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स्व. उमाकांत वाजपेयी के व्यक्तित्व में कई आयाम थे

मुम्बई के सुप्रसिद्ध हिंदीसेवी डॉ उमाकांत बाजपेयी की श्रद्धांजलि सभा अभूतपूर्व थी। उनकी पावन स्मृतियों पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन रविवार 9 नवंबर 2025 को जुहू के मिलेनियम क्लब में किया गया। भारी तादाद में रचनाकारों, पत्रकारों और कलाकारों ने डॉ उमाकांत बाजपेयी को श्रद्धा सुमन अर्पित किए और उनकी विशिष्ट उपलब्धियां को याद किया। इनमें उद्घोषक हरीश भिमानी, अभिनेता विष्णु शर्मा, भक्तकवि नारायण अग्रवाल, गायक उदित नारायण, पूर्व गृह राज्यमंत्री कृपाशंकर सिंह, पत्रकार अभिजीत राणे, आचार्य पवन त्रिपाठी और आशीर्वाद के चेयरमैन ब्रजमोहन अग्रवाल जैसे कई प्रतिष्ठित लोग शामिल थे।
डॉ उमाकांत बाजपेयी की सुपुत्रियों निरूपमा बाजपेई, नीता बाजपेई और संगीता बाजपेयी ने उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया।श्रद्धांजलि सभा का संचालन पत्रकार राजेश विक्रांत ने किया। उल्लेखनीय है कि मुंबई की प्रमुख साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्था आशीर्वाद के संस्थापक, सुप्रसिद्ध हिन्दीसेवी डॉ उमाकांत बाजपेयी अपनी सांसारिक यात्रा पूर्ण कर गुरुवार 6 नवंबर 2025 को प्रभु चरणों में लीन हो गए थे।
डॉ. उमाकांत बाजपेयी का व्यक्तित्व बहुआयामी था।सन् 1969 से मुंबई में उन्होंने आशीर्वाद नाम की पत्रिका का प्रकाशन तथा सन् 1977 से ‘आशीर्वाद’ साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक संस्था का शुभारंभ किया। देश-विदेश के हिन्दी सेवियों को पुरस्कृत व सम्मानित करने की उनकी यात्रा अनवरत जारी रही।
राजेश विक्रांत ने बताया कि डॉ उमाकांत बाजपेयी ने आशीर्वाद के पुरस्कृत एकांकी, मुंबई के हिन्दी कवि तथा मुंबई की हिन्दी कवयित्रियां पुस्तकों का संपादन किया। एक लेखक के रूप में उनके चार कहानी संग्रह प्रकाशित हैं- 1.एक था नर एक थी मादा, 2. एक सोने का मृग, 3.बैंड बाजा बुलेट और 4. जय राम जी की।
डॉ उमाकांत बाजपेई ने सन् 1974 एवं 1978 में अखिल भारतीय लेखक सम्मेलन का आयोजन किया। सन् 1978 से पच्चीस वर्षों तक लगातार आशीर्वाद फ़िल्म अवार्ड का आयोजन किया। सन् 1991 से हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु आशीर्वाद राजभाषा पुरस्कार का शुभारंभ किया जो 33 वर्षों से जारी है। सन् 2012 में 24 घंटे चलने वाले अखंड कवि सम्मेलन का आयोजन किया। वर्ष 2019 में आशीर्वाद की स्वर्ण जयंती मनायी गयी जिसमें 50 विविध आयामी लोगों को पुरस्कृत किया गया।
डॉ उमाकांत बाजपेयी ने अपना पूरा जीवन हिन्दी का साथ, हिन्दी का विकास और हिन्दी पर विश्वास के लिए समर्पित किया था। वे एक कर्मठ हिन्दी सेवी के रुप में हमेशा याद किए जाएंगे।

झूठ बोलने की संस्कृति हमारे पतन का कारण बन रही है

भारतवर्ष मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का देश है जिन्होंने सत्य मार्ग पर चलकर तपस्वी राजा के रुप में अपना त्यागी जीवन बिताया।यह भारतवर्ष शांतिदूत भगवान श्रीकृष्ण का देश है। यह देश भगवान गौतम बुद्ध का देश है। यह देश ऋषि-मुनियों का देश है।यह देश सत्य,अहिंसा और त्याग के अमर पुजारी महात्मा गांधी का देश है।इस देश में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का आगमन हुआ जिनके विषय में कहा गया है-

सत्यासक्त दयालु द्विज, प्रिय अघहर सुखकंद।
जनहित कमलातजन जय,शिव नृप कवि हरिचन्द।।

भारतीय गौरवशाली गुरुकुल परम्परा के तहत राजकुमारों को गुरुसेवा करने,सत्य बोलने और सदाचारी जीवन जीने की ही शिक्षा-दीक्षा दी जाती रही है। हमारी सनातनी वर्ण(जाति)-व्यवस्था में भी ब्राह्मण,क्षत्रीय,वैश्य और शुद्र को क्रमशः विवेक,साहस,उत्पादन और सेवा क्षमताओं के आधार पर  सत्य मार्ग पर चलने का पावन संदेश निहित है।

यही नहीं,श्रीरांम-रावण युद्ध में श्रीराम ने सत्य के ही मार्ग का अनुसरण किया।श्रीकृष्ण ने दुराचारी कंस के वध में सत्य का ही मार्ग चुना।भारतवर्ष के एकमात्र धर्म-युद्ध,महाभारत युद्ध में भी शांतिदूत श्रीकृष्ण ने गाण्डीवधारी अर्जुन को सत्य मार्ग पर ही चलने का अमर संदेश दिया।

हमारे अमर धर्मग्रंथः रामायण, श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भागवत पुराण और श्रीमद् भागवत गीता में भी समस्त भारतवासियों को सत्य को अपनाने का अमर संदेश है। लेकिन आजाद भारत में आज-कल झूठ बोलने की संस्कृति का ही बोलबाला स्पष्ट रुप से नजर आती है।

झूठ ही लेना,झूठ ही देना।
झूठ ही भोजन,झूठ चबेना।।
ऐसे में,यह कहना गलत नहीं होगा कि आज राजा(शासक)-प्रजा(आम जनता),ब्राह्मण,क्षत्रीय,वैश्य और शूद्र सभी अकारण गर्व से और शौक से झूठ बोलते नजर आते हैं। हमारे कुछ शिक्षकगण,कुछ युवावर्ग, कुछ छोटे-छोटे बच्चे,कुछ किसान,कुछ मजदूर, कुछ नौकरशाह,कुछ कर्मचारी,कुछ कारोबारी,सभी प्रकार के सेवकगण आदि शौक से झूठ बोलते नजर आते हैं।

मुझे यह जानकारी देते हुए अत्यंत दुख हो रहा है कि कुछ ऐसे कथाव्यास भी हैं जो अपने व्यासपीठ की मर्यादा का ध्यान न रखकर,बोधात्मक कथा न सुनाकर अपने आचार-विचार और व्यवहार में झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा देते नजर आते हैं।

डॉक्टरों को दूसरा भगवान माना जाता रहा है उनमें से कुछ डॉक्टर आजकल अपनी दिनचर्या में झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं।बाजार में चले जाइए,दुकानदार से लेकर ग्राहक तक बड़ी ईमानदारी से झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा देते नजर आ रहे हैं।

हमारे वकील समुदाय में कुछ तो झूठ बोलने की संस्कृति को अपनी दिनचर्या बना लिए हैं। उन्हें आज  अपने आपको बचाने की जरुरत है जिससे हमारी न्याय व्यवस्था की मर्यादा पर लोगों का विश्वास कायम हो सके।

आज समाज का कोई भी वर्ग ऐसा नहीं है जो झूठ बोलने की संस्कृति से बचा हो।इसीलिए आज सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीना तथा सत्यनिष्ठ बनकर अपना कार्य करना तो असंभव –सा नजर आता है।

आज झूठ बोलने की गलत संस्कृति से स्वयं को बचाने के लिए तथा भारतवर्ष को विकासशील से विकसित बनाने के लिए कबीरदास की इस  साखी के संदेश को अक्षरशःअपनाने की जरुरत है-

सांच बराबर तप नहीं,
झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै सांच है,
ताके हिरदै आप।।

-अर्थात् सत्य बोलने जैसी कोई तपस्या नहीं है और झूठ बोलने जैसा कोई पाप नहीं है। जो व्यक्ति सच बोलता है उसी के हृदय में ईश्वर का वास होता है।

इस झूठ बोलने की आज की संस्कृति जिस प्रकार व्यक्ति विशेष से लेकर पूरे भारतवर्ष के अधिसंख्यक लोगों में पल्लवित-पुष्पित हो रही है उसपर अंकुश लगाने के लिए,समस्त भारतवासी को इस संक्रामक झूठ संस्कृति से बचने के लिए गंभीरतापूर्वक चिंतन-मनन करने की जरुरत है। भारतवर्ष के सभी बच्चों व युवाओं में सत्य-संस्कार और सत्य-संस्कृति को अपनाने का संदेश देना होगा।हमें अपने आचार-विचार,व्यवहार और आचरण में सत्य को अपनाने की आवश्यकता है।बाल मनोविज्ञान के अनुसार बच्चों में अनुकरण की प्रवृति सबसे अधिक होती है।

करुणा एवं संवेदनाओं से ही दुनिया में संतुलन संभव

विश्व करुणा  दिवस -13 नवम्बर, 2025

आज का मनुष्य जितनी तीव्रता से भौतिक प्रगति कर रहा है, उतनी ही तेजी से मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं से दूर होता जा रहा है। विज्ञान ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, परंतु उसने मनुष्य को आत्मकेंद्रित भी कर दिया है। प्रतिस्पर्धा, उपभोगवाद, स्वार्थ और सत्ता की भूख ने मनुष्य के भीतर की दयालुता को जैसे कुंद कर दिया है। ऐसे समय में जब विश्व हिंसा, आतंक, युद्ध, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और वैमनस्य के दौर से गुजर रहा है, तब “विश्व दयालुता दिवस” मनाने का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सभ्यता के विकास की असली पहचान तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की करुणा, सहानुभूति और प्रेम से होती है। दयालुता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। यह मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाकर देवत्व की ओर ले जाती है। इतिहास साक्षी है कि जिन समाजों ने दया, करुणा और प्रेम को अपनाया, वहीं शांति और समृद्धि का आधार बने। बुद्ध, महावीर, यीशु और गांधी जैसे महापुरुषों ने दया को जीवन की सबसे बड़ी साधना माना। महात्मा गांधी ने कहा था, “अहिंसा कोई निष्क्रिय वस्तु नहीं, यह सबसे सक्रिय और जीवंत शक्ति है।” दयालुता उसी अहिंसा की आत्मा है, जो मनुष्य को दूसरों के सुख-दुःख से जोड़ती है।
आज जब दुनिया में युद्ध की विभीषिका मंडरा रही है, जब समाज हिंसा, कट्टरता और असहिष्णुता से आक्रांत है, तब दया और करुणा का महत्त्व केवल नैतिकता का विषय नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। यूक्रेन-रूस युद्ध, गाजा और इस्राइल का संघर्ष, आतंकवाद की विभीषिका और भीतर तक उतर चुकी नफरत की राजनीति-ये सब इस बात के संकेत हैं कि हमने दयालुता को अपने जीवन से बाहर कर दिया है। मनुष्य ने मशीनों की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया है। संवेदना की जगह संदेह ने ले ली है, और करुणा की जगह क्रूरता ने। ऐसे में विश्व दयालुता दिवस केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है कि क्या हम अब भी मनुष्य बचे हैं या केवल उपभोग की दौड़ में शामिल यांत्रिक प्राणी बन गए हैं।
विश्व दयालुता दिवस मनाने की पहल सबसे पहले 1998 में “वर्ल्ड काइंडनेस मूवमेंट” नामक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने की थी, जिसका उद्देश्य था-मानवता में करुणा, सहानुभूति और प्रेम के बीजों को फिर से सींचना। इस दिन का मकसद यह स्मरण कराना है कि दया कोई एक दिन की बात नहीं, बल्कि जीवन का स्थायी संस्कार होना चाहिए। दयालुता एक ऐसी भाषा है जो सभी सीमाओं, धर्मों, भाषाओं और विचारधाराओं से परे है। यह वह सूत्र है जो मनुष्यता को जोड़ता है, जो टूटे हुए रिश्तों में प्राण फूंकता है। आज की दुनिया में भौतिक विकास ने व्यक्ति को आराम तो दिया है, लेकिन आत्मिक शांति छीन ली है। हर कोई सफलता की होड़ में है, पर किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है। परिवारों में संवाद घट गया है, समाज में सहयोग की भावना कम हुई है, और राजनीति में विरोध ने वैमनस्य का रूप ले लिया है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस युग में हम जुड़ते तो बहुत हैं, पर वास्तव में अलग-थलग पड़ गए हैं। दया और करुणा की कमी के कारण मानसिक तनाव, अवसाद, आत्महत्या और असंतोष जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। इस स्थिति से उबरने का एकमात्र उपाय है-दयालुता की भावना को जीवन का आधार बनाना।
दयालुता केवल दूसरों के प्रति व्यवहार नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का माध्यम है। जब हम किसी की सहायता करते हैं, किसी के दुःख को समझते हैं, किसी की भूल को माफ करते हैं, तब हम अपने भीतर की नकारात्मकता को भी दूर करते हैं। दयालु व्यक्ति न केवल समाज को सुंदर बनाता है, बल्कि स्वयं के भीतर भी शांति का अनुभव करता है। करुणा से मनुष्य का हृदय विस्तृत होता है, दृष्टि उदार होती है, और जीवन में संतुलन आता है। आज की जटिल दुनिया में संतुलन खोना बहुत आसान है। मनुष्य अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं में उलझकर आत्मविनाश की ओर बढ़ रहा है। पर्यावरण का संकट, सामाजिक विषमता, नैतिक पतन-ये सब उसी असंतुलन के परिणाम हैं, जहाँ दयालुता और करुणा का स्थान स्वार्थ और लोभ ने ले लिया है।
यदि मनुष्य में करुणा का भाव जाग जाए, तो न युद्ध रहेगा, न आतंकवाद, न हिंसा। दुनिया में जितनी भी क्रूरताएं हुई हैं, वे दया के अभाव से हुई हैं। अतः दया केवल नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि विश्व शांति का आधार है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-“जब तक एक भी जीव भूखा या दुखी है, तब तक तुम्हारी उपासना अधूरी है।” यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि सच्चा धर्म केवल पूजा या प्रार्थना नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति करुणा का भाव है। यदि दयालुता जीवन का हिस्सा बन जाए, तो धर्म अपने वास्तविक रूप में प्रकट होता है। चाहे वह जैन धर्म का “अहिंसा परमो धर्मः” का संदेश हो या बौद्ध धर्म की “मैत्री भावना”, सभी ने दया को ही मानवता की सर्वाेच्च साधना माना है।
वास्तव में दया का अर्थ केवल किसी पर कृपा करना नहीं है, बल्कि दूसरों के दुख को अपना समझना है। दया एक ऐसी ऊर्जा है जो न केवल संबंधों को मजबूत बनाती है, बल्कि समाज में सह-अस्तित्व की भावना को भी जन्म देती है। आज जब मनुष्य अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष कर रहा है, तो दया ही वह सूत्र है जो जीवन में संतुलन और अर्थ दोनों ला सकती है। हम देख रहे हैं कि दुनिया में तकनीकी शक्ति बढ़ रही है, परंतु नैतिक और भावनात्मक शक्ति घट रही है। युद्ध और हिंसा से किसी का भला नहीं होता। दया और करुणा से ही समाज टिकता है, सभ्यता बचती है, और मनुष्य अपने भीतर के अंधकार को पहचान पाता है। विश्व दयालुता दिवस इसलिए हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या हमारे जीवन में दयालुता का स्थान बचा है? क्या हम अपने व्यवहार में दूसरों के सुख-दुःख के प्रति संवेदनशील हैं?
दयालुता की शुरुआत बहुत छोटे-छोटे कार्यों से होती है-किसी की सहायता करना, किसी के प्रति मधुर बोल कहना, किसी की गलती को क्षमा करना, या किसी जरूरतमंद की मदद करना। इन छोटे प्रयासों से बड़े बदलाव संभव हैं। यही छोटे कदम मिलकर समाज में बड़ी करुणा की लहर पैदा करते हैं। जैसे एक दीपक अंधकार को मिटा देता है, वैसे ही एक दयालु कर्म हजारों हृदयों में प्रकाश फैला सकता है। आज जब दुनिया को हथियारों से नहीं, दिलों से जीतने की जरूरत है, तब दयालुता को जीवन का आधार बनाना सबसे बड़ी मानव सेवा है। करुणा वह सेतु है जो टूटे हुए संबंधों को जोड़ती है, घृणा को प्रेम में बदलती है और संघर्ष को सहयोग में परिवर्तित करती है। यही संतुलित, शांत और सुंदर जीवन की दिशा है। इसलिए विश्व दयालुता दिवस कोरा आयोजनात्मक न होकर प्रयोजनात्मक होना चाहिए, यह दिवस एक प्रेरणा है कि हम फिर से मनुष्य बनें, अपने भीतर की करुणा को जगाएं और दुनिया को प्रेम व सहानुभूति से भर दें। जब हम दूसरों के प्रति दयालु बनते हैं, तो हम न केवल समाज में शांति फैलाते हैं, बल्कि अपने भीतर भी दिव्यता का अनुभव करते हैं। यही दया का वास्तविक चमत्कार है-जो जीवन को संतुलित बनाता है और दुनिया को फिर से मानव बनाता है।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

भारतीय राजमार्गों का नया रूप

भारत के राजमार्ग योजना निर्माण से लेकर टोल संग्रह तक हर चरण के डिजिटलीकरण के साथ बदल रहे हैं। इससे उनका भौतिक और डाटा संचालित, दोनों तरह की संपदा में परिवर्तन हो रहा है।  फास्टैग ने देश की इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह प्रणाली को एक क्रांतिकारी स्वरूप दिया है। लगभग 98 प्रतिशत वाहन फास्टैग का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसके उपयोगकर्ताओं की संख्या 8 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है।  राजमार्गयात्रा ऐप को 15 लाख से ज्यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है। यह यात्रियों के समग्र अनुभव को संवर्द्धित करने वाला भारत का चोटी का राजमार्ग यात्रा ऐप है।

डिजिटल क्रांति के इस युग में भारत के राजमार्ग सिर्फ कोलतार और कंक्रीट की बिछावन नहीं रहे हैं। ये गतिशीलता और डाटा की कुशल रीढ़ के तौर पर उभर रहे हैं। ये बाधारहित परिवहन और समय पर सूचना प्रवाह को संभव बना रहे हैं। स्मार्ट नेटवर्क का दृष्टिकोण हमारे यात्रा, माल ढुलाई, टोल प्रबंधन और यहां तक कि सफर के दौरान इंटरनेट के तौरतरीकों को नया स्वरूप दे रहा है। एक समय में राजमार्गों को सिर्फ शहरों और राज्यों को भौतिक रूप से जोड़ने वाला साधन माना जाता था। लेकिन अब उनकी कल्पना संयोजकता और नियंत्रण के स्मार्ट गलियारों के तौर पर की जा रही है। इन्हें सिर्फ वाहनों ही नहीं, बल्कि डाटा, संचार और समय पर निर्णय निर्धारण के लिए भी डिजाइन किया जा रहा है।

यह परिवर्तन राजमार्गों के नेटवर्क जैसा ही व्यापक है। मार्च 2025 में भारत की सड़कों का नेटवर्क 63 लाख किलोमीटर से भी ज्यादा था। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क है। राष्ट्रीय राजमार्गों का नेटवर्क 2013-14 में 91287 किलोमीटर से लगभग 60 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि के साथ 146204 किलोमीटर हो गया है। देश ने 2014 और 2025 के बीच 54917 किलोमीटर नए राष्ट्रीय राजमार्ग जोड़े हैं।1 यह उपलब्धि सिर्फ निर्माण के कौशल को ही नहीं दिखाती है। यह डिजिटल साधनों से प्रबंधन और इस विशाल संपदा की निगरानी की जरूरत को भी दर्शाती है।2 सरकार ने कार्यकुशलता बढ़ाने और कामकाज को सुचारू बनाने के उद्देश्य से राजमार्ग परियोजना के जीवनचक्र के सभी महत्वपूर्ण चरणों में व्यापक आमूलचूल डिजिटल कायाकल्प को अपनाया है। योजना और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) से लेकर निर्माण, रखरखाव, टोल संग्रह और नेटवर्क उन्नयन तक मुख्य प्रक्रियाओं को सुचारू बनाया जा रहा है ताकि प्रणाली के कामकाज में सुधार आए और व्यवसाय सुगमता को बढ़ावा मिले।

कागजी रसीद और नकदी खिड़कियों से अवरोध रहित सेंसर संचालित यात्रा तक भारतीय राजमार्गों में एक खामोश क्रांति आ रही है। देश की टोल संग्रह प्रणाली को डिजिटल समाधानों के जरिए दुरुस्त किया जा रहा है ताकि इंतजार का समय और ईंधन की बर्बादी घटे तथा राजस्व की हानि बंद हो।

भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने भारत के सभी राजमार्गों पर टोल संग्रह को सुचारू बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह (एनईटीसी) कार्यक्रम विकसित किया है। यह इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह के लिए एकीकृत और अंतरसंचालनीय प्लेटफॉर्म है। यह प्रणाली निपटान और विवाद समाधान के लिए एक केंद्रीकृत क्लियरिंग हाउस के जरिए बाधारहित लेन-देन की सुविधा प्रदान करती है।

एनईटीसी के केंद्र में वाहन के अगले शीशे पर चिपकाया जाने वाला रेडियो फ्रिक्वेंसी पहचान (आरएफआईडी) उपकरण, फास्टैग है। इससे वाहनों को टोल केंद्रों पर रुकना नहीं पड़ता और भुगतान उपयोगकर्ता के फास्टैग से जुड़े खाते से खुद-ब-खुद हो जाता है। बूथ का प्रबंधन किसी के भी पास हो, देश के सभी टोल केंद्रों पर एक ही फास्टैग से भुगतान किया जा सकता है।

 देश में लगभग 98 प्रतिशत वाहन फास्टैग का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसके उपयोगकर्ताओं की संख्या 8 करोड़ से ज्यादा है। फास्टैग ने देश भर में इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह प्रणाली का कायाकल्प कर दिया है।

फास्टैग का वार्षिक पास भारत के राजमार्गों पर निर्बाध यात्रा की सहूलियत देता है। गैरवाणिज्यिक वाहनों के इस पास का उपयोग राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर बने 1150 टोल केंद्रों को पार करने के लिए किया जा सकता है। सिर्फ एक बार 3000 रुपए का भुगतान कर इस पास के जरिए साल भर या 200 बार टोल केंद्रों को पार करने की असीमित सुविधा मिलती है। इस पास को राजमार्गयात्रा ऐप या एनएचएआई की वेबसाइट के जरिए सिर्फ दो घंटों में सक्रिय किया जा सकता है। इस पास से फास्टैग को बार-बार रिचार्ज करने की बाध्यता खत्म हो जाती है और राजमार्ग उपयोगकर्ताओं के लिए अवरोध रहित और कुशल यात्रा अनुभव सुनिश्चित होता है।
25 लाख से ज्यादा उपयोगकर्ता फास्टैग वार्षिक पास का उपयोग कर रहे हैं। देश भर में 15 अगस्त 2025 को शुरू किए जाने के बाद दो महीनों में इनके जरिए 5.76 करोड़ लेन-देन रिकॉर्ड किए गए। इससे बाधा रहित टोल भुगतान की मजबूत मांग का पता चलता है।

सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और टोल प्लाजा पर नकद लेनदेन को कम करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क नियम, 2008 में संशोधन किया है जो 15 नवंबर, 2025 से प्रभावी होगा। संशोधित नियमों के तहत, नकद में टोल का भुगतान करने वाले गैर-फास्टैग उपयोगकर्ताओं से मानक शुल्क का दोगुना शुल्क लिया जाएगा, जबकि यूपीआई भुगतान का विकल्प चुनने वालों को टोल राशि का 1.25 गुना भुगतान करना होगा। इसका उद्देश्य टोल संग्रहण को सुव्यवस्थित करना, भीड़-भाड़ को कम करना, अधिक पारदर्शिता लाना और राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवागमन को आसान बनाना है।6

अगस्त 2025 में, भारत ने गुजरात में एनएच-48 पर चौरासी फ़ी प्लाज़ा पर अपना पहला मल्टी-लेन फ्री फ़्लो (एम्एलएफएफ) टोलिंग सिस्टम लॉन्च किया। यह एक बाधा-मुक्त, कैमरा-और आरएफआईडी-आधारित सेटअप है जो चलते हुए वाहनों के फास्टटैग और वाहन संख्याएँ पढ़ सकता है। इस सिस्टम में वाहनों को रोके बिना निर्बाध टोल संग्रह किया जा सकता है जिससे भीड़भाड़ कम होती है, ईंधन की बचत होती है और उत्सर्जन कम होता है।7

भारत भर में राजमार्ग यात्रा को नए सिरे से परिभाषित करने के प्रयास में सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर यात्रियों के समग्र अनुभव को बेहतर बनाने के उद्देश्य से एक नागरिक-केंद्रित मोबाइल एप्लिकेशन, ‘राजमार्गयात्रा’ शुरू किया है। उपयोगकर्ता की सुविधा को ध्यान में रखकर विकसित किया गया यह ऐप, एक वेब-आधारित प्रणाली के साथ वास्तविक समय में अपडेट देता है और बेहतर ढंग से शिकायत निवारण करता है।

राजमार्गयात्रा एक डिजिटल सहयात्री के रूप में कार्य करता है, जो राजमार्गों, टोल प्लाज़ा, आस-पास की सुविधाओं (जैसे पेट्रोल पंप, अस्पताल, इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन) और यहाँ तक कि मौसम की लाइव अपडेट जैसी विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। यह व्यापक डेटा नागरिकों को यात्रा संबंधी निर्णय लेने और अपनी यात्रा की योजना अधिक प्रभावी ढंग से बनाने में मदद करता है।

एक सुगम ड्राइविंग अनुभव प्रदान करने के लिए, ऐप को बिना किसी परेशानी के टोल भुगतान के लिए फास्टटैग सेवाओं के साथ जोड़ा गया है और यह कई भाषाओं में जानकारी दे सकता है, जिससे इसकी पहुँच का दायरा बढ़ जाता है। सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए, इस ऐप में गति सीमा अलर्ट और स्वर सहायता (वॉइस असिस्टेंस) की सुविधा भी है, जो लंबी सड़कों पर ज़िम्मेदार ड्राइविंग को प्रोत्साहित करता है।
इस प्लेटफ़ॉर्म की एक ख़ास विशेषता इसकी उपयोगकर्ताओं के अनुकूल शिकायत प्रणाली है। यात्री राजमार्गों पर आने वाली समस्याओं, जैसे सड़कों के गड्ढों, रखरखाव संबंधी दिक्कतों, अनधिकृत ढाँचों या सुरक्षा संबंधी खतरों की शिकायत जियो-टैग की गई फ़ोटो या वीडियो अपलोड करके तुरंत कर सकते हैं और साथ ही अपनी शिकायतों पर की गई कार्रवाई पर नज़र भी रख सकते हैं। इससे न केवल जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि सड़कों के बुनियादी ढाँचे के प्रबंधन में पारदर्शिता भी बढ़ेगी।

राजमार्गयात्रा ऐप भारतीय यात्रियों के बीच बहुत तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है। इस ऐप ने गूगल प्ले स्टोर पर समग्र रैंकिंग में 23वें स्थान पर पहुँचकर और यात्रा श्रेणी में दूसरा स्थान हासिल किया है। 15 लाख से ज़्यादा डाउनलोड और 4.5 स्टार की प्रभावशाली उपयोगकर्ता रेटिंग के साथ, यह ऐप देश भर के राजमार्ग यात्रियों के लिए एक लोकप्रिय डिजिटल टूल के रूप में उभरा है।

 राजमार्गयात्रा ऐप, फास्टैग वार्षिक पास सुविधा के शुरू होने के सिर्फ़ चार दिन बाद ही शीर्ष प्रदर्शन करने वाला सरकारी ऐप बन गया, जो इसके उपयोग और प्रभाव की एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।
प्रक्रिया संबंधी कार्यकुशलता को बढ़ावा देने और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के समय पर पूरा होने के लिए, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने ‘एनएचएआई वन’ मोबाइल एप्लिकेशन शुरू किया है, जो एक ऐसा व्यापक प्लेटफार्म है जो आंतरिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करता है और राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क में जमीनी स्तर पर तालमेल बढ़ाता है। ‘एनएचएआई वन’ ऐप में एनएचएआई के परियोजना संचालन के पाँच प्रमुख क्षेत्रों जैसे फील्ड स्टाफ की उपस्थिति, राजमार्ग रखरखाव, सड़क सुरक्षा ऑडिट, शौचालय रखरखाव, और निरीक्षण अनुरोध (आरएफआई) के माध्यम से दैनिक निर्माण ऑडिट को जोड़ा गया है। इन कार्यों को एक ही डिजिटल इंटरफ़ेस में एकीकृत करके, यह ऐप फील्ड टीमों और पर्यवेक्षी कर्मियों के कार्यों को अधिक प्रभावी ढंग से और वास्तविक समय में प्रबंधन करने में सक्षम बनाता है।

यह ऐप क्षेत्रीय अधिकारियों (आरओ) और परियोजना निदेशकों (पीडी) से लेकर ठेकेदारों, इंजीनियरों, सुरक्षा लेखा परीक्षकों और टोल प्लाज़ा पर शौचालय पर्यवेक्षकों तक, अंतिमउपयोगकर्ता को सीधे क्षेत्र से परियोजना-संबंधी गतिविधियों की रिपोर्ट करने, उन्हें अपडेट करने और उनपर नज़र रखने में सक्षम बनाता है। जियो-टैगिंग और टाइम-स्टैम्पिंग जैसी सुविधाओं के साथ, ‘एनएचएआई वन’ जवाबदेही बढ़ाता है और साइट पर प्रगति और अनुपालन का सटीक दस्तावेज़ीकरण सुनिश्चित करता है। आंतरिक कार्यकुशलता में सुधार के अलावा, यह ऐप बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दों पर तेजी से प्रतिक्रिया देने और राजमार्ग विकास योजनाओं के सुचारू रूप से कार्यान्वयन को सक्षम करके परियोजना के निर्माण और सार्वजनिक सेवा वितरण के बीच की खाई को पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।10

डिजिटल मानचित्र और स्थानिक प्रतिभा राजमार्गों की परिकल्पना और निर्माण के तरीके को नया रूप दे रहे हैं। यह बदलाव भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और सरकार की प्रमुख पहल, पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (एनएमपी) के बीच तालमेल से हुआ है। भारत में अवसंरचना के विकास, खासकर राजमार्गों के लिए तेज़ी से डिजिटल कमांड सेंटर बनता जा रहा एनएमपी पोर्टल, एकीकृत, बहु-मॉडल कनेक्टिविटी के लिए एक व्यापक डिजिटल एटलस के रूप में कार्य करता है। इसके मूल में एक शक्तिशाली जीआईएस-आधारित प्लेटफ़ॉर्म है जो आर्थिक समूहों, लॉजिस्टिक्स केंद्रों, सामाजिक बुनियादी ढाँचे, पर्यावरणीय विशेषताओं आदि सहित 550 से अधिक लाइव डेटा स्तरों को होस्ट करता है।

 इतनी स्पष्टता के बाद,  सड़कों के निर्माण की योजना, न्यूनतम व्यवधान, कार्यकुशलता और तीव्र स्वीकृति के साथ बनाई जा सकती है।

एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने संपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क (लगभग 1.46 लाख किलोमीटर) को जीआईएस-आधारित एनएमपी पोर्टल पर अपलोड और सत्यापित कर दिया है। यह भारत के राजमार्गों की योजना और उसके क्रियान्वयन में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, जो कागजों पर टुकड़ों टुकड़ों में बनाई जाने वाली प्रक्रिया की बजाय राष्ट्रव्यापी दृष्टिकोण वाली भू-स्थानिक योजना की ओर अग्रसर है।

जब हम प्रौद्योगिकी संचालित कॉरिडोर की बात करते हैं तो केवल सड़क पूरी कहानी का सिर्फ आधा हिस्सा है। दूसरा आधा हिस्सा पहचान, विश्लेषण, क्रियान्वयन और प्रतिक्रिया का वह तंत्र है जिसे सामूहिक तौर पर बुद्धिमतापूर्ण परिवहन प्रणाली (आईटीएस) के नाम से जाना जाता है। भारत में आईटीएस को मुख्य रूप से उन्नत परिवहन प्रबंधन प्रणाली (एटीएमएस) के जरिए लागू किया जा रहा है। इसे धीमे-धीमे व्यापक वाहन से समस्त (वी2एक्स) संचार तंत्र से जोड़ा जा रहा है। इन प्रणालियों को दुर्घटनाओं और यातायात नियमों के उल्लंघन को घटाने तथा संकट के वक्त के समय तुरंत कार्रवाई करने के लिए डिजाइन किया गया है।

एटीएमएस को दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे, ट्रांस-हरियाणा एक्सप्रेसवे और ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे जैसे प्रमुख एक्सप्रेसवे पर तैनात किया गया है, ताकि घटनाओं का तेज़ी से पता लगाया जा सके और समय पर तेजी से कार्रवाई की जा सके। महत्वपूर्ण बात यह है कि एटीएमएस की स्थापना अब नई उच्च गति वाली राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं का एक अनिवार्य घटक है और इसे प्रमुख मौजूदा गलियारों पर एक स्वतंत्र प्रणाली के रूप में भी अपनाया जा रहा है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत की सड़कें अब बुद्धिमत्ता की ओर बढ़ रही हैं।15 बेंगलुरु-मैसूर एक्सप्रेसवे जैसे गलियारों पर, दुर्घटनाओं की सख्यां से पता चला है कि जुलाई 2024 में उन्नत यातायात प्रबंधन के लागू होने के बाद दुर्घटना से मृत्यु दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है, जो दर्शाता है कि स्मार्ट तरीके अपनाने से लोगों की जान बच सकती है।16

सरकार स्मार्ट प्रौद्योगिकियों के साथ राजमार्ग से संबधित काम में पारदर्शिता और सुरक्षा को बढ़ाने के लिए परियोजना की सूचना वाले क्यूआर कोड युक्त साइन बोर्ड लगाए जायेंगे जिसमें वास्तविक समय के साथ परियोजना का विवरण, आपातकालीन हेल्पलाइन और अस्पतालों, पेट्रोल पंपों और ई-चार्जिंग स्टेशनों जैसी आस-पास की सुविधाओं के बारे में जानकारी दी जाएगी 23 राज्यों में 3 डी लेजर सिस्टम, 360 डिग्री कैमरे आदि से लैस नेटवर्क सर्वेक्षण वाहन (एनएसवी) तैनात किए जाएंगे। यह कैमरे सड़क के अवरोधों का स्वचालित रूप से पता लगाने के लिए 20,933 किलोमीटर की दूरी को कवर करेंगे, जिससे सुगम, सुरक्षित और ज्यादा जानकारी वाली यात्रा का अनुभव किया जा सकेगा।

पर्यावरणीय अनुकूलन की ओर अग्रसर: संवहनीय बुनियादी ढांचे के लिए प्रतिबद्धता19

संवहनीय बुनियादी ढांचे के प्रति भारत की प्रतिबद्धता हरित राजमार्ग (वृक्षारोपण, प्रत्यारोपण, सौंदर्यीकरण और रखरखाव) नीति, 2015 के तहत शुरू किए गए हरित राजमार्ग मिशन में भी दिखाई देती है। इसका उद्देश्य प्रदूषण और ध्वनि को कम करना, मृदा क्षरण को रोकना और रोज़गार के अवसर पैदा करना है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने 2023-24 में 56 लाख से ज़्यादा पौधे लगाए और 2024-25 में 67.47 लाख पौधे और लगाए। इन प्रयासों के साथ, मिशन की शुरुआत से अब तक राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगाए गए पेड़ों की कुल संख्या 4.69 करोड़ से ज़्यादा हो गई लेकिन हरित परिवर्तन सिर्फ़ पौधारोपण तक ही सीमित नहीं है।

एनएचएआई ने राजमार्गों के किनारे स्थित जल निकायों के पुनर्निर्माण पर भी ध्यान केंद्रित किया है। भविष्य के लिए जल संरक्षण हेतु अप्रैल 2022 में शुरू किए गए मिशन अमृत सरोवर के तहत, इसने पूरे भारत में 467 जल निकायों का विकास किया है। इस पहल ने स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्स्थापित करने में मदद की है और राजमार्ग निर्माण के लिए लगभग 2.4 करोड़ घन मीटर मिट्टी उपलब्ध कराई है, जिससे अनुमानित 16,690 करोड़ रूपए की बचत हुई है। 2023-24 में, एनएचएआई ने राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के लिए फ्लाई ऐश, प्लास्टिक कचरा और पुन:उपयोग किए गए डामर जैसी 631 लाख मीट्रिक टन से अधिक पुनरावर्तित सामग्री का उपयोग किया, जिससे पर्यावरण के अनुकूल और संवहनीय निर्माण को प्रोत्साहन मिला।

भारत के राजमार्ग पारंपरिक राजमार्गों से बढ़ते हुए सिर्फ परिवहन नहीं, बल्कि परिवर्तन के वाहक के रूप में उभर रहे हैं। बेशक, यह मिशन शहरों को जोड़ने के अभियान के तौर पर शुरू हुआ था। लेकिन अब यह स्मार्ट, संवहनीय और डिजिटल रूप से सशक्त अवसंरचना के संजाल के जरिए प्रणालियों, लोगों, डाटा और निर्णयों को जोड़ने के महत्वाकांक्षी प्रयास में विकसित हो गया है। जीआईएस संचालित योजना, बुद्धिमतापूर्ण यातायात प्रणालियों, डिजिटल टोल संग्रह और नागरिक केंद्रित ऐप के समन्वय से राजमार्गों का नेटवर्क एक ऐसे ढांचे में तब्दील हो गया है जो वास्तविक समय पर पता लगाता, प्रतिक्रिया देता और सीखता है। हर एक्सप्रेसवे अब संयोजकता का वाहक और राष्ट्रीय बुद्धिमता की संधि भी है। वह सुनिश्चित करता है कि भारत सिर्फ तेज नहीं, बल्कि सुरक्षित, स्वच्छ और ज्यादा पारदर्शी भी हो। हर किलोमीटर अब यातायात से आगे बढ़ कर विश्वास, प्रौद्योगिकी और परिवर्तन का भी वाहक है।

देशभक्ति के जज्बे से ओतप्रोत रही राष्ट्रीय प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता

13 राज्यों के 74 प्रतियोगियों में भाग लिया
कोटा / देशभक्ति के जज्बे से ओतप्रोत रही राष्ट्रीय प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता। भारत के राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 7 नवंबर कोटा में कला, संगीत और साहित्य को समर्पित संस्था  “रंगीतिका ” द्वारा संस्कृति, साहित्य और मीडिया फोरम के तत्वावधान में ऑन लाइन राष्ट्रीय प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के आयोजन में 13 राज्यों के 75 प्रतियोगियों ने रुचि पूर्वक भाग लिया।
यह जानकारी देते हुए रंगीतिका संस्था की संस्थापक अध्यक्ष स्नेहलता शर्मा ने बताया कि प्रतियोगिता में उम्मीद से अधिक रेस्पॉन्स मिलना लोगों में राष्ट्रप्रेम की भावना का प्रतीक है।  प्रतिभागियों ने कम से कम समय में उत्तर देने की अग्रिम तैयारी की थी । इसी का परिणाम रहा कि रात 8.00 बजे शुरू हुई प्रतियोगिता के उत्तर 05 मिनिट बाद आना शुरू हो गए। समय सीमा समाप्ति 9.00 बजे तक सभी के उत्तर प्राप्त हो गए थे।
उन्होंने बताया कि यह सब संयोजक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल की दूरदृष्टी से यह संभव हो पाया है , जिन्होंने प्रतियोगिता की सूचना के साथ कम से कम समय में उत्तर प्राप्त होने की कार्यशैली को अपनाते हुए इच्छुक प्रतिभागी से पूर्व तैयारी करने का विकल्प सुझाया था।
प्रतियोगिता में बंकिम चंद्र चटर्जी, वंदेमातरम् गीत,  जन मन गण गीत, स्वतंत्रता आंदोलन, संस्कृति , साहित्य और ज्वलंत टॉपिक पर 30 वस्तुनिष्ठ प्रश्न शामिल किए गए थे।
 उन्होंने बताया कि प्रतियोगिता में बैंक में राजभाषा अधिकारी, प्रोफेसर, व्यवसायिक, अध्यापक, साहित्यकार,आदि ने भाग लिया वहीं कक्षा 6 के दो छोटे बच्चों ने भी अपना दम दिखाया।  उन्होंने सभी प्रतिभागियों का रंगीतिका संस्था की ओर से आभार व्यक्त कर शुभकामनाएं दी हैं।
   संस्था अध्यक्ष ने बताया कि प्रतियोगिता में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र ओडिशा, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, पश्चिमी बंगाल, झारखंड, तेलंगाना, पंजाब, तमिलनाडु राज्यों से प्रतिभागी शामिल हुए हैं। सूरज कुमार ,वरिष्ठ प्रबंधक (राजभाषा) यूको बैंक प्रधान कार्यालय, कोलकाता,  डॉ. हेमलता, यूको बैंक प्रधान कार्यालय, कोलकाता, नमिता केजरीवाल, हैदराबाद , आरव उपाध्याय, हाथरस,उत्तर प्रदेश, नैत्रीय वैश्य, लखनऊ, अल्का शर्मा, अबोहर, पंजाब,सरिता सुराना, हैदराबाद, नमिता सिंह ‘ आराधना ‘ अहमदाबाद, गौरीशंकर  वैश्य, लखनऊ, राजेश पाठक, गिरडीह, झारखंड, सन्ध्या गोयल सुगम्या, गाज़ियाबाद (उ प्र),निशा गुप्ता, आलोट, रतलाम, पूनम, अरुण शर्मा और अभिमन्यु कुमार शर्मा, चेन्नई,  दिनेश कुमार माली, तालेचर, ओडिशा, रवींद्र पाल कौर जगाधरी, हुनर भेज एवं न्याति  भेज, इंदौर से प्रतियोगिता में भाग लिया है।
राजस्थान में  प्रो.डॉ. राधा गुप्ता गोयल, जयपुर एकता शर्मा, कोटा, डॉ. सुशीला जोशी, कोटा डॉ. वैदेही गौतम, कोटा,महेश पंचोली, कोटा,मंगलम कुमार जैन, अध्यापक, उदयपुर, डॉ. अनुपमा गोयल, प्रो.ज्योति विद्यापीठ विश्व विद्यालय, जयपुर,अंकिता कक्षा 6, बीकानेर,विजय कुमार शर्मा, कोटा, विजय सिंह राठौर,शालिनी, झालावाड़, डॉ. इंदु बाला शर्मा, कोटा, अंजना जैन, कोटा,साधना शर्मा, कोटा,ओम प्रकाश चंद्रोदय , जयपुर, लक्षिता रावत, झालावाड, गरिमा राकेश ‘ गर्विता’, कोटा, अंजना मनोज गर्ग, कोटा,  यूवी झालावाड़, ,वैष्णवी चित्तौड़ा उदयपुर, भव्य कोचर बीकानेर, कक्षा 6, बीकानेर, विजय सिंह राठौर, कोटा, अनन्या, दौसा,अनीता भानावत, उदयपुर,अनीता जैन, उदयपुर, इरा सक्सेना, जयपुर, राम मोहन कौशिक, कोटा,  राजेंद्र प्रसाद झालावाड़,मदन जोशी, उदयपुर,गौरव राठौर, अध्यापक दीगोद, कोटा,अब्दुल मतीन, कोटा,  वर्षा कश्यप बीकानेर, मेनपाल वर्मा सूरतगढ़, रघुराज सिंह कर्मयोगी कोटा, चांदनी यादव सूरतगढ़,सार्राह आलमशाह उदयपुर, डॉ.राजमती पोखरना सुराना, भीलवाड़ा, रचना व्यास, बडोली, दौसा रेणु सिंह राधे, कोटा,गजल जैन ,उत्कर्ष नारायण रावत, दौसा, शृंगारिका शर्मा, सरस्वती भंसाली एवं बसंती पंवार ,जोधपुर, ,रश्म गर्ग,कोटा,रेखा सक्सेना, झालावाड़, रेखा शर्मा, बूंदी, चन्द्र प्रकाश, झालावाड़ संदीप ( व्यवसायिक ), कोटा, रविन्द्र पाल कौर,,अमन, हेमराज हेम, कोटा,डॉ.अंजू सक्सेना, जयपुर, देव कन्या मेनारिया एवं दौलत राम शर्मा, उदयपुर , अर्चना शर्मा, कोटा, शोभा गोयल ,जयपुर ने भाग लिया।
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स्नेहलता शर्मा
रंगीतिका संस्था, कोटा

वन्देमातरम् की 150 वीं वर्षगांठ पर कार्यक्रम का आयोजन

कोटा / रंगीतिका संस्था और  संस्कृति, साहित्य,  मीड़िया फोरम के तत्वाधान में राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय नवीन गुमानपुरा में वन्देमातरम् की 150  वीं वर्षगांठ पर बाल साहित्य मेले में प्रश्नोत्तरी , कविता और चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की गई।
प्रथम द्वितीय,तृतीय स्थान पर पर रहने वाले बालक – बालिकाओं को पुरस्कृत किया गया। कवि महेश पंचोली, डॉ. सुशीला जोशी, साधना शर्मा, वंदना शर्मा ने बच्चों को देशभक्ति की कविताएं सुनाई। विद्यालय के सीमा मीणा, प्रीति जैन, अबरार पठान और भूपेंद्र सिंह नरूका ने कार्यक्रम में पूर्ण रुचि से सहयोग किया।
    मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी कोटा शहर स्नेहलता शर्मा ने बताया क कि वन्देमातरम् के 150 पूर्ण होने पर हर बच्चे में तथा जन-जन में अलख जगाने के लिए हमने यह कार्यक्रम कोटा के हर स्कूल में आयोजित करने का निर्णय लिया है । इसके तहत कविता, पोस्टर, नारे , निबंध प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी।
 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग राजस्थान के पूर्व संयुक्त निदेशक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम् के विभिन्न पहलुओं की जानकारी देते हुए स्वतंत्रता संग्राम और वर्तमान संदर्भ में महत्व के बारे में बच्चों को जानकारी दी।
 कवि महेश पंचोली ने” मैं सैनिक बन जाऊंगा” कविता सुना कर बच्चों को उत्साहित किया तो साधना जी ने “वीर सपूतों जाग उठो, अब देश का मान बढ़ाना है” और वंदना जी ने”आने वाले कल की तुम तस्वीर हो ,नाज करेगी दुनिया तुम पर ,तुम दुनिया की तकदीर हो “गाना गा कर बच्चों को उत्साहित कर मनोरंजन किया।
प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में रौनक यादव कक्षा 5 प्रथम ,परिधि कक्षा 6 द्वितीय, खुशी कक्षा 8 सुमन तृतीय  रहे तो कविता प्रतियोगिता में दीपिका कक्षा 7 प्रथम  , मोनिका कक्षा 7 द्वितीय और  लव कुमार कक्षा 3 तृतीय रहे । संस्था की ओर से जीतने वालों को पुरस्कार प्रदान किए गए। सभी बच्चों को पैन और टाफियां वितरित की गई ।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुशीला जोशी के द्वारा किया गया, उन्होंने बच्चों को शपथ दिलाई की, “तिरंगे इत्र से दुनिया को महकाते रहेंगे, बुझेगी यह आग, तो आग भड़काते रहेंगे, पर हम तो हमेशा “वंदे मातरम” गाते रहेंगे “। कवि महेश पंचोली ने अपनी दो ‘बाल संग्रह’ स्कूल को भेंट किये ।
प्रेषक- डॉ. प्रभात कुमार सिंघल, कोटा से

आपणो जटनी परिवार भुवनेश्वर ने मनाया दीपावली पारिवारिक मिलन

भुवनेश्वर। स्थानीय तेरापंथ भवन में सायंकाल आपणो जटनी परिवार ,भुवनेश्वर के लगभग 150 परिवारों ने दीपावली पारिवारिक मिलन समारोहः2025 हर्षोल्लास के साथ मनाया। कार्यक्रम का शुभारंभ परम्गपरागत दीप प्रज्ज्वलन तथा गणेश वंदना से हुआ। तदोपरांत गत वर्ष परिवार के दिवंगत सदस्यों को सामूहिक श्रद्धांजलि दी गई।उसके उपरांत अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये।
इस अवसर पर जटनी परिवार भुवनेश्वर के कुछ बुजुर्ग सदस्यों को सम्मानित किया गया। यह भी जानकारी दी गई कि अब यह जिम्मेदारी आपणो जटनी परिवार भुवनेश्वर के युवाओं को संभालनी जाहिए। साथ ही साथ परिवार के जल्द से जल्द पंजीकरण की भी बात बताई गई।अंत में सभी ने सामूहिक रात्रिभोज किया।
प्रेषक भुवनेश्वर से अशोक पाण्डेय

एसआरएम विश्वविद्यालय द्वारा प्रोफेसर डॉ. अच्युत सामंत मानद डॉक्टरेट डिग्री से सम्मानित

प्रोफेसर अच्युत सामंत के नाम 69वीं मानद डॉक्टरेट डिग्री है

भुवनेश्वर, 7 नवम्बर: शिक्षा, सामाजिक परिवर्तन और मानवीय सेवा के क्षेत्र में अपने निरंतर और नि:स्वार्थ योगदान के लिए वैश्विक स्तर पर एक और सम्मान प्राप्त करते हुए, कीट- कीस और कीम्स के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत को एसआरएम विश्वविद्यालय, सोनीपत द्वारा मानद डॉक्टरेट (Honorary Doctorate) की डिग्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान विश्वविद्यालय के तीसरे दीक्षांत समारोह में प्रदान किया गया।

भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होकर यह मानद उपाधि डॉ. सामंत को प्रदान की। इस अवसर पर डॉ. टी. आर. पारिवेन्धर, संस्थापक कुलाधिपति, एसआरएमआईएसटी – चेन्नई; प्रो. परमजीत एस. जसवाल, कुलपति, एसआरएम विश्वविद्यालय सोनीपत (हरियाणा); तथा प्रो. वी. सैमुअल राज, रजिस्ट्रार आदि दीक्षांत समारोह में उपस्थित थे।

यह विशिष्ट सम्मान डॉ. सामंत को विश्वभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा प्राप्त 69वां मानद डॉक्टरेट है, जो शिक्षा के माध्यम से वंचित बच्चों को सशक्त बनाने में उनके असाधारण योगदान की पुनः पुष्टि करता है।

एसआरएम विश्वविद्यालय ने अपने प्रशस्ति पत्र में डॉ. सामंत को “सीमा रहित सेवा, भेदभाव रहित शिक्षा और समझौता रहित मानवता” के प्रतीक के रूप में सराहा है। विश्वविद्यालय ने कहा कि उन्होंने ओडिशा के गरीबतम लोगों के उत्थान के लिए शिक्षा और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है।

वहीं डॉ. सामंत ने एसआरएम विश्वविद्यालय, उसकी अकादमिक परिषद् और प्रबंधन बोर्ड के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि “Honoris Causa” उपाधि उनके लिए अत्यंत गर्व और प्रेरणा का विषय है।

मुंबई में साहित्य, संस्कृति और भाषा को नया आकाश देने वाले उमाकांत बाजपेयी

(मुम्बई गुरुवार 6 नवम्बर 2025) अभी अभी बोरीवली पूर्व के दौलत नगर श्मशान गृह से लौटा हूँ। अपने बहुत प्रिय डॉ उमाकान्त बाजपेयी जी को अंतिम विदाई देकर। आज दोपहर 1 बजे के आसपास उनका निधन कांदिवली पूर्व में अपनी सुपुत्री निरुपमा के आवास पर हो गया था।
एक बहुआयामी व्यक्तित्व, हिन्दी-सेवी, डॉ. उमाकांत बाजपेयी ने अपना पूरा जीवन काल (87 वर्ष) हिन्दी की सेवा में समर्पित किया। उन्होंने स्वेच्छा से गोलोक गमन मंजूर किया क्योंकि पिछले कुछ समय से उन्होंने अन्न जल त्याग दिया था और आज 1 बजे के लगभग शान से अनंत यात्रा पर रवाना हो गए।
यह समाचार मुंबई के असंख्य लोगों को द्रवित कर गया। देवमणि पाण्डेय, डॉ नरोत्तम शर्मा, नवीन चतुर्वेदी, राजीव रोहित, कृष्णा गौतम, एन के व्यास, डॉ जेपी बघेल, डॉ बनमाली चतुर्वेदी, एड सुशील बाजपेयी, सतीश शुक्ल रक़ीब सरीखे अनेक जन उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे। शाम 7.30 बजे पर अंतिम यात्रा शुरू हुई। दौलत नगर में डॉ बाजपेयी जी की पुत्रियों नीता व संगीता ने सभी रस्में पूरी की। हम सभी ने डा बाजपेयी जी को नम आंखों से अंतिम विदाई दी।
डॉ बाजपेयी से मेरा 35 साल का संबन्ध रहा। 1990 में भारतीय जीवन बीमा निगम कार्यालय में पहली मुलाकात हुई थी, कुछ महीने पहले मेरी पुस्तक आमची मुंबई 2 का विमोचन उन्हीं के नेतृत्व व उपस्थित में आशीर्वाद द्वारा किया गया था। बचपन से ही हिन्दी में रूझान रखने वाले “साहित्य रत्न” डॉ बाजपेयी जी ने संस्कार, संस्कृति, साहित्य एवं चिकित्सा की पृष्ठभूमि यानी होम्योपैथी की शिक्षा में गोल्ड-मेडल ग्रहण कर मुंबई को अपनी कर्मस्थली बनाया। 1969 से मुंबई में उन्होंने आशीर्वाद नाम की पत्रिका का प्रकाशन तथा सन् 1977 में आशीर्वाद साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक संस्था का शुभारंभ किया। वे भारतीय जीवन बीमा निगम में सन् 1998 तक कार्यरत रहे। तदुपरांत स्वैच्छिक सेवानिवृत लेकर आशीर्वाद संस्था के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यों में अपने को समर्पित कर दिया। देश-विदेश के हिन्दी सेवियों को पुरस्कृत व सम्मानित करने की उनकी 56 वर्ष की अनवरत यात्रा रही।
आशीर्वाद के पुरस्कृत एकांकी, मुंबई के हिन्दी कवि तथा मुंबई की हिन्दी कवयित्रियां पुस्तकों का उन्होंने संपादन किया। एक लेखक के रूप में उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं-
1. एक था नर एक थी मादा (कहानी संग्रह 2013)
2. एक सोने का मृग (कहानी संग्रह 2015)
3. बैंड बाजा बुलेट (कहानी संग्रह 2017) मॉरिशस राष्ट्रपति द्वारा विमोचन।
4. जय राम जी की (कहानी संग्रह 2019)
डॉ उमाकांत बाजपेई ने सन् 1974 एवं 1978 में अखिल भारतीय लेखक सम्मेलन का आयोजन किया जो मुंबई में पहला हिन्दी लेखक सम्मेलन था।
सन् 1978 से आशीर्वाद फ़िल्म अवार्ड का आयोजन किया जो पच्चीस वर्षों तक लगातार आयोजित होता रहा जिसमें सिनेमा जगत की मशहूर हस्तियाँ उपस्थित होती रहीं।
सन् 1986 में अखिल भारतीय एकांकी लेखन स्पर्धा का आयोजन किया। इस आयोजन में पुरस्कृत एकांकी की एक पुस्तक आशीर्वाद के पुरस्कृत एकांकी के नाम से प्रकाशित हुई।
सन् 1991 से हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु आशीर्वाद राजभाषा पुरस्कार एवं सम्मेलन का शुभारंभ किया, जो 33 वर्षों से चल रहा है जिसमें भारत के कई प्रसिद्ध और प्रमुख सरकारी कार्यालय सहयोगी हैं। हिन्दी को बढ़ावा देने हेतु अमेरिका के कार्यक्रमों में भी अपनी सहभागिता दी है।
आशीर्वाद ने सुनामी पीडितों के लिए अनुदान तथा विभिन्न सामाजिक कार्यों के लिए समय-समय पर योगदान किए हैं। कोरोना काल में महीने भर के राशन गरीबों को वितरित किए हैं।
26/11 की घटना से प्रभावित होकर आशीर्वाद संस्था द्वारा मुंबई के सभी चैनलों के 40 से अधिक मीडिया कर्मियों एवं पत्रकारों को शौर्य सम्मान से सम्मानित किया।
राजभाषा हिन्दी के 60 वर्ष पूरे होने पर आशीर्वाद राजभाषा की हीरक जयंती का महत्वपूर्ण एवं भव्य आयोजन किया गया जिसमें 60 विशिष्ट हिन्दी सेवियों को सम्मानित किया गया।
सन् 2012 में 24 घंटे चलने वाले अखंड कवि सम्मेलन का आयोजन। किया गया। सन् 2014 में अहिन्दी भाषी तथा विदेशी प्रतिनिधियों जैसे अमेरिकी दूतावास को उनके कार्यों के लिए हिन्दी पुरस्कार दिए।
वर्ष 2019 में आशीर्वाद की स्वर्ण जयंती मनायी गयी जिसमें 50 विविध आयामी लोगों को पुरस्कृत किया गया। मुंबई के 100 कवियों का एक संकलन प्रकाशित।
डॉ उमाकांत बाजपेई को प्राप्त प्रमुख पुरस्कार :
1. महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी द्वारा राज्यस्तरीय सम्मान एवं पुरस्कार 2009-2010
2. विश्व हिन्दी अकादमी द्वारा हिन्दी सेवी पुरस्कार 2014
3. भारत सरकार विकास आयुक्त संस्थान द्वारा हिन्दी पत्रकारिता रत्न सम्मान 2011
4. हिन्दी सेवा के लिए ब्रजेश पाठक मौन सम्मान 2011- 2012
5. राष्ट्रीय हिन्दी सेवी महासंघ चतुर्थ राष्ट्रीय सम्मालन में हिन्दी सेवी सम्मान 2008
6. राइटर्स एण्ड जर्नलिस्ट एशोसिएशन- वाजा इंडिया का साहित्य गौरव सम्मान ( 2017)
7. अहिसास साहित्य सम्मान (2018),
8. आपणो राजस्थान सम्मान (2019)
9. संस्कृति गौरव सम्मान ( 2021)
डॉ उमाकांत बाजपेयी के इन संस्थाओं से संबंध रहे-
1. कान्यकुब्ज मंडल के आजीवन सदस्य एवं पूर्व महासचिव
2. महाराष्ट्र हिन्दी समाज के पूर्व महासचिव
3. राष्ट्रीय हिन्दी सेवी संघ के संरक्षक एवं पूर्व महासचिव
4. सहयोग फाउंडेशन के संरक्षक
5. पत्रकारिता कोश के संरक्षक
6. बेटी बचाओ अभियान।
डॉ बाजपेयी ने अपनी पूरी जीवन हिन्दी का साथ, हिन्दी का विकास और हिन्दी पर विश्वास के लिए समर्पित किया था।
डॉ उमाकांत बाजपेई को विनम्र श्रद्धांजलि।

 

राजेश विक्रांत के फेसबुक वाल https://www.facebook.com/rajesh.vikrant.2025 से साभार

आत्मघाती होती शिक्षा प्रणाली: मौतों का भयावह यथार्थ

भारत की शिक्षा प्रणाली को लेकर समय-समय पर प्रश्न खड़े होते रहे हैं। शिक्षा की विसंगतियों एवं दबावों के चलते भी अनेक सवाल खड़े हैं। इन्हीं से जुड़ा यह एक बेहद हृदय विदारक और चिंताजनक तथ्य है कि एक वर्ष देश में लगभग 14,000 स्कूली बच्चों ने आत्महत्या कर ली। इस तथ्य की पुष्टि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ( एनसीआरबी ) भी कर रही है। अधिक घातक तथ्य यह है कि बीते एक दशक में छात्रों की आत्महत्या के मामलों में लगभग 65 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2019 की तुलना में यह संख्या 34 प्रतिशत अधिक है। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन मासूम सपनों की समाधियाँ हैं जिन्हें हमारी शिक्षा प्रणाली ने दम तोड़ने पर विवश कर दिया। यह स्थिति किसी एक स्कूल, राज्य या परिस्थिति की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा तंत्र की विफलता का दर्पण है। पहली नजर में इतनी बड़ी संख्या में आत्मघात के मूल में पढ़ाई का दबाव, अभिभावकोें की अतिश्योक्तिपूर्ण महत्वाकांक्षाएं, छात्रों की संवेदनशीलता और तंत्र की नाकामी बताई जा सकती है। लेकिन सवाल है कि हमारा तंत्र क्यों संवेदनहीन बना हुआ है? यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को तलब करके इस बाबत विस्तृत विवरण मांगा है। साथ ही सवाल पूछा है कि क्या देश के सभी शिक्षण संस्थान छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारी निभा रहे हैं? शिक्षा को प्रतिस्पर्धा का रणक्षेत्र कब तक बनने दिया जाता रहेगा?
आज का विद्यार्थी बचपन से ही एक ऐसी अंधी एवं प्रतिस्पर्धी दौड़ में धकेल दिया जाता है, जिसमें लक्ष्य अंक, ग्रेड, और रैंक बन गए हैं-ज्ञान, संवेदना और चरित्र नहीं। स्कूल अब शिक्षालय नहीं, बल्कि परीक्षा-केंद्र यानी गलाकाट प्रतियोगिता के केन्द्र बन चुके हैं। माता-पिता, शिक्षक और समाज-सभी ने मिलकर एक ऐसा माहौल बना दिया है, जहाँ “सफलता” का अर्थ केवल डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस या उच्च वेतन वाली नौकरी तक सीमित हो गया है। शिक्षा अब व्यक्ति के भीतर के मनुष्यत्व, रचनात्मकता और संवेदना को विकसित करने का माध्यम नहीं रही, बल्कि उसने जीवन को “प्रदर्शन की प्रतियोगिता” बना दिया है। छोटे बच्चों पर कोचिंग का बोझ, अभिभावकों की अपेक्षाएँ, और असफलता का भय?-ये तीन त्रिकोणीय दबाव उन्हें धीरे-धीरे मानसिक रूप से तोड़ देते हैं। शिक्षा अब एक बोझ और मानसिक तनाव का कारण बन गयी है।
एनसीआरबी के आँकड़े बताते हैं कि छात्रों में आत्महत्या के प्रमुख कारण हैं-परीक्षा में असफलता, अभिभावकीय दबाव, भविष्य की चिंता और मानसिक अवसाद। भारत दुनिया के उन शीर्ष देशों में शामिल है जहाँ किशोरों में डिप्रेशन और आत्महत्या की प्रवृत्ति सबसे अधिक है। कबीर ने कहा था-“पढ़ि-पढ़ि पंडित भया, पर भीतर का मन ना गया।” आज की शिक्षा बच्चों को केवल “जानकार” बना रही है, “ज्ञानी” नहीं। विद्यालयों में रट्टामार संस्कृति, अंक-केंद्रित मूल्यांकन और शिक्षकों की संवेदनहीनता बच्चों के भीतर आत्मविश्वास के बजाय भय भर रही है। कई प्रतिष्ठित कोचिंग सेंटर्स में तो यह प्रवृत्ति और विकराल हो जाती है। कोटा, पटना, हैदराबाद, चेन्नई जैसे शहरों में हर वर्ष दर्जनों विद्यार्थी आत्महत्या करते हैं। विडंबना यह है कि वहाँ शिक्षा से ज्यादा “प्रतियोगिता का उद्योग” पनप गया है। बच्चे अपने परिवारों से दूर, दबाव और भय में जीते हैं, और अंततः जीवन से हार जाते हैं।
साल 2020 में आई नई शिक्षा नीति ( एनइपी ) को लेकर बहुत उम्मीदें थीं कि शायद यह शिक्षा को बच्चों के बोझ से मुक्ति देगी, उसे रचनात्मकता और नैतिकता से जोड़ेगी। नीति में “होलिस्टिक लर्निंग”, “जॉयफुल एजुकेशन”, “रिड्यूस्ड बोर्ड प्रेशर” जैसे शब्द तो हैं, पर व्यवहारिक स्तर पर हालात में कोई ठोस परिवर्तन नहीं आया। स्कूलों में परीक्षा का दबाव जस का तस है, कॉलेजों में बेरोजगारी का डर और कोचिंग की होड़ बढ़ी है। शिक्षा नीति के भीतर आत्महत्या जैसे मानसिक स्वास्थ्य संकट पर कोई गंभीर विमर्श नहीं हुआ। जब तक शिक्षा नीति का केंद्र मानव-निर्माण नहीं होगा, तब तक यह प्रणाली केवल आंकड़े बढ़ाएगी-आत्महत्याओं के भी और बेरोजगारों के भी। सवाल यह भी है कि शैक्षणिक परिसरों में आत्महत्या रोकने के लिये जो कदम केंद्र व राज्य सरकारों को उठाने चाहिए थे, उसके बाबत देश की शीर्ष अदालत को क्यों पहल करनी चाहिए? इस मामले में सख्त रवैया अपनाते हुए सर्वाेच्च न्यायालय को कहना पड़ा कि केंद्र व राज्य सरकारें आठ सप्ताह के भीतर वह विस्तृत ब्योरा प्रस्तुत करें, जो आत्महत्या रोकने के दिशा-निर्देशों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करे।
शिक्षा का मूल उद्देश्य क्या है? महात्मा गांधी ने कहा था-“शिक्षा का अर्थ है शरीर, मन और आत्मा का सम्यक विकास।” स्वामी विवेकानंद ने भी कहा “शिक्षा वह है जो व्यक्ति में आत्मविश्वास, आत्मसंयम और आत्मबल भर दे।” परंतु आज की शिक्षा न शरीर को स्वस्थ रख पा रही है, न मन को शांत, न आत्मा को ऊँचा। बच्चों को किताबों के बोझ तले दबा दिया गया है, पर जीवन की समझ नहीं दी गई। उन्हें बताया गया कि असफलता अपराध है, जबकि जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक तो असफलता ही होती है। माता-पिता और शिक्षक दोनों को यह समझना होगा कि बच्चा कोई प्रोजेक्ट नहीं, एक जीवित आत्मा है। उसे सफलता के साँचे में ढालने से पहले उसे अपने ढंग से खिलने का अवसर देना जरूरी है। शिक्षक यदि केवल अंक देने वाले बन जाएँ और अभिभावक केवल रिपोर्ट कार्ड से बच्चे की योग्यता मापें, तो बच्चे का आत्मसम्मान कुचलना निश्चित है। जरूरी है कि घर और स्कूल दोनों जगह एक भावनात्मक संवाद स्थापित हो-जहाँ बच्चा अपनी असफलता, डर और उलझन को बिना भय के साझा कर सके।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य को अब भी गंभीरता से नहीं लिया जाता। अधिकांश स्कूलों में काउंसलिंग सिस्टम या तो है ही नहीं या नाममात्र का है। बच्चों को यह सिखाया ही नहीं जाता कि “तनाव से कैसे निपटें”, “असफलता को कैसे स्वीकारें” या “भावनाओं को कैसे व्यक्त करें।” जिन्हें हम “टॉपर” कहते हैं, वे अक्सर भीतर से टूटे हुए होते हैं। आत्महत्या करने वाले बच्चों के पीछे अक्सर यह मनोवैज्ञानिक सत्य होता है कि उन्होंने कभी किसी से अपनी व्यथा कही ही नहीं। शिक्षा को केवल सूचना-प्राप्ति का माध्यम नहीं, जीवन-समझ का साधन बनाना होगा। जब तक बच्चों को यह नहीं सिखाया जाएगा कि जीवन अंक-पत्र से बड़ा है, तब तक यह संकट बना रहेगा। विद्यालयों में ध्यान, योग, संवाद, कला, संगीत और नैतिक शिक्षा को अनिवार्य बनाना चाहिए। सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं, संवेदना-केंद्रित संस्कृति गढ़नी होगी।
देश में मोटी पगार वाली नौकरियों की गलाकाट स्पर्धा में शिक्षण संस्थाएं व शिक्षक उस दायित्व को भूल गए हैं, जो छात्रों को विषयगत शिक्षा के साथ विषम परिस्थितियों के बीच जीवन जीने की कला सिखा सके। उन्हें व्यावहारिक जीवन का कौशल सिखाने के साथ ही चुनौतियों से जूझने की मानसिक शक्ति विकसित करने के लिए तैयार कर सकें। आखिर किसी परिवार की उम्मीद को किस स्थिति में यह सोचना पड़ता है कि मौत को गले लगाना अंतिम विकल्प है? शिक्षा परिसरों में ऐसी स्थितियां क्यों विकसित हो रही हैं कि विद्यार्थी जीवन से हार मानने लगे हैं?
निस्संदेह, शिक्षण संस्थानों का एक मात्र लक्ष्य किताबी ज्ञान देकर डिग्री बांटने तक ही नहीं हो सकता।यह प्रश्न अब टालने योग्य नहीं रहा कि क्या हम बच्चों को पढ़ा रहे हैं या उन्हें धीरे-धीरे तोड़ रहे हैं? शिक्षा यदि आत्महत्या का कारण बन जाए, तो उससे बड़ा विडंबनापूर्ण पराजय कोई नहीं। जरूरत है ऐसी शिक्षा की जो बच्चों को जीवन से प्रेम करना सिखाए, न कि जीवन से भागना। महर्षि अरविंद ने कहा था-“सच्ची शिक्षा वह है जो भीतर की दिव्यता को प्रकट करे।” समय आ गया है कि हम शिक्षा की दिशा को पुनर्परिभाषित करें, जहाँ परीक्षा नहीं, व्यक्तित्व महत्वपूर्ण हो; रैंक नहीं, रचनात्मकता का मूल्य हो; और सफलता नहीं, संतुलन एवं सुख शिक्षा का लक्ष्य बने। यदि हम यह नहीं कर पाए, तो आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा-14,000 से बढ़कर, हमारी सामूहिक संवेदनहीनता की जीवित कब्र बन जाएगा। निस्संदेह, देश के स्कूली छात्रों में आत्मघात की प्रवृत्ति राष्ट्र की गंभीर क्षति है, जिसे संवेदनशील ढंग से दूर करने की तत्काल जरूरत है।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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