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भुवनेश्वर के कटक रोट पर खुला गणपति होमेज

भुवनेश्वर ।
स्थानीय कटक-पुरी रोड पर सुबह 9.00 बजे अभिषेक मण्डप के समीप गणपित होमेज नामक नया शोरुम खुला।अवसर पर शोरुम के मालिक कैलाश अग्रवाल ने सपत्नीक शोरुम का फीता काटा।अवसर पर स्थानीय मारवाड़ी सोसायटी के अनेक बुजुर्ग और गणमान्य लोग उपस्थित थे। गौरतलब है कि यह नया शोरुम ग्राहकों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर समस्त अत्याधुनिक गृह निर्माण में उपयुक्त होनेवाली तथा शौचालय आदि में प्रयुक्त होनेवाली सामग्रियों से युक्त शोरुम है।

स्वदेशी जागरण मंच द्वारा दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन एवं कार्यालय का उद्घाटन

नई दिल्ली ।
स्वदेशी शोध संस्थान, जो भारत के सभ्यतागत ज्ञान और स्वदेशी विकास मॉडल को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध एक प्रमुख शोध संस्थान है, आधुनिक भारत में स्वदेशी आंदोलन के दूरदर्शी विचारक और संस्थापक श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की जयंती के उपलक्ष्य में 9 और 10 नवंबर 2025 को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन कर रहा है। इस ऐतिहासिक अवसर पर, नई दिल्ली के आईटीओ के पास 46-47, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग स्थित नई पाँच मंजिला इमारत ‘ज्ञान कुंज’ का उद्घाटन किया जाएगा।

यह अत्याधुनिक इमारत स्वदेशी शोध संस्थान के राष्ट्रीय मुख्यालय की मेजबानी करेगी और देश भर में कार्यरत इसके कई अध्यायों की गतिविधियों को एकीकृत करेगी। 9 नवंबर 2025 को उद्घाटन सत्र की मुख्य अतिथि लोकसभा सदस्य बांसुरी स्वराज जी होंगी। इस अवसर पर, स्वदेशी शोध संस्थान भारतीय आर्थिक चिंतन और आत्मनिर्भरता अध्ययन को समर्पित अपनी नई शोध पत्रिका “अर्थायाम” का भी विमोचन करेगा।

राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय: “स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और भारत का पुनरुत्थान”
इस संगोष्ठी में देश के कुछ सबसे प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री, औद्योगिक नेता और नीति विचारक शामिल होंगे, जिनमें प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष डॉ. महेंद्र देव, डीयू के कुलपति डॉ. योगेश सिंह, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सचिन चतुर्वेदी, हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के कुलपति डॉ. बीआर कंबोज, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सोमनाथ सचदेवा, केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलपति प्रोफेसर राजकुमार मित्तल, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार, हिमाचल प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री संजय कुंडू, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर रामसिंह, जेएनयू के प्रोफेसर प्रदीप चौहान शामिल होंगे।

इस अवसर पर राष्ट्रीय संयोजक श्री आर. सुंदरम, राष्ट्रीय सह-संयोजक प्रोफेसर अश्विनी महाजन, राष्ट्रीय सह-संयोजक डॉ. धनपत राम अग्रवाल, राष्ट्रीय संगठक श्री कश्मीरी लाल, राष्ट्रीय संघचालक श्री. सतीश कुमार, राष्ट्रीय संयुक्त संगठक, स्वदेशी जागरण मंच। इस कार्यक्रम में कई अन्य प्रमुख अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों के शामिल होने की संभावना है।

विशेषज्ञ ट्रम्प के बाद की टैरिफ नीति व्यवस्था में भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया, घरेलू उद्योगों और आपूर्ति श्रृंखलाओं को मज़बूत करने, स्वदेशी तकनीक, उद्यमिता और नवाचार को बढ़ावा देने, भारतीय आर्थिक विचारों पर आधारित आत्मनिर्भर भारत के लिए एक रोडमैप तैयार करने और ज़मीनी स्तर पर अनुसंधान, नीति समर्थन और राष्ट्रीय विकास को आगे बढ़ाने में स्वदेशी शोध संस्थान की भूमिका पर विचार-विमर्श करेंगे।
दो दिवसीय संगोष्ठी का उद्देश्य भारत की आर्थिक संप्रभुता को मज़बूत करने और एक समृद्ध एवं विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारत सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक रोडमैप प्रस्तुत करना है।

स्वदेशी शोध संस्थान विद्वानों, नीति निर्माताओं, उद्योग विशेषज्ञों और मीडिया प्रतिनिधियों को इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय चर्चा में शामिल होने के लिए आमंत्रित करता है।

डॉ. अश्वनी महाजन
राष्ट्रीय सह संयोजक

आज का युग अनिश्चितता और पूनर्मूल्यांकन का युग है

भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी कहते हैं,संघ प्रमुख डॉ मोहन भागत कहते हैं और सबसे बड़ी बात विश्व पंचायत,यूएन की रिपोर्ट कहती है कि आज का युग युवाओं का युग है।आज पूरे विश्व का अस्तित्व युवाओं की सकारात्मक सोच और बहु आयामी हुनर पर टिका हुआ है।

हिन्दू धर्म,बौद्ध धर्म,जैन धर्म और सिख धर्म तथा इनके धर्मगुरुओं आदि का भी यह मानना है कि कालांतर में युग की अनिश्चितता और स्व पूनर्मूल्यांकन को अपनाकर ही भारत को विकसित मनाया जा सकता है।

अनिश्चितता तो पल-पल देखने को मिलती है। जिस प्रकार परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है ठीक उसी प्रकार मनुष्य जीवन में प्रतिपल परिवर्तन होते ही रहते हैं।और अपने आचार-विचार,संस्कार और व्यवहार में बदलाव लाकर वर्तमान के साथ चलना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने विजयादशमीः2025 को अपना 100वां स्थापना दिवस  हर्षोल्लास के साथ मनाया। वह पवित्र दिवस संघ के लिए ही नहीं हमसभी के लिए संकल्प दिवस था।गौरतलब है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का त्यागी राजा का जीवन शाश्वत जीवन मूल्यों पर आधारित जीवन था जिन्होंने दुराचारी रावण का वधकर यह संदेश दिया है कि यह विजय न किसी एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति पर और न ही किसी देश की दूसरे देश पर विजय थी परन्तु यह विजय धर्म की अधर्म पर, नीति की अनीति पर, सत्य की असत्य पर, प्रकाश की अंधकार पर और न्याय की अन्याय पर विजय थी जिसकी आवश्यकता आज भारतीय समाज को है।

विजयादशमी का दिवस आज हमारे लिए सतत स्फूर्ति का दिवस है।विजयादशमी का  दिवस सतत आत्मगौरव,नई ऊर्जा आत्ममूल्यांकन के साथ पूनर्मूल्यांकन का भी दिवस है।अगर भारतवर्ष की गौरवशाली परम्पराओं को देखें तो भारत एक आत्मनिर्भर समृद्धिशाली, शक्तिशाली और सभी राष्ट्रों के लिए हितकारी राष्ट्र रहा है।यह भारतराष्ट्र का समाज संस्कारी है,समरस है और आज के युग में शक्तिशाली भी है।

आज के भारतीय समाज में रामराज्य जैसा अमन-चैन अगर लाना है तो सबसे पहले अपने आपको चरित्रवान बनाना होगा,अनुशासित और शिष्टाचारी बनाना होगा।और इसके लिए सबसे पहले स्व की समीक्षा करनी होगी जिससे संस्कारी भारतीय परिवार बने और उससे  सशक्त भारतीय समाज तैयार हो सके।

अगर राष्ट्रपिता बापू के अमर संदेशा को भारत में पुनः प्रतिष्ठ करना है तो सबसे पहले आज के युग में हमसभी भारतवासी को  स्व के भाव के साथ-साथ स्व निरीक्षण-परीक्षण का समय बनाना होगा।स्वदेशी विचार अपनाना होगा, भारतीय संस्कृति,इसकी शाश्वत परंपरा और उसके गौरव को पुनः प्रतिष्ठित करना होगा और यह दायित्व आज सिर्फ और सिर्फ देश के युवाओं को परिवर्तन को अपनाकर स्व का पूनर्मूल्यांकन करके ही संभव है।उन्हें अपने व्यवहार और आचरण में भारतीयता को आत्मसात करना होगा।भारत के सौंदर्यबोध तथा शक्तिबोध को आज के परिपेक्ष्य में समझ-बुझकर अपनाना होगा।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का कहना है कि जब कमल खिलता है तो वहां पर भंवरे स्वतः आ जाते हैं। अगर आज के पश्चिमी सभ्यता के चकाचौंध तथा आणविक संकट के युग से भारत को बचाना है तो हम देश के युवाओं को स्व मूल्यांकनकर और उसी के अनुसार अपने आजार-विचार-संस्कार और संस्कृति को अपनाना होगा।

हमारे सप्त ऋषिगणःमहर्षि अगस्त्य,महर्षि अत्रि,महर्षि वसिष्ठ,महर्षि विश्वामित्र,महर्षि जमदग्नि-परशुराम,महर्षि भृगु और यहां तक कि महर्षि दुर्वासा आदि ने भी परिवर्तन के साथ स्व समीक्षा तथा स्व मूल्यांकन को अपनाने का संदेश दिया है।

शांतिदूत भगवान श्रीकृष्ण ने भी महाभारत युद्ध में महापराक्रमी अर्जुन को परिवर्तन के दौर को स्वीकार करते हुए स्व के पूनर्मूल्यांकन का अमर संदेश दिया है।

अपने बाल्यकाल में परम जिज्ञासु स्वामी विवेकानंद ने भी परिवर्तन के क्रम में स्व मूल्यांकनकर पूरे विश्व को जगतगुरु के रुप में स्व मूल्याकन तथा परिवर्तन को अपनाने का संदेश दिया है।

राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर ने अपने पूरे  जीवन में भारतीय संस्कृति और भारतीय इतिहास का गुणगान किया परन्तु उनके जीवन का सच तो यह है कि उन्होंने भी अपने जीवन के आखिरी समय में परिवर्तन की वास्तविकता को स्वीकारकर तथा स्व समीक्षाकर -हारे को हरि नाम-लिख डाला।इसीलिए तो उनके अनुसार  संस्कृति की परिभाषा संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गईं हैं उनसे अपने आपको परिचित करना ही संस्कृति है।और यह हमेशा परिवर्तन के दौर को सहर्ष स्वीकार कर तथा स्व मूल्याकन से ही संभव है।

हाल ही में जैन धर्म के प्रचारक संतमुनि चन्द्र प्रभ जी का यह  संदेश है कि सम्पूर्ण मानवता के भगवान हैं-महावीर और उन्होंने भी  युग अनिश्चितता को स्वीकरने और पूनर्मूल्यांकन के युग में अपना मूल्यांकन स्वहित,परिवारहित,समाजहित और राष्ट्रहित के लिए अनिवार्य बताया है। राजयोगी ब्रह्मकुमार निकुंज का भी हाल ही में यह कहना है कि हमें परिवर्तन से डरना नहीं चाहिए अपितु उसे सहर्ष अपनाना चाहिए।सत्य तो यह है कि आज का युग अनिश्चितता और

पूनर्मूल्यांकन का युग है-विषय निश्चित रूप से शोध का विषय है जिसपर अनवरत शोध की आवश्यकता है और उसी के अनुसार भारतीय जीवन-शैली को अपनाने की आवश्यकता है।

(लेखक भुवनेश्वर में रहते हैं और ओड़िशा की साहित्यिक, सांस्कृतिक व अध्यात्मिक गतिविधियों पर नियमित लेखन करते हैं, वे राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत भी हो चुके हैं)

ये ‘सज्जन’ कौन थे, इसका निर्णय पाठक स्वयं करें

वे जब भारत में ब्रिटिश सरकार के श्रम मंत्री बने तब के उनके भाषण पढ़िये।मैं सिर्फ एक भाषण का उदाहरण देता हूँ। तत्कालीन कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में ही नहीं, कांग्रेस के बारे में और गांधी व जयप्रकाश नारायण के बारे में उनके विचार इसमें जानिए । उनके द्वारा वायसराय और सेक्रेटरी ऑफ द स्टेट को वीटो की शक्ति प्रदान करने के पक्ष में तर्क पढ़िये। हिटलर और ब्रिटिश सरकार के बीच में फर्क करते हुए वे कहते हैं कि ऑटोक्रेसी में वीटो नहीं होता, उत्तरदायी शासन में वीटो होता है। उनके द्वारा विधायी सदन की जगह सेक्रेटरी ऑफ द स्टेट के पक्ष में वीटो रखने का औचित्यीकरण इसमें पढ़िये।
जिस विधायिका के सामने वे अपना मत रख रहे थे वे उसे वीटो अधिकार के लिए इसलिए अनर्ह मान रहे थे कि वह तीन वर्ष के लिए चुनी गई थी पर नौ वर्ष से चल रही थी पर वे सेक्रेटरी ऑफ द स्टेट और वॉयसरॉय को अनर्ह नहीं कह रहे थे जो आये तो भारत में व्यापार करने के लिए थे लेकिन यहाँ दो सौ साल से कब्जा किये बैठे थे। वे कांग्रेस को एक हिंसक संगठन बता रहे थे और गाँधी को कांग्रेस के संकल्प द्वारा डिक्टेटर और कमांडर इन चीफ बनाये जाने का तथ्य याद दिला रहे थे पर स्वयं एक औपनिवेशिक सत्ता की मूलभूत हिंसक प्रकृति का उल्लेख नहीं कर रहे थे।
वे कह रहे थे कि “यह केवल एक तथ्य नहीं है कि कांग्रेस कार्यसमिति के लगभग सभी सदस्य — या कम से कम उनमें से बहुत से — अहिंसा में अपना विश्वास खो चुके थे; उनमें से बहुत से लोग इस सिद्धांत के प्रति उदासीन हो गए थे, बल्कि पर्याप्त प्रमाण भी उपलब्ध हैं जो संकेत देते हैं कि कांग्रेस के भीतर योजनाबद्ध हिंसात्मक अभियान की कोशिशें की जा रही थीं… मैंने जिन बातों का उल्लेख किया है, वे यह विश्वास दिलाने के लिए पर्याप्त हैं कि कांग्रेस को उस औपचारिक अहिंसा-सिद्धांत के पालन पर भरोसा नहीं किया जा सकता था, जिसे वे लिप सर्विस ही देते हैं।”
क्या यह किसी के भी ध्यान में नहीं कौंधता कि यह आलोचना उस साम्राज्य के मंच से की जा रही थी जिसने दो सौ वर्षों से अधिक समय तक भारत को लूटा, विद्रोहों को कुचला, नीतियों के माध्यम से अकाल थोपे और बंदूक की नली से नियंत्रण बनाए रखा। 1857 का विद्रोह, 1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड और असंख्य शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर लाठीचार्ज केवल ऐतिहासिक घटनाएँ नहीं थीं, बल्कि औपनिवेशिक राज्य की “मूलभूत हिंसक प्रकृति” को फाश कर देने वाली थीं।
यह स्पीच पीड़ित और अपराधी की भूमिकाओं को उलट देती थी: उपनिवेशित लोग प्रतिरोध के लिए आक्रामक ठहराए जा रहे थे, जबकि उपनिवेशक की संस्थागत हिंसा—भारतीय दंड संहिता के दमनकारी प्रावधानों और सैनिकों की स्थायी तैनाती में प्रकट—को “उत्तरदायी शासन” के रूप में पवित्र बनाया जा रहा था। गांधी के अहिंसक असहयोग की पुकार को राजद्रोह में बदल दिया गया था ताकि सामूहिक गिरफ़्तारियाँ और दमन उचित ठहराया जा सके। भाषणकर्ता सज्जन इस असमानता को स्वीकार न कर केवल भारतीय आकांक्षाओं को अवैध ठहरा रहे थे, बल्कि एक नैतिक दोहरा मापदंड भी कायम कर रहे थे, जहाँ दमनकर्ता दमित को नैतिकता का पाठ पढ़ाता था। जिस साम्राज्य के हाथ खून से लथपथ थे, उसके श्रम मंत्री के रूप में कार्य करते हुए ये सज्जन राष्ट्रीय आंदोलन से नैतिक शुद्धता की मांग कर रहे थे।
विधायी सभा सभा भले ही ब्रिटिश युद्ध-स्थगन के कारण विस्तारित हुई हो, इस स्पीच में वीटो अधिकार के अयोग्य ठहराई गई। यह नजरअंदाज करते हुए कि वीटो साम्राज्यवादी नियंत्रण का हथियार था, जो 1935 के भारत सरकार अधिनियम की कथित स्वायत्तता को नाममात्र का बना देता था। ऐतिहासिक रूप से, ऐसे तर्क 1930-40 के दशक की बहसों में प्रचलित थे, जहाँ ब्रिटिश वफ़ादार “उत्तरदायी सरकार” को द्वैध शासन की असफलताओं को छिपाने के लिए इस्तेमाल करते थे, जहाँ गवर्नर वित्त और कानून पर विधायिकाओं को नियमित रूप से ओवरराइड करते थे। पाखंड इस बात में था कि निर्वाचित वैधता का उपदेश देते हुए उन अ-निर्वाचित विदेशियों को सशक्त बनाने में ये सज्जन अपनी विद्वता का उपयोग कर रहे थे जिनकी “योग्यता” नस्लीय श्रेष्ठता से उपजी थी, न कि जनादेश से। पर इन सज्जन के हाथ पर वह औपनिवेशिक घड़ी सजी थी जो हमेशा साम्राज्य के घंटे पर सेट थी तभी लंदन से निगरानी वाले स्टेट सेक्रेटरी के वीटो को “उत्तरदायी” ठहराना संभव हो सकता था।
इस दोहरे मापदंड ने न केवल भारतीय विधायकों का अपमान किया था बल्कि स्वतंत्रता के बाद संसदीय लोकतंत्र में अविश्वास के बीज बोए। वैश्विक संदर्भ में, यह अन्य औपनिवेशिक पाखंडों के समानांतर ही था। फ्रांस का “सभ्यता मिशन” अल्जीरियाई मतों को वीटो करता था।
ये सज्जन लॉर्ड लिनलिथगो के द्वारा युद्धकालीन १००,००० की बिना मुकदमा कैद “शासन” के रूप में सामान्यीकृत कर सकते थे पर गाँधी या जयप्रकाश या स्वयं कांग्रेस की आंतरिक गतिशीलता—अहिंसा में विश्वास खोने—पर ध्यान देने का परिश्रम इनके श्रम मंत्री होने की भूमिका का निर्वहन था। विधायी निकाय को संबोधित करके उसकी अपनी शक्तिहीनता के लिए सहमति मांगना चरम पाखंड था। जब ब्रिटिश “नागरिक स्वतंत्रताएँ” बंदूकों और संगीनों से थोपी जा रहीं थीं तब ये श्रम मंत्री न्यूनतम मजदूरी या यूनियन अधिकार जैसे प्रगतिशील सुधारों को अवरुद्ध करने वाले वीटो का समर्थन कर रहे थे। साम्राज्यवादी “श्रम सुरक्षा” का अर्थ कुली कानून थे जो प्रवासियों को बागानों से बाँधते थे।
भाषणकर्ता सज्जन इस असमानता को स्वीकार न कर न केवल भारतीय आकांक्षाओं को अवैध ठहरा रहे थे, बल्कि एक नैतिक दोहरा मापदंड भी कायम कर रहे थे, जहाँ दमनकर्ता दमित को नैतिकता का पाठ पढ़ाता था। जिस साम्राज्य के हाथ खून से लथपथ थे, उसके श्रम मंत्री के रूप में कार्य करते हुए ये सज्जन राष्ट्रीय आंदोलन से नैतिक शुद्धता की मांग कर रहे थे।
पर नहीं, वे तो दमित दलित के पैरोकार मान लिए गए तो मान लिए गए।
अब इतने बरसों बाद ये बात क्यों उठा रहे हैं?
वो तो सिर्फ उन्हें ही हक था कि सहस्राब्दियों पुरानी किसी किताब का मुद्दा उठा सकें।
(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और मध्यप्रदेश के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं)

आत्मबोध से विश्व बोध की संस्कृति वाला हमारा देश

  ” अयम्  निज:परोवेति, गणना लघु चेतसाम्।
उदार चरितानाम् तु,वसुधैव कुटुम्बकम्।।” चाणक्य नीति 
 यह चिंतन भारतीय संस्कृति की रीढ़ है‌। जैसे  रीढ़ के बिना  शरीर पंगु है उसी  प्रकार उदारता, प्रेम, दया ,करुणा ,स्नेह ,परहित, समाज -सेवा जैसे भावों से रहित मनुष्य का जीवन भी व्यर्थ है ।भारतीय चिंतन में विश्व कल्याण की भावना सर्वोपरि है ।जब तक मनुष्य आत्म चिंतन नहीं करता, तब तक वह अपना परिष्कार नहीं कर सकता। और आत्म परिष्कार के बिना विश्व का कल्याण भला कैसे हो सकता है ?यह दैवीय गुण मनुष्य में तभी उत्पन्न होते हैं, जब वह सर्व हितकारी ,लोकोपकारी चिंतन करता है ।जब तक मनुष्य अपने उद्धार के विषय में विचार नहीं करता, तब तक वह विश्व के कल्याण के विषय में भी विचार नहीं कर सकता।
 क्योंकि आत्मानुभूति हुए बिना दूसरे के दुख की अनुभूति नहीं हो सकती ।
महाभारत, विदुर नीति,पद्म पुराण (19/3573-58)जैसे शास्त्रों में कहा गया है-
“आत्मन:प्रतिकूलानि  परेषां न समाचरेत्।”
 जो आप अपने साथ नहीं चाहते हैं, वैसा  व्यवहार दूसरों के साथ भी ना करें ।
श्रीमदभगवत गीता में भी यही कहा है-
 कि जो मनुष्य अपना आत्म कल्याण चाहता है वही विश्व कल्याण के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है ।
“उद्धरेत् आत्मानं नात्मानं अवसादयेत्।
 आत्मैव हि आत्मनो बंधु:, आत्मैव रिपुरात्मन:।।”6/5
  मनुष्य जो समाज की प्रथम इकाई है; मनुष्य से परिवार; परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है।
राष्ट्रीय उत्थान के लिए मानवीय गुणों से दैवीय गुणों की ओर अग्रसर होना प्रत्येक प्राणी की प्राथमिकता होनी चाहिए। भारतीय संस्कृति में मनुष्य से लेकर के प्रत्येक प्राणी हित चिंतन की बात को ध्यान में रखकर भी सभी के कल्याण की प्रार्थना की गई है ।
बृहदारण्यक, तैत्तिरीय उपनिषद्, भविष्य पुराण, गरुड़ पुराण से लिया गया यह मंत्र सामूहिक कल्याण की भावना से ओतप्रोत है –
  “सर्वे भवंतु सुखिनः ,सर्वे संतु निरामया:।”
यह विचार वही कर सकता है जो संसार के प्रत्येक कण-कण में ईश्वर के स्वरूप को देखता हो।
हमारे यहां ऋषियों ने कहा -कि संपूर्ण सृष्टि जड़ और चेतन आपस में एक माला की तरह जुड़े हुए हैं ।जब  पंच महाभूत स्वस्थ और स्वच्छ रहेंगे ,तभी पंचमहाभूत से निर्मित यह सृष्टि भी स्वस्थ और स्वच्छ रह सकती है। यह तभी संभव है जब हम आत्म कल्याण से विश्व कल्याण का चिंतन करेंगे।
 इसलिए ऋषियों ने कहा-  आकाश में ,पृथ्वी में, जल में, अंतरिक्ष में, औषधियों में, वनस्पतियों में सर्वत्र शांति स्थापित हो। इतना गूढ़ गंभीर चिंतन वही समाज दे सकता है, जो बहुत संवेदनशील हो ।अन्यथा तो मनुष्य में हमेशा ही स्वार्थ भाव प्रबल रहता है ।तामसिक शक्तियां जागृत रहती हैं ।अपना हित ही प्रमुख रहता है ।संघ का कार्य स्तुत्य है।जो सदैव राष्ट्रीय चेतना को प्रत्येक मनुष्य में जागृत करने का पुनीत कार्य करता रहा है। जो राष्ट्र प्रेम से सराबोर असंख्य भारतीयों को मां भारती के चरणों में अपने आप को समर्पित करने का आह्वान करता रहा है ‌।
“भद्रम् कर्णेभि: श्रृणुयाम् देवा:”
यजुर्वेद 25/21
का उद्घोष असंख्य कण्ठों से निनादित हो हमारे चित्त को पवित्र और व्यवहार को राष्ट्रीयता से ओत- प्रोत कर सके ‌। राष्ट्र -आराधन कर सके।
हम अपने कानों से हमेशा भद्र सुनें ।अपने हाथों से संसार के लिए भद्र (कल्याण) का कार्य करें, यह तभी संभव है ,जब हम अपने चरित्र को मानवीयता से परिपूर्ण कर सकेंगे। ‌।
जैसे एक कड़ी से दूसरी कड़ी जुड़ती जाती है वैसे ही राष्ट्र को संगठित करने के लिए हमारा मन ,वचन और कर्म राष्ट्र हित में अग्रसर हो। यही ध्येय होना चाहिए
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
            ऋग्वेद 10/191वांसूक्त
यह वह मंत्र है जो  वैदिक काल से संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र बांधता रहा है ।जहां हमारा चिंतन एक मार्ग पर अग्रसर होकर राष्ट्रहित के लिए प्रवाहित होता है ।प्राचीन समय में भी जब देश अलग-अलग खंडों में विभाजित था, तब भी  राष्ट्रीय एकता को सुदृढ करने के लिए हमारे ऋषियों ने ,आचार्यों ने छात्रों में राष्ट्रीयता का भाव  भरा ‌; ताकि देश बढ़ता रहे ।
  उन गुरुओं में आचार्य चाणक्य का नाम सर्वोपरि है ‌।
श्रीमद्भगवत गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं-
“यो  माम् पश्यति सर्वत्र,सर्वम् च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि,स च मे न‌ प्रणश्यति।।6/30
वेदों में राष्ट्र को एक ब्रह्म के स्वरूप में देखा गया है ।और कहा है -राष्ट्रीय एकता बलवती हो ‌यहां के लोग तेजस्वी हों।यशस्वी हों। क्षत्रिय धर्म को धारण करें ।शत्रुओं का विनाश करें ‌यहां असीम समृद्धि व्याप्त हो। यहां के नागरिक बलवान ,योद्धा और राष्ट्रभक्त  हों।प्रकृति हमारे देश को धन और धान्य से परिपूर्ण करे ।
हम सत्य के मार्ग पर अग्रसर हों।तमस के मार्ग से प्रकाश के मार्ग पर अग्रसर हों ‌ और मृत्यु के मार्ग से अमृत के मार्ग  पर अग्रसर हों। संपूर्ण विश्व में ज्ञान ,प्रेम ,करुणा तेज का दीप  प्रज्ज्वलित करते रहे हैं और आने वाले समय में भी करते रहेंगे।
 हिंदी में भीअनेक कवियों नेराष्ट्रीय एकता का स्वर बुलंद किया और जनता में राष्ट्रीयता का भाव भरा। माखनलाल चतुर्वेदी , श्याम नारायण पांडे ,रामधारी सिंह “दिनकर”  मैथिली शरण गुप्त या जयशंकर प्रसाद हों इन सभी कवियों ने लिखने के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को ही प्रमुख रूप में प्रस्तुत किया ।
 जनता को देश के लिए संगठित होने का भाव दिया ।हमारे देश में जब-जब भी अन्याय ,अत्याचारों ,शोषण के मेघ आच्छादित हुए तब तब कवियों और लेखकों ने अपनी असिवत् प्रहार करने वाली लेखनी का प्रयोग कर आत्मबोध की भावना को भरने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
 राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के शब्दों में –
“हम कौन थे ,क्या हो गए और क्या होंगे अभी?
आओ! मिलकर के विचारें , ये समस्याएं सभी।।‌”
राष्ट्रीयता के भाव को प्रज्ज्वलित करते हुए राष्ट्र कवि रामधारी सिंह “दिनकर” लिखते हैं-
 “मही नहीं जीवित है मिट्टी से डरने वालों से, जीवित हैवह उसे फूंक सोना करने वालों से।”कुरूक्षेत्र
राष्ट्र प्रेम एक धारा, एक प्रवाह है ,जो अपने साथ बड़े से बड़े व्यवधानों को उखाड़ कर ले जाती है।जन आंदोलन के रूप में जब जब भी हिंसा का तांडव होता है ,तब कुछ ऐसे मानवतावादी साहित्यकार और लेखक उत्पन्न होते हैं जो समाज को मनुष्यता के पथ पर चलने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। महाकवि तुलसीदास जी लिखते हैं –
“सब नर करहिं परस्पर प्रीति।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति।।” रामचरितमानस
 ऐसा चिंतन केवल भारतीय साहित्यकार ही दे सकता है ‌जो आत्मबोध से विश्वबोध को जगाने का भाव  रखता हो ,ऐसा दैवीय आभा से ओतप्रोत मेरा देश सदैव विश्व के हित चिंतन में रत है।

भारत में राज्य सरकारों के ऋणों में भारी वृद्धि इन राज्यों की अर्थव्यवस्था को ले डूबेगी

किसी भी नागरिक, वाणिज्यिक संस्थान, राज्य सरकार अथवा केंद्र सरकार द्वारा उत्पादक कार्यों के लिए बाजार से ऋण लेना केवल तब तक ही सही हैं जब तक बाजार से लिए गए ऋण से कम से कम उस स्तर तक आय का अर्जन हो कि इस ऋण के ब्याज एवं किश्त का भुगतान इस आय से आसानी से किया जा सके। परंतु, किसी भी व्यक्ति अथवा संस्थान द्वारा बाजार से ऋण यदि अनुत्पादक कार्य के लिए लिया जा रहा है तो इस ऋण के ब्याज एवं किश्त का भुगतान करना निश्चित ही मुश्किल कार्य हो सकता है। आज भारत के कुछ राज्यों की बजटीय स्थिति पर भारी दबाव पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है क्योंकि इन राज्यों ने बाजार से भारी मात्रा में ऋण लिया हैं एवं इस ऋण का उपयोग अनुत्पादक कार्यों यथा बिजली के बिल माफ करना, नागरिकों के खातों में सीधे राशि जमा करना, मुफ्त पानी उपलब्ध कराना, कुछ पदार्थों पर सब्सिडी उपलब्ध कराना, आदि के लिए किया जा रहा है। इन राज्यों की स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि इन्हें ऋणों पर अदा किए जाने वाले ब्याज एवं किश्तों के भुगतान हेतु भी ऋण लेना पड़ रहा हैं। यदि कुछ और वर्षों तक इन राज्यों की यही स्थिति बनी रही तो निश्चित ही यह राज्य दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच जाने वाले हैं।

हाल ही के कुछ वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा भी बाजार से ऋण लेने की राशि में वृद्धि देखी जा रही है। वर्ष 2019 में केंद्र सरकार पर 1.74 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का ऋण बक़ाया था जो वर्ष 2025 में, लगभग दुगना होते हुए, बढ़कर 3.42 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया है और वर्ष 2029 तक इसके 4.89 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर तक हो जाने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद आज 4.19 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। इस प्रकार, भारत सरकार का ऋण, भारत के सकल घरेलू उत्पाद के 80 प्रतिशत के स्तर को पार कर गया है। केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों की निर्भरता ऋण पर लगातार बढ़ती हुई दिखाई दे रही है जिसे देश की अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता है। आज केंद्र सरकार पर 200 लाख करोड़ रुपए की राशि का ऋण बक़ाया है एवं समस्त राज्य सरकारों पर 82 लाख करोड़ रूपए का ऋण बकाया है, इस प्रकार केंद्र एवं राज्य सरकारों पर संयुक्त रूप से 282 लाख करोड़ रुपए का ऋण बक़ाया है जो देश के सकल घरेलू उत्पाद का 81 प्रतिशत है।

एक तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था ऋण के ऊपर विकसित की जा रही है। जबकि, भारतीय आर्थिक दर्शन ऋण पर निर्भरता को प्रोत्साहन नहीं देता है। चाणक्य के अर्थशास्त्र में, राजा के पास कोष में आधिक्य होने का वर्णन मिलता है। राजा के पास यदि ऋण के स्थान पर कोष का आधिक्य होगा तब वह राज्य अपने नागरिकों के कल्याण पर अधिक राशि खर्च करने की स्थिति में रहेगा। अर्थात, प्राचीन भारत में राज्यों का आधिक्य का बजट रहता था, उसी स्थिति में वे राज्य अपने नागरिकों के कल्याण के कार्यों को तेज गति से चलाने की स्थिति में रहते थे। राज्य का खजाना ही यदि खाली हो तो वे किस प्रकार से राज्य के नागरिकों के लिए भलाई के कार्य कर सकते हैं। आज की स्थिति, बिलकुल विपरीत दिखाई देती है और आज कुछ राज्य बाजार से ऋण लेकर भी नागरिकों को मुफ्त में सुविधाएं उपलब्ध करा रहें हैं बगैर यह सोचे समझे कि आगे आने वाले समय में बाजार से लिए गए ऋण का भुगतान किस प्रकार किया जाएगा।

आज भारत में कुछ राज्यों की स्थिति यह है कि वे अपनी कुल आय का 55 प्रतिशत भाग कर्मचारियों को वेतन, पेन्शन एवं उधार ली गई राशि पर ब्याज के भुगतान करने जैसी मदों पर खर्च कर रहे हैं। जबकि, विभिन्न राज्य अपनी आय को बढ़ा सकने की स्थिति में नहीं है। कुछ राज्य तो वर्ष भर में जिस आय की राशि का आंकलन करते हैं उसे प्राप्त ही नहीं कर पाते हैं और बजटीय आय की राशि एवं वास्तविक आय की राशि में 11 प्रतिशत तक की कमी रहती है, जबकि इन राज्यों के खर्च नियमित रूप से बढ़ते जा रहे हैं और इस प्रकार इन राज्यों का बजटीय घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है और अब यह असहनीय स्थिति में पहुंच गया है।

आज राज्यों की कुल आय का 84 प्रतिशत भाग स्थिर मदों पर खर्च हो रहा है। प्रदेश को आगे बढ़ाने एवं आर्थिक रूप से सम्पन्न बनाने के लिए कुछ राशि इन राज्यों के पास उपलब्ध ही नहीं हो पा रही है। पूंजीगत खर्चों में लगातार हो रही कमी के चलते इन राज्यों में नए अस्पतालों का निर्माण, नए रोड का निर्माण नए स्कूल हेतु भवनों का निर्माण नहीं हो पा रहा हैं, जिससे रोजगार के नए अवसर भी निर्मित नहीं हो पा रहे हैं।  पंजाब में कुल आय का 76 प्रतिशत भाग कर्मचारियों के वेतन, पेन्शन एवं ऋण पर ब्याज अदा करने जैसी मदों पर खर्च हो रहा है इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश में 79 प्रतिशत एवं केरल में 71 प्रतिशत भाग उक्त मदों पर खर्च किया जा रहा है। साथ ही, कुछ राज्यों द्वारा अपनी कुल आय का भारी भरकम हिस्सा सब्सिडी जैसी मदों पर खर्च किया जा रहा है। जैसे, पंजाब द्वारा अपने बजटीय आय का 24 प्रतिशत भाग सब्सिडी पर खर्च किया जा रहा है। इसी प्रकार, हिमाचल प्रदेश द्वारा 5 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश द्वारा 15 प्रतिशत, तमिलनाडु द्वारा 12 प्रतिशत एवं राजस्थान द्वारा 13 प्रतिशत राशि सब्सिडी पर खर्च की जा रही है। पंजाब द्वारा तो अपने बजट की 100 प्रतिशत राशि (24 प्रतिशत सब्सिडी पर एवं 76 प्रतिशत राशि वेतन, पेन्शन एवं ब्याज पर खर्च की जा रही है) सामान्य मदों पर खर्च की जा रही है और पूंजीगत खर्चों के लिए शून्य राशि बचती है।

विभिन्न राज्यों द्वारा पेन्शन की मद पर वर्ष 1980-81 में अपने राज्य की कुल आय का केवल 3.4 प्रतिशत की राशि का खर्च किया जा रहा था जो वर्ष 2021-22 में बढ़कर 24.3 प्रतिशत हो गया। इसी कारण से भारत सरकार ने पेन्शन अदा करने के नियमों में परिवर्तन किया था। आज यदि पेन्शन की नीति को नहीं बदला गया होता तो इस मद पर होने वाला खर्च बढ़कर 30 प्रतिशत के आसपास पहुंच जाता।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश के कई राज्यों ने अपने पूंजीगत खर्च को घटाया है। वर्ष 2015-16 से वर्ष 2022-23 के बीच राज्यों ने अपने पूंजीगत खर्च में 51 प्रतिशत तक की कमी की है। दिल्ली में 38 प्रतिशत, पंजाब में 40 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 41 प्रतिशत पश्चिम बंगाल में 33 प्रतिशत से पूंजीगत खर्चों में कमी दर्ज हुई है। आज कई राज्य सरकारें सब्सिडी प्रदान करने की मद पर अपने खर्चों को लगातार बढ़ा रहीं हैं एवं पूंजीगत खर्चों को लगातार घटा रही हैं, जो उचित नीति नहीं कही जा सकती है। इस प्रकार तो इन राज्यों की अर्थव्यवस्थाएं शीघ्र ही डूबने के कगार पर पहुंच जाने वाली हैं। इन राज्यों में हिमाचल प्रदेश, केरल, पश्चिमी बंगाल जैसे राज्य शामिल हैं।

सब्सिडी, वेतन, पेन्शन एवं ब्याज जैसी मदों पर लगातार बढ़ रहे खर्चों के कारण आज 15 राज्यों का बजटीय घाटा कानूनी रूप से निर्धारित 3 प्रतिशत की सीमा से ऊपर हो गया है। हिमाचल प्रदेश में बजटीय घाटा बढ़कर 4.7 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 4.1 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 4.2 प्रतिशत एवं पंजाब में 3.8 प्रतिशत के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

इसी क्रम में ध्यान में आता है कि मध्य प्रदेश सरकार ने 5200 करोड़ रुपये का नया कर्ज लेने का निर्णय लिया है। यह फैसला इसलिए चर्चा में है क्योंकि भाईदूज के अवसर पर ‘लाड़ली बहना योजना’ के अंतर्गत 1.27 करोड़ महिलाओं के खातों में राशि समय पर नहीं पहुंच पाई थी। इसके बाद सरकार ने प्रदेश स्थापना दिवस पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए ऋण लेने का रास्ता चुना है। जब किसी राज्य को सामाजिक योजनाओं पर खर्च के लिए ऋण लेना पड़े तो यह स्थिति उस प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं कही जा सकती है। मध्यप्रदेश द्वारा ऋण लेने की रफ्तार पिछले कुछ वर्षों में कुछ तेज हुई है। मार्च 2024 तक मध्यप्रदेश राज्य पर 3.7 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था, जो अब बढ़कर 4.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। जबकि, मध्यप्रदेश की आय में इस रफ्तार से वृद्धि नहीं देखी जा रही है। वित्‍तीय अनुशासन की दृष्टि से यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि ब्याज भुगतान का बोझ हर साल बढ़ता जा रहा है। हिमाचल प्रदेश, पंजाब, केरल एवं पश्चिम बंगाल की राह पर कहीं मध्यप्रदेश राज्य भी तो नहीं चल पड़ा है।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

अमीरी में अभिवृद्धि विद्रोह एवं संकट का बड़ा कारण

विश्व अर्थव्यवस्था पर किए गए हालिया अध्ययन विशेषकर जी-20 पैनल की रिपोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि धन और संपत्ति के वितरण में असमानता अब चरम पर पहुंच चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार आज दुनिया की नई बनी संपत्तियों का लगभग तिरेसठ प्रतिशत हिस्सा मात्र एक प्रतिशत अमीर लोगों के पास है जबकि निचले पचास प्रतिशत गरीब लोगों के हिस्से में केवल एक प्रतिशत संपत्ति आई है। यह असमानता केवल आर्थिक नहीं बल्कि नैतिक, सामाजिक और मानवीय संकट का भी संकेत है। यह स्थिति एक आदर्श विश्व संरचना के लिये भी बड़ी बाधा है। यह ऐसी त्रासद, विद्रोहपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति है जिसमें एक तरफ लोग मूलभूत सुविधाओं के अभाव में सड़कों पर उतर रहे हैं तो दूसरी ओर अमीर से और अमीर होते लोगों की विलासिता के किस्से तमाम हैं। उदारीकरण व वैश्वीकरण के दौर के बाद पूरी दुनिया में आर्थिक असमानता रूकने का नाम नहीं ले रही है, इससे एक बड़ी आबादी में विद्रोह एवं क्रांति के स्वर उभर रहे हैं।

सन् 2000 से 2024 के बीच विश्व अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, तकनीकी विकास हुआ, उत्पादन बढ़ा और वैश्वीकरण के नाम पर बाजारों का विस्तार हुआ, लेकिन इस विकास का लाभ समान रूप से नहीं बंटा। अमीर और अमीर होते गए, गरीब और गरीब। सन 2000 में जहां विश्व की कुल संपत्ति का पैंतालीस प्रतिशत हिस्सा शीर्ष एक प्रतिशत लोगों के पास था, वहीं 2024 तक यह बढ़कर तिरेसठ प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया। इसी अवधि में आधी से अधिक आबादी के हिस्से की संपत्ति घटकर केवल एक प्रतिशत रह गई। यह आंकड़े केवल संख्या नहीं, मानवता की दिशा के संकेत हैं कि हम प्रगति के नाम पर असंतुलन का साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं। जो विद्रोह का कारण बन रहा है, हिंसा एवं अलगाव का भी कारण बन रहा है।
जी-20 पैनल के अध्ययन के अनुसार, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर असमानता भयावह स्तर तक जा पहुंची है। निस्संदेह, भारत भी इस स्थिति में अपवाद नहीं है। देश के सबसे अमीर एक फीसदी लोगों ने केवल दो दशक में अपनी संपत्ति में 62 फीसदी की वृद्धि की है। दुनिया की इस चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में अमीर लगातार अमीर होते जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर गरीब अभाव, तंगी एवं जहालत के दलदल से बाहर आने के लिए छटपटा रहे हैं। इस आर्थिक असमानता का ही नतीजा है कि अमीर व गरीब के बीच संसाधनों का असमान वितरण और बदतर स्थिति में पहुंच गया है। ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि देश के शीर्ष दस प्रतिशत लोगों के पास कुल संपत्ति का लगभग सतहत्तर प्रतिशत हिस्सा है जबकि निचले साठ प्रतिशत लोगों के हिस्से में मात्र 4.7 प्रतिशत संपत्ति आती है।
बीते दशक में अरबपतियों की संख्या दोगुनी हो गई लेकिन मजदूर, किसान और मध्यम वर्ग की आमदनी स्थिर रही या घटी। एक ओर महानगरों में गगनचुंबी इमारतें, विलासिता और अति उपभोग की चकाचौंध है, तो दूसरी ओर गाँवों और झुग्गियों में रोटी और दवा के लिए संघर्षरत लोग हैं। यही विरोधाभास हमारी विकास यात्रा का सबसे बड़ा प्रश्न बन गया है।
निस्संदेह, पैनल की हालिया रिपोर्ट नीति-निर्माताओं को असमानता के इस बढ़ते अंतर को पाटने के तरीके तलाशने और नये साधन खोजने के लिये प्रेरित करेगी। पिछले ही हफ्ते, केरल सरकार ने दावा किया था कि राज्य ने अत्यधिक गरीब तबके की गरीबी का उन्मूलन कर दिया है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने इन दावों को लेकर संदेह जताया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गरीबी मुक्त भारत के निर्माण का संकल्प भी आश्चर्यकारी सफलता के साथ आगे बढ़ रहा है। करीब 25 करोड़ लोगों को गरीब से बाहर लाया गया है। इस साल की शुरुआत में, विश्व बैंक ने भी बताया था कि भारत 2011-12 और 2022-23 के बीच 17 करोड़ लोगों को गरीबी की दलदल से बाहर निकालने में सफल रहा है। मोदी सरकार के जन-केंद्रित विकास और सामुदायिक भागीदारी के लाभों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। निस्संदेह, इस पहल ने करोडों अत्यंत गरीब परिवारों को भोजन, स्वास्थ्य सेवा और आजीविका के बेहतर साधनों तक पहुंचने में मदद की है। फिर भी देश में धन-संपत्ति की असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि असंतोष और हिंसा की जड़ है। जब परिश्रमी व्यक्ति को उसका उचित मूल्य नहीं मिलता, जब समाज में अवसर और सम्मान का समान वितरण नहीं होता, तब भीतर आक्रोश और विद्रोह जन्म लेता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने कहा है कि जब पूंजी की आय दर आर्थिक वृद्धि दर से अधिक हो जाती है, तब समाज में असमानता बढ़ती है और लोकतंत्र की जड़ें हिल जाती हैं। आज यही हो रहा है। आर्थिक असंतुलन से सामाजिक असंतुलन उपज रहा है, अविश्वास और द्वेष का वातावरण बन रहा है।
कोरोना महामारी ने इस असमानता को और गहरा किया। जब करोड़ों लोग बेरोजगार और निर्धन हो गए, तब कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों और कंपनियों की संपत्ति कई गुना बढ़ गई। इसका अर्थ यह है कि संकट भी अब वर्ग विशेष के लिए अवसर बन गया है। युद्धों, ऊर्जा संकट और बढ़ती महंगाई ने गरीब देशों की स्थिति को और भी कठिन बना दिया। अमीर देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इन संकटों से भी मुनाफा कमाया जबकि विकासशील देशों में भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य की उपलब्धता घटती गई। विकास का अर्थ हमने केवल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि तक सीमित कर दिया है। समाज में नैतिकता, समानता, सहानुभूति और पर्यावरणीय न्याय जैसे तत्व विकास की परिभाषा से गायब हो गए हैं। अमीर देशों की कंपनियां गरीब देशों के संसाधनों का दोहन करती हैं, और गरीब देशों के श्रमिक उनके उत्पादन का आधार बन जाते हैं। यह एक नया आर्थिक उपनिवेशवाद है, जहां अब सत्ता नहीं, पूंजी शासन करती है।
गरीबी उन्मूलन की तस्वीर को केवल संख्याएं ही पूरी तरह नहीं उकेर सकती हैं। गरीबी कम करने के प्रयासों के दावों के मुताबिक जमीनी स्तर पर गुणात्मक बदलाव भी नजर आना चाहिए, आम जीवनस्तर उन्नत होता हुआ भी दिखना चाहिए। हालांकि, अर्थशास्त्री आमतौर पर संपत्ति कर लगाने के पक्षधर नहीं होते हैं, लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अति-धनी लोग सरकारी खजाने में अपना उचित योगदान दें। अब चाहे कोई अमीर हो या गरीब, सबका ध्यान विकास पर केंद्रित किया जाना चाहिए। तभी देश उत्पादकता के क्षेत्र में आगे बढ़कर गरीबी उन्मूलन की दिशा में सार्थक प्रगति कर सकता है। यह पहल ही नये भारत, विकसित भारत के सपने को साकार करने में मददगार साबित हो सकती है।
गरीबी-अमीरी के असंतुलन की स्थिति से निकलने का एक ही मार्ग है-धन का न्यायपूर्ण पुनर्वितरण, समान अवसर और समाजोपयोगी नीति। कर व्यवस्था ऐसी हो जो अमीरों से अधिक कर लेकर गरीबों की शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर को सुदृढ़ करे। अवसरों की समानता तभी संभव है जब शिक्षा और स्वास्थ्य सभी के लिए समान रूप से सुलभ हों। लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक है ताकि नीति पूंजी के लिए नहीं, नागरिक के लिए बने। परंतु केवल नीतियों से नहीं, दृष्टि से परिवर्तन आएगा। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-“गरीब पापी नहीं, जीवित देवता हैं। उनकी सेवा ही ईश्वर की सेवा है।” दूसरी बड़ी बात है कि जब कुछ लोग सब कुछ पा लेते हैं, तो बाकी सब कुुछ खो देते हैं। इसलिये सरकारें वोट बैंक की राजनीति से इतर ईमानदारी से पहल करें तो गरीबी उन्मूलन की दिशा में सार्थक, समता एवं सतुलन के दृश्य स्थापित किये जा सकते हैं। चुनाव से पहले मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की तेजी से बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। यह एक हकीकत है कि कोई भी सुविधा मुफ्त नहीं हो सकती। इस तरह की लोकलुभावनी कोशिशों से राज्यों का वित्तीय घाटा ही प्रभावित होता है। जिसकी कीमत लोगों को विकास योजनाओं से दूर रहकर ही चुकानी पड़ती है।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

बच्चों में साहित्य की समझ पैदा करने के लिए बाल साहित्य मेले आयोजित

झालावाड़ / बच्चों में साहित्य की समझ पैदा करने और उन्हें साहित्य से प्रेम उत्पन्न करने के किए मिशन बाल मन – 2025 के अंतर्गत
झालावाड़ के तीन विद्यालयों में बाल साहित्य मेलों का आयोजन किया गया। साहित्य परिषद राजस्थान इकाई झालावाड़ के अध्यक्ष सुरेश चंद्र निगम और पूर्व महामंत्री मोहनलाल वर्मा की पहल पर अन्य सदस्यों के साथ स्कूली बच्चों को साहित्य और संस्कृति की जानकारी दी गई और वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया गया।
सुरेश चंद्र निगम ने बताया कि बच्चों को साहित्य से जोड़ने, लेखन अभिरुचि पैदा करने एवं विभिन्न साहित्यिक सृजनात्मक कार्य करने के लिए प्रेरित करने की दिशा में आयोजित इस कार्यक्रम में 240 छात्र – छात्राओं ने रूचिपूर्वक भाग लिया। उन्होंने बताया कि कोटा के लेखक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने मिशन बाल मन तक – 25 के अंतर्गत बच्चों में साहित्य की समझ पैदा करने का व्यापक अभियान चला रखा है।
उन्होंने बताया कि सेंट मदर टेरेसा सीनियर सेकेंडरी स्कूल में साहित्य और संस्कृति प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में कक्षा 6 से 9 तक के 40 बच्चों ने भाग लिया। ज़रीन खान कक्षा 9 प्रथम,  इमरान कक्षा 7 द्वितीय और  यामीन अली, कक्षा 7 तृतीय रहे। राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, तोपखाना झालावाड़ में  प्रधानाचार्य श्रीमती पूनम सेंगर के सहयोग से कनिष्ठ और वरिष्ठ वर्ग में सुलेख प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें 160 बच्चों ने भाग लिया । कनिष्ट वर्ग में सूरज कुमार कक्षा 8 प्रथम,   गुलशन  कक्षा 9 द्वितीय और
अजय कुमार कक्षा 6 तृतीय रहे। वरिष्ठ वर्ग में  प्रियांशु कक्षा 12 प्रथम,  गजपाल सिंह कक्षा 10 द्वितीय और  अंजलि कक्षा 11 तृतीय रहे। पी. एम. सीनियर सेकेंडरी स्कूल दुर्गपुरा जिला झालावाड़ में प्रधानाचार्य  हेमन्त शर्मा  के सहयोग से आयोजित प्रतियोगिता में 40 बच्चों ने भाग लिया।  नवीन मेघवाल कक्षा 12 प्रथम, कल्पना राज कक्षा 11 द्वितीय और बलराम कक्षा 10 तृतीय  रहे।

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प्रेषक : सुरेश चंद निगम
अध्यक्ष
साहित्य परिषद राजस्थान इकाई झालावाड़

स्टार्टअप एक्सेलेरेटर वेवएक्स ने 2 आईएफएफआई गोवा 2025 में वेव्स के लिए स्टार्टअप को आमंत्रित किया

आईएफएफआई गोवा 2025 में वेवएक्स के तहत वेव्स बाजार के लिए बूथ बुकिंग शुरू की। वेवएक्स बूथ वेव्स बाजार में उभरते एवीजीसी-एक्सआर और मीडिया-टेक स्टार्टअप को प्रदर्शित करेंगे, वैश्विक उपस्थिति और नेटवर्किंग के अवसर प्रदान करेंगे

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई), गोवा 2025 में वेवएक्स द्वारा संचालित वेव्स बाजार में विशेष स्टार्टअप शोकेस जोन, वेवएक्स बूथों के लिए बूथ बुकिंग शुरू करने की घोषणा की है।

इस पहल का उद्देश्य एवीजीसी-एक्‍सआर (एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट, गेमिंग, कॉमिक और एक्सटेंडेड रियलिटी) और मनोरंजन क्षेत्र में उभरते स्टार्टअप को वैश्विक उद्योग के दिग्‍गजों, निवेशकों और प्रोडक्शन स्टूडियो से जुड़ने के लिए एक मंच प्रदान करना है।

20 से 24 नवंबर, 2025 तक आयोजित होने वाला वेव्स बाजार, फिल्म बाजार के निकट स्थित होगा, जो आईएफएफआई का प्रमुख नेटवर्किंग केंद्र है और दुनिया भर के फिल्म निर्माताओं, निर्माताओं तथा मीडिया पेशेवरों की प्रभावी भागीदारी के लिए जाना जाता है।

प्रत्येक बूथ 30,000 रुपये प्रति स्टॉल (शेयरिंग आधार पर) की मामूली लागत पर उपलब्ध होगा। भाग लेने वाले स्टार्टअप को निम्नलिखित सुविधाएं प्राप्त होंगी:

2 प्रतिनिधि पास
दोपहर का भोजन और जलपान
शाम का नेटवर्किंग अवसर
वैश्विक फिल्म, मीडिया और तकनीकी पेशेवरों के बीच प्रत्यक्ष उपस्थिति

इच्छुक स्टार्टअप wavex.wavesbazaar.com पर पंजीकरण करा सकते हैं। प्रश्न wavex-mib[at]gov[dot]in पर पूछे जा सकते हैं। सीमित स्टॉल उपलब्ध हैं और आवंटन ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर होगा।

आईएफएफआई, गोवा के बारे में
1952 में स्थापित, भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) एशिया के सबसे महत्वपूर्ण फिल्म समारोहों में से एक है, जो विश्व सिनेमा में उत्कृष्टता का उत्सव मनाता है और फिल्म निर्माताओं, कलाकारों तथा सिनेमा प्रेमियों के लिए एक मिलन स्थल के रूप में कार्य करता है। गोवा में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला आईएफएफआई, वैश्विक फिल्म जगत की भागीदारी को आकर्षित करता है और रचनात्मक सहयोग एवं अवसरों के लिए उत्प्रेरक का काम करता है। 56वां भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) 20 से 28 नवंबर, 2025 तक पणजी, गोवा में आयोजित किया जाएगा।

वेवएक्स के बारे में
वेवएक्स, भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की एक राष्ट्रीय स्टार्टअप एक्सेलेरेटर और इनक्यूबेशन पहल है, जो एवीजीसी-एक्सआर और मीडिया-टेक इकोसिस्टम में नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। अग्रणी शैक्षणिक, उद्योग और इनक्यूबेशन नेटवर्क के साथ सहयोग के माध्यम से, वेवएक्स क्रिएटर और स्टार्टअप को अपने उद्यमों को बढ़ाने में सक्षम बनाता है, जिससे भारत की बढ़ती रचनात्मक अर्थव्यवस्था में योगदान मिलता है।

भारतीय नौसेना अकादमी में भारतीय नौसेना क्विज – थिंक-25 का ग्रैंड फिनाले संपन्न

भारतीय नौसेना अकादमी (आईएनए), एझिमाला में भारतीय नौसेना क्विज थिंक-25 का ग्रैंड फिनाले 05 नवंबर, 2025 को बड़े उत्साह और जश्‍न के साथ संपन्न हुआ। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने इस अवसर पर मुख्य अतिथि थे। यह कार्यक्रम ज्ञान, नवाचार और भारत की समृद्ध समुद्री विरासत का जश्न मनाने वाली एक राष्ट्रव्यापी बौद्धिक यात्रा का समापन था।

“महासागर” थीम पर आधारित इस वर्ष के आयोजन में भारतीय नौसेना की अन्वेषण, उत्कृष्टता और युवाओं में समुद्र के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता समाहित थी। देश भर के हजारों प्रतिभागियों में से, उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले 16 स्कूलों ने सेमीफाइनल के लिए क्वालीफाई किया।

शीर्ष आठ टीमें ग्रैंड फिनाले में पहुंचीं। उन्होंने बुद्धि, टीमवर्क और जिज्ञासा की एक उत्साही प्रतियोगिता में प्रतिष्ठित थिंक-25 ट्रॉफी के लिए प्रतिस्पर्धा की।

जयश्री पेरीवाल हाई स्कूल, जयपुर; भारतीय विद्या भवन, कन्नूर; सुबोध पब्लिक स्कूल, जयपुर; शिक्षा निकेतन, जमशेदपुर; पद्म शेषाद्री बाला भवन सीनियर सेकेंडरी स्कूल, चेन्नई; कैम्ब्रिज कोर्ट हाई स्कूल, जयपुर; डॉ. वीरेंद्र स्वरूप एजुकेशन सेंटर, कानपुर; पीएम श्री जेएनवी, समस्तीपुर फाइनलिस्ट थे।

जयश्री पेरीवाल हाई स्कूल, जयपुर विजेता बना, जबकि पीएम श्री जवाहर नवोदय विद्यालय, समस्तीपुर ने उपविजेता स्थान प्राप्त किया, जिससे थिंक-25 का समापन एक उपयुक्त और प्रेरणादायक तरीके से हुआ।

इस अवसर पर अपने संबोधन में नौसेना प्रमुख ने युवा प्रतिभागियों के उत्साह, जागरूकता और भारत की समुद्री विरासत की गहरी समझ की सराहना की। उन्होंने युवाओं में जिज्ञासा पैदा करने और नवाचार को प्रोत्साहित करने के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि ये ऐसे गुण हैं जो भविष्य में समुद्री क्षेत्र की अग्रणी हस्तियों और विचारकों को आकार देंगे।

ग्रैंड फिनाले का भारतीय नौसेना के आधिकारिक यूट्यूब और फेसबुक पेज पर सीधा प्रसारण किया गया। इसमें देशभर के स्कूलों, नौसेना प्रतिष्ठानों और समुद्री विषयों पर जिज्ञास रखने वाले लोगों ने बड़ी संख्‍या में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

समय के साथ इस क्षेत्र में ज्ञान का निरंतर प्रसार हो रहा है। ऐसे में भारतीय नौसेना थिंक-26 की प्रतीक्षा कर रही है। इन प्रयासों से नवीन प्रतिभाओं को अन्वेषण, संलग्नता और उत्कृष्टता की दिशा में प्रेरणा मिलेगी तथा ज्ञान एवं अन्‍वेषण की यात्रा जारी रहेगी।