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जैनाचार्य जवाहर पर डाक टिकट और सिक्का जारी

उदयपुर। स्वतंत्रता सेनानी और जैन संत आचार्य जवाहरलालजी महाराज की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में 16 नवम्बर, रविवार को भारत सरकार द्वारा स्मारक रजत सिक्का और डाक टिकट जारी किए गए। भारत सरकार के डाक विभाग की ओर से आचार्य जवाहरलाल पर 5 रुपए मूल्य का स्मारक डाक टिकट व वित्त मंत्रालय द्वारा 150 रुपए मूल्य वर्ग का सिक्का जारी किया। जसकरण बोथरा फाउंडेशन द्वारा मुम्बई राजभवन में आयोजित विमोचन समारोह में महाराष्ट्र एवं गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने स्मारक डाक टिकट जारी किया। पंजाब के राज्यपाल एवं चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाबचंद कटारिया ने स्मारक चतुर्थांश सिक्का जारी किया। इस अवसर पर महाराष्ट्र शासन में कौशल विकास मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा और महाराष्ट्र डाक सर्कल के महानिदेशक अमिताभ सिंह सहित समाज के अनेक गणमान्य महानुभाव उपस्थित थे।
इस अवसर पर सरकार द्वारा जारी होने वाली विवरणिका में उदयपुर के साहित्यकार डॉ. दिलीप धींग द्वारा लिखित आलेख का प्रकाशन किया गया है। आलेख में आचार्य जवाहर के व्यक्तित्व, कृतित्व तथा समाज व राष्ट्र के लिए उनके योगदान को दर्शाया गया है।
श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र मुनि ने बताया कि आचार्य जवाहर भविष्य द्रष्टा भी थे। श्रमण संघ के तृतीय पट्टधर आचार्य देवेन्द्र मुनि जब आठ वर्ष के बालक थे, तब वर्ष 1939 आचार्य जवाहर ने उदयपुर के पंचायती नाहरे में उन्हें देखकर कह दिया था कि यह बालक भविष्य में धर्मोद्योत करने वाला आचार्य बनेगा। डॉ. दिलीप धींग ने बताया कि आचार्य जवाहर के उदयपुर में चार चातुर्मास हुए थे। उनके नाम से उदयपुर में जवाहर जैन विद्यालय और उदयपुर जिले के कानोड़ कस्बे में जवाहर विद्यापीठ चलता है। जवाहर विद्यापीठ से ग्रामीण क्षेत्र के हजारों विद्यार्थी उच्च शिक्षित बने हैं।

श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र मुनि ने बताया आचार्य जवाहर लाल ने देश पराधीनता में होने के समय दस हजार से अधिक सत्संगों के माध्यम से जनजागरण का कार्य किया। उन्होंने लोगों को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए प्रेरित किया। विशेष रूप से उन्होंने महात्मा गांधी, सरदार पटेल और लोकमान्य तिलक जैसे नेताओं को स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेरित किया। आचार्य जवाहर लाल महाराज ने बाल विवाह, दहेज प्रथा और नशाखोरी का दृढ़ विरोध किया। इस संदर्भ को स्मरण करते हुए राज्यपाल कटारिया ने कहा कि उनके नाम पर जारी यह स्मारक सिक्का और डाक टिकट लोगों को उनके कार्यों की चिरस्थायी याद दिलाते रहेंगे।

ज्ञातव्य हो कि स्मारक सिक्के में अभी तक पूर्व में कुल सात सिक्के जैन संत समाज पर जारी हुए पर स्थानकवासी समाज में यह प्रथम मौका है जब स्थानकवासी जैन आचार्य जवाहरलाल पर स्मारक सिक्का जारी किया गया।

जनजातीय गौरव दिवस : परंपरा, प्रगति और युवा संकल्प

जनजातीय गौरव दिवस भारत की गौरवशाली जनजातीय विरासत को समर्पित एक सजीव श्रद्धांजलि है — साहस, सादगी और प्रकृति के साथ सामंजस्य का वह प्रतीक जिसने सदैव राष्ट्र की आत्मा को समृद्ध किया है। आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत 2021 में प्रारंभ किया गया यह वार्षिक उत्सव हर वर्ष 15 नवम्बर को मनाया जाता है — इस दिन भारतभूमि के महान जननायक भगवान बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था। भारत सरकार ने यह दिन जनजातीय समुदायों के असाधारण बलिदानों और उनकी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को सम्मान देने के लिए समर्पित किया। 15 नवम्बर 2021 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भगवान बिरसा मुंडा को समर्पित एक स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी कर राष्ट्र की ओर से जनजातीय शौर्य और विरासत के प्रति सामूहिक श्रद्धा को अभिव्यक्त किया। तब से जनजातीय गौरव दिवस गौरव, प्रगति और सशक्तिकरण का राष्ट्रीय उत्सव बन चुका है।

*भगवान बिरसा मुंडा : उलीहातू से उलगुलान तक

15 नवम्बर 1875 को छोटानागपुर पठार (वर्तमान झारखंड) के उलीहातू गाँव में जन्मे भगवान बिरसा मुंडा भारत के सर्वाधिक पूज्य जनजातीय क्रांतिकारियों में से एक हैं। मुंडा जनजाति से संबंधित बिरसा का बचपन कठिनाइयों, विस्थापन और अन्याय के अनुभवों से भरा था। 1793 के स्थायी बंदोबस्त अधिनियम (Permanent Settlement Act) ने पारंपरिक खुंटकाटी भूमि व्यवस्था को नष्ट कर दिया, जिससे साहूकारों और ज़मींदारों को जनजातीय भूमि पर कब्ज़े का अवसर मिला।

1886 से 1890 के बीच चाईबासा में बिताए वर्षों ने बिरसा की चेतना को जागृत किया। मिशनरी प्रभाव और औपनिवेशिक अन्याय से विमुख होकर उन्होंने औपचारिक शिक्षा छोड़ दी और रामायण व महाभारत जैसे भारतीय ग्रंथों से आत्मिक प्रेरणा ली। 1895 तक वे अपने लोगों के स्वाभिमान और भूमि पुनः प्राप्ति के लिए एक निर्भीक नेता के रूप में उभरे। उन्हें ब्रिटिश शासन ने गिरफ्तार कर हजारीबाग केंद्रीय जेल में दो वर्ष तक रखा। रिहा होने पर हजारों लोगों ने उन्हें “धरती आबा”—अर्थात धरती के पिता—के रूप में सम्मानित किया।

उन्होंने बिरसाइट संप्रदाय की स्थापना की, जिसने जनजातीय समाज में आत्म-सम्मान, एकता और आस्था का संचार किया तथा शोषण और धर्मांतरण से मुक्ति का मार्ग दिखाया। 1899–1900 का उलगुलान (महाविद्रोह) उनकी इस चेतना का चरम बिंदु था, जिसने झारखंड, ओडिशा, बिहार, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ तक ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। इस आंदोलन ने “मुंडा राज” अर्थात स्वशासन की मांग की। यद्यपि बिरसा मुंडा को ब्रिटिशों ने पकड़ लिया और 9 जून 1900 को रांची जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में 25 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया, पर उनके विचार अमर हो गए। उनके संघर्ष का परिणाम छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (1903) के रूप में सामने आया, जिसने जनजातीय भूमि अधिकारों की रक्षा की। 2000 में उनके जन्मदिवस पर झारखंड राज्य की स्थापना कर राष्ट्र ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

सशक्त होता जनजातीय भारत : शिक्षा से उद्यमिता तक

भगवान बिरसा मुंडा के समानता और स्वाभिमान के सपने को साकार करने के लिए भारत सरकार ने शिक्षा, उद्यमिता, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में अनेक परिवर्तनकारी पहलें की हैं।

2023 में जनजातीय गौरव दिवस पर प्रारंभ किया गया प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (PM–JANMAN) इसका एक ऐतिहासिक कदम है। ₹24,000 करोड़ की लागत वाले इस कार्यक्रम का उद्देश्य 18 राज्यों और 1 केंद्रशासित प्रदेश के 75 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) को आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और संपर्क सुविधाएँ प्रदान करना है। इसी दिशा में 2 अक्टूबर 2025 को भगवान बिरसा मुंडा की भूमि से “धरती आबा जनजाति ग्राम उत्कर्ष अभियान (DAJGUA)” की शुरुआत की गई — ₹80,000 करोड़ के बजट के साथ यह योजना 63,000 जनजातीय गाँवों को सड़कों, मोबाइल नेटवर्क और पक्के मकानों से जोड़ेगी, जिससे पाँच करोड़ से अधिक जनजातीय नागरिकों को सीधा लाभ मिलेगा।

स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार हेतु 23 मोबाइल मेडिकल यूनिट्स (MMUs) और 30 नई इकाइयाँ DAJGUA के अंतर्गत जोड़ी गईं। विकसित भारत 2047 की परिकल्पना के अंतर्गत सिकल सेल एनीमिया के पूर्ण उन्मूलन का भी लक्ष्य रखा गया है।

शिक्षा जनजातीय उन्नति की आधारशिला है। राष्ट्रभर में 700 से अधिक एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि जनजातीय बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। सरकार ने विशेष रूप से विज्ञान, प्रौद्योगिकी और चिकित्सा के क्षेत्र में जनजातीय युवाओं को आगे बढ़ाने पर बल दिया है। 30 लाख से अधिक छात्रवृत्तियाँ दी जा रही हैं, जिनमें से कई विद्यार्थी विदेशों में भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) मातृभाषा में शिक्षा को प्रोत्साहित कर जनजातीय युवाओं को आत्मविश्वास और वैश्विक अवसर प्रदान कर रही है।

उद्यमिता के क्षेत्र में वन धन मिशन ने जनजातीय स्वावलंबन की दिशा में क्रांति लाई है। 3,000 से अधिक वन धन विकास केंद्र (VDVKs) पारंपरिक वनोपज को आधुनिक विपणन और मूल्यवर्धन से जोड़ रहे हैं। 90 से अधिक लघु वनोपज (MFP) वस्तुओं को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के दायरे में लाया गया है, जिससे जनजातीय उत्पादकों को न्यायपूर्ण मूल्य मिल रहा है। भारत द्वारा मनाया गया अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष (International Year of Millets) जनजातीय किसानों की पारंपरिक कृषि-बुद्धि और पोषक अन्नों के संरक्षण का उत्सव भी है।

आज 50,000 से अधिक वन धन स्व-सहायता समूह (SHGs) और 80 लाख समूहों में सक्रिय 1.25 करोड़ से अधिक सदस्य ग्रामीण समृद्धि के प्रेरक बन चुके हैं। इनमें अधिकांश समूह जनजातीय महिलाओं द्वारा संचालित हैं, जो आत्मनिर्भरता का प्रतीक हैं। पीएम-विश्वकर्मा योजना पारंपरिक कारीगरों को वित्तीय सहायता, कौशल प्रशिक्षण और विपणन सहयोग देकर उनके पारंपरिक शिल्प को नए अवसर प्रदान कर रही है।

आदि महोत्सव जैसे उत्सवों के माध्यम से जनजातीय कला, संस्कृति और हस्तकला को राष्ट्रीय पहचान मिली है। रांची का बिरसा मुंडा जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय, राष्ट्रपति भवन का जनजातीय दर्पण संग्रहालय, तथा छिंदवाड़ा और जबलपुर में नए केंद्र इस गौरवशाली धरोहर को सहेज रहे हैं। श्रीनगर और गंगटोक में स्थापित जनजातीय अनुसंधान संस्थान जनजातीय भाषा, कला और ज्ञान परंपरा के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

जनजातीय क्षेत्रों तक योजनाओं की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए विकसित भारत संकल्प यात्रा की शुरुआत खूँटी, झारखंड से की गई, जिसमें एकलव्य विद्यालय नामांकन, सिकल सेल परीक्षण और वन धन उद्यमिता पर विशेष ध्यान दिया गया।

सरकार की इस प्रतिबद्धता का प्रमाण है कि 2024–25 में जनजातीय कार्य मंत्रालय का बजट 74% बढ़कर ₹13,000 करोड़ हो गया है। पिछले दशक में 100 से अधिक जनजातीय व्यक्तित्वों को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है — यह जनजातीय उत्कृष्टता और नेतृत्व की राष्ट्रीय स्वीकृति का प्रतीक है।

विरासत से नेतृत्व तक

जनजातीय गौरव दिवस केवल एक वार्षिक उत्सव नहीं है — यह भारत की विविधता को एक सूत्र में पिरोने वाला आंदोलन है। यह भगवान बिरसा मुंडा सहित उन सभी वीरों के बलिदान को नमन करता है जिन्होंने राष्ट्र की नियति को गढ़ा, और आज की युवा पीढ़ी को बड़े सपने देखने, लगन से सीखने और निर्भीक होकर नेतृत्व करने की प्रेरणा देता है।

जब भारत विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ रहा है, तब उसके जनजातीय पूर्वजों की अजेय भावना प्रगति के मार्ग को आलोकित कर रही है। सच्चा विकास वही है जहाँ परंपरा और परिवर्तन, जड़ें और आकांक्षाएँ, दोनों साथ चलें। ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का स्वप्न तभी साकार होगा जब जनजातीय समाज भी समान गति से आगे बढ़े — क्योंकि उनका उत्थान ही राष्ट्र की शक्ति है, उनका गौरव ही उसकी विरासत।

जनजातीय गौरव दिवस केवल भारत के गौरवशाली अतीत का उत्सव नहीं, बल्कि एक जीवंत और आत्मविश्वासी भविष्य का वंदन भी है — जहाँ हर जनजातीय स्वर भारत की एकता, गरिमा और प्रगति की जीवंत तस्वीर में अपनी विशिष्ट पहचान जोड़ता है।

(लेखिका दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएच.डी. हैं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रूप से संलग्न हैं।)

आदर्श शासक महाराजा रणजीत सिंह

(13 नवम्बर उनके जन्म दिवस पर विशेष)
वे साँवले रंग का नाटे कद के मनुष्य थे। उनकी एक आँख शीतला के प्रकोप से चली गई थी। परंतु यह होते हुए भी वह तेजस्वी थे। आत्मबल का उदाहरण देखना हो तो महाराजा रणजीत सिंह मे देखना चाहिए महाराजा रणजीत सिंह जी जीतने बड़े योद्धा था उतने ही बड़े उदार महामानव थे।
उनके जीवन के 3 अलभ्य प्रकरण
1- एक बार एक कवि उनके दरबार मे कविता सुनाना चाहता था।
द्वारपाल ने अंदर जाने देने के लिए शर्त रखी कि तुम्हारी कविता मे राजा की एक आँख का जिक्र जरूर हो। (उनकी एक आँख शीतला के प्रकोप से चली गई थी)
अंदर जाकर कवि ने कविता सुनाई –
ओरों की दो दो भली ते केहि के काज
तेरी एक ही आँख मे कोटि आँख की लाज
महाराजा रणजीत सिंह जी ने उसे बहुत पुरस्कार दिया।
2- एक बार उन्होने सेना के साथ जंगल मे पड़ाव डाला भोजन पकाते समय पता चला कि नमक लाना भूल गए। तब किसी ने कहा कि निकट के गाँव मे से जाकर नमक ले आए। जब सैनिक नमक लेकर आए तो महाराजा रणजीत सिंह जी ने पूछा
क्या नमक का मूल्य दे आए ?
सैनिको ने कहा – नमक का भी क्या मूल्य देना।
तभी महाराजा ने कहा तत्काल नमक का मूल्य दे कर आओ। यदि राजा मुफ्त मे नमक लेगा तो उसके सिपाही तो पूरा गाँव ही लूट लेंगे।
3- एक बार महाराजा कहीं जा रहे थे। तभी उनके माथे पर पत्थर आकार लगा। उनके माथे पर से खून बहने लगा। तभी सैनिक एक बुढ़िया को पकड़ लाए जिसने पत्थर फेंका था। बुढ़िया ने हाथ जो कर कहा कि वह अपने पोते के लिए फल तोड़ने के लिए पत्थर फेंका था जो गलती से उनके माथे पर लग गया।
महाराजा ने उस बुढ़िया को तत्काल कुछ धन दिया। सैनिको को बहुत आश्चर्य हुआ। तभी महाराजा ने कहा कि एक पेड़ पत्थर मारने पर फल देता है तो मैं क्या पेड़ से भी गया गुजारा हूँ?
महाराजा रणजीत सिंह को कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी, वह अनपढ़ थे। अपने पराक्रम से विरोधियों को धूल चटा देने वाले रणजीत सिंह पर 13 साल की कोमल आयु में प्राण घातक हमला हुआ था। हमला करने वाले हशमत खां को किशोर रणजीत सिंह ने खुद ही मौत की नींद सुला दिया।
बाल्यकाल में चेचक रोग की पीड़ा, एक आँख गवाना, कम उम्र में पिता की मृत्यु का दुख, अचानक आया कार्यभार का बोझ, खुद पर हत्या का प्रयास इन सब कठिन प्रसंगों नें रणजीत सिंह को किसी मज़बूत फौलाद में तबदील कर दिया। उनके राज में कभी किसी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया गया था। रणजीत सिंह बड़े ही उदारवादी राजा थे, किसी राज्य को जीत कर भी वह अपने शत्रु को बदले में कुछ ना कुछ जागीर दे दिया करते थे ताकि वह अपना जीवन निर्वाह कर सके। वो महाराजा रणजीत सिंह ही थे जिन्होंने हरमंदिर साहिब यानि गोल्डन टेम्पल का जीर्णोधार करवाया था।
महाराजा रणजीत सिंह न गौ मांस खाते थे ना ही अपने दरबारियों को इसकी आज्ञा देते थे। सन 1805 में महाराजा ने भेष बदलकर लार्ड लेक शिविर में जाकर अंग्रेजी सेना की कवायद, गणवेश और सैन्य पद्दति को देखा और अपनी सेना को उसी पद्दति से संगठित करने का निश्चय किया. प्रारम्भ में स्वतन्त्र ढंग से लड़ने वाले सिख सैनिको को कवायद आदि का ढंग बड़ा हास्यापद लगा और उन्होंने उसका विरोध किया पर महाराजा रणजीत सिंह अपने निर्णय पर दृढ रहे।
महान इतिहासकार जे. डी कनिंघम ने कहा था-
” निःसंदेह रणजीत सिंह की उपलब्धियाँ महान थी। उसने पंजाब को एक आपसी लड़ने वाले संघ के रूप में प्राप्त किया तथा एक शक्तिशाली राज्य के रूप में परिवर्तित किया।
#MaharajaRanjitSingh #SherEPunjab  #ProudIndian

ग्रीस कैसे तुर्की बना: इस्लामिक समुदाय और देशों के विभाजन

कैसे तुर्की सेकुलर चरित्र का दावा करते हुए असमान विभाजन के बाद अपने पूर्व ईसाई उपनिवेशों का इस्लामीकरण कर रहा है।
आज जो तुर्की है वह कभी ग्रीस हुआ करता था। यह पहला भौगोलिक तथ्य है जिससे आपको परिचित होने की आवश्यकता है कि तुर्की तुर्की नहीं था। मूर्तिपूजक और ईसाई काल में तुर्की को अनातोलिया/एशिया माइनर कहा जाता था। जबकि पूर्वी तुर्की आर्मेनिया था।
तुर्कों का मूल निवास पूर्वी साइबेरिया में बैकाल झील के पास कहीं है। तुर्की में तुर्क आक्रमणकारी/ जनसँख्या हैं। तुर्क तुर्की के मूल निवासी नहीं हैं। वे आक्रमणकारी थे और बाहर से आकर वहाँ बसे हैं|
अनातोलिया (आज का तुर्की) में मूर्तिपूजक ग्रीक, मूर्तिपूजक रोमन और फिर ईसाई बैजांटाइन इन साम्राज्यों के कुछ सबसे महत्वपूर्ण प्रांत थे। यह प्राचीन ७ अजूबों में से दो का घर है।
ग्रीस एक समुद्री सभ्यता थी और तुर्की के पूरे तटवर्ती इलाके और कई अंतर्देशीय शहरों को ग्रीस लोगों द्वारा बसाया गया था। इफिसुस और स्मिर्ना जैसे कुछ महान यूनानी नगर अब मुस्लिम तुर्की में स्थित हैं।
 5 वीं शताब्दी तक, जो तुर्की है वह पूरी तरह से ग्रीस का हिस्सा बन गया था: संस्कृति में ग्रीक, भाषा और मज़हब में ईसाई क्योंकि वह उस समय बैजांटाइन या पूर्वी रोमन साम्राज्य का हिस्सा था।
11 वीं शताब्दी से सेल्जुक तुर्कों की बर्बर जनजातियों ने अनातोलिया (वर्तमान तुर्की) में बैजांटाइन साम्राज्य पर आक्रमण करना प्रारम्भ कर दिया। ये तुर्क मुसलमान थे। ट्रांसऑक्सियाना की मुस्लिम विजय के दौरान उन्हें अरबों और फारसियों द्वारा धर्मान्तरित कर दिया गया था ।
अरल सागर के पास अपने घर से उठकर, इन सेल्जुक तुर्कों ने अनातोलिया (जो अब तुर्की है) में बैजांटाइन साम्राज्य पर आक्रमण किया। १०७१ ई में मंज़िकर्ट की लड़ाई में , मुस्लिम सेल्जुक ने ईसाई बैजांटाइन सेनाओं को हराया और सम्राट रोमनोस IV को बंधी बनाकर उसके साम्राज्य पर अधिकार कर लिया।
यह ईसाई बैजांटाइन साम्राज्य के लिए एक विनाशकारी हार थी। इसने सुनिश्चित किया कि वे अनातोलिया और आर्मेनिया, इसके दो सबसे धनि और मुख्य क्षेत्रों की रक्षा करने में सक्षम नहीं होंगे। इस बीच मुस्लिम तुर्कों ने अनातोलिया पर आक्रमण करना प्रारम्भ कर दिया और बड़ी संख्या में वहां बस गए।
उन्होंने स्थानीय ईसाइयों को विस्थापित किया, उन्हें इस्लाम में धर्मान्तरित किया और विरोध करने वालों का नरसंहार किया और अंततः ग्रीक सभ्यता के एक मुख्य हिस्से को मुस्लिम बहुल भूमि बनाने में सफल रहे। पूर्व में केवल आर्मेनिया ही थोड़ा विरोध करने में सक्षम रहा।
सेल्जुक तुर्कों ने एशिया माइनर का इस्लामीकरण कर दिया था लेकिन वे बैजांटाइन साम्राज्य की राजधानी – कॉन्स्टेंटिनोपल को जीतने में सक्षम नहीं हुए थे। वह कार्य ओटोमन साम्राज्य द्वारा पूरा किया गया था जो १४वीं शताब्दी में अनातोलिया में सेल्जुक तुर्क के उत्तराधिकारी के रूप में उभरा।
ओटोमन्स ने अंततः १४५३ ई में कॉन्स्टेंटिनोपल पर आक्रमण किया और उसे नष्ट कर दिया और बैजांटाइन साम्राज्य अंततः समाप्त हो गया। उस समय विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ईसाई महानगर को ओटोमन्स आक्रमण ने नष्ट करके उसका इस्लामीकरण कर दिया। इसका नाम बदलकर इस्तांबुल कर दिया गया।
पूर्वी यूरोप के अन्य हिस्सों में तुर्कों का विस्तार हुआ और बुल्गारिया, मैसेडोनिया, सर्बिया, बोस्निया, अल्बानिया, क्रोएशिया के कुछ हिस्सों सहित बाल्कन इस्लामी तुर्की के अधीन हो गए। पेलोपोनिस, थिसली, एथेंस और मैसेडोनिया (मूल ग्रीक क्षेत्रों) में भी उसका शासन हुआ।
लगभग 300 वर्षों के क्रूर अधिकार के बाद, ग्रीस अंततः 1829 में स्वतंत्रता की क्रांति में स्वतंत्र हो गया जिसमें ग्रीस को रूसी, फ्रांस और ब्रिटेन ने सहायता की। हालाँकि ग्रीस की वर्तमान सीमाएँ 1923 तक ही वापस ग्रीस का पुराना आकार ले पायी थीं।
1920 की सेव्रेस की संधि में, ग्रीस ने अनातोलियन मुख्य भूमि में प्राचीन यूनानी नगर स्मिर्ना के पास थोड़ी भूमि का अधिग्रहण कर लिया था। इसने अंततः ग्रीस को प्राचीन ग्रीक सीमाओं की एक झलक दी थी, हालांकि कॉन्स्टेंटिनोपल की राजधानी तो अभी भी इसमें नहीं थी।
लेकिन तुर्की यह कैसे होने दे सकता था। मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने स्मिर्ना और थ्रेस के ग्रीक संरक्षकों के विरुद्ध सेना का नेतृत्व किया और 1922 तक ग्रीस को अनातोलिया से बाहर निकाल दिया। तुर्की ने फिर एक और नरसंहार किया: इस बार यूनानियों के विरुद्ध।
अनातोलिया में बचे लगभग 264,000 ग्रीक ईसाइयों का नरसंहार किया गया। काले सागर क्षेत्रों में नरसंहार विशेष रूप से गंभीर था और इसे पोंटिक नरसंहार के रूप में जाना जाता है। काले सागर के कुछ सबसे प्राचीन यूनानी समुदाय पूर्णतः नष्ट हो गए।
पश्चिम में, स्मिर्ना के ग्रीक ईसाइयों को तुर्की मुस्लिम सेना और नागरिकों द्वारा नरसंहार का सामना करना पड़ा। इतिहासकार अर्नोल्ड टॉयनबी बताते हैं कि तुर्कों ने न केवल यूनानियों को मारा, बल्कि ईसाई उपस्थिति को पूरी तरह से मिटाने के लिए उनके घरों को पेट्रोल से जला दिया।
स्मिर्ना के ग्रीक ऑर्थोडॉक्स आर्कबिशप क्राइसोस्टोमोस को सार्वजनिक रूप से पीट-पीट कर मार डाला गया। ग्रीक ईसाइयों को अकथनीय अत्याचारों का सामना करना पड़ा। यूनानियों को अंततः उनकी प्राचीन पूर्वी मातृभूमि – स्मिर्ना, इफिसुस और अनातोलिया – में नष्ट कर दिया गया था ।
1923 में ग्रीक प्रधान मंत्री वेनिज़ेलोस ने जनसंख्या के हस्तांतरण का प्रस्ताव रखा। उसने अर्मेनियाई और यूनानियों के भयानक नरसंहार को देखा था। तुर्की ईसाईयों से पीछा छुडाना चाहता था और उसने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
तुर्की और बाल्कन के बीच जनसंख्या का आदान-प्रदान किया गया । नरसंहार के बाद तुर्की में जो भी ईसाई बचे थे, उन्हें तुरंत ग्रीस में निष्कासित कर दिया गया। ग्रीस ने भी अपने मुसलमानों को तुर्की भेजा। विभाजन पूरा हो गया था।
यह एक पूर्ण विभाजन का एकमात्र उदाहरण है, जिसमें जनसंख्या का पूर्ण आदान-प्रदान किया गया था। जबकि यूनानियों ने अधिकतर तुर्की मुसलमानों को स्थानांतरित कर दिया, तुर्की ने अधिकांश ग्रीक ईसाइयों को मार डाला और बाकी को ग्रीस में निष्कासित कर दिया।
ग्रीस ने एक बड़ा मूल्य चुकाने के बाद, अंततः सभी मुसलमानों को तुर्की में स्थानांतरित करके स्थानीय रूप से इस्लामी समस्या का समाधान प्राप्त कर लिया था। ऐसा लग रहा था जैसे इस्लामी समस्या का स्थानीय समाधान होता है। लेकिन यहाँ कहानी समाप्त नहीं होती है।
ग्रीस की सीमा आज चार देशों के साथ लगती है: अल्बानिया, मैसेडोनिया, बुल्गारिया और तुर्की। जिनमें से दो पूरी तरह से मुस्लिम हैं, एक लगभग मुस्लिम बहुसंख्यक है और आखिरी में एक बड़ा मुस्लिम अल्पसंख्यक वाला देश| ग्रीस इस्लामी राज्यों और समुदायों से घिरा हुआ है|
ग्रीस ने अपनी सभी मुस्लिम जनसँख्या का आदान-प्रदान किया लेकिन बाल्कन में अन्य देश उतने सक्षम नहीं थे। अल्बानिया और कोसोवो लगभग पूरी तरह से मुस्लिम थे , जबकि बोस्निया में एक बड़ा मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय था और इसी तरह उत्तर मैसेडोनिया भी था। बुल्गारिया में भी कुछ मुसलमान थे।
लेकिन बाल्कन कम्युनिस्ट शासन के अधीन आ गए और 70 वर्षों तक इन देशों मज़हब पर ध्यान नहीं दिया गया। लेकिन साम्यवाद के पतन के बाद मज़हब एक बार फिर सर्वोच्च हो गया और इन देशों के मज़हबी विन्यास ने ग्रीक हितों के विरुद्ध कार्य करना प्रारम्भ कर दिया।
साम्यवाद के पतन के कारण इन देशों में बुनियादी ढांचे और संस्थानों का पतन हुआ। लाखों बुल्गारियाई पश्चिमी यूरोप और अन्य देशों में भाग गए। और साम्यवादी अवसाद के कारण उनकी जनसंख्या में भारी गिरावट आई थी। अन्य देशों में भी ऐसी ही स्थिति थी।
तुर्की के मुसलमानों ने इस स्थिति का फायदा उठाया। उन्होंने 1990 के दशक में इन देशों में घुसपैठ करना प्रारम्भ कर दिया, उनके संस्थानों पर अधिकार कर लिया और बाल्कन में मुस्लिम बहुल गांवों, नगरों की स्थापना की। बुल्गारिया में अब लगभग 12% की विशाल मुस्लिम जनसँख्या है।
मैसेडोनिया लगभग वैसा ही है जहां 1971 में लेबनान था। अब इसमें 33% मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं जो पिछले तीन दशकों में प्रवास के माध्यम से तेजी से बढ़ रहा है। जल्द ही वहाँ मुस्लिम बहुमत हो सकता है।
अल्बानिया लगभग 83% मुस्लिम बहुमत का देश है और कोसोवा लगभग पूरी तरह से मुस्लिम है। और ये दोनों देश भूमध्यसागरीय क्षेत्र में बहुत सारे माफिया और अवैध गतिविधियों का नेतृत्व करते हैं। और चौथा देश निश्चित रूप से तुर्की है।
ग्रीस मुस्लिम देशों और चारों तरफ से भारी मुस्लिम अल्पसंख्यकों से घिरा हुआ है। परिणामस्वरूप ग्रीस में एक बार फिर मुस्लिम अल्पसंख्यक लगभग 2% हो गए हैं और तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर तुर्की ने अपनी पूरी ईसाई जनसँख्या को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है।
यूरोप में में शरणार्थी संकट ने ग्रीस को क्षति पहुंचाई है  और अधिकांश अरब शरणार्थी पहले पूरे तुर्की को छोड़कर थ्रेस के माध्यम से ग्रीस में प्रवेश करते हैं। और तुर्की यूरोप के इस इस्लामी आक्रमण में उनकी सहायता करता है। इस इस्लामी आक्रमण में ग्रीस पहला अग्रिम पंक्ति वाला देश है।
इसके अलावा ग्रीस की डूबती अर्थव्यवस्था और इसकी तेजी से घटती जनसँख्या है। यह केवल समय की बात है जब तुर्की के मुसलमान एक बार फिर ग्रीस में एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक बन जायेंगे।
ग्रीस हमें सिखाता है कि इस्लामवाद और इस्लामी घुसपैठ की समस्या का कोई स्थानीय समाधान नहीं है। पड़ोसी देशों की मज़हबी जनसांख्यिकी उतनी ही मायने रखती है जितनी कि हमारे अपने देश की जनसांख्यिकी। भारत यूनानी समस्या से पर्याप्त सबक ले सकता है।

बिहार में बडबोली राजनीति की हार, सुशासन की नई सुबह

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की ऐतिहासिक एवं अनूठी जीत ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व, गृहमंत्री अमित शाह की चुनावी रणनीति और उनकी जनस्वीकार्यता आज भी भारतीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाती है। यह जीत सिर्फ एक गठबंधन की सफलता नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य की नई रूपरेखा का संकेत है। नीतीश कुमार के अनुभवी नेतृत्व, भाजपा की संगठनात्मक मजबूती और उभरते हुए युवा सितारे चिराग पासवान के प्रभावी प्रदर्शन ने मिलकर इस चुनाव को एनडीए के पक्ष में एक मिसाल बना दिया।
एनडीए की जीत के पीछे उनके 10 प्रमुख वादे हैं जिनमें पंचामृत गारंटी, रोजगार सृजन, मुफ्त शिक्षा, महिलाओं के लिए योजनाएं, कृषि सुधार और बुनियादी ढांचे का विकास शामिल है। इस बार के चुनाव इसलिये भी ख़ास रहे क्योंकि 1951 के बाद बिहार में इस बार सबसे ज्यादा वोट पड़े।
इस बार बिहार में 67.13 प्रतिशत मतदान हुआ जो कि पिछले विधानसभा चुनाव से 9.6 प्रतिशत ज्यादा है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मतदान 8.15 प्रतिशत ज्यादा रहा है। इस बार के मतदान में पुरुषों की हिस्सेदारी 62.98 प्रतिशत रही और महिलाओं की 71.78 प्रतिशत। बिहार में 3.51 करोड़ महिला वोटर हैं और 3.93 करोड़ पुरुष वोटर और कुल मतदाताओं की तादाद 7.45 करोड़ है। बिहार विधानसभा चुनाव के ताजा रुझानों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ( एनडीए ) के 200 सीटों के आंकड़े को पार कर रहा है, इस जनादेश में महिला मतदाताओं की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका है।
ऐसा प्रतीत होता है कि एकतरफा बिहार की महिलाओं का विश्वास जीत गया है, एनडीए विजयी हुआ है, बिहार विजयी हुआ है और महागठबंधन का बड़बोलापन हारा है।
महागठबंधन की करारी हार अपने आप में कई सवाल छोड़ती है। चुनावी रैलियों में भीड़ जरूर इकट्ठी हुई, भाषणों में तीखे हमले भी हुए, लेकिन विपक्ष जनता का विश्वास जीतने में विफल रहा। नेतृत्व की अस्पष्टता, रणनीति की कमी, और विकास तथा सुशासन पर ठोस विजन की गैर-हाजिरी ने जनता को यह सोचने पर मजबूर किया कि सत्ता परिवर्तन से स्थिरता नहीं, बल्कि अनिश्चितता बढ़ सकती है। महागठबंधन बार-बार सामाजिक न्याय और पुराने नारों की दुहाई देता रहा, लेकिन आज का बिहार उन नारों से अधिक उम्मीदें रखता है-रोज़गार, सुरक्षा, कानून व्यवस्था और बुनियादी सेवाओं की निरंतरता। इन मुद्दों पर विपक्ष का स्पष्ट और भरोसेमंद खाका सामने नहीं आ सका। यही कारण है कि उसके नेताओं की बड़बोली बयानबाज़ी जनता पर असर नहीं डाल सकी, बल्कि कई जगह उलटा असर दिखा गई।
इसके विपरीत एनडीए ने अपने चुनाव अभियान को “स्थिरता $ विकास” के सूत्र में पिरोया। मोदी की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता, केन्द्र सरकार की जनकल्याणकारी नीतियां-योजनाएं और नीतीश कुमार की सुशासन-छवि ने बिहार के मतदाता को यह भरोसा दिया कि यह गठबंधन अनुभव, विश्वास, विकास और नीतिगत दृढ़ता का सही मिश्रण है। नीतीश कुमार भले कई राजनीतिक मोड़ों के लिए आलोचित हुए हों, लेकिन जनता के मन में उनकी छवि एक ऐसे प्रशासक की बनी हुई है, जो लंबे समय से बिहार को कानून-व्यवस्था, महिला सशक्तिकरण, सड़क-निर्माण और शिक्षा सुधार जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ाने का प्रयास करता रहा है। इस छवि का लाभ एनडीए को व्यापक रूप से मिला। भाजपा की संगठनात्मक मशीनरी ने बूथ तक प्रभावी और लक्षित पहुंच बनाई, जिससे मतदाताओं में यह भरोसा मजबूत हुआ कि केंद्र व राज्य का समन्वय विकास की गति को और तेज करेगा।
इन चुनावों का एक बड़ा आकर्षण चिराग पासवान का उभार रहा। उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे किसी के “मोहरा” नहीं, बल्कि भविष्य के निर्णायक खिलाड़ी हैं। उनके आक्रामक और आत्मविश्वासी अभियान ने युवा और दलित वर्ग में नई ऊर्जा जगाई। एनडीए के भीतर उनकी भूमिका महज सांकेतिक नहीं थी, बल्कि वास्तविक जनाधार और असर से भरपूर रही। सीटों पर उनकी उल्लेखनीय पकड़ ने यह संदेश दिया कि वे आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित कर सकते हैं। यह भी सच है कि उनकी बढ़ती लोकप्रियता नीतीश कुमार के लिए संतुलन साधने की चुनौती भी बन सकती है, लेकिन यदि गठबंधन समन्वय बनाए रखता है, तो बिहार को इससे मजबूत नेतृत्व का लाभ मिल सकता है।
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस ऐतिहासिक जीत के बाद बिहार किस दिशा में आगे बढ़ेगा। जनता की अपेक्षाएँ बहुत ऊँची हैं-सुरक्षित समाज, संवेदनशील प्रशासन, भ्रष्टाचार पर अंकुश और विकास की तेज रफ्तार। कानून-व्यवस्था बिहार की राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा है। लोग चाहते हैं कि अपराध-नियंत्रण में सुधार हो, पुलिस प्रशासन आधुनिक और जवाबदेह बने, और न्यायिक प्रक्रियाओं में तेजी आए। एनडीए के पास केंद्र और राज्य दोनों के संसाधन और राजनीतिक सामर्थ्य है, इसलिए उससे उम्मीद यह है कि वह “सुशासन का दूसरा अध्याय” लिखने की दिशा में ठोस कदम उठाएगा। भाजपा न सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, बल्कि जेडीयू के बगैर भी वह एनडीए के अन्य सहयोगियों के साथ जादुई आंकड़े को पार करती नजर आ रही है। ऐसे में नीतीश कुमार के लिए भाजपा के साथ किसी तरह का बिहार में बार्गेनिंग करना आसान नहीं रह गया है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से यह बार-बार दोहराया गया है कि चुनाव के बाद भी परिणाम चाहे जो भी आएं, गठबंधन के चेहरे नीतीश कुमार ही बने रहेंगे। जेडीयू की ओर से भी यह बात दोहराई गई है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे। फिलहाल इस पूरे चुनाव में महिला वोटर्स गेम चेंजर बताई जा रही हैं और ऐसा हुआ बिहार चुनाव से पहले महिला रोजगार योजना के तहत बिहार सरकार द्वारा महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये भेजे जाने से। वहीं चुनाव में महागठबंधन को बड़ा झटका लगा है।
निश्चित ही इन चुनाव परिणामों में बिहार का मतदाता अधिक सजग एवं विवेकशील दिखाई दिया हैं। वह जानता है कि सत्ता परिवर्तन से अधिक जरूरी है संस्कृति परिवर्तन, राजनीतिक शुचिता, विकास, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही।
इस चुनाव ने केवल विधानसभा की सीटें तय नहीं की है, बल्कि यह तय किया है कि अब बिहार की जनता अपनी पुरानी परछाइयों से निकलकर प्रकाश की ओर बढ़ेगी। क्योंकि बिहार में पिछड़ेपन, भ्रष्टाचार, अराजकता की चर्चा तो होती रही है, लेकिन इन जटिल से जटिलतर होती समस्याओं से बाहर निकलने के रास्ते दिखाई नहीं दिये। बिहार की जनता का मोदी के प्रति एक नये तरह का विश्वास जागा है। पिछली सरकारों केे दौर में बिहार बदहाली के दौर से काफी निकल चुका है और विगत दो दशक में यहां की स्थितियां काफी बदली है। इस बार बिहार चुनाव के परिणाम चौंकाने वाले इसलिये भी बने हैं कि इसकी आहट उन घोषणाओं से भी मिलती है, जो नीतीश सरकार ने की हैं। महिलाओं, दिव्यांगों और बुजुर्गों के लिए पहली बार इस पैमाने पर ऐलान किए गए हैं।
इस चुनावी जनादेश को केवल राजनीतिक वर्चस्व के चश्मे से नहीं, बल्कि जनविश्वास की कसौटी से देखना जरूरी है। यह जीत भाजपा, जेडीयू और एलजेपी (रामविलास) के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। अब उन्हें यह साबित करना होगा कि चुनावी नारों की चमक शासन की रोशनी में भी कायम रह सकती है।
बिहार की जनता ने महागठबंधन की ऊँची-ऊँची बातों, वंशवादी दावों और बड़बोले नेताओं की कटुता को नकारकर यह संदेश दिया है कि उन्हें स्थिरता, ईमानदार नेतृत्व और विकास का भरोसा चाहिए। इन चुनाव परिणामों ने एक बार फिर कांग्रेस को करारी हार दी है, जो पार्टी के लिये आत्ममंथन का बड़ा कारण है। एनडीए की यह जीत केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बिहार के नए भाग्य का उदय है। अब देखते हैं कि यह उदय सच्चे अर्थों में उजाला बिखेरता है या सिर्फ राजनीतिक रोशनी भर साबित होता है।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

आदम की पसली, मैक्समूलर और वेद

अठारह शताब्दियों तक ईसाई विद्वान् इस उलझन में पड़े रहे कि हव्वा के ‘उत्पत्ति विधान’ (आदम की पसली से उत्पत्ति)को बुद्धिमान और विद्वान पुरुषों के स्वीकार करने योग्य कैसे बनाया जाय? परंतु उनको किसी प्रकार की सफलता नहीं मिली ! कुछ ईसाई विद्वानों ने कभी-कभी जो टीका- टिप्पणियां दीं उनसे तो अवस्था और भी बिगड़ गई और स्त्री का पद जनता की दृष्टि में बहुत गिर गया! कौरंथियनों को लिखे हुए पत्रों में तो यहां तक कह दिया गया कि आदमी औरत से नहीं बना ! औरत आदमी से पैदा हुई है ! आदमी औरत के लिए नहीं बना था! औरत आदमी के लिए बनी है ! (देखो – कौरंथियन,भाग१,अध्याय११ आयत८,९)
यह एक छोटा सा वाक्य है जो केवल एक पत्र में बिना सोचे समझे लिखा गया था परंतु इस विष के बीज ने समस्त भ्रांति- आहत ईसाई घरों में विष फैला दिया!
कुछ पादरी लोग तो यहां तक बढ़ गए कि उन्होंने बाइबल में से पूरी संगति संपुष्टि करने के लिए यहां तक कह डाला कि स्त्रियों में जीव नहीं है क्योंकि ईश्वर ने रूह को आदम के पुतले में फूंका था न कि हव्वा के पुतले में ! हव्वा तो केवल आदम के शरीर की एक पसली है!
 यूरोप में जब विज्ञान का प्रबल हुआ तो घोर विरोध होते हुए भी पादरी लोग इस उलझन की उपेक्षा नहीं कर सके! कुछ न कुछ तो सोचना ही पड़ गया!
 इन्हीं दिनों में भारतवर्ष की प्राचीन भाषा संस्कृत की ओर लोगों का ध्यान गया ! यूरोप वालों ने भारत की ओर दृष्टि दौड़ाई और उस पर शासन करने के लिए आवश्यक समझा गया कि भारतीय लोगों के प्राचीन पुस्तकों का अवलोकन किया जाय! इसी काल में भिन्न-भिन्न भाषाओं का अनुसंधान और मूल्यांकन होने लगा! 19वीं शताब्दी के जर्मनी के एक प्रसिद्ध संस्कृतज्ञ मैक्समूलर को यह यश प्राप्त है कि उसने हव्वा की उत्पत्ति के विषय में जो उलझन थी उसको सुलझा दिया ! अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘साइंस ऑफ रिलीजन्स (धर्म-विज्ञान) की भूमिका में वह लिखते हैं –
“Bone seemed a telling expression for what we should call the innermost essence.”
उन्होंने यूनानी भाषा की किसी धातु से यह सिद्ध किया है कि यूनानी भाषा में ‘हड्डी’ शब्द का प्रयोग ‘भीतरी प्रकृति’ के लिए होता था!
 फिर वह लिखते हैं –
“In the ancient hyms of the Veda,too, a poet asks, “Who has been the first, when, he who had no bones, i,e, no form,bore him that has bones,i,e when which was formless, assumed from,or it may be, when that had no essence, received an essence.”
अंग्रेजी के इस वाक्य से गुत्थी सुलझ जाती है,परंतु जब तक हम ऋग्वेद को उठाकर न देखें या थोड़ा सा संस्कृत का अध्ययन न करें यह व्याख्या सब की समझ में नहीं आ सकती ! सार तो इतना ही है कि जिसको हम हड्डी कहते हैं इसका अभिप्राय है- ‘निज प्रकृति !’
इसको मैक्समूलर ने ईसएंस (Essence ) कहा है ! मैक्समूलर ने ‘वेद’ का उल्लेख किया है परंतु प्रमाण नहीं दिया ! वस्तुत: यहां ऋग्वेद के पहले मंडल के १६४ वें सूक्त की ओर संकेत है! इसमें सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन है और ‘अस्थि’ शब्द का प्रयोग हुआ है! लोक भाषा में ‘अस्थि’ का अर्थ है ‘हड्डी’! परंतु यदि धात्वर्थ पर विचार किया जाय तो रहस्य खुल जाता है! ‘स्था’ का अर्थ है- ‘खड़ा होना’ या स्थित होना ! मनुष्य के शरीर में यदि हड्डी न हो तो वह खड़ा नहीं हो सकता इसलिए उपचार की भाषा में हड्डी का नाम ‘अस्थि’ पड़ गया! वस्तुत: ‘अस्थि’, ‘स्थिति’ आदि शब्दों का संबंध है किसी वस्तु की नैसर्गिक वास्तविकता से! क्योंकि प्रत्येक वस्तु अपनी निज नैसर्गिक प्रकृति के आधार पर स्थित रहती है! इसी वास्तविक प्रकृति के लिए वेद में एक और शब्द आया है ‘तनु’! इसका अर्थ है ‘तानना’! सूत अपनी नैसर्गिक प्रकृति के कारण ही ताना जाता है! एक और वेद मंत्र में हमको मिलता है कि परमात्मा ने जो निराकार और शरीर रहित है मनुष्य के माता-पिता को एक ही प्रकृति से उत्पन्न किया और एक साथ उत्पन्न किया !
क उ नु ते महिमन: समस्याsस्मत् पूर्व ऋषयोsन्तमापु: !
यन मातरं च पितरं च  साकमजनयथास्तन्व:  स्वाया:  !!
— ऋ०मण्डल १० सू०५४ मं०३
‘सूरत नसा’ की पहली आयत यह है-
 जिस ने तुमको एक ही नफस से बनाया और उसी नफस से उसका जोड़ा बनाया!
वेद की रऋचा और कुरान की आयत की संगति : –
क्या हम इस आयत का यह अर्थ नहीं ले सकते कि यहां नफ़स का आशय नैसर्गिक प्रकृति या एसेंस से है! जैसा कि संस्कृत के शब्दों ‘अस्थि’ या ‘तनु’ से प्रकट होता है! यदि वेद के मंत्र और कुरान की आयत की संगति सिद्ध हो जाय तो सारी उलझन दूर हो जाय ! लेकिन इसके साथ समग्र इस्लामी जगत् की मनोवृत्ति में परिवर्तन हो जायेगा ! ऋग्वेद के वर्णन और उन प्रचलित कथाओं में जो तौरेत से लेकर कुरान तक चली आती हैं व्यवहार की दृष्टि से बड़ा अंतर है !
वेद यह नहीं मानता : –
वेद यह नहीं मानता कि आरंभ में केवल एक नर उत्पन्न हुआ  और उसकी पसली से नारी बनाई गई! या एक बैल बनाया और उसकी पसली से गाय बनाई गई या एक ऊंट बनाया गया और उसकी पसली से ऊंटनी बनाई गई जिससे आदमी और औरत, बैल और गाय, ऊंट और ऊंटनी में परस्पर प्रेम हो सके और गृहस्थ धर्म (संतानोत्पत्ति) का कार्य संपादित हो सके ! वेद का सिद्धांत है कि जब सृष्टि रची गई तो बहुत से पुरुष और स्त्रियां उत्पन्न हुए ! उनका मूल तत्व एक था अर्थात् सब जीव या आत्मा थे ! उत्पत्ति की विधि भी एक थी ! शरीर का उपादान भी एक था! पत्नी के लिए यह आवश्यक न था कि वह अपने पति के शरीर का ही अंश हो! व्यवहार रूप से तो इस प्रतिपत्ति को ईसाई और मुसलमान भी नहीं मानते ! कोई मर्द अपनी पुत्री से इसलिए विवाह न करेगा कि वह उसके शरीर का अंश है और न कोई माता अपने पुत्र से विवाह करेंगी क्योंकि वह उसी के शरीर से उत्पन्न हुआ है ! कुदरत ने पति और पत्नी के संबंध का आधार इन कारणों को नहीं बनाया था !
स्रोत- गंगा- ज्ञान सागर भाग 3
लेखक- पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय
संपादक व अनुवादक – प्रा. राजेंद्र जिज्ञासु
प्रस्तुतकर्ता – रामयतन

कैवल्यधाम ने योग को शास्त्रीय और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर सशक्त बनायाः श्री रामनाथ कोविंद

लोनावला। “कैवल्यधाम योग संस्थान पारंपरिक योग ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सुंदर संगम प्रस्तुत कर रहा है। यह संस्थान योग को शास्त्रीय और व्यवहारिक दोनों स्तरों पर सशक्त बना रहा है। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे यहाँ दोबारा आने का अवसर मिला, लेकिन ये ऐसा स्थान है कि यहां बार बार आने को मन करता है।”

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ये विचार पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने लोनावला के कैवल्यधाम योग संस्थान में स्वामी कुवलयानंद योग पुरस्कार प्रदान करते हुए व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि जिस योग संस्थान के माध्यम से स्वामी कुलयानंद ने आज से 100 साल पहले योग को पूरे विश्व में फैलाने की कल्पना की थी, वह योग आज दुनिया के 175 देशों में अपनी पहचान बना चुका है। उन्होंने कहा कि जो देश योग को धर्म विशेष का मानकर इसका विरोध करते रहे आज उन देशों में भी योग किया जा रहा है और योग दिवस मनाया जा रहा है, ये सब आज के भारत की और हजारों साल पुराने योग की ताकत है कि पूरी दुनिया इसको अपना रही है।

इस अवसर पर कैवल्यधाम  शताब्दी समारोह आयोजन समिति के अध्यक्ष एवँ पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सुरेश प्रभु ने कहा यह हमारी हजारों साल पुरानी संस्कृति की विशेषता है कि समय समय पर योगाचार्य कुलयानंद जैसे लोग जन्म लेते रहते हैं और हमारी सांस्कृतिक विरासत की धारा को प्रवाहित करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि कैवल्यधाम ने विगत सौ वर्षों में भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लाखों लोगों को योग से जोड़ा। यह संस्थान ऐसे समय में शुरु हुआ था जब लोनावला में साधन तो क्या यहाँ पहुंचने के लिए सड़क तक नहीं थी, फिर भी दुनिया भर के लोग यहाँ आते रहे। श्री प्रभु ने कहा कि आज ये स्थान एक ऐसी  पुण्य भूमि बन चुका है जहाँ आकर व्यक्ति अपने आपको रूपांतरित कर लेता है।

इस अवसर पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री डी.वाय. चन्द्रचूड़ ने कहा कि मेरे जीवन को सकारात्मक व स्वस्थ बनाने में योग का ही योगदान है। मेरे योग शिक्षक ने मुझे योग की बारिकियाँ सिखाई और समझाई और जब मैने इसको अपने जीवन में उतारा तो इसके चमत्कारिक परिणाम हुए। उन्होंने योग गुरु कुवलयानंद जी को याद करते हुए कहा कि मुझे हैरानी इस बात की है कि आज से 100 साल पहले लोनावला में आने को न सड़क थी न बिजली थी तब उन्होंने इस स्थान को योग केंद्र के रूप में चुना और दूसरी हैरानी की बात ये है कि ये संस्थान पूरी गरिमा और विश्वसनीयता के साथ 100 साल बाद भी चल रहा है और यहाँ का वातावरण देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने इसे सभी वरदानों से लाद दिया है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार की अनुसंधान सलाहकार एवं परामर्शदाता सुश्री शर्ली टेलिस ने कहा कि मैने मेडिकल विज्ञान की पढ़ाई की है लेकिन जब मैने योग के माध्यम से मरीजों में होने वाले चमत्कारिक प्रभावों का अध्ययन किया तो मैं दंग रह गई। योग में वह ताकत है जो दुनिया की किसी दवाई में नहीं है।

 

योग के लिए जीवन समर्पित कर देने वाले योगाचार्य रंभाऊ खंडवे (अध्यक्ष, जनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडल, नागपुर) ने अपने पुरस्कार को अपने गुरु कुवल्यानंद जी को समर्पित करते हुए कहा कि मैने उनसे योग की दीक्षा समाज के हर कोने में योग पहुँचाने के लिए ली थी, लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि जिस संस्थान से मुझे दीक्षा और शिक्षा मिली वही संस्थान मुझे पुरस्कृत भी करेगा। उन्होंने कहा कि माननीय कोविंद जी और माननीय चन्द्रचूड़ जी की उपस्थिति में सम्मानित होना मेरे लिए गर्व की बात है।

इस आयोजन को सफल बनाने में कैवल्यधाम की सुश्री भूमि और सुश्री ईश्विंधा के साथ ही सभी कर्मचारियों का अप्रतिम योगदान रहा। कार्यक्रम में शामिल हुए सभी मेहमान कैवल्यधाम के प्राकृतिक वातावरण से लेकर अहोभाव से हुए अतिथि सत्कार से अपने आपको सम्मानित महसूस कर रहे थे।

मुंबई से आए बोनांजा पोर्टफोलियो के श्री एसपी गोयल ने कहा कि इतने विशाल परिसर को प्राकृतिक वातावरण की मौलिकता बनाए रखते हुए इतना सर्वसुविधायुक्त परिसर बनाना और इसे सफलतापूर्वक संचालित करना, इस बात का प्रमाण है कि इस संस्थान से जुडे लोग कितने समर्पित और सेवाभावी है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कैवल्यधाम के महासचिव श्री सुभाष आर. वारेकर ने की।

समारोह का संचालन राजीव वाचस्पति शालाका ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन श्याम वासलकर ने किया।

योग पुरस्कार प्राप्त विशिष्ट व्यक्तियों के बारे में

डॉ. न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश

उनकी विशिष्ट यात्रा — अकादमिक क्षेत्र से लेकर देश की सर्वोच्च न्यायपालिका तक — न्याय, संवैधानिक मूल्यों और विधि के शासन के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का प्रमाण है। उन्होंने स्वयं को भारत के सबसे सम्मानित न्यायविदों में स्थापित किया है।

भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा देने के बाद, उन्होंने नवंबर 2024 में पदमुक्त होकर एक गौरवशाली न्यायिक जीवन का समापन किया। उनका करियर वर्ष 2000 में बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति से प्रारंभ हुआ। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश (2016 से) के रूप में कार्य किया।
अपने आरंभिक कार्यकाल में वे भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रहे और वर्ष 1998 में उन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया।

वे सेंट स्टीफन्स कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय के कैम्पस लॉ सेंटर के स्नातक हैं। इसके पश्चात उन्होंने हार्वर्ड लॉ स्कूलअमेरिका से एल.एल.एम. और विधि में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

कानून के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान से परे, डॉ. चंद्रचूड़ योग के समर्पित साधक रहे हैं। वे अपने युवावस्था से ही योग का अभ्यास करते आए हैं और दशकों से इसका पालन करते हैं। जीवन और नेतृत्व के प्रति उनका दृष्टिकोण योग की मूल भावना को प्रतिबिंबित करता है —
योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि संतुलन, संयम और आत्म-जागरूकता के सिद्धांतों पर आधारित जीवन का समग्र दृष्टिकोण है।

मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने न्यायिक क्षेत्र में योग, स्वास्थ्य और कल्याण को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया। उनके नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट में एक योग हॉल का उद्घाटन किया गया, जहाँ नियमित योग सत्रों की शुरुआत हुई — जिससे न्यायालय में सजगता, स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन की संस्कृति का विकास हुआ।

डॉ. चंद्रचूड़ के लिए योग आसनों के अभ्यास से आगे बढ़कर आत्म-अनुशासन, सत्यनिष्ठा और सामंजस्य के यम-नियम जैसे मूल सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करता है। ये मूल्य उन्होंने अपने व्यक्तिगत आचरण और सार्वजनिक सेवा में निरंतर अपनाए हैं। उनका नेतृत्व योग से उत्पन्न उस आध्यात्मिक संतुलन को दर्शाता है जो बुद्धि को करुणा और न्याय को मानवता के साथ जोड़ता है।

योग के आदर्शों के प्रति उनके जीवनपर्यंत समर्पण के सम्मान में, कैवल्यधाम को गर्व है कि वह डॉ. न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ को स्वामी कुवलयानंद योग पुरस्कार 2025 प्रदान कर रहा है।

उनका जीवन और कार्य स्वामी कुवलयानंद की उस दृष्टि से गहराई से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने परंपरा की ज्ञान-गंगा को विज्ञान की कठोरता के साथ एकीकृत कर समाज को योग की रूपांतरकारी शक्ति के माध्यम से ऊँचा उठाने का प्रयास किया।

डॉ. शर्ली टेलिस
अनुसंधान सलाहकार एवं परामर्शदातापतंजलि रिसर्च फाउंडेशनहरिद्वार

हमारी अंतिम पुरस्कार प्राप्तकर्ता स्वयं एक उत्साही योग साधिका हैं और उनका विश्वास है कि योग अनुसंधान जीवन के प्रत्येक पहलू पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

डॉ. टेलिस ने पारंपरिक चिकित्सा (एम.बी.बी.एस.) में स्नातक की डिग्री प्राप्त की है। इसके बाद उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस (NIMHANS), बेंगलुरु से योग अभ्यास के प्रभावों पर न्यूरोफिज़ियोलॉजी में एम.फिल. और पीएच.डी. पूरी की।

अपने डॉक्टरेट के पश्चात, डॉ. टेलिस ने स्वामी विवेकानंद रिसर्च फाउंडेशन, बेंगलुरु से जुड़कर वहाँ प्रयोगशालाएँ स्थापित करने का अद्वितीय पोस्टडॉक अनुभव प्राप्त किया और अनुसंधान कार्य आरंभ किया।
वर्ष 2007 से, डॉ. टेलिस पतंजलि रिसर्च फाउंडेशनहरिद्वार से जुड़ी हुई हैं।

उन्हें वर्ष 1998 में ध्यान-साधकों पर fMRI अध्ययन करने हेतु फुलब्राइट फैलोशिप प्राप्त हुई, जो यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडागेंसविलअमेरिका के रेडियोलॉजी विभाग में किया गया।

वर्ष 2001 में उन्हें टेम्पलटन फाउंडेशन से न्यूरोबायोलॉजी में सृजनात्मक विचारों के लिए पुरस्कार मिला।
2007 में वे इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के अंतर्गत सेंटर फॉर एडवांस्ड रिसर्च, बेंगलुरु में योग और ध्यान के प्रभावों पर अध्ययन करने वाली पहली भारतीय वैज्ञानिक बनीं। उन्होंने स्वायत्त तंत्रिकाओं, प्रेरित एवं घटना-संबंधी विभवों, पॉलीसोमनोग्राफी जैसे विषयों पर शोध किया।

उन्होंने लगभग 200 शोध-पत्र प्रकाशित किए हैं जो विभिन्न अंतरराष्ट्रीय डेटाबेस में उद्धृत हैं, और पुस्तकों की रचना की है।

डॉ. टेलिस को भारत एवं विश्वभर में योग और आयुर्वेद के स्वास्थ्य एवं उपचार में अनुप्रयोगों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया है।
उनके योगदानों ने योग को एक वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में वैश्विक समझ को अत्यधिक समृद्ध किया है।

योगाचार्य रंभाऊ खंडवे
अध्यक्षजनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडल

हमारे दूसरे पुरस्कार प्राप्तकर्ता का परिचय देना हमारे लिए गौरव की बात है — योगाचार्य रंभाऊ खंडवे, जिन्होंने अपने जीवन के छह दशकों से भी अधिक समय योग की निःस्वार्थ सेवा में समर्पित किया है। उनका यह समर्पण जनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडलरामनगरनागपुर के साथ उनके गहन संबंध के माध्यम से प्रकट होता है, जिसकी स्थापना परम पूज्य जनार्दन स्वामी ने वर्ष 1951 में की थी।

श्री रंभाऊ खंडवे अनेक वर्षों तक मंडल के कार्यवाह रहे हैं और वर्ष 2022 से अध्यक्ष के रूप में सेवा दे रहे हैं।

कैवल्यधाम द्वारा प्रचारित योग के आदर्शों के प्रेरक वाहक के रूप में, योगाचार्य रंभाऊ खंडवे ने अपने अनुशासित जीवन, पतंजलि के अष्टांग योग के गहन ज्ञान, और करुणा-पूर्ण शिक्षण दृष्टिकोण से अनगिनत साधकों को प्रेरित किया है।

नियमित कक्षाओं, प्रशिक्षण शिविरों और जन-जागरण के माध्यम से उन्होंने विशेषकर महाराष्ट्र में समाज के ताने-बाने में योगिक मूल्यों को समाहित करने का कार्य किया है।
उनकी जीवनशैली — जो आध्यात्मिक गहराई और सामाजिक प्रासंगिकता का संतुलित उदाहरण है — उन्हें योग पथ पर अनेक लोगों के लिए एक मार्गदर्शक बनाती है।

जनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडल में अपने आजीवन कार्य के माध्यम से उन्होंने पतंजलि के अष्टांग योग की भावना को बनाए रखा और विनम्रता, अनुशासन, विवेक तथा ज्ञान पर आधारित पारंपरिक योग साधनाओं को आगे बढ़ाया।
उन्होंने स्वामी कुवलयानंद जी की उस दृष्टि को साकार करने में योगदान दिया जिसमें योग को विज्ञान की दृढ़ता के साथ जोड़कर मानव उत्थान और कल्याण का माध्यम बनाया गया।

सरहदों से पार हैं जनजाति योद्धाओं का पराक्रम

15 नवंबर बिरसा मुंडा 150 जयंती पर विशेष

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सुदूर आदिवासी अंचलों से भी अंगे्रजी शासन के खिलाफ आवाज उठी थी. अनेक जनजाति योद्धाओं ने अपने पराक्रम का परिचय दिया था. ये सारे योद्वा एक अंचल अथवा समुदाय के लिए अंग्रेजी शासन से नहीं लड़े थे बल्कि ये भारत भूमि के लिए लड़े थे, लेकिन यह दुर्भाग्य से इन सारों को उन्हें क्षेत्र विशेष में बाँध दिया गया था. वे जिस अंचल से आते थे, उनके लिए वे गौरव नायक तो हुए ही, साथ ही वे समूचे भारतीय समाज के लिए गौरव नायक हैं. इन्हीं गौरव नायकों में बिरसा मुंडा का नाम आता है. भारत सरकार की पहल पर बिरसा मुंडा की जन्म जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में स्थापित किया गया. यह वर्ष बिरसा मुंडा की जन्म जयंती का डेढ़ सौ वर्ष है जिसे पूरे देश में सेलिब्रेट किया जा रहा है.

यह हम सबके लिए गौरव की बात है. बिरसा मुंडा को उनके कार्यों के लिए जननायक ही नहीं माना जाता बल्कि उन्हें भगवान का दर्जा हासिल है. अहिल्या देवी को जिस तरह लोकमाता का दर्जा प्राप्त है, वैसा ही बिरसा मुंडा भगवान कहे जाते हैं. बिरसा मुंडा की विरासत के बारे में जानने से पहले देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू के इस वक्तव्य को समझ लेते हैं. वे कहती हंै कि-आज जब देश ने अपने आधुनिक इतिहास के इस महान व्यक्तित्व की 150वीं जयंती का साल भर चलने वाला समारोह शुरू किया है, मैं उनकी पुण्य स्मृति को कृतज्ञतापूर्वक नमन करती हूँ। मुझे यह भी याद आता है कि कैसे बचपन में भगवान बिरसा मुंडा की गाथाएं सुनकर मुझे और मेरे संगी-साथियों को अपनी विरासत पर गर्व महसूस होता था। मात्र 25 वर्ष की छोटी सी आयु में, आज के झारखंड के उलिहातू गांव का वह बालक औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध जन-प्रतिरोध का महानायक बन गया। जब ब्रिटिश अधिकारी और स्थानीय जमींदार जनजातीय समुदायों का शोषण कर रहे थे, उनकी ज़मीनें हड़प रहे थे और अत्याचार कर रहे थे तब भगवान बिरसा इस सामाजिक और आर्थिक अन्याय के विरुद्ध उठ खड़े हुए और लोगों को अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए प्रेरित किया।
‘धरती आबा’ के रूप में सम्मानित भगवान बिरसा ने 1890 के दशक के अंत में ब्रिटिश उत्पीडऩ के विरुद्ध ‘उलगुलान’ या मुंडा विद्रोह का संचालन किया। उलगुलान, निस्संदेह, एक विद्रोह से कहीं ब?कर था। यह लड़ाई न्याय और सांस्कृतिक पहचान दोनों के लिए थी। भगवान बिरसा मुंडा की सूझबूझ ने एक ओर जनजातीय लोगों द्वारा बिना किसी हस्तक्षेप के अपनी ज़मीन पर स्वामित्व और खेती करने के अधिकार को, तो दूसरी तरफ जनजातीय रीति-रिवाज़ों और सामाजिक मूल्यों के महत्व को एक साथ जोड़ दिया। महात्मा गांधी की तरह, उनका संघर्ष भी न्याय और सत्य की खोज से प्रेरित था। बीमारों की सेवा करना उनके लिए मिशन था। उन्हें एक उपचारकर्ता का प्रशिक्षण मिला था, और अद्भुत घटनाओं की एक श्रृंखला ने लोगों में यह विश्वास पैदा किया कि ईश्वर ने उन्हें एक महान उपचारक का विशेष स्पर्श दिया है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे किसी भी बीमार व्यक्ति को उनके पास लाएं, और कहा, ‘यदि यह संभव नहीं है तो मैं खुद बीमारों से मिलने आऊंगा।’ वे गाँव-गाँव बीमारों से मिलने जाते थे, और अपने कौशल और अपने उपचार करने वाले स्पर्श से असंख्य लोगों को स्वस्थ कर देते थे।
बिरसा मुंडा के  बलिदान की गाथा भारत के जनजातीय समुदायों के महान क्रांतिकारियों के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। उनके संघर्ष हमारी धरती की उस अनूठी परंपरा को रेखांकित करते हैं, जहाँ कोई भी समुदाय कभी मुख्यधारा से अलग नहीं रहा। वनवासी, जो आज अनुसूचित जनजातियों की श्रेणी में आते हैं, हमेशा से राष्ट्रीय सामूहिकता का हिस्सा रहे हैं। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि-उन्होंने मातृभूमि के सम्मान और गौरव की रक्षा के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। वर्तमान झारखंड में 1875 में जन्मे मुंडा ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी थी और आदिवासियों को साम्रा’य के विरुद्ध संगठित करने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। 25 वर्ष की अल्पायु में ब्रिटिश हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई। बिरसा मुंडा अपनी छोटी सी उम्र में इतिहास लिख गए. स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में बिरसा मुंडा का नाम स्वर्णाक्षरों में लिख गया है. आने वाली पीढिय़ों के लिए वे आदर्श हैं और वे अपने त्याग से बताते हैं कि देशभक्ति क्या होती है.
‘धरती आबा’ बिरसा मुंडा का उदय 1857 के दो दशक बाद हुआ। खूंटी के उलिहातू में 15 नवंबर 1875 को बिरसा मुंडा का जन्म हुआ। बिरसा की प्रारंभिक शिक्षा चाईबासा के जर्मन मिशन स्कूल में हुई। पढ़ाई के दौरान ही बिरसा की क्रांतिकारी तेवर का पता चलने लगा। इधर, सरदार आंदोलन भी चल रहा था जो सरकार और मिशनरियों के खिलाफ भी था। सरदारों के कहने पर ही मिशन स्कूल से बिरसा मुंडा को हटा दिया गया। 1890 में बिरसा और उसके परिवार ने भी चाईबासा छोड़ दिया और जर्मन ईसाई मिशन की सदस्यता भी। बिरसा ने जर्मन मिशन त्यागकर रोमन कैथोलिक धर्म स्वीकार किया। बाद में इस धर्म से भी अरुचि हो गई। 1891 में बंदगांव के आनंद पांड़ के संपर्क में आए। आनंद स्वांसी जाति के थे और गैरमुंडा जमींदार जगमोहन सिंह के यहां मुंशी का काम करते थे। आनंद रामायण-महाभारत के अ‘छे ज्ञाता थे। इससे उनका प्रभाव भी था।
आंदोलन की गति धीमी थी और बिरसा भी इस आंदोलन में भाग लेने लगे थे। सरदार आंदोलन में भाग लेने को ले आनंद पांड़ ने समझाया लेकिन बिरसा ने आंनद की बात नहीं सुनी। आगे चलकर, बिरसा भी इस आंदोलन में कूद गए। बिरसा ने एक दिन घोषणा की कि वह पृथ्वी पिता यानी ‘धरती आबा’ है। उनके अनुयायियों ने भी इसी रूप को माना। ब्रिटिश सत्ता ने 1895 में पहली बार बिरसा मुंडा को गिरफ्तार किया तो धार्मिक गुरु के रूप में मुंडा समाज में स्थापित हो चुके थे। दो साल बाद जब रिहा हुए तो अपने धर्म को मुंडाओं के समक्ष रखना शुरू। आगे चलकर धार्मिक सुधार का यह आंदोलन भूमि संबंधी राजनीतिक आंदोलन में बदल गया। छह अगस्त 1895 को चौकीदारों ने तमाम थाने में यह सूचना दी कि ‘बिरसा नामक मुंडा ने इस बात की घोषणा की है कि सरकार के रा’य का अंत हो गया है।’ इस घोषणा को अंग्रेज सरकार ने हल्के में नहीं लिया। वह बिरसा को लेकर गंभीर हो गई। उधर बिरसा मुंडा ने मुंडाओं को जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए बलिदान देने के लिए प्रेरित किया। बिरसा मुंडा का पूरा आंदोलन 1895 से लेकर 1900 तक चला। इसमें भी 1899 दिसंबर के अंतिम सप्ताह से लेकर जनवरी के अंत तक काफी तीव्र रहा। डरपोक अंग्रेज सरकार ने चालाकी से बिरसा को रात में पकड़ लिया, जब वह सोए थे। बिरसा जेल भेज दिए गए। बिरसा और उनके साथियों को दो साल की सजा हुई। पहली गिरफ्तारी अगस्त 1895 में बंदगांव से हुई।
बिरसा को रांची जेल से हजारीबाग जेल भेज दिया गया। &0 नवंबर 1897 को उसे जेल से रिहा कर दिया गया। उसे पुलिस चलकद लेकर आई और चेतावनी दी कि वह पुरानी हरकत नहीं करेगा। बिरसा ने भी वादा किया कि वह किसी तरह का आंदोलन नहीं करेगा, लेकिन अनुयायियों और मुंडाओं की स्थिति देखकर बिरसा अपने वचन पर कायम नहीं रह सके। हाालांकि पुलिस भी बिरसा और उनके अनुयायियों पर नजर रखे हुए थी। पल-पल की खबर के लिए उसने कई गुप्तचर छोड़ रखे थे। चौकीदारों का काम भी यही था। फिर भी बिरसा चकमा दे जाते। कब कहां किस पहाड़ी पर बैठक होनी है, यह बहुत गुप्त रखा जाता।

जमींदारों और पुलिस का अत्याचार भी बढ़ता जा रहा था। मुंडाओं का विचार था कि आदर्श भूमि व्यवस्था तभी संभव है, जब यूरोपियन अफसर और मिशनरी के लोग पूरी तरह से हट जाएं। इसलिए, एक नया नारा गढ़ा गया-‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ जिसका मतलब है कि अपना देश-अपना राज। 24 दिसंबर 1899 से लेकर बिरसा की गिरफ्तारी तक रांची, खूंटी, सिंहभूम का पूरा इलाका ही विद्रोह से दहक उठा था। इसका केंद्र खूंटी था। इस विद्रोह का उद्देश्य भी चर्च को धमकाना था कि वह लोगों को बरगलाना छोड़ दे, लेकिन वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे।  पुलिस को खबर मिली की नौ जनवरी को सइल रकब पर मुंडाओं की एक बड़ी बैठक होने वाली है। पुलिस दल-बल के साथ यहां पहुंची। पहाड़ी करीब तीन सौ फीट ऊंची थी। यहां पुलिस और विद्रोहियों के बीच जमकर युद्ध हुआ, लेकिन बिरसा मुंडा यहां नहीं मिले। वे पहले ही यहां से निकल गए थे।

बिरसा के हाथ न आने से पुलिस बौखलाई हुई थी।  यहां भी अपना हुलिया बदलकर निकल गए थे। अब पुलिस ने लालच की तरकीब निकाली और बिरसा का पता देने वालों को इनाम की घोषणा की। यह उक्ति काम कर गई। वे पोडाहाट के जंगलों में अपना स्थान बदलते रहते।
अपनों से ही शिकस्त खा गए बिरसा को मानमारू और जरीकेल के सात आदमी इनाम के लोभवश सेंतरा के पश्चिमी जंगल पहुंचे और बिरसा को यहां देखा तो खुशी का ठिकाना रहीं रहा। जब सभी खा-पीकर सो गए तो इन लोगों ने मौका देखकर सभी को दबोच लिया और बंदगांव में डिप्टी कमिश्नर को सुपुर्द कर दिया। इन लोगों को पांच सौ रुपये का नकद इनाम मिला। बिरसा को वहां से रांची जेल भेजा गया। यहीं रांची जेल में नौ जून 1900 को हैजा के कारण बिरसा ने अंतिम सांसें ली और आनन-फानन में कोकर पास डिस्टिलरी पुल के निकट उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस तरह एक युग का अंत हुआ। जाते-जाते बिरसा मुंडा ने लोगों के जीवन पर ऐसी छाप छोड़ी कि आदिवासियों ने उन्हें भगवान का दर्जा दे दिया।
पीएम मोदी ने बिरसा मुंडा की जन्मदिवस को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस घोषित किया था. वर्ष 2025 उनकी जन्मजयंती के डेढ़ सौ वर्ष है. इस अवसर पर मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देशन में प्रदेशव्यापी आयोजन हो रहा है. राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस पर डॉ. मोहन यादव कहते हैं-मध्यप्रदेश देश का सबसे बड़ा जनजातीय आबादी वाला रा’य है। यहां करीब 21 प्रतिशत लोग जनजातीय समुदाय से हैं। यह वर्ग प्रकृति के साथ मिलकर जीवन जीता है और उसकी रक्षा करता है। सरकार इन समुदायों के शिक्षा, समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के विकास के लिए पूरी तरह समर्पित है। उनका कहना है कि जनजातीय समाज के शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक विकास में एनजीओ की भूमिका महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया कि जनजातीय कल्याण सरकार की सर्वो‘च प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि रानी दुर्गावती की &00वीं जयंती पर जबलपुर में विशेष कैबिनेट बैठक आयोजित की गई थी। इसके अलावा, खरगोन में टंट्या मामा भील विश्वविद्यालय की स्थापना और राजा शंकर शाह-कुंवर रघुनाथ शाह के कार्यों को जनता तक पहुँचाने जैसे कदम उठाए गए हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

भागवत की नई दृष्टि और समरस भारत की परिकल्पना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रायः हिंदूवादी संगठन के रूप में देखा जाता रहा है, परंतु वस्तुतः वह केवल एक धार्मिक या सांप्रदायिक संगठन नहीं, बल्कि भारतीयता और राष्ट्रीयता की जीवंत चेतना का प्रतीक है। संघ की मूल प्रेरणा “वसुधैव कुटुम्बकम्” के भाव से उपजी है, जो भारत की सनातन संस्कृति की आत्मा है। इसी दृष्टि का विस्तार संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के हालिया बेंगलुरु वक्तव्य में परिलक्षित हुआ, जब उन्होंने खुले हृदय से कहा कि “ईसाई और मुसलमान भी संघ में शामिल हो सकते हैं”। यह कथन न केवल साहसिक है बल्कि यह नए भारत, विकसित भारत और संतुलित भारत की सोच का परिचायक भी है। संघ में मुस्लिम, ईसाई समेत किसी भी संप्रदाय के लोगों के स्वागत की भागवत के वक्तव्य की व्यापक चर्चा होना स्वाभाविक है। लेकिन यह वक्तव्य संघ की व्यापक सोच का भी परिचायक है और उसके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

मोहन भागवत का यह वक्तव्य संघ की विचारधारा में निहित उस भारतीय दर्शन की पुनः पुष्टि करता है जिसमें धर्म का अर्थ संप्रदाय नहीं बल्कि जीवन-मूल्यों का समुच्चय है। संघ के लिए हिंदुत्व किसी धर्म विशेष का नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की वह पद्धति है जिसमें समरसता, सह-अस्तित्व, करुणा और राष्ट्रनिष्ठा के तत्व समाहित हैं। यही कारण है कि संघ की दृष्टि में “हिंदुत्व” का अर्थ भारतीयता है अर्थात् भारत की संस्कृति, परंपरा, इतिहास, संवेदना और जीवनशैली से आत्मीय जुड़ाव। ऐसा नहीं है कि इसके पहले संघ में विभिन्न संप्रदायों के लोगों को आने की अनुमति नहीं थी, यह अनुमति पहले से है और सच तो यह है कि उसके कार्यक्रमों में विभिन्न संप्रदायों के लोग आते भी रहे हैं। इनमें मुस्लिम और ईसाई भी हैं। इस सबके बाद भी धारणा यह भी है कि संघ के कार्यक्रमों में केवल हिंदू संप्रदाय के लोग शामिल होते हैं।
इस धारणा का कारण यह है कि हिंदू संप्रदाय को लेकर संघ की अपनी विशिष्ट धारणा और परिभाषा है। उसके अनुसार देश में रहने वाले सभी लोग हिंदू ही हैं, भले ही उनका संप्रदाय और उनकी उपासना पद्धति कुछ भी हो। संघ की ओर से बार-बार यह स्पष्ट किया गया है कि चूंकि इस देश में रहने वाले समस्त लोगों के पूर्वज हिंदू ही थे, इसलिए वह सभी को हिंदू के रूप में देखता, मानता और संबोधित करता है। आखिर इस अवधारणा में कठिनाई क्या है?
संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरुजी गोलवलकर ने कहा था, “हिंदुत्व केवल धर्म नहीं, वह संस्कृति है, जीवन का एक दृष्टिकोण है।” इसी सूत्र को आगे बढ़ाते हुए मोहन भागवत स्पष्ट करते हैं कि हिंदुत्व किसी जाति, भाषा, मज़हब या सीमित परंपरा का नाम नहीं है। संघ यह मानता है कि भारत में रहने वाले सभी लोग, चाहे वे किसी भी पंथ या विश्वास से जुड़े हों, इस धरती के सांस्कृतिक उत्तराधिकारी हैं। इसीलिए वे भारतीय हैं और इस दृष्टि से “हिंदू” अर्थात् इस भूमि की सभ्यता के उत्तराधिकारी। संघ की दृष्टि में “हिंदू” शब्द धार्मिक पहचान से अधिक सांस्कृतिक अवधारणा है। यह भारतीय जीवन का पर्याय है, जो समानता, सहिष्णुता और एकात्मता में विश्वास करता है। यही भाव “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” जैसे मंत्रों में प्रतिध्वनित होता है।
आज की राजनीति में समाज को जाति, धर्म और भाषा के आधार पर बाँटने का जो विषवमन चल रहा है, उससे राष्ट्र की एकात्मता को गहरी चोट पहुँच रही है। संघ का उद्देश्य इस विभाजनकारी मानसिकता के प्रतिरोध में खड़ा होना है। मोहन भागवत का यह वक्तव्य इसी विषहरण की प्रक्रिया का हिस्सा है, एक ऐसी पुकार जो समाज के हर वर्ग को यह विश्वास दिलाती है कि राष्ट्र की आत्मा किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान में नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक चेतना में निहित है। संघ के लिए राष्ट्र ही सर्वाेच्च देवता है। इस राष्ट्रभक्ति के केंद्र में धर्मनिरपेक्षता नहीं बल्कि धर्मसम्मतता है अर्थात् ऐसी आस्था जो सभी मतों का सम्मान करती है। इसी भाव से प्रेरित होकर संघ अपने कार्यकर्ताओं को “हिंदू समाज की सेवा के माध्यम से समग्र भारतीय समाज की एकता” का लक्ष्य देता है।
भागवत का यह संदेश उस भारत की परिकल्पना करता है जिसमें मतभेद तो हो सकते हैं, पर मनभेद नहीं। वे मानते हैं कि “जो भी इस भूमि में जन्मा है, उसका पूर्वज कोई न कोई हिंदू ही रहा है।” यह कथन ऐतिहासिक नहीं, सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि भारत की सभ्यता का मूल एक ही रहा है, जिसने विविध रूपों में विकसित होकर अनेक धर्मों और संप्रदायों को जन्म दिया।
इस संदर्भ में भागवत का दृष्टिकोण गांधीजी की उस संकल्पना से मेल खाता है जिसमें उन्होंने कहा था- “मेरा हिंदुत्व सबको समेटने वाला है, किसी को बाहर करने वाला नहीं।” यही समावेशी भाव राष्ट्र की एकता का आधार बन सकता है। यदि संघ इस पर बल देता है कि उसका उद्देश्य हिंदुओं को संगठित करना है तो इसका अर्थ यही भी है कि वह सभी भारतीयों को संगठित करके एक सशक्त राष्ट्र की परिकज्पना करता है। कठिनाई यह है कि उसके विरोधी यह प्रचारित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते कि वह तो केवल हिंदू समाज का संगठन है। चूंकि यह दुष्प्रचार बड़े पैमाने पर हो रहा है, इसलिए आवश्यक हो जाता है कि संघ के स्तर एवं अन्य स्तरों पर इन देश तोड़क स्थितियों एवं दुष्प्रचार का स्पष्टीकरण होता रहे।
संघ को लेकर फैलायी जा रही यह भ्रांति एवं गुमराह पूर्ण स्थितियों का खुलासा होना जरूरी है कि संघ संप्रदाय विशेष के लोगों को एकजुट करने का कार्य कर रहा है। यदि यह मिथ्या धारणा दूर हो सके तो संघ का कार्य और अधिक आसान एवं सृजनात्मक हो जाएगा, लेकिन यह मानकर चला जाना चाहिए कि संघ के विरोधी उसके बारे में दुष्प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। जो भी हो, संघ प्रमुख ने यह कहकर एक तरह से अपने विरोधियों और आलोचकों की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया है कि उसके कार्यक्रमों में सभी संप्रदायों के लोग आ सकते हैं, लेकिन केवल भारत माता के पुत्र के रूप में। उनकी इस पहल का सकारात्मक उत्तर दिया जाना चाहिए, उसका व्यापक स्तर पर स्वागत भी होना चाहिए। लेकिन बड़ी विडंबना यह है कि कुछ लोग भारत को माता के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। क्या यह किसी से छिपा है कि संकीर्ण राजनीतिक कारणों से भारत माता की जय कहने से बचा जाता है? पिछले दिनों इसी संकीर्ण दृष्टि के कारण वंदे मातरम् के विरोध में स्वर सुनाई दिए।
इक्कीसवीं सदी का भारत केवल आर्थिक या तकनीकी महाशक्ति नहीं बनेगा, यदि उसके भीतर मानसिक और सांस्कृतिक एकता का सूत्र न हो। संघ इसी सूत्र को मजबूत करने का कार्य कर रहा है। भागवत का संदेश भारत के बहुलतावाद और धार्मिक विविधता में निहित एकता को स्वीकार करता है। यह एक ऐसा आमंत्रण है जो हर नागरिक को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि “भारतीयता” हमारी साझा पहचान है, बाकी सब उपाधियाँ हैं। इस दिशा में संघ का दृष्टिकोण “समरस समाज” की रचना पर केंद्रित है? ऐसा समाज जहाँ मुसलमान, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी सभी अपने धर्म का पालन करते हुए भी राष्ट्र को अपनी मातृभूमि मानें और भारतीय संस्कृति के गौरव से जुड़ें। मोहन भागवत के बेंगलुरु वक्तव्य ने हिंदुत्व की परिभाषा को एक व्यापक और आधुनिक संदर्भ दिया है। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि संघ का हिंदुत्व किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबके लिए है। यह विभाजन नहीं, समन्वय का सूत्र है। यही सच्ची भारतीयता है- जो विविधताओं में एकता को, विरोध में संवाद को और मतभेद में सह-अस्तित्व को स्वीकार करती है। संघ का यह दृष्टिकोण बताता है कि हिंदुत्व का अर्थ किसी पंथ का वर्चस्व नहीं, बल्कि उस जीवनदर्शन का पुनर्जागरण है जिसमें भारत की आत्मा बसती है। यही भाव राष्ट्र को अखंडता, शांति और विकास के पथ पर अग्रसर करेगा।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

आस्था-इतिहास-पर्यटन का संगम: लक्ष्मण पथ, पंचवटी द्वीप और पीपा पुल की परिकल्पना

जबसे भगवान श्रीराम अयोध्या में अपने भव्य मंदिर में विराजे हैं, राम नगरी के इस शहर में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। बढ़ती भीड़ और सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने कई परियोजनाओं की शुरुआत की है।

अयोध्या आज देश और दुनिया का बड़ा आध्यात्मिक केंद्र बन चुकी है। राम मंदिर निर्माण के बाद यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस स्थिति में प्रशासन ऐसे सभी प्रोजेक्टों पर काम कर रहा है जो शहर को सुव्यवस्थित, आकर्षक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाएं।आज हम अयोध्या में विकसित हो रहे लक्ष्मण पथ, पंचवटी द्वीप और पीपा पुल की परिकल्पना को साकार होते देख रहे हैं।

 

1.लक्ष्मण पथ का निर्माण

लक्ष्मण पथ अयोध्या में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाया जा रहा एक नया चार-लेन वाला वैकल्पिक मार्ग है। यह लगभग 12 किलोमीटर लंबा होगा और इसकी लागत लगभग ₹200 करोड़ है। इस मार्ग का उद्देश्य गुप्तारघाट से राजघाट तक कनेक्टिविटी में सुधार करना है, जिससे अयोध्या में यातायात प्रबंधन में मदद मिलेगी और अन्य प्रमुख मार्गों जैसे राम पथ, जन्मभूमि पथ, भक्ति पथ और धर्म पथ के साथ एक व्यापक नेटवर्क बनेगा।  यह राम पथ, जन्मभूमि पथ, भक्ति पथ, धर्म पथ जैसी अन्य परियोजनाओं और अयोध्या के लिए एक व्यापक सड़क नेटवर्क का हिस्सा हैं। इस पथ के निर्माण के साथ-साथ, भीड़ प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए गुप्तार घाट, उदया पब्लिक स्कूल के सामने और राजघाट पर पार्किंग स्थलों का भी निर्माण किया

जाएगा।

सरयू नदी के तटबंध की चौड़ाई पहले छह मीटर थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर सात मीटर कर दिया गया है। लक्ष्मण पथ की चौड़ाई 18 मीटर रखने का डिज़ाइन तैयार किया गया है। जन्मभूमि पथ, भक्ति पथ और धर्म पथ का निर्माण पूरा करने के बाद, योगी सरकार अब लक्ष्मण पथ के निर्माण की तैयारी कर रही है। इस नए वैकल्पिक मार्ग के लिए एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की गई है, जिसका नाम भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण के नाम पर रखा जाएगा।

 

2.पंचवटी द्वीप की परिकल्पना

अयोध्या विकास प्राधिकरण (एडीए) श्री निलयम रिसॉर्ट के माध्यम से सरयू के बीच 75 एकड़ में पंचवटी द्वीप का विकास कर रहा है। यह परियोजना अपने आप में अनोखी है क्योंकि इसे भगवान राम के जीवन से जुड़े प्रसंगों पर आधारित थीम पर विकसित किया जा रहा है। इसमें ‘राम की जीवन यात्रा’ पर आधारित प्रस्तुतीकरण, ऋषि कॉटेज, योग एवं ध्यान केंद्र, सांस्कृतिक मंच, घुड़सवारी की व्यवस्था, एडवेंचर जोन और जैविक खेती के मॉडल स्थापित किए जा रहे हैं।

पंचवटी द्वीप को अयोध्या की विश्व-स्तरीय पर्यटन पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा रहा है। यहां धार्मिक कार्यक्रम, सांस्कृतिक आयोजन और योग-ध्यान से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समारोह भी आयोजित किए जा सकते हैं। पीपा पुल इसमें प्राकृतिक सौंदर्य और पारंपरिक आकर्षण दोनों का मेल जोड़ देगा। नई परियोजना में सुरक्षा और स्थायित्व पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

एक नया पीपा पुल जमथरा घाट के पास बनाया जाएगा और लक्ष्मण पथ को सरयू नदी के मध्य विकसित किए जा रहे पंचवटी द्वीप से जोड़ेगा। इससे न केवल पर्यटन को नई उड़ान मिलेगी बल्कि श्रद्धालुओं के लिए पहुंच मार्ग भी अधिक सुगम और आकर्षक बनेगा। पीपा पुल पार करने का अनुभव अलग ही होता था। सरयू की धीमी-धीमी लहरों पर झूलता पुल यात्रियों के लिए रोमांच की अनुभूति कराता था। अब वही दृश्य एक आधुनिक और सुरक्षित रूप में फिर सामने आएगा। प्रशासन का मानना है कि यह नया पुल श्रद्धालुओं, पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा।

पीपा पुल की मजबूती बढ़ाने के लिए आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों का प्रयोग होगा। पुल पर पर्याप्त चौड़ाई, रेलिंग और रात्रिकालीन रोशनी की भी व्यवस्था प्रस्तावित है ताकि श्रद्धालु सुरक्षित तरीके से आवागमन कर सकें। अधिकारियों का कहना है कि मानसून के दौरान पुल को सुरक्षित तरीके से हटाने और पुनः स्थापित करने की योजना भी तैयार की जा रही है।  इससे नदी की प्राकृतिक धारा और जलस्तर के अनुसार कार्यप्रणाली को नियंत्रित किया जा सकेगा।

सरयू की धारा पर फिर दिखेगा तैरता पुल

नई परियोजना में सुरक्षा और स्थायित्व पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। पीपा पुल की मजबूती बढ़ाने के लिए आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों का प्रयोग होगा। पुल पर पर्याप्त चौड़ाई, रेलिंग और रात्रिकालीन रोशनी की भी व्यवस्था प्रस्तावित है ताकि श्रद्धालु सुरक्षित तरीके से आवागमन कर सकें। अधिकारियों का कहना है कि मानसून के दौरान पुल को सुरक्षित तरीके से हटाने और पुनः स्थापित करने की योजना भी तैयार की जा रही है। इससे नदी की प्राकृतिक धारा और जलस्तर के अनुसार कार्यप्रणाली को नियंत्रित किया जा सकेगा।

पीपा पुल का निर्माण न केवल पुराने अयोध्या की याद दिलाएगा बल्कि नए आधुनिक शहर की सूरत भी संवारने में मदद करेगा। शासन का यह कदम आस्था, इतिहास और पर्यटन के त्रिवेणी संगम का प्रतीक माना जा रहा है।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं।

वॉट्सप नं.+919412300183