स्व. उमाकांत वाजपेयी के व्यक्तित्व में कई आयाम थे
झूठ बोलने की संस्कृति हमारे पतन का कारण बन रही है
भारतवर्ष मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का देश है जिन्होंने सत्य मार्ग पर चलकर तपस्वी राजा के रुप में अपना त्यागी जीवन बिताया।यह भारतवर्ष शांतिदूत भगवान श्रीकृष्ण का देश है। यह देश भगवान गौतम बुद्ध का देश है। यह देश ऋषि-मुनियों का देश है।यह देश सत्य,अहिंसा और त्याग के अमर पुजारी महात्मा गांधी का देश है।इस देश में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का आगमन हुआ जिनके विषय में कहा गया है-
सत्यासक्त दयालु द्विज, प्रिय अघहर सुखकंद।
जनहित कमलातजन जय,शिव नृप कवि हरिचन्द।।
भारतीय गौरवशाली गुरुकुल परम्परा के तहत राजकुमारों को गुरुसेवा करने,सत्य बोलने और सदाचारी जीवन जीने की ही शिक्षा-दीक्षा दी जाती रही है। हमारी सनातनी वर्ण(जाति)-व्यवस्था में भी ब्राह्मण,क्षत्रीय,वैश्य और शुद्र को क्रमशः विवेक,साहस,उत्पादन और सेवा क्षमताओं के आधार पर सत्य मार्ग पर चलने का पावन संदेश निहित है।
यही नहीं,श्रीरांम-रावण युद्ध में श्रीराम ने सत्य के ही मार्ग का अनुसरण किया।श्रीकृष्ण ने दुराचारी कंस के वध में सत्य का ही मार्ग चुना।भारतवर्ष के एकमात्र धर्म-युद्ध,महाभारत युद्ध में भी शांतिदूत श्रीकृष्ण ने गाण्डीवधारी अर्जुन को सत्य मार्ग पर ही चलने का अमर संदेश दिया।
हमारे अमर धर्मग्रंथः रामायण, श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भागवत पुराण और श्रीमद् भागवत गीता में भी समस्त भारतवासियों को सत्य को अपनाने का अमर संदेश है। लेकिन आजाद भारत में आज-कल झूठ बोलने की संस्कृति का ही बोलबाला स्पष्ट रुप से नजर आती है।
झूठ ही लेना,झूठ ही देना।
झूठ ही भोजन,झूठ चबेना।।
ऐसे में,यह कहना गलत नहीं होगा कि आज राजा(शासक)-प्रजा(आम जनता),ब्राह्मण,क्षत्रीय,वैश्य और शूद्र सभी अकारण गर्व से और शौक से झूठ बोलते नजर आते हैं। हमारे कुछ शिक्षकगण,कुछ युवावर्ग, कुछ छोटे-छोटे बच्चे,कुछ किसान,कुछ मजदूर, कुछ नौकरशाह,कुछ कर्मचारी,कुछ कारोबारी,सभी प्रकार के सेवकगण आदि शौक से झूठ बोलते नजर आते हैं।
मुझे यह जानकारी देते हुए अत्यंत दुख हो रहा है कि कुछ ऐसे कथाव्यास भी हैं जो अपने व्यासपीठ की मर्यादा का ध्यान न रखकर,बोधात्मक कथा न सुनाकर अपने आचार-विचार और व्यवहार में झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा देते नजर आते हैं।
डॉक्टरों को दूसरा भगवान माना जाता रहा है उनमें से कुछ डॉक्टर आजकल अपनी दिनचर्या में झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं।बाजार में चले जाइए,दुकानदार से लेकर ग्राहक तक बड़ी ईमानदारी से झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ावा देते नजर आ रहे हैं।
हमारे वकील समुदाय में कुछ तो झूठ बोलने की संस्कृति को अपनी दिनचर्या बना लिए हैं। उन्हें आज अपने आपको बचाने की जरुरत है जिससे हमारी न्याय व्यवस्था की मर्यादा पर लोगों का विश्वास कायम हो सके।
आज समाज का कोई भी वर्ग ऐसा नहीं है जो झूठ बोलने की संस्कृति से बचा हो।इसीलिए आज सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीना तथा सत्यनिष्ठ बनकर अपना कार्य करना तो असंभव –सा नजर आता है।
आज झूठ बोलने की गलत संस्कृति से स्वयं को बचाने के लिए तथा भारतवर्ष को विकासशील से विकसित बनाने के लिए कबीरदास की इस साखी के संदेश को अक्षरशःअपनाने की जरुरत है-
सांच बराबर तप नहीं,
झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै सांच है,
ताके हिरदै आप।।
-अर्थात् सत्य बोलने जैसी कोई तपस्या नहीं है और झूठ बोलने जैसा कोई पाप नहीं है। जो व्यक्ति सच बोलता है उसी के हृदय में ईश्वर का वास होता है।
इस झूठ बोलने की आज की संस्कृति जिस प्रकार व्यक्ति विशेष से लेकर पूरे भारतवर्ष के अधिसंख्यक लोगों में पल्लवित-पुष्पित हो रही है उसपर अंकुश लगाने के लिए,समस्त भारतवासी को इस संक्रामक झूठ संस्कृति से बचने के लिए गंभीरतापूर्वक चिंतन-मनन करने की जरुरत है। भारतवर्ष के सभी बच्चों व युवाओं में सत्य-संस्कार और सत्य-संस्कृति को अपनाने का संदेश देना होगा।हमें अपने आचार-विचार,व्यवहार और आचरण में सत्य को अपनाने की आवश्यकता है।बाल मनोविज्ञान के अनुसार बच्चों में अनुकरण की प्रवृति सबसे अधिक होती है।
करुणा एवं संवेदनाओं से ही दुनिया में संतुलन संभव
आज का मनुष्य जितनी तीव्रता से भौतिक प्रगति कर रहा है, उतनी ही तेजी से मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं से दूर होता जा रहा है। विज्ञान ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, परंतु उसने मनुष्य को आत्मकेंद्रित भी कर दिया है। प्रतिस्पर्धा, उपभोगवाद, स्वार्थ और सत्ता की भूख ने मनुष्य के भीतर की दयालुता को जैसे कुंद कर दिया है। ऐसे समय में जब विश्व हिंसा, आतंक, युद्ध, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और वैमनस्य के दौर से गुजर रहा है, तब “विश्व दयालुता दिवस” मनाने का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सभ्यता के विकास की असली पहचान तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की करुणा, सहानुभूति और प्रेम से होती है। दयालुता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। यह मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाकर देवत्व की ओर ले जाती है। इतिहास साक्षी है कि जिन समाजों ने दया, करुणा और प्रेम को अपनाया, वहीं शांति और समृद्धि का आधार बने। बुद्ध, महावीर, यीशु और गांधी जैसे महापुरुषों ने दया को जीवन की सबसे बड़ी साधना माना। महात्मा गांधी ने कहा था, “अहिंसा कोई निष्क्रिय वस्तु नहीं, यह सबसे सक्रिय और जीवंत शक्ति है।” दयालुता उसी अहिंसा की आत्मा है, जो मनुष्य को दूसरों के सुख-दुःख से जोड़ती है।
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133
भारतीय राजमार्गों का नया रूप
भारत के राजमार्ग योजना निर्माण से लेकर टोल संग्रह तक हर चरण के डिजिटलीकरण के साथ बदल रहे हैं। इससे उनका भौतिक और डाटा संचालित, दोनों तरह की संपदा में परिवर्तन हो रहा है। फास्टैग ने देश की इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह प्रणाली को एक क्रांतिकारी स्वरूप दिया है। लगभग 98 प्रतिशत वाहन फास्टैग का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसके उपयोगकर्ताओं की संख्या 8 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है। राजमार्गयात्रा ऐप को 15 लाख से ज्यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है। यह यात्रियों के समग्र अनुभव को संवर्द्धित करने वाला भारत का चोटी का राजमार्ग यात्रा ऐप है।
डिजिटल क्रांति के इस युग में भारत के राजमार्ग सिर्फ कोलतार और कंक्रीट की बिछावन नहीं रहे हैं। ये गतिशीलता और डाटा की कुशल रीढ़ के तौर पर उभर रहे हैं। ये बाधारहित परिवहन और समय पर सूचना प्रवाह को संभव बना रहे हैं। स्मार्ट नेटवर्क का दृष्टिकोण हमारे यात्रा, माल ढुलाई, टोल प्रबंधन और यहां तक कि सफर के दौरान इंटरनेट के तौरतरीकों को नया स्वरूप दे रहा है। एक समय में राजमार्गों को सिर्फ शहरों और राज्यों को भौतिक रूप से जोड़ने वाला साधन माना जाता था। लेकिन अब उनकी कल्पना संयोजकता और नियंत्रण के स्मार्ट गलियारों के तौर पर की जा रही है। इन्हें सिर्फ वाहनों ही नहीं, बल्कि डाटा, संचार और समय पर निर्णय निर्धारण के लिए भी डिजाइन किया जा रहा है।
यह परिवर्तन राजमार्गों के नेटवर्क जैसा ही व्यापक है। मार्च 2025 में भारत की सड़कों का नेटवर्क 63 लाख किलोमीटर से भी ज्यादा था। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क है। राष्ट्रीय राजमार्गों का नेटवर्क 2013-14 में 91287 किलोमीटर से लगभग 60 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि के साथ 146204 किलोमीटर हो गया है। देश ने 2014 और 2025 के बीच 54917 किलोमीटर नए राष्ट्रीय राजमार्ग जोड़े हैं।1 यह उपलब्धि सिर्फ निर्माण के कौशल को ही नहीं दिखाती है। यह डिजिटल साधनों से प्रबंधन और इस विशाल संपदा की निगरानी की जरूरत को भी दर्शाती है।2 सरकार ने कार्यकुशलता बढ़ाने और कामकाज को सुचारू बनाने के उद्देश्य से राजमार्ग परियोजना के जीवनचक्र के सभी महत्वपूर्ण चरणों में व्यापक आमूलचूल डिजिटल कायाकल्प को अपनाया है। योजना और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) से लेकर निर्माण, रखरखाव, टोल संग्रह और नेटवर्क उन्नयन तक मुख्य प्रक्रियाओं को सुचारू बनाया जा रहा है ताकि प्रणाली के कामकाज में सुधार आए और व्यवसाय सुगमता को बढ़ावा मिले।
कागजी रसीद और नकदी खिड़कियों से अवरोध रहित सेंसर संचालित यात्रा तक भारतीय राजमार्गों में एक खामोश क्रांति आ रही है। देश की टोल संग्रह प्रणाली को डिजिटल समाधानों के जरिए दुरुस्त किया जा रहा है ताकि इंतजार का समय और ईंधन की बर्बादी घटे तथा राजस्व की हानि बंद हो।
भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने भारत के सभी राजमार्गों पर टोल संग्रह को सुचारू बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह (एनईटीसी) कार्यक्रम विकसित किया है। यह इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह के लिए एकीकृत और अंतरसंचालनीय प्लेटफॉर्म है। यह प्रणाली निपटान और विवाद समाधान के लिए एक केंद्रीकृत क्लियरिंग हाउस के जरिए बाधारहित लेन-देन की सुविधा प्रदान करती है।
एनईटीसी के केंद्र में वाहन के अगले शीशे पर चिपकाया जाने वाला रेडियो फ्रिक्वेंसी पहचान (आरएफआईडी) उपकरण, फास्टैग है। इससे वाहनों को टोल केंद्रों पर रुकना नहीं पड़ता और भुगतान उपयोगकर्ता के फास्टैग से जुड़े खाते से खुद-ब-खुद हो जाता है। बूथ का प्रबंधन किसी के भी पास हो, देश के सभी टोल केंद्रों पर एक ही फास्टैग से भुगतान किया जा सकता है।
सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और टोल प्लाजा पर नकद लेनदेन को कम करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क नियम, 2008 में संशोधन किया है जो 15 नवंबर, 2025 से प्रभावी होगा। संशोधित नियमों के तहत, नकद में टोल का भुगतान करने वाले गैर-फास्टैग उपयोगकर्ताओं से मानक शुल्क का दोगुना शुल्क लिया जाएगा, जबकि यूपीआई भुगतान का विकल्प चुनने वालों को टोल राशि का 1.25 गुना भुगतान करना होगा। इसका उद्देश्य टोल संग्रहण को सुव्यवस्थित करना, भीड़-भाड़ को कम करना, अधिक पारदर्शिता लाना और राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवागमन को आसान बनाना है।6
अगस्त 2025 में, भारत ने गुजरात में एनएच-48 पर चौरासी फ़ी प्लाज़ा पर अपना पहला मल्टी-लेन फ्री फ़्लो (एम्एलएफएफ) टोलिंग सिस्टम लॉन्च किया। यह एक बाधा-मुक्त, कैमरा-और आरएफआईडी-आधारित सेटअप है जो चलते हुए वाहनों के फास्टटैग और वाहन संख्याएँ पढ़ सकता है। इस सिस्टम में वाहनों को रोके बिना निर्बाध टोल संग्रह किया जा सकता है जिससे भीड़भाड़ कम होती है, ईंधन की बचत होती है और उत्सर्जन कम होता है।7
भारत भर में राजमार्ग यात्रा को नए सिरे से परिभाषित करने के प्रयास में सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर यात्रियों के समग्र अनुभव को बेहतर बनाने के उद्देश्य से एक नागरिक-केंद्रित मोबाइल एप्लिकेशन, ‘राजमार्गयात्रा’ शुरू किया है। उपयोगकर्ता की सुविधा को ध्यान में रखकर विकसित किया गया यह ऐप, एक वेब-आधारित प्रणाली के साथ वास्तविक समय में अपडेट देता है और बेहतर ढंग से शिकायत निवारण करता है।
राजमार्गयात्रा एक डिजिटल सहयात्री के रूप में कार्य करता है, जो राजमार्गों, टोल प्लाज़ा, आस-पास की सुविधाओं (जैसे पेट्रोल पंप, अस्पताल, इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन) और यहाँ तक कि मौसम की लाइव अपडेट जैसी विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। यह व्यापक डेटा नागरिकों को यात्रा संबंधी निर्णय लेने और अपनी यात्रा की योजना अधिक प्रभावी ढंग से बनाने में मदद करता है।
राजमार्गयात्रा ऐप भारतीय यात्रियों के बीच बहुत तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है। इस ऐप ने गूगल प्ले स्टोर पर समग्र रैंकिंग में 23वें स्थान पर पहुँचकर और यात्रा श्रेणी में दूसरा स्थान हासिल किया है। 15 लाख से ज़्यादा डाउनलोड और 4.5 स्टार की प्रभावशाली उपयोगकर्ता रेटिंग के साथ, यह ऐप देश भर के राजमार्ग यात्रियों के लिए एक लोकप्रिय डिजिटल टूल के रूप में उभरा है।
यह ऐप क्षेत्रीय अधिकारियों (आरओ) और परियोजना निदेशकों (पीडी) से लेकर ठेकेदारों, इंजीनियरों, सुरक्षा लेखा परीक्षकों और टोल प्लाज़ा पर शौचालय पर्यवेक्षकों तक, अंतिमउपयोगकर्ता को सीधे क्षेत्र से परियोजना-संबंधी गतिविधियों की रिपोर्ट करने, उन्हें अपडेट करने और उनपर नज़र रखने में सक्षम बनाता है। जियो-टैगिंग और टाइम-स्टैम्पिंग जैसी सुविधाओं के साथ, ‘एनएचएआई वन’ जवाबदेही बढ़ाता है और साइट पर प्रगति और अनुपालन का सटीक दस्तावेज़ीकरण सुनिश्चित करता है। आंतरिक कार्यकुशलता में सुधार के अलावा, यह ऐप बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दों पर तेजी से प्रतिक्रिया देने और राजमार्ग विकास योजनाओं के सुचारू रूप से कार्यान्वयन को सक्षम करके परियोजना के निर्माण और सार्वजनिक सेवा वितरण के बीच की खाई को पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।10
डिजिटल मानचित्र और स्थानिक प्रतिभा राजमार्गों की परिकल्पना और निर्माण के तरीके को नया रूप दे रहे हैं। यह बदलाव भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और सरकार की प्रमुख पहल, पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (एनएमपी) के बीच तालमेल से हुआ है। भारत में अवसंरचना के विकास, खासकर राजमार्गों के लिए तेज़ी से डिजिटल कमांड सेंटर बनता जा रहा एनएमपी पोर्टल, एकीकृत, बहु-मॉडल कनेक्टिविटी के लिए एक व्यापक डिजिटल एटलस के रूप में कार्य करता है। इसके मूल में एक शक्तिशाली जीआईएस-आधारित प्लेटफ़ॉर्म है जो आर्थिक समूहों, लॉजिस्टिक्स केंद्रों, सामाजिक बुनियादी ढाँचे, पर्यावरणीय विशेषताओं आदि सहित 550 से अधिक लाइव डेटा स्तरों को होस्ट करता है।
एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने संपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क (लगभग 1.46 लाख किलोमीटर) को जीआईएस-आधारित एनएमपी पोर्टल पर अपलोड और सत्यापित कर दिया है। यह भारत के राजमार्गों की योजना और उसके क्रियान्वयन में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, जो कागजों पर टुकड़ों टुकड़ों में बनाई जाने वाली प्रक्रिया की बजाय राष्ट्रव्यापी दृष्टिकोण वाली भू-स्थानिक योजना की ओर अग्रसर है।
जब हम प्रौद्योगिकी संचालित कॉरिडोर की बात करते हैं तो केवल सड़क पूरी कहानी का सिर्फ आधा हिस्सा है। दूसरा आधा हिस्सा पहचान, विश्लेषण, क्रियान्वयन और प्रतिक्रिया का वह तंत्र है जिसे सामूहिक तौर पर बुद्धिमतापूर्ण परिवहन प्रणाली (आईटीएस) के नाम से जाना जाता है। भारत में आईटीएस को मुख्य रूप से उन्नत परिवहन प्रबंधन प्रणाली (एटीएमएस) के जरिए लागू किया जा रहा है। इसे धीमे-धीमे व्यापक वाहन से समस्त (वी2एक्स) संचार तंत्र से जोड़ा जा रहा है। इन प्रणालियों को दुर्घटनाओं और यातायात नियमों के उल्लंघन को घटाने तथा संकट के वक्त के समय तुरंत कार्रवाई करने के लिए डिजाइन किया गया है।
एटीएमएस को दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे, ट्रांस-हरियाणा एक्सप्रेसवे और ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे जैसे प्रमुख एक्सप्रेसवे पर तैनात किया गया है, ताकि घटनाओं का तेज़ी से पता लगाया जा सके और समय पर तेजी से कार्रवाई की जा सके। महत्वपूर्ण बात यह है कि एटीएमएस की स्थापना अब नई उच्च गति वाली राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं का एक अनिवार्य घटक है और इसे प्रमुख मौजूदा गलियारों पर एक स्वतंत्र प्रणाली के रूप में भी अपनाया जा रहा है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत की सड़कें अब बुद्धिमत्ता की ओर बढ़ रही हैं।15 बेंगलुरु-मैसूर एक्सप्रेसवे जैसे गलियारों पर, दुर्घटनाओं की सख्यां से पता चला है कि जुलाई 2024 में उन्नत यातायात प्रबंधन के लागू होने के बाद दुर्घटना से मृत्यु दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है, जो दर्शाता है कि स्मार्ट तरीके अपनाने से लोगों की जान बच सकती है।16
सरकार स्मार्ट प्रौद्योगिकियों के साथ राजमार्ग से संबधित काम में पारदर्शिता और सुरक्षा को बढ़ाने के लिए परियोजना की सूचना वाले क्यूआर कोड युक्त साइन बोर्ड लगाए जायेंगे जिसमें वास्तविक समय के साथ परियोजना का विवरण, आपातकालीन हेल्पलाइन और अस्पतालों, पेट्रोल पंपों और ई-चार्जिंग स्टेशनों जैसी आस-पास की सुविधाओं के बारे में जानकारी दी जाएगी 23 राज्यों में 3 डी लेजर सिस्टम, 360 डिग्री कैमरे आदि से लैस नेटवर्क सर्वेक्षण वाहन (एनएसवी) तैनात किए जाएंगे। यह कैमरे सड़क के अवरोधों का स्वचालित रूप से पता लगाने के लिए 20,933 किलोमीटर की दूरी को कवर करेंगे, जिससे सुगम, सुरक्षित और ज्यादा जानकारी वाली यात्रा का अनुभव किया जा सकेगा।
पर्यावरणीय अनुकूलन की ओर अग्रसर: संवहनीय बुनियादी ढांचे के लिए प्रतिबद्धता19
संवहनीय बुनियादी ढांचे के प्रति भारत की प्रतिबद्धता हरित राजमार्ग (वृक्षारोपण, प्रत्यारोपण, सौंदर्यीकरण और रखरखाव) नीति, 2015 के तहत शुरू किए गए हरित राजमार्ग मिशन में भी दिखाई देती है। इसका उद्देश्य प्रदूषण और ध्वनि को कम करना, मृदा क्षरण को रोकना और रोज़गार के अवसर पैदा करना है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने 2023-24 में 56 लाख से ज़्यादा पौधे लगाए और 2024-25 में 67.47 लाख पौधे और लगाए। इन प्रयासों के साथ, मिशन की शुरुआत से अब तक राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगाए गए पेड़ों की कुल संख्या 4.69 करोड़ से ज़्यादा हो गई लेकिन हरित परिवर्तन सिर्फ़ पौधारोपण तक ही सीमित नहीं है।
एनएचएआई ने राजमार्गों के किनारे स्थित जल निकायों के पुनर्निर्माण पर भी ध्यान केंद्रित किया है। भविष्य के लिए जल संरक्षण हेतु अप्रैल 2022 में शुरू किए गए मिशन अमृत सरोवर के तहत, इसने पूरे भारत में 467 जल निकायों का विकास किया है। इस पहल ने स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्स्थापित करने में मदद की है और राजमार्ग निर्माण के लिए लगभग 2.4 करोड़ घन मीटर मिट्टी उपलब्ध कराई है, जिससे अनुमानित 16,690 करोड़ रूपए की बचत हुई है। 2023-24 में, एनएचएआई ने राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के लिए फ्लाई ऐश, प्लास्टिक कचरा और पुन:उपयोग किए गए डामर जैसी 631 लाख मीट्रिक टन से अधिक पुनरावर्तित सामग्री का उपयोग किया, जिससे पर्यावरण के अनुकूल और संवहनीय निर्माण को प्रोत्साहन मिला।
भारत के राजमार्ग पारंपरिक राजमार्गों से बढ़ते हुए सिर्फ परिवहन नहीं, बल्कि परिवर्तन के वाहक के रूप में उभर रहे हैं। बेशक, यह मिशन शहरों को जोड़ने के अभियान के तौर पर शुरू हुआ था। लेकिन अब यह स्मार्ट, संवहनीय और डिजिटल रूप से सशक्त अवसंरचना के संजाल के जरिए प्रणालियों, लोगों, डाटा और निर्णयों को जोड़ने के महत्वाकांक्षी प्रयास में विकसित हो गया है। जीआईएस संचालित योजना, बुद्धिमतापूर्ण यातायात प्रणालियों, डिजिटल टोल संग्रह और नागरिक केंद्रित ऐप के समन्वय से राजमार्गों का नेटवर्क एक ऐसे ढांचे में तब्दील हो गया है जो वास्तविक समय पर पता लगाता, प्रतिक्रिया देता और सीखता है। हर एक्सप्रेसवे अब संयोजकता का वाहक और राष्ट्रीय बुद्धिमता की संधि भी है। वह सुनिश्चित करता है कि भारत सिर्फ तेज नहीं, बल्कि सुरक्षित, स्वच्छ और ज्यादा पारदर्शी भी हो। हर किलोमीटर अब यातायात से आगे बढ़ कर विश्वास, प्रौद्योगिकी और परिवर्तन का भी वाहक है।
देशभक्ति के जज्बे से ओतप्रोत रही राष्ट्रीय प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता
वन्देमातरम् की 150 वीं वर्षगांठ पर कार्यक्रम का आयोजन
आपणो जटनी परिवार भुवनेश्वर ने मनाया दीपावली पारिवारिक मिलन
एसआरएम विश्वविद्यालय द्वारा प्रोफेसर डॉ. अच्युत सामंत मानद डॉक्टरेट डिग्री से सम्मानित
प्रोफेसर अच्युत सामंत के नाम 69वीं मानद डॉक्टरेट डिग्री है
भुवनेश्वर, 7 नवम्बर: शिक्षा, सामाजिक परिवर्तन और मानवीय सेवा के क्षेत्र में अपने निरंतर और नि:स्वार्थ योगदान के लिए वैश्विक स्तर पर एक और सम्मान प्राप्त करते हुए, कीट- कीस और कीम्स के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत को एसआरएम विश्वविद्यालय, सोनीपत द्वारा मानद डॉक्टरेट (Honorary Doctorate) की डिग्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान विश्वविद्यालय के तीसरे दीक्षांत समारोह में प्रदान किया गया।
भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होकर यह मानद उपाधि डॉ. सामंत को प्रदान की। इस अवसर पर डॉ. टी. आर. पारिवेन्धर, संस्थापक कुलाधिपति, एसआरएमआईएसटी – चेन्नई; प्रो. परमजीत एस. जसवाल, कुलपति, एसआरएम विश्वविद्यालय सोनीपत (हरियाणा); तथा प्रो. वी. सैमुअल राज, रजिस्ट्रार आदि दीक्षांत समारोह में उपस्थित थे।
यह विशिष्ट सम्मान डॉ. सामंत को विश्वभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा प्राप्त 69वां मानद डॉक्टरेट है, जो शिक्षा के माध्यम से वंचित बच्चों को सशक्त बनाने में उनके असाधारण योगदान की पुनः पुष्टि करता है।
एसआरएम विश्वविद्यालय ने अपने प्रशस्ति पत्र में डॉ. सामंत को “सीमा रहित सेवा, भेदभाव रहित शिक्षा और समझौता रहित मानवता” के प्रतीक के रूप में सराहा है। विश्वविद्यालय ने कहा कि उन्होंने ओडिशा के गरीबतम लोगों के उत्थान के लिए शिक्षा और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है।
वहीं डॉ. सामंत ने एसआरएम विश्वविद्यालय, उसकी अकादमिक परिषद् और प्रबंधन बोर्ड के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि “Honoris Causa” उपाधि उनके लिए अत्यंत गर्व और प्रेरणा का विषय है।
मुंबई में साहित्य, संस्कृति और भाषा को नया आकाश देने वाले उमाकांत बाजपेयी
आत्मघाती होती शिक्षा प्रणाली: मौतों का भयावह यथार्थ
एनसीआरबी के आँकड़े बताते हैं कि छात्रों में आत्महत्या के प्रमुख कारण हैं-परीक्षा में असफलता, अभिभावकीय दबाव, भविष्य की चिंता और मानसिक अवसाद। भारत दुनिया के उन शीर्ष देशों में शामिल है जहाँ किशोरों में डिप्रेशन और आत्महत्या की प्रवृत्ति सबसे अधिक है। कबीर ने कहा था-“पढ़ि-पढ़ि पंडित भया, पर भीतर का मन ना गया।” आज की शिक्षा बच्चों को केवल “जानकार” बना रही है, “ज्ञानी” नहीं। विद्यालयों में रट्टामार संस्कृति, अंक-केंद्रित मूल्यांकन और शिक्षकों की संवेदनहीनता बच्चों के भीतर आत्मविश्वास के बजाय भय भर रही है। कई प्रतिष्ठित कोचिंग सेंटर्स में तो यह प्रवृत्ति और विकराल हो जाती है। कोटा, पटना, हैदराबाद, चेन्नई जैसे शहरों में हर वर्ष दर्जनों विद्यार्थी आत्महत्या करते हैं। विडंबना यह है कि वहाँ शिक्षा से ज्यादा “प्रतियोगिता का उद्योग” पनप गया है। बच्चे अपने परिवारों से दूर, दबाव और भय में जीते हैं, और अंततः जीवन से हार जाते हैं।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133