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हिमशिखर और चाँदनीः संवेदनाओं को झकझोरती हैं संदेशपरक कहानियाँ

कहानीकार रेखा पंचोली की 9 कहानियों का संग्रह “हिमशिखर और चाँदनी” में बुना गया कहानियों का तानाबाना संदेश परक कहानियों का ऐसा गुलदस्ता है जो किसी परिस्थिति का वर्णन ही  नहीं करती वरन संदेश प्रधान हो कर मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती भी हैं। वर्तमान का यथार्थ भी इनमें झांकता है तो ऐतिहासिक और धार्मिक प्रसंग, परंपराएं भी वर्तमान से जुड़ते प्रतीत होते हैं। सभी कहानियाँ चिंतन का एक बिंदु उभरती हैं । भाषा शैली सहज सरल है और कथानक का कसावट पाठक को बांधे रखता हैं।
इस संग्रह की शीर्षक कहानी हिमशिखर और चाँदनी वंश वृद्धि और संतान प्राप्ति के लिए हमारी प्राचीन परंपरा नियोग प्रथा पर आधारित है जिसमें कहानी की पात्र कल्याणी संन्यासी से संबंध स्थापित करती है।
कहानी के अंश देखिए कल्याणी कहती है वही तो महाराज! इसीलिए तो मन्नत मागने आई हूँ? बद्री नारायण की कृपा से…. या किसी साधू-संत के आशीर्वाद से मैं भी मातृत्व सुख प्राप्त कर सकें। टेकरी वाले बाबा के दर्शन तो मेरे भाग्य में नहीं थे महात्मा ! पर आपके आशीर्वाद से मेरी मनोकामना फलीभूत हो, मुझे आशीर्वाद प्रदान करें!

सृष्टि के कुछ नियम होते हैं कल्याणी ! प्रकृति विज्ञान के नियमों पर चलती है. केवल आशीर्वाद से संतान की प्राप्ति नहीं हो सकती कल्याणी!” कल्याणी की अबोध सी बात सुनकर संन्यासी के चेहरे पर क्षण भर के लिए मुस्कान की रेखा उभरी और फिर उसकी गंभीरता के पीछे उसी तरह छुप गई जैसे बादलों के मध्य दूज का चाँद । चौंक कर संन्यासी की ओर देखा कल्याणी ने मेरी समझ में आपकी बातें नहीं आ रहीं महात्मन्। हमारे शास्त्रों में इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। संतों का प्रताप होता ही ऐसा है।

मैं समझ रहा हूँ कल्याणी तुम कौन से उदाहरणों की बात कर रही हो… केवल आशीर्वाद या प्रसाद खाने से संतान की प्राप्ति हो सकती तो महाभारत की सत्यवती अपना वंश चलाने के लिए वेदव्यास जी को न बुलाती …उस समय तो साक्षात श्री कृष्ण मौजूद थे न… कल्याणी ! क्या वे आशीर्वाद नहीं दे सकते थे? निस्संतान स्त्री जिसका पति संतान उत्पन्न करने योग्य न हो. उसके लिए संतान प्राप्ति का केवल एक ही तरीका है. और वह है नियोग प्रथा द्वारा संतान प्राप्ति… जिसकी अनुमति हमारे शास्त्रों में दी गई है।
लेखिका के कथानक की गहराई में झांकने के लिए कहानी के ये अंश अपने आप में उल्लेखनीय हैं कि किस प्रकार निसंतान नारी की संतान प्राप्ति की समस्या को सांस्कृतिक प्रथाओं से जोड़ कर समाधान तक पहुंचाया है।
कहानी हैप्पी मदर्स डे सरहद पर देश और मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने को तत्पर जांबाज सैनिकों की माताओं को समर्पित हैं जो हंसते – हंसते अपने दिल के कलेजे को मातृभूमि की रक्षा के लिए सीमाओं पर भेज देती हैं।

इस कहानी का एक अंश –  वह मन ही मन कह उठी – ‘समझ गई कि इस फोटो के माध्यम से तुम क्या कहना चाहते हो। इस फोटो के जरिए तुम मुझे यह सन्देश देना चाहते हो कि माँ आप उन माताओं के बारे में भी सोचो जिन्होंने मजबूत जिगर करके अपने जिगर के टुकड़ों को भारत माँ की रक्षा के लिए सीमा पर भेज दिया है। धन्यवाद बेटे, याद दिलाने के लिए। वास्तव में तो वही माताएं मजबूत और साहसी हैं। इस मदर्स डे पर उन्हीं बहादुर माताओं को मेरा शत-शत नमन, जिन्होंने अपने स्वार्थों से ऊपर उठ कर अपने आँगन की रौनक को भारत माँ के आँगन की सुरक्षा में लगा दिया। उन सभी को मेरी ओर से ‘हैप्पी मदर्स डे।
पुरुष प्रधान समाज में नारी को अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अग्नि परीक्षा से गुजरने का सीता माता का प्रसंग सर्वविदित है। इसको लेकर सृजित कहानी अग्नि परीक्षा समाज में नारी की स्थिति को बखूबी दर्शाती है। कहानी के तानेबाने में मंदोदरी के मंद –  मंद झुलसते जीवन को जिस प्रकार से उभरा गया है वह लेखिका की अपनी ही लेखन शैली की विशेषता है।
कहानी का अंश –  सभी परिचारिकाएं महल की ओर प्रस्थान कर गई थीं, जहां से रह-रहकर कभी मंदोदरी की सिसकियां उठती थीं तो कभी विलाप, जो प्रलाप में बदल जाता था। वह रूदन के साथ प्रलाप करते हुए कह रही थी–“हे प्रिय! मेरे वीर योद्धा लंकापति ! इस तपस्विनी के प्रति तुम्हारे मोह ने हमारे परिवार की और इस सोने की लंका की क्या दशा कर दी। तुम्हारी मृत्यु पर शोक करने वाला तुम्हारा कोई भाई या पुत्र नहीं बचा, हमारे परिवार की सारी स्त्रियां विधवा और पुत्र हीन होकर जड़ हो गईं। वे तुम्हारी मृत्यु पर जरा भी आंसू नहीं बहा रही हैं बल्कि अपने पति और पुत्रों की मृत्यु का कारण तुम्हें मानकर धिक्कार रही हैं। हाय! मैं तुम्हारी ऐसी मृत्यु से शोक संतप्त हूं। तुम्हारी प्रजा तुम्हारी मृत्यु पर शोक मनाने के बजाय तुम्हारे शत्रु का गुणगान कर रही है। तुम्हें तो सदैव से ही मैं ही सर्वाधिक प्रिय थी। फिर प्रौढ़ आयु में आकर इस तापसी को क्यों अपने हृदय में बसाया? तुम्हारे इस मोह ने हमारे कुल का सर्वनाश कर दिया।” मंदोदरी के कानों में रावण के वे शब्द गूंज रहे थे जो उसने कितनी ही बार सीता से मंदोदरी के समक्ष ही कहे थे कि यदि सीता उसकी बात मान लेगी तो वह उसकी महारानी बनेगी और मंदोदरी उसकी दासी के समान रहेगी। जब से सीता लंका में आई, कितनी बार मंदोदरी को अपमान की आग में जलना पड़ा था। जब से रावण से विवाह हुआ, उसने रावण की सेवा और प्रेम में कोई कमी नहीं रखी थी। उसने एक धर्म – परायण स्त्री की तरह अपने कर्तव्य का पालन किया।
कर्म प्रधान कहानी है तर्पण । कर्म जैसे होंगे वहीं सूद समेत मिलते हैं। सद्कर्मों के लिए प्रेरित करती हैं यह कहानी। संग्रह की अन्य कहानियाँ लोको पायलट, रक्त रंजित केश, काले संदूक का राज, सेतु निर्माण और समझौता सुंदर समाज की रचना के लिए कोई न कोई संदेश देती नजर आती हैं।
भूमिका में माधव विद्यालय माउंट आबू में हिंदी की प्रोफेसर डॉ. गीता सक्सेना लिखती हैं – नव ग्रह की नव कल्पना सदृश रेखा पंचौली की इन कहानियों का यह समुच्चय साहित्य के क्षेत्र में एक उत्तम दस्तावेज है। इसमें सूर्य की तरह आभासित वैचारिक प्रखरता है, तो चन्द्र सदृश शीतलता भी है। इसकी कहानियाँ कहीं मंगल सा उत्साहवर्धन करती हैं तो कहीं बुध सी बौद्धिकता प्रदान करती हैं। किन्हीं कहानियों में शुक्र सी चकाचौंध है तो कहीं शनि का शनैः शनैः गमन करता संघर्ष विद्यमान है। साथ ही इन कहानियों में राहु सा बौद्धिक भ्रम तो है ही केतु सी गहराई भी हैं। कुल मिलाकर जीवन की संचालित स्थितियों के अनेकानेक प्रसंग हैं।
पुस्तक के बारे ने प्रकाशक का मत है कि  यह पुस्तक रेखा पंचौली की नौ उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह है जिसमें नारी विमर्श को केंद्र में रखते हुए जीवन के अनेक पक्षों की बहुत बारीकी से प्रस्तुत किया गया है।  कहानियों की एक बड़ी विशेषता है उसका सहज प्रवाह जिसके कारण कोई भी कहानी कभी बोझिल नहीं लगती और पाठक अंत तक उसमें डूब सा जाता है। इस संग्रह की सभी कहानियां अपने आप में अनोखी हैं और बेहद रोचक है लेकिन हिमशिखर और चांदनी एवं अग्नि-परीक्षा शीर्षक वाली कहानियां अपनी बेहतरीन प्रस्तुति और विचारोत्तेजक विषयों के कारण हमारे दिमाग पर लंबे समय तक अपनी छाप छोड़ जाती हैं। निश्चित रूप से यह एक अत्यंत पठनीय पुस्तक है।
आत्मकथ्य में लेखिका रेखा पंचोली लिखती हैं – उचित अनुचित का प्रश्न पाठकों के समक्ष छोड़ती हूं और अपनी कहानी पाठकों को समर्पित करती हूं। हम आज के बुद्धिजीवी पाठकों को यह नहीं कह सकते कि अग्नि को समर्पित की जाने वाली सीता नकली थी। असली सीता तो लंका गई ही नहीं थी। यह तर्कहीन तथ्य है जिसे धर्मभीरुता का नाम तो दिया जा सकता है तर्क सहित स्थापित नहीं किया जा। प्रश्न यह है कि जब देवी अहिल्या के उद्धारक श्री राम अहिल्या उद्धार के समय यह कहते कि मैं दशरथ नंदन राम ये घोषणा करता हूं कि “देवी अहिल्या सर्वथा पवित्र और निर्दोष हैं।” और पूरी प्रजा नत मस्तक हो कर उसे स्वीकार कर लेती है क्योंकि घोषणा करने वाला कोई साधारण पुरुष नहीं है। आशा है कहानियां पाठकों को पसंद आएंगी।
इनकी कहानियाँ उपज हैं उस समय की जब मनोरंजन के इलेक्ट्रॉनिक साधन नहीं थे और बच्चें रात को अपने माता – पिता से नाना – नानी, दादा – दादी से कहानियां सुनते थे। कहानियों की समझ और रुचि के लिए इनके पिता सीताराम शर्मा ‘ श्रोत्रिय ‘ इनके आदर्श रहे जिनसे ये बचपन में पंचतंत्र से ले कर महाभारत, रामायण जैसे ग्रंथों की। कहानियाँ
सुना करती थी। बचपन से उपजे कहानी प्रेम ने इन्हें कहानी लिखने को प्रेरित किया और 23 वर्ष की उम्र में पहली कहानी का प्रसारण सवाईमाधोपुर आकाशवाणी केंद्र से हुआ। कहानी लेखन ने रफ्तार पकड़ी और तीसरा कृति कहानी संग्रह के रूप में सामने आई। इसे राजस्थान साहित्य अकादमी का आर्थिक सहयोग प्राप्त हुआ है। इसके पूर्व कहानी संग्रह भीगी पलकों में उजास  भी साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित हुआ है। दूसरी कृति  लोक डाउन और कोचिंग सिटी उपन्यास था। पुस्तक का आवरण पृष्ठ शीर्षक के अनुरूप आकर्षक है। लेखिका के संक्षिप्त परिचय के साथ विस्तृत परिचय जानने के लिए प्रोफाइल कोड दिया गया है।
पुस्तक : हिमशिखर और चाँदनी ( कहानी संग्रह )
सहयोग : राजस्थान साहित्य अकादमी,उदयपुर
लेखिका : रेखा पंचोली, कोटा
प्रकाशक :  ऐनक्डोट पब्लिशिंग हाउस दरियागंज दिल्ली
प्रथम संस्करण 2025
मूल्य ₹ 350
पृष्ठ : 117, पेपर बैक
आईएसबी एनः 978-81-988015-9-3117
( लेखिका संपर्क : मो.99500 62953)
डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
(समीक्षक कोटा के वरिष्ठ व मान्यताप्राप्त पत्रकार हैं, आप साहित्य संस्कृति, पर्यटन व ऐतिहासिक विषयों पर लेखन करते हैं) 

हमारा संविधान ही हमारा सपना है

भारत का संविधान ही 140 करोड़ देशवासियों की आत्मा है और डॉ. भीमराव अंबेडकर ही इसकी प्रस्तावना के रचनाकार हैं। हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।‘ डॉ. भीमराव अंबेडकर को इस संविधान के आलोक में याद करते हुए जब हम भारत की खोज को पढ़ते हैं, तो लगता है कि वंदे मातरम् और जन गण मन‘ जैसी आराधना से बढ़कर कोई अन्य कविता इस धरती पर हो ही नहीं सकती।
भारत का यह दिव्य सपना 26 नवंबर, 1949 से हमारे देश का मार्गदर्शक है।
दुनिया के सबसे बड़े लिखित संविधान में वर्णित जो मौलिक अधिकार (1) समानता का अधिकार (2) स्वतंत्रता का अधिकार (3) शोषण के विरुद्ध अधिकार (4) धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (5) संस्कृति तथा शिक्षा संबंधी अधिकार  (6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार आज हमें प्राप्त है, उसकी अनुपालना में ही विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका की संपूर्ण संरचना प्रेरित और उत्तरदायी है। इस विभाजीत राष्ट्र की अनेकताओं को एकता में बांधने का यह अमर तंत्र जब डॉ. अंबेडकर ने लिखा था, तब वह कोई दलित नहीं थे, अपितु एक भारतीय नागरिक थे। इसी तरह 1857 से लेकर 1947 तक भारत में जो आजादी की लड़ाई लड़ी गई, उसके सभी महानायक किसी जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और वर्ग के सैनिक और सेनानी नहीं थे, अपितु भारत के उपासक थे। लेकिन, तब से लेकर अब तक इस देश के विकास और परिवर्तन का प्रवाह कुछ ऐसी विपरीत दिशा में धकेला जा रहा है कि हमने अपने सभी राष्ट्र निर्माताओं को जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीयता के हाशिए पर धकेल दिया है।
जो भी भारत गणराज्य का अधिपति बनता है, वह एक भारतः श्रेष्ठ भारत और सबका साथ-सबका विकास की नई-नई बातें तो करता है, लेकिन असल में संविधान के विपरीत सत्ता और व्यवस्था का एक नया ताना-बाना भी बुनता है। यही कारण है कि नए भारत की पिछले 78 साल की कहानी समानता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध, धार्मिक स्वतंत्रता, संस्कृति तथा शिक्षा संबंधी अधिकार और इसके संवैधानिक उपचारों के आसपास ही घूम रही है। हमने अंबेडकर को दलित नेता बना दिया है, तो ज्योतिबा फुले को मालियों का आराध्य, भगत सिंह को चरमपंथ का सिपाही, तो वल्लभ भाई पटेल को गुजरात का गौरव, तो सुभाषचंद्र बोस को बंगाल गरिमा, तो जवाहरलाल नेहरू को वंशवाद का जनक, तो विवेकानंद को कट्टर हिंदुत्व का प्रणेता, तो सुब्रहण्यम भारती को तमिल प्रतिष्ठा और न जाने किन-किन को अपनी-अपनी कैसी-कैसी जाति-धर्म की पहचान का प्रतीक बना दिया है।
 इसी तरह हमने संपूर्ण मानवता के उपासकों की जगह राम-कृष्ण को हिंदुओं की, बुद्ध को बौद्धों की, हजरत मोहम्मद को मुसलमानों की, गुरु नानक को सिक्खों की, महावीर को जैनियों की तथा ईसा मसीह को ईसाइयों की चारदीवारी में ही कैद कर दिया है। यानी कि हमने नदी, पर्वत, हवा, प्रकाश, पृथ्वी तक को अपनी जाति-धर्म की पहचान में समेट लिया है तथा मां गंगा की जीवनदायी पवित्रता को भी हिंदू संस्कृति की मुख्यधारा तथा सूर्य और चंद्रमा को भी हिंदू संस्कृति के नमस्कार में बदल दिया है। आज भी हम जब महात्मा गांधी को किसी राजनीतिक पार्टी का विज्ञापन बना देते हैं और अंबेडकर को दलितों का मसीहा कहते रहते हैं, तो हम यह भूल जाते हैं कि इनका जीवन-दर्शन क्या था? हम एक कृतज्ञ राष्ट्र के रूप में भी कभी अंबेडकर के भारत के संविधान की बात क्यों नहीं करते और महात्मा गांधी की सत्य और अहिंसा को याद क्यों नहीं करते? यह सीमित समझ ही बताती है कि हम ऐसे सभी राष्ट्र निर्माताओं को एक व्यक्ति के रूप में जाति-धर्म के लिए उपयोगिता की सामग्री में बदल रहे हैं, जबकि गांधी और अंबेडकर एक विचार है तथा वह किसी संकीर्णता के हकदार नहीं हैं। महाराणा प्रताप और शिवाजी को किसी धर्म और जाति का नायक बनाना भी हमारी समझ की संकीर्णता है, क्योंकि यह सभी इतिहास पुरुष राजा और प्रजा की मर्यादा के आधार हैं।
इसलिए, हमें आज यह अवधारणा भी बदलनी होगी कि जाति और धर्म की पहचान से ही किसी देश की पहचान बनती है और विकास तथा परिवर्तन की योजनाएं चलाई जाती हैं। यदि भारत में दलितों को सामाजिक-आर्थिक समानता का अधिकार हम आज तक नहीं दे पाए हैं, तो यह डॉ. अंबेडकर और हमारे संविधान का अपमान है।
इसी तरह भारत में असत्य और हिंसा का विस्तार भी महात्मा गांधी के सपनों की अवहेलना है। भारत का संविधान ही हमें वह ताकत देता है कि-आज भी हम एक हैं और आगे-पीछे वंदे मातरम् और जन गण मन ही गा रहे हैं तथा सभी प्रकार की शपथ अपने संविधान के अंतर्गत ही ले रहे हैं।
ऐसे में, भारत का जीवन धर्म और जीवन कर्म भारत का संविधान ही है। अतः अंबेडकर को जाति-धर्म की सीमाओं में बांधकर इन्हें छोटा मत बनाइए, क्योंकि प्रेरणा के प्रकाश का कोई जाति-धर्म नहीं होता।  अतः समय की चेतावनी को समझते हुए डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि 26 जनवरी 1950 को हम एक विरोधाभास की जिंदगी में प्रवेश करने जा रहे हैं। हमारी राजनीति में समानता होगी और हमारे सामाजिक व आर्थिक जीवन में असमानता। राजनीति में हम एक वोट और हर वोट का समान मूल्य पर चल रहे होंगे। परंतु अपने सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में हमारे सामाजिक एवं आर्थिक ढांचे के कारण हर व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को नकार रहे होंगे। इस विरोधाभास के जीवन को हम कब तक जीते रहेंगे? कब तक हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारते रहेंगे? यदि हम इसे नकारना जारी रखते हैं तो हम केवल अपने राजनीति प्रजातंत्र को संकट में डाल रहे होंगे। हमें जितनी जल्दी हो सके, इस विरोधाभास को समाप्त करना होगा, अन्यथा जो लोग इस असमानता से पीड़ित हैं, वे उस राजनीतिक प्रजातंत्र को उखाड़ फेकेंगे जिसे हम सभी ने परिश्रम से खड़ा किया है।
 (लेखक साहित्य मनीषी व वरिष्ठ पत्रकार हैं)

गीत सुहाने बचपन के : बाल मन के सौंदर्य से महकते शब्दों का गुलदस्ता

डाॅ. विमला भंडारी द्वारा सलूम्बर, राजस्थान में स्थापित ‘सलिला संस्था’ बालसाहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली देश की अग्रगण्य संस्था है। यह संस्था सन् 1994 से ही अपने विभिन्न आयोजनों के माध्यम से बाल साहित्य एवम् बाल साहित्यकारों को निरन्तर प्रोत्साहित करती आ रही है।
बालसाहित्य संस्था ‘सलिला’ ने वर्ष 2025 की विधा गत प्रतियोगिता के लिए बालगीत को चुना और प्रविष्टियाँ आमंत्रित की थीं। प्रतियोगिता के अन्तर्गत चयनित बाल गीतों को संस्था ने एक पुस्तक के आकार में प्रकाशित किया और पुस्तक को नाम दिया ‘गीत सुहाने बचपन के’।बालगीत संग्रह ‘गीत सुहाने बचपन के’ प्रथम खंड में अपेक्षाकृत युवावर्ग के प्रतियोगी बाल गीतों के रचनाकारों को स्थान दिया गया है। इस खण्ड में सम्मिलित बाल साहित्यकारों के नाम हैं- यशपाल शर्मा, फहीम अहमद, नीलम मुकेश वर्मा, योगेन्द्र मौर्य, बलवीर सिंह वर्मा, अनीता गंगाधर, कन्हैयालाल साहू’ अमित’, भाऊराव महन्त, विनीता काबरा, नीरज शास्त्री, सिराज अहमद, राम नरेश उज्ज्वल, शादाब आलम, राजूराम बिजारणियाँ, योगिता जोशी, केदार शर्मा।
द्वितीय खंड में प्रबुद्ध बाल रचनाकारों की आमंत्रित रचनाओं को स्थान दिया गया है।द्वितीय खण्ड में सम्मिलित रचनाकार हैं – विष्णु शर्मा ‘हरिहर’, माणक तुलसीराम गौड़, सुरेश चन्द्र ‘सर्वहारा’, डाॅ. गोपाल राजगोपाल, संतोष कुमार सिंह, डाॅ. इंदु गुप्ता, डाॅ. सरिता गुप्ता, सुनीता माहेश्वरी, गोविन्द भारद्वाज, गोपाल माहेश्वरी, भगवती प्रसाद गौतम, दिविक रमेश, कुसुम अग्रवाल, चक्रधर शुक्ल, प्रकाश तातेड़, डाॅ. आर. पी. सारस्वत, राजेन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव, रेखा लोढ़ा ‘स्मित’ किशोर श्रीवास्तव, डाॅ. विष्णु शास्त्री ‘सरल’, श्यामपलट पांडेय, बलदाऊ राम साहू, डाॅ. नागेश पांडेय ‘संजय’, प्रभुदयाल श्रीवास्तव, डाॅ. अंजीव ‘अंजुम’। इस प्रकार ‘सलिला’ संस्था द्वारा नवोदित एवं स्थापित रचनाकारों के समकालीन साहित्य को प्रामाणिक रूप से सहेजने का यह स्तुत्य प्रयास किया गया है। संग्रह में इक्यावन बाल गीतों को संगृहीत किया गया है जो बच्चों के बालमन को आनन्द से आप्लावित करने के साथ ही उन्हें सहज रूप से जीवनोपयोगी सीख भी देते हैं। उदाहरण के तौर पर ‘मैं इतिहास रचाऊँगी’ कविता में कवि नीरज शास्त्री बालिका शिक्षा का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए कहते हैं –
“पापा मुझे मँगा दो बस्ता /मैं भी पढ़ने जाऊँगी /
अ आ इ ई अक्षर पढ़कर /मैं भी नाम कमाऊँगी/
कितना अच्छा लगता है /जब भैया पुस्तक पढ़ते हैं /
मम्मी कहती पढ़ने वाले /जग में आगे बढ़ते हैं /
मैं भी पापा ! आगे बढ़कर /गीत खुशी के गाऊँगी/
पापा मुझे मँगा दो बस्ता /मैं भी पढ़ने जाऊँगी… /” (पृष्ठ 38)
बालमन प्रकृति से ही जिज्ञासु होता है। उसका प्रश्नाकुल मन अपने आसपास के परिवेश को बड़ी उत्सुकता से देखता है। कवि योगेन्द्र मौर्य अपनी कविता ‘काॅलोनी की सत्ता’ में मधुमक्खी के छत्ते को लेकर बच्चे की जिज्ञासा को बड़े ही सुन्दर ढंग से व्यक्त करते हुए कहते हैं –
“मधुमक्खी तुम आखिर कैसे /रच लेती हो छत्ता /
शिल्प गजब यह सीखी हो क्या /जाकर तुम कलकत्ता /
छत्ते में जो मीठा मधु है /ढूँढ कहाँ से लाती /
दिन में कितनी बार बताओ /फूलों पर मँडराती/
दूर – दूर तक जाती हो पर /नहीं भूलता रस्ता /
मधुमक्खी तुम आखिर कैसे /रच लेती हो छत्ता… /”(पृष्ठ 26)
 बाल साहित्य बच्चों को मनोरंजन प्रदान करता है। बच्चों के मन में खुशियों का संचार कर देना ही बाल साहित्य की सफलता की कसौटी है। शब्दों में सरल होते हुए भी ये रचनाएँ भाषा के अनुपम सौन्दर्य को प्रकट करती हैं। बाल मनोविज्ञान पर आधारित इन कविताओं का लक्ष्य बच्चों को कोई सीख देना नहीं वरन् किसी भी वस्तु की रोचक जानकारी के माध्यम से बच्चों का मन बहलाना है। कवि श्यामपलट पांडेय की कविता ‘हाथी आया’ इसी तरह की कविता है –
“लम्बी सूँड़ हिलाता आया /हाथी आया हाथी आया /
मस्त चाल से है वह चलता /नहीं किसी से पथ में डरता /
दाँतों को दिखलाता आया /हाथी आया हाथी आया /
बच्चे हाथी से हैं डरते /पर चढ़ने की जिद भी करते /
बिठा पीठ पर खूब घुमाया/हाथी आया हाथी आया /
पीलवान के वश में रहता /जो वह कहता हाथी करता /
तैर नदी में खूब नहाया /हाथी आया हाथी आया /” (पृष्ठ 65)
बाल साहित्य का उद्देश्य बच्चों को खेल – खेल में नैतिक शिक्षा देना भी है। आज के बच्चे ही कल के नागरिक होंगे। बचपन से ही अच्छे संस्कारों का अंकुरण होने से आगे चलकर बच्चे मानवीय गुणों से युक्त होंगे, जिससे वे सुन्दर समाज की रचना में सहायक होंगे। डाॅ. अंजीव ‘अंजुम’ बालमन में उत्साह का संचार करते हुए ‘हिम्मत पर विश्वास है’ कविता में कहते हैं –
“नहीं भाग्य पर नहीं कर्म पर /हिम्मत पर विश्वास है /
धरा सजाने को हम सब का /ये ही नवल प्रयास है /
सूखी तपती धरती पर /आशा-नीर बहानी है /
संकल्पों के बीज गिराकर /फसलें नई उगानी हैं /
दृढ़ता का सूरज जब जागे /सुखमय तभी प्रकाश है /
धरा सजाने को हम सब का /ये ही नवल प्रयास है /”  (पृष्ठ 69)
पर्यावरण संरक्षण आज के समय की महती आवश्यकता है। बढ़ते प्रदूषण के कारण धरती के जीवों पर अब अस्तित्व का ही संकट मँडराने लगा है। हमें प्रकृति का संरक्षण कर आने वाली पीढ़ियों के लिए यह अनमोल विरासत सहेज कर रखना है। ऐसे में बच्चों को भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना आवश्यक है, जिससे कि वे आगे चलकर प्राकृतिक सौन्दर्य को बचाने में अपना योगदान दे सकें। ‘पर्यावरण बचाना है’ कविता में कवि भाऊराव महन्त का कहना है –
“हम सबको आगे आना है /यदि पर्यावरण बचाना है /
सूख रहे हैं ताल – तलैया /सूख रही है गंगा – मैया /
कैसे पार करेंगे बच्चो /बोलो तब हम जीवन – नैया /
इस धरती का निर्मल पानी /बेकार न हमें बहाना है /
यदि पर्यावरण बचाना है…/” (पृष्ठ 34)
 ‘गीत सुहाने बचपन के’ बाल गीत संग्रह के उक्त कतिपय उदाहरणों की तरह ही इस संग्रह के शेष सभी गीत भी मनोरंजन, ज्ञान और शिक्षा से भरपूर हैं।संग्रह के सभी गीतों में फूलों – से कोमल बचपन की महक को बचाए रखने का आग्रह है। इन गीतों में बालमन की कोमल भावनाओं को बड़ी संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया गया है। विषय – विविधता वाले ये गीत शब्द – शब्द में कोमल भावनाओं को सँजोये हुए हैं। भाव और भाषा दोनों ही दृष्टि से ये गीत उत्कृष्ट हैं और गीत विधा की कसौटी पर खरे उतरते हैं। सभी गीतों में गीत विधा के आवश्यक तत्त्वों मुखड़ा, अंतरा और टेक के साथ ही लयबद्धता, गेयता एवम् भावप्रवणता का निर्वाह किया गया है।
भाषायी सौन्दर्य से युक्त, फूलों की गन्ध से महकते ये गीत बच्चों की सुकोमल भावनाओं की रक्षा करते हुए उन्हें सहज ही जीवन – मूल्यों की सीख दे जाते हैं।ये गीत बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास में सहायक हैं।’गीत सुहाने बचपन के’ गीत संग्रह की भूमिकाओं में जहाँ  श्री प्रकाश तातेड़ ने बाल गीत को ‘भावनाओं का समंदर’ कहा है, वहीं श्री इंजी. संतोष कुमार सिंह ने ‘गीत और उसका शिल्प’ विषय पर अच्छा प्रकाश डाला है। डाॅ. विमला भंडारी जी ने अपने आत्मकथ्य में ‘गीत सुहाने बचपन के’  बाल गीत संग्रह को ऐसे बीजों का बाग कहा है जिनसे भावी भारत की खुशबू फूटेगी।बच्चों को अपनी भाषा, संस्कृति, संस्कार और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ने कीदृष्टि से किया गया डॉ. विमला भंडारी जी का यह नवाचार निश्चित रूप से बाल साहित्य जगत में समादृत होगा।’गीत सुहाने बचपन के’ बाल गीत संग्रह के कुशल सम्पादन के लिए बालसाहित्य के उन्नयन के लिए समर्पित डॉ. विमला भंडारी जी को हार्दिक बधाई।
पुस्तक का नाम : गीत सुहाने बचपन के
विधा : बाल गीत
सम्पादक : डाॅ. विमला भंडारी
 प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड,
              नोएडा –
संस्करण : 2025 / पृष्ठ : 73
मूल्य : ₹ 150/- (पेपर बैक)
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समीक्षक
सुरेश चन्द्र ‘सर्वहारा’
कोटा (राजस्थान)

राम मंदिर के लिए हमारी आस्था की अग्नि पाँच सौ वर्षों तक धधकती रही: श्री नरेन्द्र मोदी

आज अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के एक और उत्कर्ष बिंदु की साक्षी बन रही है। आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व, राममय है। हर रामभक्त के हृदय में अद्वितीय संतोष है, असीम कृतज्ञता है, अपार अलौकिक आनंद है। सदियों के घाव भर रहे हैं, सदियों की वेदना आज विराम पा रही है, सदियों का संकल्प आज सिद्धि को प्राप्त हो रहा है। आज उस यज्ञ की पूर्णाहुति है, जिसकी अग्नि 500 वर्ष तक प्रज्वलित रही। जो यज्ञ एक पल भी आस्था से डिगा नहीं, एक पल भी विश्वास से टूटा नहीं। आज, भगवान श्री राम के गर्भगृह की अनंत ऊर्जा, श्री राम परिवार का दिव्य प्रताप, इस धर्म ध्वजा के रूप में, इस दिव्यतम, भव्यतम मंदिर में प्रतिष्ठापित हुआ है।

ये धर्म ध्वजा केवल एक ध्वजा नहीं, ये भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज है। इसका भगवा रंग, इस पर रचित सूर्यवंश की ख्याति, वर्णित ओम् शब्द और अंकित कोविदार वृक्ष रामराज्य की कीर्ति को प्रतिरूपित करता है। ये ध्वज संकल्प है, ये ध्वज सफलता है। ये ध्वज संघर्ष से सृजन की गाथा है, ये ध्वज सदियों से चले आ रहे स्वप्नों का साकार स्वरूप है। ये ध्वज संतों की साधना और समाज की सहभागिता की सार्थक परिणीति है।

आने वाली सदियों और सहस्र-शताब्दियों तक, ये धर्मध्वज प्रभु राम के आदर्शों और सिद्धांतों का उद्घोष करेगा। ये धर्मध्वज आह्वान करेगा- सत्यमेव जयते नानृतं! यानी, जीत सत्य की ही होती है, असत्य की नहीं। ये धर्मध्वज उद्घोष करेगा- सत्यम्-एकपदं ब्रह्म सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः। अर्थात्, सत्य ही ब्रह्म का स्वरूप है, सत्य में ही धर्म स्थापित है। ये धर्मध्वज प्रेरणा बनेगा- प्राण जाए पर वचन न जाहीं। अर्थात्, जो कहा जाए, वही किया जाए। ये धर्मध्वज संदेश देगा- कर्म प्रधान विश्व रचि राखा! अर्थात्, विश्व में कर्म और कर्तव्य की प्रधानता हो। ये धर्मध्वज कामना करेगा- बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥ यानी,  भेदभाव, पीड़ा-परेशानी से मुक्ति, समाज में शांति और सुख हो। ये धर्मध्वज हमें संकल्पित करेगा- नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। यानी, हम ऐसा समाज बनाएं, जहां गरीबी न हो, कोई दुखी या लाचार न हो।

हमारे ग्रन्थों में कहा गया है- आरोपितं ध्वजं दृष्ट्वा, ये अभिनन्दन्ति धार्मिकाः। ते अपि सर्वे प्रमुच्यन्ते, महा पातक कोटिभिः॥ यानी, जो लोग किसी कारण मंदिर नहीं आ पाते, और दूर से मंदिर के ध्वज को प्रणाम कर लेते हैं, उन्हें भी उतना ही पुण्य मिल जाता है।

ये धर्मध्वज भी इस मंदिर के ध्येय का प्रतीक है। ये ध्वज दूर से ही रामलला की जन्मभूमि के दर्शन कराएगा। और, युगों-युगों तक प्रभु श्रीराम के आदेशों और प्रेरणाओं को मानव मात्र तक पहुंचाएगा।

मैं सम्पूर्ण विश्व के करोड़ों रामभक्तों को इस अविस्मरणीय क्षण की, इस अद्वितीय अवसर की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं आज उन सभी भक्तों को भी प्रणाम करता हूं, हर उस दानवीर का भी आभार व्यक्त करता हूं, जिसने राम मंदिर निर्माण के लिए अपना सहयोग दिया। मैं राम मंदिर के निर्माण से जुड़े हर श्रमवीर, हर कारीगर, हर योजनाकार, हर वास्तुकार, सभी का अभिनंदन करता हूं।

अयोध्या वह भूमि है, जहां आदर्श, आचरण में बदलते हैं। यही वह नगरी है, जहाँ से श्रीराम ने अपना जीवन–पथ शुरू किया था। इसी अयोध्या ने संसार को बताया कि एक व्यक्ति कैसे समाज की शक्ति से, उसके संस्कारों से, पुरुषोत्तम बनता है। जब श्रीराम अयोध्या से वनवास को गए, तो वे युवराज राम थे, लेकिन जब लौटे, तो मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर के आए। और उनके मर्यादा पुरुषोत्तम बनने में महर्षि वशिष्ठ का ज्ञान, महर्षि विश्वामित्र की दीक्षा, महर्षि अगस्त्य का मार्गदर्शन, निषादराज की मित्रता, मां शबरी की ममता, भक्त हनुमान का समर्पण, इन सबकी, अनगिनत ऐसे लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

विकसित भारत बनाने के लिए भी समाज की इसी सामूहिक शक्ति की आवश्यकता है। मुझे बहुत खुशी है कि राम मंदिर का ये दिव्य प्रांगण, भारत के सामूहिक सामर्थ्य की भी चेतना स्थली बन रहा है। यहां सप्तमंदिर बने हैं। यहां माता शबरी का मंदिर बना है, जो जनजातीय समाज के प्रेमभाव और आतिथ्य परंपरा की प्रतिमूर्ति हैं। यहां निषादराज का मंदिर बना है, ये उस मित्रता का साक्षी है, जो साधन नहीं, साध्य को, उसकी भावना को पूजती है। यहां एक ही स्थान पर माता अहिल्या हैं, महर्षि वाल्मीकी हैं, महर्षि वशिष्ठ हैं, महर्षि विश्वामित्र हैं, महर्षि अगस्त्य हैं, और संत तुलसीदास हैं। रामलला के साथ-साथ इन सभी ऋषियों के दर्शन भी यहीं पर होते हैं। यहां जटायु जी और गिलहरी की मूर्तियां भी हैं, जो बड़े संकल्पों की सिद्धि के लिए हर छोटे से छोटे प्रयास के महत्व को दिखाती हैं। मैं आज हर देशवासी से कहूंगा कि वो जब भी राम मंदिर आएं, तो सप्त मंदिर के दर्शन भी अवश्य करें। ये मंदिर हमारी आस्था के साथ-साथ, मित्रता, कर्तव्य और सामाजिक सद्भाव के मूल्यों को भी शक्ति देते हैं।

हम सब जानते हैं, हमारे राम भेद से नहीं, भाव से जुड़ते हैं। उनके लिए व्यक्ति का कुल नहीं, उसकी भक्ति महत्वपूर्ण है। उन्हें वंश नहीं, मूल्य प्रिय हैं। उन्हें शक्ति नहीं, सहयोग महान लगता है। आज हम भी उसी भावना से आगे बढ़ रहे हैं। पिछले 11 वर्षों में, महिला, दलित, पिछड़े, अति-पिछड़े, आदिवासी, वंचित, किसान, श्रमिक, युवा, हर वर्ग को विकास के केंद्र में रखा गया है। जब देश का हर व्यक्ति, हर वर्ग, हर क्षेत्र सशक्त होगा, तब संकल्प की सिद्धि में सबका प्रयास लगेगा। और सबके प्रयास से ही 2047, जब देश आज़ादी के 100 साल मनाएगा, हमें 2047 तक विकसित भारत का निर्माण करना ही होगा।

रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक अवसर पर, मैंने राम से राष्ट्र के संकल्प की चर्चा की थी। मैंने कहा था कि हमें आने वाले एक हज़ार वर्षों के लिए भारत की नींव मज़बूत करनी है। हमें याद रखना है, जो सिर्फ वर्तमान का सोचते हैं, वो आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय करते हैं। हमें वर्तमान के साथ-साथ भावी पीढ़ियों के बारे में भी सोचना है। क्योंकि, हम जब नहीं थे, ये देश तब भी था, जब हम नहीं रहेंगे, ये देश तब भी रहेगा। हम एक जीवंत समाज हैं, हमें दूरदृष्टि के साथ ही काम करना होगा। हमें आने वाले दशकों, आने वाली सदियों को ध्यान में रखना ही होगा।

इसके लिए भी हमें प्रभु राम से सीखना होगा। हमें उनके व्यक्तित्व को समझना होगा, हमें उनके व्यवहार को आत्मसात करना होगा, हमें याद रखना होगा, राम यानी- आदर्श, राम यानी- मर्यादा, राम यानी- जीवन का सर्वोच्च चरित्र। राम यानी- सत्य और पराक्रम का संगम,  “दिव्यगुणैः शक्रसमो रामः सत्यपराक्रमः।” राम यानी- धर्मपथ पर चलने वाला व्यक्तित्व, “रामः सत्पुरुषो लोके सत्यः सत्यपरायणः।” राम यानी- जनता के सुख को सर्वोपरि रखना, प्रजा सुखत्वे चंद्रस्य। राम यानी- धैर्य और क्षमा का दरिया “वसुधायाः क्षमागुणैः”। राम यानी- ज्ञान और विवेक की पराकाष्ठा, बुद्धया बृहस्पते: तुल्यः। राम यानी- कोमलता में दृढ़ता, “मृदुपूर्वं च भाषते”। राम यानी- कृतज्ञता का सर्वोच्च उदाहरण, “कदाचन नोपकारेण, कृतिनैकेन तुष्यति।” राम यानी- श्रेष्ठ संगति का चयन, शील वृद्धै: ज्ञान वृद्धै: वयो वृद्धै: च सज्जनैः। राम यानी- विनम्रता में महाबल, वीर्यवान्न च वीर्येण, महता स्वेन विस्मितः। राम यानी- सत्य का अडिग संकल्प, “न च अनृत कथो विद्वान्”। राम यानी- जागरूक, अनुशासित और निष्कपट मन, “निस्तन्द्रिः अप्रमत्तः च, स्व दोष पर दोष वित्।”

साथियों,

राम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, राम एक मूल्य हैं, एक मर्यादा हैं, एक दिशा हैं। अगर भारत को साल 2047 तक विकसित बनाना है, अगर समाज को सामर्थ्यवान बनाना है, तो हमें अपने भीतर “राम” को जगाना होगा। हमें अपने भीतर के राम की प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी, और इस संकल्प के लिए आज से बेहतर दिन और क्या हो सकता है?

25 नवंबर का ये ऐतिहासिक दिन अपनी विरासत पर गर्व का एक और अद्भुत क्षण लेकर आया है। इसकी वजह है, धर्मधव्जा पर अंकित- कोविदार वृक्ष। ये कोविदार वृक्ष इस बात का उदाहरण है कि जब हम अपनी जड़ों से कट जाते हैं, तो हमारा वैभव इतिहास के पन्नों में दब जाता है।

जब भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट पहुंचे, तो लक्ष्मण ने दूर से ही अयोध्या की सेना को पहचान लिया। ये कैसे हुआ, इसका वर्णन वाल्मीकि जी ने किया है, और वाल्मीकि जी ने क्या वर्णन किया है, उन्होंने कहा है – विराजति उद्गत स्कन्धम्, कोविदार ध्वजः रथे।। लक्ष्मण कहते हैं— “हे राम, सामने जो तेजस्वी प्रकाश में विशाल वृक्ष जैसा ध्वज दिखाई दे रहा है, वही अयोध्या की सेना का ध्वज है, उस पर कोविदार का शुभ चिह्न अंकित है।”

आज जब राम मंदिर के प्रांगण में कोविदार फिर से प्रतिष्ठित हो रहा है, यह केवल एक वृक्ष की वापसी नहीं है, यह हमारी स्मृति की वापसी है, हमारी अस्मिता का पुनर्जागरण है, हमारी स्वाभिमानी सभ्यता का पुनः उद्घोष है। कोविदार वृक्ष हमें याद दिलाता है कि जब हम अपनी पहचान भूलते हैं, तो हम स्वयं को खो देते हैं। और जब पहचान लौटती है, तो राष्ट्र का आत्मविश्वास भी लौट आता है। और इसलिए मैं कहता हूं, देश को आगे बढ़ना है, तो अपनी विरासत पर गर्व करना होगा।

अपनी विरासत पर गर्व के साथ-साथ, एक और बात भी महत्वपूर्ण है, और वो है- गुलामी की मानसिकता से पूरी तरह मुक्ति। आज से 190 साल पहले, 190 साल पहले, साल 1835 में मैकाले नाम के एक अंग्रेज़ ने भारत को अपनी जड़ों से उखाड़ने के बीज बोए थे। मैकाले ने भारत में मानसिक गुलामी की नींव रखी थी। दस साल बाद, यानि 2035 में उस अपवित्र  घटना को 200 वर्ष पूरे हो रहे हैं। कुछ दिन पहले ही मैंने एक कार्यक्रम में आग्रह किया था कि हमें आने वाले दस वर्षों तक, उस दस वर्षों का लक्ष्य लेकर चलना है कि भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्त करके रहेंगे।

सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि मैकाले ने जो कुछ सोचा था, उसका प्रभाव कहीं व्यापक हुआ। हमें आज़ादी मिली, लेकिन हीन भावना से मुक्ति नहीं मिली। हमारे यहां एक विकार आ गया कि विदेश की हर चीज़, हर व्यवस्था अच्छी है, और जो हमारी अपनी चीजें हैं, उनमें खोट ही खोट है।

गुलामी की यही मानसिकता है, जिसने लगातार ये स्थापित किया, हमने विदेशों से लोकतंत्र लिया, कहा गया कि हमारा संविधान भी विदेश से प्रेरित है, जबकि सच ये है कि भारत लोकतंत्र की जननी है, Mother of Democracy है, लोकतंत्र हमारे DNA में है।

अगर आप तमिलनाडु जाएंगे, तो तमिलनाडु के उत्तरी हिस्से में उत्तिरमेरूर गांव है। वहां हज़ारों  वर्ष पहले का एक शिलालेख है। उसमें बताया गया है कि उस कालखंड में भी कैसे लोकतांत्रिक तरीके से शासन व्यवस्था चलती थी, लोग कैसे सरकार चुनते थे। लेकिन हमारे यहां तो मैग्ना कार्टा की प्रशंसा का ही चलन रहा। हमारे यहां भगवान बसवन्ना, उनके अनुभव मंटपा की जानकारी भी सीमित रखी गई। अनुभव मंटपा यानि, जहां सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक विषयों पर सार्वजनिक बहस होती थी। जहां सामूहिक सहमति से निर्णय लिए जाते थे। लेकिन गुलामी की मानसिकता के कारण, इस भारत की कितनी ही पीढ़ियों को इस जानकारी से भी वंचित रखा गया।

हमारी व्यवस्था के हर कोने में गुलामी की इस मानसिकता ने डेरा डाला हुआ था। आप याद करिए, भारतीय नौसेना का ध्वज, सदियों तक उस ध्वज पर ऐसे प्रतीक बने रहे, जिनका हमारी सभ्यता, हमारी शक्ति, हमारी विरासत से कोई संबंध नहीं था। अब हमने नौसेना के ध्वज से गुलामी के हर प्रतीक को हटाया है। हमने छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत को स्थापित किया है। और ये सिर्फ एक डिजाइन में बदलाव नहीं हुआ, ये मानसिकता बदलने का क्षण था। ये वो घोषणा थी कि भारत अब अपनी शक्ति, अपने प्रतीकों से परिभाषित करेगा, न कि किसी और की विरासत से।

यही परिवर्तन आज अयोध्या में भी दिख रहा है।

ये गुलामी की मानसिकता ही है, जिसने इतने वर्षों तक रामत्व को नकारा है। भगवान राम, अपने आप में एक वैल्यू सिस्टम हैं। ओरछा के राजा राम से लेकर, रामेश्वरम के भक्त राम तक, और शबरी के प्रभु राम से लेकर, मिथिला के पाहुन राम जी तक, भारत के हर घर में, हर भारतीय के मन में, और भारतवर्ष के हर कण-कण में राम हैं। लेकिन गुलामी की मानसिकता इतनी हावी हो गई कि प्रभु राम को भी काल्पनिक घोषित किया जाने लगा।

अगर हम ठान लें, अगले दस साल में मानसिक गुलामी से पूरी तरह मुक्ति पा लेंगे, और तब जाकर के, तब जाकर के ऐसी ज्वाला प्रज्जवलित होगी, ऐसा आत्मविश्वास बढ़ेगा कि 2047 तक विकसित भारत का सपना पूरा होने से भारत को कोई रोक नहीं पाएगा। आने वाले एक हज़ार वर्ष के लिए भारत की नींव तभी सशक्त होगी, जब मैकाले की गुलामी के प्रोजेक्ट को हम अगले 10 साल में पूरी तरह ध्वस्त करके दिखा देंगे।

अयोध्या धाम में रामलला का मंदिर परिसर भव्य से भव्यतम हो रहा है, और साथ ही अयोध्या को संवारने का काम लगातार जारी है। आज अयोध्या फिर से वह नगरी बन रही है, जो दुनिया के लिए उदाहरण बनेगी। त्रेता युग की अयोध्या ने मानवता को नीति दी, 21वीं सदी की अयोध्या मानवता को विकास का नया मॉडल दे रही है। तब अयोध्या मर्यादा का केंद्र थी, अब अयोध्या विकसित भारत का मेरुदंड बनकर उभर रही है।

भविष्य की अयोध्या में पौराणिकता और नूतनता का संगम होगा। सरयू जी की अमृत धारा और विकास की धारा, एक साथ बहेंगी। यहां आध्यात्म और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, दोनों का तालमेल दिखेगा। राम पथ, भक्ति पथ और जन्मभूमि पथ से नई अयोध्या के दर्शन होते हैं। अयोध्या में भव्य एयरपोर्ट है, अयोध्या में आज शानदार रेलवे स्टेशन है। वंदे भारत और अमृत भारत एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें अयोध्या को बाकी देश से जोड़ रही हैं। अयोध्या वासियों को सुविधाएं मिलें, उनके जीवन में समृद्धि आए, इसके लिए निरंतर काम चल रहा है।

जब से प्राण प्रतिष्ठा हुई है, तब से लेकर आज तक करीब-करीब पैंतालीस करोड़ श्रद्धालु, यहां दर्शन के लिए आ चुके हैं। ये वो पवित्र भूमि है, जहां पैंतालीस करोड़ लोगों के चरण रज पड़े हैं। और इससे अयोध्या और आसपास के लोगों की आय में आर्थिक परिवर्तन आया है, वृद्धि हुई है। कभी अयोध्या विकास के पैमानों में बहुत पीछे थी, आज अयोध्या नगरी यूपी के अग्रणी शहरों में से एक बन रही है।

21वीं सदी का आने वाला समय बहुत महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद के 70 साल में भारत, 70 साल में भारत विश्व की 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना, 70 साल में 11वीं। लेकिन पिछले 11 साल में ही भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। और वो दिन दूर नहीं, जब भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन जाएगा। आने वाला समय नए अवसरों का है, नई संभावनाओं का है। और इस अहम कालखंड में भी भगवान राम के विचार ही हमारी प्रेरणा बनेंगे। जब श्रीराम के सामने रावण विजय जैसा विशाल लक्ष्य था, तब उन्होंने कहा था- सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।। बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।। यानि, रावण पर विजय पाने के लिए जो रथ चाहिए, शौर्य और धैर्य उसके पहिए हैं। उसकी ध्वजा सत्य और अच्छे आचरण की है। बल, विवेक, संयम और परोपकार इस रथ के घोड़े हैं। लगाम के रूप में क्षमा, दया और समता हैं, जो रथ को सही दिशा में रखते हैं।

विकसित भारत की यात्रा को गति देने के लिए ऐसा ही रथ चाहिए, ऐसा रथ जिसके पहिए शौर्य और धैर्य हों। यानि चुनौतियों से टकराने का साहस भी हो, और परिणाम आने तक दृढ़ता से डटे रहने का धैर्य भी हो। ऐसा रथ, जिसकी ध्वजा सत्य और सर्वोच्च आचरण हो, यानि नीति, नीयत और नैतिकता से समझौता कभी न हो। ऐसा रथ, जिसके घोड़े बल, विवेक, संयम और परोपकार हों, यानि शक्ति भी हो, बुद्धि भी हो, अनुशासन भी हो और दूसरों के हित का भाव भी हो। ऐसा रथ, जिसकी लगाम क्षमा, करुणा और समभाव हो, यानि जहां सफलता का अहंकार नहीं, और असफलता में भी दूसरों के प्रति सम्मान बना रहे। और इसलिए मैं आदरपूर्वक कहता हूँ, ये पल कंधे से कंधा मिलाने का है, ये पल गति बढ़ाने का है। हमें वो भारत बनाना है, जो रामराज्य से प्रेरित हो। और ये तभी संभव है, जब स्वयंहित से पहले, देशहित होगा। जब राष्ट्रहित सर्वोपरि रहेगा। एक बार फिर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

आईएफएफआई में तीन सिनेमाई दुनिया-‘नीलगिरी’, ‘मु. पो. बॉम्बिलवाड़ी’ और ‘सिकार’ आकर्षण का केन्‍द्र रही

सिकार के कलाकारों और दल ने ज़ुबीन गर्ग को सम्मान किया, महाद्वीपों के सफ़र पर बात की

नीलगिरी के फ़िल्म निर्माताओं ने धैर्य की कहानियां साझा की; साथ रहने की अपील की

बॉम्बिलवाड़ी के निर्माताओं ने अपने युद्धकालीन व्‍यंग्‍य के पीछे के जादू के बारे में बताया

भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में आज एक बहु-सांस्कृतिक और बहु-शैली संवाद का मंच तैयार हुआ, जहां तीन प्रभावशाली फिल्मों के कलाकार और दल एक जीवंत प्रेस सम्‍मेलन के लिए एकत्रित हुए। यह प्रेस सम्‍मेलन गहन विचारों, भावनाओं और हास्य से भरपूर थी। इस रोचक संवाद में, ‘नीलगिरी: अ शेयर्ड वाइल्डरनेस’, ‘मुक्कम पोस्ट बॉम्बिलवाड़ी’ और ‘सिकार’ के रचनाकारों ने भी उनकी फिल्मों में बुने गए समृद्ध और विविध विषयों अपनी राय रखी।

‘सिकार’: एक श्रद्धांजलि, एक यात्रा और असम की एक सिनेमाई पहली फिल्म

सत्र की शुरुआत बेहद भावुक अंदाज़ में हुई जब ‘सिकार’ के निर्देशक देबांगकर बोरगोहेन ने फिल्म के मुख्य अभिनेता और संगीतकार ज़ुबीन गर्ग को याद किया, जिनका हाल ही में निधन हो गया था। लगभग दो दशकों तक साथ काम करने के बाद, देबांगकर ने याद किया कि कैसे उन्होंने शुरुआत में ज़ुबीन से केवल संगीत के लिए संपर्क किया था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “उन्होंने कहानी सुनी और कहा कि वह अभिनय करना चाहते हैं,” और फिर धीरे से कहा, “यह उनकी आखिरी फिल्म है जो उनके साथ रहते हुए रिलीज़ हुई है। उन्हें गुज़रे 64 दिन हो गए हैं। आज उन्हें यहां आकर खुशी होती।”

देबांगकर ने ‘सिकार’ के असाधारण निर्माण सफर पर भी बात की, जो पहली असमिया फिल्म है जिसकी शूटिंग बड़े पैमाने पर विदेश में हुई है, और जिसका लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा लंदन में फिल्माया गया है। टीम के ज़्यादातर सदस्य यात्रा करने में असमर्थ होने के कारण, निर्देशक ने गुवाहाटी से ही काम किया, अक्सर “मच्छरदानी में बैठकर” लाइवस्ट्रीम के ज़रिए शूटिंग का मार्गदर्शन करते हुए। यह बात सुनकर कमरे में ज़ोरदार ठहाके लगे।

उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में फिल्म को मिली प्रशंसा के बारे में बताया। उन्होंने कहा, “हाउसफुल शो और देश के विभिन्न हिस्सों से आए लोगों द्वारा इसकी सराहना देखकर मुझे खुशी होती है। मैं असली असम को चित्रित करना चाहता हूं। एक ऐसा असम जो पूरी ताकत और गरिमा से भरा हो।”

क्षेत्रीय फिल्मों के लिए ओटीटी पर स्‍थान की उपलब्‍धता के संबंध में चिंताओं पर देबांगकर ने कहा कि इन प्लेटफार्मों ने वैश्विक पहुंच का विस्तार किया है, लेकिन वे अक्सर क्षेत्रीय सिनेमा को वह प्रसिद्धि दिलाने में विफल रहते हैं जिसका वह हकदार है।

‘नीलगिरी: अ शेयर्ड वाइल्डरनेस’, सजीव और जीवंत जीवमंडल को दर्शाती है

जहां ‘सिकार’ ने भावुक कर दिया, वहीं ‘नीलगिरी – अ शेयर्ड वाइल्डरनेस’ की टीम ने विस्मय का अनुभव कराया। सहयोगी निर्माता आदर्श एनसी ने 8के और 12के में शूट की गई एक वन्यजीव वृत्तचित्र बनाने के लिए आवश्यक धैर्य के बारे में बताया, जिसमें अरबों वर्षों से आकार ले रहे इस क्षेत्र की दुर्लभ प्रजातियों को कैद किया गया है। उन्होंने कहा, “हमारी फिल्म के नायक वन्यजीव हैं। वे समय पर नहीं आते। कोई पुन: फिल्‍मांकन नहीं होता है,” उन्होंने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि कैसे कभी-कभी एक शॉट लेने में तीन महीने लग जाते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि यह वृत्तचित्र सह-अस्तित्व के बारे में बताता है। “यह इस बारे में है कि हम अपने-अपने घरों के आस-पास के जंगलों को कैसे साझा करते हैं। हम लोगों के घरों में गए और उनके आस-पास रहने वाली प्रजातियों को खोजा।”

टीम के सदस्य श्री हर्ष ने इस तरह के फिल्म निर्माण की अप्रत्याशित प्रकृति का वर्णन करते हुए कहा: “हमें बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि हम क्या फिल्माने वाले हैं। हमें नहीं पता था कि जानवर कहां हैं। कैमरे के पीछे एक विशाल शोध दल था जो हमें वन्यजीवों की गतिविधियों के बारे में जानकारी देता रहा। अंततः आपको उस कहानी का अंदाज़ा हो जाता है जिसे आप गढ़ रहे हैं।”

यह पूछे जाने पर कि क्या वैश्विक वृत्तचित्र दिग्गजों ने फिल्म को प्रभावित किया है, आदर्श ने कहा: “‘नीलगिरी’ एक मेक-इन-इंडिया फिल्म है। इसके पीछे हर व्यक्ति भारतीय है।” हर्ष ने आगे कहा, “हम वैश्विक तकनीक और प्रतिभा से सीखते हैं, और उसे भारतीय प्रणाली में लाते हैं। हमें उम्मीद है कि एक दिन हम वैश्विक उद्योग के लिए एक आदर्श बनेंगे।”

आदर्श ने यह भी बताया कि ओटीटी के लिए पूछताछ ज़ोरदार रही है, लेकिन टीम चाहती है कि दर्शक ‘नीलगिरी’ को बड़े पर्दे पर देखें। उन्होंने कहा, “कई वृत्तचित्र सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच पाते हैं लेकिन ‘नीलगिरी’ ने अच्छा प्रदर्शन किया। ओटीटी मायने रखता है, लेकिन बाद में।”

‘मुक्कम पोस्ट बोम्बिलवाडी’: हास्‍य औपनिवेशिक युग की अराजकता को हास्‍य रूप में दर्शाती है

एक नया जोश लाते हुए, ‘मुक्कम पोस्ट बॉम्बिलवाड़ी’ की टीम ने अपने हास्य-मिलन-इतिहास कथा से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। निर्देशक परेश मोकाशी और निर्माता भरत शितोले ने अपने मूल नाटक को 1942 की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म में रूपांतरित करने की चुनौती और आनंद पर चर्चा की, जहां एक शांत तटीय मराठी गांव खुद को स्वतंत्रता संग्राम और द्वितीय विश्व युद्ध की अराजकता, दोनों में उलझा हुआ पाता है।

इतनी गंभीर पृष्ठभूमि के साथ हास्‍य के मिश्रण पर परेश ने कहा, “गरीबी जैसे विषयों पर बेहतरीन हास्‍य फ़िल्में बनाई गई हैं।” उन्होंने आगे बताया कि कैसे हास्य सच्चाई को कमज़ोर नहीं करता, बल्कि अक्सर उसे और बेहतर ढंग से दिखाता है।”

ओटीटी द्वारा क्षेत्रीय सिनेमा को आकार देने के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए, परेश ने कहा कि यह सफ़र घर से शुरू होता है। “क्षेत्रीय फिल्मों को वैश्विक स्तर पर पहुंचने से पहले स्थानीय दर्शकों का समर्थन हासिल करना होगा।” निर्माता भरत शितोले ने भी यही बात दोहराई और कहा कि ओटीटी ने अवसरों का विस्तार किया है, लेकिन क्षेत्रीय फिल्मों को अभी भी इन प्लेटफॉर्म्स पर समान रूप से दिखाई देने की ज़रूरत है।

प्रेस सम्‍मेलन में भारत की सिनेमाई विविधता का एक व्यापक दृश्य प्रस्तुत किया गया जिसमें नीलगिरी के प्राचीन पारिस्थितिक तंत्र से लेकर बॉम्बिलवाड़ी की जोशीली प्रफुल्लता और महाद्वीपों में फैले असमिया जीवन की भावनात्मक झलक शामिल थी। प्रत्येक टीम ने बातचीत में ईमानदारी, गर्मजोशी और रचनात्मक स्पष्टता दिखाई, जिससे यह सत्र इस बात की याद दिलाता है कि आईएफएफआई किस चीज़ का समारोह मनाता रहता है: एक ऐसा सिनेमा तंत्र जहां हर कहानी मायने रखती है, हर क्षेत्र को अपनी आवाज़ मिलती है, और हर फिल्म निर्माता अपनी एक अलग दुनिया लेकर आता है।

आईएफएफआई के बारे में

1952 में स्थापित भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) दक्षिण एशिया में सिनेमा का सबसे पुराना और सबसे बड़ा उत्सव है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी),  सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार और एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ गोवा (ईएसजी), गोवा सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह महोत्सव एक वैश्विक सिनेमाई महाशक्ति के रूप में विकसित हुआ है—जहां पुनर्स्थापित क्लासिक फिल्में साहसिक प्रयोगों से मिलती हैं, और दिग्गज कलाकार नए कलाकारों के साथ मंच साझा करते हैं। आईएफएफआई को वास्तव में शानदार बनाने वाला इसका विद्युत मिश्रण अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक प्रदर्शन, मास्टरक्लास, श्रद्धांजलि और ऊर्जावान वेव्‍स फिल्म बाजार हैं जहां विचार, सौदे और सहयोग उड़ान भरते हैं। 20 से 28 नवंबर तक गोवा की शानदार तटीय वातावरण में आयोजित 56वें आईएफएफआई में भाषाओं, शैलियों, नवाचारों और आवाज़ों की एक चमकदार श्रृंखला का संयोजन देखने को मिलेगा। —

सदमे से जीत तक: 12 वर्षीया लड़की ‘कार्ला’ की सशक्त कहानी ने जीता दर्शकों का दिल

गोआ।  12 वर्षीया कार्ला के साहसिक अदालती संघर्ष से लेकर 11 वर्षीया फुकी की कल्पनाशील दुनिया तक, आईएफएफआई के पर्दे दिल में बस जाने वाली कहानियों और इन मार्मिक कहानियों के पीछे की उन सफर से जगमगा उठे, जिसमें साहस, जिज्ञासा और कल्पनाशीलता बचपन की परेशानियों को सिनेमाई जीत में बदल देती है।

56वें आईएफएफआई में आज एक रोचक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। इसमें ‘कार्ला’ की निर्देशक क्रिस्टीना थेरेसा टूर्नाट्जेस और ‘रेनॉयर’ के सह-निर्माता क्रिस्टोफ ब्रंचर ने अपनी प्रशंसित फिल्मों के पीछे की कहानियां साझा कीं।

निर्देशक क्रिस्टीना थेरेसा टूर्नाट्जेस ने ‘कार्ला’ को पर्दे पर जीवंत करने के बारीक और भावनात्मक सफर के बारे में बात की। इस फिल्म में 12 वर्ष की कार्ला की दर्दनाक सच्ची कहानी है, जो एक साहसी लड़की है और दुर्व्यवहार करने वाले अपने पिता का सामना करती है। मात्र दो गवाहों वाला यह मुकदमा “शब्दों के खिलाफ शब्दों” की एक तनावपूर्ण लड़ाई बन जाता है और कार्ला के लिए, अपने सदमे को बयान करना दिल दहला देने वाला और बेहद चुनौतीपूर्ण हो   जाता है।

यह फिल्म कार्ला के नजरिए को गहराई से दर्शाती है और सदमे से उपजी खामोशियों, झिझक और अवाकता की स्थिति को सामने लाती है। न्यायाधीश एक निर्णायक किरदार बन जाता है। वह एकमात्र ऐसा व्यक्ति होता है जो कार्ला की बातों को सचमुच सुनता है और उसे मुखर होने  में मदद करता है। इस कहानी की प्रामाणिकता पारिवारिक इतिहास में निहित है और कार्ला का एक रिश्तेदार इस कहानी के साथ उभरता है और इसे एक आजीवन परियोजना में बदल देता है और आखिरकार इसे पर्दे पर उतार देता है।

क्रिस्टीना ने इस फिल्म की सार्वभौमिक प्रासंगिकता पर जोर दिया। बच्चों के खिलाफ यौन उत्पीड़न एक व्यापक वैश्विक मुद्दा है और ‘कार्ला’ ने पीड़िता की कहानी पर ध्यान केन्द्रित करते हुए बच्ची की गरिमा को भी ध्यान में रखा है।

उन्होंने म्यूनिख में इस फिल्म के प्रीमियर के बारे में भी बताया और इसे “बेहतरीन सफलता” करार दिया। उन्होंने आईएफएफआई में पहली बार भारत में इसे पेश करने के रोमांच को साझा किया। 12 वर्षीया मुख्य कलाकार के साथ काम करते हुए, क्रिस्टीना ने एक सुरक्षित और निखारने वाले माहौल बनाने पर जोर दिया ताकि बाल कलाकार का अभिनय सहज, वास्तविक और सम्मोहक लगे।

रेनॉयर: एक बच्चे की जादुई कल्पना के माध्यम से दुनिया को देखना

सह-निर्माता क्रिस्टोफ ब्रंचर ने ‘रेनॉयर’ के पर्दे के पीछे की कहानी की एक दिलचस्प झलक पेश की। यह फिल्म 11 वर्षीया फुकी की नजरों से बचपन की आकर्षक दुनिया को दर्शाती है।

भले ही इसका शीर्षक प्रसिद्ध फ्रांसीसी चित्रकार की ओर इशारा करता है, लेकिन ब्रंचर ने बताया, “यह किसी व्यक्ति के जीवन पर आधारित फिल्म (बायोपिक) नहीं है। एक प्रभाववादी कला (इम्प्रेशनिस्ट पेंटिंग) की तरह, यह कहानी छोटे-छोटे एवं बिखरे हुए पलों से बनी है, जिन्हें एक साथ देखने पर एक समृद्ध भावनात्मक तस्वीर बनती है। यही बात इस फिल्म को जीवंत और काव्यात्मक बनाती है।”

वर्ष 1987 में जापान में आए आर्थिक उछाल के दौरान टोक्यो की जिंदगी पर आधारित, ‘रेनॉयर’, पिता की लाइलाज बीमारी और मां के बढ़ते तनाव से जूझने वाली फुकी नाम की एक संवेदनशील और जिज्ञासु लड़की की कहानी है। अपने अकेलेपन और बढ़ते हुए दबावों से निपटने के लिए, वह कल्पना, दूरसंवेदन (टेलीपैथी) और चंचल प्रयोगों की एक जादुई दुनिया में खो जाती है – यहां तक कि वह डेटिंग हॉटलाइन पर कॉल भी करती है!

ब्रंचर ने फुकी के सफर की सार्वभौमिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “हम यह दिखाना चाहते थे कि बच्चे बड़ी व वयस्कों वाली समस्याओं को अपने आंतरिक तर्क से कैसे समझते हैं। फुकी की कल्पनाशीलता ही दुनिया को समझने का उसका तरीका है।”

ब्रंचर ने कहा कि यह फिल्म बचपन, परिवार और सामाजिक बदलाव की कड़वी-मीठी सच्चाइयों को बड़ी ही बारीकी से दर्शाती है। उन्होंने कहा, “फुकी की भूमिका निभाने वाली युवा अभिनेत्री का अभिनय अद्भुत है – तकनीकी रूप से सशक्त, सहज और भावनात्मक रूप से मनमोहक। भले ही वह कान्स में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार पाने से चूक गईं, लेकिन एशिया पैसिफिक स्क्रीन अवार्ड्स में उसे सर्वश्रेष्ठ नवोदित कलाकार का पुरस्कार मिला, जिसने एक असाधारण प्रतिभा के तौर पर उसकी हैसियत को और पुख्ता किया।”

‘रेनॉयर’ बचपन के आश्चर्य, जिज्ञासा और साहस का उत्सव है, जो दर्शकों को खेल और जीवन की कठोर वास्तविकताओं के बीच नाजुक संतुलन बनाने वाली बच्ची की नजरों से दुनिया को देखने के लिए आमंत्रित करता है।

फिल्म के बारे में
1. कार्ला
जर्मनी | 2025 | जर्मन | 104′ | रंगीन

‘कार्ला’ 1962 के म्यूनिख में घटित वास्तविक जीवन की एक भावनात्मक कहानी पर आधारित ड्रामा है। यह 12 वर्षीया कार्ला की सच्ची कहानी बयान करती है, जो वर्षों से चले आ रहे यौन उत्पीड़न से सुरक्षा की मांग करते हुए, दुर्व्यवहार करने वाले अपने पिता के खिलाफ साहसपूर्वक आरोप दायर करती है। अक्सर बाल पीड़ितों की उपेक्षा करने वाली एक न्याय व्यवस्था में, कार्ला अपनी कहानी अपने तरीके से कहने पर अड़ी रहती है और इस प्रक्रिया में एक न्यायाधीश उसका प्रमुख समर्थक बन जाता है। यह फिल्म यौन उत्पीड़न के सदमे की पड़ताल करती है और एक लड़की के साहस एवं अपनी गरिमा को बचाने के उसके संघर्ष को दर्शाती है। इस फिल्म में बिना किसी ताक-झांक के कार्ला की आवाज का सम्मान किया जाता है।

2. रेनॉयर
जापान, फ्रांस, सिंगापुर, फिलीपींस, इंडोनेशिया, कतर | 2025 | जापानी | 116’ | रंगीन
वर्ष 1987 में जापान में आए आर्थिक उछाल के दौरान टोक्यो की जिंदगी पर आधारित, यह फिल्म 11 वर्षीया फुकी की कहानी है, जो एक जिज्ञासु और संवेदनशील लड़की है और अपने गंभीर रूप से बीमार पिता और तनाव की शिकार मां उताको ओकिता की देखभाल कर रही है। भावनात्मक और आर्थिक दबावों का सामना कर रहे अपने माता-पिता से अलग, फुकी अपनी ही दुनिया में शरण लेती है। वह जादू और टेलीपैथी को आजमाती है और डेटिंग हेल्पलाइन पर कॉल भी करती है। दोस्ती बनाते और वयस्कों वाली चुनौतियों का सामना करते हुए, वह अकेलेपन और दर्द का अनुभव करती है। यह फिल्म नुकसान और बड़े होने के क्रम में उसके शांत लेकिन साहसी सफर को दर्शाती है, जिसमें बचपन, पारिवारिक संघर्षों और सामाजिक बदलाव की कड़वी-मीठी जटिलताओं को दर्शाया गया है।

आईएफएफआई के बारे में

वर्ष 1952 में शुरू किया गया, भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) दक्षिण एशिया में सिनेमा के सबसे पुराने और सबसे बड़े उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित है। भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) और गोवा सरकार के एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ गोवा (ईएसजी), द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित, यह महोत्सव एक ऐसे वैश्विक सिनेमाई महाशक्ति के रूप में विकसित हुआ है – जहां जीर्णोद्धार की प्रक्रिया के बाद वापस हासिल गई पुरानी फिल्मों (क्लासिक्स) और साहसिक प्रयोगों का संगम होता है और दिग्गज हस्तियां तथा निडर नवोदित प्रतिभाएं एक साथ मंच साझा करती हैं। आईएफएफआई को वास्तव में चमकदार बनाने वाला अद्भुत मिश्रण है – अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक प्रदर्शन, मास्टरक्लास, श्रद्धांजलि और उच्च ऊर्जा वाला वेव्स फिल्म बाजार, जहां विचार, सौदे और सहयोग उड़ान भरते हैं। 20 से 28 नवंबर तक गोवा की मनोरम तटीय पृष्ठभूमि में आयोजित, आईएफएफआई 56वां संस्करण विभिन्न भाषाओं, शैलियों, नवाचारों और आवाजों की एक चमकदार श्रृंखला का वादा करता है – जोकि वैश्विक मंच पर भारत की रचनात्मक प्रतिभा का एक मनमोहक उत्सव है।

स्वतंत्र सिनेमा में महिलाओं ने मांगी समानता, दृश्यता और रचनात्मक स्वतंत्रता

स्वतंत्र सिनेमा के माध्यम से एक वैश्विक भारत: एक महिला पैनल’  शीर्षक वाली पैनल चर्चा में चार प्रभावशाली हस्तियाँ एक साथ आईं—अभिनेत्री-फिल्मकार रजनी बसुमतारी, छायाकार फ़ौज़िया फ़ातिमा, अभिनेत्री-फिल्मकार रैचेल ग्रिफ़िथ्स, और अभिनेत्री मीनाक्षी जयन। इस बातचीत में यह पता लगाया गया कि कैसे महिलाओं की रचनात्मक और व्यक्तिगत यात्राएँ स्वतंत्र सिनेमा के भविष्य को आकार दे रही हैं।

यह चर्चा महिलाओं की फिल्म निर्माण कला के एक परिभाषित तत्व के रूप में संवेदना पर विचारों के साथ शुरू हुई। फ़ौज़िया ने बताया कि कैसे एक विचार की शुरुआत से लेकर अंतिम फ्रेम तक, संपूर्ण रचनात्मक प्रक्रिया संवेदना पर आधारित होती है, जो फिल्म निर्माताओं को स्थानीय कथाओं को वैश्विक स्तर पर गूंजने वाली कहानियों में बदलने में सक्षम बनाती है। रजनी ने आगे कहा कि महिलाएँ अक्सर जीवन के छोटे से छोटे विवरणों पर ध्यान देती हैं, और ये ही सूक्ष्म अवलोकन उनकी फिल्मों को उन कहानियों को आवाज़ देने की अनुमति देते हैं जो शायद अन्यथा अनकही रह जातीं।

जब बातचीत प्रतिनिधित्व पर छिड़ी तो पैनल ने इस बात पर विचार किया कि क्या महिलाएँ आज उद्योग में खुद को अधिक दिखते हुए महसूस करती हैं। रैचेल ने साझा किया कि उनके अपने उद्योग में महिला छायाकार और निर्माताओं की संख्या बढ़ रही है। फ़ौज़िया ने इंडियन विमेन सिनेमैटोग्राफ़र्स कलेक्टिव के विकास का उल्लेख किया, जो 2017 में कुछ सदस्यों के साथ शुरू हुआ था और अब कनिष्ठ से लेकर वरिष्ठ तक, लगभग दो सौ तक बढ़ गया है। उन्होंने समझाया कि यह कलेक्टिव किस तरह मार्गदर्शन और सहयोग को बढ़ावा देता है, जो महिलाओं को उद्योग में लंबे समय से अपेक्षित सहायक वातावरण प्रदान करता है। उन्होंने आईएफएफआई में महिला छायाकारों की उपस्थिति का भी जश्न मनाया, जिसमें उन्होंने ‘विमुक्ति’  में शेली शर्मा की कला और ‘शेप ऑफ मोमो’  में अर्चना घांग्रेकर की कला की प्रशंसा की।

रजनी ने याद किया कि कैसे दो साल पहले, उन्हें अपने एक प्रोजेक्ट के लिए इसी कलेक्टिव  की एक सिनेमेटोग्राफर  के पास भेजा गया था, जिसने इस तरह के नेटवर्कों के प्रभाव की पुष्टि की। मीनाक्षी ने केरल राज्य सरकार द्वारा समर्थित पहल को रेखांकित किया, जो महिलाओं द्वारा बनाई गई फिल्मों को वित्त पोषित करती है। उन्होंने साझा किया कि उनकी फिल्म ‘विक्टोरिया’ इसी अवसर से विकसित हुई। फ़ौज़िया, जिन्होंने महिलाओं के नेतृत्व वाली फिल्मों का समर्थन करने वाली इस केरल राज्य सरकार की पहल के पहले चयन पैनल में काम किया था, ने पुरुषों द्वारा महिलाओं के नाम पर प्रोजेक्ट जमा करने के बारे में चिंताएँ व्यक्त कीं, जो निरंतर सतर्कता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

इसके बाद पैनलिस्ट फिल्म निर्माण को व्यक्तिगत जीवन के साथ संतुलित करने की चुनौतियों पर आगे बढ़े। रैचेल ने तीन बच्चों की परवरिश करते हुए उद्योग में काम करने के बारे में खुलकर बात की, और महिलाओं का समर्थन करने के लिए बारी-बारी से काम करने वाले सप्ताह  जैसे मॉडलों का सुझाव दिया। फ़ौज़िया ने मातृत्व के बाद अपनी कला में लौटने की कठिनाई साझा की और इस बात के लिए आभार व्यक्त किया कि उनका करियर जारी रह सका, खासकर विजय सेतुपति अभिनीत उनकी आगामी व्यावसायिक फिल्म ‘ट्रेन’ के साथ।

कलाकारों द्वारा सेट पर नैरेटिव्स को किस प्रकार आकार दिया जाता है, इस सवाल पर मीनाक्षी ने टिप्पणी की कि नए कलाकारों में अक्सर अपने सहयोगियों को चुनने की स्वतंत्रता की कमी होती है, लेकिन जैसे-जैसे उनका करियर बढ़ रहा है, उन्हें उम्मीद है कि वह और अधिक महिला फिल्म निर्माताओं के साथ काम करेंगी। रजनी ने गौर किया कि ओटीटी  प्लेटफॉर्म ने महिलाओं के लिए उपलब्ध भूमिकाओं के प्रकार का विस्तार किया है, जिससे उन्हें अधिक गहराई और उपस्थिति मिली है। फ़ौज़िया ने आगे कहा कि अब अधिक महिला अभिनेत्रियां निर्माण  के क्षेत्र में भी कदम रख रही हैं, जिससे रचनात्मक निर्णय लेने वालों का दायरा बढ़ रहा है। मीनाक्षी ने भविष्य में फिल्में बनाने की अपनी इच्छा के बारे में बात की, जबकि रैचेल ने हॉलीवुड में महिला निर्माताओं की लंबी उपस्थिति और उन चुनौतियों पर विचार किया जिनसे वे लगातार जूझ रही हैं। रैचेल ने वेतन समानता पर भी बात की, और कहा कि सार्थक बदलाव के लिए पुरुषों को इस असंतुलन को स्वीकार करने और महिलाओं के लिए निष्पक्षता सुनिश्चित करने वाले प्रयासों का समर्थन करने की आवश्यकता है।

जब चर्चा लेखन और प्रक्रिया की ओर मुड़ी, तो रजनी ने अपनी कहानियों को स्थानीय वास्तविकताओं और अपने क्षेत्र द्वारा अनुभव किए गए पीढ़ीगत दर्द में स्थापित करने की बात की। उनकी सबसे हालिया फिल्म में लैंगिक न्याय का पता लगाने के लिए पूरी तरह से महिला कलाकारों को शामिल किया गया है। मीनाक्षी ने कहा कि उनकी फिल्म ‘विक्टोरिया’ पूरी तरह से महिला कलाकारों के साथ बनाई गई थी, एक ऐसा चुनाव जिसने अक्सर सवाल खड़े किए, सिर्फ इसलिए क्योंकि इसने सामान्य ढाँचे को बदल दिया था।

जैसे ही पैनल फिल्मों को बनाने और उन्हें बनाए रखने की वास्तविकताओं की ओर मुड़ा, रैचेल ने टिप्पणी की कि फिल्म निर्माताओं को ऐसी कहानियाँ बनानी चाहिए जो अपने दर्शकों को पा सकें, इस बात पर भरोसा करते हुए कि सही कथा उन लोगों तक पहुँचेगी जिनके लिए वह बनी है। रजनी ने आगे कहा कि उनकी फिल्में छोटे बजट में बनी हैं और उन्हें महिला निर्माताओं का समर्थन मिला है, और उन्होंने सुनिश्चित किया कि उन्हें कभी नुकसान न हो।

जब सत्र अपने समापन के करीब पहुँचा, तो पैनलिस्टों से पूछा गया कि उनके अनुसार कौन सी फिल्में हैं जो सभी को देखनी चाहिए। रैचेल ने लड़कियों के उत्सव के लिए ‘दंगल’ का नाम लिया; फ़ौज़िया ने ‘द पावर ऑफ़ द डॉग’  को चुना; रजनी ने ‘आर्टिकल 15’ और ‘आई इन द स्काई’  की सिफारिश की; और मीनाक्षी ने चिंता के चित्रण के लिए ‘शिवा बेबी’  को चुना, और एक चंचल मुस्कान के साथ जोड़ा कि वह अपनी खुद की फिल्म ‘विक्टोरिया’ की भी सिफारिश करेंगी।

यह सत्र गर्मजोशी और संभावना के पलों के साथ समाप्त हुआ। मीनाक्षी ने ऑस्ट्रेलियाई फिल्म उद्योग की उसके प्रगतिशील परिदृश्य के लिए प्रशंसा की और एडिलेड फिल्म फेस्टिवल में देखी गई एक फिल्म को याद किया जिसमें वह अभिनय करना चाहती थीं। रैचेल ने सौहार्दपूर्ण जवाब दिया, यह सुझाव देते हुए कि चारों महिलाएँ एक दिन सहयोग कर सकती हैं, जो उस दोपहर की भावना को दर्शाता है: महिलाएँ एक साथ नए भविष्य की कल्पना कर रही हैं, और स्वतंत्र सिनेमा उन भविष्य की शुरुआत के लिए जगह प्रदान कर रहा है।

आईएफएफआई के बारे में

1952 में शुरु हुआ, भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) दक्षिण एशिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े सिनेमा उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी), सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार और एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ गोवा (ईएसजी), गोवा राज्य सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह महोत्सव एक वैश्विक सिनेमाई शक्ति के रूप में विकसित हुआ है – जहाँ पुनर्स्थापित क्लासिक्स और नए प्रयोगों का संगम होता है और दिग्गज कलाकार पहली बार यहां आने वाले लोगों के साथ विचार साझा करते हैं। आईएफएफआई को वास्तव में प्रसिद्ध बनाने वाला इसका आकर्षण है जहां अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक प्रदर्शन, मास्टरक्लास, श्रद्धांजलि और उच्च-ऊर्जा वेव्स फिल्म बाजार, जहां विचार और सहयोग उड़ान भरते हैं। 20 से 28 नवंबर तक गोवा की तटीय पृष्ठभूमि में आयोजित, 56वां संस्करण भाषाओं, शैलियों, नवाचारों और आवाजों के एक चकाचौंध भरे इंद्रधनुष का वादा करता है जो विश्व मंच पर भारत की रचनात्मक प्रतिभा का एक व्यापक उत्सव है।

इफ्फी का चौथा दिन: क्रिएटिव माइंड्स और सिनेमैटिक आइकॉन्स का महासंगम

गोआ। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) 2025 का चौथा दिन वैश्विक प्रतिभा के एक ऊर्जावान संगम के रूप में चिह्नित हुआ, जिसका मुख्य आकर्षण इंटेंस क्रिएटिव चैलेंज और इंस्पायरिंग मास्टरक्लास रहे।

इस दिन की शुरुआत ‘क्रिएटिव माइंड्स ऑफ टुमॉरो’ (सीएमओटी) की 48 घंटे की चुनौती के भव्य समापन के साथ हुई। अपनी अंतिम कृतियाँ प्रस्तुत करते समय, युवा फिल्मकारों में थकान, राहत और खुशी का मिश्रित भाव स्पष्ट रूप से देखा गया।

पीआईबी मीडिया सेंटर महोत्सव की धड़कन का केंद्र बना रहा, जहाँ कई बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गईं। ‘डी टैल पालो’ (इवान डेरिएल ओर्टिज़ लैंड्रॉन, जोस फेलिक्स गोमेज़) और ‘पाइक रिवर’ (रॉबर्ट सार्किज) फिल्मों के निर्देशकों और अभिनेताओं ने अपनी आकर्षक कहानियों पर चर्चा की, वहीं ‘सीसाइड सेरेंडिपिटी’ (टोमोमी योशिमुरा) और ‘टाइगर’ (अंशुल चौहान, कोसेई कुडो, मीना मोटेकी) की टीमों ने एशियाई सिनेमा की मजबूत उपस्थिति पर प्रकाश डाला।

भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा और डॉक्यूमेंट्रीज ने जोरदार चमक बिखेरी। संदेश कदुर, परेश मोकाशी और देबांगकर बोरगोहेन ने अपनी विशिष्ट फिल्मों—’नीलगिरीज़ – अ शेयर्ड वाइल्डरनेस’, ‘मुक्काम पोस्ट बॉम्बिलवाड़ी’ और ‘शिकार’—के लिए मीडिया से बात की। इंटरनेशनल आर्टिस्ट्री ने भी सबको लुभाया, जब निर्देशक क्रिस्टीना थेरेसा टूरनात्ज़ेस (‘कार्ला’) और हयाकावा ची (‘रेनॉयर’) ने एक संयुक्त सत्र के दौरान अपनी क्रिएटिव जर्नी साझा कीं।

चौथे दिन का मुख्य आकर्षण बहुप्रतीक्षित मास्टरक्लास ‘गिविंग अप इस नॉट ए चॉइस!’ रही। कला अकादमी में, दिग्गज अभिनेता और वक्ता अनुपम खेर ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने एक शक्तिशाली और प्रेरणादायक संबोधन दिया, जिसने उस दिन के ‘दृढ़ता’ और ‘उत्कृष्टता के प्रति जुनून’ के भाव को पुख्ता कर दिया।

सीएमओटी की चुनौती के 48 घंटे पूरे होने पर

56वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) 2025 में 48 घंटे की ‘क्रिएटिव माइंड्स ऑफ टुमॉरो’ (सीएमओटी) चुनौती का समापन समारोह आज, 23 नवंबर 2025 को, गोवा के कला अकादमी में हुआ।

पीआईबी मीडिया सेंटर में “डी टैल पालो” के निर्देशक इवान डेरियल ऑर्टिज़ लैंड्रोन और अभिनेता जोस फेलिक्स गोमेज तथा ‘पाइक रिवर’ के निर्देशक रॉबर्ट सरकीज ने संयुक्त रूप से मीडिया को संबोधित किया। यह प्रेस कॉन्फ्रेंस इन फिल्मों की कहानियों और उनके निर्माण की प्रेरणाओं को जानने का एक महत्वपूर्ण अवसर रही।

‘डी टैल पालो’ के निर्देशक इवान डेरियल ओर्टिज लैंड्रोन और अभिनेता जोस फेलिक्स गोमेज ने ‘पाइक रिवर’ के निर्देशक रॉबर्ट सर्कीज के साथ मिलकर 23 नवंबर 2025 को पीआईबी मीडिया सेंटर में मीडिया को संबोधित किया। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों फिल्मों की प्रेरक कहानियों पर गहराई से चर्चा की गई।

दो दुनिया, एक लय: अजनीश ने लोक संगीत में अपने प्रयोगों से मंत्रमुग्ध किया

गोआ। आईएफएफआई में “द रिदम्स ऑफ इंडिया: फ्रॉम द हिमालयाज टू द डेक्कन” शीर्षक वाला सालाना लता मंगेशकर मेमोरियल टॉक एक जबरदस्त म्यूजिकल सफर की तरह सामने आया, जिसमें यादें, मेलोडी और क्रिएशन का जादू एक साथ बुना गया। म्यूजिक कंपोजर विशाल भारद्वाज और बी. अजनीश लोकनाथ की बातचीत और क्रिटिक सुधीर श्रीनिवास की अगुआई वाले संवाद (डायलॉग) के साथ, इस सत्र ने दर्शकों को दो खास संगीत प्रतिभाओं को अपनी रचनात्मक दुनिया खोलते हुए देखने का एक दुर्लभ मौका दिया।

फिल्ममेकर रवि कोट्टाराक्कारा के वक्ताओं को बधाई देने के साथ, शाम की शुरुआत एक गर्मजोशी से हुई और उन्होंने संगीत को एक ऐसी ताकत बताया जो हमें ऊपर उठाती है और एक साथ बांधती है। उनके शब्दों ने धीरे से एक ऐसी बातचीत शुरू की जो सोचने वाली, मजेदार और गहन संगीतमय थी।

सुधीर ने तुरंत माहौल बना दिया और दर्शकों को याद दिलाया कि अजनीश “सिर्फ ‘कंतारा’ कंपोजर से कहीं ज्यादा हैं,” और उनके और विशाल के बीच, कमरे में “भारतीय संगीत का अतीत, वर्तमान और भविष्य” था। वहां से, चर्चा दो कलाकारों के बीच दिल से हुई बातचीत में बदल गई, जो लंबे समय से एक-दूसरे के काम की तारीफ करते रहे हैं।

सबसे पहले विशाल ने बात करते हुए, ‘कंतारा’ थीम को “अब तक की सबसे बेहतरीन फिल्म थीम में से एक” कहा, और माना कि इसने उन्हें इसके पीछे के कंपोजर को खोजने पर मजबूर कर दिया। अजनीश ने मुस्कुराते हुए और एक याद के साथ जवाब दिया: ‘माचिस’, चप्पा चप्पा, और विशाल के संगीत का अनोखा रिदमिक “स्विंग” जिसने उन्हें बचपन से बनाया था। उन्होंने खुश दर्शकों के लिए रिदम का थोड़ा सा हिस्सा गुनगुनाया भी।

जब बातचीत ‘पानी पानी रे’ पर आई, तो माहौल पूरी तरह बदल गया। विशाल ने बताया कि कैसे पानी की आवाज और नदी किनारे की शांति ने गाने की आत्मा को व्यक्त किया। उन्होंने लता मंगेशकर की सहज परफेक्शन को याद किया कि कैसे वह हर नोट याद रखती थीं, एक ही टेक में गाती थीं और पानी के बहाव को दिखाने के लिए धुन में समायोजन का भी सुझाव देती थीं। उन्होंने कहा, “वह सिर्फ एक गायिका नहीं थीं। वह अपने आप में एक कंपोजर थीं।”

इसके बाद अजनीश ने अपने अनोखे प्रोसेस की एक झलक दिखाई। उन्होंने बताया कि कैसे ‘अय्य्यो’ और ‘अब्बाब्बा’ जैसे अर्थपूर्ण शब्द अक्सर लिरिक्स आने से पहले इमोशन दिखाने के लिए उनकी धुनों में घुस जाते हैं। उन्होंने हंसते हुए कहा कि निर्देशक लगभग हमेशा उन्हें रखने पर जोर देते हैं। रिलीज से 20 दिन पहले ‘वराहरूपम’ को कंपोज करने के दबाव से भरे आखिरी दिनों के बारे में उनके किस्से पर श्रोताओं की तरफ से मजेदार प्रतिक्रियाएं मिलीं।

बातचीत तब फिलॉसफी की तरफ मुड़ गई जब सुधीर ने पूछा कि संगीतकार अक्सर रचनात्मकता में आध्यात्मिक ताकत की बात क्यों करते हैं। विशाल ने अपनी खास साफगोई से जवाब दिया: “शांति के सबसे करीब हम संगीत में आते हैं।” उन्होंने एक धुन के रहस्यमयी, लगभग पवित्र आगमन की बात की, जिसके बारे में उनका मानना है कि वह “कहीं और से” आती है। अजनीश ने सहमत होते हुए कहा कि वह कभी पूरी तरह से समझ नहीं पाए कि वह रचनात्मक स्थिति में कैसे आते हैं और उन्होंने कभी भी ‘कंतारा’ का श्रेय खुद को नहीं दिया।

इसके बाद सत्र में भाषा और संगीत के बीच के मुश्किल तालमेल को देखा गया। अजनीश ने बताया कि कैसे ‘कर्मा’ गाना पूरी दुनिया से जुड़ा है, जबकि दूसरे गाने जो सांस्कृतिक बारीकियों से जुड़े होते हैं, वे हमेशा एक जैसा सफर नहीं करते। विशाल ने मलयालम में कंपोज करने, एमटी वासुदेवन नायर और ओएनवी कुरुप के साथ काम करने के अपने अनुभव याद किए और एक ऐसी भाषा में कंपोज करने की दिलचस्प चुनौतियों को याद किया जिसे वह पूरी तरह से नहीं जानते थे।

इसके बाद लोक संगीत केंद्र में रहा। अजनीश ने लोक संगीत को “मासूमियत से पैदा हुआ” कहा  और बताया कि कैसे ‘कंतारा’ अपने क्लाइमेक्स फ्यूजन तक पूरी तरह से आदिवासी वाद्य यंत्रों पर निर्भर था। उन्होंने कोरगा समुदायों के उदाहरण से भारत की रिदमिक डायवर्सिटी को दिखाया जो अलग-अलग ढोल पैटर्न के ज़रिए बातचीत करते हैं। विशाल ने आगे कहा कि भारत में “कई संस्कृतियां” हैं, जिनमें से हर एक की अपनी बोलियां, टेक्सचर, लोक परंपराएं और म्यूजिकल सिग्नेचर हैं।

संगीत का भविष्य: एआई, लिरिक्स और स्टोरीटेलिंग

जैसे ही सवालों के लिए सत्र शुरू हुआ, लिरिक्स और स्टोरीटेलिंग से लेकर एआई और संगीत के भविष्य तक चर्चा हुई। अजनीश ने कहा कि एआई कुछ खास मामलों में मदद कर सकता है, वहीं विशाल ने तकनीक से नहीं डरने की बात करते हुए दर्शकों को याद दिलाया: “हम सीखेंगे कि क्या इस्तेमाल करना है और क्या छोड़ना है।”

आखिर में, मेमोरियल टॉक ने नाइटिंगेल ऑफ़ इंडिया को सम्मान देने से कहीं अहम काम किया। इसमें क्लासिकल से लेकर फोक तक, व्यक्तिगत यादों से लेकर आध्यात्मिक सोच तक, भारतीय संगीत के बड़े परिदृश्य को दिखाया गया, और दर्शकों को रचनात्मकता को उसके सबसे साफ रूप में देखने का मौका दिया। यह सिर्फ नाम से नहीं, बल्कि एक श्रद्धांजलि थी। इसमें रिदम, संस्कृति, याद और उन अनगिनत धुनों का उत्सव शामिल है, जो भारतीय कल्पना को आकार देती हैं।

आईएफएफआई के बारे में

1952 में शुरू हुआ, भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) दक्षिण एशिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा सिनेमा महोत्सव है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार और एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ गोवा (ईएसजी), गोवा राज्य सरकार मिलकर इसकी मेजबानी करते हैं। यह महोत्सव एक वैश्विक सिनेमा पावरहाउस बन गया है-जहां रिस्टोर की गई क्लासिक फिल्में साहसिक प्रयोग से मिलती हैं और महान उस्ताद पहली बार आने वाले निडर लोगों के साथ जगह साझा करते हैं।

आईएफएफआई को जो चीज सच में शानदार बनाती है, वह है इसका बेहतरीन मिश्रण—अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा, सांस्कृतिक प्रदर्शन, मास्टरक्लास, श्रद्धांजलि और ऊर्जावान वेव्स फिल्म बाजार, जहां आइडिया, समझौते और भागीदारी उड़ान भरते हैं। 20-28 नवंबर तक गोवा की शानदार तटीय पृष्ठभूमि में होने वाला 56वां एडिशन, भाषाओं, शैलियों, नवाचार और आवाजों की एक शानदार रेंज का वादा करता है जो दुनिया के मंच पर भारत की रचनात्मक प्रतिभा का एक जबरदस्त उत्सव है।

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भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) में क्षेत्रीय सिनेमा की विविधता और भव्यता की झलक

सांस्कृतिक स्वीकृति, फिल्म के प्रति समर्पण और टीमवर्क सफल क्षेत्रीय फिल्म के प्रमुख तत्व हैं: निर्देशक राजू चंद्रा

कहानी, निर्देशन और अभिनय में मजबूत होने पर क्षेत्रीय फिल्में असाधारण प्रदर्शन कर सकती हैं: निर्देशक मिलिंद लेले

56वें  भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) में भारत के क्षेत्रीय सिनेमा की समृद्ध विविधता का प्रदर्शन किया जा रहा है। इनमें से दो क्षेत्रीय फिल्मों- ‘पिरंथनाल वझथुकल’ (तमिल) और ‘दृश्य अद्रुश्य’ (मराठी) की टीमों ने आज मीडिया से बातचीत की।

निर्देशक राजू चंद्रा ने तमिल फिल्म ‘पिरंथानाल वजथुकल’ के निर्माण के अपने अनुभव साझा करते कहा कि स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित फिल्मों के निर्माण को न केवल अपने समुदाय से, बल्कि अन्य सांस्कृतिक समूहों से भी प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक स्वीकृति, फिल्म के प्रति समर्पण और टीम वर्क एक सफल क्षेत्रीय फिल्म के प्रमुख तत्व हैं। इस फिल्म के मुख्य अभिनेता अप्पुकुट्टी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपस्थित थे।

मराठी फिल्म ‘दृश्य अद्रुश्य’ के बारे में बात करते हुए निर्देशक मिलिंद लेले ने कहा कि इस रोमांचक सस्पेंस थ्रिलर की शूटिंग एक अलग रिसॉर्ट में सिर्फ 8-10 सदस्यों की एक छोटी सी टीम के साथ की गई थी। सीमित संसाधनों के बावजूद, टीम के हर सदस्य के समर्पण ने फिल्म को संभव बनाया।

यह फिल्म जनवरी में रिलीज के लिए तैयार है। बड़े बैनर की रिलीज के बीच एक छोटे बजट की फिल्म कैसे टिक पाएगी के सवाल पर लेले ने कहा कि हर फिल्म अपनी कुंडली लेकर आती है। दर्शक ही फिल्म का सफर तय करते हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय फिल्में अगर कहानी, निर्देशन और अभिनय में मजबूत हों तो असाधारण प्रदर्शन कर सकती हैं। यह सब टीम वर्क की बात है। उन्होंने आगे कहा कि बड़े बैनर की फिल्मों की भीड़ में, अब क्षेत्रीय सिनेमा को न केवल अच्छा, बल्कि बहुत अच्छा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय सिनेमा अपने लोगों और उनकी परंपराओं के सच्चे सांस्कृतिक सार का प्रतिनिधित्व करता है।

‘दृश्य अद्रुश्य’ का सारांश:

‘दृश्य अद्रुश्य’ एक पिकनिक स्थल की शांत लेकिन रहस्यमयी पृष्ठभूमि पर आधारित एक मनोरंजक कहानी है जहां एक छोटी बच्ची के अचानक गायब होने से कई विचलित करने वाली घटनाएं घटित होती हैं। यह फिल्म मानवीय भावनाओं, सामाजिक जटिलताओं और जीवन को प्रभावित करने वाली दृश्य और अदृश्य शक्तियों के बीच के अंतर को गहराई से दर्शाती है। कहानी लड़की के परिवार, स्थानीय अधिकारियों और आसपास के लोगों के दृष्टिकोणों से सामने आती है, जिनमें से हर कोई भय, अनिश्चितता और छिपे हुए सत्य से जूझ रहा है। जैसे-जैसे तनाव बढ़ता है और रहस्य सामने आते हैं, कहानी आस्था, भय और वास्तविकता की एक सशक्त खोज में विकसित होती है। भावनात्मक तीव्रता के साथ कच्चे यथार्थवाद के मेल से यह फिल्म बताती है कि कैसे अदृश्य मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शक्तियां मानवीय कार्यों और निर्णयों को संचालित करती हैं।

पिरांथनाल वाजथुकल (तमिल) का सारांश

गांव के युवकों के समूह का नेतृत्व करने वाले अनपु (अप्पुकुट्टी) शराब और धूम्रपान का आदी है। उसकी पत्नी, पारिवारिक मित्रों और गांव वालों ने उसकी जीवनशैली का विरोध किया और उन्हें अत्यधिक शराब पीने से मना किया। उसकी पत्नी गर्भवती है और बच्चे को जन्म देने वाली है। अनपु का मानना है कि शराब ही जीवन में आनंद का एकमात्र स्रोत है। वह गैर-जिम्मेदाराना जीवन जीता है, परिणामों की परवाह किए बिना मनमानी करता है। एक दिन उसके जीवन ने एक अप्रत्याशित मोड़ लिया और उसने देखा कि समाज उसे, उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों और जीवन के मूल्य को कैसे देखता है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अप्पुकुट्टी अभिनीत यह फिल्म कई मायनों में अनमोल है। “नायक हमें हंसाकर, आंसू बहाकर और गहन चिंतन के लिए प्रेरित करके चकित कर देता है।”

इफ्फी के बारे में

1952 में शुरू हुआ भारतीय अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव (इफ्फी) दक्षिण एशिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा फिल्‍म महोत्‍सव है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी), सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ गोवा (ईएसजी) मिलकर इस महोत्‍सव का आयोजन करते हैं। यह महोत्‍सव वैश्विक सिनेमा का प्रमुख केन्‍द्र बन गया है—जहां साहसिक प्रयोगों से क्लासिक फिल्मों का पुनर्निर्माण होता है और महान हस्तियां नये कलाकारों के साथ मंच साझा करती हैं। इफ्फी को जो चीज वास्‍तव में शानदार बनाती है, वह है-अंतर्राष्‍ट्रीय प्रतिस्‍पर्धा, सांस्‍कृतिक प्रदर्शन, मास्टरक्लास, ट्रिब्यूट और हाई-एनर्जी वेब्‍स फिल्म बाजार, जहां विचार, समझौते और साझेदारियां उड़ान भरते हैं। 20 से 28 नवंबर तक गोवा के खूबसूरत तट पर हो रहा 56वां फिल्‍म महोत्‍सव कई भाषाओं, फिल्‍म विधाओं, नवाचार और आवाजों की एक शानदार श्रृंखला प्रस्‍तुत करता है। यानी वैश्विक मंच पर यह भारत की सृजनात्‍मक उत्‍कृष्‍टता का एक शानदार महोत्‍सव है।