythmic structure है


भाग 2 — दंड-क्रम (Dandakrama) — आरेख

दंड-क्रम एक लंबा, आरोहण–अवरोहण (up–down) वाला क्रम है:

A
A B
A B C
A B C D
B C D
C D
D

✔ ऊपर चढ़ता है
✔ फिर चरम पर पहुँचता है
✔ फिर लौटता है
✔ एक दंड (staff) की आकृति बनाता है


 भाग 3 — संयुक्त तुलना आरेख (Side-by-Side Diagram)

नीचे दोनों को साथ रखा गया है — बाईं ओर घन-पाठ, दाईं ओर दंड-क्रम

GHANA-PATHA DANDAKRAMA

A B A
B A A B
A B A B C
A B C D
B C B C D
C B C D
B C D

C D
D C
C D

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे को बिना किसी रुकावट के 50 दिनों में दंडक्रम परायणम -जिसमें शुक्ल याजुर्वेद की मध्यंदिनी शाखा के 2000 मंत्र शामिल हैं-पूरा करने के लिए बधाई दी है। श्री मोदी ने कहा कि 19 वर्षीय वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे द्वारा किया गया कार्य आने वाली पीढ़ियों द्वारा याद किया जाएगा। काशी के सांसद के रूप में, मुझे प्रसन्नता है कि यह असाधारण उपलब्धि इस पवित्र शहर में हुई। श्री मोदी ने कहा, “उनके परिवार, पूरे भारत के कई संतों, ऋषियों, विद्वानों और संगठनों को मेरा प्रणाम, जिन्होंने उनकी सहायता की।”

प्रधानमंत्री ने एक्स पर पोस्ट किया:

19 वर्षीय वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे ने जो कार्य किया है, उसे आने वाली पीढ़ियां सदियों तक याद रखेंगी!

भारतीय संस्कृति के प्रति जुनूनी हर व्यक्ति को उन पर गर्व है कि उन्होंने बिना किसी रुकावट के 50 दिनों में दंडक्रम परायणम-जिसमें शुक्ल आयुर्वेद की मध्यंदिनी शाखा के 2000 मंत्र शामिल हैं- को पूरा किया। इसमें कई वैदिक छंद और पवित्र शब्द शामिल हैं जिन्हें त्रुटिहीन रूप से उच्चारित किया गया है। वह हमारे गुरु परंपरा के बेहतरीन अवतार के प्रतीक हैं।

काशी के सांसद के रूप में, मुझे प्रसन्नता है कि यह असाधारण उपलब्धि इस पवित्र शहर में हुई। उनके परिवार, पूरे भारत के कई साधुओं, ऋषियों, विद्वानों और संगठनों को मेरा प्रणाम, जिन्होंने उनकी सहायता की है।

हर मोबाईल में होगा संचार साथी एप

भारत में स्मार्टफोन यूजर्स की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। अब नए स्मार्टफोन में साइबर सेफ्टी ऐप संचार साथी प्री-इंस्टॉल होकर आएगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनियों को 90 दिनों के भीतर इस बदलाव को लागू करने को कहा गया है।

इस फैसले के दायरे में Apple, Samsung सहित कई प्रमुख ब्रांड शामिल हैं। ऐप को यूजर न डिलीट कर पाएंगे और पुराने फोन्स में सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए यह जोड़ा जाएगा। सरकार का उद्देश्य बढ़ते साइबर अपराधों, IMEI क्लोनिंग और चोरी के मामलों पर रोक लगाना है।

‘संचार साथी’ से यूजर संदिग्ध कॉल, मैसेज या चैट की रिपोर्ट कर सकेंगे, वहीं चोरी या गुम मोबाइल को IMEI के जरिए ब्लॉक भी किया जा सकेगा। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अब तक 7 लाख से ज्यादा खोए फोन इस सिस्टम से रिकवर हो चुके हैं। 1.2 अरब से अधिक यूजर्स वाले भारत में डुप्लिकेट IMEI के चलते ठगी और ट्रैकिंग से बचने की घटनाएं बढ़ रही हैं।

IMEI एक 15 अंकों का यूनिक कोड है, जिसे अपराधी क्लोन कर लेते हैं। यह ऐप पुलिस और नेटवर्क एजेंसियों को डिवाइस ट्रेस करने में मदद देगा। हालांकि, ऐप को अनिवार्य करने से प्राइवेसी पर बहस भी तेज हो सकती है, लेकिन सरकार का दावा है कि यह कदम यूजर्स की सुरक्षा और भरोसे को प्राथमिकता देता है।

नए भारत को सुरक्षा एवं संवेदना वाली नई पुलिस चाहिए

भारतीय लोकतंत्र में पुलिस व्यवस्था कानून-व्यवस्था की आधारभूत धुरी है, परंतु आम नागरिक के मानस में पुलिस की छवि अभी भी कठोरता, डर और दमन से जुड़ी हुई है। इसे केवल अधिकार जताने वाली शक्ति समझा गया है, संवेदनशीलता, जवाबदेही और मित्र भाव से नहीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय प्रबंधन संस्थान रायपुर में पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के 60वें अखिल भारतीय सम्मेलन में इसी जटिलता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पुलिस की छवि तभी बदलेगी जब व्यवस्था अधिक प्रोफेशनल, अधिक उत्तरदायी और अधिक मानवीय बने। विकसित भारत की दृष्टि में पुलिस का पुनर्गठन केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि समाज में भरोसे को पुनर्जीवित करने का कार्य भी है।
पुलिस के पास अपराध नियंत्रण, आतंकवाद-निरोध, भीड़ प्रबंधन, आपदा राहत, नशीली दवाओं के खिलाफ अभियान, चुनाव ड्यूटी और वीआईपी सुरक्षा जैसी असंख्य जिम्मेदारियां हैं, लेकिन संसाधन सीमित हैं, कार्य-भार भारी और राजनीतिक दबाव व्यापक हैं। कुछ अधिकारियों के भ्रष्ट या कठोर व्यवहार ने संपूर्ण पुलिस व्यवस्था की छवि पर चोट पहुंचाई है, इसलिए जनता पुलिस के निकट आने पर भी भय का अनुभव करती है। प्रधानमंत्री ने इस स्थिति बदलने की स्पष्ट आवश्यकता जताई और युवाओं में पुलिस की सकारात्मक छवि निर्माण पर बल दिया ताकि आने वाली पीढ़ी पुलिस को मित्र और संरक्षणकर्ता के रूप में पहचाने।
भारतीय लोकतंत्र के संरचनात्मक स्तंभों में पुलिस की भूमिका अत्यंत निर्णायक है। वह केवल अपराधियों से मुकाबला करने वाली शक्ति नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था, नैतिकता और जनविश्वास की संरक्षक है। परंतु विडम्बना यह है कि आम जनता के मानस में पुलिस की छवि आज भी कठोरता, डर, भ्रष्टाचार और दमन से जुड़ी हुई दिखाई देती है। समाज पुलिस को “डंडे” और “खाकी” के प्रतीक रूप में पहचानता है, संवेदनशीलता और जवाबदेही के दृष्टिकोण से नहीं। यही कारण है कि पुलिस सुधार दशकों से विमर्श का विषय तो रहा, लेकिन कभी जनांदोलन नहीं बन सका, न चुनावी मुद्दा बना और न ही गंभीर राजनीतिक प्राथमिकता। इसलिये मोदी ने शहरी पुलिसिंग को मजबूत करने, पर्यटक पुलिस को फिर से सक्रिय करने, विश्वविद्यालयों को फोरेंसिक अध्ययन के लिए प्रेरित करने और नए भारतीय न्याय संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम तथा नागरिक सुरक्षा संहिता पर व्यापक जनजागरूकता चलाने की जरूरत रेखांकित की। उनका यह दृष्टिकोण पुलिस को प्रतिक्रियाशील संस्था से आगे बढ़ाकर बुद्धिमान, वैज्ञानिक, पूर्वानुमान आधारित और विश्वसनीय संस्था बनाने की दिशा है।
प्रधानमंत्री की दृष्टि का महत्वपूर्ण आयाम यह है कि पुलिस केवल कानून लागू करने वाली मशीन नहीं बल्कि समाज का सहभागी तंत्र है। यदि पुलिस व्यवहार में संवेदनशीलता, संवाद, पारदर्शिता और विनम्रता विकसित करे तो जनविश्वास स्वतः बढ़ेगा। नए कानूनों के बारे में जन-जागरूकता अभियान इसी सोच का हिस्सा है, क्योंकि कानून तभी प्रभावी होते हैं जब जनता उन्हें समझती और स्वीकार करती है। अपराध की प्रकृति तेजी से बदल रही है, इसलिए पुलिस का प्रशिक्षण, तकनीकी दक्षता, इंटेलिजेंस नेटवर्क और फोरेंसिक क्षमता मजबूत होना अनिवार्य है। प्रधानमंत्री ने नेटग्रिड, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एकीकृत डेटाबेस के प्रभावी उपयोग पर जोर देकर पुलिसिंग को डेटा आधारित, कृत्रिम बुद्धिमता-एआई और वैज्ञानिक सोच से जोड़ने की दिशा दिखाई है। उन्होंने प्रतिबंधित संगठनों की सतत निगरानी, नशीली दवाओं के विरुद्ध बहुस्तरीय रणनीति, कट्टरपंथ से प्रभावित क्षेत्रों में विकास आधारित समाधान, तटीय सुरक्षा के नवाचार, तथा प्राकृतिक आपदाओं में सक्रिय पुलिस नेतृत्व की आवश्यकता भी व्यक्त की। यह सब उस व्यापक सोच का हिस्सा है जिसमें पुलिस केवल अपराध से लड़ने वाली व्यवस्था नहीं बल्कि विकास की रणनीतिक सहभागी शक्ति है।
परंतु पुलिस सुधार केवल निर्देशों से संभव नहीं; इसके लिए संतुलित एवं अत्याधुनिक ढांचे की जरूरत है जिसमें प्रशिक्षण, संसाधन, मनोबल, आचार-नीति, राजनीतिक निर्भरताओं से मुक्ति और सामाजिक सम्मान शामिल हों। आलोचना जितनी महत्वपूर्ण है, पुलिस के संघर्षों को समझना भी उतना ही आवश्यक है, क्योंकि इसी दोतरफा समझ से सुधार का रास्ता निकलता है। प्रधानमंत्री की अपेक्षा है कि पुलिस नेतृत्व खुद को नए भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप तैयार करे, लक्ष्य स्पष्ट करे और वह व्यवस्था बनाए जिसमें नागरिक पुलिस को भय से नहीं बल्कि विश्वास से देखें। विकसित भारत की यात्रा में सुरक्षा, न्यायबोध और अनुशासन की संरचना को सशक्त बनाने के लिए पुलिस का आधुनिक, मानवीय और विश्वसनीय स्वरूप अनिवार्य है। यह सुधार केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि सोच, दृष्टि और चरित्र का परिवर्तन है। तभी खाकी का सम्मान लौटेगा, जनता का विश्वास मजबूत होगा और पुलिस व्यवस्था वास्तव में लोकतंत्र की प्रहरी के रूप में पहचानी जाएगी।
प्रधानमंत्री के ताजा विचारों ने स्पष्ट किया है कि पुलिस की छवि सुधारने का अर्थ केवल कठोरता घटाना नहीं, बल्कि उसे प्रोफेशनल, संवेदनशील और जवाबदेह बनाना है। आज जरूरत इस बात की है कि पुलिस व्यवस्था के लिए भय का नहीं, विश्वास और सुरक्षा का केंद्र बने। शहरी पुलिसिंग को सुदृढ़ करने, पर्यटक पुलिस को पुनर्जीवित करने और नए आपराधिक कानूनों पर जन-जागरूकता बढ़ाने की दिशा में पहल इसलिए महत्वपूर्ण है कि इससे पुलिस “डंडे की ताकत” से आगे बढ़कर “मदद की शक्ति” बनेगी। यदि नागरिक को यह अनुभव होने लगे कि पुलिस मदद के लिए तत्पर है, उसके अधिकारों का सम्मान करती है और कानून का निष्पक्ष पालन करती है, तो खाकी वर्दी का अर्थ केवल अनुशासन नहीं बल्कि विश्वास, अभय और सहारा प्रतीत होगा। यही वह परिवर्तन है जो विकसित भारत की सोच में निहित है।
अंग्रेज़ी शासकों ने अपने शासन को थोपने, जनता को नियंत्रित करने और भय-आधारित प्रशासन चलाने हेतु पुलिस तंत्र की रचना की। 1860 के कानून के आधार पर स्थापित भारतीय पुलिस का मूल चरित्र दंडात्मक, शासक-केन्द्रित और कठोर शक्ति-प्रयोग वाला था। स्वतंत्रता के बाद भी इस व्यवस्था में सार्थक बदलाव न होना एक विडंबना है। आज़ाद भारत ने लोकतंत्र अपनाया पर पुलिस ढांचे ने अभी तक औपनिवेशिक सोच को पूरी तरह त्यागा नहीं। परिणामतः पुलिस जनसेवा की बजाय सत्ता को बचाने और भय पैदा करने का उपकरण बनी रह गई। आज आवश्यकता है कि भारत का पुलिस तंत्र भारत के मूल्यों के अनुरूप पुनर्निर्मित हो। विकसित भारत को विकसित सोच वाली पुलिस चाहिए जो नागरिकों के साथ विश्वास-आधारित संबंध बनाए, दमन नहीं बल्कि संरक्षण दे, और कानून को लागू करने में नैतिकता, पारदर्शिता और मानवता को प्राथमिकता दे। ऐसी पुलिस व्यवस्था ही सच्चे अर्थों में लोकतंत्र की प्रहरी बन सकती है और भारत की सभ्यता-संस्कारों का प्रतिबिंब भी।
इसी संदर्भ में पुलिस थानों के नामकरण की सोच पर पुनर्विचार भी आवश्यक है। “थाना” शब्द में दमन और भय की छाया रही है, जबकि लोकतांत्रिक समाज में वह नागरिक सहारा का स्थान होना चाहिए। यदि उन्हें “सुरक्षा केंद्र”, “नागरिक सहायता केंद्र”, “पुलिस सेवा भवन”, “अभय केंद्र” या “सहयोग प्रहरी केंद्र” जैसे नाम दिए जाएं तो नागरिक के मानस में पुलिस की भूमिका का अर्थ बदलने लगेगा। नाम केवल शब्द नहीं होता, वह भाव, चरित्र और अनुभव निर्मित करता है। इस सकारात्मक नामकरण से पुलिस केन्द्र केवल शिकायत या धमकाने का प्रतीक नहीं बल्कि सहायता, समस्या-समाधान, विश्वास और न्याय का केन्द्र बन सकता है। यह प्रतीकात्मक परिवर्तन, यदि व्यवहार सुधार के साथ जुड़ जाए, तो पुलिस के प्रति जनता में सम्मान, निर्भयता और साझेदारी की भावना और अधिक मजबूत होगी और यही वह दिशा है जिसे विकसित भारत की सुरक्षा, नीतिगत सोच और संवेदनशील शासन का स्वरूप कह सकते हैं।
इसके विपरीत आज की वास्तविकता यह है कि जब पुलिस दरवाजे पर आती है, तो नागरिक घबराता है-“कहीं फंस न जाऊं।” यह भय उस विश्वासहीनता का परिणाम है जिसे बदलना आवश्यक है। अपराध की प्रकृति बदल रही है, साइबर अपराध, आर्थिक अपराध, आतंकवाद, मानव तस्करी, ड्रग नेटवर्क-इनसे मुकाबले के लिए बेहतर प्रशिक्षण, तकनीक और इंटेलिजेंस चाहिए। लोकतंत्र में पुलिस सबसे प्रत्यक्ष शासन-कर्म है। जनता रोज उसे देखती, झेलती और समझती है। खराब अनुभव सीधे शासन के प्रति अविश्वास पैदा करते हैं। विकसित भारत 2047 की आकांक्षाओं में पुलिस वह संरचना है जो सुरक्षा, अनुशासन, न्याय और सामाजिक साझेदारी को सुनिश्चित करती है। पुलिस की वर्दी के भीतर मनुष्य, संवेदना और विवेक दिखाई दे, तभी खाकी का सम्मान लौटेगा और जनता का विश्वास सुदृढ़ होगा। नए भारत के निर्माण में पुलिस का यह रूपांतरण एक निर्णायक धुरी होगा, जहां सुरक्षा और संवेदनशीलता साथ-साथ चलें, और जहां कानून केवल भय नहीं बल्कि न्याय और विश्वास का प्रतीक बने।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान और विकृत राजनीति

बिहार विधानसभा चुनावो से पूर्व आरंभ हुआ मतदाता सूची का शुद्धीकरण ( एसआईआर ) अभियान अब पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश सहित कुछ अन्य राज्यों में चल रहा है। देश के तमाम विरोधी राजनैतिक दलों ने मतदाता सूची शुद्धीकरण अभियान के विरुद्ध आक्रामक राजनीति भी कर रहे हैं । मतदाता सूची के शुद्धीकरण अभियान के अंतर्गत जिन लोगों की मृत्यु हो चुकी है  या जो लोग कहीं अन्यत्र चले गए हैं, या जिनके पास एक से अधिक मतदाता क्रमांक हैं उनकी पहचान करके उनको मतदाता सूची से बाहर किया जा रहा है। निर्वाचन आयोग कई बार स्पष्ट कर चुका है कि एसआईआर की इस प्रक्रिया में कोई भी योग्य मतदाता छूटेगा नहीं और कोई भी  विदेशी घुसपैठिया सूची में रहेगा नहीं।

चुनाव आयोग के इस अभियान में लाखों कर्मचारी व अधिकारी दिन रात कठोर परिश्रम कर रहे हैं। जिस समय देश के समस्त राजनैतिक दलों को चुनाव आयोग के इस अभियान में सम्पूर्ण सहयोग सहयोग करना चाहिए उस समय विरोधी दल इसका विरोध कर रहे हैं और इसे पटरी से उतारने के लिए तरह- तरह की पैतरेंबाजी कर रहे हैं। एसआईआर की  प्रक्रिया के विरुद्ध कांग्रेस पार्टी  सहित केरल, तमिलनाडु और बंगाल कि राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट तक चली गयीं । झारखंड सरकार के एक मंत्री ने बयान दिया कि अगर  बीएलओ किसी मतदाता का नाम काटता है तो उस बीएलओ को एक कमरे में बंद करके आग लगा दो। जो लोग संविधान की किताब हाथ में लेकर घूमते हैं वही लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया व संवैधानिक काम में बाधा डालने का घृणित प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी  जहां एक ओर वोट चोरी का आरोप लगाते हुए शुद्ध मतदाता सूची  की मांग कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर इस अभियान का विरोध कर रहे हैं। राहुल को पता ही नहीं कि वो क्या चाहते हैं?

बंगाल में तीखा विरोध- एसआईआर का सबसे तीखा विरोध बंगाल, केरल, तमिलनाडु में सरकारी स्तर पर देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में जातिवाद व मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले सभी दल इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। बंगाल में जब से मतदाता सूची शुद्धीकरण का अभियान प्रारंभ हुआ है तभी से बांग्लादेशी घुसपैठिए स्वतः बंगाल छोड़ रहे हैं और सीमा पार जाने के लिए एकत्र हो रहे हैं। अनेक बांग्लादेशी घुसपैठियों ने कैमरे के सामने आकर स्वीकारा है कि वह कई वर्षो से बंगाल में रह रहे हैं, उनका आधार कार्ड व राशन कार्ड तक बना हुआ है।

एसआईआर प्रक्रिया से बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी घुसपैठियों के मुद्दे  पर पूरी तरह से बेनकाब हो रही हैं। एक समय में ममता बनर्जी ने बंगाल में बढ़ रही घुसपैठ के खिलाफ संसद से सड़क तक आवाज बुलंद की थी और वर्ष 2002 में एसआईआ का समर्थन किया था। उस समय ममता दीदी को बंगाल का मुख्यमंत्री बनना था लेकिन अब वो मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीती के कारण  घुसपैठियों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए,  भारत और भारतियों के हितो को दरकिनार करते हुए मतदाता शुद्धीकरण अभियान का विरोध कर रही हैं। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस अभियान के विरोध में पूरे भारत में आग लगाने की धमकी दे रही हैं। ममता बनर्जी ने एसआईआर के विरोध के नाम पर आगामी छह दिसंबर को एक रैली करने का निर्णय लिया है जिसका नाम उन्होंने सद्भावना रैली रखा है । रैली का नाम और तिथि दोनों ही उनकी मंशा पर संदेह अगर उन्हें उत्पन्न कर रहे हैं । बंगाल में एसआईआर के कार्य में लगे कर्मचरियों को धमकियां  दी जा रही हैं।

विरोधी दलों ने एसआईआर पर दोहरे मापदंड वाली रणनीति अपनाई है। एक तरफ यह एसआईआर की प्रक्रिया में शामिल हो रहे हैं और दूसरी और न्यायपालिका की शरण में भी जा रहे हैं और समाज में व्यापक पैमाने पर झूठ और भ्रम फैलाने वाले बयान भी दे रहे हैं।अभी टीएमसी नेताओं की चुनाव  आयोग के साथ एक बैठक भी हुई जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग से पांच सवाल पूछे। उसके बाद चुनाव आयोग ने अत्यंत कड़ा रुख अपनाते हुए बंगाल के डीजीपी को पत्र लिखकर मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के कार्य में लगे सभी अधिकारियों  और कर्मचारियों  को पूरी सुरक्षा देने  को कहा है।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी विरोध- एसआईआर पर  यूपी में मुस्लिम तुष्टिकरण और पीडीए की राजनीति करने वाले सपा मुखिया अखिलेश यादव  ने  भी दोहरा मापदंड अपनाते हुए अपना एसआईआर  का फार्म तो भर कर दे दिया किंतु विरोध  के लिए एक नया शिगूफा छोड़  दिया है कि एसआईआर की इस प्रक्रिया के कारण आरक्षण समाप्त हो जाएगा। आपकी जमीन खेत और नौकरी आदि  सब कुछ छीन लिया जाएगा । वह यह भी दावा कर रहे हैं कि इसके कारण  कम से कम एक करोड़ से ढाई करोड़ तक मतदाताओं  के नाम कट जाएंगे । जब उनकी भ्रम पैदा करने वाली बयानबाजी कम पड़ जाती है तब वह चुनाव आयोग को लठैत आयोग बताने लगते हैं।

वास्तविकता यह हे कि एसआईआर की यह  प्रक्रिया मतदाता सूची  को व्यापक ढंग से शुद्ध कर रही है। विचार करने कि बात है क्या लोकतान्त्रिक व्यवस्था की परिष्कृति के लिए जिस मतदाता की 2003 से 2025 के मध्य मृत्यु हो चुकी है या जो मतदाता अन्यत्र चला गया है या जो भारत का नागरिक ही नहीं है क्या उसका नाम हटना नहीं चाहिए। वो कौन लोग हैं जो मृत्यु के बाद भी मतदान कर रहे हैं? मतदाता सूची शुद्धिकरण लोकतंत्र की शुचिता के लिए आवश्यक है। तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले स्वार्थी नेता इस बात को समझें  या न समझें  मतदाता इस बात को अच्छी तरह समझ रहा है और प्रक्रिया को पर्याप्त समर्थन व सहयोग दे रहा है ।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं. – 9198571540

बीजेपी की सीएम प्रयोगशाला में मप्र, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पर भारी हैं भजनलाल

किसी जादूगर की झोली से, बेहद अप्रत्याशित और औचक तरीके से निकले जादू की तरह, दो साल पहले तीन मुख्यमंत्री निकले। राजस्थान में भजनलाल शर्मा, मध्य प्रदेश में मोहन यादव और छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय। तीनों को जब मुख्यमंत्री घोषित गया, तो पार्टी के ज्यादातर लोग तीनों को, संगठन के ईमानदार कार्यकर्ता से ज्यादा नहीं जानते थे, और तीनों प्रदेशों की जनता तो तीनों को भी बेहद कम ही नहीं जानती थी। न तीनों का कोई बड़ा जनाधार, न बड़े सियासी समीकरण,  और न ही कोई ऐसा कोई संकेत कि वे राज्य में सत्ता को सफलता से संभाल लेंगे। मगर अब, जब तीनों को सत्ता सम्हाले दो साल पूरे हो रहे हैं, तो यह हिसाब – किताब भी जरूरी है कि तीनों में से कौन कितना सफल बन सका और किसने खुद को आलाकमान की भावनाओं के अनुरूप मुख्यमंत्री के खुद को ढाला। तीनों में सबसे मजबूत प्रोफ़ाइल किसका है, और किसके बारे में क्या आम धारणा बनी है। यह जांचने के लिए अगर राजनीतिक स्थिरता, प्रशासनिक पकड़, नेतृत्व के साथ तालमेल, प्रादेशिक जटिलताओं को संभालने की क्षमता और भविष्य की संभावना के राजनीतिक नजरिये का आकलन करें, तो सबसे मजबूत प्रोफ़ाइल भजनलाल शर्मा का उभरता है। क्योंकि भौगोलिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं जातिगत समीकरण में सबसे अप्रत्याशित राज्य में सबसे कमजोर समझे जाने वाले किसी नेता का लगातार दो वर्ष तक बिना किसी बड़े असंतोष के निर्विवाद सत्ता संभालना आसान नहीं होता।

पॉलिटिकल प्रोफ़ाइल मजबूत किया भजनलाल ने

 राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में, भजनलाल शर्मा के खाते में तीन प्रमुख उपलब्धियां दर्ज हुईं, एक तो निर्विवाद सत्ता संचालन, दूसरा, प्रशासनिक कमान और तीसरा ताकतवर नेताओं के साथ व्यावहारिक संतुलन। राजस्थान की राजनीति में, जहां सियासी संघर्ष और धड़ेबाज़ी लगातार चलते रहते हैं, वहां मुख्यमंत्री के तौर पर भजनलाल शर्मा ने शांत प्रशासनिक ढांचा दिया। शर्मा के अब तक के कार्यकाल के संदेश यही है कि कम अनुभव वाले नेता भी बड़े राज्य चला सकते हैं, यदि उनमें संतुलन, सरलता और स्थिरता की क्षमता हो। इसी कारण माना जाता है कि मध्य प्रदेश में मोहन यादव और छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय के मुकाबले भजनलाल शर्मा का पॉलिटिकल प्रोफ़ाइल सबसे अधिक मजबूत हुआ है। वे सबसे कमजोर माने जाते थे, लेकिन अब सबसे ज्यादा भरोसेमंद मुख्यमंत्री के रूप में उभरे हैं। मुख्यमंत्री शर्मा कम बोलने और ज्यादा काम करने वाली शैली में फिट होते दिखे हैं। न किसी बड़े नेता से टकराव, न किसी विवादित बयान से सुर्खियां बटोरने की कोशिश। उन्होंने खुद को लो-प्रोफाइल, मगर इफ़ेक्टिव मुख्यमंत्री साबित किया। भजनलाल शर्मा की सबसे बड़ी ताकत उनका केंद्रीय नेतृत्व के साथ सहज तालमेल है, जो बीजेपी नेतृत्व को सबसे अधिक पसंद आता है। इस कारण वे उस मॉडल में सबसे बेहतर फिट हुए हैं जिसमें आलाकमान राज्य की कमान अपने हाथ में रखकर, एक संतुलित और भरोसेमंद चेहरे को आगे करता है।

सीमित प्रभाव में सिमटे यादव और विष्णुदेव

 भले ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव को संगठन के मजबूत सिपाही के तौर पर जाना जाता है, लेकिन लेकिन प्रशासनिक वजन सीमित ही रहा है। यादव भी लंबे समय तक गुमनाम ही रहे मगर, युवा मोर्चा से लेकर संगठन में मेहनत करते हुए वे प्रदेश के शीर्ष पद तक पहुंचे। मुख्यमंत्री के तौर पर उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी शिवराज सिंह चौहान जैसे तपे – तपाए नेता के बाद सत्ता संभालने का दबाव। मोहन यादव व्यक्तिगत करिश्मा और व्यापक प्रशासनिक नियंत्रण के मामले में तुलनात्मक रूप से सीमित नजर आते हैं। क्योंकि मुख्यमंत्री बने हुए दो वर्ष बीत जाने के बावजूद, राज्य अब भी व्यापक पैमाने पर बीजेपी के पारंपरिक ‘शिवराज स्ट्रक्चर’ पर ही चलता हुआ दिखता है। उधर, छत्तीसगढ़ देखें, तो मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के साथ आदिवासी चेहरा होने की मजबूती का लेबल तो चस्पा है, पर उनका भी राजनीतिक विस्तार अभी भी सीमित ही है। वे शांत, सरल और आदिवासी समाज में प्रभाव रखने वाले नेता रहे हैं। आदिवासी मुख्यमंत्री के रूप में उनकी छवि ईमानदार, सादगीपूर्ण और साफ-सुथरी है। मगर, साय अभी तक छत्तीसगढ़ की राजनीति में प्रखर या तेजतर्रार चेहरा नहीं बन पाए हैं। उनकी पहचान एक शांत और सीमित प्रभाव वाले नेता की ही ज्यादा बन सकी है, इसी कारण वहां कांग्रेस ताकत दिखाती रहती है।

भजनलाल की राष्ट्रीय राजनीति में पहचान

तुलनात्मक तरीके से देखें, तो विष्णुदेव साय और मोहन यादव के मुकाबले राजस्थान में भजनलाल शर्मा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वे एक नए प्रकार के बीजेपी मुख्यमंत्री का मॉडल बनकर उभरे हैं। वे शांत, ईमानदार, महत्वाकांक्षा विहीन और पूर्णतः आलाकमान के प्रति समर्पित विश्वासपात्र के रूप में भी खरे उतरे हैं। उन्होंने अपने से वरिष्ठ, बड़े और प्रभावशाली नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखा और चाहे वह प्रदेश संगठन हो, केंद्र हो या स्थानीय शक्ति समूह। इसीलिए शर्मा को मुख्यमंत्रियों के मामले में बीजेपी के प्रयोग का सफलतम उदाहरण माना जा सकता हैं। दो वर्ष पहले और आज के तुलनात्मक आकलन में, भजनलाल शर्मा मात्र एक अप्रत्याशित चेहरा नहीं रहे, बल्कि अब वे राजस्थान और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी एक स्थापित पहचान बना चुके हैं। शर्मा को मुख्यमंत्री बना कर बीजेपी ने यह उदाहरण सेट किया था कि पार्टी संगठन छोटे से कार्यकर्ता को भी शीर्ष पद तक पहुंचा सकता है, तो एक मुख्यमंत्री के तौर पर बीते दो वर्षों में भजनलाल शर्मा ने भी अपने राजनीतिक आचरण से यह साबित किया ही है कि सामान्य लोगों पर जब भरोसा किया जाता है, तो वे प्रभावशाली लोगों से भी ज्यादा बेहतर साबित हो सकते हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

भारत का आर्थिक विकास – सहकारिता से समृद्धि की ओर

भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है और हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों का अनुपालन करते हुए ग्रामीण इलाकों में निवास कर रहे नागरिक आपस में भाई-चारे के साथ मिलजुलकर रहते आए हैं। इस दृष्टि से देखा जाय तो सहकार की भावना हम भारतीयों के डीएनए में है। इसी विषय के दृष्टिगत एक बार पुनः आज भारत के प्रत्येक गांव को खुशहाल एवं समृद्ध बनाने की लिए समस्त गावों को सहकारिता से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। “सहकार से समृद्धि” का नारा भी इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर दिया गया है। भारत में आज सहकारी समितियों की स्थापना को बढ़ावा दिया जा रहा है क्योंकिं भारत में सहकारी समतियां, स्व-सहायता, स्व-जिम्मेदारी, लोकतंत्र, समानता, न्याय एवं एकजुटता जैसे भारतीय मूल्यों के आधार पर कार्य करती हुई दिखाई देती हैं। साथ ही, जिन 7 सिद्धांतों के आधार पर इन समितियों के कार्य करने की अपेक्षा रहती है, उससे इन समितियों के सफल होने की सम्भावना बढ़ जाती है। यह 7 सिद्धांत हैं – खुली और स्‍वैच्छिक सदस्‍यता; लोकतांत्रिक तरीके से सदस्‍यों की भागीदारी; सदस्‍यों की आर्थिक भागीदारी; स्‍वायत्‍तता और स्‍वतंत्रता; शिक्षा, प्रशिक्षण और सूचना: कोआपरेटिव के बीच सहयोग; समुदाय के प्रति सरोकार।

सहकारिता वह संगठन है जिसके द्वारा दो या दो से अधिक व्यक्ति स्वेच्छापूर्ण मिलजुल कर समान स्तर पर आपसी आर्थिक हितों की वृद्धि करते हैं। इस प्रकार सहकारिता उस आर्थिक व्यवस्था को कहते हैं जिसमें मनुष्य किसी आर्थिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए मिलजुल कर कार्य करते हैं। समृद्धि केवल धन-संपत्ति से कहीं अधिक है, यह तब होती है जब सभी लोगों को फलने-फूलने का अवसर और स्वतंत्रता प्राप्त होती है। समृद्धि एक समावेशी समाज पर आधारित होती है, जिसमें एक मजबूत सामाजिक अनुबंध होता है जो प्रत्येक व्यक्ति की मूलभूत स्वतंत्रता और सुरक्षा की रक्षा करता है। सहकारिता का मुख्य उद्देश्य सदस्यों के जीवन को बेहतर बनाना और सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। यह एक ऐसा संगठन है जो सदस्यों को सशक्त बनाता है और उन्हें अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए एक साथ काम करने का अवसर प्रदान करता है।

भारत में आर्थिक विकास को गति देने के उद्देश्य से सहकारिता आंदोलन को सफल बनाना बहुत जरूरी है। वैसे तो हमारे देश में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1904 से हुई है एवं तब से आज तक सहकारी क्षेत्र में लाखों समितियों की स्थापना हुई है। कुछ अत्यधिक सफल रही हैं, जैसे अमूल डेयरी, परंतु इस प्रकार की सफलता की कहानियां बहुत कम ही रही हैं। कहा जाता है कि देश में सहकारिता आंदोलन को जिस तरह से सफल होना चाहिए था, वैसा हुआ नहीं है। बल्कि, भारत में सहकारिता आंदोलन में कई प्रकार की कमियां ही दिखाई दी हैं। देश की अर्थव्यवस्था को शीघ्र ही यदि 5 लाख करोड़ अमेरिकी डालर के आकार का बनाना है तो देश में सहकारिता आंदोलन को सफल बनाना ही होगा। इस दृष्टि से केंद्र सरकार द्वारा एक नए सहकारिता मंत्रालय का गठन भी किया गया है। विशेष रूप से गठित किए गए इस सहकारिता मंत्रालय से अब “सहकार से समृद्धि” की परिकल्पना के साकार होने की उम्मीद भी की जा रही है।

भारत में सहकारिता आंदोलन का यदि सहकारिता की संरचना की दृष्टि से आंकलन किया जाय तो ध्यान में आता है कि देश में लगभग 8.5 लाख से अधिक सहकारी साख समितियां कार्यरत हैं। इन समितियों में कुल सदस्य संख्या लगभग 28 करोड़ है। हमारे देश में 55 किस्मों की सहकारी समितियां विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं। जैसे, देश में 1.5 लाख प्राथमिक दुग्ध सहकारी समितियां कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त 93,000 प्राथमिक कृषि सहकारी साख समितियां कार्यरत हैं। ये मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में कार्य करती हैं। इन दोनों प्रकार की लगभग 2.5 लाख सहकारी समितियां ग्रामीण इलाकों को अपनी कर्मभूमि बनाकर इन इलाकों की 75 प्रतिशत जनसंख्या को अपने दायरे में लिए हुए है।

इसके अलावा देश में सहकारी साख समितियां भी कार्यरत हैं और यह तीन प्रकार की हैं। एक तो वे जो अपनी सेवाएं शहरी इलाकों में प्रदान कर रही हैं। दूसरी वे हैं जो ग्रामीण इलाकों में तो अपनी सेवाएं प्रदान कर रही हैं, परंतु कृषि क्षेत्र में ऋण प्रदान नहीं करती हैं। तीसरी वे हैं जो उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों एवं कर्मचारियों की वित्त सम्बंधी जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करती हैं। इसी प्रकार देश में महिला सहकारी साख समितियां भी कार्यरत हैं। इनकी संख्या भी लगभग एक लाख है। मछली पालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मछली सहकारी साख समितियां भी स्थापित की गई हैं, इनकी संख्या कुछ कम है। ये समितियां मुख्यतः देश में समुद्र के आसपास के इलाकों में स्थापित की गई हैं। देश में बुनकर सहकारी साख समितियां भी गठित की गई हैं, इनकी संख्या भी लगभग 35,000 है। इसके अतिरिक्त हाउसिंग सहकारी समितियां भी कार्यरत हैं। संचालन और कार्यों की प्रकृति के आधार पर मुख्यतः छह प्रकार की सहकारी समितियां होती हैं। इनमें उपभोक्ता सहकारी समितियां, उत्पादक सहकारी समितियां, विपणन सहकारी समितियां, कृषक सहकारी समितियां, ऋण सहकारी समितियां और सहकारी आवास समितियां शामिल हैं।

उक्त वर्णित विभिन क्षेत्रों में कार्यरत सहकारी समितियों के अतिरिक्त देश में सहकारी क्षेत्र में तीन प्रकार के बैंक भी कार्यरत हैं। एक, प्राथमिक शहरी सहकारी बैंक जिनकी संख्या 1550 है और ये देश के लगभग सभी जिलों में कार्यरत हैं। दूसरे, 300 जिला सहकारी बैंक कार्यरत हैं एवं तीसरे, प्रत्येक राज्य में एपेक्स सहकारी बैंक भी बनाए गए हैं। उक्त समस्त आंकडें वर्ष 2021-22 तक के हैं। 29 जून, 2022 को भारत सरकार द्वारा 63,000 क्रियाशील प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) के कम्प्यूटरीकरण के लिए 2,516 करोड़ रुपये के कुल वित्तीय परिव्यय के साथ परियोजना को मंजूरी दी गई थी।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि हमारे देश में सहकारी आंदोलन की जड़ें बहुत गहरी हैं। दुग्ध क्षेत्र में अमूल सहकारी समिती लगभग 70 वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई है, जिसे आज भी सहकारी क्षेत्र की सबसे बड़ी सफलता के रूप में गिना जाता है। सहकारी क्षेत्र में स्थापित की गई समितियों द्वारा रोजगार के करोड़ों नए अवसर निर्मित किए गए हैं। सहकारी क्षेत्र में एक विशेषता यह पाई जाती है कि इन समितियों में सामान्यतः निर्णय सभी सदस्यों द्वारा मिलकर लिए जाते हैं। सहकारी क्षेत्र देश के आर्थिक विकास में अपनी अहम भूमिका निभा सकता है। परंतु इस क्षेत्र में बहुत सारी चुनौतियां भी रही हैं। जैसे, सहकारी क्षेत्र के बैंकों की कार्य पद्धति पर हमेशा से ही आरोप लगते रहे हैं एवं कई तरह की धोखेबाजी की घटनाएं समय समय पर उजागर होती रही हैं। सहकारी क्षेत्र के बैंकों में पेशेवर प्रबंधन का अभाव रहा है एवं ये बैंक पूंजी बाजार से पूंजी जुटा पाने में भी सफल नहीं रहे हैं। अभी तक चूंकि सहकारी क्षेत्र के संस्थानों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी तंत्र का अभाव था एवं केंद्र सरकार द्वारा अब किए गए नए मंत्रालय के गठन के बाद सहकारी क्षेत्र के संस्थानों को नियंत्रित करने में कसावट आएगी एवं इन संस्थानों का प्रबंधन भी पेशेवर बन जाएगा जिसके चलते इन संस्थानों की कार्य प्रणाली में भी निश्चित ही सुधार होगा, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

भारत विश्व में सबसे अधिक दूध उत्पादन करने वाले देशों में शामिल हो गया है। अब हमें दूध के पावडर के आयात की जरूरत नहीं पड़ती है। परंतु दूध के उत्पादन के मामले में भारत के कुछ भाग ही, जैसे पश्चिमी भाग, सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं। देश के उत्तरी भाग, मध्य भाग, उत्तर-पूर्व भाग में दुग्ध उत्पादन का कार्य संतोषजनक रूप से नहीं हो पा रहा है। जबकि ग्रामीण इलाकों में तो बहुत बड़ी जनसंख्या को डेयरी उद्योग से ही सबसे अधिक आय हो रही है। अतः देश के सभी भागों में डेयरी उद्योग को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है। केवल दुग्ध सहकारी समितियां स्थापित करने से इस क्षेत्र की समस्याओं का हल नहीं होगा। डेयरी उद्योग को अब पेशेवर बनाने का समय आ गया है। गाय एवं भैंस को चिकित्सा सुविधाएं एवं उनके लिए चारे की व्यवस्था करना, आदि समस्याओं का हल भी खोजा जाना चाहिए। साथ ही, ग्रामीण इलाकों में किसानों की आय को दुगुना करने के लिए सहकारी क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना करनी होगी। इससे खाद्य सामग्री की बर्बादी को भी बचाया जा सकेगा। एक अनुमान के अनुसार देश में प्रति वर्ष लगभग 25 से 30 प्रतिशत फल एवं सब्जियों का उत्पादन उचित रख रखाव के अभाव में बर्बाद हो जाता है।

शहरी क्षेत्रों में गृह निर्माण सहकारी समितियों का गठन किया जाना भी अब समय की मांग बन गया है क्योंकि शहरी क्षेत्रों में मकानों के अभाव में बहुत बड़ी जनसंख्या झुग्गी झोपड़ियों में रहने को विवश है। अतः इन गृह निर्माण सहकारी समितियों द्वारा मकानों को बनाने के काम को गति दी जा सकती है। देश में आवश्यक वस्तुओं को उचित दामों पर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कंजूमर सहकारी समितियों का भी अभाव है। पहिले इस तरह के संस्थानों द्वारा देश में अच्छा कार्य किया गया है। इससे मुद्रा स्फीति की समस्या को भी हल किया जा सकता है।

देश में व्यापार एवं निर्माण कार्यों को आसान बनाने के उद्देश्य से “ईज आफ डूइंग बिजिनेस” के क्षेत्र में जो कार्य किया जा रहा है उसे सहकारी संस्थानों पर भी लागू किया जाना चाहिए ताकि इस क्षेत्र में भी काम करना आसान हो सके। सहकारी संस्थानों को पूंजी की कमी नहीं हो इस हेतु भी प्रयास किए जाने चाहिए। केवल ऋण के ऊपर अत्यधिक निर्भरता भी ठीक नहीं है। सहकारी क्षेत्र के संस्थान भी पूंजी बाजार से पूंजी जुटा सकें ऐसी व्यवस्था की जा सकती हैं।

विभिन्न राज्यों के सहकारी क्षेत्र में लागू किए गए कानून बहुत पुराने हैं। अब, आज के समय के अनुसार इन कानूनो में परिवर्तन करने का समय आ गया है। सहकारी क्षेत्र में पेशेवर लोगों की भी कमी है, पेशेवर लोग इस क्षेत्र में टिकते ही नहीं हैं। डेयरी क्षेत्र इसका एक जीता जागता प्रमाण है। केंद्र सरकार द्वारा सहकारी क्षेत्र में नए मंत्रालय का गठन के बाद यह आशा की जानी चाहिए के सहकारी क्षेत्र में भी पेशेवर लोग आकर्षित होने लगेंगे और इस क्षेत्र को सफल बनाने में अपना भरपूर योगदान दे सकेंगे। साथ ही, किन्हीं समस्याओं एवं कारणों के चलते जो सहकारी समितियां निष्क्रिय होकर बंद होने के कगार पर पहुंच गई हैं, उन्हें अब पुनः चालू हालत में लाया जा सकेगा। अमूल की तर्ज पर अन्य क्षेत्रों में भी सहकारी समितियों द्वारा सफलता की कहानियां लिखी जाएंगी ऐसी आशा की जा रही है। “सहकारिता से विकास” का मंत्र पूरे भारत में सफलता पूर्वक लागू होने से गरीब किसान और लघु व्यवसायी बड़ी संख्या में सशक्त हो जाएंगे।

प्रहलाद सबनानी

सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

संसद को बाधित करना राष्ट्र को बाधित करना है

भारत की संसद का शीतकालीन सत्र 1 दिसंबर से आरंभ हो रहा है और इसके प्रारंभ होने से पहले हुई सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने आने वाले दिनों में संसद की कार्रवाई के हंगामेदार होने का संकेत देने में देर नहीं लगाई। विपक्ष ने स्पष्ट कर दिया है कि वह एस.आई.आर. सहित कई मुद्दों पर जोरदार ढंग से सदन में अपनी आवाज उठाएगा। विपक्ष संसद में सवाल उठाए, आवाज उठाए, यह उसका संवैधानिक अधिकार और कर्तव्य है, लेकिन मुद्दा यह है कि क्या यह अधिकार सार्थक बहस के रूप में सामने आएगा या एक बार फिर हंगामे की भेंट चढ़कर भारत के लोकतंत्र को शर्मसार करेगा। मॉनसून सेशन अगर ऑपरेशन सिंदूर के नाम था, तो इस बार बहस के केंद्र में एस.आई.आर. है। लेकिन, सरकार और विपक्ष-दोनों से ही सदन के भीतर ज्यादा समझदारी, संयम, शालीनता और सहयोग की अपेक्षा है, ताकि सत्र में अधिक काम हो सके। शीतकालीन क19 दिसंबर तक चलना है। इसमें कुल 15 दिन कार्यवाही चलेगी और इस दौरान शिक्षा, सड़क और कॉरपोरेट लॉ संबंधी कई अहम बिल पेश किए जाएंगे। इसी सत्र में हेल्थ सिक्यॉरिटी एंड नैशनल सिक्यॉरिटी सेस बिल, 2025 भी रखा जा सकता है, जिसका मकसद देश के हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा तैयारियों के लिए एक नया उपकर लगाना है। सारे ही बिल-प्रस्ताव महत्वपूर्ण हैं और इन पर सार्थक बहस की जरूरत है।
निश्चित दौर पर पिछले अनेक वर्षों से संसद की कार्रवाई हंगामे, शोर-शराबे, नारेबाजी की भेंट चढ़ती रही है। पिछला सत्र इस संदर्भ में बेहद निराशाजनक रहा। वेल में आकर नारेबाजी, कुर्सियां ठोकने, प्लेकार्ड दिखाने और लगातार स्थगन जैसे दृश्य दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण तस्वीर पेश करते रहे। वह सत्र देश के संसदीय इतिहास के सबसे कमजोर प्रदर्शन वाले सत्रों में गिना गया, जब लोकसभा की प्रॉडक्टिविटी महज 31 प्रतिशत के आसपास और राज्यसभा की लगभग 39 प्रतिशत रही। हंगामे और शोर-शराबे की वजह से दोनों सदनों में कई महत्वपूर्ण घंटे बर्बाद हो गए थे। सवाल यह है कि आखिर यह परंपरा कब बदलेगी? कब हमारे जनप्रतिनिधि समझेंगे कि संसद का एक-एक मिनट देश के करोड़ों लोगों की गाढ़ी कमाई से चलता है? एक मिनट का व्यर्थ खर्च लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाता है। संसद केवल बहस का मंच नहीं बल्कि देश की नीतियों, कानूनों और विकास-दिशा को तय करने वाला सर्वाेच्च स्थल है। लोकतंत्र की सफलता का मूलमंत्र जनता द्वारा चुनकर भेजे गए प्रतिनिधियों की सजगता, जवाबदेही और गरिमा है। इसलिए संसद का हर क्षण अर्थपूर्ण, कार्यकारी होना चाहिए, हर चर्चा राष्ट्रीय हित को आगे बढ़ाने वाली होनी चाहिए और हर बहस शालीनता तथा परिपक्वता की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए।
सत्र को सुचारुरूप से चलाने के लिये सरकार की ओर से सर्वदलीय बैठक आयोजित करना एक स्वस्थ एवं सौहार्दपूर्ण परम्परा एवं एक आशा की किरण है। इस बार भी सत्र शुरू होने से पहले 36 दलों का एक साथ बैठक करना एक अच्छी शुरुआत है। यह बैठक केवल औपचारिकता नहीं बल्कि संवाद और सहयोग की दिशा में एक सार्थक पहल है। देश यह उम्मीद कर सकता है कि यदि सदन का संचालन भी इसी सकारात्मक भावभूमि पर हुआ तो यह सत्र एक आदर्श परंपरा स्थापित कर सकता है। लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है, परंतु मनभेद अनिवार्य नहीं। संसद उन मनभेदों को संवाद में बदलने का पवित्र स्थान है। निश्चित ही विपक्ष की भी अपनी मांगें हैं, जिसे सर्वदलीय बैठक में रखा गया। विपक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा, एसआईआर, वायु प्रदूषण और विदेश नीति पर विस्तृत चर्चा चाहता है। अच्छी बात है कि विपक्षी दलों ने इस बारे में पहले ही अवगत करा दिया है और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के ही मुताबिक, किसी ने भी यह नहीं कहा कि संसद नहीं चलने दी जाएगी। सरकार और विपक्ष, दोनों का इस पर सहमत होना कि सदन चलना चाहिए, स्वागत योग्य है।
इस सत्र से सरकार 14 महत्त्वपूर्ण विधेयक पेश करने जा रही है। इन विधेयकों को पारित करवाना मात्र सरकार की जिम्मेदारी नहीं है; यह विपक्ष की भी उतनी ही बड़ी भूमिका है कि वह रचनात्मक सुझाव दे, आवश्यक संशोधन का आग्रह करे और राष्ट्रहित सर्वाेपरि रखते हुए संवाद के माध्यम से कानूनों को दिशा दे। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों दो पहिये हैं, एक पहिया चिटक जाए तो रथ आगे नहीं बढ़ता। आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद में एक नई लकीर खींची जाए-शालीनता की, संवैधानिक मर्यादाओं की, तर्कसंगत बहस की और राष्ट्रीय हित की। दुनिया भर के लोकतंत्रों में बहसें गरम होती हैं, लेकिन गरिमा नहीं टूटती। भारत में भी यह संस्कृति विकसित होनी चाहिए। विपक्ष का काम सरकार को कठघरे में खड़ा करना है, लेकिन वह हंगामे से नहीं बल्कि तथ्यपूर्ण तर्कों से हो। सवाल उठाने का अधिकार तभी सार्थक है जब उसके साथ उत्तर सुनने की तैयारी भी हो। पिछले कुछ सत्रों में यह प्रवृत्ति बढ़ी है कि विपक्ष प्रश्न पूछता है लेकिन उत्तर सुनने का अवसर ही नहीं देता। यह लोकतंत्र की आत्मा का हनन है। संसद सिर्फ आवाज बुलंद करने का मंच नहीं, वह सुनने, समझने और समाधान खोजने का माध्यम है। दुर्भाग्य से, पिछले कुछ वर्षों में यह मंच पक्ष और विपक्ष की राजनीतिक लड़ाइयों का अखाड़ा बनता जा रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार को भी विपक्ष के सवालों का सम्मानपूर्वक जवाब देना चाहिए, लेकिन विपक्ष को भी यह समझना होगा कि राजनीति निरंतर संघर्ष का नाम नहीं बल्कि संवाद की प्रक्रिया है।
देश की जनता बेहद उम्मीदों के साथ इस सत्र को देख रही है। महंगाई, रोजगार, सुरक्षा, विदेश नीति, सामाजिक सौहार्द, अर्थव्यवस्था, कृषि, शिक्षा और न्याय-ये सभी गंभीर मुद्दे हैं। जनता चाहती है कि उसके चुने हुए प्रतिनिधि इन मुद्दों पर ठोस बहस करें। यदि संसद हंगामों का अखाड़ा बन जाए, तो इन मुद्दों का समाधान कैसे निकलेगा? लोकतंत्र का वास्तविक मूल्य कानून में नहीं बल्कि उसके निर्बाध संचालन में है; यदि संचालन त्रुटिपूर्ण हो जाए, तो कानून भी अर्थहीन हो जाता है। संसद की गरिमा देश की गरिमा है। सांसद केवल राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा के वाहक हैं। उनकी भाषा, उनका आचरण और उनकी बहसें भविष्य की राजनीति का मार्ग तय करती हैं। यह चिंता का विषय है कि आज युवा पीढ़ी संसद के व्यवहार को लोकतंत्र का आदर्श नहीं, बल्कि अव्यवस्था का प्रतीक मानने लगी है।
सदन की मर्यादा केवल स्पीकर या सभापति पर निर्भर नहीं, बल्कि सभी सांसदों के संयम एवं शालीनता पर निर्भर है। सभापति का सम्मान करना, नियमों का पालन करना, विषय पर रहने वाली बहस करना और असहमति में भी सभ्यता-शालीनता बनाए रखना-ये संसदीय चरित्र के मूल तत्व हैं। इनका पालन ही संसद की शुचिता को बनाए रख सकता है। यदि सरकार बहुमत के अहंकार में विपक्ष की उपेक्षा करती है तो यह गलत है; लेकिन यदि विपक्ष अपनी रचनात्मक भूमिका छोड़कर केवल अवरोध बन जाए तो यह भी लोकतंत्र के साथ अन्याय है। संसद तभी सफल होगी जब दोनों तरफ का आचरण सकारात्मक हो। इस दृष्टि से शीतकालीन सत्र नई परंपराओं का प्रारंभ बनना ही चाहिए। इस बार के सत्र से यह अपेक्षा है कि यह एक सकारात्मक, शालीन और प्रगति का सत्र बने।
यह केवल कानून पारित करने का सत्र न हो; यह संवाद का, सौहार्दपूर्ण वार्ता का, समस्याओं के समाधान का और राष्ट्रीय हित के नए संकल्प का सत्र हो। यदि इस बार पक्ष और विपक्ष मिलकर अनुशासन, मर्यादा और जिम्मेदारी की एक नई लकीर खींच दें, तो देश के लोकतांत्रिक इतिहास में यह सत्र मील का पत्थर बन सकता है। भारत का लोकतंत्र विश्व के लिए प्रेरणा बन सकता है, बशर्ते संसद स्वयं अपने भीतर अनुशासन, शांति और संवाद की संस्कृति को स्थापित करे। यह सत्र उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन सकता है। देश आज यही उम्मीद कर रहा है कि जो सर्वदलीय बैठक शांति और सहमति से हुई, उसी भाव के साथ संसद का संचालन भी हो। यदि यह संभव हुआ तो यह केवल एक सत्र की सफलता नहीं होगी, बल्कि भारत के लोकतंत्र की विजय होगी।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

काशी तमिल संगममः ज्ञान परंपराओं, संस्कृतियों और समुदायों का मिलन

काशी तमिल संगमम का चौथा  सोपान 2 दिसम्‍बर, 2025 को शुरू हो रहा है, जो तमिलनाडु और काशी के बीच सांस्‍कृतिक और सभ्‍यतागत सम्‍पर्क को आगे बढ़ाएगा।
यह संस्‍करण “लेट्स लर्न तमिल – तमिल करकलम” पर आधारित है, जिसमें तमिल भाषा सीखने और भाषा की एकता को संगमम के केन्‍द्र में रखा गया है।
प्रमुख कार्यक्रम में तमिल करकलम (वाराणसी के स्कूलों में तमिल पढ़ाना), तमिल करपोम (काशी क्षेत्र के 300 छात्रों के लिए तमिल सीखने का स्टडी टूर), और ऋषि अगस्त्य वाहन अभियान (तेनकासी से काशी तक सभ्‍यतागत मार्ग का पता लगाना) शामिल हैं।
इस वर्ष का संगमम रामेश्वरम में एक विशालसमापन समारोह के साथ खत्म होगा, जो काशी से तमिलनाडु तक संस्‍कृति के उद्भव और विकास को सांकेतिक तौर पर पूरा करेगा।

एक पुराने रिश्ते को नये रुप में रखना: काशी तमिल संगमम क्या है?

काशी तमिल संगमम एक ऐसे रिश्ते का जश्न है जो सदियों से भारतीय कल्पना में बसा हुआ है। अनगिनत तीर्थयात्रियों, विद्वानों और साधकों के लिए, तमिलनाडु और काशी के बीच का सफ़र कभी भी सिर्फ़ शारीरिक तौर पर आने-जाने का रास्ता नहीं था – यह विचारों, सोच, भाषाओं और जीवित परंपराओं का एक आंदोलन था। संगमम इसी भावना से प्रेरित है, एक ऐसे बंधन को ज़िंदा करता है जिसने पीढ़ियों से भारत के सांस्कृतिक माहौल को शांतिपूर्वक आकार दिया है।

जब भारत अपनी आज़ादी के 75 साल पूरे होने परपूरे देश में आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाए जाने के महत्‍व के बारे में गहराई और गंभीरता से सोच रहा था और अपनी सभ्यतागत विरासत की गहराई को फिर खोज रहा था – संगमम देश को जोड़ने वाली सांस्कृतिक निरंतरता को फिर से पक्का करने के लिए एक उद्देश्‍यपूर्ण कोशिश के तौर पर सामने आया। आत्‍मविश्‍लेषण और भारत की स्‍थायी शक्ति का जश्‍न मनाने की इसी भावना के साथ, काशी तमिल संगमम ने एक पुराने जुड़ाव को सामने लाने के लिए एक राष्‍ट्रीय मंच दिया, जिसने सदियों से आध्यात्मिक सोच, कलात्मक अभिव्यक्ति और ज्ञान के आदान-प्रदान को रास्ता दिखाया है।

यह पहल एक भारत श्रेष्ठ भारत के सार को दर्शाती है, जो लोगों को अपनी संस्कृति से परे संस्कृतियों की समृद्धि को समझने और उसकी सराहना करने के लिए प्रोत्साहित करती है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित, आईआईटी मद्रास और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय प्रमुख ज्ञान भागीदार के रूप में कार्य कर रहे हैं, और रेलवे, संस्कृति, पर्यटन, कपड़ा और युवा कार्य और खेल सहित दस मंत्रालयों और उत्तर प्रदेश सरकार की भागीदारी के साथ, काशी तमिल संगमम दोनों क्षेत्रों के छात्रों, कारीगरों, विद्वानों, आध्यात्मिक गुरूओं, शिक्षकों और सांस्कृतिक परम्‍पराओं को संरक्षित करने के लिए सभी को एक साथ लाता है, जिससे उनके बीच विचारों, सांस्कृतिक कार्य प्रणालियों और पारंपरिक ज्ञान का आदान-प्रदान होता है। संगमम के प्रत्येक संस्करण में तमिलनाडु के छात्र, शिक्षक, कारीगर, विद्वान, आध्यात्मिक नेता और सांस्कृतिक चिकित्सक एक सप्ताह से दस दिनों के लिए काशी आते थे, जिसके दौरान वे काशी के मंदिरों, तमिल संबंध वाले सभी केंद्रों और अयोध्या और प्रयागराज जैसे पड़ोसी क्षेत्रों का दौरा करते थे।

काशी तमिल संगमम 4.0: ‘तमिल कारकलम’ – आइए तमिल सीखें

काशी तमिल संगमम 4.0 इस बढ़ते सांस्‍कृतिक संगम का अगला अध्‍याय है, जो इसकी सीमा और महत्‍वाकांक्षा दोनों को बढ़ाएगा। 2 दिसम्‍बर 2025 को शुरू होने वाला यह संस्‍करण पूर्व के संगमम का सारांश बनाए रखेगा, साथ ही भाषा सीखने और शैक्षणिक आदान-प्रदान पर ज़्यादा ज़ोर देगा। कार्यक्रम रामेश्वरम में एक समापन समारोह के साथ खत्म होगा, जो काशी – जो उत्तर भारत के सबसे पवित्र केन्‍द्रों में से एक है – से तमिल अध्‍यात्‍मिक विरासत की सबसे पवित्र जगहों में से एक तक के सफ़र को एक तरह से पूरा करेगा। यह उत्तर से दक्षिण के आर्क संगमम की असली भावना को दिखाता है: दो जीवंत संस्‍कृतियों के भूगोलों के बीच एक सेतु।

काशी तमिल संगमम 4.0 का दिल इसकी विषय वस्‍तु, “चलो तमिल सीखें – तमिल करकलम” में है। यह संस्‍करण तमिल भाषा अध्‍ययन को अपनी कल्‍पना के केन्‍द्र में रखता है, और इस विश्वास को आगे बढ़ाता है कि सभी भारतीय भाषाएँ एक साझा भारतीय भाषा परिवार का हिस्सा हैं। विषय वस्‍तु एक आसान लेकिन दमदार संदेश देती है: भाषाई विविधता सांस्कृतिक एकता को मज़बूत करती है। इस साल का संस्‍करण एक मज़बूत शैक्षणिक केन्‍द्र भी पेश करता है, जिसमें भाषा-आधारित सांस्कृतिक लेन-देन और युवाओं की भागीदारी पर ज़ोर दिया गया है। यह काशी क्षेत्र के छात्रों को तमिल भाषा में डूबने और तमिलनाडु की समृद्ध विरासत को सीधे अनुभव करने के मौके देकर, सांस्कृतिक एकता के विचार को प्रतीकों से परे ले जाता है।

इस विशाल कल्‍पना को ध्यान में रखते हुए, तमिलनाडु से 1,400 से अधिक प्रतिनिधि काशी में होने वाले कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। ये प्रतिनिधि सात बड़ी श्रेणियों में आते हैं – छात्र, अध्‍यापक, लेखक और मीडिया प्रोफेशनल्स, कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों के लोग, पेशेवर और कारीगर, महिलाएं, और अध्‍यात्मिक विद्वान। उनके शामिल होने से यह पक्का होता है कि विषय वस्‍तु की भावना समाज के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचे, जिससे काशी तमिल संगमम 4.0 का असर सबको साथ लेकर चलने वाला और दूर तक पहुंचने वाला हो।

काशी तमिल संगमम 4.0: प्रमुख पहल
उत्तर प्रदेश में छात्रों को तमिल पढ़ाना – “आइए तमिल सीखें – तमिल करकलम”

इस संस्‍करण की एक खास पहल तमिल अध्‍ययन का लर्निंग का संरचित परिचय है, खासकर काशी इलाके में।

वाराणसी के स्कूलों में डीबीएचपीएसप्रचारकों समेत 50 हिंदी जानने वाले तमिल अध्‍यापक तैनात किए जाएंगे।
उत्तर प्रदेश आने से पहले वे सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ़ क्लासिकल तमिल (सीआईसीटी) में ट्रेनिंग लेंगे।
प्रत्‍येक अध्‍यापक30छात्रों के बैच के लिए अल्‍पकालिक स्पोकन तमिल मॉड्यूल चलाएगा, जिसमें बेसिक बातचीत, उच्चारण और अल्फाबेट शामिल होंगे।
इस पहल के ज़रिए कुल 1,500 छात्र शुरुआती तमिल सीखेंगे।
बीएचयूका तमिल विभाग, सीआईआईएलमैसूर, आईआरसीटीसीऔर वाराणसी एडमिनिस्ट्रेशन कोऑर्डिनेशन और लॉजिस्टिक्स में मदद कर रहे हैं।

यह पहल तमिलनाडु के बाहर तमिल सीखने को बढ़ाने और भाषाई समावेश को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

तमिलनाडु की यात्रा करते हुए तमिल सीखें – स्टडी टूर प्रोग्राम

उत्तर प्रदेश में तमिल शिक्षण को पूरा करना काशी क्षेत्र के युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर शैक्षणिक बदलाव है।

उत्तर प्रदेश के 300 कॉलेज छात्र 2 दिसम्‍बर, 2025 से 10 बैच में तमिलनाडु जाएंगे।
वे सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ़ क्लासिकल तमिल (सीआईसीटी) चेन्नई में एक ओरिएंटेशन में शामिल होंगे, जिसके बाद राज्य भर के बड़े संस्‍थानों में तमिल भाषा की कक्षा और सांस्‍कृतिक सत्र होंगे।
प्रत्‍येक संस्‍थानछात्रों की मेजबानी करेगा, विषय कोऑर्डिनेटर प्रदान करेगा और ऐतिहासिक तमिल-काशी सम्‍पर्क से जुड़ी जगहों पर स्टडी टूर आयोजित करेगा।

यह कार्यक्रम सुनिश्चित करता है कि उत्तर भारत के युवा सीखने वालों को तमिल भाषा, विरासत और आज के सांस्‍कृतिकतौर-तरीकों से सीधा संपर्क मिले।

केटीएस 4.0 की सबसे खास पहलों में से एक अगस्त्य अभियान है, जो तमिल और भारतीय परंपरा में गहराई से जुड़े एक सभ्यतागत रास्ते को दिखाता है।

यह अभियान 2 दिसम्‍बर 2025 को तेनकासी (तमिलनाडु) से शुरू होगा और 10 दिसम्‍बर 2025 को काशी पहुंचेगा।
यह ऋषि अगस्त्य से जुड़े पौराणिक रास्ते पर चलेगा, जो भारतीय ज्ञान प्रणाली में तमिलनाडु के योगदान को दिखाता है।
यह यात्रा पांडियन शासक आदि वीर पराक्रम पांडियन की विरासत का भी सम्मान करती है, जिन्होंने सांस्कृतिक एकता का संदेश फैलाने के लिए उत्तर की यात्रा की और एक शिव मंदिर बनवाया, जिससे तेनकासी (“दक्षिण काशी”) का नाम पड़ा।
अपने मार्ग में, यह अभियान चेर, चोल, पांड्या, पल्लव, चालुक्य और विजयनगर काल के सभ्यतागत संबंधों को दिखाता है।
यह पारम्‍परिक तमिल साहित्य, सिद्ध चिकित्सा और साझा विरासत परंपराओं के बारे में जागरूकता को भी बढ़ावा देता है।

यह अभियान तमिलनाडु और काशी के बीच विचारों, संस्कृति और आध्यात्मिक शिक्षा के गहरे ऐतिहासिक आंदोलन का प्रतीक है।

1.0 से 4.0 तक: काशी तमिल संगमम की यात्रा

2022 में अपनी शुरुआत के बाद से, काशी तमिल संगमम तमिलनाडु और काशी के बीच एक संरचित सांस्‍कृति और शैक्षणिक जुड़ाव के तौर पर विकसित हुआ है। हर संस्‍करण ने क्यूरेटेड डेलीगेशन, थीमैटिक फोकस एरिया, एकेडमिक बातचीत और हेरिटेज एक्सपीरियंस के ज़रिए अपना दायरा बढ़ाया है, जिससे दोनों इलाकों के बीच सभ्‍यतागत रिश्ते लगातार मज़बूत हुए हैं।

काशी तमिल संगमम 1.0 (नवम्‍बर – दिसम्‍बर2022)
प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने 2022 में काशी तमिल संगमम का पहला संस्‍करण शुरू किया था, जिसने सांस्‍कृतिक सेतु की नींव रखी, जो बाद के संस्‍करणों के ज़रिए और मज़बूत होता जाएगा।पहला संस्‍करण, जो 16 नवम्‍बर से 15 दिसम्‍बर 2022 तक हुआ था, वह तमिलनाडु और काशी के बीच सांस्‍कृतिक रिश्तों को बड़े और रोमांचक अनुभवों की विशेषता के साथ लोगों के सामने लाया।

मुख्‍य बातें:
तमिलनाडु से 12अलग-अलग समूहों में – छात्र, अध्‍यापक, कारीगर, किसान, लेखक, धर्म गुरू, पेशेवर और सांस्‍कृतिक प्रैक्टिशनर्स—के 2,500से अधिक भागीदार।
वाराणसी, प्रयागराज और अयोध्या को कवर करने वाले आठ दिन के क्यूरेटेड टूर।
काशी में मुख्य सांस्‍कृतिक और आध्‍यात्मिक स्‍थानों: काशी विश्वनाथ मंदिर, केदार घाट, सारनाथ और तमिल हेरिटेज पॉकेट्स का दौरा।
महाकवि सुब्रमण्यम भारती के पुश्तैनी घर का दौरा और शहर में तमिल बोलने वाले समुदायों के साथ बातचीत।
बीएचयूमें रोज़ाना सांस्‍कृतिक कार्यक्रम जिनमें तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के कलाकार शामिल हुए।
हथकरघा, हस्‍तशिल्‍प, ओडीओपी उत्‍पाद, किताबें और परम्‍परागत खाने की प्रदर्शनियां।
शैक्षणिक सत्र, लेक्चर-डेमोस्ट्रेशन्स और सामुदायिक बातचीत जिनमें तमिलनाडु और काशी के बीच ऐतिहासिक और साहित्यिक संबंधों की खोज की गई।

इस पहले संस्‍करण ने संगमम का मॉडल बनाया—जो विरासत, संस्कृति, स्कॉलरशिप और सीधे लेन-देन के ज़रिए लोगों को एक साथ लाता है—और इसके बाद के सभी संस्‍करणों के लिए एक मज़बूत नींव रखी।

काशी तमिल संगमम 2.0 (दिसम्‍बर2023)

17 से 30 दिसम्‍बर 2023तक वाराणसी के नमो घाट पर आयोजित काशी तमिल संगमम के दूसरे संस्‍करण ने उद्घाटन समारोह में स्थापित सांस्कृतिक आदान-प्रदान के पैमाने और गहराई को बढ़ाया।

तमिलनाडु से सात अलग-अलग श्रेणियों के 1,435 प्रतिनिधियों ने वाराणसी, प्रयागराज और अयोध्या को कवर करते हुए आठ दिन के टूर में हिस्सा लिया, जिसमें काशी विश्वनाथ मंदिर, सारनाथ और सुब्रमण्यम भारती के घर जैसे बड़े आध्यात्मिक और तमिल विरासत वाले जगहों के दौरे भी शामिल थे।

इस संस्‍करण में माननीय प्रधानमंत्री के भाषण का पहली बार रियल-टाइम तमिल ट्रांसलेशन पेश किया गया, जिससे प्रतिनिधियों तक आसानी से जानकारी पहुंच सकी।
नमो घाट पर रोज़ाना होने वाले सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में दोनों राज्यों के शास्‍त्रीय, लोक और आधुनिक कार्यक्रम हुए, साथ ही सात विषयों वाले शैक्षणिक सत्र भी हुए, जिसमें एक खास अगस्त्य जयंती सत्र भी शामिल था।

हथकरघा, हस्‍तशिल्‍प, ओडीओपी उत्‍पाद, किताबें और क्षेत्रीय पकवानों की एक विशाल प्रदर्शनी में ₹22 लाख की बिक्री हुई और 2 लाख से ज़्यादालोग आए।
मज़बूत डिजिटल फुटप्रिंट, 8.5 करोड़ नागरिकों (ब्रांड24) तक अभियान की पहुंच और आधिकारिक केटीएससोशल मीडिया हैंडल पर 2.5 लाख इंटरैक्शन के साथ कुल 8 मिलियन (80 लाख) पहुंच।

15 से 24 फरवरी 2025 तक हुए काशी तमिल संगमम के तीसरे संस्‍करण ने तमिलनाडु और काशी के बीच सांस्कृतिक और बौद्धिक संबंधों को और गहरा किया, और विषय वस्‍तु पर ज़्यादा ध्यान दिया।

तीसरे सोपान के बारे में

ऋषि अगस्त्य पर एक खास विषय पर ध्‍यान केन्द्रित, जिसमें साहित्य, भाषा विज्ञान, दर्शन और भारतीय ज्ञान परंपराओं में उनके योगदान को दिखाने वाली प्रदर्शनियां और चर्चाएं हुई।
वाराणसी, प्रयागराज और अयोध्या में सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण जगहों का दौरा, जिसमें प्रयागराज में महाकुंभ मेला 2025 और नयाराम मंदिर शामिल है, जिससे प्रतिनिधियों ने एक गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभव लिया।

एनईपी 2020 के भारतीय ज्ञान परम्‍पराओं पर ज़ोर देने के साथ, प्राचीन तमिल ज्ञान सिस्टम को आधुनिक अनुसंधान, नये अविष्‍कारों और आधुनिक शिक्षा से जोड़ने वाले वर्कशॉप, सेमिनार और बहुविषयकसत्र।
अलग-अलग समूहों – छात्रों, अध्‍यापकों, लेखकों, कलाकारों, उद्यमियों, मिलकर काम करने वाली महिलाओं का समूह, डीबीएचपीएसप्रचारकों और युवा अविष्‍कारकों – की भागीदारी, जिससे एक-दूसरे के यहां सार्थक आदान-प्रदान और गहरा सामुदायिक सम्‍पर्क बन सके।

काशी तमिल संगम  3.0 ने संगमम की भूमिका को एक ऐसे प्लेटफॉर्म के रूप में मजबूत किया जहां परम्‍परा और आधुनिकता मिलती है, जिससे सीखने, बातचीत और साझा सांस्कृतिक अनुभव के माध्यम से तमिलनाडु और काशी के बीच सभ्यता की निरंतरता को मजबूत किया गया।

काशी-तमिल संबंध को मजबूत करना: एक स्थायी सांस्कृतिक निरंतरता

अपने चार संस्‍करणों में, काशी तमिल संगमम ने दिखाया है कि जब सांस्‍कृतिक लेन-देन असल में अनुभव से जुड़ा होता है, तो यह कैसे बदलाव लाता है।

प्रत्‍येक संस्‍करण ने इस सफ़र में एक अलग पहलू जोड़ा है: संगम एकका बड़े पैमाने पर सांस्‍कृतिक जुड़ाव, केटीएस 2.0में लोगों की बढ़ी हुई भागीदारी और विषय वस्‍तु पर आधारित जुड़ाव, और केटीएस 3.0का ज्ञान पर आधारित, ऋषि अगस्त्य पर केन्‍द्रित बातचीत। संगम 4 के साथ, संगमम तमिल भाषा सीखने को सबसे आगे रखकर एक नए दौर में आ रहा है, जिससे तमिल करकलम, तमिल कारपोम और संरचित स्टडी टूर के ज़रिए दो-तरफ़ा भाषाई जुड़ाव मुमकिन हो रहा है।

ये संस्‍करण मिलकर दिखाते हैं कि संगमम कैसे एक यादगार प्रोग्राम से आगे बढ़कर एक निरन्‍तर चलने वाला सांस्‍कृतिक मार्गबन गया है। प्रतिनिधि काशी के घाटों और मंदिरों में तमिल विरासत को फिर से खोजते हैं; उत्तर प्रदेश के छात्र तमिलनाडु का सीधा अनुभव करते हैं; अध्‍यापक नए सीखने वालों को तमिल सिखाते हैं; और दोनों इलाकों के समुदाय साहित्‍य, शिल्‍प, भोजन और साझा आध्‍यात्मिक परम्‍पराओं से जुड़ते हैं।

कुल मिलाकर यह सफ़र एक भारत श्रेष्ठ भारतकीप्रमुख कल्‍पना को दिखाता है, जहाँ एक-दूसरे की भाषाओं, परम्‍पराओं और नज़रियों से जान-पहचान के ज़रिए राष्‍ट्रीय एकता मज़बूत होती है। पुराने रिश्तों की फिर से खोज – जिसे अगस्त्य अभियान जैसी पहलों के ज़रिए उजागर किया गया है – और स्कूलों, यूनिवर्सिटीज़ और सांस्‍कृतिक स्‍थानों परआधुनिक अध्‍ययन का स्‍थान बनाना, साल भर सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान, भाषा की समझ और युवाओं की भागीदारी पर ईबीएसबीके ज़ोर को दिखाता है।

जैसे-जैसे काशी तमिल संगमम 4.0एक नए भाषाई और शैक्षणिक फोकस के साथ सामने आ रहा है, यह इस विचार को और मज़बूत करता है कि सांस्कृतिक समझ लगातार बातचीत से बनती है। विरासत को बढ़ावा देकर, भाषा सीखने को बढ़ावा देकर, और लोगों के बीच अच्छे संपर्क को मुमकिन बनाकर, संगमम आज एक लंबे समय तक चलने वाली सांस्कृतिक निरंतरता के तौर पर खड़ा है—यह तमिलनाडु और काशी के बीच हमेशा रहने वाले रिश्ते को और गहरा कर रहा है और साझा सभ्यता के अनुभव के ज़रिए भारत की एकता को और मज़बूत कर रहा है।

कांग्रेस में नए जिलाध्यक्षों पर सवाल और राजस्थान में बवाल

राजस्थान में नए कांग्रेस जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के बाद जबरदस्त घमासान मचा है। कहीं नए जातिगत समीकरणों पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो कहीं कमजोर को कमान सौंपने का मुद्दा है। किसी की विचारधारा पर विवाद है, तो कहीं पर उसका जनाधार ही न होने पर बवाल है। हर जिले में नए जिलाध्यक्ष नहीं बने नेताओं ने, जिलाध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के लिए यह बेहद मुश्किल हो रहा है कि उनके बनाए जिलाध्यक्षों को कई जिलों में स्वीकारा ही नहीं जा रहा है। इस घमासान का नुकसान कांग्रेस कैडर को हो रहा है।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के दस्तखत से नए घोषित कुल 45 जिलाध्यक्षों की नियुक्ति पर मचे इस घमासान से कांग्रेस संगठन को मजबूत बनाने के बजाय बिखराव की मुश्किलें ज्यादा बढ़ रही है। नए बने जिलाध्यक्षों में 12 वर्तमान और 5 पूर्व विधायक – मंत्री हैं। पांच जिलों में कुछ ज्यादा ही विवाद होने से घोषणा रोक दी गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के फॉर्मूले पर युवक कांग्रेस में चुनाव पहले से ही उसका कबाड़ा कर चुके हैं, और अब कांग्रेस में भी संगठन सृजन की बहुप्रचारित फार्मूले के तहत लंबी रायशुमारी और अध्यक्ष पद की दावेदारी में छंटनी से छन कर निकले जिलाध्यक्षों का यह ‘संगठन सृजन’ संगठन विसर्जन अभियान ज्यादा लग रहा है।

राहुल के फार्मूले की विफलता

कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी ने कांग्रेस को कैडर आधारित, चुनावी तैयार संगठन में बदलने के लिए ‘संगठन सृजन’ जैसा मॉडल अपनाया, जिसमें मुख्य संगठन और युवक कांग्रेस, महिला कांग्रेस, सेवादल, एनएसयूआई संगठनों में चुनाव, सर्वे और पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के आधार पर नई टीमें बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। युवक कांग्रेस में आंतरिक चुनाव करवाने का प्रयोग भी इसी सोच का हिस्सा था, लेकिन इससे कई जगह पैसे, गुटबाजी और स्थानीय ताकतवर नेताओं का दखल इतनी बढ़ा कि संगठन में असंतोष और विभाजन पहले से ज्यादा सामने आ गया। टिकट और पद के लालच में गुट बना कर चुनाव लड़ने से युवा कार्यकर्ताओं का वैचारिक प्रशिक्षण और दीर्घकालिक निष्ठा कमजोर हुई, और हारने वाले खेमे पार्टी से दूर या निष्क्रिय हो गए, तथा कमजोर लोग ज्यादा हावी भी हो गए।

शताब्दी गौरव के संपाक सिद्धराज लोढ़ा का मानना है कि राहुल गांधी का कांग्रेस को अपने तरीकों से मजबूत करने का फार्मूला फेल साबित हो रहा है। युवक कांग्रेस में चुनाव करवाने से पहले ही कांग्रेस का नुकसान हुआ मगर राहुल गांधी समझने को ही तैयार नहीं है। लोढ़ा कहते हैं कि संघ परिवार की धारा से आए लोगों को भी विधायक बनाने के बाद अब जिला कांग्रेस की कमान भी सौंपी गई है। आज नए जिला अध्यक्षों को लेकर राजस्थान कांग्रेस में जो धमाल दिख रहा है, उसे राहुल के प्रयोगवादी मॉडल को एक स्थिर संगठन के लिए सवाल के तौर पर भी देखा जाना चाहिए।

समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी

संगठन सृजन अभियान के तहत राजस्थान में 45 नए जिलाध्यक्षों की सूची जारी होते ही कई जिलों में विरोध, इस्तीफे और सार्वजनिक नाराजगी की लहर उठी। कुछ नवनियुक्त जिलाध्यक्षों ने खुद जिम्मेदारी लेने से इंकार किया या त्यागपत्र की बात कही, तो कई दावेदार और उनके समर्थक सोशल मीडिया और ज्ञापनों के जरिए खुले विरोध पर उतर आए, जिससे अभियान का मकसद यानी संगठन को मजबूत करना, उलटा पार्टी के लिए सिरदर्द बन गया है। वरिष्ठ पत्रकार हरिसिंह राजपुरोहित बताते हैं कि जोधपुर, जालोर, बाड़मेर और जयपुर जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिलों में नाराज नेताओं का आरोप है कि पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई और असली फैसला सिफारिश, धनबल और गुटीय दबाव के आधार पर हुआ, जिससे पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी हुई और स्थानीय जातीय व राजनीतिक संतुलन भी बिगड़ गया। कई जगह कार्यकर्ताओं ने सामूहिक इस्तीफे, बैठकों का बहिष्कार और मीडिया बयानबाजी का रास्ता पकड़ लिया, जिसने यह संदेश दिया कि नई जिला अध्यक्ष की सूची को व्यापक स्वीकार्यता नहीं मिल पाई है।

गुटबाजी से बने कमजोर जिलाध्यक्ष

राजस्थान कांग्रेस पहले से ही सचिन पायलट की खेमेबाजी और लंबी खींचतान और गुटबाजी से जूझती रही है, जिससे पार्टी का संगठनात्मक मनोबल कई बार गिरा है। ऐसे माहौल में लगातार साढ़े पांच साल से ज्यादा समय से प्रदेश अध्यक्ष पद पर बैठे गोविंद सिंह डोटासरा को यह स्पष्ट अंदाजा है कि भविष्य में भी इस पद पर बने रहना उनके लिए अपने व्यक्तिगत जनाधार के बूते कतई आसान नहीं होगा। इसीलिए उन्होंने नए जिलाध्यक्ष नियुक्ति को अपने सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की है।

राजनीतिक विश्लेषक राजकुमार सिंह का कहना है कि राजस्थान के कई जिलों में ऐसे लोगों को भी जिलाध्यक्ष बनाया गया, जो या तो अपेक्षाकृत कमजोर या जनाधारहीन माने जाते हैं या फिर स्थानीय जातीय समीकरणों के खिलाफ हैं, ताकि वे व्यक्तिगत रूप से उनके प्रति ज्यादा निर्भर और वफादार रहें तथा आगे चलकर प्रदेश में ताकतवर गुट के रूप में डोटासरा की ही नेतृत्व वाली भूमिका सुरक्षित रहे। राजस्थान के दिग्गज पत्रकार त्रिभुवन कहते हैं कि जिस तरह से नेताओं के बेटे-बेटियों को पद और ज़िम्मेदारियां बांटी गई हैं, वे आने वाले समय में कांग्रेस के लिए भारी बोझ साबित हो सकते हैं। जानी – मानी पत्रकार रेणु मित्तल दुख व्यक्त करते हुए कहती है कि ऐसा संभवतया पहली बार हुआ है कि कुछ जिलाध्यक्ष के पद बेचे गए और पैसे का लेनदेन हुआ है। इससे संगठन में दो तरह का नुकसान हुआ है, एक तरफ स्थानीय समाज में प्रतिनिधित्व और संतुलन का भाव कमजोर पड़ा, दूसरी तरफ पुराने प्रभावशाली नेताओं और कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर देने की धारणा ने बगावत की जमीन तैयार की, जो आज जिले ‑ जिले में दिखाई दे रही है।

अब बड़े नेताओं की जिम्मेदारी 

नई सूची में समझा जा रहा है कि नाम तय करने में गोविंद सिंह डोटासरा का, कुछ में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का, तो कुछ में कांग्रेस महासचिव सचिन पायलट का प्रभाव ज्यादा रहा। कुछ जिलों  में नाम को लेकर दिल्ली स्तर तक खींचतान हुई और हाईकमान को पैनल वापस मंगाकर फिर से मंथन करना पड़ा, जो इस बात का संकेत है कि तीनों शीर्ष राज्य नेताओं के हिस्से के जिला अध्यक्षों की अनौपचारिक बंदरबांट की राजनीति भी काम कर रही थी। अब जब सूची से असंतोष खुलकर सामने आ चुका है, तो तीनों नेताओं पर दोहरी जिम्मेदारी है कि वे अपने‑अपने समर्थक जिलाध्यक्षों से बात कर उन्हें शांत और सक्रिय रखें साथ ही जिन जिलों में उनके विरोधी या दूसरे गुट के लोग नियुक्त हुए हैं, वहां संवाद, समन्वय और साझा कार्यक्रमों के जरिए यह संदेश दें कि जिला अध्यक्ष किसी एक नेता का नहीं, पूरी कांग्रेस का प्रतिनिधि है। अगर डोटासरा, गहलोत और पायलट मिलकर नाराज व विरोध करने वाले जिला स्तरीय नेताओं से एक साथ मिल कर चर्चा करे, तथा कुछ विवादित नियुक्तियों पर संशोधन या समायोजन जैसे संगठनात्मक कदम जल्दी नहीं उठाए जाते, तो नए जिलाध्यक्षों की यह सूची अगले विधानसभा और पंचायत चुनावों से पहले कांग्रेस के लिए अवसर की बजाय बड़ी कमजोरी साबित हो सकती है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)