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ब्रह्मर्षि श्रीदेवरहा बाबा जन्म स्थान प्रधान पीठ उमरिया, बस्ती

पूज्य श्री देवरहा बाबा एक ऐसे ईश्वरलीन, अष्टांग योगसिद्ध योगी थे. जिन्हें लगभग एक शताब्दी से भी अधिक अवधि तक भारतवर्ष और विदेशों के, न सिर्फ उनके गृहस्थ-भक्त अपितु अनगिनत संन्यस्त शिष्य भी, साक्षात् परमात्मा की तरह पूजते रहे हैं।

उनका जन्म कब, कहाँ हुआ और उनकी आयु कितनी थी, ये प्रश्न आज भी लोग अनुत्तरित बना कर रखे हैं।  ना तो बाबा जी स्वयं और ना ही उनके भक्त अनुयायी इस गूढ़ रहस्य से पर्दा उठाये हैं। उमरिया बस्ती में कुल कुटुम्ब  होने के बावजूद बाबा जी को अपनी मातृभूमि का रहस्य ना जाने क्यों नहीं खोला। उमरिया भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बस्ती जिले के कप्तानगंज ( अब दुबौलिया) ब्लॉक में एक छोटा सा गांव है। यह बस्ती जिले के अंतर्गत आता है। यह जिला मुख्यालय बस्ती से 27 किलोमीटर दक्षिण की ओर स्थित है। यह ब्लॉक मुख्यालय कप्तानगंज से 11 कि.मी.और राज्य की राजधानी लखनऊ से 191 किमी दूर स्थित है। 2011 की जनगणना के अनुसार, उमरिया की जनसंख्या 218 है। यह नटवाजोत ग्राम पंचायत  के अधिकार क्षेत्र में आता है । उमरिया में लगभग 32 घर हैं।

इस स्तम्भ का लेखक बाबाजी के मूल गांव के पड़ोस का ही रहने वाला है जो अपने तीन पूर्ववर्ती पूर्वजों से बाबा जी के बचपन की कहानी सुनते चला आ रहा है। वह “बस्ती का पुरातत्व” विषय पर आगरा विश्व विद्यालय से पी एच डी शोध भी कर चुका है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में तीस साल अपनी सेवाएं दे चुका है। विगत कई दशक से अनवरत बस्ती की माटी और बस्ती की हस्तियों पर चिन्तन मनन और लेखनी भी चला रहा है। बस्ती से जुड़ने पर बाबा सरकार की यश प्रतिष्ठा में कोई कमी नहीं आने वाला है ,परन्तु बस्ती से ना जुड़ना और दूरी बनाए रखने में उसे कोई गूढ़ रहस्य जरूर प्रतीत हो रहा है। हो सकता है उनके कुल वंश के लोगों का बाबा जी के जीवन काल वांछित सहयोग ना मिलना और परिजनों द्वारा उपेक्षा या ताड़ना भी इस बेरुखी का कारण हो सकता है।

देवरिया में भक्तों ने उन्हें हाथों हाथ ले रखा था। इसलिए बाबा जी का झुकाव बस्ती की अपेक्षा देवरिया के तप स्थल का ज्यादा रहा हो। यह भी हो सकता है कि अपने कुटुम्ब खानदान से जुड़ने पर उन्हें स्वतंत्रता और उन्मुक्त वातावरण मिलने की संभावना कम होने का डर रहा हो, जो एक ब्रह्मर्षि के लिए आवश्यक हो। कुल खानदान से ममता बढ़ाने से योग भक्ति प्रभावित होने की संभावना बढ़ जाती है। इस कारण उनकी जन्म भूमि उपेक्षा का दंश अब तक झेलती आ रही हो। यहां के जन प्रतिनिधि और अधिकारी भी इसी फोबिया के शिकार बने हुए हैं , वरना पड़ोसी गांव जो आचार्य राम चन्द्र शुक्ल की पावन धरती अग़ौना जैसे यह भी स्थल लोगों के जुबान पर होता।

अपने अंतरंग भक्तों की प्रेच्छा पर स्वयं श्री देवराहा बाबा अपनी उत्पत्ति जल से बताते थे। भक्त-समुदाय के बीच उन्होंने एक बार कहा था “मैं तुम लोगों की तरह मनुष्य नही हूं। यह शरीर तो मैंने तुम लोगों के लिए धारण किया है, जो मुझे मनुष्य समझता है, वह मूर्ख है।” इस प्रकार का वक्तव्य ना तो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामजी कह सकते हैं और ना लीलाधारी भगवान श्री कृष्णजी ही। जबकि बाबा जी के आराध्य तो यही दोनों रहे हैं।

देवरहा बाबा अपने समय के गोरखपुर और वर्तमान बस्ती जिले के हरैया तहसील के दुबौलिया थाना क्षेत्र के उमरिया ग्राम के मूल निवासी रहे हैं। वे स्वर्गीय श्री रामयश दूबे के सबसे छोटे पुत्र हैं । उनका बचपन का नाम पंडित जनार्दन दत्त दूबे था। पंडित राम यश दूबे के तीन पुत्र सूर्यबली ,देवकली और जनार्दन दत्त थे। उनके बड़े भाई श्री सूर्य बली दूबे का वंश ही आगे बढ़ा है ,जिनके पुत्र का नाम श्री चंद्रशेखर दूबे रहा है। उनके पुत्र का नाम श्री सीताराम दूबे उर्फ सुदर्शनाचार्य और श्री बाबूराम दूबे था। श्री बाबूराम की असमय हत्या हो गई थी और श्री सीताराम दूबे उर्फ सुदर्शनाचार्य का वंश ही आगे चला। पंडित सीताराम दूबे की पत्नी श्रीमती उदयराजी थी जो अपनी पति की मृत्यु 23 अगस्त 2019 के बाद दोनों पुत्रों के साथ घर की पैतृक और अयोध्या स्थित आश्रम की संपत्ति की सह उत्तराधिकारी बनी। इनके दो पुत्र थे । पण्डित मथुरा प्रसाद दूबे उर्फ मधुसूदनाचार्य (जन्म 1 जनवरी 1955 ) और पण्डित मनीराम दूबे उर्फ मनीरामाचार्य,जो दिव्यांग थे ।

ब्रह्मर्षि श्री देवरहा बाबा जन्मस्थान प्रधान पीठ उमरिया जिला बस्ती में स्थापित है । यह एक विशाल भूभाग पर  सरयू नदी के तट पर भव्य प्राकृतिक सुषमा बिखेरता है। उनके वंशज और कुल के भक्तों द्वारा पोषित यह मन्दिर विविध प्रकार के सांस्कृतिक आयोजनों की आयोजन करता रहता है। यह गांव पहले से ही बाबा निहाल दास की कुटिया के रूप में एक सिद्ध स्थल रहा है। ब्रम्हर्षि श्री देवरहा बाबा जन्मस्थान के अलावा  त्रिदेव मन्दिर तथा प्रसिद्ध बाबा निहाल दास की कुटिया व मन्दिर के लिए भी विख्यात है।

ब्रह्मर्षि श्री देवरहा बाबा जन्मस्थान प्रधान पीठ के श्री मथुरा दूबे उर्फ महंत स्वामी मधुसूदनाचार्य जी महाराज रहे जो अब साकेत वासी हो चुके हैं। वे ही मन्दिर में पूजा पाठ तथा आश्रम की देख रेख कर रहे थे। वे 13 सितम्बर 2023 को उमरिया में ही ब्रह्मलीन हुए थे और 25 सितंबर 2023 को इनका ब्रह्म भोज सम्पन्न हुआ था। इस समय मधुसूदनाचार्य  के पुत्र शिष्य श्री प्रद्युम्न कुमार दूबे l जन्मस्थान उमरिया के प्रधानपीठ के वर्तमान उत्तराधिकारी हैं। इनके अग्रज महंत श्री कृष्ण शरण दूबे चार्य अयोध्या स्थित देवरहा बाबा आश्रम के उत्तराधिकारी हैं।

सब मिलाकर बाबा की पांचवीं पीढ़ी इस समय गांव में अस्तित्व में है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में लगभग 25 या 30 साल का अन्तर देखने को मिलता है। इस मोटे तौर पर इस गणना के हिसाब से बाबा का समय 150 साल तक ही पहुंच रहा है। इसलिए बाबा जी को 250, 500 या 900 साल की जिन्दगी अतिशयोक्ति पूर्ण ही दिखाई दे रही है। सरयू को मां का दर्जा देना भी भारतीय संस्कृति और परम्परा को आत्मसात करना ही कहा जा सकता है। इसलिए अपने को या उनके अनुवाई अपने गुरु को खुश रखने और दीर्घायु बताकर सत्यता को छिपाने का प्रयास करते हुए देखे जा रहे हैं।

छपरा बिहार निवासी पत्रकार श्री अनूप नारायण सिंह “आर्यावर्त” के स्वामी और श्री हर्ष वर्धन का देवरहवा बाबा – हर्ष के ब्लॉग https://share.google/o2jKwtyfmUHbgNE7e  और रामेश्वर नाथ तिवारी का ब्लॉग https://rntiwari1.wordpress.com/2022/01/22 आदि में  उक्त विद्वान “नाथ”नदौली लार रोड देवरिया बाबा जी का जन्म स्थान की सूचना तो देते हैं पर विस्तार से नहीं बताते हैं। ना ही गुगल पर ही इस पर कुछ खास जानकारी छोड़ रखी है। अतएव इस पर गहन शोध की आवश्यकता है। इसके विपरीत बस्ती जिले का उमरिया में स्थापित उनके जन्म स्थान का प्रधान पीठ और उनकी वंशावली पूर्ण रूप से यह सिद्ध करने में सफल रहे हैं कि बाबा जी की जन्म भूमि बस्ती का उमरिया गांव ही है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम – सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।वॉट्सप नं.+919412300183)

आंध्र प्रदेश के केएल विश्वविद्यालय में उद्भव 2025 का आयोजन

राष्ट्रीय आदिवासी छात्र शिक्षा समिति (नेnस्ट्स) ने आंध्र प्रदेश आदिवासी कल्याण आवासीय शैक्षणिक संस्थान सोसाइटी (एपीटीडब्ल्यूआरईआईएस) की मेजबानी में छठे राष्ट्रीय ईएमआरएस सांस्कृतिक एवं साहित्यिक उत्सव और कला उत्सव – उद्भव 2025 का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री श्री जुएल ओराम और जनजातीय कल्याण एवं महिला एवं बाल कल्याण मंत्री श्रीमती गुम्मिडी संध्या रानी ने आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित वड्डेश्वरम के केएल विश्वविद्यालय में किया।

इस वर्ष का उत्सव जनजातीय युवाओं को सशक्त बनाने और देश के जनजातीय समुदायों की जीवंत विविधता प्रदर्शित करने की सरकार की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। यह मंच छात्रों को 35 से अधिक सांस्कृतिक, साहित्यिक और दृश्य कला कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर प्रदान करता है, जिससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर ज्ञानवर्धन अनुभव और समग्र विकास के अवसर मिलते हैं।

प्रधानमंत्री के समावेशी विकास और जनजातीय सशक्तिकरण के विज़न के अनुरूप यह उत्सव समन्वित, नियोजित और रूपांतरकारी पहलों के माध्यम से अनुसूचित जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक उन्नति को गति देने के सरकार के मिशन के अनुरूप है। जनजातीय छात्रों को रचनात्मकता व्यक्त करने, आत्मविश्वास बढ़ाने और सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करने के लिए एक राष्ट्रीय मंच प्रदान करने के जरिए उद्भव 2025 जनजातीय कार्य मंत्री के विकासात्मक दृष्टिकोण में परिकल्पित समग्र सशक्तिकरण में सार्थक योगदान देता है।

उद्भव 2025 की मुख्य विशेषताएं

1. भारत की जनजातीय सांस्कृतिक विविधता का प्रदर्शन

इस कार्यक्रम में देश भर के एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों (ईएमआरएस) के 2,000 से अधिक जनजातीय छात्र एकत्र होंगे और भारत के जनजातीय समुदायों की एकता, प्रतिभा और सांस्कृतिक जीवंतता का प्रदर्शन करेंगे। विविध सांस्कृतिक और साहित्यिक प्रस्तुतियों के माध्यम से, छात्र राष्ट्रीय मंच पर अपनी विरासत की समृद्धि को प्रस्तुत करेंगे।

उद्भव 2025 में गायन और वाद्य संगीत, नृत्य, रंगमंच, दृश्य कला और साहित्यिक प्रतियोगिताओं सहित 48 विशिष्ट कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। ये मंच छात्रों को अपने कलात्मक कौशल और रचनात्मक क्षमता का प्रदर्शन करने का अवसर प्रदान करेंगे। इस उत्सव के विजेता राष्ट्रीय स्तर के कला उत्सव में भाग लेने के भी पात्र होंगे, जो महाराष्ट्र के पुणे स्थित यशवंतराव चव्हाण विकास प्रशासन अकादमी (यशदा) में आयोजित किया जाएगा। यहां ईएमआरएस के छात्र पूरे भारत की 38 टीमों के साथ प्रतिस्पर्धा करेंगे।

प्रतिस्पर्धात्मक भावना से परे ईएमआरएस सांस्कृतिक महोत्सव जनजातीय युवाओं के समग्र विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसने समान अवसर सुनिश्चित करके और छात्रों को विविध क्षेत्रों में अपनी क्षमता का पता लगाने के लिए प्रोत्साहित करके जनजातीय और मुख्यधारा के समुदायों के बीच की खाई को पाटने का निरंतर प्रयास किया है। वर्षों से यह महोत्सव एक परिवर्तनकारी मंच के रूप में उभरा है जो सांस्कृतिक, कलात्मक और साहित्यिक क्षेत्रों में उत्कृष्टता को पोषित करता है।

इस वर्ष के आयोजन के साथ, नेस्ट्स सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के माध्यम से जनजातीय शिक्षा और सशक्तिकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है। उद्भव 2025 जनजातीय छात्रों के सर्वांगीण विकास को बढ़ावा देते हुए उनके सामाजिक आत्मविश्वास, शैक्षणिक जुड़ाव और रचनात्मक विकास को बढ़ावा देना जारी रखेगा।

अखिल भारतीय अनुराग साहित्य सम्मान घोषित

राजस्थान के साहित्य साधक कृति पर डॉ. प्रभात सिंघल पुरस्कृत होंगे
कोटा /  राजस्थान के साहित्यकारों की जीवनी पर आधारित “राजस्थान के साहित्य साधक” कृति पर लेखक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल को 20 दिसंबर  को लालसोट ( राजस्थान ) में अनुराग सेवा संस्थान लालसोट द्वारा सम्मानित किया जाएगा।
संस्था के  प्रेस सचिव  अनिल नीलमा ने बताया कि   अनुराग सेवा संस्थान  लालसोट के स्थापना के इक्तीस वर्ष पूर्ण होने पर संस्थान द्वारा   “अनुराग -31” के अन्तर्गत आयोजित विभिन्न साहित्यिक , सांस्कृतिक, बौद्धिक, क्रीड़ा, धार्मिक, सामाजिक ,  लोक- संस्कृति,  सामाजिक समरसता, साम्प्रदायिक सद्भाव, सनातन संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण से संबंधित सभी 31 कार्यक्रमों के अन्तर्गत अखिल भारतीय अनुराग साहित्य सम्मान 2025 में 11 राज्यों के 31 साहित्यकारों को सम्मानित किया जाएगा।
इसके अन्तर्गत पद्मश्री डॉ .रवीन्द्र कुमार, मेरठ को साहित्य में विशिष्ट अवदान हेतु अनुराग साहित्य श्री सम्मान -2025 से सम्मानित किया जाएगा वहीं स्मृति सम्मान में डॉ. पदम सिंह पदम, करहल  मैनपुरी -हिंदी लेखिकाओं का इतिहास (साहित्य इतिहास) , डॉ. रामकुमार घोटड़ सार्दुलपुर चूरू -बाल मन की दस्तावेजी लघुकथाऍं (लघुकथा), डा. प्रबोध कुमार गोविल, जयपुर,  पिंजरा तोड़ के भागा पंछी, (आत्मकथा)  डॉ. अखिलेश निगम लखन‌ऊ- अखिल दोहा सतसई (दोहा संग्रह) ,  जगदीश मोहन रावत, जयपुर – अंग अंग में चन्दन वन, (गीत), श्याम प्रकाश देवपुरा, श्रीनाथद्वारा हरसिंगार (पत्रिका) (संपादन), डा. आर पी सारस्वत, मुम्बई (महाराष्ट्र)- सिमटती साँसों का संघर्ष, डायरी , रामनारायण शर्मा, श्री गंगानगर – रामचरितमानस में पर्यावरण (आध्यात्मिक विवेचन), श्रीमती शील कौशिक सिरसा, हरियाणा, – माया का रहस्यमयी टीला, (बाल साहित्य),  डा. मनीषा शर्मा  कोटा-हिंदी कथा साहित्य विमर्श (आलोचना) को प्रदान किए जाएंगे।
 श्री देवेन्द्र कुमार मिश्रा जबलपुर, मप्र – डस्ट एवं अन्य कहानियां, (कहानी),  विष्णु शर्मा ‘हरिहर’, कोटा, – त्रिवेणी, (हाईकू),   रामनारायण हलधर कोटा- धूप और चांदनी, (ग़ज़ल),  डा. नीना छिब्बर जोधपुर- अब लौट चलें, (कविता),  अटल राम चतुर्वेदी, मथुरा  अटल सजल संग्रह  (सजल),  श्रीमती बसंती पॅंवार जोधपुर – अपना अपना भाग्य, (हिन्दी अनुवाद),  अमर बानियां लोहारो गन्तोक सिक्किम- हँसिली लीला(अनुवाद), श्रीमती विमला नागला, केकड़ी – तुलसी चिरमी लिख लिख पाती, (पत्र),   संतोष दास शास्त्री नैनीताल उत्तराखंड – वनवासी राघवेंद्र (आध्यात्मिक आलेख) ,  महाराम सिंह मृदुल , इटावा, – माटी का तो धर्म एक है (गीत),  प्रेमपाल शर्मा , दिल्ली, – स्मृतियों के मोती, (संस्मरण),  श्रीमती एकता अमित व्यास कच्छ गुजरात – अमीरन, (उपन्यास),  डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा रायपुर, छत्तीसगढ़ – अपने अपने संस्कार,( लघुकथा),  रवि पुरोहित बीकानेर , आग अभी शेष है (कविता),  नीलम राकेश लखनऊ, उ प्र – फूलों की बगिया, (बाल साहित्य), शिव मोहन यादव, दिल्ली,  कृष्ण अर्जुन युद्ध, (खण्ड काव्य),  सतीश कुमार, किशनगढ़ , राजस्थान  (जीवनी साहित्य),  नरेंद्र निर्मल, भरतपुर , – धूप छांव (गीत),  धर्मेन्द्र सैनी, बांदीकुई दौसा  – फुनगी , उपन्यास ( युवा साहित्यकार) को प्रदान किए जाएंगे।
दौसा जिले से  विनोद गौड, श्री अनुराग प्रेमी , श्री कृष्णा सैनी एवं  बुद्धिप्रकाश महावर मन को विशिष्ट सम्मान प्रदान किया जाएगा।
इसके अन्तर्गत साहित्य श्री सम्मान के लिए 11000 रूपये नगद व स्मृति सम्मान हेतु प्रत्येक साहित्यकार को 3100 रुपए नगद, श्रीफल, शाल, स्मृति चिह्न, प्रमाण पत्र व कलम आदि से 20 दिसम्बर को आयोजित भव्य सार्वजनिक समारोह में विभूषित किया जाएगा।

केरल के मुन्नार से भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ेगी ये ‘सोनिया गांधी’

वामपंथियों के गढ़ केरल में मुन्नार के शांत पहाड़ी इलाके में इस बार पंचायत चुनाव दिलचस्पी का केंद्र बना हुआ है। वजह है भाजपा की वह उम्मीदवार जिसका नाम सुनकर लोग चौंक जाते हैं, सोनिया गाँधी। 34 वर्षीय यह सोनिया गाँधी नल्लथन्नी कल्लर की रहने वाली हैं और पहली बार नल्लथन्नी के वॉर्ड 16 से पंचायत चुनाव में किस्मत आजमा रही हैं।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, सोनिया के पिता भी कॉन्ग्रेस से जुड़े रहे थे और उन्होंने पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी से प्रभावित होकर अपनी बेटी को यह नाम दिया था। माना जाता है कि उनका परिवार आज भी कॉन्ग्रेस का ही समर्थक है। हालाँकि, शादी के बाद सोनिया गाँधी की किस्मत बदल गई।

सोनिया के पति सुभाष बीजेपी के पंचायत महासचिव हैं और उन्होंने ओल्ड मुन्नार मुलक्कड़ से पहले उपचुनाव भी लड़ चुके हैं। समय के साथ, सोनिया भी भाजपा में शामिल हो गईं। सोनिया का कहना है कि उनके पति बीजेपी में हैं और वह हमेशा से उनका समर्थन करती रही हैं। बकौल सोनिया, पति के समर्थन के कारण ही वह बीजेपी से चुनाव मैदान में उतरी हैं।

बीजेपी की सोनिया गाँधी का इस सीट पर मुकाबला कॉन्ग्रेस की मंजुला रमेश और CPM की वलारमती से है। केरल में 9 और 11 दिसंबर को दो चरणों में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव होने हैं। राज्य की 941 ग्राम पंचायतों, 152 ब्लॉक पंचायतों, 14 जिला पंचायतों, 87 नगर पालिकाओं और 6 नगर निगमों में होने हैं। इनमें 21,000 से अधिक वार्ड में 75,000 से अधिक उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

जापान के लिए सिरदर्द बनी बढ़ती मुस्लिम आबादी, 45 साल में 40 गुना बढ़ी मस्जिदें

यूरोप में आर्थिक विकास के साथ साथ प्रवासी मुस्लिमों की संख्या लगातार बढ़ी। ऐसा ही हाल जापान का हो गया है। पाकिस्तान, ईरान, इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक देशों से मुस्लिम कामगार के रूप में यहाँ आ रहे हैं और बस रहे हैं। यही वजह है कि जापान में मस्जिदों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई है। जून 2024 तक यहाँ 149 मस्जिदें बनीं।

जापान में मुस्लिम आबादी की बेतहाशा वृद्धि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। यहाँ बड़े-बड़े मस्जिद बन गए हैं। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद देखा जा सकता है। जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी इस्लाम को मानने वालों की है। हाल ही में कब्रिस्तान को बनाने के लिए जगह देने को लेकर जापानी संसद में सवाल पूछे गए। इसके बाद मुस्लिम आबादी का मामला सुर्खियों में आ गया।

दुनियाभर में मुस्लिम आबादी बेहताशा बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक, इस सदी के अंत तक ईसाइयों को पीछे छोड़ते हुए इस्लाम मानने वालों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी।

दुनिया में 200 से ज्यादा देशों में इनकी अच्छी खासी आबादी है। इन देशों में इस्लामी गतिविधियाँ तेजी से बढ़ी हैं। 2013 में विश्व जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 1.6 अरब थी और 2050 तक 2.9 अरब यानी विश्व जनसंख्या का करीब 26% तक पहुँचने का अनुमान है। यही वजह से की विश्व के छोटे-छोटे देशों में भी इनकी संख्या दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ रही है।

छोटा सा एशियाई देश जापान भी इससे अछूता नहीं है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में मुस्लिम आबादी करीब 1.30 लाख थी। इनमें से 1.20 लाख विदेशी मुस्लिम और 10 हजार जापानी मुस्लिम रहते थे। लेकिन अब इस्लाम को माननेवालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी है। मुस्लिमों की कुल आबादी जापान की आबादी का 0.18 फीसदी से 0.33 फीसदी है, जो साल-दर-साल बढ़ रही हैं।

ये लोग ज्यादातर प्रवासी कामगार हैं, जो टेक्नोलॉजी, बिजनेस और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। जापान में मुसलमानों पर स्टडी करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तनाडा के एक सर्वे के मुताबिक, इनकी संख्या 200,000 से ज़्यादा होने का अनुमान है। मार्च 2021 तक, देश भर में मस्जिदों, यानी पूजा की जगहों की संख्या 1999 में 15 से बढ़कर 113 हो गई है।

जापानी की अधिकांश मुस्लिम आबादी (लगभग 80%) ग्रेटर टोक्यो क्षेत्र, चुक्यो महानगरीय क्षेत्र और किन्ही क्षेत्र में रहते हैं। अब इनका विस्तार दूसरे क्षेत्रों में भी हो रहा है।

ईरान और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों से मजदूरों के बढ़ते इमिग्रेशन और धर्मांतरण की वजह से जून 2024 तक यहाँ 149 मस्जिदें बन गई हैं। यानी इनकी संख्या 10 गुणा बढ़ गई हैं। कई मस्जिदों को बड़ा बनाया गया है।

टोक्यो में टोक्यो कैमी मस्जिद को हाल ही में बहुमंजिला बनाया गया है और समय-समय पर आम जनता को लुभाने के लिए इस्लामिक गतिविधियाँ चलाई जाती हैं। दिसंबर 2012 के मध्य में एक शुक्रवार को दोपहर के आसपास, टोक्यो के शिबुया वार्ड में टोक्यो कैमी मस्जिद में एक खास आवाज में आदमी ने अज़ान दिया और नमाज का समय बताया। उसने कहा, “मस्जिद घर जैसी है। अल्लाहु अकबर।”

यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद बन चुकी है। जैसे- वासेदा विश्वविद्यालय के टोकोरोजावा परिसर के पास एक इमारत बनी थी, जिसे मस्जिद के रूप में उपयोग करने के लिए पुनर्निर्मित किया गया है।

1990 के दशक में यहाँ मस्जिदों की संख्या तेजी से बढ़ी। 1980 में जहाँ सिर्फ 4 मस्जिदें थी, वहीं 1990 के दशक में ये बढ़ कर 90 से ज्यादा हो गई। इन वर्षों में इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए बाहरी देशों से कई लोग आए और मस्जिदों में कार्यक्रम आयोजित कर जापानियों को लुभाने की कोशिश की गई यानी जापानियों के धर्मांतरण में इन कार्यक्रमों की अहम भूमिका रही।

अब हालात ये हैं कि न सिर्फ प्रवासी मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, बल्कि जापान की मूल आबादी का धर्मांतरण तेजी से हुआ है। जापान में प्रवासी मुस्लिमों के बसने और परिवार बसाने की वजह से एक ‘हाइब्रिड मुस्लिम’ आबादी तैयार हो गई है। नमाज पढ़ना और रोजा रखना जैसे रीति रिवाज का पालन बड़ी आबादी करती है। इनमें कट्टरता भी देखी जाती है।

जापान में हाल ही में ये खबर भी सामने आई कि सरकार ने शव दफनाने के लिए कब्रिस्तान बनाने के लिए जमीन देने से इनकार कर दिया है और प्रवासी मुस्लिमों को शव अपने देश लेकर दफनाने को कहा है। हालाँकि सरकार ने जापानी संसद में इसको लेकर स्पष्टीकरण दिया है।

दरअसल हाउस ऑफ काउंसिलर्स की प्रतिनिधि उमेमुरा मिजुहो ने कहा कि जापान में छोटा भू भाग है। प्राकृतिक आपदाएँ यहाँ होती रहती हैं, ऐसे में किसी बड़ी आपदा की स्थिति में दफनाने पर शवों के बाहर निकलने की संभावना है। साथ ही 99 फीसदी आबादी यहाँ दाह संस्कार करती है, इसलिए जापान की स्थिति को देखते हुए दफनाने से जुड़े नियम कड़े किए जाने चाहिए।

इसको लेकर सरकार ने स्थानीय सरकार को इसके बारे में विचार करने को कहा है। साथ ही स्थानीय रीति रिवाजों, नियमों और पर्यावरण को भी ध्यान में रखने को कहा है। क्योडो न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में मुस्लिम आबादी बढ़ने के बाद जापानी मुस्लिमों को दफनाने के लिए नई जगहों की जरूरत है।

एजेंसी का कहना है कि कुछ लोकल सरकारें बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए नए कब्रिस्तानों के लिए ज़मीन अलग रखने को तैयार हैं, जबकि दूसरी सरकारें इतनी मदद नहीं कर रही हैं।

जापान में दाह संस्कार आम बात है और 99.9% शवों का दाह संस्कार किया जाता है। इससे मुसलमान अपने दफ़नाने के तरीकों को लेकर परेशान हैं।

उत्तर-पूर्वी जापान में मौजूद मियागी प्रांत के गवर्नर ने दिसंबर में कहा था कि 2023 में इंडोनेशिया के साथ लोकल इलाकों के लिए मज़दूर देने के लिए मेमोरेंडम साइन करने के बाद एक नए कब्रिस्तान पर विचार किया जा रहा है।

जापान शांति पसंद देश माना जाता है। अनुशासन प्रिय इस देश की बड़ी आबादी बुजुर्ग हो चुकी है। ऐसे में कामगार की जरूरत को पूरा करने के लिए विदेशों से लोग यहाँ आकर बस रहे हैं। इनमें मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है। खासकर ईरान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया जैसे देशों से कामगार आकर यहाँ स्थायी रूप से बस रहे हैं। इसका असर जापान में दिखने लगा है।

साभार- https://hindi.opindia.com/ से

‘मो माः मो प्रेरणा’(मेरी माँ-मेरी प्रेरणा) पुस्तक का लोकार्पण

भुवनेश्वर: मातृत्व और प्रेरणा को समर्पित डॉ. अच्युत सामंत की नवीनतम कृति ‘मेरी मां: मेरी प्रेरणा’ का लोकार्पण सोमवार को एक विशेष समारोह में हुआ।  कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ओडिशा के पूर्व राज्यपाल प्रो. गणेशी लाल ने पुस्तक का अनावरण किया।  इस अवसर पर पाँच अन्य पुस्तकों का भी विमोचन किया गया।  प्रो. गणेशीलाल  ने कहा, “मां ही हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाती है” —

अंग्रेज़ी संस्करण के विमोचन में उपराष्ट्रपति के साथ उपस्थित रहे प्रो. गणेशी लाल ने मातृत्व की महिमा पर एक भावपूर्ण संबोधन दिया।

उन्होंने कहा,“प्रकृति के तीन गुणों—सहित अज्ञान—से कोई मुक्त नहीं है। पर माँ ही हमें इनसे ऊपर उठाती है।”उन्होंने ओडिशा में बिताए अपने वर्षों को स्मरण करते हुए कहा,“यहीं आकर मैंने ‘माँ’ शब्द का अर्थ पहले से कहीं अधिक गहराई से समझा।”

उन्होंने डॉ. सामंत की माता की महानता को रेखांकित करते हुए कहा,“उन्होंने देवकी की तरह महान त्याग किए—एक कृष्ण को इस धरती पर लाने के लिए। माँ अनिवार्य है। यदि ईश्वर तक पहुँचना है, तो पहले माँ को सम्मान देना होगा।”“मां सबसे शक्तिशाली शब्द है”—मनीष सिंगला,सुपुत्र प्रोफेसर गणेशीलाल

प्रो. गणेशीलाल के पुत्र मनीष ने भी कार्यक्रम में भावपूर्ण वक्तव्य दिया और मां सं संबंधित सुमधुर गीत गाये। उन्होंने कहा,“‘माँ’ सबसे शक्तिशाली शब्द है। अच्युत सामंत ने मन भी पाया है और माया भी।”

उन्होंने माँ पर एक भक्तिपूर्ण गीत भी प्रस्तुत किया, जिसने सभी को भाव-विभोर कर दिया।

“प्रेम और स्नेह ही मेरा संबल”—डॉ. सामंत

समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. अच्युत सामंत ने एक पुरानी भावुक स्मृति का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा,“मुझे याद है जब प्रो. गणेशी लाल ने, राज्यपाल रहते हुए, मुझे मेरे कामों के कारण ‘किसी दूसरे ग्रह से आया व्यक्ति’ कहा था। उनका स्नेह हमेशा मुझे ऊर्जा देता आया है।”

गीता जयंती और मोक्षदा एकादशी के अवसर का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि पुस्तक में गीता के संदेश और भगवान कृष्ण के ‘दिव्य वत्स’ रूप से एक सांकेतिक जुड़ाव भी है।उन्होंने कहा कि ओड़िया संस्करण अंग्रेज़ी संस्करण का सीधा अनुवाद नहीं है, बल्कि इसमें उनके जीवन के कई गहरे अनुभव और अतिरिक्त प्रसंग शामिल हैं।

उन्होंने कहा,“मैं लोगों के प्रेम और सम्मान के कारण कड़ी मेहनत करता हूँ। माँ ने सिखाया था—यदि तुमने कोई गलत काम नहीं किया है, तो किसी से डरने की ज़रूरत नहीं।”उन्होंने दोहराया कि कीट और कीस आज ओडिशा और उसके लोगों के संरक्षक बन चुके हैं।

साहित्य, अध्यात्म और पत्रकारिता जगत की हस्तियों ने की सराहना कार्यक्रम में साहित्य, आध्यात्मिकता और पत्रकारिता जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियाँ मौजूद थीं।

वरिष्ठ लेखक रक्षक नायक ने पुस्तक को “अच्छे और कठिन समयों का संतुलित चित्रण, साहस और प्रेरणा से भरी हुई” बताया।

प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो. हरिकृष्ण सतपथी ने प्रो. गणेशी लाल को “ओडिशा का सर्वश्रेष्ठ नागरिक” बताया—ओड़िया भाषा, संस्कृति और साहित्य के प्रति उनके प्रेम के कारण।

उन्होंने कहा कि वे “जन-जन के राज्यपाल” हैं, जिन्हें राज्य सदैव याद रखेगा।

डॉ. सामंत को उन्होंने “सर्वोत्तम साधक” बताते हुए कहा कि उन्हें अब तक 70 से अधिक विश्वविद्यालयों ने मानद उपाधि प्रदान की है।

“वे अपने संस्थानों के प्रति समर्पण और अपने लोगों के प्रति करुणा के प्रतीक हैं।”

वरिष्ठ पत्रकार उमापद बोस ने कहा कि यह पुस्तक “इतिहास, अर्थशास्त्र और गीता के एक नए अध्याय का अद्भुत मिश्रण” है।

इस अवसर पर आध्यात्मिक गुरु बाबा रामनारायण दास और साहित्यकार प्रो. शशांक चूड़ामणि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

‘भाजपा के 11 साल एएसआई के लिए अंधकार युग’- के के मुहम्मद

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक केके मुहम्मद ने रोकी गई खुदाई और सांस्कृतिक विरासत की उपेक्षा की आलोचना की। अनुभवी पुरातत्वविद् ने कहा कि सांस्कृतिक संरक्षण के संबंध में उनकी और अन्य लोगों की सरकार से जो अपेक्षाएं थीं, वे “पूरी नहीं हुईं”।

उन्होंने  भाजपा सरकार के पिछले ग्यारह वर्षों को देश के इस प्रमुख धरोहर निकाय के लिए “अंधकार युग” बताया है। उन्होंने केंद्र पर संरक्षण की उपेक्षा करने, महत्वपूर्ण उत्खनन में देरी करने और भारत की सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करने में विफल रहने का आरोप लगाया।

इंडिया टुडे से बात करते हुए, वरिष्ठ पुरातत्वविद् ने कहा कि सांस्कृतिक संरक्षण के संबंध में सरकार से उनकी और अन्य लोगों की जो अपेक्षाएं थीं, वे “पूरी नहीं हुईं”। उन्होंने कहा, “जब भाजपा सरकार सत्ता में आई तो हम सभी को उससे बहुत उम्मीदें थीं। इसलिए, हमने सोचा था कि इन लोगों की तरफ से एक तरह की… सुरक्षा ज़्यादा होगी, और वे संस्कृति में काफ़ी रुचि लेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।” उन्होंने आगे कहा, “हम इसे पिछले 11 सालों के भाजपा काल का अंधकार युग कहते हैं। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का अंधकार युग है।”
जब उनसे पूछा गया कि ऐसा क्यों हुआ, तो मुहम्मद ने रुके हुए संरक्षण कार्य की ओर इशारा किया, जिसमें चंबल स्थित बटेश्वर मंदिर परिसर भी शामिल है, जहां उन्होंने पहले एक बड़े पुनरुद्धार कार्य का निरीक्षण किया था।

 “उदाहरण के लिए, मेरा अपना बटेश्वर मंदिर, जहाँ मैंने काम किया था। वहाँ चंबल के काटो के साथ-साथ हम लगभग 90 मंदिरों का पुनर्निर्माण करने में सक्षम रहे हैं। लेकिन भाजपा के 11 वर्षों के दौरान, केवल 10 मंदिरों का पुनर्निर्माण किया गया, और वह भी बहुत प्रयास करने के बाद। मुझे उसके लिए बहुत अभ्यास करना पड़ा, अन्यथा वह भी नहीं हो पाता।”

उन्होंने दिल्ली के पुराना किला समेत कई जगहों पर महत्वपूर्ण खुदाई रोकने के लिए सरकार की आलोचना की। मुहम्मद ने कहा, “पुराना किला में खुदाई जारी रहनी चाहिए थी। डॉ. वसंत कुमार स्वर्णकार इसकी खुदाई कर रहे थे। उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली थी। ऐसा होना चाहिए था।” उन्होंने आगे कहा, “और इसी तरह, कई अन्य जगहों पर भी खुदाई होनी चाहिए थी। सरकार को इसे अपने हाथ में लेना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।”

उनके अनुसार, सत्तारूढ़ दल के “संस्कृति के असली मालिक” होने के दावे ने एक ऐसा माहौल बनाया है जहाँ निगरानी और आलोचना कमज़ोर हो गई है। उन्होंने कहा, “क्योंकि वे दावा करते हैं कि वे संस्कृति के असली मालिक हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।” हालाँकि, उन्होंने स्वीकार किया कि कई जगहों पर यह काम हो रहा है, जो कांग्रेस के ज़माने में नहीं था।

के के मुहम्मद का व्यक्तित्व और कृतित्व

करिंगमन्नु कुझियिल मुहम्मद (जन्म 1 जुलाई 1952) एक भारतीय पुरातत्वविद् हैं, जिन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के क्षेत्रीय निदेशक (उत्तर) के रूप में कार्य किया । मुहम्मद को इबादत खाना के साथ-साथ विभिन्न प्रमुख बौद्ध स्तूपों और स्मारकों की खोज का श्रेय दिया जाता है । अपने करियर के दौरान, उन्होंने बटेश्वर परिसर के जीर्णोद्धार का कार्य किया , नक्सल विद्रोहियों और डकैतों को सहयोग के लिए सफलतापूर्वक राजी किया , साथ ही दंतेवाड़ा और भोजेश्वर मंदिरों का जीर्णोद्धार और जीर्णोद्धार भी किया ।

जीवन परिचय
के.के. मोहम्मद केरल के कालीकट में एक माध्यम वर्गीय परिवार में पैदा हुए थे. बीयरन कुट्टी हाजी और मारीयाम् की पांच संतानों में वे दुसरी संतान है. सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय, कोदवली से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में अपनी मास्टर डिग्री और स्नातकोत्तर डिप्लोमा इन पुरातत्व : स्कुल ऑफ़ पुरातत्व सर्वेक्षण, पुरातात्विक सर्वेक्षण भारत, नई दिल्ली, भारत से किया। केके मुहम्मद ने 29 जुलाई 1983 को कालिकट की निवासी राबिया से शादी की। उनके दो संतानें हैं, जमशेद और शाहीन।

प्रमुख पुरातात्विक खोज
इबादत खाना ,जिस संरचना में अकबर ने समग्र धर्म का निर्माण किया जिसे दीन-ए -इलाही (भारतीय धर्मनिरपेक्षता की नर्सरी) कहा जाता है।
फतेहपुर सीकरी में अकबर द्वारा निर्मित उत्तर भारत के पहले ईसाई चैपल की खोज की।
बटेश्वर परिसर का पुनरुथान
सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए केसरी के बौद्ध स्तूप का उत्खनन किया।
राजगीर में बौद्ध स्तूप की खोज और उत्खनन किया।
कोलहु, वैशाली में बौद्ध पुरातात्विक स्थल का उत्खनन किया।
कालीकट और केरल के मलापुरम जिलों में रॉक कट की गुफाएं, छाता पत्थरों, सिस्ट्स और डोलमेंस की खोज और खुदाई की।

के.के. मोहम्मद ने अपनी आत्मकथा में मलयालम भाषा में (नजान एनना भरेथीयन – पृष्ठ 114, मी भरेथीय) ने कहा कि बाबरी मस्जिद के तहत एक मंदिर (11-12 वीं शताब्दी ईस्वी) के अस्तित्व के लिए ठोस सबूत थे। उत्खनन के पहले के दिनों में भारतीय मुस्लिम समुदाय हिंदुओं को जमीन सौंपने के लिए उत्सुक था, लेकिन कम्यूनिस्ट (वामपंथी) इतिहासकारों जैसे अलीगढ़ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर इरफान हबीब और जेएनयू के अन्य इतिहासकारों ने इस विवाद का समाधान होने से रोका।

दंतेवाड़ा मंदिर
के के मुहम्मद ने छत्तीसगढ़ के जगदलपुर के पास दंतेवाड़ा जिले में बारसुअर और समलुर मंदिरों को संरक्षित किया। यह क्षेत्र इस क्षेत्र में नक्सल गतिविधियों के गढ़ के रूप में जाना जाता है। २००३ में, के के मोहम्मद नक्सल कार्यकर्ताओं को समझने में सक्षम हुए और उनके सहयोग के साथ, मंदिरों को आज के वर्तमान राज्य में संरक्षित कर दिया।

बटेश्वर परिसर का पुनरुथान
बटेश्वर, मुरैना व ग्वालियर से ४० किमी दूर स्थित लगभग २०० प्राचीन शिव और विष्णु मंदिरों का परिसर है। खजुराहो से २०० साल पहले गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के दौरान ९ वें और ११ वीं शताब्दी के बीच इन मंदिरों का निर्माण हुआ था। यह क्षेत्र निर्भय सिंह गुज्जर और गड़रिया डाकुओं के नियंत्रण में था। केके मुहम्मद डकैतों को समझाने में सफल रहे ताकि वे इन मंदिरों को पुनर्स्थापित कर सकें। वह क्षेत्र में अपने कार्यकाल के दौरान ८० मंदिरों को पुनर्स्थापित करने में सक्षम हुए । पुलिस द्वारा डकैतों का सफाया होने के बाद, इस क्षेत्र को खनन माफिया द्वारा घेर लिया गया।

संपर्क सूत्र : +91 88868 13447

प्रस्तुति: आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी

पुतिन की भारत यात्रा: नई विश्व राजनीति की आहट

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा एक साधारण कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इतिहास के सात दशकों में बुनी एवं गढ़ी गई मित्रता का नवीन उद्घोष है। कहा जाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र और शत्रु नहीं, स्थायी हित होते हैं, किंतु भारत-रूस संबंध इस कथन की परिधि से आगे जाकर स्थायी भरोसे, नैतिक दायित्व और पारस्परिक सम्मान के प्रतीक बने हुए हैं। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब पश्चिमी देश विशेषकर अमेरिका, यूरोप एवं नाटो गठबंधन रूस पर कठोर आर्थिक और रणनीतिक प्रतिबंध लगाए हुए हैं। इसके बावजूद भारत ने रूस को न केवल कूटनीतिक स्तर पर सम्मान-साथ दिया बल्कि ऊर्जा व रक्षा क्षेत्र में उसे सबसे भरोसेमंद साझेदार माना। इसलिए यह वार्ता केवल दो नेताओं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एवं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मुलाकात नहीं, बल्कि एक नए युग के सूत्रपात का संकेत है, नयी विश्व राजनीतिक समीकरण की आहट है।
भारत और रूस की मित्रता का इतिहास लगभग 70 वर्षों का है। शीतयुद्ध काल में रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की संप्रभुता और सुरक्षा हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से लेकर पोखरण परमाणु परीक्षणों तक, रूस ने भारत का साथ दिया। आज जब यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक राजनीति को धू्रवीकृत कर दिया है, अमेरिका ने भारत पर रूस से दूरी बनाने का दबाव बनाया, किंतु भारत ने सामरिक स्वायत्तता की नीति को बनाए रखते हुए रूस का साथ निभाया। पश्चिम के प्रतिबंधों के बीच भारत ने भारी मात्रा में रूसी पेट्रोलियम और गैस खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की तथा रूस को आर्थिक सहारा दिया।
यह निर्णय महज एक वाणिज्यिक लाभ का मामला नहीं था, बल्कि भारतीय विदेश नीति की स्वयंभूता का प्रदर्शन था। दूसरी ओर, रूस ने भी भारत को कभी निराश नहीं किया। चाहे एस-400 वायु रक्षा प्रणाली हो, टी-90 टैंक हों, ब्रह्मोस मिसाइल परियोजना हो या पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान सुयू-57 से जुड़ा सहयोग, भारत की सैन्य क्षमता में रूस का योगदान निर्णायक रहा है। वहीं पाकिस्तान की शत्रुता के खिलाफ भारत के हितों को रूस का अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता रहा। हाल ही में दक्षिण एशिया की बदलती सुरक्षा परिस्थितियों में रूस ने भारत की सामरिक चिंता को समझा और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे अभियानों में सहयोग की भूमिका निभाई। यह तथ्य भारत-रूस संबंधों की गहराई और विश्वास को दर्शाता है।
पुतिन और मोदी की वार्ता ऐसे समय आयोजित हो रही है, जब वैशिक शक्ति-संतुलन परिवर्तन के दौर में है। अमेरिका-चीन तनाव, यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंध, ऊर्जा बाजारों की अस्थिरता और पश्चिमी देशों की रूस के विरुद्ध एकजुटता, इन परिस्थितियों में भारत की भूमिका मध्यस्थ, संतुलक तथा स्वतंत्र धुरी के रूप में उभर रही है। पुतिन भारत को न केवल रक्षा सहयोगी मानते हैं, बल्कि एशियाई भू-राजनीति में संतुलन का स्तंभ भी। वहीं मोदी की विदेश नीति बहुधू्रवीय विश्व की अवधारणा पर आधारित है, जिसमें रूस का स्थान केंद्रीय है। इस यात्रा से ऊर्जा सहयोग और बढ़ेगा। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है और रूस उसके लिए सस्ता, विश्वसनीय तथा दीर्घकालिक आपूर्तिकर्ता। प्रतिबंधों के बावजूद रूस ने भारत को कच्चे तेल के साथ ही कोयला, गैस और परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में सहयोग दिया। भारत को सस्ती ऊर्जा देने के पीछे केवल व्यावसायिक हित नहीं बल्कि मित्रता और सामरिक साझेदारी भी निहित है। रक्षा क्षेत्र में सहयोग और विस्तृत होने की उम्मीद है। भारत का लक्ष्य ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा उत्पादन है और रूस इसके लिए सबसे बड़ा भागीदार बना हुआ है। ब्रह्मोस मिसाइल, राइफल निर्माण, स्पेयर पार्ट सप्लाई और संयुक्त विकास कार्यक्रमों के नए विकल्प वार्ता में उभरेंगे। रूस भारत को केवल उपभोक्ता नहीं, निर्माता के रूप में स्थापित करने में सहभागी है, जो संबंधों की परिपक्वता को दर्शाता है।
भारत-रूस दोस्ती अब एक नया अध्याय लिखने को तत्पर है।  दोनों देशों की दोस्ती किसी से छिपी नहीं है, यहां तक की अमेरिका के साथ बेहतर हुए संबंधों के दौर में भी रूस हमारा विश्वस्त साझीदार बना रहा है, प्रगाढ़ दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ा है। अब रूस के राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा से दोनों देशों की दोस्ती में नई गरमाहट की संभावना के साथ दोस्ती के नये स्वस्तिक उकेरने की बात सामने आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के वर्षों में अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है, लेकिन रूस के साथ देश के दशकों पुराने रक्षा संबंध भी बरकरार हैं। भारत ने अमेरिका और यूरोप से हथियारों की खरीद बढ़ाकर रूस पर निर्भरता को संतुलित बनाया है, लेकिन मॉस्को अभी भी भारत का सबसे बड़ा हथियार सप्लायर है। रूस दोस्ती की ओर आगे बढ़ते हुए भारत के लोगों को रोजगार देने के लिये भी एक समझौता मसौदा तैयार किया है। रूस अपने उद्योगों के लिए 10 लाख भारतीय कुशल श्रमिकों को काम पर रखना चाहता है।
भारत-रूस संबंधों का सबसे मजबूत आधार है-कूटनीतिक विश्वास और सम्मान।
 रूस ने कभी भारतीय आंतरिक राजनीति या नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया। उसने कश्मीर, परमाणु नीति, रणनीतिक साझेदारी और पड़ोसी विवादों पर भारत की संप्रभुता का समर्थन किया। वहीं भारत ने भी रूस की सुरक्षा चिंताओं को समझाकृचाहे नाटो विस्तार का मुद्दा हो या यूक्रेन का संघर्ष। इसलिए भारत ने पश्चिमी दबावों की उपेक्षा करते हुए संवाद और शांतिपूर्ण समाधान की वकालत की। अंतरिक्ष विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, अनुसंधान और चिकित्सा के क्षेत्र में भी रूस की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में रूस सहयोगी रहा है और भविष्य की यात्री-वाहक मिशनों में भी सहयोग की संभावनाएँ हैं। दोनों देशों की सांस्कृतिक साझेदारी भी विशेष हैरू योग, आयुर्वेद, साहित्य, रूसी नाट्यकला और भारतीय कलाकृसबने एक-दूसरे समाज में स्थान पाया। फिर भी यह संबंध चुनौतियों से खाली नहीं। चीन-रूस साझेदारी और भारत-अमेरिका निकटता के बीच संतुलन बनाए रखना दोनों देशों के लिए चुनौतीपूर्ण है। रूस चाहता है कि एशिया में भारत संतुलक भूमिका निभाए, वहीं भारत नहीं चाहता कि रूस का झुकाव चीन की ओर अत्यधिक बढ़े। इसी प्रकार रक्षा सहयोग में तकनीक हस्तांतरण, उत्पादन विलंब और आर्थिक भुगतान व्यवस्थाओं पर भी मतभेद रहे हैं। किंतु इन मतभेदों को वार्ता द्वारा समाधान के प्रयास दोनों राष्ट्रों की परिपक्वता को दर्शाते हैं।
पुतिन की इस यात्रा का महत्व इसलिए भी है कि यह बताती है कि भारत किसी वैश्विक शक्ति के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर संबंध तय करता है। ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा आत्मनिर्भरता, बहुधू्रवीय वैश्विक व्यवस्था और एशियाई सामरिक संतुलन की दृष्टि से भारत-रूस साझेदारी अपरिहार्य है। मोदी और पुतिन की मुलाकात इस विश्वास की प्रमाणिकता है कि संबंध केवल शीत युद्ध की स्मृतियों पर नहीं, बल्कि समकालीन हितों और भविष्य की रणनीति पर आधारित हैं। यह यात्रा एक प्रतीक है-स्वतंत्र विदेश नीति, सामरिक साझेदारी और सांस्कृतिक सम्मान की। भारत-रूस संबंध केवल दो राष्ट्रों की निकटता का परिचय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में एक विशिष्ट वैकल्पिक शक्ति संरचना का निर्माण है। पश्चिमी देशों की आलोचना और प्रतिबंधों के बावजूद भारत और रूस ने अपने संबंधों को न केवल जीवित रखा बल्कि सुदृढ़ किया।
इस मुलाकात से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नई गति मिलेगी, रक्षा उत्पादन को स्वदेशीकरण का बल मिलेगा, व्यापार एवं तकनीकी सहयोग विस्तृत होगा और रणनीतिक विश्वास की डोर और मजबूत होगी। पुतिन और मोदी की यह वार्ता बताती है कि भूराजनीति केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि भरोसे और सहयोग पर भी टिकती है। अतः कहा जा सकता है कि पुतिन की भारत यात्रा एक नई ऊर्जा, नए दृष्टिकोण और नई साझेदारियों की शुरुआत है-जहाँ भारत और रूस न केवल मित्र हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर संतुलित, स्वाधीन और बहुधू्रवीय विश्व व्यवस्था के निर्माता भी हैं। यह यात्रा उसी निर्माण का नवीन अध्याय है, जिसमें पुराने भरोसे से जन्म ले रहा है एक नया भविष्य।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

4 दिसंबर को आसमान में दिखाई देगा सुपरमून

इस माह की 4 तारीख को आसमान में अनूठी खगोलीय घटना सुपरमून के रूप में देखने को मिलेगी। सुपरमून तो असमान में प्राय: दिखाई देता है लेकिन इस बार ये खास इसलिए है क्योंकि यह आसमान में सबसे अधिक ऊंचाई पर होगा और ऐसा आने वाले 17 साल तक नहीं होगा। आसमान साफ होने पर उज्जैन की जीवाजी वेधशाला और डोंगला वेधशाला से भी देखा जा सकेगा।

सुपरमून का मतलब है पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का पृथ्वी से सबसे करीब होना। दिसंबर 2025 का सुपरमून इस साल का अंतिम और बेहद खास चंद्र-दर्शन होने वाला है। वैज्ञानिक, धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण घटना है। यह साल 2025 की सबसे खास रातों में से एक होगी, जब चंद्रमा सबसे चमकीला, सबसे बड़ा और आकाश में सबसे ऊंचाई पर दिखाई देगा।

सुपरमून एक अद्भुत खगोलीय घटना है, जब पूर्णिमा की रात चंद्रमा सामान्य दिनों की तुलना में बड़ा और अधिक चमकीला दिखाई देता है। चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा अंडाकार कक्षा में करता है और इसी कारण कभी वह पास आता है तो कभी दूर चला जाता है। जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है, तो उसे पेरिजी कहते हैं।

जब पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पृथ्वी से सबसे करीब होता है, तो उसे विशेष ‘सुपरमून’ कहा जाता है। खगोलविदों के अनुसार 4 दिसंबर, 2025 को चंद्रमा आकाश में वर्ष की सबसे अधिक ऊंचाई पर दिखाई देगा। इतनी ऊंचाई पर दिखाई देने वाला चंद्रमा दोबारा 2042 से पहले नहीं दिखेगा। यह 2025 का अंतिम सुपरमून भी है।

कोल्ड मून भी कहते हैं, क्योंकि, दिसंबर में दिखाई देने वाली पूर्णिमा को दुनिया भर में ‘कोल्ड मून’ के नाम से भी जाना जाता है।  इसका कारण यह है कि दिसंबर का महीना उत्तरी गोलार्ध में अत्यधिक ठंड की शुरुआत का समय होता है।

इसी सर्द मौसम को दर्शाने के लिए प्राचीन मूल अमेरिकी मोहॉक जनजाति ने इसे ‘कोल्ड मून नाम दिया था। इसे लॉन्ग नाइट मून भी कहा जाता है क्योंकि यह पूर्णिमा अक्सर शीतकालीन संक्रांति के आसपास पड़ती है। 4 दिसंबर की सुबह 8.37 से 5 दिसंबर की शाम 4.43 बजे तक यह दृश्य देखा जा सकता है।

  • सुपरमून: यह तब होता है जब पूर्णिमा (full moon) चंद्रमा की पृथ्वी के सबसे निकटतम बिंदु, जिसे पेरिगी (perigee) कहा जाता है, के 90% के भीतर होती है। इस निकटता के कारण, चंद्रमा सामान्य से लगभग 14% बड़ा और 30% अधिक चमकीला दिखाई देता है।
  • कोल्ड मून: दिसंबर की पूर्णिमा को पारंपरिक रूप से उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों की शुरुआत के साथ मेल खाने के कारण “कोल्ड मून” (Cold Moon) कहा जाता है।
  • दुर्लभक्षण यह 2025 के लगातार चार सुपरमून की श्रृंखला का अंतिम सुपरमून है। इसके अलावा, यह एक दुर्लभ खगोलीय घटना ‘मेजर लूनर स्टैंडस्टिल’ (Major Lunar Standstill) के दौरान पड़ रहा है, जिससे यह 2042 तक फिर से इतना ऊंचा और चमकीला नहीं दिखाई देगा।
इसे कब और कैसे देखें
  • कब: सुपरमून 4 दिसंबर, 2025 को अपने चरम पर होगा, लेकिन यह बुधवार (3 दिसंबर) की रात से लेकर शुक्रवार (5 दिसंबर) की रात तक पूर्ण रूप से दिखाई देगा, जिससे आपके पास इसे देखने के कई अवसर होंगे।
  • कैसे: इसे देखने के लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं है; आप इसे नंगी आँखों से देख सकते हैं। सूर्यास्त के तुरंत बाद पूर्वी क्षितिज पर देखें, जब चंद्रमा ऊपर उठ रहा होता है, क्योंकि उस समय “मून इल्यूजन” (moon illusion) नामक प्रभाव के कारण यह सबसे बड़ा दिखाई देता है।
यह घटना वर्ष का एक शानदार खगोलीय समापन है और यह चिंतन (reflection) और नवीनीकरण (renewal) की अवधि का भी प्रतीक है, क्योंकि वर्ष समाप्त हो रहा है। यह उन खगोल विज्ञान प्रेमियों और फोटोग्राफरों के लिए एक अंतिम और विशेष अवसर है जो चमकीले और बड़े चंद्रमा को देखना चाहते हैं।

वैज्ञानिकों ने स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक उभरता हुआ पदार्थ विकसित किया

सबसे स्वच्छ ईंधनों में से एक-हाइड्रोजन- को उत्पन्न करने हेतु जल को विभाजित करने में प्रयुक्त उत्प्रेरकों की क्रियाशीलता को बढ़ाने के लिए एक नई रणनीति विकसित की गई है।

जल के विद्युत अपघटन में, जो स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन के लिए आवश्यक है, ऑक्सीजन अवकरण अभिक्रिया (OER) अपनी धीमी गतिकी और हाइड्रोजन अवकरण अभिक्रिया (HER) की तुलना में उच्च अधिविभव आवश्यकताओं के कारण लंबे समय से एक चुनौती बनी हुई है। इसी कारण, ऐसे धातु-मुक्त उत्प्रेरकों का विकास जो ओईआर को प्रभावी ढंग से संचालित कर सकें, आज शोध की प्राथमिकता बन गया है।

समन्वय बहुलक (सीओपी) धातु आयनों और कार्बनिक अणुओं के संयोजन से बनते हैं और वर्तमान में जल के विद्युत-अपघटन के लिए उपयोग किए जाते हैं। हालांकि, इनकी एक सीमा है। आमतौर पर, ऐसे सीओपी विलायक और जल के अणुओं द्वारा पूरी तरह से समन्वित होते हैं, जिससे विद्युत-उत्प्रेरक के लिए बहुत कम सक्रिय स्थल बचते हैं और इनका प्रत्यक्ष तौर पर उपयोग सीमित होता है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान, नैनो एवं मृदु पदार्थ विज्ञान केंद्र (सीईएनएस), बेंगलुरु के शोधकर्ताओं ने समन्वय बहुलक (सीओपी) की उत्प्रेरक गतिविधि को उसकी मूल संरचना से समझौता किए बिना महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाने के लिए एक नई रणनीति तैयार की है।

उन्होंने आर्गन प्लाज्मा का प्रयोग किया, जिससे COP सक्रिय हो गया। यह समन्वयात्मक असंतृप्त धातु स्थलों (CUMS) के निर्माण के कारण संभव हुआ। इस प्रक्रिया ने बहुलक की संरचनात्मक मजबूती और सम्पूर्ण संरचना को संरक्षित रखते हुए उत्प्रेरक प्रदर्शन को बढ़ाया।

विस्तृत संरचनात्मक अध्ययनों से पता चला है कि नव-विकसित Ni- और Co-आधारित COP एकल-क्रिस्टल और बल्क पाउडर एक्स-रे विवर्तन (XRD) विश्लेषणों में एकरूप थे। हालाँकि इन मूल पदार्थों ने क्षारीय माध्यम में ऑक्सीजन के विकास के लिए उच्च प्रारंभिक क्षमता और धीमी गति से प्रदर्शन किया, लेकिन आर्गन प्लाज्मा उपचार के बाद उनकी सक्रियता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। प्लाज्मा प्रक्रिया ने बल्क ढाँचे में कोई परिवर्तन किए बिना समन्वयात्मक रूप से असंतृप्त धातु स्थल (CUMS) बनाए, जिसकी पुष्टि पाउडर XRD, ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (TEM), एक्स-रे फोटोइलेक्ट्रॉन स्पेक्ट्रोस्कोपी (XPS), और संपर्क कोण माप द्वारा किया गया।

प्लाज़्मा-सक्रिय Ni- और Co-COPs ने अपने इलेक्ट्रोकैटालिटिक प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार दिखलाया है।

‘एसीएस एप्लाइड नैनो मैटेरियल्स’ पत्रिका में प्रकाशित इस शोध ने संरचनात्मक संशोधन के माध्यम से समन्वय-पॉलिमर-आधारित इलेक्ट्रोकैटेलिस्ट्स की आंतरिक गतिविधि को बढ़ाने और उनकी सम्पूर्ण संरचना को बनाए रखने की एक प्रभावी रणनीति का प्रदर्शन किया है। यह विज़न जल विखंडन के लिए लागत-प्रभावी और कुशल उत्प्रेरकों के डिज़ाइन की नई संभावनाओं के द्वार खोलता है, जो स्वच्छ और टिकाऊ हाइड्रोजन ऊर्जा प्राप्त करने के व्यापक लक्ष्य में योगदान देगा।

लिंक :https://doi.org/10.1021/acsanm.5c02951