Home Blog Page 45

“माई मुंबई 2026” कैलेंडर में मुंबई के बेघर समुदायों द्वारा कैद की गई कहानियाँ प्रदर्शित होंगी

पहचान संस्था ने अपने बहुप्रतीक्षित MyMumbai 2026 Calendar Project की घोषणा की है। यह समुदाय-नेतृत्व वाला दृश्य कहानी कहने का अनोखा प्रयास है, जो मुंबई के हाशिए पर रहने वाले लोगों की नज़र से शहर की अनदेखी कहानियाँ सामने लाता है। बेघर फोटोग्राफरों ने अपनी रचनात्मकता और दृढ़ संकल्प के साथ ऐसे रोज़मर्रा के क्षण कैद किए हैं, जिन्हें अक्सर हम सब अनदेखा कर देते हैं।

इस वर्ष, 34 बेघर फोटोग्राफरों ने 945 से अधिक तस्वीरें खींचीं, जिसने दृढ़ता, गरिमा और समुदायों की वास्तविक जीवन स्थितियों को दर्शाने वाला एक असाधारण संग्रह तैयार किया।

फोटोवॉइस पद्धति पर आधारित यह प्रोजेक्ट एक ऐसी मुंबई प्रस्तुत करता है जो संवेदनशील, अंतरंग और बेहद सशक्त है। यह केवल तस्वीरों का संकलन नहीं, बल्कि संघर्ष, गरिमा और उन भूले-बिसरे स्थानों में छिपी शक्ति से निर्मित एक सामूहिक कथा है।

बीते दिन, मुंबई के निदेशालय नगर प्रशासन कार्यालय में प्रतिष्ठित निर्णायक मंडल ने इस विशाल संग्रह से अंतिम चालीस तस्वीरों का चयन किया। निर्णायकों ने अपनी विशेषज्ञता और संवेदनशीलता के साथ अत्यंत पारदर्शी और ईमानदार ढंग से चयन प्रक्रिया संपन्न की। जनमत मतदान भी आयोजित किया गया, ताकि समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित हो सके और उन तस्वीरों को सम्मान मिले जो दर्शकों के बीच व्यापक रूप से गूंजीं।

उज्वल उके, पूर्व IAS अधिकारी और अध्यक्ष, राज्य स्तरीय शेल्टर मॉनिटरिंग कमेटी, महाराष्ट्र, ने कहा कि ये तस्वीरें केवल दस्तावेज़ नहीं हैं। ये साहस और मानवीय संवेदनाओं की झलक देती हैं तथा हमें शहर की जमीनी सच्चाइयों से रूबरू करवाती हैं।

अनिल गलगली, वरिष्ठ पत्रकार एवं आरटीआई कार्यकर्ता, ने कहा कि इन फ़्रेमों में दिखाई देने वाली कहानियाँ हमें उस मुंबई का एहसास कराती हैं जिसे अधिकतर लोग देख नहीं पाते। यह प्रोजेक्ट उन लोगों को आवाज़ देता है जिनके अनुभव सम्मान के योग्य हैं।

बृजेश आर्या, संस्थापक, पहचान, ने कहा कि यह प्रोजेक्ट समुदाय-नेतृत्व वाली रचनात्मकता में हमारे विश्वास को और मजबूत करता है। सही साधन और मंच मिलने पर हर व्यक्ति समाज की कहानी और सोच बदलने में सक्षम है।

प्रशांत नकवे, प्रोफ़ेशनल फ़ोटोग्राफ़र और मीडिया विशेषज्ञ, ने कहा कि इन तस्वीरों में जो सच्चाई और निष्पक्ष अभिव्यक्ति है, वह अत्यंत प्रभावशाली है। इन फोटोग्राफरों ने मुंबई को जिस ईमानदारी से कैद किया है, वह पेशेवरों के लिए भी प्रेरणादायक है।

प्रशाना खरे, फ़ूजीफ़िल्म इंडिया, ने कहा कि MyMumbai प्रोजेक्ट दिखाता है कि किस तरह कहानी कहने की प्रक्रिया समुदायों को सशक्त बना सकती है। इन फोटोग्राफरों ने जो भावनात्मक गहराई और प्रामाणिकता लाई है, वह वाकई अद्भुत है।

इस अवसर पर सुभाष रोकड़े, सार्थक बनर्जीपुरी, निशिका शाह, अश्विका कोच्चर, हार्दिक आर्या, गुरसिस सिंह, भवराज, नमित तलरेजा, दिव्या, दिनेश कवीना, देवांश और तनमय शुक्ला उपस्थित थे।

MyMumbai 2026 Calendar मानवता का उत्सव है—और समुदाय की कहानी कहने की परिवर्तनकारी शक्ति का सशक्त प्रमाण भी। यह पूरे शहर को आमंत्रित करता है कि एक पल ठहरकर देखें, महसूस करें और उस खूबसूरती को पहचानें जो अक्सर हमारी नज़रों से ओझल रह जाती है।

संघ का सनातन एवं प्रकृति-दर्शन: वैश्विक चेतना का आह्वान

भारत की सांस्कृतिक चेतना की जड़ में पंचमहाभूतों की जीवन-व्यवस्था है-भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश का संतुलन ही भारतीय ज्ञान-तंत्र की आत्मा है। ‘‘भगवान’’ शब्द के अक्षरों में निहित पंचतत्त्वों का सार यही दर्शाता है कि भारतीय जीवन-दर्शन में भगवान कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति का सुसंगठित योग है। यही दृष्टि सनातन कहलाती है, नित्य प्रवाहमान, पुनर्जननशील, अविनाशी। जब भारत का जीवन इसी तत्त्वदृष्टि से संचालित था, तब वह न केवल आर्थिक रूप से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी विश्व-गुरु था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में यह विचार और भी प्रासंगिक हो उठता है कि संघ का अस्तित्व ही सनातन जीवन-शैली की पुनर्स्मृति, पुनर्रचना और पुनर्स्थापना का प्रयत्न है। संघ नेतृत्व विशेषकर सरसंघचालक श्री मोहन भागवत की दृष्टि इस मूल दर्शन की आधुनिक व्याख्या है- “भारत की पहचान धर्म से है और धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि वह जीवन-शैली है, जिसमें प्रकृति, समाज, संस्कृति और आत्मा का संतुलन हो।’’ उनकी यह बात भारत की वैदिक चेतना को वर्तमान विश्व-यथार्थ में स्थापित करती है।
संघ के शताब्दी वर्ष का समय केवल एक संगठनात्मक उत्सव नहीं बल्कि भारत की सनातन जीवन पद्धति के पुनरुत्थान का क्षण है। संघ सरचालक श्री मोहन भागवत बार-बार यह कहते रहे हैं कि भारत का अस्तित्व किसी राजनीतिक ढांचे से नहीं बल्कि उसकी प्रकृति और संस्कृति के अखंड योग से बना है। भारतीय जीवन का यह सत्य पंचमहाभूतों के योग में निहित है, जिनसे सृष्टि बनी और जिनकी गति को भगवान कहा गया। मोहन भागवत का दृष्टिकोण इस सत्य को आधुनिक भाषा में समझाता है कि सनातन केवल कोई धर्म नहीं बल्कि वह जीवन-तंत्र है जो मानव और प्रकृति के संतुलन से चलता है। भारतीयता प्रकृति-पूजक है और संस्कृति को उसी प्रकृति की लय पर निर्मित करती है।
आज की दुनिया युद्ध, आतंक, प्रतिस्पर्धा और पकर्यावरणीय संकट से त्रस्त है। मानव की भूख केवल संसाधन और उपभोग तक सीमित होने से जीवन तनाव, प्रदूषण और अव्यवस्था का पर्याय बनता जा रहा है। यही पश्चिमी दुनिया की शोषणकारी दृष्टि रही जिसने प्रकृति पर नियंत्रण को प्रगति माना, जबकि भारत की दृष्टि पोषण और सहअस्तित्व की थी। मोहन भागवत कहते हैं कि भारत का मार्ग “सबका हित और सबके साथ” पर आधारित है, क्योंकि भारतीय समाज ने प्रकृति को माता माना और संस्कृति को उसका स्वरूप। यह वही दृष्टि है जिसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जीवन के चार आयाम हैं; जहां मोक्ष की चाह लालच रहित आनंद में है और जीवन को आरोग्य बनाना ही संस्कृति का प्रमुख लक्ष्य है। संघ का जीवन यही संदेश देता है कि व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व तभी स्वस्थ होंगे जब मानव प्रकृति के साथ समरस जीवन जिएगा।
आज जब राष्ट्रवाद को भौतिक शक्ति से मापा जा रहा है, तब मोहन भागवत इसके आध्यात्मिक स्वरूप को स्पष्ट करते हैं। राष्ट्र उनके लिए भू-भाग ही नहीं, बल्कि स्मृति, संस्कृति, प्रण और परंपरा का जीवंत व्यक्तित्व है। वे कहते हैं कि भारत की शक्ति उसकी विविधता और सामंजस्य में है, और सनातन इसलिए सनातन है क्योंकि वह पुनर्जननशील है; वह कभी समाप्त नहीं होता क्योंकि उसका आधार प्रकृति है। यही कारण है कि संघ की जीवन शैली में ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य आधारित आहार-विहार, चरित्र निर्माण और संतुलित व्यवहार को स्थान दिया गया। गांव, गौ-संवर्धन, हस्तशिल्प, लोक-जीवन, जैविक खेती, नदी-पुनरुद्धार, जल संरक्षण, स्वच्छता एवं आत्मनिर्भर भारत-ये नीतियां आधुनिक रूप में ‘‘भू-सांस्कृतिक मानचित्र’’ की पुनर्स्थापना हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जीवन दृष्टि को आधुनिक शासन में उतारा है। योग का विश्वदिवस घोषित होना, आयुर्वेद का पुनर्धर्म, “माई लाइफ़ माई योगा”, “पंचामृत”, “लोकल टू ग्लोबल”, “वोकल फॉर लोकल”, जी-20 की भारतीय दर्शन आधारित थीम “वसुधैव कुटुम्बकम्”, मिशन लाइफ, प्राकृतिक खेती, पारंपरिक चिकित्सा मंत्रालय, मंदिरों का पुनर्जीवन, सांस्कृतिक आत्मविश्वास का उदय-ये सब उस सनातन दृष्टि के शासन रूप हैं जिसे संघ वर्षों से साधता आया है। मोदी के नेतृत्व में भारत की राजनयिक भूमिका आध्यात्मिक भाषा में उभर रही है, जहां युद्ध की भाषा की जगह सहजीवन की भाषा है, प्रतिस्पर्धा की जगह सहयोग की भूमिका है। मोहन भागवत कहते हैं कि “भारत को दुनिया में नेतृत्व अपने धर्म से मिलेगा, किसी वर्चस्व से नहीं।” यही धर्म प्रकृति और संस्कृति के संतुलन का वह सिद्धांत है जिसने भारत को दार्शनिक राष्ट्र बनाया।
आज दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, महामारी, अकेलापन, मानसिक तनाव और युद्ध के बीच टूट रही है। पश्चिमी विज्ञान समाधान के लिए रोबोट, जीन इंजीनियरिंग या डिजिटल कृतक जीवन की ओर जा रहा है, जबकि भारतीय अध्यात्म कहता है कि समाधान भीतर है, प्रकृति के साथ है, समरस संस्कृति के साथ है। यही संघ का कथन है कि “मानव को मनुष्य बनाना ही राष्ट्र निर्माण है।” संघ का जीवन तंत्र व्यक्ति में यह भरोसा जगाता है कि वह सृष्टि से जुड़ा है, पंचमहाभूतों का अंश है, और उसका धर्म है कि वह प्रकृति और समाज दोनों का पोषण करे। संघ की शाखाओं में हर प्रार्थना “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” यह स्मरण दिलाती है कि भारत माता केवल प्रतीक नहीं बल्कि प्रकृति और संस्कृति का योग है, जिसे जीना ही सनातनता है। संघ के लिए सनातन केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य के लिए नैतिक और सामाजित अनुशासन की ऊर्जा है। संघ स्वयंसेवक जब शाखा में प्राणायाम, सूर्यनमस्कार, योगासन और सामूहिक भाव-विन्यास करते हैं, तो वे भारतीय संस्कृति के मूल सूत्र ‘‘प्रकृति-संस्कृति योग’’ को साधते हैं।
मोहन भागवत यह भी कहते हैं कि भारत का मार्ग किसी पर थोपने का नहीं है बल्कि जगत को दिखाने का है कि शांति, समृद्धि और संतोष कैसे प्राप्त हो सकते हैं। उनके वक्तव्यों में स्पष्ट है कि सनातन जीवन-पद्धति ‘‘ग्रहण और उपभोग’’ नहीं बल्कि सहजीवन और पोषण सिखाती है। एक ओर पश्चिमी मॉडल शोषण, नियंत्रण का जीवन देता है, विज्ञान भी वहां सत्ता का औजार है; दूसरी ओर सनातन दर्शन अध्यात्म और विज्ञान को पूरक बनाता है, भौतिकी को आध्यात्मिक चेतना से संचालित करता है। यही अंतर भारत और विश्व को दिशा देता है। उनकी दृष्टि में भारत की समस्याओं का समाधान शिक्षा प्रणाली के पुनर्संयोजन में है, जिसमें ज्ञान केवल तकनीक न हो बल्कि जीवन विद्या हो। वे कहते हैं कि यदि भारत प्रकृति आधारित संस्कृति को पुनर्जीवित करेगा तो आरोग्य, आनंद और मोक्ष की दिशा में एक नई मनुष्यता जन्म लेगी। यह केवल भारत के लिए नहीं बल्कि विश्व के लिए समाधान है क्योंकि विश्व के संकट का मूल मानव और प्रकृति के बीच का विभाजन है।
आज संघ का शताब्दी वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह भारत के सनातन पुनरुत्थान का ऐतिहासिक मोड़ हो सकता है। संघ की जीवन शैली-साधारणता, संयम, समर्पण, समाज-धर्म, अनुशासन, सेवा और आत्मपरिष्कार, यह प्रकृति आधारित संस्कृति की आधुनिक अभिव्यक्ति है। और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शासन, संघ के जीवन तंत्र को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने का राजनीतिक-राजनयिक रूप है। इसलिए आज के हिंसा और युद्धग्रस्त विश्व के लिए भारत का संदेश स्पष्ट है कि समाधान हथियार से नहीं, जीवन दर्शन से होगा; विकास भौतिक उपभोग से नहीं, समरस संस्कृति से होगा; और भविष्य उस सभ्यता का है जो प्रकृति को माता और संस्कृति को सृष्टि का धर्म मानकर चलती है।
सनातन जीवन दृष्टि केवल विश्वास नहीं, बल्कि मानवता के लिए जीवंत प्रस्ताव है। संघ सरचालक मोहन भागवत का आग्रह इसी पर है कि भारत को अपने अक्षय ज्ञान पर पुनर्विश्वास करना होगा, क्योंकि वही वह शक्ति है जो संकटग्रस्त विश्व को दिशा दे सकती है। जब प्रकृति और संस्कृति का योग जीवन का आधार बनता है, तब व्यक्ति आरोग्यवान, समाज समृद्ध और राष्ट्र मोक्षपथगामी होता है। यही सनातन समृद्धि है और यही भारत का वैश्विक योगदान है, जिसकी उद्घोषणा संघ के शताब्दी वर्ष में अधिक स्पष्ट होती है कि “विश्व बंधुत्व, प्रकृति सम्मान और मोक्ष-केंद्रित जीवन, यही भविष्य की सभ्यता है।”
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

पुतिन की भारत यात्रा और बदलती दुनिया में भारत–रूस रिश्तों की नई ताकत

4–5 दिसंबर को राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दो दिवसीय भारत यात्रा केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह बदलती वैश्विक राजनीति में भारत–रूस रिश्तों की नई दिशा और नई गहराई का स्पष्ट संकेत बनकर सामने आई। एक ओर यूक्रेन युद्ध को तीन वर्ष पूरे होने को हैं, दूसरी ओर पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंध, वैश्विक मंदी का डर और ऊर्जा संकट पूरी दुनिया को अस्थिर बनाए हुए हैं। ऐसे समय में भारत और रूस का साथ यह बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब केवल दबाव और टकराव से नहीं, बल्कि संतुलन और व्यावहारिक साझेदारी से आगे बढ़ रही है।
पुतिन की यह यात्रा इस मायने में भी खास रही कि रूस आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, जबकि भारत तेजी से उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। इस पृष्ठभूमि में दोनों देशों ने साफ कर दिया कि उनकी दोस्ती किसी तात्कालिक मजबूरी की नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर आधारित है।
यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की पूरी कोशिश की। स्विफ्ट भुगतान प्रणाली से रूस को बाहर करने, उसके बैंकों और ऊर्जा निर्यात पर रोक लगाने जैसे कदम उठाए गए। इसके बावजूद भारत–रूस व्यापार कमजोर नहीं पड़ा। उलटे वर्ष 2024–25 में द्विपक्षीय व्यापार 65 अरब डॉलर के पार पहुँच गया, जो अब तक का सबसे ऊँचा स्तर है।
रुपया–रूबल व्यापार व्यवस्था, रूस की SPFS प्रणाली और भारत की रूपे प्रणाली के तालमेल, नई शिपिंग और बीमा व्यवस्थाओं ने इस व्यापार को प्रतिबंधों से काफी हद तक सुरक्षित रखा। आज भारत रूस से समुद्री रास्ते से कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है। सस्ते रूसी तेल से भारत को दो बड़े फायदे हुए—एक तो घरेलू महँगाई पर नियंत्रण बना रहा, दूसरा उद्योगों को लगातार सस्ती ऊर्जा मिलती रही। यह भारत की उस स्वतंत्र विदेश नीति का उदाहरण है, जिसमें वह दबाव में नहीं, बल्कि अपने हितों के आधार पर फैसला करता है।
यूरोप आज भी ऊर्जा संकट से पूरी तरह उबर नहीं पाया है, लेकिन भारत ने इस संकट को रणनीतिक अवसर में बदल दिया। पुतिन की यात्रा के दौरान दीर्घकालिक तेल और गैस आपूर्ति समझौते, एलएनजी सहयोग, आर्कटिक क्षेत्र में भारतीय निवेश और परमाणु ऊर्जा सहयोग पर सहमति बनी है। कुडनकुलम परमाणु परियोजना की आगे की इकाइयों पर भी ठोस बातचीत हुई है।
भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का करीब 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में रूस के साथ मजबूत ऊर्जा साझेदारी भारत की आर्थिक वृद्धि, औद्योगिक विकास और महँगाई नियंत्रण तीनों के लिए बेहद अहम है। साफ है कि आने वाले वर्षों में यह साझेदारी भारत की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ बनने जा रही है।
भारत–रूस रक्षा संबंध अब केवल हथियार खरीद तक सीमित नहीं रहे। अब जोर संयुक्त निर्माण और तकनीक हस्तांतरण पर है। ब्रह्मोस मिसाइल भारत–रूस की सबसे सफल संयुक्त रक्षा परियोजना बन चुकी है, जिसे अब तीसरे देशों को भी निर्यात किया जा रहा है। एस-400 वायु रक्षा प्रणाली ने भारत की सुरक्षा क्षमता को नई मजबूती दी है।
पुतिन की यात्रा के दौरान ड्रोन तकनीक, हाइपरसोनिक हथियार, साइबर सुरक्षा, सुखोई विमानों के इंजन निर्माण और संयुक्त शोध पर नई सहमतियाँ बनी हैं। ये सभी कदम ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को सीधे मजबूती देते हैं और भारत को धीरे-धीरे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाते हैं।
भारत–रूस संबंध अब केवल द्विपक्षीय नहीं रहे, बल्कि यूरेशिया के बड़े भू-आर्थिक नेटवर्क से जुड़ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) भारत को ईरान और रूस के रास्ते मध्य एशिया और यूरोप से जोड़ता है। इसे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। वहीं चेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग भारत को रूस के सुदूर पूर्व से सीधे जोड़ने की क्षमता रखता है।
पुतिन की यात्रा में इन परियोजनाओं के तहत लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह विकास और कस्टम प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर सहमति बनी, जिससे आने वाले समय में भारत का निर्यात और निवेश दोनों बढ़ सकते हैं।
ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन (SCO), रूस–भारत–चीन (RIC) और जी-20 जैसे मंचों पर भारत और रूस का सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। ब्रिक्स का विस्तार, न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार के प्रयास डॉलर आधारित वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को धीरे-धीरे संतुलित कर रहे हैं। भारत आज ‘ग्लोबल साउथ’ की मजबूत आवाज़ बन रहा है, जबकि रूस पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती देने वाली शक्ति के रूप में उभरा है। दोनों मिलकर बहुध्रुवीय विश्व की नींव मजबूत कर रहे हैं।
भारत ने इस शिखर सम्मेलन में साफ कर दिया कि वह किसी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं है। भारत अमेरिका, यूरोप, रूस और एशिया—सबके साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर रिश्ते रखता है। भारत–रूस साझेदारी किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं, बल्कि वैश्विक अस्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखने की नीति का हिस्सा है।
आज की दुनिया तेजी से बदल रही है। शक्ति-संतुलन नया रूप ले रहा है। ऐसे समय में राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा और 22वां भारत–रूस शिखर सम्मेलन यह साबित करता है कि दोनों देशों का रिश्ता सिर्फ इतिहास की विरासत नहीं है, बल्कि भविष्य की रणनीति है। अनिश्चितताओं से भरी वैश्विक राजनीति में भारत–रूस साझेदारी स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा क्षमताओं और आर्थिक विकास का मजबूत आधार बनती जा रही है।
(लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना झंडेवालान,नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैें) 

पाकिस्तान में मंदिर-गुरुद्वारों का बुरा हाल, 1800 में से केवल 37 में ही हो रही पूजा-पाठ

पाकिस्तान में हिंदू और सिख जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है। पाकिस्तान खुद को अल्पसंख्यकों का रक्षक बताता है लेकिन सच्चाई यह है कि उसका शासन आज भी उन नीतियों पर चल रहा है जो धार्मिक दमन को जिंदा रखे हुए हैं। पाकिस्तान में हिंदुओं के पूजा के 1,285 स्थल और 532 गुरुद्वारे मौजूद हैं लेकिन इनमें से सिर्फ 37 को चलने दिया गया है। बाकी सब या तो ताले में जकड़े हुए हैं या खंडहरों में बदल दिए गए हैं। यह किसी प्रशासनिक गलती का नहीं बल्कि दशकों से जारी दुश्मनी भरे रवैये का नतीजा है।

डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, माइनॉरिटी कॉकस की पहली बैठक में यह जानकारी सामने आई। जो देश हर मंच पर मानवाधिकारों की दुहाई देता फिरता है, वह अपने ही संविधान में दर्ज अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को खुलेआम रौंद रहा है। बैठक में सीनेटर दानिश कुमार ने कहा कि कॉकस यह सुनिश्चित करने के लिए काम करेगा कि गैर-मुस्लिमों के लिए संवैधानिक सुरक्षा को बरकरार रखा जा सके।

इस बैठक के दौरान इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ETPB) की संपत्तियों उनमें में खासकर हिंदुओं और सिखों के पूजा स्थलों का रखरखाव करने में नाकाम रहने के लिए आलोचना की है। कॉकस की बैठक में माँग की गई कि इस बोर्ड का मुखिया किसी गैर-मुस्लिम को बनाया जाना चाहिए ताकि गैर-मुस्लिम समुदायों के पूजा स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

समिति ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों को स्कॉलरशिप जरूर मिलनी चाहिए ताकि उनकी पढ़ाई में कोई रुकावट ना आए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अंग्रेजी और उर्दू के कोर्स में जो नफरत फैलाने वाली या भेदभाव वाली बात लिखी है, तो उसे तुरंत हटाया जाए। साथ ही, धर्म से जुड़ी बातें सिर्फ उसी धर्म के विषय में पढ़ाई जाएँ और बाकी सामान्य शिक्षा में धार्मिक प्रचार न हो।

 
पाकिस्तानी अखबार डॉन की रिपोर्ट https://www.dawn.com/news/1959038/only-37-of-1800-hindu-sikh-worship-sites-functional-in-pakistan-minority-caucus-told

चुनाव सुधारों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता

विगत  दो दिनों से संसद के दोनों सदनों, लोकसभा (लोकप्रिय सदन/ निम्न सदन /जनता के सदन) एवं राज्यसभा (ऊपरी सदन/ राज्यों के सदन / पांडित्य सदन) में ‘ विशेष सघन पुनरीक्षण’ (SIR) को लेकर गतिरोध उत्पन्न हुआ है। दोनों पक्ष( सत्ता पक्ष एवं विपक्ष) चुनाव सुधारो पर चर्चा के लिए सहमत हो गए हैं । विशेष सघन पुनरीक्षण(SIR ) एक प्रशासनिक विषय है, जिसे  निर्वाचन आयोग ने तय किया है।
चुनाव की प्रणाली में करने योग्य उन परिवर्तनों/ बदलावों  को ‘ चुनाव सुधार’ कहते हैं, जिनके आवेदित  करने से जनता की आकांक्षाएं व अपेक्षाएं चुनाव परिणाम के रूप में आधिकारिक  परिणित होने लगे। लोकतंत्र में राजनीतिक दल  प्राणवायु के समान होते हैं, राजनीतिक दल ईंधन के रूप में कार्य करते हैं। प्रतिनिधि लोकतंत्र में राजनीतिक दल प्रतिनिधित्व का माध्यम होते हैं। राजनीतिक दलों में सत्ता का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर( पिरामिड) होता है:, अर्थात ऊपर बैठे व्यक्तियों के पास  सत्ता अधिक होती है, जो फैसला करते हैं कि आने वाले आम चुनाव  व मध्यावधि चुनाव में किसको टिकट मिले? इसी “ हाई कमान संस्कृति “ कहा जाता है! इस तरह के प्रक्रिया से व्यक्तिवाद, वंशवाद और परिवारवाद जैसे विचारधारा का विकास होता है ,और राजनीतिक नेतृत्व के समक्ष निर्णय करने की प्रक्रिया अधिक केंद्रित होतीहै।
लोकतंत्र के सशक्तिकरण को मापने के लिए ‘आंतरिक लोकतंत्र’ को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत के लोकतंत्र और निर्वाचन आयोग का दुर्भाग्य है कि इस समय निर्वाचन आयोग के पास एक कोई अधिकार नहीं है कि वह भारत के राजनीतिक दलों में ‘ आंतरिक लोकतंत्र’ की मजबूती का मूल्यांकन  कर सके। ‘ आंतरिक लोकतंत्र’ के अभाव में दलों में विचार – विमर्श नहीं हो पता है ,जिसमें स्थायित्व  की भावना नहीं आ पाती है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वाले किसी भी राजनीतिक दल को अपने संगठन / संघ के कार्यों के रूप में औपचारिक एवं  आवधिक चुनाव कराने चाहिए ,जिससे राजनीतिक दलों में लोकतांत्रिक मूल्यों एवं आदर्शों का समावेश हो सके एवं दल के भीतर उत्पन्न निराशा एवं कुंठा का  शमन किया जा सके।
1994 में न्यायमूर्ति बी. आर, कृष्णन समिति ने सभी राजनीतिक दलों में ‘ आंतरिक लोकतंत्र’ को सुनिश्चित करने और लेखा एवं लेखा- परीक्षा हेतु कानूनी मंजूरी की मांग की थी:, इसी प्रकार विधि आयोग ने अपनी 170 वीं विधि प्रतिवेदन में “चुनाव कानूनों में सुधार            में स्पष्ट कहा था कि, राजनीतिक दल भीतर से तानाशाही/स्वेक्षातांत्रिक और बाहर से लोकतांत्रिक नहीं हो सकते हैं।” इसके साथ ही विधि आयोग ने यह  संस्तुति किया था कि राजनीतिक दलों की संभावित सांप्रदायिक गतिविधियों या उनके अन्य संवैधानिक कार्यों का निरीक्षण करने के लिए एक अलग से “आयुक्त” की नियुक्ति की जानी चाहिए।
2002 में संविधान के कार्यों की समीक्षा करने वाली ‘ राष्ट्रीय समीक्षा आयोग’ ने चुनाव एवं चुनाव से इतर समय में पार्टी फंड के विनियमन की आवश्यकता को रेखांकित किया था । इस समिति ने राजनीतिक दलों के लेखा परीक्षा के साथ-साथ उस लेखा परीक्षा को सामान्य निरीक्षण के लिए खोलने की बात कही थी। इसके अतिरिक्त चुनाव के दौरान बढ़ते हुए जातिवाद पर लगाम लगाने के लिए कदम उठाने, दल- बदल कानून को और मजबूत करने और सामान्य जीवन में नैतिकता की स्थापना के लिए प्रयत्न की सिफारिश की थी:, हिंसा, जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयतावाद  को निजी हितों के लिए प्रयोग किया जा रहा है, जिससे हिंसक  अपराधों में वृद्धि हो रही है।
2006 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने केंद्रीय सूचना आयोग में अपील की कि राजनीतिक दलों के आयकर के विवरण को सार्वजनिक किया जाए। इस कार्य के लिए संगठन को 2 साल तक लंबा संघर्ष करना पड़ा और उसके बाद 2008 में केंद्रीय सूचना आयोग ने फैसला दिया कि आयकर के विवरण को सार्वजनिक किया जाए। वर्ष 2013 में जब केंद्रीय सूचना आयोग ने 6 राष्ट्रीय दलों को  “सार्वजनिक प्राधिकरण” घोषित किया, जिससे कि वह सूचना के अधिकार के अधिनियम की धारा 2( झ) के प्रभाव के परिधि में आ जाएं, इसका राजनीतिक दलों ने बहुत विरोध किया । इस योजना को बाद में  ठंडे  बस्ते में डाल दिया गया, क्योंकि ऐसी खबरें उड़ने लगी थी कि सूचना का अधिकार अधिनियम को ही अनुच्छेद 123(1) के अंतर्गत संशोधित किया जाएगा। कुछ राजनीतिक दल ऐसे भी हैं जो सामाजिक या क्षेत्रीय पक्षों को लेकर चलते हैं। भारत की संघीय और बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था ने भी  वंशवाद या व्यक्तिगत प्रभाव के लोगों के प्रभुत्व को बढ़ावा दिया है। इसमें वित्तीय अनुदान भी महत्वपूर्ण हो जाता है ,इसलिए अनेक दलों में आंतरिक चुनाव पर ज्यादा जोर नहीं दिया जाता है। कांग्रेस पार्टी में बहुत साल बाद लोकतांत्रिक तरीके से ‘ थके हुए अध्यक्ष’ का चुनाव हुआ है।
 राजनीतिक दलों के वित्तीय आधार में सुधार की बात की जाए तो राजनीतिक चंदे के रूप में चुनावी बांड के मुद्दे पर चर्चा करने से बचा नहीं जा सकता है। चुनावी बांड से वास्तविक स्तर पर याराना पूंजीवाद यानी क्रोनी कैपिटल ही प्रोत्साहित हुआ है। यह एक सुधारात्मक एवं  प्रगतिशील सुधार है। कंपनियां करोड़ों रुपए इधर-उधर कर सकती हैं और किसी को भनक भी नहीं लगेगी कि पैसा किसने किसको दिया?, यह व्यवस्था कुछ भी हों ,लेकिन पारदर्शी किसी भी तरह से नहीं है। इसका परिणाम यह हुआ  है कि पूंजीपति देश चलाएंगे जो संभवत: वर्षों से करते आ रहे हैं।
अभी एक कंपनी अपने फायदे का 100% किसी राजनीतिक दल को चंदे के रूप में दे सकती हैं ,और बदले में वह राजनीतिक दल सत्ता में आकर उस  कंपनी के अनुरूप नीतियों का निर्माण करेगा। ऐसी व्यवस्था का संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में जबरदस्त विरोध हुआ था ,जिससे  लूट प्रणाली(Spoil system)  पर काफी हद तक नियंत्रण स्थापित हुआ था। चुनाव सुधारो पर भारत सरकार ने 1990 में श्री दिनेश गोस्वामी समिति को गठित  किया  था जिसने संस्तुति  किया था की मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को राज्य की ओर से धन  के रूप में सीमित वित्त पोषण प्रदान किया जाए। इसी प्रकार, 1998 में श्री इंद्रजीत गुप्ता समिति ने मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों के लिए आंशिक वित्त पोषण का अनुमोदन किया था। राज्य/ व्यवस्था द्वारा दलों का यह वित्त पोषण चुनाव प्रचार के दौरान पानी की तरह पैसा बहाने की मनोवृत्ति पर नियंत्रण करेगा, जिससे राजनीति में धन- बल पर नियंत्रण स्थापित होगा।
लोकतंत्र में चुनाव सुधार की दिशा में पहल यह  रहा है कि दागी विधायकों को अयोग्य ठहराया जाता है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 के अनुसार, कानूनन अपराधी ठहराए गए राजनीतिज्ञ चुनाव लड़ नहीं सकते हैं,लेकिन जिन पर मुकदमा चल रहा है वह कितना भी गंभीर हों ,उनके चुनाव लड़ने पर कोई रोक नहीं है। 2002 में न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में चुनाव सुधार के लिए समिति गठित की गई थी  जिसका प्रतिवेदन था कि, आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों या अदालत में मुकदमे का सामना कर रहे उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने व प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश श्रीमान दीपक मिश्रा ने इस विषय पर निर्णय दिया था कि न्यायालय संसद की भूमिका में नहीं हो सकती हैं ।संसद इस मामले में अनुच्छेद 102(1) के अनुसार कानून बना सकती हैं ।राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध चुनाव आयोग पिछले दो दशकों से संघर्ष कर रहा है और आयोग लगातार इस दिशा में सफलता हासिल कर रहा है। समाचार चैनलों और सोशल मीडिया के माध्यम से ‘ प्रायोजित खबरों ‘ और ‘ झूठी खबरों ‘ से राजनीतिक परिणाम प्रभावित न हो। मतदाता सूचियां को मतदाता संपर्क के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है और गोपनीयता को लेकर चिंताएं खड़ी हो गई हैं। कैंब्रिज एनालिटिका कांड  इस संबंध में नवीनतम उदाहरण है।
चुनाव आयोग का सुधार एवं मतदाता सहभागिता बढ़ाने के लिए M – 3 इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के संशोधित  संस्करण के रूप में रिमोट इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन तैयार किया गया है। इससे शिक्षा ,रोजगार या अन्य  कारणों  से देश( राज्य) में रहने वाले व्यक्ति चुनाव में सहभागिता कर सकें। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शी, समानता, स्वतंत्रता और न्याय की भावना को मजबूती से लागू करना होता है तभी संभव है जब शासन में सुशासन के तत्व परिलक्षित होते हैं। लोकतंत्र को विचार या विचारों के पुंज के रूप में लागू करना होता है। अपने निजी हितों के लिए वर्तमान  विधियों को कमजोर करने और व्यवस्था को अपने अनुसार ढालने की बजाय सभी राजनीतिक दलों को अपने निजी हितों का परित्याग करके राष्ट्रीय एकता की भावना से सोच करके  बढ़ना होगा, इन्हीं प्रयासों से मजबूत लोकतंत्र का निर्माण हो सकता है।
निर्वाचन आयोग के अनुसार ,तेजी से शहरीकरण, रोजगार के लिए शहरों में पलायन, युवा नागरिकों( जिनकी आयु 18 वर्ष हो चुका हैं ) का मतदान के योग्य होना एवं अवैध विदेशी नागरिकों के नाम मतदाता सूची में सम्मिलित होना। ऐसे बहुत से कारण है, जिसके चलते मतदाता सूची का सघन पुनरीक्षण आवश्यक है। इस प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन आयोग यह  सुनिश्चित करता है कि किसी गैर- नागरिक का नाम मतदाता सूची में सम्मिलित ना हो सके। लोकतंत्र के मौलिक आदर्श “ एक व्यक्ति- एक मत” की सार्थकता को विशेष सदन पुनरीक्षण पूरा कर सकता है।
चुनाव सुधारों के लिए निम्न सुझाव है:-
1.भारत में चुनाव सुधारो के लिए दहशतगर्दी एवं अपराधीकरण को रोकना;
2.राजनीतिक दलों को विभिन्न समितियों के  संस्तुतियों  के आधार पर  अद्यतन करना;
3.मतदाता जागरूकता को देशव्यापी स्तर पर प्रचारित करना;
4.चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष एवं दबाव विहीन बनाने के लिए प्रयास करना;एवं
5.निर्वाचन आयोग  अद्यतन  सुधारों के लिए विशेषज्ञों का ‘ थिंक टैंक’ गठित करें।
(लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना झंडेवालान,नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं) 

देवरहा बाबा का मइल आश्रम भारतीय संतपरंपरा की अमूल्य धरोहर है

पूर्वपीठिका :-

पूज्य श्री देवरहा बाबा एक ऐसे ईश्वरलीन, अष्टांग योगसिद्ध योगी थे. जिन्हें लगभग एक शताब्दी से भी अधिक अवधि तक भारतवर्ष और विदेशों के, न सिर्फ उनके गृहस्थ-भक्त अपितु अनगिनत संन्यस्त शिष्य भी, साक्षात् परमात्मा की तरह पूजते रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िले में सरयू नदी के तट पर स्थित मइल का यह पावन स्थल देवरहा बाबा जी की दिव्य तपस्थली के रूप में आज भी श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। एक साधारण चटाई पर विराजमान होकर देवरहा बाबा ने वर्षों तक मौन साधना, ध्यान और निःस्वार्थ सेवा के माध्यम से मानवता की सेवा की। राजा हो या रंक – सभी को उन्होंने समान दृष्टि से देखा और आशीर्वाद  प्रदान किया है।

 

बाबा ने अकाल से राहत दी :-

देवरहा बाबा अपने पूर्व नाम जनार्दन दत्त के रूप में बस्ती जिले के उमरिया गांव को छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए ब्रह्म की खोज में वापस चले गए थे । हिमालय में अनेक वर्षों तक अज्ञात रूप में रहकर उन्होंने साधना की थी । हिमालय से साधना करने के पश्‍चात जब बाबा अपने भक्‍तों के बीच रहने आये तो उन्‍होंने अपना निवास स्‍थान पहले तो उत्‍तर प्रदेश का देवरिया जिला चुना और अपने जीवन के अंत समय में वे मथुरा में यमुना नदी के किनारे रहे। बीच बीच में वे प्रयाग, विंध्याचल हरिद्वार अयोध्या आदि स्थलों पर भी विचरण करते रहे हैं। हिमालय से आने के बाद वे सरयू नदी के तट पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के मइल  नामक स्थान पर पहुंचे। उस समय 1870 से 1910 के के बीच अकाल और महामारियों का दौर चल रहा था। इस अवधि में 1876-1878 का अकाल बहुत विनाशकारी था, जिसमें सूखा और अल नीनो जैसी घटनाओं के कारण लाखों लोगों की जान चली गई थी। पूरे उत्तर प्रदेश में भीषण अकाल पड़ा था। अकाल से सर्वाधिक प्रभावित गोरखपुर जिला था। आज का देवरिया जिला उन दिनों गोरखपुर जिले में ही था। भयंकर सूखे के कारण पूरे जनपद में त्राहि-त्राहि मची थी।

एक दिन अकाल ग्रस्त ग्रामवासी सरयू नदी के तट पर एकत्रित होकर भगवान से प्रार्थना कर रहे थे। देवरा (नदी के किनारे उगने वाला एक प्रकार का छोटा पौधा) के घने जंगलों में लम्बे समय तक बाबाजी को रुकना व छिपना और साधना करना पड़ा था। इससे  उनके  केश  बाल और  दाढ़ी  बहुत  बढ़ गये थे। कोई व्यक्ति उस जंगल में अचानक जनार्दन दत्त को  देखकर  उन्हे  “देवरा बाबा” कह भय से वहां से भाग  गया  था। नदी की रेत को जनभाषा में भी  देवरा कहते हैं । वहां रहने के कारण बाबा को “देवरहा बाबा” कहा जाने लगा। इस प्रकार अवधूत वेषधारी जटाधारी एक तपस्वी महापुरुष नदी तट पर प्रकट हुए थे। उनका उन्नत ललाट मुख मंडल पर देदीप्यमान तेज आंखों में सम्मोहन देखकर उपस्थित जन अपने को रोक न सके और उस तपस्वी के सामने साष्टांग प्रणाम करने लगे थे । यह सूचना पूरे गांव और क्षेत्र में आग की तरह फैल गई। देखते ही देखते गांव के समस्त नर-नारी दौड़कर वहां आ गए । कुछ ही देर में बाबा के सामने एक विशाल जन समुदाय इकट्ठा हो गया था। बाबा सरयू नदी के जल से प्रकट हुए थे इसलिए “जलेसर महाराज” के नाम से जय – जयकार के नारे लगने लगे थे। बाबा से सभी मनुष्यों ने अपनी अपनी विपत्तियां कहीं । बाबा ने सबकी बातें प्रेम पूर्वक सुनी और कहा,” तुम लोग अपने अपने घर जाओ । शीघ्र ही वर्षा होगी ।”

जन समूह बाबा का गुणगान करते हुए अपने अपने घरों को लौट पड़े और शाम होते ही पूरा आकाश बादलों से घिर गया। देखते ही देखते मूसलाधार वर्षा होने लगी। “जलेसर बाबा” ही आगे चलकर ” देवरहा बाबा” कहलाए।

 

मइल का प्रसिद्ध देवरहा आश्रम बना:-

देवरिया का मइल आश्रम प्रसिद्ध देवरहा बाबा आश्रम है, जो बरहज तहसील के मइल गांव में सरयू नदी के किनारे स्थित है। यह आश्रम ब्रह्मयोगी श्री देवरहा बाबा की तपो- स्थली है। करीब एक किलोमीटर दूर, श्री राधा रानी मंदिर के पास, एक गुफा आश्रम है, जिसे देवरहा बाबा का ध्यान स्थल माना जाता है। इस स्थान को एक पवित्र तपोवन माना जाता है, जहाँ आध्यात्मिक ज्ञान और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव किया जा सकता है। कुछ ही दिनों में जनार्दन दूबे की ज्योति तप साधना योग से पूरे देश में फैलने लगी पूरे देश में बड़ी बड़ी हस्तियां उनकी तरफ चली आ रही थी । देवरहा बाबा रामभक्त थे, उनके मुख में सदा राम नाम का वास था, वो भक्तों को राम मंत्र की दीक्षा देते थे। वह सदा सरयू के किनारे रहते थे। उनका कहना था-

“एक लकड़ी हृदय को मानो

दूसर राम नाम पहिचानो।

राम नाम नित उर पे मारो

ब्रह्म लाभ संशय न जानो।”

 

राम कृष्ण को एक जानो :-

देवरहा बाबा श्री राम और श्री कृष्ण को एक मानते थे और भक्तो को कष्ट से मुक्ति के लिए ये कृष्ण मंत्र भी देते थे-

“ऊं कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने

प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नम:”।

 

जीवन की पवित्रता:-

बाबा का कहना था कि जीवन को पवित्र बनाये बिना ईमानदारी, सात्विकता, सरसता के बिना भगवान नहीं मिलते। इसलिए सबसे पहले अपने जीवन को शुद्ध व पवित्र बनाओ। बाबा ना ही कभी धरती पर लेटे हैं। हमेशा एक लकड़ी के मचान में रहते थे, जो धरती से 12 फिट की ऊंचाई पर होता था और उसी पर बाबा योग साधना किया करते थे।

 

बाबा की सिद्धियॉ :-

बाबा को कई सिद्धियॉ भी प्राप्‍त थी, जो इस प्रकार हैं- जिसमें एक सिद्धि पानी में बिना सांस के रहने की है। दूसरी जंगली जानवरों की भाषा समझ लेते थे। बाबा जी खतरनाक जंगली जानवरों को पल भर में काबू कर लेते थे। जो एक सामान्‍य मनुष्‍य के वश की बात नहीं है। तीसरी खेचरी मुद्रा में उनको महारथ हासिल थी, जिसके कारण बाबा आवागमन करते थे, हालांकि बाबा को किसी ने आते-जाते नहीं देखा। खेचरी मुद्रा से ही बाबा अपनी भूख व उम्र पर नियंत्रण करते थे। बाबा के अनुयायियों के अनुसार बाबा को दिव्‍य द्रष्टि की सिद्धि प्राप्‍त थी, बाबा बिना कुछ कहे-सुने ही अपने भक्‍तों की समस्‍याओं और उनके मन में चल रही बातों को जान लिया करते थे। उनकी याददास्‍त इतनी अच्‍छी थी कि दसकों बाद भी किसी व्‍यक्ति से मिलते थे तो उसके पूरे घर की जानकारी और इतिहास बता दिया करते थे। बाबा हठ योग की दसों मुद्राओं में पारंगत थे। साथ ही ध्‍यान योग, नाद योग, लय योग, प्राणायम, त्राटक, ध्‍यान,धारणा, समाधि आदि पद्धतियों का भरपूर ज्ञान था,जिससे बड़े-बड़े विद्वान उनके योग ज्ञान के सामने नतमस्‍तक हो जाया करते थे। बाबा के सबसे निकट भक्‍त थे उनका नाम था मार्कण्‍डेय महाराज। जिन्‍होंने बाबा की लगभग 10 साल कुम्भ कैंपस में सेवा की है। उन्होंने बताया कि बाबा एक लकड़ी के मचान पर रहते थे, और केवल स्नान के लिए ही नीचे उतरते थे।

 

श्याम सुंदर दास वर्तमान पीठाधीश्वर

महंत श्याम सुंदर दास जी महाराज देवरहा बाबा के मइल आश्रम के पीठाधीश्वर है। देवरहा बाबा के चमत्कारों और शिक्षाओं को दुनिया के सामने लाने में महंत श्याम सुंदर दास जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने देवरहा बाबा की शिक्षाओं पर कई बार प्रकाश डाला है। वे देवरहा बाबा के ‘आष्टांग योग’ और ‘खेचरी मुद्रा’ जैसे योग साधनाओं का भी उल्लेख करते रहते हैं। वे देवरहा बाबा के अनुयायियों को आध्यात्मिकता और मानव सेवा का संदेश देते हैं।महायोगीराज देवरहा बाबा ने अपनी साधना के लिए इसी भूमि का चयन किया था और यहीं उन्हें आष्टांग योग की सिद्धि प्राप्त हुई थी। बाबा समदर्शी महात्मा थे।

 

आश्रम की उपेक्षा

देवरहा बाबा आश्रम मइल विश्व विख्यात स्थलों में अपनी एक अलग पहचान रखता है। बाबा के भक्त देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी फैले हुए हैं। देवरहा बाबा की महत्ता का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं  कि उनका दर्शन और आशीर्वाद लेने के लिए देश, विदेश की नामचीन हस्तियां आती रहती थीं। योगिराज के ब्रम्हलीन होने के बाद आश्रम के दुर्दशा की कहानी प्रारंभ हो गई। जो अपनी उपेक्षा पर आंसू बहा रहा है। हालात इतना बद्तर है कि गोशाला की गायों को खाने के लिए न तो चारा है और नहीं भक्तों को देने के लिए प्रसाद है। आश्रम को किसी ऐसे भगीरथ का इंतजार है, जो इसके विकास के लिए आगे आकर पहल करे और पर्यटन स्थल घोषित करा कर दुनिया से जोड़ सके।

 

स्वदेश दर्शन योजना से जुड़ा

2019 में बांसगांव के भाजपा सांसद कमलेश पासवान और निवर्तमान भाजपा विधायक सुरेश तिवारी के प्रयास से भारत सरकार की स्वदेश दर्शन योजनान्तर्गत पर्यटन मंत्रालय द्वारा भवन निर्माण आदि का कार्य कराया गया। निर्दलीय विधायक सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहते हुए पं. दुर्गा प्रसाद मिश्रा ने वर्ष 2006 -07 में तीन कमरा, बरामदा, शौचालय व स्नानघर का निर्माण कराया। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी दीपक कुमार मिश्रा शाका जब भागलपुर के ब्लाक प्रमुख थे, तब उन्होंने भी आश्रम से मइल तक चकरोड और तालाब की साफ-सफाई करा कर आश्रम को सौगात दिया था, लेकिन इसके बावजूद इस दर्शनीय स्थल का दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ रहा है।

 

तालाब की दुर्दशा

सुंदर तालाब घास फूस और झाड़-झंखाड़ से भरा हुआ है और उसमें एक बूंद पानी नहीं है। आश्रम में योगिराज देवरहा बाबा द्वारा लगाया गया कल्प वृक्ष (पारिजात) के अलावा सुंदर और रमणीय स्थान होने के बाद भी पर्यटन विभाग की नजर नहीं पड़ रही है। आश्रम को किसी ऐसे भगीरथ का इंतजार है जो इसके विकास के लिए पहल करे सके।

 

कल्पवृक्ष पारिजात विरासत वृक्ष घोषित

प्रदेश सरकार व वन विभाग ने देवरिया जिले के गैर वन क्षेत्र में सामुदायिक भूमि पर करीब सौ साल से अधिक के वृक्षों को विरासत वृक्ष घोषित किया है। इसमें मइल स्थित देवरहा बाबा आश्रम परिसर में स्थित कल्पवृक्ष पारिजात भी शामिल है। इन वृक्षों के संरक्षण और संवर्धन के लिए वन विभाग द्वारा प्रयास किया जाता है।

बताया जाता है कि देवरहा बाबा ने अपने आश्रम में पारिजात को करीब डेढ़ सौ साल पहले लगाया था। ऐसी मान्यता है कि इसके छूने मात्र से शरीर की सारी थकान दूर हो जाती है। इसकी पत्तियों व छाल के प्रयोग से रोगों में चमत्कारी लाभ बताए गए हैं।

 

सुंदरीकरण कार्य भी हुआ:-

देवरहा बाबा आश्रम  मइल के महंथ श्याम सुंदर दास जी ने आत्मदाह की चेतावनी दी थी। देवरहा बाबा आश्रम के सुंदरीकरण करने के लिए रुपए 1 करोड़ 90 लाख मिला है। कुछ लोग सुंदरीकरण दूसरी जगह करना चाहते थे। इस बात से नाराज मंहत जी ने जिलाधिकारी को पत्र लिखकर जानकारी दी थी। इस पर डीएम ने दिए जाँच के आदेश दिए हैं।

नरियांव स्थित योगीराज देवरहा बाबा के तपोभूमि के विकास के लिए काफी दिनों से जन प्रतिनिधि प्रयास कर रहे थे। बासगांव के सांसद कमलेश पासवान पर केंद्र सरकार ने धन मुहैया कराया, जिसके बाद कार्य शुरू हो गया है। बाबा की तपोभूमि पर स्थित काष्ट मंच के पास पर्यटन मंत्रालय केंद्र सरकार द्वारा स्वदेश दर्शन योजना के अंतर्गत एक करोड़ तिरपन लाख रुपये से सुंदरीकरण का कार्य शुरू हो गया। कार्यदायी संस्था को शीघ्र कार्य पूरा करने का निर्देश प्रशासन ने दे रखा है। यहां पर 500 वर्ग मीटर का एक शानदार हाल, 320 वर्ग मीटर का फ्लोर बनेगा जो लाल रंग का होगा, इंटर लाक, रंगीन रोड, 12 सोलर लाईट, एक हाईमास्ट लैंप, 15 आरसीसी बैच सहित मेन गेट का निर्माण हो रहा है।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम – सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।वॉट्सप नं.+919412300183)

क्यों जरुरी है एसआईआरः इससे जुड़ी हर जानकारी

चुनाव आयोग ने

SIR = Special Intensive Revision — यानी मतदाता सूची (voter-list/electoral roll) का “विशेष गहन पुनरीकरण / संशोधन”। की प्रक्रिया क्या शुरु की पूरे देश में इसको लेकर वबाव मचा हुआ है।  इस प्रक्रिया के तहत मौजूदा मतदाता सूची की पूरी समीक्षा की जाती है — फर्जी नाम, मृतक या पलायनित मतदाता, दोहरे/duplicate मतदाता, पता-गलतियाँ आदि जांची जाती हैं। इसका उद्देश्य है कि वोटर लिस्ट पूरी तरह “शुद्ध, त्रुटिहीन और भरोसेमंद” बने, ताकि चुनाव निष्पक्ष हो सकें।

SIR प्रक्रिया — कैसे होती है?

स्थानीय स्तर पर “बूथ-लेवल अधिकारी” (BLO) को जिम्मेदारी दी जाती है — वे घर-घर जाकर हर मतदाता की जानकारी जांचते हैं।

मतदाता को एक “एन्यूमरेशन / फॉर्म” (registration/verification form) भरना होता है — इसमें नाम, पता, अन्य विवरण आदि शामिल होते हैं।

यदि मतदाता सूची में सुधार, जोड़-घट या पुनः सत्यापन (verification) की जरूरत होती है — तो यह SIR में की जाती है।

SIR के दौरान मतदाता रोल “फ्रीज़” (freeze) कर दिया जाता है — अर्थात् पहले से वैध मतदाताओं को रखा जाए, और संशोधन/जोड़-घट एक तय प्रक्रिया से हो।

SIR के बाद संशोधित / नया ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होती है, और फिर यदि कोई आपत्ति (objection) या दावा (claim) हो, तो उसे देखा जाता है। ऐसा सुनिश्चित करना कि कोई पात्र मतदाता वंचित न हो।

SIR — अब क्यों और कब?

2025 में, चुनाव आयोग ने कई राज्यों में SIR (दूसरा चरण) चलाने की घोषणा की है।

आयोग का कहना है कि 2002–2004 के बाद से व्यापक पुनरीक्षण नहीं हुआ था — इसलिए अब देशभर में मतदाता सूची को “गहन रूप से अपडेट” करना जरूरी है।

SIR उन राज्यों में प्राथमिकता से लागू हो रहा है जहाँ निकट भविष्य में विधानसभा / अन्य चुनाव होना है।

SIR के फायदे (उद्देश्य)

फर्जी, मृत या डुप्लीकेट मतदाताओं की पहचान कर उन्हें सूची से हटाना — जिससे वोटिंग प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़े।

वर्तमान और सही वोटर सूची — वास्तव में वोट देने वाले योग्य मतदाता ही वोट कर सकें।

मतदाता-पात्रता, पता, नाम, विवरण आदि अपडेट करने का अवसर — जिससे सीधी लोकतांत्रिक भागीदारी सुनिश्चित हो।

हर चुनाव से पहले सूची को अपडेट करके चुनाव का निष्पक्ष आधार तैयार करना।

SIR से जुड़ी चुनौतियाँ — विवाद और आलोचनाएँ

हालाँकि SIR का उद्देश्य स्पष्ट है, पर इसे लेकर कई विवाद भी सामने आए हैं:  कुछ विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR प्रक्रिया का इस्तेमाल “वोटर कटौती” (voter purging) या “मतदाता वंचित करना” (voter disenfranchisement) के लिए हो सकता है।

कुछ राज्यों/पार्टियों ने SIR पर ऐतराज़ जताया है — कि इतनी जल्दी और व्यापक संशोधन लोकतंत्र की भावना के खिलाफ हो सकती है।

Supreme Court of India (SC) समेत न्यायालयों में याचिकाएँ हुई हैं — जिनमें सवाल उठाए गए हैं कि SIR प्रक्रिया, उसकी वैधता और मानदंड कितने उचित हैं।

आयोग ने स्पष्ट किया कि सिर्फ पहचान के लिए उपयोग किया जाएगा; किसी भी तरह का नागरिकता, जन्मतिथि या निजी जानकारी के आधार पर वोटर सूची से हटाना नहीं किया जाएगा — लेकिन आलोचक इस दावे पर संदेह करते हैं।

निष्कर्ष — SIR क्यों अहम है?

SIR, यदि ठीक तरीके से और पारदर्शिता के साथ किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती और चुनावों की विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद कर सकता है। यह मतदाता सूची को “साफ़-सुथरी, अप-टू-डेट और भरोसेमंद” बनाता है — जिससे हर योग्य नागरिक अपना वोट डाल सके और फर्जी वोटों / दुरुपयोगों की संभावना कम हो। लेकिन, इसके साथ ही यह बेहद संवेदनशील प्रक्रिया है। यदि इसे जल्दबाजी में, बिना पर्याप्त वैरिफिकेशन या पारदर्शिता के लागू किया जाए, तो वास्तविक मतदाता वंचित हो सकते हैं।

मतदाता के रूप में — आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिएः

अगर आप उन राज्यों/UTs में रहते हैं जहाँ SIR हो रहा है (जैसे आप तिरुवल्लुर, तमिलनाडु से हैं) — तो निम्न बातों पर विशेष ध्यान दें:

फॉर्म भरना / सत्यापन करना: अगर आपके घर में कोई फॉर्म/BLO आया हो, उसे सही-सही भरें। पता, नाम, उम्र, परिवार आदि विवरण ठीक से दें।

ड्राफ्ट सूची देखना: 16 दिसंबर के बाद प्रकाशित ड्राफ्ट वोटर लिस्ट देखें — अपना या परिवार का नाम है या नहीं, पता सही है या नहीं।

दावा / आपत्ति दाखिल करना: अगर नाम गलत है, गायब है, या पता गलत है — तो Claims/Objections की अवधि (16 दिसंबर – 15 जनवरी) में ठीक से आवेदन करें।

दस्तावेज तैयार रखें: पहचान, निवास, उम्र आदि के दस्तावेज तैयार रखें — क्योंकि अगर किसी को नए नाम जोड़ने या सत्यापन की मांग होगी, तो दस्तावेज दिखाने पड़ सकते हैं।

समय-सीमा का ध्यान रखें: फॉर्म भरने, आपत्ति देने आदि की अंतिम तिथि याद रखें — ताकि आपका नाम फाइनल सूची में शामिल हो सके।

नयी सूची (final roll) मिलने पर चेक करें: 14 फरवरी 2026 को फाइनल रोल जब निकले, तो देखें कि आपका नाम सही है। अगर नहीं — तो स्थानीय ERO / BLO से संपर्क करें।

मताधिकार न छूटा रहे: यदि आप पात्र हैं (18 साल या अधिक, वहां के निवासी), तो सुनिश्चित करें कि आप SIR प्रक्रिया में सक्रिय रहें — ताकि चुनाव में आपका वोट सुरक्षित रहे।

क्यों ये आपके लिए महत्वपूर्ण है

इस SIR से मतदाता सूची को पूरी तरह अप-टू-डेट, सटीक और विश्वसनीय बनाया जा रहा है — जिससे फर्जी या डुप्लीकेट वोटर हटेंगे और सिर्फ योग्य मतदाता ही वोट देने पाएँगे।

एक आम नागरिक के रूप में — अगर आप सक्रिय न रहें, फॉर्म न भरें या आपत्ति न दें — तो आपका वोट निकल सकता है। इसी वजह से हर योग्य व्यक्ति को सशक्त बनाना और शामिल करना SIR का मकसद है।

चार श्रम संहिताओं से भारत में रोजगार के लाखों अवसर निर्मित होंगे

दिनांक 21 नवम्बर 2025 से भारत में चार श्रम संहिताओं (वेतन संहिता 2019, औद्योगिक सम्बंध संहिता 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 एवं व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्त संहिता, 2020) को लागू कर दिया गया है। इन चार श्रम संहिताओं के माध्यम से भारत में पूर्व में लागू 29 श्रम कानूनों को आसान और कारगर बनाए जाने का प्रशंसनीय प्रयास केंद्र सरकार द्वारा किया गया है। उक्त चार श्रम संहिताओं का लागू किया जाना भारत के श्रमबल के लिए उचित वेतन, श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा, उनकी रक्षा एवं उनके बेहतर कल्याण के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव की शुरुआत भी माना जा रहा है। इससे भारत में मजबूत उद्योग की नींव रखी जाकर रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित किए जा सकेंगे। इन चार श्रम संहिताओं के माध्यम से भारत के श्रमिकों को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने का प्रयास भी किया जाएगा एवं उनके लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सकेगा जो अंततः भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में सहायक होगा।

भारत में अभी तक लागू 29 श्रम कानूनों में से कुछ तो देश की आजादी से पूर्व एवं आजादी के तुरंत बाद के खंडकाल (वर्ष 1930 से 1950 के बीच) में बनाए गए थे। विश्व के अन्य देशों में पुराने श्रम कानूनों में पर्याप्त बदलाव कर वैश्विक स्तर पर हुए आर्थिक बदलावों के अनुरूप बनाकर नए श्रम कानूनों को लागू किए हुए एक अरसा हो चुका है परंतु भारत में अभी भी 29 केंद्रीय श्रम कानूनों का अनुपालन किया जा रहा था, जो अपने आप में बिखरे हुए हैं, पेचीदा हैं, एवं अति पुराने नियमों के अंतर्गत चलायमान रहे हैं, इससे अंततः भारत में इतने लम्बे समय तक, आजादी के 75 वर्षों के बाद भी, श्रमिकों के साथ अन्याय किया जाता रहा है। इससे भारत में औद्योगिक प्रगति भी एक तरह से बाधित ही होती रही है और आर्थिक प्रगति को भी कहीं न कहीं विपरीत रूप से प्रभावित करती रही है। उक्त चार श्रम सहिताओं को लागू करने के बाद औपनिवेशिक सोच को पीछे छोड़कर नए भारत की नींव रखने का प्रयास किय जा रहा है। साथ ही, आधुनिक वैश्विक प्रवाह  के साथ तालमेल बिठाने की लंबे समय से चली आ रही जरूरत को पूरा किया जा रहा है। उक्त चार संहिताएं मिलकर मजदूरों और कंपनियों दोनों को मजबूत बनाएंगे एवं एक ऐसा श्रमबल तैयार करेंगे जो सुरक्षित, उत्पादक और काम की बदलती हुई दुनिया के साथ तालमेल बिठाएंगे, इससे भारत को अधिक मजबूत, प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता साफ होगा।

भारतीय स्टेट बैंक द्वारा जारी एक अनुसंधान प्रतिवेदन में बताया गया है कि भारत में उक्त चार श्रम सहिताओं को लागू करने के बाद बेरोजगारी की दर में कमी होगी, रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे, बढ़ी संख्या में अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रहा श्रमबल औपचारिक क्षेत्र में हस्तांतरित होगा और इससे उनकी मजदूरी की दर में वृद्धि होगी, श्रमिकों की बचत की क्षमता में वृद्धि होगी एवं उनकी खर्च करने की क्षमता भी बढ़ेगी। इससे कुल मिलाकर देश में विभिन्न उत्पादों की मांग में वृद्धि दर्ज होगी। उक्त अनुसंधान प्रतिवेदन के अनुसार, वर्तमान में, भारत में लगभग 44 करोड़ श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, इनमें से 31 करोड़ श्रमिक भारत के ई-श्रम पोर्टल पर रजिस्टर्ड हैं। उक्त श्रमिकों में से यदि केवल 20 प्रतिशत श्रमिक ही अनौपचारिक क्षेत्र से औपचारिक क्षेत्र में हस्तांतरित हो जाएं तो लगभग 10 करोड़ श्रमिक औपचारिक क्षेत्र में बढ़ जाएंगे, जिससे उन्हें बढ़ी हुई दर से मजदूरी एवं सेवा निवृत्ति के समस्त लाभ मिलना प्रारम्भ हो जाएंगे। इससे अंततः भारत में कुल कार्यरत श्रमिकों में से 80-85 प्रतिशत श्रमिक भारत की सामाजिक सुरक्षा योजना में शामिल हो जाएंगे। एक अन्य अनुसंधान प्रतिवेदन के अनुसार, आज भारत में कुल श्रमिकों का लगभग 60.4 प्रतिशत भाग औपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रहा है, उक्त वर्णित चार श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद अनौपचारिक क्षेत्र में से लगभग 15.1 प्रतिशत भाग औपचारिक क्षेत्र में शामिल हो जाने वाला है। इस प्रकार, औपचारिक क्षेत्र में कार्य करने वाले श्रमबल की संख्या बढ़कर 75.5 प्रतिशत हो जाएगी।

भारतीय स्टेट बैंक के उक्त वर्णित अनुसंधान प्रतिवेदन के अनुसार, भारत में चार श्रम संहिताओं को लागू करने के बाद आगे आने वाले समय में बेरोजगारी की दर में भी लगभग 1.3 प्रतिशत तक की कमी दर्ज हो सकती है क्योंकि देश में रोजगार के लगभग 77 लाख नए अवसर निर्मित होने की सम्भावना व्यक्त की गई है। इससे, कार्य कर सकने वाली उम्र के श्रमिकों की संख्या भी 60.1 प्रतिशत से बढ़कर 70.7 प्रतिशत तक पहुंचने की सम्भावना है। श्रमिकों के अनौपचारिक क्षेत्र से औपचारिक क्षेत्र में हस्तांतरित होने के कारण श्रमिकों की उपभोग क्षमता में भी वृद्धि की सम्भावना व्यक्त की गई है। इस संदर्भ किए गए अनुसंधान के अनुसार, प्रत्येक श्रमिक की प्रतिदिन लगभग 66 रुपए की अतिरिक्त खर्च करने की क्षमता में वृद्धि दर्ज होगी और इससे कुल मिलाकर पूरे देश में लगभग 75,000 करोड़ रुपए की विभिन्न उत्पादों की अतिरिक्त मांग निर्मित होगी।

भारत में लागू की गई चार श्रम संहिताओं के बाद समस्त कामगारों को नियुक्ति पत्र प्रदान करना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि श्रमिकों को औपचारिक क्षेत्र में मिलने वाले समस्त लाभ मिल सकें। साथ ही, रोजगार के सम्बंध में लिखित में सबूत उत्पन्न होने से पारदर्शिता तथा श्रमिकों को रोजगार की गारंटी एवं पक्का रोजगार उपलब्ध होगा। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के अंतर्गत गिग एवं प्लेटफार्म श्रमिकों सहित समस्त कामगारों को सामाजिक सुरक्षा के लाभ उपलब्ध होंगे।

सभी कामगारों को पीएफ, ईएसआईसी, बीमा और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ मिलने प्रारम्भ होंगे। वर्तमान में श्रमिकों का एक बड़ा वर्ग न्यूनतम मजदूरी की सीमा से बाहर रखा जा रहा था क्योंकि न्यूनतम मजदूरी केवल अधिसूचित उद्योगों/रोजगार पर ही लागू थी। परंतु, अब वेतन संहिता, 2019 के अंतर्गत, समस्त कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन भुगतान पाने का कानूनी अधिकार प्रदान कर दिया गया है। न्यूनतम मजदूरी एवं समय पर वेतन के भुगतान से श्रमिकों की वित्तीय सुरक्षा को बेहतर किया जा सकेगा। साथ ही, अब नियोक्ताओं के लिए 40 वर्ष से अधिक की आयु के समस्त कर्मचारियों की मुफ्त स्वास्थ्य जांच कराना आवश्यक कर दिया गया है। समय पर निवारक स्वास्थ्य सेवा संस्कृति को विकसित किया जाना ही चाहिए। महिला कार्यबल को सभी स्थानों पर समस्त प्रकार के काम करने की इजाजत दे दी गई है, लेकिन इसके लिए सबंधित मातृशक्ति की सहमति होना अनिवार्य किया गया है एवं मातृशक्ति के आवश्यक सुरक्षा उपाय भी किए जाना आवश्यक होगा। साथ ही, कई प्रकार के आर्थिक लाभ भी औपचारिक क्षेत्र में शामिल होने वाले श्रमिकों को प्रदान किए गए हैं।

आज भारतीय अर्थव्यवस्था, पूरे विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच, सबसे तेज गति से आगे बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बन गई है और भारत आज प्रयासरत है कि देश में बड़े आकार के उद्योगों का जाल फैले ताकि भारत के विकास में उद्योग क्षेत्र का योगदान भी बढ़े। उद्योग क्षेत्र में सामान्यतः श्रमिकों का शोषण किए जाने की कई घटनाएं सामने आती रही हैं। अतः श्रमिकों के हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से एवं देश में उद्योग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उक्त चार श्रम संहिताओं को लागू किया गया है। भारत के श्रमिकों को आज वैश्विक स्तर पर इस संदर्भ में लागू मानदंडो पर अपने आप को खरा उतारना होगा। इसके बाद ही भारत में निर्मित उत्पाद विश्व के अन्य देशों में निर्मित उत्पादों से प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे। कुल मिलाकर भारतीय उद्योग को वैश्विक स्तर पर ले जाने में श्रमिकों की अहम भूमिका रहने वाली है अतः उनके हितों की देखरेख भी उचित तरीके से किया जाना आवश्यक है। चार श्रम संहिताएं इस दृष्टि से अपनी सार्थक भूमिका निभाएंगी, ऐसी उम्मीद की जा रही है।

हालांकि पिछले दशक में, भारत में सामाजिक सुरक्षा कवरेज का व्‍यापक विस्तार किया गया है, इससे सामाजिक सुरक्षा योजना में शामिल कार्यबल की संख्या वर्ष 2015 के लगभग 19 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष  2025 में 64 प्रतिशत से अधिक हो गई है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया गया है कि देश भर के श्रमिकों को सुरक्षा और सम्मान मिले और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में प्राप्त की गई उक्त बड़ी उपलब्धि के लिए भारत ने वैश्विक स्तर पर मान्यता भी अर्जित की है। चार श्रम संहिताओं का कार्यान्वयन इस व्‍यापक बदलाव में अगला बड़ा कदम है, जो सामाजिक सुरक्षा की प्रणाली को और सशक्‍त करता है और राज्यों तथा सेक्‍टरों तक विभिन्‍न लाभों को पहुंचाता है। विस्तारित सामाजिक सुरक्षा, मजबूत सुरक्षा और अधिकारों की राष्ट्रव्यापी पोर्टेबिलिटी के साथ, संहिता श्रमिकों, विशेष रूप से महिलाओं, युवाओं, असंगठित, गिग और प्रवासी श्रमिकों को श्रम शासन के केंद्र में मजबूती से रखती है। अनुपालन के बोझ को कम करके और लचीली, आधुनिक कार्य प्रणाली को सक्षम करके, यह संहिता रोजगार, कौशल और उद्योग विकास को बढ़ावा देती है और एक श्रमिक समर्थक, महिला समर्थक, युवा समर्थक और रोजगार समर्थक श्रम-इकोसिस्‍टम की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता की पुष्टि करती है।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940

ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

संचार साथी ऐपः आपका दुश्मन नहीं दोस्त है

भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में एक विचित्र प्रवृत्ति विकसित होती दिख रही है, जहाँ सत्ता द्वारा उठाए गए प्रत्येक कदम को विपक्ष संदेह की दृष्टि से देखता है। संचार साथी ऐप को लेकर इन दिनों इसी प्रकार का विवाद एवं विरोध का वातावरण बना हुआ है। केंद्र सरकार की यह सोच कि हर नए स्मार्टफोन में इस ऐप को अनिवार्य किया जाए, विपक्ष ने इसे निजता एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताते हुए कठोर शब्दों में चुनौती दी और संसद के शीतकालीन सत्र में इसे बड़ा मुद्दा बना दिया है और इससे व्यक्ति के जीवन में सरकारी हस्तक्षेप बढने की आशंकाएं व्यक्त की है। विपक्ष ने इसे संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण व नागरिकों की निगरानी करने वाला टूल बताया। इस बहस के बीच विपक्ष को नया मुद्दा मिलते देख केंद्र सरकार ने अनिवार्य तौर पर ऐप प्री-इंस्टॉल करने का अपना फैसला वापस ले लिया। ़सरकार ने स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए फिलहाल इसे स्वैच्छिक बना दिया है अर्थात जो चाहे ऐप को रखे, जो चाहे उसे हटाए। परंतु इस विवाद ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठा दिया है कि क्या हम केवल विरोध की राजनीति में वास्तविक चुनौतियों और आवश्यकताओं को भुला रहे हैं?
वास्तविकता यह है कि डिजिटल युग आज अवसरों के साथ-साथ अभूतपूर्व संकटों का भी युग है। साइबर अपराध, चोरी, जासूसी, डेटा हेरफेर, गलत सूचना, आतंकवादी नेटवर्किंग-इन सबने सुरक्षा की चुनौतियों का नया स्वरूप निर्मित किया है। संयुक्त राष्ट्र तक यह स्वीकार कर चुका है कि अगला विश्वयुद्ध यदि हुआ, तो वह साइबर मोर्चे पर भी लड़ा जाएगा। ऐसे समय में क्या किसी राष्ट्र की सरकार को निष्क्रिय खड़ा रहना चाहिए? निश्चित रूप से नहीं। इसलिए संचार साथी ऐप मात्र निगरानी का यंत्र नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिक संरक्षण एवं डिजिटल अपराध नियंत्रण की रणनीतिक आवश्यकता के रूप में उभरा है। सरकार का सही कहना था कि डिजिटल होती दुनिया में लगातार बढ़ते साइबर अपराधों से नागरिकों को सुरक्षा देने के मकसद से यह पहल की गई थी। उसका कहना था कि लगातार जटिल होते साइबर अपराधों पर अंकुश लगाने के लिये ऐसी पहल अपरिहार्य है।
विपक्ष का विरोध इसलिए भी एकांगी है क्योंकि केवल यह निजता के सवाल पर केंद्रित है। परंतु निजता का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित, पूर्ण स्वतंत्र नहीं, बल्कि परिस्थितिनिष्ठ है। लोकतंत्र व्यक्ति को अधिकार देता है, साथ ही साझा सुरक्षा की जिम्मेदारी भी मांगता है। जब डिजिटल मंचों पर राष्ट्रीय अखंडता, आर्थिक व्यवस्था, सामरिक रहस्य और सामाजिक शांति पर संकट मंडराते हों, तो सरकार को हस्तक्षेप करना नैतिक रूप से उचित ही नहीं, बल्कि आवश्यक हो जाता है। अमेरिका, चीन, जर्मनी, ब्रिटेन-सभी देशों के पास निगरानी आधारित साइबर सुरक्षा प्रणालियाँ हैं। क्या उनकी लोकतांत्रिक संरचनाएँ इस कारण क्षीण हो गईं? नहीं, क्योंकि निगरानी और सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित किया गया।
भारत को भी इसी संतुलन की आवश्यकता है। यह सही है कि किसी भी डिजिटल ऐप में निगरानी का वहनीय स्वरूप रखना चाहिए, जिससे नागरिक की व्यक्तिगत जिंदगी पर अनावश्यक हस्तक्षेप न हो। सरकार ने भी यही स्पष्ट किया है कि संचार साथी नागरिक के निजी जीवन में दखल नहीं देना चाहता, बल्कि उसे साइबर अपराध, हैकिंग, धोखाधड़ी, फर्जीवाड़ा, एवं डिजिटल आतंकवाद से बचाने हेतु काम करेगा। विडंबना यह है कि विपक्ष इस ऐप को ‘निष्ठा परीक्षण’, ‘मनोवैज्ञानिक निगरानी’ और ‘गोपनीयता हनन’ का उपकरण बताकर भय पैदा कर रहा है, जबकि पूर्व में स्वयं उनकी सरकारें समान तंत्र विकसित कर चुकी हैं, चाहे वह आधार डेटा सुरक्षा हो, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल हों या राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के निगरानी प्रोटोकॉल।
सवाल यह है कि यदि अपराधी, आतंकवादी, अलगाववादी, साइबर गैंग्स संगठित डिजिटल हथियारों का उपयोग कर रहे हैं, तो क्या सामान्य नागरिकों को असुरक्षित छोड़ दिया जाए? क्या यह लोकतंत्र का तकाज़ा है कि सरकार देखती रहे और समाज अपराध की प्रयोगशाला बन जाए? वास्तव में यह संकट केवल भारत का नहीं, विश्व का है। आज की दुनिया में जो राष्ट्र डिजिटल नियंत्रण तंत्र विकसित नहीं करता, उसकी सुरक्षा दीवारें कागज़ की नाव जैसी सिद्ध होती हैं। इसलिए यह कहना कि संचार साथी ऐप अनावश्यक या दमनकारी है, वस्तुस्थिति से आंखें मूंद लेने जैसा है। निश्चित रूप से एक सवाल उठता है, क्या ऐप डेटा सुरक्षा की गारंटी देगा? यह बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न है। सरकार को इस ऐप के उद्देश्य और डाटा संचालन नीति को पारदर्शी रूप में सार्वजनिक करना चाहिए। यदि इस पर स्वतंत्र ऑडिट हो, निजता सुरक्षा प्रावधान हों, दुरुपयोग को रोकने वाली न्यायिक निगरानी हो तो विरोध स्वतः समाप्त हो जाएगा। परंतु विपक्ष का विरोध नीतिगत सुधारों की दिशा में न होकर केवल राजनीतिक अवसरवाद प्रतीत होता है। यह भी सही है कि नागरिकों की चिंताएँ निराधार नहीं, भारत में डेटा सुरक्षा कानून अभी भी परिपक्व नहीं है, डिजिटल संरचनाएँ जवाबदेही की दृष्टि से मजबूत नहीं हैं। अतः संचार साथी के विकास के साथ-साथ देश में निजता सुरक्षा कानूनों को और अधिक कठोर, दंडात्मक एवं न्यायिक रूप से संरक्षित बनाने की आवश्यकता है।
यदि इस ऐप के कार्यों पर दृष्टि डालें तो उसके पीछे सोच यह है कि मोबाइल संचार के माध्यम से होने वाले अपराधों की पहचान, रिपोर्टिंग और ट्रैकिंग को व्यवस्थित किया जा सके। यह व्यक्ति की निगरानी का उपकरण कम और अपराध नियंत्रण की प्रणाली अधिक है। भारत में साइबर अपराधों में प्रति वर्ष 63 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की जा रही है, लाखों लोग ऑनलाइन धोखाधड़ी के शिकार बन रहे हैं, बैंकिंग ठगी से लेकर सोशल मीडिया मनोवैज्ञानिक अपराधों तक का दायरा बढ़ रहा है। क्या सरकार की चुप्पी इन अपराधियों को खुला मैदान नहीं दे देती? इसलिए संचार साथी जैसे कदमों का उद्देश्य नागरिक सुरक्षा का विस्तार है, न कि लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का संकुचन।
कठोर सत्य यह है कि राष्ट्र केवल अधिकारों पर आधारित नहीं होते, जिम्मेदारियों और सुरक्षा तंत्रों पर भी टिके होते हैं। एक नागरिक के रूप में हम यह अपेक्षा करते हैं कि हमारा डेटा सुरक्षित हो, हमारा पैसा सुरक्षित हो, हमारा देश सुरक्षित हो परंतु जब सुरक्षा के लिए कदम उठाया जाए, तो हम विरोध में खड़े हो जाते हैं। यह राजनीतिक अधिक है, जहाँ हम एक विश्वव्यापी सिद्धांत को भूल जाते हैं कि “स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ ही टिक सकती है।” इसलिए संचार साथी ऐप पर संतुलित दृष्टि ही सार्थक है। सरकार को उसकी संरचना पारदर्शी, उत्तरदायी और कानून नियंत्रित रखनी चाहिए, और विपक्ष को इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि डिजिटल भारत की सुरक्षा चुनौतियाँ केवल नारे से हल नहीं होंगी, बल्कि तकनीकी सुरक्षा तंत्रों से ही नियंत्रण संभव होगा। लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, परंतु रचनात्मक आलोचना, जिसमें सुधार की मांग होती है, न कि केवल अस्वीकरण। यदि राजनीतिक वर्ग इस बहस को इसी दिशा में ले जाए, तो संचार साथी ऐप न केवल विवादित विषय रहेगा बल्कि डिजिटल सुरक्षा के लिए नागरिक-हितकारी उपकरण के रूप में स्थापित भी होगा।
निस्संदेह, आज के डिजिटल युग में व्यक्ति का डेटा बेहद महत्वपूर्ण है। जिसकी हर कीमत पर सुरक्षा की जानी चाहिए। वहीं इसके साथ ही इस बात की भी पड़ताल होनी चाहिए कि कहीं कुछ अन्य ऐप हमारे डेटा में तो सेंध नहीं लगा रहे हैं? सरकार को इससे उपभोक्ता की सुरक्षा करनी होगी। वहीं तर्क दिया जा रहा है कि संचार साथी ऐप को अनिवार्य करने के बजाय आम लोगों को नई तकनीक और इसके इस्तेमाल के लिये सतर्क करने को देशव्यापी जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। साथ ही इसके लिये आम जनता को प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए। जिससे तकनीक के जरिये साइबर अपराधियों पर अंकुश लगाने की मुहिम को गति दी जा सके। अंततः यह समझना होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और निजता-दोनों अनिवार्य हैं। चुनौती इन्हें संतुलित करने की है, न कि किसी एक को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की। यदि यह संतुलन नीति, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ बने, तो संचार साथी ऐप देश के डिजिटल भविष्य की सुरक्षा का सेतु बन सकता है। विरोध की राजनीति नहीं, समझ और समाधान की राजनीति आज की आवश्यकता है, यही इस ऐप की वास्तविकता और उपयोगिता को समझने की दिशा है।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

उत्तरी/आगरा मंडल की यात्राऔर पुरातत्व पुस्तकालय की स्थापना

“उत्तर-पश्चिमी प्रांत” का तात्पर्य ब्रिटिश भारत में एक ऐतिहासिक प्रशासनिक क्षेत्र या उत्तर-पश्चिमी भारत के आधुनिक भौगोलिक क्षेत्र सेहो सकता है । ऐतिहासिक रूप से, यह ब्रिटिश भारत का एक प्रशासनिक प्रभाग था जो 1836 से 1902 तक अस्तित्व में था और इसमें आधुनिक उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से और अन्य क्षेत्र शामिल थे। आजकल, इस शब्द का प्रयोग प्रायः भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र का वर्णन करने के लिए किया जाता है, जिसमें पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्य, तथा दिल्ली, जम्मू और कश्मीर और लद्दाख जैसे केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं। 1836 में स्थापित, इसे बाद में 1858 में अवध में मिला दिया गया और इसका नाम बदलकर उत्तर-पश्चिमी प्रांत और अवधकर दिया गया ।

1858 तक इसकी राजधानी आगरा थी, उसके बाद यह इलाहाबाद बन गयी। 1902 में प्रांत का पुनर्गठन किया गया और इसे आगरा और अवध का संयुक्त प्रांत बना दिया गया । मूल प्रांत में आधुनिक उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल थे और बाद में इसका विस्तार कर इसमें दिल्ली क्षेत्र (1858 तक) और अन्य क्षेत्र भी शामिल कर दिए गए। इसमें पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं। यह क्षेत्र अपनी विविध भौगोलिक स्थिति, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत तथा भारत की जनसंख्या के एक बड़े भाग के निवास के लिए जाना जाता है, तथा हिमालय इस भौगोलिक क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा है।

पुरातत्व संस्कृति संग्रहालय और खोज का  कार्य पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग कर रहा था।   पहले इसका मुख्यालय लखनऊ था।  आगरा में मुस्मिल स्मारकों के बहुलता के कारण इस मण्डल का मुख्यालय सितम्बर 1903 में लखनऊ से हटाकर आगरा बनाया गया। अधीक्षक का एक पद लाहौर मे पदास्थापित कर दिया गया। उसका मुख्यालय लाहौर बनाया गया।

उत्तरी/आगरा मंडल की यात्रा वृतांत
यूनाइटेड प्राविंस आफ आगरा एण्ड अवध तथा पंजाब सर्किल का मुख्यालय आगरा हो ही गया था। प्रधान नक्शानवीस मुंशी गुलाम रसूल बेग के पास इस मण्डल का प्रभार आया जो 4 दिसम्बर 1903 तक पुरातत्व सर्वेक्षक कार्यालय के प्रभारी रहे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक ने डबलू एच निकोलस को 7 मार्च 1904 को आगरा के सर्वेक्षक का प्रभार लेने के लिए महानिदेशक कार्यालय कार्यमुक्त किया। इस अवधि में यूनाइटेड प्राविंस पंजाब का प्रभार महानिदेशक के पास रहा। 1904 -05 तक अकालाजिकल सर्वेयर यूनाइटेड प्राविंस  एवं पंजाब का पद नाम मिलता है। इस क्षेत्र को 1905-06 में उत्तरी नार्दन सर्किल के रुप में जाना जाने लगा। अब तक डबलू एच निकोलस यहां पर सर्वेयर पद पर बना रहा।

1905-06 से उत्तरी मंडल में पुस्तकालय की स्थापना हेतु पुस्तकों का क्रय किया जाना शुरु हो गया था। 1905-10 तक यह भूभाग नार्दन सर्किल उत्तरी मंडल के रुप में प्रयुक्त होता रहा है। 1905-06 से 1910-11 तक यूनाइटेड प्राविंस एवं पंजाब का भूभाग नार्दन सर्कल के रुप में प्रयुक्त होता रहा। अभी तक मण्डल प्रमुख को आर्कालाजिकल सर्वेयर के रुप में जाना जाता था। 1911 की एनुवल प्रोगे्रस रिपोर्ट में आर्कालाजिकल सर्वेयर के साथ साथ सुप्रिन्टेन्डेन्ट का पद भी प्रयुक्त होने लगा। गार्डन सैण्डर्सन उत्तरी मंडल का अन्तिम सर्वेयर तथा प्रथम सुप्रिन्टेन्डेन्ट रहा। पुरातत्व सर्वेयर टक्कर साहब नें 1 जुलाई 1908 में कैन्ट के आपरेशन के दौरान एक पखवाड़े के अल्प समय के नोटिस पर आये उन्हें सिविल लाइन्स में दूसरा कार्यालय भवन खोजना था। उन्हे  एक अन्य मकान हेतु 55 रुपये प्रति माह किराये की और स्वीकृति लेनी पड़ी। यद्यपि 1908 में सिविल लाइन्स में दूसरा किराये का मकान मिल गया था। एक तरफ सर्वेयर का पद नाम बदलकर 1911 में सुप्रिन्टेन्डेन्ट हो गया दूसरी ओर स्मारकों के प्रकृति के आधार पर वर्गीकरण करके दो पृथक पृथक मण्डल बनाये गये। लाहौर मुख्यालय बनाते हुए नार्दन सर्किल का हिन्दू बोद्धिस्ट मोनोमेंट एक पृथक सर्किल बनाया गया।

मुस्लिम एण्ड ब्रिटिस मोनोमेंट आगरा
आगरा स्थित पुराना नार्दन सर्किल अब मुस्लिम एण्ड ब्रिटिस मोनोमेंट का मुख्यालय बन गया। वर्तमान 22 मालरोड भवन में कार्यरत रहा। पहले यह भवन किराये पर रहा और 1922 में उसे स्थाई रुप से क्रय करके भारत सरकार ने इसे अपना लिया।

आगरा मंडल, जिसे पहले उत्तरी मंडल कहा जाता था, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सबसे पुराने मंडलों में से एक है। इसकी प्रथम बार स्थापना 1885 में हुई थी और इसका मुख्यालय 22, द मॉल, आगरा में है।

प्रमुख अधिकारी
आर. फ्राउड टकर, एम. मुहम्मद शुऐब, गॉर्डन सैंडरसन, एच. हरग्रीव्स, जेएफ ब्लैकिस्टन, जेए पेज, मौलवी जफर हसन, एमएस वत्स, केएन पुरी, बीबी लाल, एससी चंद्रा, एसआर राव, एनआर बनर्जी, वाईडी शर्मा, डीआर पाटिल, डब्ल्यूएच सिद्दीकी शंकर नाथ, पी बी एस सेंगर, ए आर सिद्दीकी, इंदुधर द्विवेदी धर्म बीर शर्मा , के के मुहम्मद, डी दयालन, डी एन डिमरी, एन के पाठक, भुवन विक्रम, वसन्त कुमार स्वर्णकार, एम आर के पटेल डॉ. स्मिता एस कुमार और अन्य विद्वानों जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने इस मंडल का नेतृत्व किया है।

24 जिला 265 स्मारकों वाले मण्डल में      9 जिला 155 स्मारक रह गए।
2003 तक  आगरा मण्डल उत्तर प्रदेश के 24 जिलों में स्थित 265 स्मारकों पुरास्थलों की देखभाल कर रहा था । उक्त कार्य के सफल संचालन हेतु ताजमहल, आगरा किला, एतमाद-उद-दौला, सिकन्दरा, फतेहपुर सीकरी, मथुरा, मेरठ एवं कन्नौज मण्डलों की स्थापना की गई थी।  वर्तमान समय में आगरा मंडल के अधिकार क्षेत्र में 155 स्मारक/स्थल हैं जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 9 जिलों में फैले हुए हैं, जिनमें तीन विश्व धरोहर स्मारक जैसे ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी शामिल हैं, जो सभी मुगल काल के हैं और आगरा जिले में स्थित हैं। मंडल अपने 8 उप-मंडलों के माध्यम से स्मारकों और स्थलों का संरक्षण और प्रबंधन कर रहा है ताजमहल, आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, सिकंदरा, इत्मादुद्दौला, मथुरा और एटा।

कभी पश्चिम उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के स्मारक इसी कार्यालय के अधीन थे। बाद में उत्तराखंड का नियंत्रण देहरादून मंडल से और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के स्मारकों का नियंत्रण मेरठ मंडल से होने लगा है। देहरादून मंडल, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का एक नया मंडल है जो 16 जून 2003 को अस्तित्व में आया था। इसका गठन आगरा सर्कल से विभाजन के बाद नए राज्य (उत्तराखंड) के स्मारकों के बेहतर रखरखाव के लिए किया गया था। देहरादून मंडल में 42 स्मारक हैं और यह मंडल उत्तराखंड के सभी 13 जिलों को कवर करता है।

28 अगस्त 2020 की अधिसूचना के आधार पर आगरा मंडल के उत्तरी हिस्से को काटकर मेरठ मंडल बनाया गया।मेरठ सर्किल में कुल 16 जिले शामिल किए गए हैं। जिन्हें पांच सब सर्किल में बांटा गया है। मेरठ पुरातत्व मंडल से 16 जिलों के 82 स्थल संरक्षित हो रहे हैं।

उत्तरी/ आगरा मंडल में पुरातत्व पुस्तकालय
वर्ष 1904-05 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 22 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 300 पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। वर्ष 1906-07 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 21 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 198 और पांच आने पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। वर्ष 1907-08 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 23 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 200 पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। वर्ष 1908-09 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 20 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 199 और ग्यारह आने पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। 10 पुस्तकें निःशुल्क प्राप्त हुईं। पायनियर नामक समाचार प़त्र खरीदा जाने लगा था। वर्ष 1909-10 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 32 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 217 और चार आना पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया।इसके अलावा 11 पुस्तकें दान में तथा तीन पाण्डुलिपियां प्राप्त हुईं।

इस साल भी पायनियर पेपर मंगवाया गया। वर्ष 1910-11 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 15 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 199 और बारह आने पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। इस साल 19 पुस्तके दान स्वरुप प्राप्त हुईं। वर्ष 1911-12 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 24 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 200 पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। इसके अलावा 48 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं। वर्ष 1912-13 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 18 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 297 और चार आने पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। इसके अलावा 01 पुस्तक दान में प्राप्त हुईं। वर्ष 1913-14 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 35 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 160 , तेरह आने और 06 पैसे पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। वर्ष 1914-15 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 05 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 371 पांच आने पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। इसके अलावा 12 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं। वर्ष 1915-16 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 03 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 147 तेरह आने पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। इसके अलावा 24  पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1916-17 वर्ष 1917-19 तथा वर्ष 1918-19 का विवरण उपलब्ध नहीं है।1920-.21 में 24 पुस्तकें दान में प्राप्त हुई भी कही गयी हैं।
वर्ष 1921-22 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 34 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 200 पुस्तकालय के लिए एलाट हुआ था तथा रुपया  रु. 125 और आना 15 खर्च किया गया। वर्ष 1922-23 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 03 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 200 एलाट हुआ था तथा रुपया  166 ,आना 02 और पैसा 02 पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। इसके अलावा 33 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1923-24 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 12 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 200 एलाट हुआ था तथा रुपया रुपया 215 और आना 11 ,पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। इसके अलावा 42 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1924-25 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 27 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 700 एलाट हुआ था तथा रुपया 1259 और आना 12 पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया। इसके अलावा 22 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1925-26 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 22 पुस्तकें खरीदी गईं। इस साल रुपया 300 एलाट हुआ था तथा रुपया 300 औरआना 14 पुस्तकालय के लिए खर्च किया गया।
इसके अलावा 27 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1926-27 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 30 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 34 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1927-28 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 14 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 21 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1928-29 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 22 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 24 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1929-30  में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 06 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 24 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1930-31 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 74 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 41 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1931-32 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 09 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 24 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं ।

वर्ष 1932-33 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 23 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 21 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1933-34 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 15 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 21 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1934 -35 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 23 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 23 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1935-36 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 33 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 56 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1936-37 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 33 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 21 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं । वर्ष 1937-38 में उत्तरी मण्डल के पुस्तकालय में 10 पुस्तकें खरीदी गईं। इसके अलावा 35 पुस्तकें दान में प्राप्त हुईं ।

ब्रिटिश समय में पूरे भारत में आय- व्यय का पूरा लेखा जोखा हर वर्ष के एनुवल रिपोर्ट में दर्ज होती आई है। जब से “एनिसेंट इंडिया” और “इंडियन आर्कियोलॉजी- ए रिव्यू” प्रकाशित होने लगा, ये पुस्तकालय खर्च का विवरण नदारद हो गया। अस्तु !आगे इसे अद्यतन किया जाना सम्भव नहीं रहा।

पुस्तकालय मंदिर, पुस्तकें प्रभु के विग्रह तथा पाठक उस प्रभु के परम प्रिय भक्त होते हैं। मैं तो प्रभु और भक्त के बीच सेवक के रुप में एक कड़ी था। मुझे प्रभु और भक्तों दोनों का भरपूर सहयोग, प्यार और आशीर्वाद निरन्तर मिलता रहा। अब उस भौतिक मंदिर से बाहर रहते हुए अपने मन मंदिर के प्रभु से सभी भक्तों के प्रसन्न व आनंदिन रहने की प्रार्थना करता रहता हॅू।

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा के  सेवानिवृत्त सहायक पुस्तकालय एवम् सूचनाधिकारी  हैं )