ग्रीस कैसे तुर्की बना: इस्लामिक समुदाय और देशों के विभाजन
बिहार में बडबोली राजनीति की हार, सुशासन की नई सुबह
निश्चित ही इन चुनाव परिणामों में बिहार का मतदाता अधिक सजग एवं विवेकशील दिखाई दिया हैं। वह जानता है कि सत्ता परिवर्तन से अधिक जरूरी है संस्कृति परिवर्तन, राजनीतिक शुचिता, विकास, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही।
इस चुनावी जनादेश को केवल राजनीतिक वर्चस्व के चश्मे से नहीं, बल्कि जनविश्वास की कसौटी से देखना जरूरी है। यह जीत भाजपा, जेडीयू और एलजेपी (रामविलास) के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। अब उन्हें यह साबित करना होगा कि चुनावी नारों की चमक शासन की रोशनी में भी कायम रह सकती है।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133
आदम की पसली, मैक्समूलर और वेद
कैवल्यधाम ने योग को शास्त्रीय और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर सशक्त बनायाः श्री रामनाथ कोविंद
लोनावला। “कैवल्यधाम योग संस्थान पारंपरिक योग ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सुंदर संगम प्रस्तुत कर रहा है। यह संस्थान योग को शास्त्रीय और व्यवहारिक दोनों स्तरों पर सशक्त बना रहा है। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे यहाँ दोबारा आने का अवसर मिला, लेकिन ये ऐसा स्थान है कि यहां बार बार आने को मन करता है।”
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ये विचार पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने लोनावला के कैवल्यधाम योग संस्थान में स्वामी कुवलयानंद योग पुरस्कार प्रदान करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि जिस योग संस्थान के माध्यम से स्वामी कुलयानंद ने आज से 100 साल पहले योग को पूरे विश्व में फैलाने की कल्पना की थी, वह योग आज दुनिया के 175 देशों में अपनी पहचान बना चुका है। उन्होंने कहा कि जो देश योग को धर्म विशेष का मानकर इसका विरोध करते रहे आज उन देशों में भी योग किया जा रहा है और योग दिवस मनाया जा रहा है, ये सब आज के भारत की और हजारों साल पुराने योग की ताकत है कि पूरी दुनिया इसको अपना रही है।

इस अवसर पर कैवल्यधाम शताब्दी समारोह आयोजन समिति के अध्यक्ष एवँ पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सुरेश प्रभु ने कहा यह हमारी हजारों साल पुरानी संस्कृति की विशेषता है कि समय समय पर योगाचार्य कुलयानंद जैसे लोग जन्म लेते रहते हैं और हमारी सांस्कृतिक विरासत की धारा को प्रवाहित करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि कैवल्यधाम ने विगत सौ वर्षों में भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लाखों लोगों को योग से जोड़ा। यह संस्थान ऐसे समय में शुरु हुआ था जब लोनावला में साधन तो क्या यहाँ पहुंचने के लिए सड़क तक नहीं थी, फिर भी दुनिया भर के लोग यहाँ आते रहे। श्री प्रभु ने कहा कि आज ये स्थान एक ऐसी पुण्य भूमि बन चुका है जहाँ आकर व्यक्ति अपने आपको रूपांतरित कर लेता है।
इस अवसर पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री डी.वाय. चन्द्रचूड़ ने कहा कि मेरे जीवन को सकारात्मक व स्वस्थ बनाने में योग का ही योगदान है। मेरे योग शिक्षक ने मुझे योग की बारिकियाँ सिखाई और समझाई और जब मैने इसको अपने जीवन में उतारा तो इसके चमत्कारिक परिणाम हुए। उन्होंने योग गुरु कुवलयानंद जी को याद करते हुए कहा कि मुझे हैरानी इस बात की है कि आज से 100 साल पहले लोनावला में आने को न सड़क थी न बिजली थी तब उन्होंने इस स्थान को योग केंद्र के रूप में चुना और दूसरी हैरानी की बात ये है कि ये संस्थान पूरी गरिमा और विश्वसनीयता के साथ 100 साल बाद भी चल रहा है और यहाँ का वातावरण देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने इसे सभी वरदानों से लाद दिया है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार की अनुसंधान सलाहकार एवं परामर्शदाता सुश्री शर्ली टेलिस ने कहा कि मैने मेडिकल विज्ञान की पढ़ाई की है लेकिन जब मैने योग के माध्यम से मरीजों में होने वाले चमत्कारिक प्रभावों का अध्ययन किया तो मैं दंग रह गई। योग में वह ताकत है जो दुनिया की किसी दवाई में नहीं है।
योग के लिए जीवन समर्पित कर देने वाले योगाचार्य रंभाऊ खंडवे (अध्यक्ष, जनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडल, नागपुर) ने अपने पुरस्कार को अपने गुरु कुवल्यानंद जी को समर्पित करते हुए कहा कि मैने उनसे योग की दीक्षा समाज के हर कोने में योग पहुँचाने के लिए ली थी, लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि जिस संस्थान से मुझे दीक्षा और शिक्षा मिली वही संस्थान मुझे पुरस्कृत भी करेगा। उन्होंने कहा कि माननीय कोविंद जी और माननीय चन्द्रचूड़ जी की उपस्थिति में सम्मानित होना मेरे लिए गर्व की बात है।
इस आयोजन को सफल बनाने में कैवल्यधाम की सुश्री भूमि और सुश्री ईश्विंधा के साथ ही सभी कर्मचारियों का अप्रतिम योगदान रहा। कार्यक्रम में शामिल हुए सभी मेहमान कैवल्यधाम के प्राकृतिक वातावरण से लेकर अहोभाव से हुए अतिथि सत्कार से अपने आपको सम्मानित महसूस कर रहे थे।
मुंबई से आए बोनांजा पोर्टफोलियो के श्री एसपी गोयल ने कहा कि इतने विशाल परिसर को प्राकृतिक वातावरण की मौलिकता बनाए रखते हुए इतना सर्वसुविधायुक्त परिसर बनाना और इसे सफलतापूर्वक संचालित करना, इस बात का प्रमाण है कि इस संस्थान से जुडे लोग कितने समर्पित और सेवाभावी है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कैवल्यधाम के महासचिव श्री सुभाष आर. वारेकर ने की।
समारोह का संचालन राजीव वाचस्पति शालाका ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन श्याम वासलकर ने किया।
योग पुरस्कार प्राप्त विशिष्ट व्यक्तियों के बारे में
डॉ. न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
उनकी विशिष्ट यात्रा — अकादमिक क्षेत्र से लेकर देश की सर्वोच्च न्यायपालिका तक — न्याय, संवैधानिक मूल्यों और विधि के शासन के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का प्रमाण है। उन्होंने स्वयं को भारत के सबसे सम्मानित न्यायविदों में स्थापित किया है।

भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा देने के बाद, उन्होंने नवंबर 2024 में पदमुक्त होकर एक गौरवशाली न्यायिक जीवन का समापन किया। उनका करियर वर्ष 2000 में बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति से प्रारंभ हुआ। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश (2016 से) के रूप में कार्य किया।
अपने आरंभिक कार्यकाल में वे भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रहे और वर्ष 1998 में उन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया।
वे सेंट स्टीफन्स कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय के कैम्पस लॉ सेंटर के स्नातक हैं। इसके पश्चात उन्होंने हार्वर्ड लॉ स्कूल, अमेरिका से एल.एल.एम. और विधि में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।
कानून के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान से परे, डॉ. चंद्रचूड़ योग के समर्पित साधक रहे हैं। वे अपने युवावस्था से ही योग का अभ्यास करते आए हैं और दशकों से इसका पालन करते हैं। जीवन और नेतृत्व के प्रति उनका दृष्टिकोण योग की मूल भावना को प्रतिबिंबित करता है —
योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि संतुलन, संयम और आत्म-जागरूकता के सिद्धांतों पर आधारित जीवन का समग्र दृष्टिकोण है।
मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने न्यायिक क्षेत्र में योग, स्वास्थ्य और कल्याण को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया। उनके नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट में एक योग हॉल का उद्घाटन किया गया, जहाँ नियमित योग सत्रों की शुरुआत हुई — जिससे न्यायालय में सजगता, स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन की संस्कृति का विकास हुआ।
डॉ. चंद्रचूड़ के लिए योग आसनों के अभ्यास से आगे बढ़कर आत्म-अनुशासन, सत्यनिष्ठा और सामंजस्य के यम-नियम जैसे मूल सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करता है। ये मूल्य उन्होंने अपने व्यक्तिगत आचरण और सार्वजनिक सेवा में निरंतर अपनाए हैं। उनका नेतृत्व योग से उत्पन्न उस आध्यात्मिक संतुलन को दर्शाता है जो बुद्धि को करुणा और न्याय को मानवता के साथ जोड़ता है।
योग के आदर्शों के प्रति उनके जीवनपर्यंत समर्पण के सम्मान में, कैवल्यधाम को गर्व है कि वह डॉ. न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ को स्वामी कुवलयानंद योग पुरस्कार 2025 प्रदान कर रहा है।
उनका जीवन और कार्य स्वामी कुवलयानंद की उस दृष्टि से गहराई से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने परंपरा की ज्ञान-गंगा को विज्ञान की कठोरता के साथ एकीकृत कर समाज को योग की रूपांतरकारी शक्ति के माध्यम से ऊँचा उठाने का प्रयास किया।
डॉ. शर्ली टेलिस
अनुसंधान सलाहकार एवं परामर्शदाता, पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार
हमारी अंतिम पुरस्कार प्राप्तकर्ता स्वयं एक उत्साही योग साधिका हैं और उनका विश्वास है कि योग अनुसंधान जीवन के प्रत्येक पहलू पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

डॉ. टेलिस ने पारंपरिक चिकित्सा (एम.बी.बी.एस.) में स्नातक की डिग्री प्राप्त की है। इसके बाद उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस (NIMHANS), बेंगलुरु से योग अभ्यास के प्रभावों पर न्यूरोफिज़ियोलॉजी में एम.फिल. और पीएच.डी. पूरी की।
अपने डॉक्टरेट के पश्चात, डॉ. टेलिस ने स्वामी विवेकानंद रिसर्च फाउंडेशन, बेंगलुरु से जुड़कर वहाँ प्रयोगशालाएँ स्थापित करने का अद्वितीय पोस्टडॉक अनुभव प्राप्त किया और अनुसंधान कार्य आरंभ किया।
वर्ष 2007 से, डॉ. टेलिस पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार से जुड़ी हुई हैं।
उन्हें वर्ष 1998 में ध्यान-साधकों पर fMRI अध्ययन करने हेतु फुलब्राइट फैलोशिप प्राप्त हुई, जो यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा, गेंसविल, अमेरिका के रेडियोलॉजी विभाग में किया गया।
वर्ष 2001 में उन्हें टेम्पलटन फाउंडेशन से न्यूरोबायोलॉजी में सृजनात्मक विचारों के लिए पुरस्कार मिला।
2007 में वे इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के अंतर्गत सेंटर फॉर एडवांस्ड रिसर्च, बेंगलुरु में योग और ध्यान के प्रभावों पर अध्ययन करने वाली पहली भारतीय वैज्ञानिक बनीं। उन्होंने स्वायत्त तंत्रिकाओं, प्रेरित एवं घटना-संबंधी विभवों, पॉलीसोमनोग्राफी जैसे विषयों पर शोध किया।
उन्होंने लगभग 200 शोध-पत्र प्रकाशित किए हैं जो विभिन्न अंतरराष्ट्रीय डेटाबेस में उद्धृत हैं, और 7 पुस्तकों की रचना की है।
डॉ. टेलिस को भारत एवं विश्वभर में योग और आयुर्वेद के स्वास्थ्य एवं उपचार में अनुप्रयोगों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया है।
उनके योगदानों ने योग को एक वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में वैश्विक समझ को अत्यधिक समृद्ध किया है।
योगाचार्य रंभाऊ खंडवे
अध्यक्ष, जनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडल
हमारे दूसरे पुरस्कार प्राप्तकर्ता का परिचय देना हमारे लिए गौरव की बात है — योगाचार्य रंभाऊ खंडवे, जिन्होंने अपने जीवन के छह दशकों से भी अधिक समय योग की निःस्वार्थ सेवा में समर्पित किया है। उनका यह समर्पण जनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडल, रामनगर, नागपुर के साथ उनके गहन संबंध के माध्यम से प्रकट होता है, जिसकी स्थापना परम पूज्य जनार्दन स्वामी ने वर्ष 1951 में की थी।

श्री रंभाऊ खंडवे अनेक वर्षों तक मंडल के कार्यवाह रहे हैं और वर्ष 2022 से अध्यक्ष के रूप में सेवा दे रहे हैं।
कैवल्यधाम द्वारा प्रचारित योग के आदर्शों के प्रेरक वाहक के रूप में, योगाचार्य रंभाऊ खंडवे ने अपने अनुशासित जीवन, पतंजलि के अष्टांग योग के गहन ज्ञान, और करुणा-पूर्ण शिक्षण दृष्टिकोण से अनगिनत साधकों को प्रेरित किया है।
नियमित कक्षाओं, प्रशिक्षण शिविरों और जन-जागरण के माध्यम से उन्होंने विशेषकर महाराष्ट्र में समाज के ताने-बाने में योगिक मूल्यों को समाहित करने का कार्य किया है।
उनकी जीवनशैली — जो आध्यात्मिक गहराई और सामाजिक प्रासंगिकता का संतुलित उदाहरण है — उन्हें योग पथ पर अनेक लोगों के लिए एक मार्गदर्शक बनाती है।
जनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडल में अपने आजीवन कार्य के माध्यम से उन्होंने पतंजलि के अष्टांग योग की भावना को बनाए रखा और विनम्रता, अनुशासन, विवेक तथा ज्ञान पर आधारित पारंपरिक योग साधनाओं को आगे बढ़ाया।
उन्होंने स्वामी कुवलयानंद जी की उस दृष्टि को साकार करने में योगदान दिया जिसमें योग को विज्ञान की दृढ़ता के साथ जोड़कर मानव उत्थान और कल्याण का माध्यम बनाया गया।
सरहदों से पार हैं जनजाति योद्धाओं का पराक्रम
15 नवंबर बिरसा मुंडा 150 जयंती पर विशेष
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सुदूर आदिवासी अंचलों से भी अंगे्रजी शासन के खिलाफ आवाज उठी थी. अनेक जनजाति योद्धाओं ने अपने पराक्रम का परिचय दिया था. ये सारे योद्वा एक अंचल अथवा समुदाय के लिए अंग्रेजी शासन से नहीं लड़े थे बल्कि ये भारत भूमि के लिए लड़े थे, लेकिन यह दुर्भाग्य से इन सारों को उन्हें क्षेत्र विशेष में बाँध दिया गया था. वे जिस अंचल से आते थे, उनके लिए वे गौरव नायक तो हुए ही, साथ ही वे समूचे भारतीय समाज के लिए गौरव नायक हैं. इन्हीं गौरव नायकों में बिरसा मुंडा का नाम आता है. भारत सरकार की पहल पर बिरसा मुंडा की जन्म जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में स्थापित किया गया. यह वर्ष बिरसा मुंडा की जन्म जयंती का डेढ़ सौ वर्ष है जिसे पूरे देश में सेलिब्रेट किया जा रहा है.
जमींदारों और पुलिस का अत्याचार भी बढ़ता जा रहा था। मुंडाओं का विचार था कि आदर्श भूमि व्यवस्था तभी संभव है, जब यूरोपियन अफसर और मिशनरी के लोग पूरी तरह से हट जाएं। इसलिए, एक नया नारा गढ़ा गया-‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ जिसका मतलब है कि अपना देश-अपना राज। 24 दिसंबर 1899 से लेकर बिरसा की गिरफ्तारी तक रांची, खूंटी, सिंहभूम का पूरा इलाका ही विद्रोह से दहक उठा था। इसका केंद्र खूंटी था। इस विद्रोह का उद्देश्य भी चर्च को धमकाना था कि वह लोगों को बरगलाना छोड़ दे, लेकिन वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे। पुलिस को खबर मिली की नौ जनवरी को सइल रकब पर मुंडाओं की एक बड़ी बैठक होने वाली है। पुलिस दल-बल के साथ यहां पहुंची। पहाड़ी करीब तीन सौ फीट ऊंची थी। यहां पुलिस और विद्रोहियों के बीच जमकर युद्ध हुआ, लेकिन बिरसा मुंडा यहां नहीं मिले। वे पहले ही यहां से निकल गए थे।

भागवत की नई दृष्टि और समरस भारत की परिकल्पना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रायः हिंदूवादी संगठन के रूप में देखा जाता रहा है, परंतु वस्तुतः वह केवल एक धार्मिक या सांप्रदायिक संगठन नहीं, बल्कि भारतीयता और राष्ट्रीयता की जीवंत चेतना का प्रतीक है। संघ की मूल प्रेरणा “वसुधैव कुटुम्बकम्” के भाव से उपजी है, जो भारत की सनातन संस्कृति की आत्मा है। इसी दृष्टि का विस्तार संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के हालिया बेंगलुरु वक्तव्य में परिलक्षित हुआ, जब उन्होंने खुले हृदय से कहा कि “ईसाई और मुसलमान भी संघ में शामिल हो सकते हैं”। यह कथन न केवल साहसिक है बल्कि यह नए भारत, विकसित भारत और संतुलित भारत की सोच का परिचायक भी है। संघ में मुस्लिम, ईसाई समेत किसी भी संप्रदाय के लोगों के स्वागत की भागवत के वक्तव्य की व्यापक चर्चा होना स्वाभाविक है। लेकिन यह वक्तव्य संघ की व्यापक सोच का भी परिचायक है और उसके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
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फोनः 22727486, 9811051133
आस्था-इतिहास-पर्यटन का संगम: लक्ष्मण पथ, पंचवटी द्वीप और पीपा पुल की परिकल्पना
जबसे भगवान श्रीराम अयोध्या में अपने भव्य मंदिर में विराजे हैं, राम नगरी के इस शहर में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। बढ़ती भीड़ और सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने कई परियोजनाओं की शुरुआत की है।
अयोध्या आज देश और दुनिया का बड़ा आध्यात्मिक केंद्र बन चुकी है। राम मंदिर निर्माण के बाद यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस स्थिति में प्रशासन ऐसे सभी प्रोजेक्टों पर काम कर रहा है जो शहर को सुव्यवस्थित, आकर्षक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाएं।आज हम अयोध्या में विकसित हो रहे लक्ष्मण पथ, पंचवटी द्वीप और पीपा पुल की परिकल्पना को साकार होते देख रहे हैं।
1.लक्ष्मण पथ का निर्माण
लक्ष्मण पथ अयोध्या में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाया जा रहा एक नया चार-लेन वाला वैकल्पिक मार्ग है। यह लगभग 12 किलोमीटर लंबा होगा और इसकी लागत लगभग ₹200 करोड़ है। इस मार्ग का उद्देश्य गुप्तारघाट से राजघाट तक कनेक्टिविटी में सुधार करना है, जिससे अयोध्या में यातायात प्रबंधन में मदद मिलेगी और अन्य प्रमुख मार्गों जैसे राम पथ, जन्मभूमि पथ, भक्ति पथ और धर्म पथ के साथ एक व्यापक नेटवर्क बनेगा। यह राम पथ, जन्मभूमि पथ, भक्ति पथ, धर्म पथ जैसी अन्य परियोजनाओं और अयोध्या के लिए एक व्यापक सड़क नेटवर्क का हिस्सा हैं। इस पथ के निर्माण के साथ-साथ, भीड़ प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए गुप्तार घाट, उदया पब्लिक स्कूल के सामने और राजघाट पर पार्किंग स्थलों का भी निर्माण किया
जाएगा।
सरयू नदी के तटबंध की चौड़ाई पहले छह मीटर थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर सात मीटर कर दिया गया है। लक्ष्मण पथ की चौड़ाई 18 मीटर रखने का डिज़ाइन तैयार किया गया है। जन्मभूमि पथ, भक्ति पथ और धर्म पथ का निर्माण पूरा करने के बाद, योगी सरकार अब लक्ष्मण पथ के निर्माण की तैयारी कर रही है। इस नए वैकल्पिक मार्ग के लिए एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की गई है, जिसका नाम भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण के नाम पर रखा जाएगा।
2.पंचवटी द्वीप की परिकल्पना
अयोध्या विकास प्राधिकरण (एडीए) श्री निलयम रिसॉर्ट के माध्यम से सरयू के बीच 75 एकड़ में पंचवटी द्वीप का विकास कर रहा है। यह परियोजना अपने आप में अनोखी है क्योंकि इसे भगवान राम के जीवन से जुड़े प्रसंगों पर आधारित थीम पर विकसित किया जा रहा है। इसमें ‘राम की जीवन यात्रा’ पर आधारित प्रस्तुतीकरण, ऋषि कॉटेज, योग एवं ध्यान केंद्र, सांस्कृतिक मंच, घुड़सवारी की व्यवस्था, एडवेंचर जोन और जैविक खेती के मॉडल स्थापित किए जा रहे हैं।
पंचवटी द्वीप को अयोध्या की विश्व-स्तरीय पर्यटन पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा रहा है। यहां धार्मिक कार्यक्रम, सांस्कृतिक आयोजन और योग-ध्यान से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समारोह भी आयोजित किए जा सकते हैं। पीपा पुल इसमें प्राकृतिक सौंदर्य और पारंपरिक आकर्षण दोनों का मेल जोड़ देगा। नई परियोजना में सुरक्षा और स्थायित्व पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
एक नया पीपा पुल जमथरा घाट के पास बनाया जाएगा और लक्ष्मण पथ को सरयू नदी के मध्य विकसित किए जा रहे पंचवटी द्वीप से जोड़ेगा। इससे न केवल पर्यटन को नई उड़ान मिलेगी बल्कि श्रद्धालुओं के लिए पहुंच मार्ग भी अधिक सुगम और आकर्षक बनेगा। पीपा पुल पार करने का अनुभव अलग ही होता था। सरयू की धीमी-धीमी लहरों पर झूलता पुल यात्रियों के लिए रोमांच की अनुभूति कराता था। अब वही दृश्य एक आधुनिक और सुरक्षित रूप में फिर सामने आएगा। प्रशासन का मानना है कि यह नया पुल श्रद्धालुओं, पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा।
पीपा पुल की मजबूती बढ़ाने के लिए आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों का प्रयोग होगा। पुल पर पर्याप्त चौड़ाई, रेलिंग और रात्रिकालीन रोशनी की भी व्यवस्था प्रस्तावित है ताकि श्रद्धालु सुरक्षित तरीके से आवागमन कर सकें। अधिकारियों का कहना है कि मानसून के दौरान पुल को सुरक्षित तरीके से हटाने और पुनः स्थापित करने की योजना भी तैयार की जा रही है। इससे नदी की प्राकृतिक धारा और जलस्तर के अनुसार कार्यप्रणाली को नियंत्रित किया जा सकेगा।
सरयू की धारा पर फिर दिखेगा तैरता पुल
नई परियोजना में सुरक्षा और स्थायित्व पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। पीपा पुल की मजबूती बढ़ाने के लिए आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों का प्रयोग होगा। पुल पर पर्याप्त चौड़ाई, रेलिंग और रात्रिकालीन रोशनी की भी व्यवस्था प्रस्तावित है ताकि श्रद्धालु सुरक्षित तरीके से आवागमन कर सकें। अधिकारियों का कहना है कि मानसून के दौरान पुल को सुरक्षित तरीके से हटाने और पुनः स्थापित करने की योजना भी तैयार की जा रही है। इससे नदी की प्राकृतिक धारा और जलस्तर के अनुसार कार्यप्रणाली को नियंत्रित किया जा सकेगा।
पीपा पुल का निर्माण न केवल पुराने अयोध्या की याद दिलाएगा बल्कि नए आधुनिक शहर की सूरत भी संवारने में मदद करेगा। शासन का यह कदम आस्था, इतिहास और पर्यटन के त्रिवेणी संगम का प्रतीक माना जा रहा है।
लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं।
वॉट्सप नं.+919412300183
ऋण के जाल में फंसे देशों से भारत के राज्यों को मिलती है सीख
वैश्विक स्तर पर कई विकासशील एवं अविकसित देशों पर लगातार बढ़ रहे ऋण के दबाव के चलते इन देशों की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव स्पष्टत: दिखाई दे रहा है। इन देशों द्वारा अपने नागरिकों को लम्बे समय तक मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराना जारी रखा गया है एवं यहां की सरकारों द्वारा अपने आय के साधनों में पर्याप्त वृद्धि नहीं की गई है। नागरिकों को दी जाने वाली सुविधाओं को ऋण लेकर भी जारी रखना अब इन देशों के लिए आत्मघाती निर्णय साबित होता हुआ दिखाई दे रहा है, और आज यह देश दिवालिया होने के मुहाने पर खड़े हैं तथा इन्हें अपना सामान्य प्रशासन चलाने के लिए खर्च करने हेतु भी ऋण लेना पड़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक आंकलन के अनुसार, अक्टूबर 2025 में वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद का 98.9 प्रतिशत सार्वजनिक ऋण बकाया है, जो वर्ष 2030 तक 102.3 प्रतिशत तक बढ़ जाने की सम्भावना है। विभिन्न देशों के सार्वजनिक ऋण, आय से अधिक खर्च करने की प्रवृति, अधिक ब्याज दर, आय में कम वृद्धि होना, आदि कारकों के चलते लगातार बढ़ता जा रहा है। विकासशील एवं अविकसित देश अपनी आय में वृद्धि नहीं कर पाते हैं परंतु, उन्हें अपने नागरिकों को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए खर्च लगातार बढ़ाते रहना होते हैं। इन्हीं कारणों के चलते श्रीलंका, अर्जेंटीना, सूडान, ग्रीस, मालदीव, सेनेगल, आदि देशों में तो आर्थिक आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी थी एवं विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं अन्य वैश्विक वित्तीय संस्थानों द्वारा इन देशों की मदद के लिए आगे आना पड़ा था, अन्यथा यह देश लगभग दिवालिया घोषित होने की स्थिति में पहुंच गए थे। वर्ष 2025 में विश्व के प्रथम 10 देशों में, जिनका ऋण का सकल घरेलू उत्पाद से प्रतिशत सबसे अधिक है, शामिल हैं – जापान (229.6 प्रतिशत), सूडान (221.5 प्रतिशत), सिंगापुर (175.6 प्रतिशत), ग्रीस (146.7 प्रतिशत), बहरीन (142.5 प्रतिशत), इटली (136.8 प्रतिशत), मालदीव (131.8 प्रतिशत), अमेरिका (125 प्रतिशत), सेनेगल (122.9 प्रतिशत) एवं फ्रान्स (116.5 प्रतिशत)।
ग्रीस, घाना, हैती, मोजांबीक, पाकिस्तान, जाम्बिया, फिलिपींस, श्रीलंका, कीन्या, अर्जेंटीना, आदि देशों द्वारा अधिक मात्रा में लिए गए ऋण के चलते इनकी वित्तीय स्थिति डावांडोल हो चुकी है। इन देशों द्वारा अपने खर्चों को व्यवस्थित तरीके से नहीं किया गया था एवं केवल जनता को मुफ्त में सुविधाएं उपलब्ध कराना लम्बे समय तक जारी रखा गया था तथा साथ में आय बढ़ाने के साधनों पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। इससे इन देशों का बजटीय घाटा लगातार बढ़ता रहा तथा मजबूरी में इन्हें अपने साधारण सरकारी कामकाज चलाने के लिए भी ऋण लेते रहना पड़ा है। वर्ष 2001 में युगांडा में वित्तीय संकट खड़ा हो गया था एवं उस समय पर युगांडा अपने सामान्य खर्चों को जारी रखने के स्थिति में भी नहीं था।
भारत में भी कुछ राज्य “फ्रीबी” के नाम पर कुछ ऐसी योजनाएं चला रहे हैं जिनके अंतर्गत राज्य की जनता के बिजली एवं पानी के बिल समय समय पर माफ किये जा रहे हैं। किसानों, बुजुर्गों एवं मातृशक्ति के बैंक खातों में सीधे ही कुछ राशि प्रति माह जमा की रही है। जबकि, इन राज्यों की वित्तीय स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि इनके बजट इस अतिरिक्त खर्च को वहन कर सकें। कुछ राज्य तो आज मजबूरी में इन योजनाओं को चलायमान बनाए रखने के लिए बाजार से ऊंची ब्याज दर पर ऋण भी लेने लगे हैं। जिसका प्रभाव इन राज्यों की वित्तीय स्थिति पर विपरीत रूप से पड़ रहा है। यदि समय पर ये राज्य नहीं चेते एवं इन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं किया तो ये राज्य अपने भारी भरकम ऋणों पर ब्याज अदा करने में चूक करने की ओर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। जाहिर तौर पर जब राज्यों की आर्थिक स्थिति की चर्चा होती है तो इसका असर राज्यों के विकास और इन राज्यों में निवास कर रहे नागरिकों के जीवन पर भी पड़ता है। लोकलुभावन राजनीति इन राज्यों की वित्तीय स्थिति को बहुत बुरे तरीके से प्रभावित कर रही है। भारतीय रिजर्व बैंक के वार्षिक प्रतिवेदन में भी राज्यों की वित्तीय स्थिति को लेकर कई गंभीर पहलु और सवाल खड़े किए गए हैं। विशेष रूप से पंजाब, केरल, झारखंड, राजस्थान और पश्चिम बंगाल आदि राज्य बढ़ते कर्ज के बोझ तले दबे जा रहे हैं और इन राज्यों की अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही है। हाल ही के समय में पंजाब, केरल, राजस्थान, पश्चिम बंगाल एवं बिहार की वित्तीय सेहत बहुत बिगड़ी है।
सभी राज्यों की वित्तीय सेहत का विस्तार से आकलन करने पर ध्यान में आता है कि कई राज्यों द्वारा अनियंत्रित रूप से चलाई जा रही मुफ्त योजनाओं, लोकलुभावन घोषणाओं, अत्यधिक सब्सिडी देने एवं पुरानी पेंशन योजना बहाली से इन राज्यों की वित्तीय सेहत बहुत बुरी तरह से बिगड़ रही है। राज्य, विशेष रूप से सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से, कई लोकलुभावन घोषणाएं करते हैं जैसे कि बिजली एवं पानी मुफ्त में उपलब्ध कराने का वादा, उर्वरकों पर सब्सिडी प्रदान करने का वादा आदि जिसका सीधा असर राज्य की माली हालत पर पड़ता है। पंजाब की आर्थिक स्थिति पूर्व में ही बहुत गम्भीर अवस्था में पहुंच चुकी है फिर वहां नई सरकार ने किए गए चुनावी वादे अर्थात मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने के अपने वादे पर कार्य करना शुरू कर दिया है जिससे पंजाब की स्थिति निश्चित रूप से और अधिक बिगड़ने जा रही है और पंजाब को ऋण की किश्त एवं ऋणों पर ब्याज अदा करने हेतु भी ऋण लेना पड़ रहा है। किन परिस्थितियों में, कितने प्रकार की, कितनी और किस स्तर तक लोक लुभावन घोषणाएं की जानी चाहिए, इस सम्बंध में अब नियम बनाने का समय आ गया है।
विभिन्न राज्यों के वित्तीय घाटे की स्थिति एवं प्रवृत्ति पर गम्भीरता पूर्वक विचार कर इस पर रोक लगने का समय अब आ गया है। उत्पादक कार्यों पर सब्सिडी दी जाय तो ठीक है परंतु यदि यह लोक लुभावन वायदों को पूरा करने पर दी जा रही है तो इन पर अब अंकुश लगाया जाना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा आगे बढ़कर इस सम्बंध में कुछ नियम जरूर बनाए जाने चाहिए। यदि इन राज्यों की वित्तीय स्थिति लोक लुभावन घोषणाओं को पूरा करने की नहीं है तो, इस प्रकार की घोषणाएं चिन्हित राज्यों द्वारा नहीं की जानी चाहिए, ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए। सहायता की राशि केवल चिन्हित व्यक्तियों को ही प्रदान की जानी चाहिए न कि राज्य की पूरी जनता को उपलब्ध करायी जाय। जैसा कि बिजली माफी योजना के अंतर्गत किया जा रहा है। राज्य के समस्त परिवारों को 330 यूनिट बिजली मुफ़्त में उपलब्ध कराए जाने के प्रयास हो रहे हैं। यदि राज्य की आर्थिक हालत बिगड़ रही है तो इसका खामियाजा भी अंततः उस प्रदेश की जनता को ही भुगतना पड़ता है। यह राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, आदि मदों पर होने वाले खर्च में कटौती करते हैं, जो राज्य के आर्थिक विकास एवं भविष्य में आने वाली पीढ़ी के लिए ठीक नहीं है। राज्य में आर्थिक विकास की गति कम होने से इन राज्यों में रोजगार के अधिक अवसर भी निर्मित नहीं हो पा रहे है।
प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com
सिक्किम 13 से 16 नवंबर तक 13वें अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन हाट की मेजबानी करेगा
केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय 13 से 16 नवंबर 2025 तक सिक्किम की राजधानी गंगटोक में पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन हाट (आईटीएम- इंटरनेशनल टूरिज्म मार्ट) के 13वें संस्करण का आयोजन करने जा रहा है। इस हाट का उद्घाटन केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत सिक्किम के मुख्यमंत्री श्री प्रेम सिंह तमांग और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री पेमा खांडू, पूर्वोत्तर राज्यों के पर्यटन मंत्रियों और पर्यटन मंत्रालय एवं राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारियों की गरिमामयी उपस्थिति में करेंगे।
अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन हाट, पर्यटन मंत्रालय का एक प्रमुख वार्षिक आयोजन है। इसका उद्देश्य भारत की “अष्ट लक्ष्मी” नाम से मशहूर पूर्वोत्तर राज्यों की पर्यटन क्षमता को घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों के सामने प्रदर्शित करना है। यह हाट क्षेत्र की समृद्ध प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विविधता और साहसिक पर्यटन के अवसरों को उजागर करेगा। इसका साथ ही इसका लक्ष्य सतत और समावेशी पर्यटन विकास को बढ़ावा देना भी है। राजधानी गंगटोक में आयोजित होने वाला अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन हाट का यह 13वां संस्करण पूर्वोत्तर को पर्यावरण-पर्यटन, स्वास्थ्य, संस्कृति और साहसिक पर्यटन के लिए एक पसंदीदा गंतव्य के रूप में स्थापित करने की मंत्रालय की प्रतिबद्धता दर्शाता है।
गंगटोक में इस आयोजन का विशेष महत्व है। सिक्किम ने स्थायी और ज़िम्मेदार पर्यटन के एक आदर्श के रूप में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है। अपने प्राचीन प्राकृतिक दृश्यों, जैविक कृषि पद्धतियों, आध्यात्मिक विरासत और जीवंत स्थानीय संस्कृति के साथ सिक्किम समुदाय-आधारित और पर्यावरण को लेकर सचेत पर्यटन के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय पूरे देश में बढ़ावा देना चाहता है। यह हाट मंत्रालय की “जीवन के लिए यात्रा” पहल के अनुरूप आयोजित किया जा रहा है।
13वें अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन हाट में दुनिया भर से व्यापक भागीदारी देखने को मिलेगी, जिसमें स्पेन, थाईलैंड, फ्रांस, रूस, जर्मनी, वियतनाम और अन्य सहित लगभग 19 देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस आयोजन में 39 अंतर्राष्ट्रीय टूर ऑपरेटर, 5 अंतर्राष्ट्रीय प्रभावशाली व्यक्ति, 50 घरेलू खरीदार, 20 घरेलू प्रभावशाली व्यक्ति और ट्रैवल मीडिया, और 91 घरेलू विक्रेता शामिल होंगे। इस हाट में तकनीकी सत्रों, पैनल चर्चाओं, उत्पादों की प्रस्तुतियों और बीटूबी बैठकों की एक श्रृंखला आयोजित की जाएगी। इसका उद्देश्य घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन हितधारकों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है। राज्य पर्यटन अधिकारियों के साथ चर्चाएं सिनेमाई पर्यटन, होमस्टे, युवा उद्यमिता, डिजिटल नवाचार, स्थिरता और साहसिक पर्यटन पर केंद्रित होंगी।
इस आयोजन में पूर्वोत्तर की समृद्ध कलात्मक और प्रदर्शनकारी परंपराओं को दर्शाने वाले सांस्कृतिक प्रदर्शन भी शामिल होंगे, साथ ही गंगटोक और उसके आसपास के प्रमुख स्थलों जैसे रुमटेक मठ, दो द्रुल चोर्टेन और नामग्याल तिब्बती विज्ञान संस्थान के तकनीकी दौरे भी शामिल होंगे। उत्पादों की प्रस्तुतियां वन्यजीव और नदी परिभ्रमण पर्यटन, त्योहारों और समारोहों, विरासत और शिल्प, पाक परंपराओं और साहसिक अनुभवों जैसे विविध क्षेत्रों में पूर्वोत्तर क्षेत्र की संभावनाओं को उजागर करेंगी। इस आयोजन के बाद, अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू प्रतिभागियों के लिए पूर्वोत्तर राज्यों के विभिन्न स्थलों पर परिचयात्मक दौरे आयोजित किए जाएंगे ताकि उन्हें क्षेत्र की सांस्कृतिक और प्राकृतिक संपदा का प्रत्यक्ष अनुभव प्रदान किया जा सके।
इस प्रकार, गंगटोक में आयोजित 13वां अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन हाट पूर्वोत्तर के न केवल असाधारण प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता का उत्सव है, बल्कि इस क्षेत्र को एक वैश्विक पर्यटन केंद्र में बदलने के सरकार के दृष्टिकोण की भी पुष्टि करता है। अपने शांत परिदृश्यों, जीवंत समुदायों और स्थायित्व के प्रति अनुकरणीय प्रतिबद्धता के साथ, सिक्किम इस ऐतिहासिक आयोजन के लिए एक आदर्श पृष्ठभूमि प्रदान करता है, जो विविधता में एकता की भावना और पर्यटन से संचालित ज़िम्मेदार विकास के वादे का प्रतीक है।
उज्जैन में विक्रमोत्सव का आयोजन 15 फरवरी से
उज्जैनर। संभागायुक्त श्री आशीष सिंह की अध्यक्षता में विक्रमोत्सव 2026 की पूर्व तैयारियों के संबंध में बैठक आयोजित हुई। बैठक में महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ, स्वराज संस्थान संचालनालय, संस्कृति विभाग एवं उज्जैन जिला प्रशासन के सहयोग से विक्रमोत्सव 2026 के आयोजन किए जाने पर चर्चा की गईं।
बैठक में संभागायुक्त श्री सिंह द्वारा निर्देश दिए गए कि विक्रमोत्सव 2026 के पूर्व घाटों की साफ-सफाई, घाट स्थित मंदिरों की रंगाई-पुताई और साज-सज्जा सुनिश्चित की जाए।
संभागायुक्त श्री सिंह ने विक्रमोत्सव अंतर्गत आयोजित हथकरघा एवं टेक्सटाइल प्रदर्शनी के समन्वय के लिए जिला पंचायत सीईओ श्री श्रेयांस कूमट को निर्देशित किया।
बैठक में महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के निदेशक श्री श्रीराम तिवारी ने जानकारी दी कि विक्रमोत्सव 2026 की शुरुआत 15 फरवरी 2026 से होगी। विक्रमोत्सव 2026 अंतर्गत 15 फरवरी 2026 से विक्रम व्यापार मेला भी आयोजित किया जाएगा।
निर्धारित कार्यक्रमानुसार 15 फरवरी 2026 को अनादिदेव शिव की कलाओं का शिवार्चन (प्रदेश के सभी शिवरात्रि मेलों का समारंभ) किया जाएगा। प्रात: 11 बजे भव्य कलश यात्रा निकाली जाएगी। इसके पश्चात विक्रमोत्सव 2026 का शुभारंभ कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जिसमें शंकर महादेवन, एहसान, लॉय, विशाल मिश्रा, सोनू निगम, प्रीतम के द्वारा प्रस्तुति दी जाएगी।
साथ ही बहुलोकप्रिय कलाकारों द्वारा “शिवोहम” की प्रस्तुति दी जाएगी। इस दौरान विक्रमादित्य और अयोध्या, आर्ष भारत, 84 महादेव, जनजातीय देवलोक (रेपलिका का निर्माण) पर आधारित प्रदर्शनी लगाई जाएगी।
15 फरवरी को ही इंजीनियरिंग कॉलेज परिसर में विक्रम व्यापार मेले का शुभारंभ किया जाएगा। मेले में फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज, विभिन्न माध्यमों के पारंपरिक शिल्पों का मेला, हथकरघा एवं टेक्सटाइल प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी।
22 फरवरी से 2 मार्च तक विक्रम नाट्य समारोह का आयोजन किया जाएगा, जिसमें राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रस्तुतियां दी जाएंगी।
27 फरवरी से 18 मार्च तक उज्जैन हाट बाजार में स्थानीय सांस्कृतिक मंडलियों की प्रतिदिन प्रस्तुति दी जाएगी। इस दौरान शिल्प कार्यशाला और मालवी कलम कार्यशाला का आयोजन भी किया जाएगा।
28 फरवरी से 1 मार्च तक विक्रमादित्य के न्याय का वैचारिक समागम आयोजित किया जाएगा। 7 मार्च को स्थानीय बोलियों का अखिल भारतीय कवि सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जिसमें सम्राट विक्रमादित्य पर केंद्रित रचनाओं का समावेश भी होगा।
13 मार्च से 17 मार्च तक पौराणिक फिल्मों का अंतरराष्ट्रीय महोत्सव आयोजित किया जाएगा। 17 और 18 मार्च को महाकाल पृथ्वी का समय – शोध संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा।
19 मार्च को सृष्टि आरंभ दिवस (नववर्ष प्रतिपदा) के अवसर पर उज्जैन का गौरव दिवस मनाया जाएगा। इस दिन प्रात: काल रामघाट और दत्त अखाड़ा घाट पर सूर्योपासना की जाएगी।
प्रदेश के सभी जिलों में विक्रमोत्सव का आयोजन किया जाएगा। 19 मार्च को शाम 7 बजे, मुख्य कार्यक्रम शिप्रा नदी के तट पर आयोजित किया जाएगा। समारोह में सम्राट विक्रमादित्य अलंकरण दिए जाएंगे। साथ ही विक्रम पंचांग 2082-83 और आर्ष भारत के द्वितीय संस्करण का लोकार्पण किया जाएगा।
कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध कलाकार मोहित चौहान, सुनिधि चौहान और शंकर महादेवन के द्वारा सांगीतिक प्रस्तुति दी जाएगी। रामघाट पर भव्य आतिशबाजी भी की जाएगी।
19 मार्च से जल गंगा संवर्धन अभियान का शुभारंभ होगा, जिसमें प्रदेश के सभी जिलों में कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। सभी जिलों में पर्यावरण, जलीय संरचनाओं के संरक्षण और संवर्धन पर केंद्रित गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा। यह अभियान 30 जून तक पूरे प्रदेश में चलेगा।
23 और 24 मई को भोपाल में 2 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय जल सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा। 25 मई को गंगा दशहरा के अवसर पर शिप्रा नदी के तट पर मुख्य कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जिसमें प्रतिष्ठित कलाकारों द्वारा सांगीतिक प्रस्तुति दी जाएगी।
30 जून को विक्रमोत्सव और जल गंगा संवर्धन अभियान का समापन समारोह आयोजित किया जाएगा।
बैठक में कलेक्टर श्री रौशन कुमार सिंह, पुलिस अधीक्षक श्री प्रदीप शर्मा, नगर निगम आयुक्त श्री अभिलाष मिश्रा, जिला पंचायत सीईओ श्री श्रेयांस कूमट, अपर कलेक्टर श्री अत्येंद्र सिंह गुर्जर, एसडीएम श्री पवन बारिया, श्री संजय अग्रवाल, श्री राजेश कुशवाह, श्री नरेश शर्मा, श्री रवि सोलंकी, श्री रमण सोलंकी एवं अन्य विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।