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बंकिम को क्या मालूम था कि उनके गीत को ही आधा कर दिया जाएगा…

अब बताइये। यदि हम वंदेमातरम् का वही टुकड़ा राष्ट्रगान की तरह रखें जिसमें सिर्फ प्रकृति की सुषमा का वर्णन है, जिसमें सुमधुरभाषिणीं, सुहासिनीं भारतीय पहचान का वर्णन है तो क्या वह भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि और आत्म-छवि एक ऐसे राष्ट्र की नहीं बनाता जो एक सॉफ्ट स्टेट है, जो दुनिया भर की धर्मांतरणोन्मादी शक्तियों के लिए एक खुला गोचर है, जहाँ आतंकवादी अपनी गतिविधियों के लिए स्वतंत्र हैं क्योंकि उन्हें संरक्षण देने वाले वही नहीं हैं जो उन्हें आश्रय देते हैं बल्कि वे भी हैं जो अभी अपने भाषणों में उनकी बी टीम की तरह काम करते हैं। दुर्गा के 10 हथियार 10 दिशाओं में भारती की संप्रभुता का गान थे। सैम मानेकशा ने क्यों कहा था कि A nation that sings only half its war cry will lose half its wars.” दुर्गा का संघर्ष किसी समकालीन समुदाय के विरुद्ध नहीं था, असुरों के विरुद्ध था। तब कोई समुदाय उनके नाम से बिदकेगा क्यों? इंडोनेशिया में एक दुर्गा मस्जिद है। क्या वहाँ के बहुसंख्यक समुदाय ने उस मस्जिद जाना बंद कर दिया? मौलाना हसरत मोहानी ने 1921 में इसे मातृभूमि की पुकार की तरह बताया था जो यह है भी। 1905 के स्वदेशी आंदोलन में पूरा गीत सड़कों पर गूँजा। नज़रुल इस्लाम ने गाया।
मूल वंदेमातरम् के शेष हिस्से की आवश्यकता आज इसलिए है कि भारत की न कोई विश्व-छवि और न कोई आत्म-छवि खंडित तरह से बने। जब आजाद हिंद फौज ने जापानी हवाओं में इसे गाया था तो पूरे पाँच छंद एक साथ गाये थे और उस फौज में बहुत सी आस्थाओं के सैनिक थे।
इजरायल का हतिक्वा (1878) गान में जिओन और यहूदी आत्मा है। फिलिस्तीनी नफरत करते हैं। पर क्या उसे इजरायल ने अपने यहाँ की एक आबादी को खुश करने के लिए काटा? नहीं। परिणाम? आयरन डोम, मोसाद, टफ राष्ट्र के रूप में वैश्विक छवि। इज़राइल के अधिकारियों और न्यायालयों ने भी यही टेक रखी कि यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का गीत है, यह नहीं बदला जा सकता। तुर्की में एर्दोआन ने ओटोमन मार्च लौटाया—कोई धर्मनिरपेक्ष विद्रोह वहाँ तमाम आधुनिकीकरण के बाद भी नहीं हुआ। भारत में हमने गोली चलने से पहले ही अपना गान काट दिया। पूर्ण गीत अलगाव नहीं पैदा करता यदि अलगाव पहले से है—अपनी पहचान छोड़ कर आप किसी की नज़रों में सम्मान के पात्र नहीं होते।
लिथुआनिया के राष्ट्रगीत Tautiška giesmė की भी काँट छाँट करने की माँग कुछ वर्ग वर्षों से कर रहे हैं। लिथुआनिया ने कहा कि ऐसे Edits उनकी दृष्टि में violation of national integrity होंगे जो अस्वीकार्य है।
2018 में equal opportunity commissioner ने जर्मनी के राष्ट्रगीत में आये Fatherland” को “homeland” शब्द से और “brotherly” को “courageously” शब्द से प्रतिस्थापित करने का सुझाव दिया पर चांसलर एंजेला मार्केल ने मना कर दिया और राष्ट्रपति फ्रैंकवाल्टर स्टीनमियर ने भी मना कर दिया।
प्रतीकों पर समझौता संप्रभुता का समर्पण होता है और आधा गान वैश्विक हँसी का पात्र बनाता है।BBC डॉक्यूमेंट्री (2025) का शीर्षक “India: The Reluctant Giant” इसीलिए था क्योंकि हम खुद को सेंसर करते हैं। उनका संदेश यह है कि यह देश अपनी जड़ों से कट चुका है।
मैं 1937 में लिये गये निर्णय की आलोचना नहीं कर रहा। जिस निर्णय में देश के तीन असाधारण नेता शामिल हों, उस पर कुछ कहने लायक ऊँचाई अपनी है भी नहीं, न उस दौर का तापमान इतने वर्षों बाद सुरक्षित दूरी पर बैठे हुए हम लोग आँक सकते हैं। मैं तो सिर्फ यह कह रहा हूँ कि 1957 में भारतीय कापीराइट एक्ट में संशोधन हुआ और उसमें कवि या लेखक के मृत्यूपरांत भी उसके अपनी रचना पर नैतिक अधिकार का बने रहना माना गया और वह अधिकार उसके विधिक उत्तराधिकारी पर अंतरित होना स्वीकार किया गया। वह तो शुक्र मानिए कि बंकिम चंद्र जी के उदार वंशजों ने इस संक्षिप्तीकरण पर अभी तक कोई आपत्ति नहीं की अन्यथा आप किसी महान रचना के साथ ऐसी स्वच्छंदता दिखाने का क्षेत्राधिकार ही नहीं रखते थे।
पर क्या वह सिर्फ एक ऐसी रचना का अंग-भंग था जिसने बंग-भंग तक रोक दिया था जब उसे अक्षुण्ण रूप से गाया जाता था? अथवा उसमें यदि मूर्तिपूजा दिखती थी और आपने उस मूर्तिपूजा के तर्क को स्वीकार लिया तो क्या यह उस अमर गीत में वर्णित मूर्ति का भंजन नहीं हुआ? कि मध्यकाल में मूर्तियाँ पत्थर की होती थीं तो तोड़ दी जाती थीं तब हमने आधुनिक युग में इस शब्द-मूर्ति को तोड़ना उचित समझा कि कुछ लोग अकॉमॉडेट हो सकें?
और वह विभाजन दिखता है क्योंकि भारत सिर्फ प्रकृति ही नहीं है, जनसंख्या भी है। बंकिम को प्रकृति के तत्काल बाद वे भी याद आये थे। कोई भी राष्ट्र बनता तो अपनी आबादी से ही है। प्रकृति ईश्वर की निर्मिति है। पर संस्कृति तो मनुष्यों से बनती है। बंकिम प्रकृति और संस्कृति दोनों से समन्वित भारत की बात कर रहे थे—
कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले कोटि-कोटि-भुजैरधृत-खरखरवाले।
भारत की यह जनसंख्या जो भारत का सबसे बड़ा dividend सिद्ध होती, इसी को अंग्रेजी राज ने कभी अकालों और कभी महामारियों में करोड़ों की संख्या में मरवाया। उनका इरादा इस जनसंख्या के साथ भी वही करने का था जो उन्होंने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की स्थानीय आबादी के साथ किया। उनका उत्पाटन और उन्मूलन। पर वंदे मातरम् के कवि ने इस आबादी को याद कराया कि तुम नि:शक्त नहीं हो- अबला केन मा एते बल। शक्ति की शब्द-मूर्ति बंकिम ने अकारण ही नहीं गढ़ी थी। Baz Luhrmann ने कहा था—A life lived in fear is a life half lived. कि भय में बिताया जीवन आधा जिया जीवन है।
बंकिम को क्या मालूम था कि उनके गीत को ही आधा कर दिया जाएगा।

 

इफ्फी 2025 में शांति और अहिंसा को बढ़ावा देने वाली उत्कृष्ट फिल्म रचनात्मकता को आईसीएफटी-यूनेस्को गांधी पदक से सम्मानित किया जाएगा

गोआ में आयोजित 46वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) में शुरू किया गया, आईसीएफटी-यूनेस्को गांधी पदक, आईसीएफटी पेरिस के सहयोग से यूनेस्को के तत्वावधान में प्रदान किया जाने वाला एक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार है। यह पुरस्कार शांति, संवाद और अहिंसा के गांधीवादी दृष्टिकोण को व्यक्त करने वाली उत्कृष्ट फिल्म को दिया जाता है।

इस वर्ष की 10 उल्लेखनीय फिल्मों का मूल्यांकन एक प्रतिष्ठित जूरी पैनल द्वारा किया जाएगा, जिसमें डॉ. अहमद बेदजौई, फिल्म एवं टेलीविजन निर्देशक-निर्माता और अल्जीयर्स अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के कलात्मक निदेशक (निर्णायक मंडल के अध्यक्ष), ज़ुएयान हुन, अंतर्राष्ट्रीय फिल्म, टेलीविजन एवं ऑडियो-विजुअल संचार परिषद (सीआईसीटी-आईसीएफटी) के उपाध्यक्ष और रचनात्मकता एवं नवाचार मंच (पीसीआई) के निदेशक, सर्ज मिशेल, यूनिका (यूनियन इंटरनेशनेल डू सिनेमा) के उपाध्यक्ष, टोबियास बियानकोन, अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संस्थान (आईटीआई) के पूर्व महानिदेशक और जॉर्जेस ड्यूपॉंट, अंतर्राष्ट्रीय फिल्म, टेलीविजन एवं ऑडियो-विजुअल संचार परिषद (सीआईसीटी-आईसीएफटी) के महानिदेशक और यूनेस्को में पूर्व वरिष्ठ अंतर्राष्ट्रीय सिविल सर्वेंट शामिल होंगे।

 

ब्राइड्स

प्लेराईट और फिल्म निर्माता नादिया फॉल्स की पहली ड्रामा फिल्म ब्राइड्स का प्रीमियर सनडांस फिल्म फेस्टिवल 2025 में हुआ, जहां इसे विश्व सिनेमा (ड्रामाटिक) श्रेणी में ग्रैंड जूरी पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।

यह फ़िल्म दो ब्रिटिश-मुस्लिम किशोर लड़कियों की यात्रा पर आधारित है जो अपने कष्टमय जीवन और घरों से भागकर अपना अस्तित्व तलाशती हैं। लेकिन जब तक उनका सामना अपने अतीत से नहीं होता, तब तक उन्हें अपनी नई यात्रा का कोई मतलब नहीं समझ आता।

यह फिल्म अतिशयोक्ति से बचते हुए, कट्टरपंथ के मुद्दे, युवाओं की पहचान, आस्था, संबद्धता और पसंद के संघर्ष को मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है।

 

सेफ हाउस (मूल शीर्षक – फार मार्केट)

नॉर्वेजियन लेखक और फिल्म निर्देशक एरिक स्वेन्सन द्वारा निर्देशित “सेफ हाउस”, नॉर्वेजियन फिल्म निर्माताओं की नई पीढ़ी की एक प्रभावशाली युद्ध-ड्रामा फिल्म है। इस फिल्म का विश्व प्रीमियर 48वें गोटेबोर्ग फिल्म महोत्सव 2025 में उद्घाटन फिल्म के रूप में हुआ, जहाँ इसे ऑडियंस ड्रैगन पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ नॉर्डिक फिल्म) मिला।

सच्ची घटनाओं पर आधारित यह फिल्म मध्य अफ़्रीकी गणराज्य में 2013 के गृहयुद्ध के दौरान बांगुई के डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स अस्पताल में 15 घंटे तक चले तनावपूर्ण अनुभव पर आधारित है। सेफ़ हाउस एक रोमांचक और यथार्थवादी ड्रामा है, जो मानवता, साहस और देखभाल के नैतिक मूल्यों पर आधारित है।

 

हाना

पुरस्कार विजेता कोसोवो फिल्म निर्माता उजकन ह्यसाज की पहली फिल्म हाना का विश्व प्रीमियर 56वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव 2025 में होगा।

यह फिल्म एक ऐसी अभिनेत्री की कहानी है जो कोसोवो के एक महिला पुनर्वास केंद्र में कला चिकित्सा कार्यक्रम में भाग लेती है। वह युद्धग्रस्त महिलाओं को कला के माध्यम से अपना दुख व्यक्त करने में मदद करती है। लेकिन जब वह इन कहानियों को सुनती है, तो उसके अपने दबे हुए घाव और पहचान फिर से सामने आ जाते हैं।

हाना स्मृति, उपचार और कला की शक्ति के बारे में एक गहन भावनात्मक और विचारोत्तेजक फिल्म है, जो उन घावों को उजागर करती है जिन्हें इतिहास दफनाना चाहता है।

 

के पॉपर

ईरानी अभिनेता और पटकथा लेखक इब्राहिम अमिनी ने फिल्म के पॉपर से निर्देशन में पदार्पण किया। इस फिल्म का प्रीमियर टालिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल 2025 में हुआ।

फिल्म एक ईरानी किशोरी की कहानी है जो एक के-पॉप आइडल पर बेहद मोहित है। वह उसका शो देखने और एक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए सियोल जाने का फैसला करती है। उसकी माँ का कड़ा विरोध उनके रिश्ते में सपनों, डर और पीढ़ीगत मूल्यों के टकराव को जन्म देता है।

गर्मजोशी और संयमित तरीके से कही गई, के पॉपर युवा आकांक्षाओं, एकतरफा रिश्तों, माता-पिता की चिंताओं और हम जो चाहते हैं और जो हमें अनुमति है, उसके बीच बढ़ते अंतर का गहन अध्ययन है।

 

द प्रेसिडेंट्स केक (मूल शीर्षक – ममलकेत अल-क़साब)

इराकी लेखक, फिल्म निर्माता और शिक्षक हसन हादी “द प्रेसिडेंट्स केक” के साथ निर्देशन में पदार्पण कर रहे हैं। इस फिल्म का विश्व प्रीमियर 2025 के कान फिल्म समारोह के डायरेक्टर्स फ़ोर्टनाइट सेक्शन में हुआ था, जहाँ इसने इस सेक्शन का ऑडियंस अवार्ड और कैमरा डी’ओर जीता था। इसे 98वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए इराकी प्रविष्टि के रूप में चुना गया था।

1990 के दशक के इराक पर आधारित यह फिल्म 9 साल की लामिया की कहानी है, जिसे राष्ट्रपति के जन्मदिन का केक बनाने का काम सौंपा गया है। राजनीतिक अशांति के दौर में, जब लोग संयुक्त राष्ट्र के खाद्य प्रतिबंधों के तहत रोजमर्रा की जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वह इस जरूरी काम के लिए सामग्री जुटाने में संघर्ष करती है और अगर वह नाकाम रहती है तो उसे सजा भी भुगतनी पड़ सकती है।

भूख के बार-बार आने वाले भाव के जरिए, यह फिल्म युद्ध और राजनीतिक उथल-पुथल में फँसे बच्चों के असहाय होने और उनकी कमजोरी को उजागर करती है। आटे की तलाश से शुरू होने वाली इस फिल्म की कहानी, भोजन, सुरक्षा और बचपन के अधिकार से वंचित होने का एक भयावह रूपक बन जाती है।

 

द वेव (मूल शीर्षक – ला ओला)

चिली सिनेमा के अग्रणी फिल्म निर्माताओं में से एक, सेबेस्टियन लेलियो अपनी पहली संगीतमय ड्रामा फिल्म, “द वेव” लेकर आए हैं।

इस फिल्म का प्रीमियर कान फिल्म महोत्सव 2025 में होगा। 2018 के चिली नारीवादी विरोध और हड़तालों से प्रेरित, यह फिल्म एक विश्वविद्यालय की छात्रा जूलिया की कहानी है, जो एक उभरते आंदोलन के संदर्भ में हुए यौन उत्पीड़न की वास्तविकताओं से जूझती है।

लेलियो ने संगीतमय रूप और राजनीतिक तात्कालिकता का एक साहसिक मिश्रण प्रस्तुत किया है – जिसमें उन्होंने सामूहिक आक्रोश को एक करिशमाई सिनेमा में बदलने के लिए नृत्यकला, कोरस और शोधनात्मक प्रदर्शनों का उपयोग किया है।

 

याकुशिमास इल्यूजन (मूल शीर्षक – एल’इल्यूज़न डी याकुशिमा)

प्रशंसित जापानी लेखिका नाओमी कावासे ने इस अस्तित्ववादी नाटक के लिए लक्ज़मबर्ग-जर्मन अभिनेत्री विकी क्रिप्स के साथ मिलकर काम किया है, जिसका प्रीमियर लोकार्नो फिल्म फेस्टिवल 2025 में हुआ था, जहां इसे गोल्डन लेपर्ड के लिए नामांकित किया गया था।

जापान में एक फ्रांसीसी प्रत्यारोपण समन्वयक अपने लापता साथी की तलाश करते हुए एक लड़के की जान बचाने का काम करती है, जो देश के हजारों वार्षिक ‘जोहात्सु’ में से एक बन जाता है जो ऐसे लोग होते हैं जो बिना किसी निशान के गायब हो जाते हैं।

कावासे की विशिष्ट शैली में, यह फिल्म मृत्यु, परित्याग और मानव जीवन को बांधने वाले अदृश्य धागों पर गहन चिंतन के रूप में दर्शकों के सामने आती है।

 

तन्वी द ग्रेट

सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद, अभिनेता और निर्देशक अनुपम खेर की प्रशंसित निर्देशित फिल्म तन्वी द ग्रेट का इफ्फी में प्रीमियर हो रहा है।

ऑटिज्म से पीड़ित तन्वी रैना, अपने दिवंगत भारतीय सैनिक पिता के सियाचिन ग्लेशियर पर ध्वज को सलामी देने के सपने को साकार करती है। सैन्य सेवा में ऑटिज़्म से पीड़ित लोगों के सामने आने वाली बाधाओं के बावजूद, वह अपने मिशन को पूरा करने का संकल्प लेती है।

तन्वी के सफर के माध्यम से, फिल्म दिखाती है कि साहस, मजबूत दिल और दृढ़ संकल्प ही सच्चे नायकों की पहचान होते हैं।

 

व्हाइट स्नो

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता और पूर्व आईसीएफटी-यूनेस्को गांधी पदक विजेता प्रवीण मोरछले की नवीनतम फीचर फिल्म एक उर्दू भाषा के ड्रामा, “व्हाइट स्नो” से प्रेरित है। इस परियोजना को 21वें हांगकांग-एशिया फिल्म फाइनेंसिंग फोरम (एचएएफ) अनुदान के लिए भी चुना गया था।

एक युवा फिल्म निर्माता आमिर की फिल्म को एक पहाड़ी क्षेत्र के एक धार्मिक नेता ने पहली स्क्रीनिंग के बाद प्रतिबंधित कर दिया, सिर्फ़ इसलिए कि इसमें प्रसव के बाद रक्त स्राव दिखाया गया है – एक प्राकृतिक क्षण जिसे समाज के लिए विघटनकारी माना जाता है। कोई उम्मीद न देखकर, उनकी माँ फ़ातिमा, आमिर के कलात्मक सपने को पूरा करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर, एक याक पर एक छोटा सा टीवी और डीवीडी प्लेयर लेकर दूरदराज के गाँवों में जाती हैं।

यह फिल्म उत्पीड़न और पितृसत्तात्मक नियंत्रण की तीखी आलोचना करती है।

 

विमुक्त (अंग्रेजी शीर्षक – इन सर्च ऑफ द स्काई)

जितंक सिंह गुर्जर की संवेदनशील फीचर ड्रामा का प्रीमियर टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (टीआईएफएफ) में हुआ और इसने प्रतिष्ठित नेटपैक पुरस्कार जीता, जिससे एक समकालीन स्वतंत्र फिल्म निर्माता के रूप में उनकी सशक्त पहचान को और मजबूती मिली।

ब्रज भाषा की यह भारतीय फिल्म गरीबी से त्रस्त एक बुजुर्ग दंपति की कहानी है, जो अपने बौद्धिक रूप से दिव्यांग बेटे के इलाज की उम्मीद में महाकुंभ मेले की तीर्थयात्रा पर जाते हैं।

यह फिल्म आस्था, निराशा, मजबूती और दिव्यांगता से जुड़े सामाजिक भेदभाव जैसे विषयों को दर्शाती है।

इफ्फी 2025 में भारत और दुनिया भर से सात निर्देशकों की सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्में दिखाई जाएंगी

अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में बेहतरीन नई प्रतिभाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, 56वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव  (इफ्फी) 2025 में निर्देशक के बेस्ट डेब्यू फीचर फिल्म अवॉर्ड के लिए विशेष रूप से चुनी गई पांच अंतरराष्ट्रीय और दो भारतीय फ़िल्में दिखाई जाएंगी।

विजेता को प्रतिष्ठित सिल्वर पीकॉक, ₹10 लाख का नकद पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र मिलेगा।

सिनेमा के दिग्गजों की जानी-मानी जूरी विजेता का फैसला करेगी। जूरी की अध्यक्षता मशहूर भारतीय फिल्म निर्माता राकेश ओमप्रकाश मेहरा करेंगे। उनके साथ ग्रीम क्लिफर्ड (संपादक और निर्देशक, ऑस्ट्रेलिया), कैथरीना शटलर (एक्टर, जर्मनी), चंद्रन रत्नम (फिल्म निर्माता, श्रीलंका) और रेमी एडेफरासिन (सिनेमैटोग्राफर, इंग्लैंड) भी होंगे।

हर साल की तरह, इस वर्ष के फिल्मोत्सव में भी पहली बार फिल्म बनाने वाले फिल्म निर्माताओं के बेहतरीन काम को दिखाया जायेगा और दुनिया भर के अगली पीढ़ी के कहानीकारों के सिनेमैटिक विज़न को पेश किया जाएगा।

फ्रैंक

एस्टोनियाई फिल्म निर्माता टोनिस पिल इस मार्मिक कमिंग-ऑफ-एज ड्रामा के साथ फीचर फिल्म में डेब्यू कर रहे हैं। फिल्म का प्रीमियर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल फॉर चिल्ड्रन एंड यंग ऑडियंस – श्लिंगेल 2025 में हुआ, जहाँ इसे FIPRESCI जूरी पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों के लिए नामित किया गया था।

घरेलू हिंसा की क्रूर घटना के बाद, 13 वर्ष का पॉल अपनी जगह से उजड़ जाता है और खुद को नए शहर में पाता है। वहाँ अपनेपन की भावना की तलाश उसे गलत फैसलों की श्रृंखला में ले जाती है। जैसे ही उसका भविष्य बिगड़ने लगता है, एक सनकी, दिव्यांग अजनबी के साथ अप्रत्याशित रिश्ता उसके जीवन की दिशा बदल देता है।

यह फिल्म टूटे परिवारों, बचपन के ज़ख्मों के शांत दर्द और अप्रत्याशित दोस्ती की परिवर्तनकारी शक्ति को कोमलता से दिखाती है।

 

फ्यूरी (मूल नाम: ला फुरिया)

स्पैनिश फिल्ममेकर जेम्मा ब्लास्को की पावरफुल डेब्यू फीचर फिल्म फ्यूरी एक ब्रूटल ड्रामा है जो बोल्ड नई आवाज़ के आने का संकेत देती है। यह फिल्म SXSW फिल्म फेस्टिवल 2025 और सैन सेबेस्टियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2025 में प्रीमियर हुई।

अभिनेत्री एलेक्जेंड्रा ने फिल्म में मेडिया की भूमिका निभाई है। नए साल की शाम को रेप होने के बाद वह मेडिया के किरदार के ज़रिए अपने दर्द को बाहर निकालती है, जबकि उसका भाई एड्रियन उसे बचाने में नाकाम रहने के लिए शर्मिंदगी और गुस्से से जूझता है।

यह फिल्म महिलावादी नजरिए से  उस डर, शर्म, घृणा और गिल्ट की पड़ताल पेश करती है जिसका सामना हिंसक, पितृसत्तात्मक समाज में यौन शोषण से बचे लोगों को करना पड़ता है।

कार्ला

जर्मन फिल्ममेकर क्रिस्टीना टूर्नाट्ज़ेस का डेब्यू ड्रामा कार्ला का प्रीमियर म्यूनिख फिल्म फेस्टिवल में हुआ, जहाँ इसने बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट स्क्रीनराइटर के दोअवॉर्ड जीते।

1962 में म्यूनिख में सेट, यह फिल्म 12 वर्ष की कार्ला की सच्ची कहानी बताती है, जो वर्षों के दुर्व्यवहार से सुरक्षा पाने के लिए अपने पिता के खिलाफ केस दर्ज कराती है।

बहुत ज़्यादा संवेदनशीलता और एटमॉस्फेरिक सिनेमैटोग्राफी के साथ बनाई गई, यह फिल्म बच्चे की अपनी ही ज़ुबान में बताई गई कहानी का सशक्त वर्णन है। कार्ला के साथ, टूर्नाट्ज़ेस एक ऐसी सिनेमैटिक भाषा बनाती हैं जो अनकही बातों को कहने में सक्षम है – जो कोमलता, स्पष्टता और ज़बरदस्त सुरक्षा से बनी है।

माई  डॉटर्स हेयर (ओरिजिनल टाइटल – राहा)

ईरानी निर्देशक हेसाम फराहमंद अपनी मशहूर लघु फिल्मों और डॉक्यूमेंट्रीज़ के बाद राहा के साथ एक ज़बरदस्त सोशल ड्रामा लेकर आए हैं।

फिल्म तोहिद पर आधारित है, जो अपने परिवार के लिए थोड़ी खुशी लाने के लिए अपनी छोटी बेटी के बाल बेचकर सेकंड हैंड लैपटॉप खरीदता है। लेकिन जब एक अमीर परिवार लैपटॉप की ओनरशिप पर सवाल उठाता है, तो झगड़ों की एक चेन गहरे क्लास डिवीज़न को सामने लाती है।

असल ज़िंदगी की सच्चाइयों से प्रेरित होकर, फराहमंद एक ऐसी दुनिया बनाते हैं जहाँ नैतिकता धुंधली हो जाती है और न्याय कमज़ोर होता है। बिना किसी लाग-लपेट के ऑब्ज़र्वेशन के साथ, राहा गरिमा, संघर्ष और ज़िंदा रहने की खामोश कीमत के बारे में सार्वभौमिक कहानी बन जाती है।

 

 

द  डेविल स्मोक्स (एंड सेव्स द बर्न्ट मैचेस इन द सेम बॉक्स)

(ओरिजिनल टाइटल – एल डियाब्लो फुमा (वाई गार्डस लास कैबेज़ास डे लॉस सेरिलोस क्वेमाडोस एन ला मिस्मा काजा))

मैक्सिकन फिल्ममेकर अर्नेस्टो मार्टिनेज़ बूसियो की विशेष पहली फीचर फिल्म ने बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2025 में पहला पर्सपेक्टिव्स कॉम्पिटिशन जीता।

यह पाँच भाई-बहनों की कहानी है जिन्हें उनके माता-पिता छोड़कर चले जाते हैं और वे खुद ही अपना ख्याल रखते हैं। जैसे-जैसे वे अकेलेपन से गुज़रते हैं, वे अपनी चिंताओं को अपनी सिज़ोफ्रेनिक दादी के अस्थिर दिमाग के ज़रिए दिखाते हैं, और एक-दूसरे का साथ बनाए रखने की लड़ाई में कल्पना और हकीकत के बीच की लाइन को धुंधला कर देते हैं।

एलिप्टिकल नैरेटिव के ज़रिए बनाई गई यह फिल्म बचपन के डर और इंस्टिंक्ट्स के बारे में तीखी, परेशान करने वाली बातें बताती है। यह जानी-पहचानी “होम अलोन” कहानी को डर, कल्पना और ज़िंदा रहने की परत दर परत मनोवैज्ञानिक खोज में बदल देती है।

शेप ऑफ़ मोमो

भारतीय  फिल्म निर्माता त्रिबेनी राय की पहली फीचर फिल्म शेप ऑफ़ मोमो ने शानदार फेस्टिवल जर्नी के बाद डेब्यू कॉम्पिटिशन में अच्छी एंट्री की है। यह कान 2025 में “HAF गोज़ टू कान” शोकेस के लिए पांच एशियन वर्क्स-इन-प्रोग्रेस में से एक के तौर पर चुनी गई थी। इस फिल्म का प्रीमियर बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ और सैन सेबेस्टियन में भी दिखाई गई, जहाँ इसे न्यू डायरेक्टर्स अवॉर्ड के लिए नामित किया गया था।

सिक्किम में सेट और नेपाली में फिल्माई गई, यह कहानी बिष्णु के बारे में है। वह अपने कई पीढ़ियों वाले महिलाओं के घर लौटती है, जो अब सुस्ती में डूबा हुआ है। खुद के लिए और उनके लिए आज़ादी वापस पाने के लिए दृढ़, वह पितृसत्ता द्वारा बनाए गए रूटीन को तोड़ती है। हर उस महिला को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है कि वह विरासत में मिली सीमाओं को स्वीकार करे या उनका विरोध करे।

शेप ऑफ़ मोमो परंपरा, आज़ादी और परिवारों के अंदर पैदा होने वाली शांत क्रांतियों पर भावपूर्ण विचार है।

आता थांबायचा नाय! (इंग्लिश टाइटल – नाउ,  देयर इज नो शॉपिंग!)

एक्टर शिवराज वायचल की यह पहली फीचर फिल्म है। यह मराठी भाषा का ड्रामा है जो मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के क्लास IV सफाई  कर्मियों के एक समूह की सच्ची कहानी पर आधारित है। ये लोग एक समर्पित अधिकारी से प्रेरित होकर अपनी 10वीं कक्षा की परीक्षा पूरी करने के लिए स्कूल वापस जाने का फैसला करते हैं।

हास्य और भावनाओं का मेल यह फिल्म हिम्मत, काम की गरिमा और शिक्षा की बदलने वाली ताकत का सम्मान करती है – यह साबित करती है कि सीखने, सपने देखने या फिर से शुरू करने में कभी देर नहीं होती।

प्रश्न पूछता और उत्तर देता रोचक, शिक्षाप्रद बाल उपन्यास-कहानी वाला शंख

बाल साहित्य के उत्थान के लिए निरंतर प्रयत्नशील, अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित, साहित्य की हर विधा में पारंगत प्रतिष्ठित वरिष्ठ  साहित्यकार विमला जी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। आपके बाल तथा प्रौढ़ साहित्य पर लगभग 45 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। कई पुस्तकों का अंग्रेजी,असमिया,पंजाबी, गढ़वाली तथा उड़िया भाषा में अनुवाद हो चुका है। उनकी कुछ बाल कहानियाँ पाठय पुस्तकों में शामिल हैं। उनकी सहज़, सरल भाषा में लिखी कथोपकथन शैली न केवल बच्चों को वरन बड़ों का भी मन मोह लेती है।

प्रसिद्ध बाल साहित्यकार विमला भंडारी जी का ‘कहानी वाला शंख’ उपन्यास पढ़ते हुए मुझे अनायास विक्रम बैताल की कहानियाँ याद आ गईं। जिस तरह हर कहानी के अंत में बैताल, विक्रम से प्रश्न पूछता है तथा उचित उत्तर पाकर पुनः पेड़ पर जाकर बैठ जाता है ठीक उसी तरह विमला जी के इस बाल उपन्यास  ‘कहानी वाला शंख’ में शंख, चाचा जमालुद्दीन को कहानी सुनाकर उनसे प्रश्न पूछता है तथा ठीक होने पर एक महीने पश्चात् पुनः आने के लिए कहता है। इस संग्रह में 14 कहानियाँ हैं जो बच्चों को हिन्दी पंचांग के महीनों, उन महीनों के मौसम के बारे में जानकारी भी देती हैं।

बच्चों के नाम कहानी सुनाने वाले शंख की ओर से पैगाम में विमला जी कहती हैं –
इस पुस्तक के पन्नों में छिपे हैं
हंसी और रहस्य के पल
सोचने और समझने की बातें
और सबसे जरूरी-तुम्हारे दिल से जुड़े सवाल।

‘चाचा जमालुद्दीन कलई वाला’ में वह चाचा जमालुद्दीन उनके शंख के साथ उनके व्यवसाय बर्तनों पर कलई चढ़ाने के काम के साथ, यह भी बताती हैं कि पुराने समय में हर घर में पीतल के बर्तन हुआ करते थे। उन पर कलई करवाने पर वे बर्तन चांदी जैसे चमकने लगते थे।

‘जंगल, प्यास और  शंख की कहानी’ में लेखिका शंख से उनके मिलने तथा हर महीने उससे 12 महीनों में 12 कहानी सुनाने के जाल में फंसने की बात बताते हुए शंख के द्वारा पहली आषाढ़ मास की कहानी ‘जिम्मी और बन्दर’ चाचा जमालुद्दीन   सुनवाती हैं।

जिम्मी के बारे में वह कहती हैं उसे शॉर्टकट से जाना अच्छा लगता था। रास्ते की बाधाएं उसके लिए खेल और रोमांच जैसी थीं। एक दिन उसके मार्ग में बन्दर आ गया। जिम्मी उससे डर कर भागी या साहस से समस्या का समाधान किया। वास्तविकता और धोखे में क्या अंतर है? शंख के इस प्रश्न का चाचा जमालुद्दीन द्वारा दिए उत्तर को जानने के लिए, इस रोचक कहानी को पढ़ना ही चाहिए।

श्रावण मास की दूसरी कहानी है ‘टोनी की बरसाती छुट्टी’  -शहर का नाम छपछपपुर। नाम से ही समझ लो, वहां बारिश ऐसे गिरती थी जैसे बादलों में टपकने की होड़ लगी हो। नालियाँ इतनी चतुर थीं कि बारिश के साथ रेस लगाती थीं, जहाँ गड्ढा मिला वहीं अपना झरना खोल देती थीं।-पेज 18
गोलू और उसके बैग टोनी के माध्यम से बारिश से बचने के लिए के लिए रैनकोट के महत्व को लेखिका ने बच्चों को बताया है।

भाद्रपद मास की कहानी ‘तेजा की यात्रा’ के द्वारा नागौर जिले के खरनाल में स्थित लोकदेवता तेजा जी, के दर्शन को जाते जत्थे के बारे में बताते हुए विमला जी बच्चों को समझाती हैं कि साहस और समझ से इंसान बाधाओं को पार कर सकता है। इसके साथ ही यह उल्लेख भी किया है कि भाद्रपद मास में बिलों में पानी भर जाने के कारण सांप अधिक निकलते हैं अतः सतर्क रहना आवश्यक है।

आश्विन मास की कहानी ‘झूले वाली टहनी’ के द्वारा बरसात, झूला तथा सावधानी की बात बताते हुए विमला जी कहानी के माध्यम से बच्चों को बताती  हैं कि असली बहादुर वही होता है जो बड़ों की सलाह मानते हुए, मजा लेते हुए समझदारी से खेले। वे आषाढ़ श्रावण, भाद्रपद, अश्विन को बरसात के चार महीने बताते हुए उनसे जुड़ी कहानी कहती हैं।

कार्तिक मास की कहानी दीपावली, गधा, बाइक नाटक और मंच के द्वारा लेखिका बाइक के आने पर गधे की व्यथा उकेरती हुई कहती है – अक्सर ऐसा होता है कि कभी -कभी इंसान रिश्तों को पुराने जूते की तरह समझ लेता है, ज़ब तक जरूरत हो पहनो, फिर कोने में ऱख दो।  लेकिन असली रिश्ता वही होता है जो जरूरत के बिना भी साथ चले। पेज- 36
यह कहानी सीख देती है कि कुछ रिश्ते पहियों से नहीं, भरोसे से चलते हैं।

मार्गशीर्ष मास की कहानी ‘अँधेरे में बुद्धि की रोशनी’ की शुरुआत करते हुए वह कहती हैं -मार्गशीर्ष आते ही गुलाबी सर्दी प्रारम्भ हो गई थी। रातें लम्बी और दिन छोटे होने लगे थे। इस कहानी में तीव्र बुद्धि और जिज्ञासु स्वभाव वाले बीदा ने ज़ब बेधशाला के उपकरणों का अपनी तीव्र बुद्धि से पता लगा लिया तो शंख ने चाचा जमालुद्दीन से पूछा-”चाचा जमालुद्दीन क्या कभी डर के अँधेरे में सोचने की शक्ति भी खो जाती है? तब हम बुद्धि की रौशनी कैसे जलाएं?”
“हे शंख डर एक धुंध है, जो हमारे भीतर के रास्तों को ढँक देती है। लेकिन ज़ब सवाल दिल में हो, तो दिमाग़ जवाब ढूंढना नहीं छोड़ता। डर से लड़ने का सबसे आसान तरीका है -एक छोटा सा कदम सही दिशा में, जैसे बीदा ने उठाया था। बस पहला कदम उठाओ, अंधेरा खुद पीछे हट जाता है। बुद्धि की रोशनी भीतर से निकलती है, ज़ब तुम उसे बंद नहीं करते।” पेज -41

पौष माह की ठिठुराने वाली सर्दी के बारे में बताते हुए ‘चिड़िया के चार प्रश्न’ पलायन करते लोगों के छूटे घर, उनकी यादें पर लिखी बेहद मार्मिक अनेकों प्रश्नों से मनमस्तिष्क को मथती कहानी है। इस कहानी में शंख चाचा जमालुद्दीन से पूछता है – “चाचा जमालुद्दीन!ज़ब कोई गाँव चुप हो जाये, तहखाने में यादें बंद हो जाएं, बच्चे मोबाइल में खो जाएं तब क्या वक्त सच में पीछे नहीं लौट सकता? क्या चिड़िया के बीज कभी अंकुर बन पाएंगे?”
“सुनो शंख वक्त कभी पीछे नहीं लौटता लेकिन इंसान लौट सकता है। चिड़िया ने जो बीज बोए, वे बीज समय के नहीं समझदारी के हैं। जब कोई बच्चा उन बीजों को सींचेगा किसी संदूक को फिर से खोलेगा किसी वायलन को नया तार देगा, किसी हवेली को फिर से घर बनाएगा तब गांव जगेगा। तहखाना रोशनी से भर जाएगा और बूढ़े पीपल की जड़ें मुस्कुराएंगी।”
वे फिर बोले, “हम सबके भीतर एक छोटा  तहखाना होता है उसमें कहानियाँ है, रिश्ते हैं, मिट्टी की गंध है। अगर हम उसे रोज थोड़ा-थोड़ा खोले तो गांव कभी नहीं मरेगा… गांव कभी नहीं मरता वह सिर्फ इंतजार करता है।”पेज -45
रिश्तों में आती संवेदनहीनता को बताती बेहद मर्मस्पर्शी कहानी है। बच्चे बड़े अगर इस इस कहानी में दिए प्रश्नों के साथ उत्तर को आत्मसात कर लें तो जीवन में  अवश्य सुधार आएगा।

माघ मास की सर्दी की धुंधली सुबह, देश की सीमाओं के निकट पहाड़ी पर बना गाँव। “कोई भी दरवाजा अगर एक ओर बंद हो तो दूसरी ओर खुल भी सकता है।” कहकर आतंकी को इंसान बनने की प्रेरणा देती नन्हीं अनन्या। अगर किसी में पछतावा और स्वयं को बदलने की इच्छा है तो अपराधी अपराध छोड़, नई जिंदगी की ओर अग्रसर हो सकता है। अच्छी कहानी।

फाल्गुन मास का वर्णन करते हुए मौसम में आते परिवर्तन के बारे ‘गोलू कि बातें’ कहानी के द्वारा लेखिका बच्चों को बताती हैं -सर्दी में ठिठुरे पेड़ों के पत्ते झड़कर टूट चुके थे। बदले मौसम की दस्तक के साथ नंगे खड़े पेड़ों से नन्हीं कोपलें फूटने लगी थी, नये वस्त्र पहनने के लिए, उन्हें फाल्गुन मास का तथा बसंत ऋतु का स्वागत जो करना था।
इस ऋतु के बारे में लेखिका ग्रेसी बिल्ली मम्मी और उसके नन्हें बच्चे गोलू के द्वारा सपनों की सैर, धूप, तितली, फूल के बारे में बताती हुई यह शिक्षा देती हैं कि दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह माँ की गोद होती है।

चैत्र मास की कहानी ‘अन्वी और बोलता हुआ रिबन’ कहानी का प्रारम्भ लेखिका यह कहकर करती हैं कि प्रकृति अपना उत्सव चैत्र मास के महीने में मनाती है क्योंकि यह मास हिन्दी कैलेंडर का नव वर्ष है। ‘अन्वी और बोलते रिबन’ कहानी द्वारा बच्चों को सन्देश देती हैं कि स्वयं को श्रेष्ठ मानने की भावना को त्याग कर ही हम अच्छे इंसान बन सकते हैं।

बैशाख मास में मौसम खुशनुमा रहता है तो वहीं परीक्षा के परिणाम का भी। ‘शाबास पल्ल्वी’ कहानी में पल्लवी के मन में बोर्ड की  परीक्षा में टॉप करने के कारण श्रेष्ठता का बोध आ गया था। ऐसा क्या हुआ जिससे उसकी आंखों पर पड़ी पट्टी हट गई। चाचा जमालुद्दीन ने शंख के प्रश्न पर कहा, जो कहानी का सार हैं -अगर किसी की आँखों में श्रेष्ठता के बोध के कारण मैं से हटकर हम दिखाई देने लग जाये तब वह सच्चा टॉपर बन जाता है।

जेठ माह की कहानी ‘साइकिल की आत्मकथा’ में लेखिका कहती हैं कि तपती दोपहरी लेकर आता है जेठ मास। धूप और भीषण गर्मी इतनी कि छाया भी पनाह मांगती है।चाचा जमालुद्दीन की शंख के पास जाने की अंतिम यात्रा थी इसलिए उन्होंने नदी का जल लाने के लिए कमण्डल भी साथ ले लिया था। साइकिल की आत्मकथा के द्वारा जहाँ विदुषी लेखिका ने साइकिल के बारे में जानकारी दी है वहीं वह यह सन्देश देना चाहती हैं कि साइकिल की  तरह जिंदगी भी सदा चलती जाती है। शंख ने शायद इसीलिए चाचा जमालुद्दीन को अपना साथी बना लिया तथा स्वयं को उसे सौंपते हुए कहा कि ज़ब भी तुम इसे बजाओगे यह कहानी सुनाएगा।

पुस्तक का अंतिम वाक्य -इस तरह कहानी वाला शंख एक गांव से दूसरे गाँव, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, कहानियों की ज्योत जलाता चला गया। यह इंसानी जीवन का एक शाश्वत कथन है जो कहानियों के माध्यम से अपनी सभ्यता, संस्कृति को आने वाली पीढ़ी में हस्ताँतरित करता है।

सुभद्रा पब्लिशर्स एन्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 68 पेज वाला 225 रुपये वाला खूबसूरत चित्रों से सजा ‘कहानी वाला शंख’ बाल उपन्यास बच्चों के मन को अवश्य भायेगा। विमला जी उनके  बालोपयोगी बाल कहानी संग्रह के लिए एक बार पुनः बधाई।

समीक्षक
सुधा आदेश
बेंगलुरु ( कर्नाटक )

मेरे बाल-जीवन की प्रेरणा है श्री अच्युत सामंत का आर्ट ऑफ गिविंग

मैं अपनी जानकारी से यह गर्व के साथ कह सकता हूं कि भुवनेश्वर कीट-कीस-कीम्स के संस्थापक महान् शिक्षाविद् प्रोफेसर अच्युत सामंत का वास्तविक जीवन-दर्शनःआर्ट ऑफ गिविंगः मेरे बाल-जीवन की सच्ची प्रेरणा हैं।मैं यह भी मानता हूं कि प्रोफेसर अच्युत सामंतजी का आर्ट ऑफ गिविंग जीवन-दर्शन भारत के समस्त युवा समाज में शांति,खुशी और सद्भाव फैलाने, मानवीय संबंधों को मजबूत करने, सभी से प्यार करने में और जरूरतमंदों की मदद करने के लिए बहुत जरुरी जीवन-दर्शन है।

मित्रों,यह जानकर मुझे खुशी हुई कि 17 मई, 2013 को अच्युत सामंत सर ने आत्मज्ञान प्राप्त कर इसे अपनाया।आर्ट ऑफ गिविंग जीवन-दर्शन को जाति, भाषा,सम्प्रदाय, लिंग, धर्म, जन्म स्थान आदि की बाधाओं के बिना सभी को अपनाना चाहिए।मैं इससे पूरी तरह से प्रभावित हूं। मेरी समझ से यह एक सामाजिक आंदोलन  है जिसके माध्यम से प्रेम, सद्भाव, भाईचारा, एकता और सौहार्द पूरे बाल-समुदाय में विकसित होगा। मेरा यह भी मानना है कि प्रोफेसर अच्युत सामंत जी के इस ऑर्ट ऑफ गिविंग जीवन-दर्शन को अगर देश के सभी स्कूली बच्चे अगर ईमानदारी से अपना लेंगे तो सम्पूर्ण भारतवर्ष में एकता,शांति,मैत्री,प्रेम और भाईचारे का पावन संदेश जाएगा और यह जीवन-दर्शन भारत को विकासशील से विकसित राष्ट्र बनाने में सहायक सिद्ध होगा।

-कृष्णा तिवारी.के.वि.-1,यूनिट-9,भुवनेश्वर

…आखिर हम क्यों न गर्व करें वंदे मातरम् पर

वंदे मातरम् की एक और अद्वितीयता है। यह राष्ट्रीयता की पहचान सुमधुरभाषिणीं की शब्दावली में करता है। दुनिया का कोई भी अन्य राष्ट्रगीत या गान किसी भाषिक या वाचिक माधुर्य या भद्रता या सुकोमलता का उल्लेख अपने देश या देशवासियों के संदर्भ में नहीं करता।

सेनेगल का राष्ट्रीय गान स्पष्ट रूप से अपने देश/लोगों को गरजते हुए (roaring) बताता है। यह गान “Le Lion rouge” (लाल शेर) के नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें यह पंक्ति है: Le lion rouge a rugi (लाल शेर ने गरज दिया है)।यहाँ “लाल शेर” सेनेगल का राष्ट्रीय प्रतीक है, जो देश की ताकत, जागृति और एकता का प्रतीक है। गान में आगे कहा गया है: “पूरी सेना एक साथ उठ खड़ी हुई है” – यानी शेर की गरज पर पूरे देश ने एक स्वर में जवाब दिया।यह दुनिया का एकमात्र राष्ट्रीय गान है जिसमें स्पष्ट रूप से “रोरिंग/गरजना” का उल्लेख है।दूसरे गानों में थोड़ा-बहुत मिलता-जुलता है, लेकिन सीधे नहीं। फ्रांस का ला मार्सेयेज: “मुगीर से फेरोस सोल्दा” में दुश्मन सैनिकों के गरजने की बात है,अपने लोगों की नहीं। Entendez-vous dans les campagnes, mugir ces féroces soldats?”(क्या तुम सुनते हो मैदानों में उन क्रूर सैनिकों के गरजने/बेलोइंग की आवाज़?)। Mugir” का मतलब जानवर की तरह गहरी गरज या bellow/roar है – दुश्मन सैनिकों की।
अमेरिका का राष्ट्रीय गान (The Star-Spangled Banner) “The rockets’ red glare, the bombs bursting in air”(रॉकेट की लाल चमक, हवाई में बम फटने की आवाज़) जैसी युद्ध की ध्वनियों (explosions, bursting bombs) को देश की आज़ादी की गवाही के रूप में चित्रित करता है। और तब से उसके राकेटों की लाल चमक और बम अन्य देशों की राष्ट्रीय संप्रभुताएँ देख ही रहीं हैं। पाकिस्तान जैसे कुछ देशों ने तो अपने ही देश के कुछ हिस्सों में अपने ही अस्सी हजार नागरिकों को ऐसी बमबारी से मरवाने की बेशर्मी की वृत्ति ही बना ली है।
भूटान वैसे तो सबसे शांतिप्रिय देश है किन्तु उसके राष्ट्रीय गान (Druk Tsendhen – The Thunder Dragon Kingdom) का नाम ही “थंडर ड्रैगन किंगडम” है, जिसमें गरजते ड्रैगन (thunderous dragon) का प्रतीक है जो देश की ताकत और खुशी लाता है। गान में “thunder” की ध्वनि सीधे जुड़ी है।
अल्जीरिया के राष्ट्रीय गान (Qasaman) में कहा गया है We have taken the drum of gunpowder as our rhythm / And the sound of machine guns as our melody” कि बारूद के ड्रम को हमने ताल बनाया, मशीनगनों की आवाज़ को संगीत। इसमें युद्ध की ध्वनियाँ (gunfire, drums of war) स्वतंत्रता की धुन बतायी गयी है।
इटली के राष्ट्रीय गान (Il Canto degli Italiani) में “thunderous chorus” और युद्ध की ध्वनियाँ जैसे cannons thunder का उल्लेख है जिसमें एकता की गरज पैदा करना आशयित है।
लेकिन सुमधुरभाषिणीं जैसी बात कहीं नहीं है। सिर्फ मधुरभाषिणीं से बंकिम के कवि की तृप्ति नहीं हो रही थी तब उन्होंने ‘सु’ उपसर्ग लगाना और आवश्यक समझा।
अधिकतर राष्ट्रवाद कर्कश हो जाता है, पर भारत के वंदे मातरम् का प्रथमादर्श जेंटल और सॉफ्ट स्पोकन होने का है। राष्ट्रवाद का स्वर आक्रामक ही हो, यह आवश्यक नहीं। राष्ट्रवाद वह जिसमें अपने देश के प्रति प्रेम हो, न कि दूसरे देशों के प्रति घृणा हो। वह बात अलग है कि जब दूसरे देश जन्मे ही एक बद्धमूल घृणा के साथ हों और उनका प्रतिकार हमारा राष्ट्रप्रेम बन जाता हो।
मधुरता हमारा वैदिक आदर्श रहा है। हमारे देश की हवाओं और नदियों में वही मधुरता श्रेय और प्रेय रही है।
ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 90 से ली गयीं ऋचाएँ याद करें : मधु वाता ऋतायते मधुं क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता॥ वायुदेव मधु प्रदान करते हैं; तरंगमय जलप्रवाह जिनमें होता है उन नदियों से मधु रिसता है; संसार में उपलब्ध विविध ओषधियां हमारे लिए मधुमय हों । रात्रि हमारे लिए मधुप्रदाता होवे; और उसी प्रकार उषाकाल भी मधुप्रद हो; पृथ्वी से धारण किया गया यह लोक मधुमय हो; जलवृष्टि द्वारा हमारा पालन करने वाला द्युलोक माधुर्य लिए होवे ।
और देखिये कि जिन नदियों से मधु रिसता था, उनमें औद्योगिक effluents मिलाकर हमने कितना विषैला बना दिया। और देखिये कि मधु प्रदान करने वाली वायु को दिल्ली पंजाब आदि स्थानों में हमने कितना जहरीला कर दिया है।
यही मधुरता हमारी वाणी में हो। ऐसी बानी बोलिये मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपुही शीतल होय।’ यह तथाकथित जनवादी कबीर कहते थे और ‘तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहुं ओर। वशीकरण एक मंत्र है, तज दे वचन कठोर’ यह पंडित होने के कारण आधुनिक प्रताड़ना के शिकार तुलसी भी कहते थे। और तुलसी के मित्र कवि रहीम भी यही बताते थे : कागा काको धन हरे, कोयल काको देय। मीठे वचन सुनाय कर, जग वश में कर लेय।
पर जब हम आज देखते हैं कि हमारे सोशल मीडिया पर गालियों का मवाद बहता रहता है, जब हम देखते हैं कि माँ बहन की गालियाँ देना बॉलीवुड और ओटीटी से लाई जा रही अपसंस्कृति में एक नया ‘कूल’ बन गया है तब क्या हम ‘सुमधुरभाषिणीं’ के आदर्श वाले राष्ट्रगान के प्रति अपना दायित्व निभा रहे हैं?
जब हम देखते हैं कि एक समुदाय दूसरे समुदाय को भर भर के गालियाँ देता है तब क्या हमें लगता है कि हम अपनी सुमधुरभाषिणीं भारत माता से कितनी दूर चले आये हैं?
जब सार्वजनिक मंचों से किसी नेता की कर्कशता का डेसीबेल लीवल और से और ऊपर होता चला जाता है तब क्या उसे इस सुमधुरभाषिणीं का ध्यान आता है?
बंकिम ‘प्रियं ब्रूयाद्’ की संस्कृति से अपने देश की पहचान को जोड़ते थे।  विज्ञापन और वायदों से भ्रष्ट हुई भाषा के दौर में ‘सुमधुरभाषिणीं’ का आदर्श एक यूटोपिया लगता है।
पर उसे व्यवहृत करना इतना असंभव भी नहीं है। कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
(लेखक मप्र के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में मप्र के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं) 

हिंदी को कोई खतरा नहीं

पुणे। बार-बार हिंदी के खतरे की बात हो रही है लेकिन हिंदी को किसी से किसी तरह का कोई खतरा नहीं है। जब हम भारत में होते हैं तब आपसी संपर्क की भाषा हिंदी होती ही है क्योंकि देश के सात-आठ प्रदेशों की भाषा हिंदी है। लेकिन जब हम विदेश जाते हैं तो हमारी प्रांतीय पहचान से भी ऊपर हो जाती है, एक भारतीय के रूप में हमारी पहचान। विदेश की धरती पर हर भारतीय एक-दूसरे से हिंदी की वजह से ही जुड़ता है। ऐसा कहते हुए महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक निर्मिति व पाठ्यक्रम संशोधन मंडल पुणे की विशेषाधिकारी हिंदी तथा समन्वयक विद्या विभाग अलका पोतदार ने हिंदीतर प्रदेशों के युवाओं के लिए आयोजित ऑनलाइन हिंदी प्रतियोगिता की सराहना की।

रविवार को शुक्रवार पेठ स्थित महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्यालय में हिंदीतर भाषी युवाओं हेतु राजभाषा हिंदी के उपलक्ष्य में आयोजित ऑनलाइन प्रतियोगिता के विजेताओं/प्रतिभागियों का अभिनंदन समारोह हुआ। इस अवसर पर अध्यक्षता करते हुए पोतदार ने पहली से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए प्रदेश सरकार द्वारा बनने वाली किताबों की जानकारी देते हुए बताया कि पाठ्यक्रमों के संशोधन एवं निर्माण का कार्य यहाँ होता है। उपस्थित विद्यार्थियों ने जाना कि अपने स्कूली पाठ्यक्रम में वे भाषा की जिन किताबों को बालभारती के नाम से जानते हैं उसके निर्माण का कार्य यह संस्था करती है। दरअसल देश भर में राजभाषा विभाग की स्वर्ण जयंती मनाई जा रही है। इस उपलक्ष्य में हिंदी दिवस 2025 के औचित्य को साधते हुए हिंदीतर भाषी क्षेत्र के युवाओं के लिए वैश्विक हिंदी परिवार (महाराष्ट्र) की ओर से राज्य स्तरीय निःशुल्क हिंदी प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था।

वैश्विक हिंदी परिवार 70 से अधिक देशों के हिंदी से जुड़े विचारकों, साहित्यकारों तथा भाषाकर्मियों का समूह है। यह आयोजन ‘केंद्रीय हिंदी संस्थान’ ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’, ‘भारतीय भाषा मंच’ के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार का था। जिसमें 18 से 25 वर्ष की आयु के युवाओं ने भाग लिया था। पूरे देश के हिंदीतर प्रदेशों से प्रतियोगिता में 5097 विद्यार्थियों ने भाग लिया था, जिसमें महाराष्ट्र के 910 विद्यार्थियों ने प्रतिभागिता की। भारत आयात-निर्यात (इंडिया एक्जिम) बैंक, मुंबई के सहयोग से महाराष्ट्र के प्रथम, द्वितीय, तृतीय स्थान पर आए 23 विद्यार्थियों का सम्मान हुआ जिनमें से नागपुर के छोड़कर शेष सभी को पुणे में पुरस्कृत किया गया। मुंबई से नवेंदु कुमार का इसमें सहयोग रहा। नागपुर की दूरी अधिक होने से उसके लिए अलग आयोजन का नियोजन है। विजेता विद्यार्थियों में पुणे के 7 विद्यार्थी थे। पुणे के प्रतिभागी विद्यार्थियों का भी प्रमाणपत्र देकर अभिनंदन किया गया।

वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष अनिल जोशी की परिकल्पना से प्रतियोगिता का मुख्य उद्देश्य हिंदीतर भाषी क्षेत्र के युवाओं में भारत और हिंदी के रिश्ते को और मज़बूत बनाना तथा राष्ट्रीय समन्वय और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना था। प्रतियोगिता ने युवाओं के सामान्य ज्ञान संवर्धन, भाषायी ज्ञान और देश के बारे में उनकी जानकारी को बढ़ाने में महत्वपूर्व भूमिका निभाई। इसमें हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं से संबंधित तथा भारतीय अस्मिता, सांस्कृतिक परिवेश, सामाजिक सौहार्द्र, कला, साहित्य, प्रादेशिक मूल्यों से जुड़े प्रश्न थे। सभी छात्रों को प्रमाण पत्र के साथ पहले स्थान पर रहे 5 विद्यार्थियों को 2500 रुपए, द्वितीय स्थान पर रहे 6 विद्यार्थियों को 1500 रुपए तथा तृतीय स्थान पर रहे 12 विद्यार्थियों को 1000 रुपए के पुरस्कार दिए गए।

प्रांत संयोजक स्वरांगी साने (पुणे) थीं। सह संयोजक मुंबई से डॉ. रवींद्र कात्यायन थे। प्रतियोगिता को नियोजित करने से लेकर आयोजन तक में समिति के कार्याध्यक्ष डॉ. सुनील देवधर ने महती भूमिका निभाई। मुंबई से डॉ. रमेश यादव, नागपुर से गंगाधर वानोडे ने सहयोग दिया। प्राध्यापकों की टीम में पुणे से डॉ.गोरख थोरात, डॉ. संतोष धोत्रे, डॉ. प्रेरणा उबाले ने साथ दिया। छात्र संयोजक शुभम घोलप, राहुल ससाणे, अर्थव सोनार थे। डॉ. निर्मला राजपूत और भावना गुप्ता ने कार्यक्रम को अमली जामा पहनाया।

पुरस्कार प्रदान समारोह के मुख्य अतिथि राष्ट्र भाषा प्रचार समिति के संचालक 95 वर्षीय हिंदी सेवी जयराम फगरे थे। उन्होंने बीते कल की बात करते हुए आने वाले कल के प्रति उम्मीद जताई। उन्होंने कहा कि जब इतने युवा हिंदी की सेवा के लिए आ रहे हैं तो हिंदी को लेकर आशंकित होने की कोई आवश्यकता नहीं। मुंबई से आए विशेष अतिथि डॉ. रमेश यादव ने वैश्विक हिंदी परिवार की स्थापना से अब तक की यात्रा की जानकारी देते हुए युवाओं को हिंदी से जुड़े रहने के लिए प्रेरित किया। विशिष्ट अतिथि डॉ. सुनील देवधर तथा बंडोपंत पाटिल ने विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया। शहर के जानेमाने साहित्यकार सुमित पॉल, ग़ज़लगो प्रदीप निफाडकर सहित कई गणमान्य अतिथि इस अवसर पर उपस्थित थे।

पहले सत्र में विजेता विद्यार्थियों का सम्मान किया गया। शत प्रतिशत अंक पाने वाली कांचन शेलके (मॉर्डन कॉलेज पुणे) , समृद्धि भालवणकर (डेक्कन कॉलेज पुणे) तथा सानिया मुल्ला (मास्टर दीनानाथ मंगेशकर कॉलेज, लातूर) को 2500 रुपए नकद पुरस्कार, प्रमाण पत्र तथा स्मृति चिह्न दिया गया। महावीर कॉलेज कोल्हापुर की निधि कोरे ने भी शत प्रतिशत अंक पाए जिन्हें ऑनलाइन राशि स्थानांतरित की जाएगी। नागपुर के जी एस कॉलेज के जय भरणे को शीघ्र ही नागपुर में होने वाले कार्यक्रम में सम्मानित किया जाएगा।

द्वितीय स्थान पर रही अंजली पाटिल (एसपी कॉलेज, पुणे),  संस्कृति महाले (मॉर्डन कॉलेज, पुणे) तथा यासीन राशिद (एफ सी) को 1500 रुपए की राशि दी गई। तृतीय स्थान पर रहे साईम शेख (एचजीटीसी जलगांव), रेशमा यादव (मॉर्डन कॉलेज, पुणे) तथा निमेश कुमार (मुंबई युनिवर्सिटी) को 1000 रुपए प्रदान किए गए। पुणे के उपस्थित प्रतिभागियों- साक्षी कांबले मॉर्डन कॉलेज, मयूरी यादव एफसी,  रोहित खैरनार (पिंपरी), राज साहनी एशियन कॉलेज, प्रिया बरकुड (मॉर्डन),मुस्कान गोलंदाज (पिंपरी), सन्नो शर्मा व रितु तोमर को प्रमाण पत्र दिया गया। इस सत्र का संचालन निर्मला राजपूत व भावना गुप्ता ने किया। आभार मनीषा तनपुरे ने माना।

इसके तुरंत बाद काव्य संध्या का आयोजन किया गया था। गुप्ता एवं राजपूत के साथ नव कवि खगेश वैद्य एवं प्रतिभागी मुस्कान तथा रोहित ने भी काव्य पाठ किया। शहर के कवियों में डॉ. अलका अग्रवाल, प्रेरणा उबाले, हितेश व्यास, सत्येंद्र सिंह, सुनील जोशी, प्रशांत कांबले, विद्या सराफ, शुभांगी गुरवे, विजयबाला स्याल, सुरजीत, अनुराधा, डॉ. अनीता जठार, नरेंद्र छाबड़ा, हृदय प्रकाश, धर्मेंद्र सिंह, स्नेहा सिंह, शिल्पा कांबले, वेद स्मृति आदि ने काव्य पाठ किया। इस सत्र का संचालन राजपूत ने किया तथा आभार प्रदर्शन प्रो. पूनम कन्नौजे ने किया।

स्व. उमाकांत वाजपेयी के व्यक्तित्व में कई आयाम थे

मुम्बई के सुप्रसिद्ध हिंदीसेवी डॉ उमाकांत बाजपेयी की श्रद्धांजलि सभा अभूतपूर्व थी। उनकी पावन स्मृतियों पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन रविवार 9 नवंबर 2025 को जुहू के मिलेनियम क्लब में किया गया। भारी तादाद में रचनाकारों, पत्रकारों और कलाकारों ने डॉ उमाकांत बाजपेयी को श्रद्धा सुमन अर्पित किए और उनकी विशिष्ट उपलब्धियां को याद किया। इनमें उद्घोषक हरीश भिमानी, अभिनेता विष्णु शर्मा, भक्तकवि नारायण अग्रवाल, गायक उदित नारायण, पूर्व गृह राज्यमंत्री कृपाशंकर सिंह, पत्रकार अभिजीत राणे, आचार्य पवन त्रिपाठी और आशीर्वाद के चेयरमैन ब्रजमोहन अग्रवाल जैसे कई प्रतिष्ठित लोग शामिल थे।
डॉ उमाकांत बाजपेयी की सुपुत्रियों निरूपमा बाजपेई, नीता बाजपेई और संगीता बाजपेयी ने उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया।श्रद्धांजलि सभा का संचालन पत्रकार राजेश विक्रांत ने किया। उल्लेखनीय है कि मुंबई की प्रमुख साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्था आशीर्वाद के संस्थापक, सुप्रसिद्ध हिन्दीसेवी डॉ उमाकांत बाजपेयी अपनी सांसारिक यात्रा पूर्ण कर गुरुवार 6 नवंबर 2025 को प्रभु चरणों में लीन हो गए थे।
डॉ. उमाकांत बाजपेयी का व्यक्तित्व बहुआयामी था।सन् 1969 से मुंबई में उन्होंने आशीर्वाद नाम की पत्रिका का प्रकाशन तथा सन् 1977 से ‘आशीर्वाद’ साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक संस्था का शुभारंभ किया। देश-विदेश के हिन्दी सेवियों को पुरस्कृत व सम्मानित करने की उनकी यात्रा अनवरत जारी रही।
राजेश विक्रांत ने बताया कि डॉ उमाकांत बाजपेयी ने आशीर्वाद के पुरस्कृत एकांकी, मुंबई के हिन्दी कवि तथा मुंबई की हिन्दी कवयित्रियां पुस्तकों का संपादन किया। एक लेखक के रूप में उनके चार कहानी संग्रह प्रकाशित हैं- 1.एक था नर एक थी मादा, 2. एक सोने का मृग, 3.बैंड बाजा बुलेट और 4. जय राम जी की।
डॉ उमाकांत बाजपेई ने सन् 1974 एवं 1978 में अखिल भारतीय लेखक सम्मेलन का आयोजन किया। सन् 1978 से पच्चीस वर्षों तक लगातार आशीर्वाद फ़िल्म अवार्ड का आयोजन किया। सन् 1991 से हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु आशीर्वाद राजभाषा पुरस्कार का शुभारंभ किया जो 33 वर्षों से जारी है। सन् 2012 में 24 घंटे चलने वाले अखंड कवि सम्मेलन का आयोजन किया। वर्ष 2019 में आशीर्वाद की स्वर्ण जयंती मनायी गयी जिसमें 50 विविध आयामी लोगों को पुरस्कृत किया गया।
डॉ उमाकांत बाजपेयी ने अपना पूरा जीवन हिन्दी का साथ, हिन्दी का विकास और हिन्दी पर विश्वास के लिए समर्पित किया था। वे एक कर्मठ हिन्दी सेवी के रुप में हमेशा याद किए जाएंगे।

झूठ बोलने की संस्कृति हमारे पतन का कारण बन रही है

भारतवर्ष मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का देश है जिन्होंने सत्य मार्ग पर चलकर तपस्वी राजा के रुप में अपना त्यागी जीवन बिताया।यह भारतवर्ष शांतिदूत भगवान श्रीकृष्ण का देश है। यह देश भगवान गौतम बुद्ध का देश है। यह देश ऋषि-मुनियों का देश है।यह देश सत्य,अहिंसा और त्याग के अमर पुजारी महात्मा गांधी का देश है।इस देश में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का आगमन हुआ जिनके विषय में कहा गया है-

सत्यासक्त दयालु द्विज, प्रिय अघहर सुखकंद।
जनहित कमलातजन जय,शिव नृप कवि हरिचन्द।।

भारतीय गौरवशाली गुरुकुल परम्परा के तहत राजकुमारों को गुरुसेवा करने,सत्य बोलने और सदाचारी जीवन जीने की ही शिक्षा-दीक्षा दी जाती रही है। हमारी सनातनी वर्ण(जाति)-व्यवस्था में भी ब्राह्मण,क्षत्रीय,वैश्य और शुद्र को क्रमशः विवेक,साहस,उत्पादन और सेवा क्षमताओं के आधार पर  सत्य मार्ग पर चलने का पावन संदेश निहित है।

यही नहीं,श्रीरांम-रावण युद्ध में श्रीराम ने सत्य के ही मार्ग का अनुसरण किया।श्रीकृष्ण ने दुराचारी कंस के वध में सत्य का ही मार्ग चुना।भारतवर्ष के एकमात्र धर्म-युद्ध,महाभारत युद्ध में भी शांतिदूत श्रीकृष्ण ने गाण्डीवधारी अर्जुन को सत्य मार्ग पर ही चलने का अमर संदेश दिया।

हमारे अमर धर्मग्रंथः रामायण, श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भागवत पुराण और श्रीमद् भागवत गीता में भी समस्त भारतवासियों को सत्य को अपनाने का अमर संदेश है। लेकिन आजाद भारत में आज-कल झूठ बोलने की संस्कृति का ही बोलबाला स्पष्ट रुप से नजर आती है।

झूठ ही लेना,झूठ ही देना।
झूठ ही भोजन,झूठ चबेना।।
ऐसे में,यह कहना गलत नहीं होगा कि आज राजा(शासक)-प्रजा(आम जनता),ब्राह्मण,क्षत्रीय,वैश्य और शूद्र सभी अकारण गर्व से और शौक से झूठ बोलते नजर आते हैं। हमारे कुछ शिक्षकगण,कुछ युवावर्ग, कुछ छोटे-छोटे बच्चे,कुछ किसान,कुछ मजदूर, कुछ नौकरशाह,कुछ कर्मचारी,कुछ कारोबारी,सभी प्रकार के सेवकगण आदि शौक से झूठ बोलते नजर आते हैं।

मुझे यह जानकारी देते हुए अत्यंत दुख हो रहा है कि कुछ ऐसे कथाव्यास भी हैं जो अपने व्यासपीठ की मर्यादा का ध्यान न रखकर,बोधात्मक कथा न सुनाकर अपने आचार-विचार और व्यवहार में झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा देते नजर आते हैं।

डॉक्टरों को दूसरा भगवान माना जाता रहा है उनमें से कुछ डॉक्टर आजकल अपनी दिनचर्या में झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं।बाजार में चले जाइए,दुकानदार से लेकर ग्राहक तक बड़ी ईमानदारी से झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा देते नजर आ रहे हैं।

हमारे वकील समुदाय में कुछ तो झूठ बोलने की संस्कृति को अपनी दिनचर्या बना लिए हैं। उन्हें आज  अपने आपको बचाने की जरुरत है जिससे हमारी न्याय व्यवस्था की मर्यादा पर लोगों का विश्वास कायम हो सके।

आज समाज का कोई भी वर्ग ऐसा नहीं है जो झूठ बोलने की संस्कृति से बचा हो।इसीलिए आज सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीना तथा सत्यनिष्ठ बनकर अपना कार्य करना तो असंभव –सा नजर आता है।

आज झूठ बोलने की गलत संस्कृति से स्वयं को बचाने के लिए तथा भारतवर्ष को विकासशील से विकसित बनाने के लिए कबीरदास की इस  साखी के संदेश को अक्षरशःअपनाने की जरुरत है-

सांच बराबर तप नहीं,
झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै सांच है,
ताके हिरदै आप।।

-अर्थात् सत्य बोलने जैसी कोई तपस्या नहीं है और झूठ बोलने जैसा कोई पाप नहीं है। जो व्यक्ति सच बोलता है उसी के हृदय में ईश्वर का वास होता है।

इस झूठ बोलने की आज की संस्कृति जिस प्रकार व्यक्ति विशेष से लेकर पूरे भारतवर्ष के अधिसंख्यक लोगों में पल्लवित-पुष्पित हो रही है उसपर अंकुश लगाने के लिए,समस्त भारतवासी को इस संक्रामक झूठ संस्कृति से बचने के लिए गंभीरतापूर्वक चिंतन-मनन करने की जरुरत है। भारतवर्ष के सभी बच्चों व युवाओं में सत्य-संस्कार और सत्य-संस्कृति को अपनाने का संदेश देना होगा।हमें अपने आचार-विचार,व्यवहार और आचरण में सत्य को अपनाने की आवश्यकता है।बाल मनोविज्ञान के अनुसार बच्चों में अनुकरण की प्रवृति सबसे अधिक होती है।

करुणा एवं संवेदनाओं से ही दुनिया में संतुलन संभव

विश्व करुणा  दिवस -13 नवम्बर, 2025

आज का मनुष्य जितनी तीव्रता से भौतिक प्रगति कर रहा है, उतनी ही तेजी से मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं से दूर होता जा रहा है। विज्ञान ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, परंतु उसने मनुष्य को आत्मकेंद्रित भी कर दिया है। प्रतिस्पर्धा, उपभोगवाद, स्वार्थ और सत्ता की भूख ने मनुष्य के भीतर की दयालुता को जैसे कुंद कर दिया है। ऐसे समय में जब विश्व हिंसा, आतंक, युद्ध, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और वैमनस्य के दौर से गुजर रहा है, तब “विश्व दयालुता दिवस” मनाने का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सभ्यता के विकास की असली पहचान तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की करुणा, सहानुभूति और प्रेम से होती है। दयालुता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। यह मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाकर देवत्व की ओर ले जाती है। इतिहास साक्षी है कि जिन समाजों ने दया, करुणा और प्रेम को अपनाया, वहीं शांति और समृद्धि का आधार बने। बुद्ध, महावीर, यीशु और गांधी जैसे महापुरुषों ने दया को जीवन की सबसे बड़ी साधना माना। महात्मा गांधी ने कहा था, “अहिंसा कोई निष्क्रिय वस्तु नहीं, यह सबसे सक्रिय और जीवंत शक्ति है।” दयालुता उसी अहिंसा की आत्मा है, जो मनुष्य को दूसरों के सुख-दुःख से जोड़ती है।
आज जब दुनिया में युद्ध की विभीषिका मंडरा रही है, जब समाज हिंसा, कट्टरता और असहिष्णुता से आक्रांत है, तब दया और करुणा का महत्त्व केवल नैतिकता का विषय नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। यूक्रेन-रूस युद्ध, गाजा और इस्राइल का संघर्ष, आतंकवाद की विभीषिका और भीतर तक उतर चुकी नफरत की राजनीति-ये सब इस बात के संकेत हैं कि हमने दयालुता को अपने जीवन से बाहर कर दिया है। मनुष्य ने मशीनों की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया है। संवेदना की जगह संदेह ने ले ली है, और करुणा की जगह क्रूरता ने। ऐसे में विश्व दयालुता दिवस केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है कि क्या हम अब भी मनुष्य बचे हैं या केवल उपभोग की दौड़ में शामिल यांत्रिक प्राणी बन गए हैं।
विश्व दयालुता दिवस मनाने की पहल सबसे पहले 1998 में “वर्ल्ड काइंडनेस मूवमेंट” नामक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने की थी, जिसका उद्देश्य था-मानवता में करुणा, सहानुभूति और प्रेम के बीजों को फिर से सींचना। इस दिन का मकसद यह स्मरण कराना है कि दया कोई एक दिन की बात नहीं, बल्कि जीवन का स्थायी संस्कार होना चाहिए। दयालुता एक ऐसी भाषा है जो सभी सीमाओं, धर्मों, भाषाओं और विचारधाराओं से परे है। यह वह सूत्र है जो मनुष्यता को जोड़ता है, जो टूटे हुए रिश्तों में प्राण फूंकता है। आज की दुनिया में भौतिक विकास ने व्यक्ति को आराम तो दिया है, लेकिन आत्मिक शांति छीन ली है। हर कोई सफलता की होड़ में है, पर किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है। परिवारों में संवाद घट गया है, समाज में सहयोग की भावना कम हुई है, और राजनीति में विरोध ने वैमनस्य का रूप ले लिया है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस युग में हम जुड़ते तो बहुत हैं, पर वास्तव में अलग-थलग पड़ गए हैं। दया और करुणा की कमी के कारण मानसिक तनाव, अवसाद, आत्महत्या और असंतोष जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। इस स्थिति से उबरने का एकमात्र उपाय है-दयालुता की भावना को जीवन का आधार बनाना।
दयालुता केवल दूसरों के प्रति व्यवहार नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का माध्यम है। जब हम किसी की सहायता करते हैं, किसी के दुःख को समझते हैं, किसी की भूल को माफ करते हैं, तब हम अपने भीतर की नकारात्मकता को भी दूर करते हैं। दयालु व्यक्ति न केवल समाज को सुंदर बनाता है, बल्कि स्वयं के भीतर भी शांति का अनुभव करता है। करुणा से मनुष्य का हृदय विस्तृत होता है, दृष्टि उदार होती है, और जीवन में संतुलन आता है। आज की जटिल दुनिया में संतुलन खोना बहुत आसान है। मनुष्य अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं में उलझकर आत्मविनाश की ओर बढ़ रहा है। पर्यावरण का संकट, सामाजिक विषमता, नैतिक पतन-ये सब उसी असंतुलन के परिणाम हैं, जहाँ दयालुता और करुणा का स्थान स्वार्थ और लोभ ने ले लिया है।
यदि मनुष्य में करुणा का भाव जाग जाए, तो न युद्ध रहेगा, न आतंकवाद, न हिंसा। दुनिया में जितनी भी क्रूरताएं हुई हैं, वे दया के अभाव से हुई हैं। अतः दया केवल नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि विश्व शांति का आधार है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-“जब तक एक भी जीव भूखा या दुखी है, तब तक तुम्हारी उपासना अधूरी है।” यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि सच्चा धर्म केवल पूजा या प्रार्थना नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति करुणा का भाव है। यदि दयालुता जीवन का हिस्सा बन जाए, तो धर्म अपने वास्तविक रूप में प्रकट होता है। चाहे वह जैन धर्म का “अहिंसा परमो धर्मः” का संदेश हो या बौद्ध धर्म की “मैत्री भावना”, सभी ने दया को ही मानवता की सर्वाेच्च साधना माना है।
वास्तव में दया का अर्थ केवल किसी पर कृपा करना नहीं है, बल्कि दूसरों के दुख को अपना समझना है। दया एक ऐसी ऊर्जा है जो न केवल संबंधों को मजबूत बनाती है, बल्कि समाज में सह-अस्तित्व की भावना को भी जन्म देती है। आज जब मनुष्य अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष कर रहा है, तो दया ही वह सूत्र है जो जीवन में संतुलन और अर्थ दोनों ला सकती है। हम देख रहे हैं कि दुनिया में तकनीकी शक्ति बढ़ रही है, परंतु नैतिक और भावनात्मक शक्ति घट रही है। युद्ध और हिंसा से किसी का भला नहीं होता। दया और करुणा से ही समाज टिकता है, सभ्यता बचती है, और मनुष्य अपने भीतर के अंधकार को पहचान पाता है। विश्व दयालुता दिवस इसलिए हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या हमारे जीवन में दयालुता का स्थान बचा है? क्या हम अपने व्यवहार में दूसरों के सुख-दुःख के प्रति संवेदनशील हैं?
दयालुता की शुरुआत बहुत छोटे-छोटे कार्यों से होती है-किसी की सहायता करना, किसी के प्रति मधुर बोल कहना, किसी की गलती को क्षमा करना, या किसी जरूरतमंद की मदद करना। इन छोटे प्रयासों से बड़े बदलाव संभव हैं। यही छोटे कदम मिलकर समाज में बड़ी करुणा की लहर पैदा करते हैं। जैसे एक दीपक अंधकार को मिटा देता है, वैसे ही एक दयालु कर्म हजारों हृदयों में प्रकाश फैला सकता है। आज जब दुनिया को हथियारों से नहीं, दिलों से जीतने की जरूरत है, तब दयालुता को जीवन का आधार बनाना सबसे बड़ी मानव सेवा है। करुणा वह सेतु है जो टूटे हुए संबंधों को जोड़ती है, घृणा को प्रेम में बदलती है और संघर्ष को सहयोग में परिवर्तित करती है। यही संतुलित, शांत और सुंदर जीवन की दिशा है। इसलिए विश्व दयालुता दिवस कोरा आयोजनात्मक न होकर प्रयोजनात्मक होना चाहिए, यह दिवस एक प्रेरणा है कि हम फिर से मनुष्य बनें, अपने भीतर की करुणा को जगाएं और दुनिया को प्रेम व सहानुभूति से भर दें। जब हम दूसरों के प्रति दयालु बनते हैं, तो हम न केवल समाज में शांति फैलाते हैं, बल्कि अपने भीतर भी दिव्यता का अनुभव करते हैं। यही दया का वास्तविक चमत्कार है-जो जीवन को संतुलित बनाता है और दुनिया को फिर से मानव बनाता है।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133