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धर्म-स्थलों के हादसेःआखिर कब जागेगा तंत्र?

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम में वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में मची भगदड़ में हुई दर्दनाक मौतों ने एक बार फिर हमारे प्रशासनिक ढांचे, सरकारों की संवेदनशीलता और तंत्र की जवाबदेही पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। हर बार ऐसी त्रासदी होती है, कुछ जानें जाती हैं, कुछ परिवार उजड़ते हैं, कुछ आंसू बहते हैं- फिर वही रटंत बयान, “जांच के आदेश दे दिए गए हैं”, “दोषियों पर कार्रवाई होगी”, “पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया जाएगा” और फिर सब कुछ धूल में मिल जाता है। सवाल यह है कि आखिर हम कब तक इस लापरवाही, इस प्रशासनिक नींद, इस जानलेवा कोेताही और इस संवेदनहीन व्यवस्था का शिकार बने रहेंगे? किसी धार्मिक स्थल पर भगदड़ की यह पहली घटना नहीं, लेकिन अफसोस है कि पुरानी गलतियों से सबक नहीं लिया जा रहा। ऐसी त्रासद, विडम्बनापूर्ण एवं दुखद घटनाओं के लिये मन्दिर प्रशासन और सरकारी प्रशासन जिम्मेदार है, एक बार फिर भीड़ प्रबंधन की नाकामी श्रद्धालुओं के लिये मौत का मातम बनी, चीख, पुकार और दर्द का मंजर बना। इस घटना के बाद जिस तरह से बयान दिए जा रहे हैं, वह पीड़ितों के जले पर नमक छिड़कने जैसा है।
धार्मिक स्थल आस्था के केंद्र होते हैं, ऊर्जा के केन्द्र होते हैं, जहां लोग शांति और श्रद्धा पाने आते हैं, लेकिन यह कैसी विडंबना है कि इन पवित्र स्थलों पर भी लोगों को असमय मृत्यु का सामना करना पड़ता है। श्रीकाकुलम में जो कुछ हुआ, वह केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत विफलता है। भीड़ प्रबंधन के नाम पर प्रशासन हर बार हाथ खड़े कर देता है। न पर्याप्त बैरिकेडिंग, न एंट्री-एग्जिट का संतुलन, न भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त पुलिसबल या वॉलंटियर, न मेडिकल सहायता का इंतजाम। मन्दिरों, त्योहारों और विशेष अवसरों पर श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ के बावजूद तैयारी का नामोनिशान नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है। श्रीकाकुलम में वेंकटेश्वर स्वामी का यह मंदिर कुछ महीने पहले ही खोला गया था और राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि जिले के अधिकारियों को इसके बारे में जानकारी नहीं थी। हालांकि इससे यह जवाबदेही खत्म नहीं हो जाती कि एक धार्मिक स्थल पर क्षमता से कई गुना ज्यादा लोग जुटते चले गए और फिर भी स्थानीय पुलिस-प्रशासन को भनक कैसे नहीं लगी।
सरकार और मंदिर प्रबंधन की बातों से लग रहा है कि दोनों पक्ष घटना से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। मंदिर का निर्माण ओडिशा के जिस शख्स हरि मुकुंद पांडा ने कराया है, उनका कहना है कि सीढ़ियों की रेलिंग टूटने से हादसा हुआ। लेकिन, यही वजह तो काफी नहीं। भगदड़ मचने के बाद श्रद्धालुओं को बाहर जाने का रास्ता नहीं मिल पाया, वह व्यवस्थापकों की लापरवाही का नतीजा है। मंदिर में आने-जाने का एक ही रास्ता था और जब भीड़ अनुमान से अधिक बढ़ती चली गई, तब भी पुलिस-प्रशासन को सूचित नहीं किया गया। इस पर पांडा का कहना कि इस घटना के लिए कोई जिम्मेदार नहीं, यह एक्ट ऑफ गॉड है- इक्कीसवीं सदी के वैज्ञानिक युग में इस तरह की सोच बेहद शर्मनाक है। यह उन लोगों की पीड़ा का मजाक उड़ाने जैसा है, जिन्होंने अपनों को खोया। यह घटना कोई अपवाद नहीं है, बल्कि हाल के वर्षों में दुनिया भर में सामने आई ऐसी घटनाओं की कड़ी का नया खौफनाक मामला है, जहां भीड़ नियंत्रण में चूक एवं प्रशासन एवं सत्ता का जनता के प्रति उदासीनता का गंभीर परिणाम एवं त्रासदी का ज्वलंत उदाहरण है।
श्रीकाकुलम के मातम, हाहाकार एवं दर्दनाक मंजर ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल ही नहीं खोली बल्कि सत्ता एवं धार्मिक व्यवस्थाओं के अमानवीय चेहरे को भी बेनकाब किया है। हर बार जांच, कठोर कार्रवाई करने, सबक सीखने की बातें की जाती हैं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला है। न तो शासन-प्रशासन कोई सबक सीख रहा है और न ही आम जनता संयम एवं अनुशासन का परिचय देने की आवश्यकता समझ रही है। भगदड़ की घटनाओं का सिलसिला कायम रहने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की बदनामी भी होती है, क्योंकि इन घटनाओं से यही संदेश जाता है कि भारत का शासन-प्रशासन भगदड़ रोकने में पूरी तरह नाकाम है। सार्वजनिक स्थलों पर भगदड़ की घटनाएं दुनिया के अन्य देशों में भी होती है, लेकिन उतनी नहीं जितनी अपने देश में होती ही रहती हैं।
यह कोई पहली घटना नहीं है। अतीत में प्रयागराज कुंभ, अयोध्या, हरिद्वार में प्रसिद्ध मनसा देवी मंदिर, सबरीमला, वैष्णो देवी, पुलकेश्वरम, देवरी मंदिर जैसे अनेक स्थलों पर भी ऐसी भगदड़ें हो चुकी हैं। चिंता की बात यह है कि पिछले हादसों से कोई सबक सीखने को तैयार नहीं है। केवल आंध्र में ही इस साल यह तीसरी बड़ी दुर्घटना है। जनवरी में तिरुपति और अप्रैल में विशाखापत्तनम के सिम्हाचलम में भगदड़ से कई मौतें हुई थीं। पूरे देश में इस साल अभी तक भगदड़ की विभिन्न घटनाओं में 114 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। हर बार सरकारें “सीख लेने” की बात करती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि सीखने की क्षमता हमारे तंत्र से जैसे गायब हो चुकी है। धार्मिक आयोजनों की भीड़ का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होता। आज तकनीक का युग है सीसीटीवी, ड्रोन, डिजिटल टिकटिंग, भीड़-सेंसरिंग सिस्टम जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। परंतु इनका उपयोग नहीं किया जाता क्योंकि धर्म और आस्था के नाम पर “प्रबंधन” को हमेशा भाग्य पर छोड़ दिया जाता है।
जब तक कोई हादसा न हो, तब तक कोई अधिकारी मंदिर परिसर में झांकने तक नहीं आता। और जब हादसा हो जाता है, तब “प्रेस कॉन्फ्रेंस” और “मुआवजा” की राजनीति शुरू हो जाती है। यह भी एक सामाजिक प्रश्न है कि क्या हमारी आस्था इतनी अंधी हो चुकी है कि हम सुरक्षा नियमों की अनदेखी कर देते हैं? क्या धार्मिक आयोजनों में अनुशासन और व्यवस्था का पालन करना हमारी श्रद्धा को कम कर देगा? श्रद्धा के नाम पर अराजकता, प्रशासनिक ढिलाई और अव्यवस्था का यह घातक संगम अब रुकना चाहिए। सरकारों को चाहिए कि वे भीड़ प्रबंधन को एक राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बनाएं। हर बड़े धार्मिक स्थल पर स्थायी भीड़ नियंत्रण तंत्र विकसित किया जाए, जिसमें प्रवेश और निकास मार्ग स्पष्ट हों, आपातकालीन निकास गेट हों, प्रशिक्षित स्वयंसेवक हों, मेडिकल टीम और एम्बुलेंस की व्यवस्था हो। स्थानीय प्रशासन को नियमित तौर पर सुरक्षा मॉक ड्रिल करनी चाहिए।
आखिर दुनिया के सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश में हम भीड़ प्रबंधन को लेकर इतने उदासीन क्यों है? बड़े आयोजनों-भीड़ के आयोजनों में भीड़ बाधाओं को दूर करने के लिए, भीड़ प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचे में सुधार, सुरक्षाकर्मियों को पर्याप्त प्रशिक्षण प्रदान करना, जन जागरूकता बढ़ाना और आधुनिक तकनीकों का उपयोग करना अब नितान्त आवश्यक है। आज जरूरत है केवल मुआवजे और जांच की नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की। कौन अधिकारी लापरवाह था, किस विभाग ने सुरक्षा प्रोटोकॉल की अनदेखी की, और क्यों भीड़ को अनियंत्रित छोड़ा गया- इन प्रश्नों का उत्तर दिए बिना जांच बेईमानी है। श्रीकाकुलम की यह त्रासदी एक और चेतावनी है।
अगर अब भी सरकारें नहीं जागीं, तो आने वाले दिनों में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी, क्योंकि धार्मिक आस्था बढ़ रही है, पर प्रबंधन की मानसिकता वही पुरानी बनी हुई है। भीड़ केवल संख्या नहीं होती, वह जीवन है, वह परिवार है, वह उम्मीद है और जब वह कुचल जाती है, तो यह केवल एक हादसा नहीं, शासन की असफलता एवं सरकारी कोताही की द्योतक है। तमिलनाडु के करूर में तमिल सिनेमा के सुपरस्टार थलपति विजय की रैली में हुआ हादसा हो या फिर श्रीकाकुलम की घटना – कुछ गलतियां बार-बार दोहराई जा रही हैं। हादसों के बाद सबक लेने के बजाय जिम्मेदार लोग और संस्थाएं बचने का रास्ता तलाशने लगते हैं। सरकारों को समझना होगा कि भीड़ प्रबंधन भारत जैसे देश की जरूरत है। मुआवजे की घोषणा करके मामले को हल्का किया जा सकता है, लेकिन जवाबदेही तय हो और लापरवाही पर सजा मिले। क्या यह पुकार अब भी सत्ता के कानों तक नहीं पहुंचेगी?
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

भारत में कृषि शिक्षा एवं प्रशिक्षण

कृषि भारत की करीब आधी आबादी की आजीविका का मुख्य साधन है और सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान लगभग 18 प्रतिशत है। उच्च शिक्षा, अनुसंधान और व्यावहारिक प्रशिक्षण के जरिये मानव क्षमता निर्माण उत्पादकता बढ़ाने, लागत कम करने और राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। कृषि शिक्षा, अनुसंधान और शिक्षा संबंधी विस्तार को इस क्षेत्र का प्रमुख स्तंभ माना जाता है जो 5 प्रतिशत कृषि विकास दर के लक्ष्य  को बनाए रखने और “विकसित कृषि और समृद्ध किसान” के राष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्राप्त करने के लिए आवश्यक संस्थागत और वैज्ञानिक आधार तैयार करते हैं। यही “विकसित भारत” का मूल दर्शन है। इस दृष्टिकोण को हासिल करने के लिए, इन तीनों स्तंभों को “एक राष्ट्र – एक कृषि – एक टीम” के मार्गदर्शक सिद्धांत के तहत तालमेल से काम करना होगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा के लिए सर्वोच्च निकाय: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), जिसकी स्थापना 1929 में (कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अधीन) हुई थी। यह कृषि अनुसंधान और उच्च शिक्षा के समन्वय हेतु भारत का प्रमुख संगठन है। यह कृषि, बागवानी, मत्स्य पालन और पशु विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान संस्थानों और विश्वविद्यालयों का मार्गदर्शन करने के लिए उत्तरदायी है।

राष्ट्रव्यापी नेटवर्क: आईसीएआर एक बड़े तंत्र को संभालता है जिसके अंतर्गत 113 राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान (विस्तृत सूची यहां https://icar.org.in/institutes पर देखी जा सकती है) और भारत भर के 74 कृषि विश्वविद्यालय आते हैं। इस वजह से ये दुनिया के सबसे बड़े कृषि अनुसंधान नेटवर्कों में से एक है। इसने हरित क्रांति का नेतृत्व किया और जलवायु-अनुकूल, उच्च उपज वाली किस्मों और कृषि प्रौद्योगिकियों के विकास में अग्रणी बना हुआ है।
शिक्षा संबंधी विस्तार और गुणवत्ता: आईसीएआर अपने प्रभागों के माध्यम से किसानों को तकनीक हस्तांतरित करने के लिए 731 कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) का प्रबंधन करता है। यह ‘आईसीएआर मॉडल अधिनियम (संशोधित 2023)’ और ‘कृषि महाविद्यालयों की स्थापना के लिए न्यूनतम आवश्यकताएं’ जारी करके शैक्षणिक मानक भी निर्धारित करता है और राष्ट्रीय कृषि शिक्षा प्रत्यायन बोर्ड के माध्यम से संस्थानों को मान्यता प्रदान करता है।

सार्वजनिक और निजी संस्थान
सरकारी विश्वविद्यालय और संस्थान: भारत में 63 राज्य कृषि विश्वविद्यालय (एसएयू),तीन केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (सीएयू) (पूसा, इम्फाल, झांसी), चार “मानद” विश्वविद्यालय (आईएआरआई-दिल्ली, एनडीआरआई-करनाल, आईवीआरआई-इज्जतनगर, सीआईएफई-मुंबई) और कृषि संकाय वाले चार केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। आईसीएआर नेटवर्क में 11 एटीएआरआई (कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान) केंद्र भी शामिल हैं।

निजी क्षेत्र: कृषि शिक्षा राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती है। इन राज्यों की निजी संस्थानों की स्थापना और प्रोत्साहन के लिए अपनी नीतियां हैं। आईसीएआर की भूमिका अनुरोध पर मान्यता प्रदान करने तक सीमित है। पिछले पांच वर्षों में, आईसीएआर द्वारा मान्यता प्राप्त निजी कृषि महाविद्यालयों की संख्या 2020-21 में 5 से बढ़कर 2024-25 तक 22 हो गई है।

केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय
वर्तमान में, भारत में तीन केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (सीएयू) संचालित हैं। प्रत्येक विश्वविद्यालय की स्थापना क्षेत्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संसद के एक अधिनियम द्वारा की गई थी:
डॉ. राजेंद्र प्रसाद सीएयू, पूसा (बिहार): अक्टूबर 2016 में पूर्व राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय (स्थापना 1970) से सीएयू में परिवर्तित। इसके 8 संबद्ध महाविद्यालय हैं:
तिरहुत कृषि महाविद्यालय
कृषि स्नातकोत्तर महाविद्यालय
कृषि अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय
सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय
मूलभूत विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय
मत्स्य पालन महाविद्यालय
पंडित दीन दयाल उपाध्याय बागवानी एवं वानिकी महाविद्यालय
कृषि व्यवसाय एवं ग्रामीण प्रबंधन विद्यालय

आरपीसीएयू 8 विषयों (कृषि, बागवानी, कृषि अभियांत्रिकी, सामुदायिक विज्ञान, मत्स्य पालन, जैव प्रौद्योगिकी, वानिकी और खाद्य प्रौद्योगिकी) में स्नातक कार्यक्रम संचालित करता है। इसके अतिरिक्त यह विश्वविद्यालय कई तरह के स्नातकोत्तर कार्यक्रम चलाने के साथ पीएच.डी. भी कराता है। यह विश्वविद्यालय बिहार के समस्तीपुर जिले के पूसा, मुजफ्फरपुर जिले के ढोली और पूर्वी चंपारण जिले के पिपराकोठी में स्थित कई परिसरों के माध्यम से संचालित होता है। यह बिहार में किसानों के साथ अनुसंधान के मामले में संपर्क स्थापित करते हुए 18 कृषि विज्ञान केंद्रों का प्रबंधन भी करता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप, विश्वविद्यालय ने कई अल्पकालिक प्रमाणपत्र और डिप्लोमा कार्यक्रम शुरू किए हैं जिनका लक्ष्य जमीनी स्तर और मध्य-प्रबंधन स्तरों पर प्रतिभाओं को विकसित करना है जो सीधे उद्योग से जुड़ सकें।

केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल (मणिपुर): केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1992 के तहत जनवरी 1993 में स्थापित, यह विश्वविद्यालय पूर्वोत्तर के सात पहाड़ी राज्यों, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, सिक्किम, नागालैंड और त्रिपुरा को सेवाएं प्रदान करता है। सीएयू, इम्फाल, सात पहाड़ी राज्यों में स्थित अपने 13 संबद्ध महाविद्यालयों (पूरी सूची https://cau.ac.in/about-cau-imphal/ पर उपलब्ध है) में शिक्षण, अनुसंधान और शिक्षा संबंधी विस्तार को एकीकृत करके एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाता है। इस समय यह कृषि और संबद्ध विषयों में 10 स्नातक, 48 स्नातकोत्तर और 34 पीएचडी कार्यक्रम चलाता है। इस विश्वविद्यालय में शैक्षणिक वर्ष 2024-25 में कुल 2982 छात्रों का नामांकन हुआ।

रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी (उत्तर प्रदेश): इसकी स्थापना संसद के अधिनियम (2014 का अधिनियम संख्या 10) द्वारा कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डीएआरई) के अंतर्गत राष्ट्रीय महत्व के एक संस्थान के रूप में हुई है। यह विश्वविद्यालय कृषि विज्ञान में उत्कृष्टता केंद्र के रूप में कार्य करता है, जो भारत में शिक्षा, अनुसंधान और शिक्षा संबंधी विस्तार सेवाओं को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित है। आरएलबीसीएयू का पाठ्यक्रम स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी के विद्यार्थियों को कृषि विज्ञान, बागवानी, पशु चिकित्सा विज्ञान और कृषि अभियांत्रिकी आदि विषयों में नवीनतम ज्ञान और कौशल से युक्त करने के लिए तैयार किया गया है। इसके संबद्ध महाविद्यालयों में झांसी (उत्तर प्रदेश) स्थित कृषि महाविद्यालय और उद्यान एवं वानिकी महाविद्यालय, तथा दतिया (मध्य प्रदेश) स्थित मत्स्य पालन महाविद्यालय और पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय शामिल हैं।

कृषि में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)
प्रौद्योगिकी अपनाना: सरकार खेती को आधुनिक बनाने के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है। इसके अनुप्रयोगों में सटीक खेती (सेंसर-चालित सिंचाई, स्वचालित मशीनरी), इमेजिंग और छिड़काव के लिए ड्रोन, पशुधन निगरानी, जलवायु-स्मार्ट ग्रीनहाउस, एआई-चालित कीट/फसल निगरानी और रिमोट सेंसिंग शामिल हैं।

नवाचार केंद्र: विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत राष्ट्रीय अंतर्विषयी साइबर-भौतिक प्रणाली मिशन ( एनएम-आईसीपीएस) के तहत, दिसंबर 2022 तक देश भर में 25 प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्र (टीआईएच) स्थापित किए गए जिनमें से तीन कृषि में आईओटी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अनुप्रयोग पर केंद्रित हैं। उदाहरण के लिए, आईआईटी रोपड़ का कृषि/जल टीआईएच, पूरे भारत में केसर उत्पादन और आपूर्ति के लिए आओटी सेंसर पर काम कर रहा है। आईआईटी बॉम्बे “इंटरनेट ऑफ एवरीथिंग” पर एक टीआईएच से जुड़ा है और आईआईटी खड़गपुर कृत्रिम बुद्धमत्ता/मशीन लर्निंग समाधानों (फसल स्वास्थ्य पूर्वानुमान, उपज पूर्वानुमान) के लिए एक एआई4आईसीपीएस केंद्र चलाता है।

डिजिटल अवसंरचना: इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय ने बेंगलुरु, गुरुग्राम, गांधीनगर और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में आईओटी पर उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए हैं। उदाहरण के लिए, विशाखापत्तनम आईओटी उत्कृष्टता केंद्र (सीओई) कृषि-तकनीक पर केंद्रित है और नवाचार को हर स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए स्टार्टअप्स, उद्योग, निवेशकों और शिक्षा जगत को जोड़ता है। कृषि के लिए राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना के तहत, राज्यों को कृत्रिम बुद्धमत्ता, /मशीन लर्निंग, आईओटी, ब्लॉकचेन आदि का उपयोग करके डिजिटल-कृषि परियोजनाओं को लागू करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती  है।
स्टार्ट-अप इकोसिस्टम: 2018-19 से, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के तहत “नवाचार और कृषि-उद्यमिता विकास” कार्यक्रम वित्तीय सहायता प्रदान करके और कृषि-ऊष्मायन पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करके नवाचार और कृषि उद्यमिता को बढ़ावा दे रहा है। यह पहल कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में स्टार्ट-अप का समर्थन करती है, जिसका दोहरा लाभ है। इससे नए अवसर पैदा होते हैं जिससे किसानों की आय बढ़ती है और ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार पैदा होता है। इस कार्यक्रम के तहत जिन स्टार्ट-अप को सहायता दी जाती है वे कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के विविध क्षेत्रों में कार्यरत हैं, जिनमें कृषि प्रसंस्करण, खाद्य प्रौद्योगिकी और मूल्य संवर्धन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी), सटीक खेती, डिजिटल कृषि, ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकी शामिल हैं।

किसानों का कौशल और प्रशिक्षण
किसानों का कौशल और प्रशिक्षण भारत के कृषि परिवर्तन का केंद्र बन गया है। सरकार ने आधुनिक कृषि आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, किसानों को तकनीकी नवाचारों, जलवायु और बाज़ार परिवर्तनों के अनुकूल बनाने में मदद करने के लिए क्षमता निर्माण को प्राथमिकता दी है। ग्रामीण युवाओं का कौशल प्रशिक्षण (एसटीआरवाई), कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन (एसएमएएम), प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई),और कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) और कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) के माध्यम से की जाने वाली पहल जैसे कार्यक्रम किसानों को स्थायी कृषि पद्धतियों के लिए व्यावहारिक ज्ञान और व्यावसायिक विशेषज्ञता की जानकारी दे रहे हैं।

कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके): आईसीएआर द्वारा संचालित ये केंद्र किसानों के प्रशिक्षण में सबसे आगे हैं। 2021-22 और 2023-24 के बीच, केवीके ने 58.02 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया और यह संख्या हर साल लगातार बढ़ रही है। 2024-25 के पहले दस महीनों में, 18.56 लाख अतिरिक्त किसानों को पहले ही प्रशिक्षित किया जा चुका है। केवीके के पाठ्यक्रमों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उन्नत कृषि विज्ञान, पशुधन देखभाल, मृदा स्वास्थ्य, कटाई के बाद की तकनीक आदि शामिल हैं।

एटीएमए (शिक्षा संबधी विस्तार सुधार योजना): कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) योजना विकेंद्रीकृत कृषि विस्तार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस पहल के तहत, 2021-22 में 32.38 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया गया, इसके बाद 2022-23 में 40.11 लाख और 2023-24 में 36.60 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया गया। जनवरी 2025 तक लगभग 18.30 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया जा चुका था। कुल मिलाकर, 2021-25 के दौरान एटीएमए के माध्यम से लगभग 1.27 करोड़ किसानों को प्रशिक्षित किया गया है।
ग्रामीण युवाओं का कौशल प्रशिक्षण (एसटीआरवाई): एसटीआरवाई कृषि/संबद्ध व्यवसायों (बागवानी, डेयरी, मत्स्य पालन, आदि) में लघु व्यावसायिक पाठ्यक्रम (लगभग सात दिन) संचालित करता है। इसने 2021-22 में 10,456 ग्रामीण युवाओं, 2022-23 में 11,634 और 2023-24 में 20,940 को प्रशिक्षित किया। 2021 से दिसंबर 2024 तक 51,000 से अधिक ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य स्वरोजगार को बढ़ावा देना और गांवों में कुशल कामगार तैयार करना है।
कृषि यंत्रीकरण (एसएमएएम): कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन (एसएमएएम) कृषि मशीनरी के उपयोग पर प्रशिक्षण प्रदान करता है। 2021-25 के दौरान, एसएमएएम ने प्रदर्शनों और कस्टम हायरिंग जागरूकता के माध्यम से 57,139 किसानों को मशीनीकरण में सीधे प्रशिक्षित किया।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना: इस कार्यक्रम के तहत मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किये जाते हैं और किसानों को संतुलित उर्वरक प्रयोग के बारे में शिक्षित किया जाता है। जुलाई 2025 तक, देश भर में 25.17 करोड़ से ज़्यादा कार्ड वितरित किए जा चुके थे। समानांतर प्रयासों में 93,000 से ज़्यादा मृदा स्वास्थ्य प्रशिक्षण आयोजित किये गये और पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों को सिखाने के लिए 6.8 लाख से ज़्यादा फील्ड प्रदर्शनों का आयोजन हुआ।
किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ): बाज़ार-उन्मुख क्षमता निर्माण के लिए, सरकार ने 10,000 से ज़्यादा एफपीओ पंजीकृत किए हैं। डिजिटल मॉड्यूल और वेबिनार के माध्यम से, एफपीओ के किसान कृषि-व्यवसाय प्रबंधन, मूल्य श्रृंखलाओं और विपणन पर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। (छोटे किसानों को एकजुट करके, एफपीओ ग्रामीण क्षेत्रों में लक्षित कौशल विकास और विस्तार में मदद करते हैं)।

निष्कर्ष
भारत की कृषि शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणाली आज शिक्षा, अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और क्षेत्र-स्तरीय कौशल विकास को जोड़कर एक सुव्यवस्थित दृष्टिकोण को दर्शाती है। “एक राष्ट्र – एक कृषि – एक टीम” के दृष्टिकोण से प्रेरित होकर, आईसीएआर, केंद्रीय और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों जैसे संस्थानों ने खेती को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और ज्ञान-आधारित बनाने के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मान्यता संबंधी सुधारों और किसान-केंद्रित प्रशिक्षण पर निरंतर जोर से वैज्ञानिक अनुसंधान और व्यावहारिक अनुप्रयोग के बीच की खाई को पाटने में मदद मिल रही है।

इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और उपयुक्त कृषि उपकरणों जैसी तकनीकों का समावेश आधुनिक और डेटा-आधारित कृषि की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है। एटीएमए, एसटीआरवाई और एसएमएएम जैसी पहलों के माध्यम से, किसानों और ग्रामीण युवाओं को आवश्यक तकनीकी और उद्यमशीलता संबंधी कौशल से युक्त किया जा रहा है, जिससे गांवों में रोजगार और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल रहा है। ये प्रयास मिलकर उच्च उत्पादकता, बेहतर आय और संसाधनों के सतत उपयोग में योगदान दे रहे हैं। चूंकि भारत का लक्ष्य खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भरता और एक ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती है ऐसे में राष्ट्र की कृषि संबंधी प्रगति के लिए शिक्षा नवाचार और कुशलता में तालमेल को बेहतर बनाना जरूरी है।

नई उड़ान, नया क्षितिज – छत्तीसगढ़ में महतारियों के सशक्तिकरण की कहानी

छत्तीसगढ़ अपने विकास-यात्रा के स्वर्णिम पड़ाव पर है। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण आधार बनी हैं – राज्य की महिलाएँ, जिन्हें स्नेह व सम्मान से “महतारी” कहा जाता है।

बीते वर्षों में छत्तीसगढ़ सरकार ने महिला सशक्तिकरण को केवल नीतिगत प्राथमिकता नहीं बनाया, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की धुरी के रूप में स्थापित किया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में आज महिलाएँ योजनाओं की लाभार्थी मात्र नहीं, परिवर्तन की वाहक बनकर उभरी हैं। राज्य में महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए सरकार ने विविध योजनाएँ शुरू की हैं।

सबसे उल्लेखनीय महतारी वंदन योजना है, जिसके तहत लगभग 70 लाख महिलाओं को अब तक 12,983 करोड़ रुपए की राशि वितरित की गई है। यह सहायता महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि परिवार व समाज में निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता भी प्रदान करती है।

दीदी ई-रिक्शा योजना ने 12,000 महिलाओं को रोजगार के नए अवसर दिए। सक्षम योजना के तहत 32,000 महिलाओं को 3 प्रतिशत ब्याज पर 2 लाख रुपए तक व्यवसायिक ऋण दिया गया, जबकि महतारी शक्ति ऋण ने 50,000 महिलाओं को बिना जमानत ऋण प्रदान कर आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त किया। मुख्यमंत्री सिलाई मशीन सहायता योजना से 1.15 लाख महिलाएँ घर-परिवार के साथ उत्पादन कार्य से जुड़कर सम्मानजनक आय अर्जित कर रही हैं।

कोंडागांव की रतो बाई का जीवन कभी नक्सली भय से घिरा था। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) से उन्हें 1.20 रुपए लाख और मनरेगा से 90 दिन का रोजगार मिला। आज वे पक्के घर में सुरक्षित जीवन जीती हैं और सब्ज़ी विक्रय के माध्यम से जीवन यापन करती हैं। उज्ज्वला, नल-जल जैसी सुविधाएँ उनके जीवन में प्रकाश भर रही हैं। दंतेवाड़ा जिले की गंगादेवी SHG की महिलाएँ आज टाटा मैजिक वाहन का संचालन कर 26,000 रुपए मासिक आय अर्जित कर रही हैं। यह उदाहरण बताता है कि ग्रामीण महिलाएँ अवसर मिलने पर कैसे नए व्यवसायों का संचालन कर सकती हैं।

सरगुजा की श्रीमती श्यामा सिंह ने बिहान योजना के तहत 95,000 रुपए की सहायता से 30 सेंट्रिंग प्लेट से काम शुरू किया। आज उनके पास 152 प्लेट हैं तथा वे 50,000 रुपए प्रतिमाह कमाती हैं। कोरबा की श्रीमती मंझनीन बाई को DMF फंड से स्वास्थ्य केंद्र में नियुक्त होकर उन्हें 9,000 रुपए मासिक मानदेय मिलता है। यह न सिर्फ आर्थिक स्थिरता, बल्कि सामाजिक सम्मान भी देता है।

कभी नक्सली हिंसा से भयभीत बस्तर आज नए परिदृश्य के साथ उभर रहा है। यह इलाका आत्मनिर्भरता, सम्मान और अवसरों की नई पहचान बन गया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय कहते हैं कि “बस्तर का पुनर्निर्माण केवल सड़क या पुल बनाना नहीं, यह वहाँ के हर घर में विश्वास का दीप जलाने का संकल्प है।”

केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 15,000 विशेष आवास स्वीकृत किए, जिनमें से 3,000 बस्तर, सुकमा, कांकेर, बीजापुर और दंतेवाड़ा में बन रहे हैं। अब तक 12,000 से अधिक लोग सुरक्षित आवास पा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में महिला SHG की संख्या 2,80,362 है, जिनमें से लगभग 60,000 समूह बस्तर में सक्रिय हैं। वनोपज और हस्तशिल्प आधारित उद्यमों से करोड़ों का कारोबार हो रहा है। “लखपति महिला मिशन” के अंतर्गत 2,000 महिलाएँ सालाना 1 लाख रुपए से अधिक कमाती हैं। ‘जशप्योर’ और बस्तर बेंत उत्पाद राष्ट्रीय पहचान पा चुके हैं। महिलाएँ अब रोजगार पाने तक सीमित नहीं, बल्कि रोजगार-दाता भी बन रही हैं।

स्वास्थ्य और सुविधा को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार की उज्ज्वला योजना के अंतर्गत स्वीकृत 25 लाख नए LPG कनेक्शन में से 1.59 लाख कनेक्शन छत्तीसगढ़ को मिले, जिससे नियद नेल्लानार ग्रामों की महिलाएं भी लाभान्वित हो रही है। मुख्यमंत्री श्री साय कहते हैं -“स्वच्छ रसोई, स्वस्थ परिवार और सशक्त महिला – यही उज्ज्वला का सार है।

छत्तीसगढ़ के 27 जिलों में सखी वन-स्टॉप सेंटर स्थापित हैं, महिला हेल्पलाइन – 181, डायल – 112, 24*7 कार्यरत हैं। नवाबिहान योजना से कानूनी व परामर्श सहायता दी जा रही है। शुचिता योजना से 3 लाख किशोरियाँ लाभान्वित हो रही हैं। 2,000 स्कूलों में नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाई गई है। इन पहलों ने महिलाओं के मन में सुरक्षा और आत्मविश्वास की नई ऊर्जा भरी है।

योजनाएँ महिलाओं को तकनीक-आधारित सशक्तिकरण की ओर ले जा रही हैं। ड्रोन दीदी योजना से महिलाओं का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जशप्योर ब्रांड से लगभग 500 महिलाएँ, 10,000 रुपए प्रति माह कमा रही हैं। नवा रायपुर के यूनिटी मॉल में SHG उत्पादों को प्राथमिकता दी जा रही है। ये नारी शक्ति को स्थानीय से राष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँचाने का मार्ग तैयार कर रही हैं।

महिला एवं बाल विकास मंत्री

श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े कहती हैं कि “नया छत्तीसगढ़ वह होगा जहाँ भय नहीं, विश्वास होगा, जहाँ महिलाएँ आश्रित नहीं, सशक्त होंगी। ”आज छत्तीसगढ़ का हर गाँव, हर घर, हर परिवार में बदलाव की अग्नि प्रज्वलित है। जहाँ पहले भय था – वहाँ आज आत्मनिर्भरता है। जहाँ मजबूरी थी- वहाँ आज सम्मान है। छत्तीसगढ़ की महतारियाँ अब परिवर्तन की राह नहीं देख रहीं- वे स्वयं परिवर्तन की दिशा रच रही हैं।

(लेखिका छत्तीसगढ़ सरकार में उप संचालक, जनसंपर्क विभाग है) 

भारतीय महिला क्रिकेट: नई उड़ान, नई संभावना को सलाम

2 नवंबर 2025 का रविवार भारतीय खेल जगत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया। यह वह दिन था जब नवी मुंबई का डीवाई पाटिल स्पोर्ट्स अकेडमी मैदान न केवल एक विश्व कप का साक्षी बना, बल्कि भारतीय महिला शक्ति की अजेय प्रतिभा और जज्बे का भी प्रमाण देखा। शेफाली वर्मा ने 87 रन की पारी खेल कर विश्वकप को भारत के नाम कराने में अमूल्य योगदान दिया। शेफाली की यह पारी आत्मविश्वास से भरी होने के साथ-साथ सनसनीखेज पारी रही। इसी के साथ स्मृति मंधाना ने अपना सर्वश्रेष्ठ देते हुए भारत के लिये सबसे ज्यादा रन बनाने वाली खिलाड़ी बनी। उनकी टाइमिंग एवं कंवर ड्राइव ने सबका दिल जीत लिया। वैसे टीम का हर खिलाड़ी इस आश्चर्यकारी जीत के लिये बधाई का पात्र है। निश्चित ही भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने आईसीसी महिला विश्व कप 2025 अपने नाम कर ऐसा इतिहास रचा, जो न केवल खेल का अध्याय है बल्कि सामाजिक परिवर्तन और नारी सशक्तिकरण की प्रेरक गाथा भी है। विश्व विजेता बनने के बाद भारतीय महिला क्रिकेट की टीम की चर्चा दुनिया के हर कोने में हो रही है।

यह जीत केवल एक ट्रॉफी भर नहीं, बल्कि उस नारी शक्ति का उद्घोष है जो वर्षों से अपने अस्तित्व को साबित करने में लगी थी। भारतीय बेटियों ने मैदान में यह दिखा दिया कि अब “खेल” सिर्फ पुरुषों का क्षेत्र नहीं रहा, यह वह मंच है जहां नारी की प्रतिभा, रणनीति, धैर्य और आत्मविश्वास अपनी सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति पा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर टीम को बधाई देते हुए कहा कि “यह केवल क्रिकेट की जीत नहीं, बल्कि भारत की नारी शक्ति, परिश्रम और आत्मविश्वास की जीत है।” सच भी यही है कि यह विजय भारत की नई महिला चेतना का प्रतीक है, वह चेतना जो अब हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ रही है। अब भारतीय महिलाओं को हाशिया नहीं, पूरा पृष्ठ चाहिए और यह बात उन्होंने इस ऐतिहासिक जीत को हासिल करके साबित किया है।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार महिला वनडे विश्व कप अपने नाम कर ऐतिहासिक जीत हासिल की है। भारत और दक्षिण-अफ्रीका का फाइनल विश्व कप मैच सदा के लिए इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों के साथ अतीत के पन्नों में दर्ज हो गई है। हरमनप्रीत की कप्तानी में महिला क्रिकेट टीम ने यह यादगार जीत हासिल की है। इससे पहले मिताली राज की कप्तानी में महिला क्रिकेट टीम 2005 और 2017 में फाइनल तक पहुंची थी, लेकिन यहां आकर ट्रॉफी हाथ से फिसल गई थी। भारतीय महिला टीम ने टॉस हारने के बाद भी बल्लेबाजी के लिए उतरी और 298 रन बनाए। साउथ अफ्रीक की टीम इस आंकड़े को छू नहीं पाई, भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने साउथ अफ्रीका को 52 रन से हराकर 47 साल के इंतजार को खत्म किया।

इस महान सफलता के पीछे आईसीसी अध्यक्ष जय शाह की दूरदर्शी नीतियों और नेतृत्व का भी बड़ा योगदान है। उनके कार्यकाल में महिला क्रिकेट को वह सम्मान और अवसर मिले जिसकी वह वर्षों से हकदार थी। जय शाह ने न केवल संरचनात्मक सुधार किए बल्कि महिला क्रिकेट के लिए आधारभूत ढांचे, सुविधाओं और प्रोत्साहन योजनाओं को नई दिशा दी। उन्होंने यह साबित कर दिया कि जब नेतृत्व में दृष्टि होती है, तो इतिहास बदलता है। इस विश्व कप में भारतीय खिलाड़ियों ने अपने खेल से दुनिया को चकित किया। कप्तान हरमनप्रीत कौर ने जिस साहस और सूझबूझ से टीम का नेतृत्व किया, वह प्रेरणा का विषय है। उनके बल्ले से निकले हर रन ने नारी शक्ति की धुन गाई।

स्मृति मंधाना की क्लासिकल बल्लेबाजी ने विपक्षी गेंदबाजों को बेहाल कर दिया, जबकि युवा खिलाड़ी शैफाली वर्मा की आक्रामकता ने नई पीढ़ी की ऊर्जा को स्वर दिया। गेंदबाजी में रेणुका ठाकुर और पूजा वस्त्राकर की सटीक लाइन-लेंथ ने टीम को हर मुश्किल समय में संभाला, वहीं स्पिनर दीप्ति शर्मा ने अपनी जादुई गेंदों से विरोधियों के हौसले पस्त किए। इस टूर्नामेंट में भारत की फील्डिंग और फिटनेस भी अप्रतिम रही, जो यह दर्शाती है कि अब भारतीय महिला क्रिकेट केवल तकनीक नहीं, बल्कि रणनीति और समर्पण के सर्वाेच्च मानकों पर खड़ी है। महिला क्रिकेट खिलाड़ी नवीन क्षमताओं की नई उड़ान भरते हुए हर मन की मुराद पूरी कर रही है। यह जीत केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय खेल संस्कृति में परिवर्तन की दिशा का प्रतीक है। आज भारत की बेटियां छोटे कस्बों और गाँवों से निकलकर विश्व मंच पर चमक रही हैं। यह उस सामाजिक परिवर्तन का परिणाम है जिसमें परिवार, समाज और सरकार ने नारी खेल प्रतिभा को अवसर देना शुरू किया है।

महिला विश्व कप 2025 ने यह सिद्ध कर दिया कि अब भारत में खेल सिर्फ “मैदान” तक सीमित नहीं, यह राष्ट्रीय चेतना और गौरव का हिस्सा बन चुका है। यह नारी स्वाभिमान, श्रम और संघर्ष की कहानी है। क्रिकेट अब केवल पुरुषों की लोकप्रियता का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि महिलाओं की असाधारण योग्यता का उत्सव बन गया है। भारत की यह जीत उस भविष्य की ओर इशारा करती है जहाँ खेल, लिंग भेद से परे, केवल प्रतिभा और परिश्रम के आधार पर सम्मान पाएगा। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की यह ऐतिहासिक विजय केवल कप जीतने की कहानी नहीं है, यह उस भारत की घोषणा है जो अपनी बेटियों को आगे बढ़ाने का साहस रखता है। यह जीत हर उस लड़की की प्रेरणा है जो गली के मैदान में क्रिकेट बैट थामे सपना देखती है कि एक दिन वह भी भारत के लिए खेलेगी। यह स्वर्णिम विजय हमें यह संदेश देती है कि भारत की नारी अब हर क्षेत्र में “खेल बदलने” के लिए तैयार है। जय शाह जैसे सक्षम नेतृत्व और खिलाड़ियों की प्रतिभा से सुसज्जित यह टीम आने वाले समय में विश्व क्रिकेट का नया अध्याय लिखेगी, जहाँ हर शॉट में आत्मविश्वास होगा, हर गेंद में संकल्प, और हर जीत में भारत की बेटियों की दमकती मुस्कान। भारत की बेटियाँ अब सिर्फ खेल नहीं रही हैं बल्कि वे इतिहास रच रही हैं।

देश पर छा रहे अनेकानेक उजालों के बीच महिला विश्व कप 2025 रूपी उजाला देशवासियों को प्रसन्नता का प्रकाश दे गया। संदेश दे गया कि देश का एक भी व्यक्ति अगर दृढ़ संकल्प से आगे बढ़ने की ठान ले तो वह शिखर पर पहुंच सकता है। विश्व को बौना बना सकता है। पूरे देश के निवासियों का सिर ऊंचा कर सकता है। महिलाओं की इस करिश्माई उपलब्धि के बाद अखबारों के शीर्ष में यह समाचार छपा और सबको लगा कि शब्द उन पृष्ठों से बाहर निकलकर नाच रहे हैं। भारतीय महिला खिलाड़ियों ने खिलाड़ीपन के लम्बे रन-अप को पल-पल जीया है। इस दौरान बहुत कुछ पीया है तभी वे विश्व विजेता बनी। वरना यहां तक पहुंचते-पहुंचते कईयों के घुटने घिस जाते हैं। एक बूंद अमृत पीने के लिए समुद्र पीना पड़ता है।

सम्मान, पदवी, उपाधियां, अलंकरण बहुतों को मिलते हैं पर सही सीने पर सही तमगा और सही नाम के आगे सही सम्बोधन कभी-कभी लगता है। जैसा महिला विश्व कप 2025 की भारतीय महिला खिलाड़ियों के सीनों पर लगा है। जब भी कोई अर्जुन धनुष उठाता है, निशाना बांधता है तो करोड़ों के मन में एक संकल्प, एक एकाग्रता का भाव जाग उठता है और कई अर्जुन पैदा होते हैं। अपने देश में हर बल्ला उठाने वाला अपने को गावस्कर, तेंगुलकर विराट कोहली, रोहित समझता है, हर बॉल पकड़ने वाला अपने को कपिल-अर्शदीप, बुमराह समझता है। हॉकी की स्टिक पकड़ने वाला हर खिलाड़ी अपने को ध्यानचंद, हर टेनिस का रेकेट पकड़ने वाला अपने को रामानाथन कृष्णन समझता है। और भी कई नाम हैं, मिल्खा सिंह, पी.टी. उषा, प्रकाश पादुकोन, गीत सेठी, जो माप बन गये हैं खेलों की ऊंचाई के। आज शेफाली हो स्मृति या फिर जेमिमा हो या दीप्ति आज माप बन गयी है और जो माप बन जाता है वह मनुष्य के उत्थान और प्रगति की श्रेष्ठ स्थिति है। यह अनुकरणीय है। जो भी कोई मूल्य स्थापित करता है, जो भी कोई पात्रता पैदा करता है, जो भी कोई सृजन करता है, जो देश का गौरव बढ़ाता है, जो गीतों मंे गाया जाता है, उसे सलाम। भारतीय महिला क्रिकेट टीम को सलाम।

प्रेषकः


(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

मेरी माँ स्व. नीलिमारानीः जिसने अभावों और संघर्ष के बीच मुझे बुलंदियों का रास्ता दिखाया

संतान चाहे अमीर हो या गरीब,प्रत्येक संतान के जीवन में और उसकी सभी प्रकार की कामयाबी में उसकी अपनी मां का विशेष महत्त्व होता है,दिव्य आशीर्वाद होता है,उसका संस्कार होता है,उसका परवरिश और कठोर अनुशासन होता है। यह बात मेरे साथ भी लागू है।मेरी मां ऐसे धनाढ्य परिवार से थी जहां पर उसकी परवरिश बडे लाड-प्यार से हुई थी। उस देदीप्यमान कन्या का विवाह किसी धनी लडके के साथ होना चाहिए था लेकिन उसके भाग्य ने उसका विवाह मेरे दादाजी के चलते एक साधारण, सौम्य तथा ईमानदार गरीब लडके के साथ हो गया। मेरे पिताजी,स्वर्गीय अनादि चरण सामंत बहुत गरीब थे लेकिन वे आजीवन एक नेक,स्वच्छ मन वाले  और सदाचारी इंसान थे।

आप अवश्य सोच रहे होंगे कि मैंने यह पुस्तक- नीलिमारानीःमाई मदर,माई हीरो, क्यों लिखी- सच मानिए इसके लेखन का मूल कारण मेरा मां की अलौकिक दूरदर्शिता तथा उसकी निःस्वार्थ जनसेवा और समाजसेवा थी जिससे वह आजीवन संकल्पित भाव से जुडी रही। सच कबूं तो यथार्थ रुप में वह भारतीय नारी-जाति की गौरव थी जो नारी सशक्तिकरण को नया आयाम देना चाहती थी।

मेरी मां स्वर्गीया नीलिमा रानी सामंत जब मात्र 40 वर्ष की थी तभी मेरे पिताजी का एक रेलदुर्घटना में असामयिक निधन हो गया। मेरे परिवार के भरण-पोषण के साथ-साथ स्वयं के साथ-साथ कुल 7 बच्चों की परवरिश तथा उनकी शिक्षा –दीक्षा की पूरी जिम्मेदारी मेरी विधवा मां के कमजोर कंधों पर आ गई।

मेरे पिताजी निःस्वार्थ जनसेवा,समाजसेवा तथा लोकसेवा के लिए अपने जीवनकाल में  काबुलीवालों से ऋण लिया था। हमलोग इतने गरीब थे कि जब मेरे पिताजी का निधन हुआ तो मेरी मां ने मेरे बडे भाई से यह कहा कि वे अपने पिताजी का अंतिम संस्कार कर के ही कलराबंक,मेरे पैतृक गांव लौटे। मेरी मां अपने जीवन के उन सबसे बुरे दिनों में काफी संघर्ष करके बडे धीरज और साहस के साथ अकेले ही अपनी कुल 7 संतानों को अच्छी शिक्षा प्रदानकर उन्हें नेक तथा स्वावलंबी बनाया।

जब मैंने 192-93 में ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर में कीट-कीस की स्थापना की नींव डाली और जब उसके निर्माण कार्य बडी तेजी के साथ आरंभ हुआ उस वक्त भी मेरी मां ने मेरे पैतृक गांव कलराबंक को भी स्मार्ट विलेज के रुप में विकसित करने की सलाह मुझे दी। उसने कहा कि कलराबंक गांव की अपनी झोपडी की मरम्मत तथा अपने परिवार की खुशी के लिए पैसे-संग्रह करने की जगह कलराबंक गांव के सर्वांगीण विकास के लिए पैसे लगाना।उसने मुझसे यह भी अपने लिए कोई आभूषण खरीदने तथा जगह-जमीन खरीदने के लिए नहीं कहा। मेरे भाइयों को पैसे देने के लिए भी नहीं कहा । उसके अनुसार हम जो कुछ भी कमायें उसका इस्तेमाल हमें अपनी मातृभूमि अपने पैतृक गांव कलराबंक की सेवा में ही लगाना चाहिए।

मैंने आज जो कुछ भी अपने जीवन में असाधारण कामयाबी के रुप में हांसिल किया है, वह सबकुछ अपनी मां के द्वारा प्राप्त बाल-संस्कारों तथा उसके नैतिक जीवन-मूल्यों का प्रतिफल है,जिसे मैंने उसकी आजीवन सेवा करके उसके दिव्य आशीर्वाद के रुप में प्राप्त किया है। मेरी मां की देन मेरी अच्छी परवरिश तथा अच्छे दिव्य संस्कार हैं जिनका अक्षरशः पालन मैं अपने जीवनकाल में करते आ रहा हूं।उसीने मुझे एक नेक,भद्र,परोपकारी,सजाचारी,धार्मिक तथा अच्छा इंसान बनाया है। इसलिए मेरे विदेह जीवन की उन तमाम उपलब्धियों को आज मैं अपनी स्वर्गीया मां नीलिमारानी ,माई मदरःमेरी हीरो को समर्पित करता हूं।

मैं जीवनभर अपनी स्वर्गीया मां नीलिमारानी सामंत के जीवन से अपनाये गये शाश्वत नैतिक और सामाजिक मूल्यों,सिद्धांतों,आध्यकत्मिक विवेक व चेतना तथा उसके शुद्ध जीवन आदि के प्रति ऋणी हूं जिनके बदौलत मैं भी आज पिछले लगभग 60 सालों से एक निःस्वार्थ जननायक,महान् शिक्षाविद् तथा आध्यात्मिक जीवन यापन कर रहा हूं । आज मैं जो कुछ भी हूं,वह सबकुछ मेरी मां स्वर्गीया नीलिमारानी सामंत की ही देन है।

यह पुस्तकः स्वर्गीया नीलिमारानीःमाई मदर,माई हीरो मैंने जो लिखी है वह निश्चित रुप से अपने  जैसे लाखों-करोड़ों युवाओं तथा समस्त नारी-जाति के सशक्तिकरण के लिए ही लिखी है।

(लेखक भुवनेश्वर के प्रसिध्द कीट एवँ कीस जैसे विश्वविद्यालयों के संस्थापक हैं)

एएसबीएल के “बिऑंड फ्यूटर वाल्स ” से रियल एस्टेट में नया अध्याय शुरू

हैदराबाद, तेलंगाना। भारत के सबसे दूरदर्शी रियल एस्टेट डेवलपर्स में से एक, ASBL ने “Beyond Four Walls” कार्यक्रम की मेजबानी की जो हैदराबाद में इस प्रकार का पहला उद्योग आधारित कार्यक्रम है। यह कार्यक्रम रियल एस्टेट ब्रोकर्स और सेक्टर को बढ़ावा देने में व उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को समर्पित था। यह एक पारंपरिक समारोह नहीं था जो केवल क्रय-विक्रय पर केन्द्रित होते हैं। इसके विपरीत इस पहल ने ब्रोकर्स और डेवलपर्स को एक साथ लाने के लिए एक खुले मंच (open forum) के रूप में कार्य किया, जिससे सहयोग, पारदर्शिता और रियल एस्टेट के भविष्य पर संवाद को बढ़ावा मिला।

इंडस्ट्री की आवाज़ उठाने वाला एक मंच

इस इवेंट में चर्चा एवं विचार-विमर्श के लिए देशभर से प्रमुख आवाज़ें एक साथ आईं। डेवलपर्स का प्रतिनिधित्व करते हुए, ASBL के संस्थापक व मुख्य कार्यकारी अधिकारी अजितेश कोरुपोलू ने सैकड़ों बिल्डरों की आवाज़ उठाई जबकि ब्रोकर्स के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व रवि केवलरमानी, मयंक अग्रवाल और दीप्ती मलेक जैसे राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त लीडर्स ने किया।

 

ब्रोकर्स, चैनल पार्टनर्स और रियल एस्टेट पेशेवरों से बने दर्शकों के साथ इस इवेंट ने एक ऐसा स्थान बनाया जहाँ विचारों को स्वतंत्र रूप से और सीधे रखा जा सका।

 

मुख्य विषय और चर्चा

पैनल और दर्शकों ने आज के रियल एस्टेट बाजार से संबंधित मुद्दों के एक विस्तृत स्पेक्ट्रम पर विचार-विमर्श किया:

  • शहरों की तुलना और बुनियादी ढाँचा : मुंबई, दिल्ली और हैदराबाद की जीवनशैली, बुनियादी ढाँचे और सामर्थ्य (affordability) के आधार पर तुलना की गई। पैनलिस्टों ने हैदराबाद के ‘प्लानिंग-फर्स्ट’ दृष्टिकोण की प्रशंसा की और इसकी बढ़ती स्थिति पर प्रकाश डाला।
  • भारतीय रियल एस्टेट का भविष्य (20-30 साल आगे): भविष्यवाणियां वर्टिकल मेगा-सिटी और सैटेलाइट टाउनशिप से लेकर टेक्नोलॉजी-संचालित योजना और NRI मांग के साथ हाइब्रिड, टिकाऊ क्लस्टर तक रहीं।
  • शहरों में खरीदारों की प्राथमिकताएं : युवा खरीदारों को अधिक तर्क-संचालित (logic-driven) के रूप में देखा गया, जो capital appreciation और रेंटल यील्ड की तलाश में हैं। Mumbai में लग्ज़री खरीददारों को स्थान और दृश्यों के लिए अत्यधिक प्रीमियम का भुगतान करते हुए देखा गया, जबकि हैदराबाद वैल्यू-संचालित, विशाल घरों के लिए सबसे अलग रहा।
  • टेक्नोलॉजी की भूमिका : पैनल ने इस बात पर चर्ची की कि डिस्कवरी ऑनलाइन कैसे हुई है और यह कि अगला कदम खरीददार और ब्रोकर के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए लेन-देन, दस्तावेज़ीकरण और एट्रिब्यूशन को डिजिटाइज़ करने में निहित है।

ब्रोकर को आने वाली चुनौतियाँ

इस चर्चा के दौरान एक समर्पित हिस्सा और दर्शकों के कई सवाल ब्रोकर्स के सामने आने वाली चुनौतियों पर केंद्रित थे। क्लाइंट्स द्वारा ब्रोकर्स को बाईपास करने, कमीशन में देरी या इनकार और केंद्रीकृत नियमन की कमी जैसे मुद्दे उठाए गए। पैनलिस्टों ने मजबूत एट्रिब्यूशन सिस्टम, डेवलपर्स के साथ पारदर्शी संचार और दीर्घकालिक साझेदारी की आवश्यकता पर जोर दिया जो ब्रोकर्स के प्रयासों की रक्षा करते हुए निष्पक्ष सहयोग सुनिश्चित करे।
यह क्यों मायने रखता है

ब्रोकर्स को मंच देकर ASBL ने निर्माण से परे सहयोग में अपना विश्वास प्रदर्शित किया। इस पहल ने डेवलपर्स और ब्रोकर्स के बीच दूरी को कम करने का काम किया व इस विचार को मजबूत किया कि भारतीय रियल एस्टेट में प्रगति साझा विश्वास और खुले संवाद पर निर्भर करती है।
इवेंट में बोलते हुए, अजितेश कोरुपोलू ने कहा, “हमारा दृष्टिकोण घर बनाने से आगे बढ़कर, भरोसे का इकोसिस्टम बनाने का है। ब्रोकर्स के लिए एक पारदर्शी, सम्मानजनक मंच बनाकर हम सुनिश्चित करते हैं कि खरीदार और विक्रेता दोनों को मजबूत अधिक सहयोगी उद्योग प्रथाओं से लाभ मिले।”
स्पॉटलाइट में हैदराबाद

पैनलिस्टों ने हैदराबाद के बुनियादी ढाँचे, सामर्थ्य और रहने योग्य होने की प्रशंसा की इसे भारत के “उभरते सितारे” के रूप में स्थापित किया। चर्चाओं में शहर के उच्च-उदय सामर्थ्य, मजबूत बुनियादी ढाँचे, और बढ़ते IT/फार्मा क्षेत्रों के संतुलन पर प्रकाश डाला गया, जिससे यह न केवल एक आकर्षक बाजार बन गया है, बल्कि भविष्य के शहरी विकास के लिए एक खाका (blueprint) भी बन गया है।

Deepika Guleria 
Senior Executive – Media Relations

सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. रामदरश मिश्र का निधन, मातृभाषा ने दी श्रद्धांजलि

इंदौर। देश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पद्मश्री प्रो. रामदरश मिश्र  के निधन पर मातृभाषा ने दी श्रद्धांजलि।
प्रो. रामदरश मिश्र जी का जन्म 15 जून 1924 को गोरखपुर जिले के कछार अंचल के गाँव डुमरी में हुआ था। आपके पिता रामचन्द्र मिश्र और माता कमलापति मिश्र हैं। प्रो. मिश्र बहुआयामी रचनाकार रहे, आपकी सुदीर्घ साहित्यिक सेवाओं के लिए वर्ष 2025 में आपको भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से भी अलंकृत किया। हाल ही में मातृभाषा उन्नयन संस्थान द्वारा जीवन गौरव सम्मान से भी सम्मानित किया गया। आपने कई किताबें लिखी हैं।
मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ ने कहा कि ‘निःसंदेह एक पिता तुल्य व्यक्तित्व का देह को त्यागकर अक्षर देह में परिवर्तित हो जाना, हमारे समय की अपूरणीय क्षति है। कई स्मृतियों के साथ उनसे जुड़ाव रहा, पुस्तक मेले में हुई उनसे मुलाक़ात, घर पर पूज्य माताजी सरस्वती देवी जी की मौजूदगी में उनका आशीर्वाद और फिर कई कार्यक्रम और भेंट। ऐसी अनगिनत स्मृतियों को आज आँखों को भिगाने का अवसर मिल गया।’
संस्थान की राष्ट्रीय सचिव भावना शर्मा ने कहा कि ‘हम भाग्यशाली हैं कि हमें कीर्तिशेष रामदरश मिश्र जी का सानिध्य, साथ और सम्बल मिला है।’ उनके निधन पर कवि राजकुमार कुम्भज, मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ सहित राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नितेश गुप्ता, राष्ट्रीय सचिव भावना शर्मा, सह सचिव सपन जैन काकड़ीवाला, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष शिखा जैन, कार्यकारिणी सदस्य गणतंत्र ओजस्वी, डॉ. नीना जोशी, मणिमाला शर्मा, अनुपमा समाधिया आदि सदस्यों ने गहरा दु:ख व्यक्त करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।

सियासत के पार गहलोत और माथुर की मुलाकात के मायने

राजनीति में जब विरोधी विचारधाराओं के दो दिग्गज नेता अकेले में मिलते हैं, तो हलचल होना स्वाभाविक है। परंतु कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं, जो राजनीति के दायरे से ऊपर उठकर मानवीय मजबूतियों और रिश्तों की सच्चाई को बयान करती हैं। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सिक्किम के राज्यपाल ओमप्रकाश माथुर की जयपुर में हुई भेंट भी कुछ वैसी ही रही। यह मुलाकात न किसी राजनीतिक सौदेबाजी का संकेत थी, न कोई भावी रणनीति का हिस्सा और न ही सियासत की सांसों के सच को संवारने की कोशिश। बल्कि यह वह पल था, जब जीवन की आत्मीयता, पुरानी यादों के साये और आपसी सम्मान की भावना ने सियासत की सीमाओं को और विस्तार दे दिया। इस मुलाकात ने यह याद दिला दिया कि राजनीति के मैदान में भले ही विचारधाराएं टकराती हों, लेकिन रिश्तों का संसार सदा संवेदनाओं से सहेजा रहता है।

 

राजस्थान के दिग्गज बीजेपी नेता रहे और अब सिक्किम के राज्यपाल ओमप्रकाश माथुर 1 नवंबर 2025 को सुबह जयपुर में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सिविल लाइंस स्थित निवास पर अपने परिवार में होने वाले विवाह समारोह का निमंत्रण देने पहुंचे। यह दृश्य राजस्थान की राजनीति में एक सुकून भरा अपवाद था। गहलोत ने उनका आत्मीयता से स्वागत किया, और दोनों के बीच पारिवारिक स्तर की बातचीत हुई। कोई राजनीतिक विमर्श नहीं, कोई रणनीति नहीं — बस सिर्फ संबंधों की गर्माहट। आजकल की राजनीति के कठोर और प्रायः आरोप – प्रत्यारोप भरे माहौल में, यह मुलाकात जीवन के मानवीय पक्ष को सहेजने का अवसर बन गई। गहलोत से इस मुलाकात को राज्यपाल माथुर ने स्वयं भी रील के जरिए सोशल मीडिया पर प्रेषित करके संबंधों के सच को संवारा है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी सहयोगी रहे राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि सियासत का यही वह मानवीय पहलू है जो बताता है कि राजनेताओं के बीच मतभेद तो हो सकते हैं, लेकिन रिश्तों की डोर अगर सच्चाई और सद्भाव से बुनी हुई हो, तो वह कभी कमजोर नहीं पड़ती। परिहार कहते हैं कि वैसे भी राजस्थान की राजनीति में ओमप्रकाश माथुर और अशोक गहलोत केवल बीजेपी या कांग्रेस के नेता नहीं, बल्कि जन नेता माने जाते हैं और उससे भी आगे, दोनों नेता राजनीति की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने सियासत को सेवा और संवाद का माध्यम माना है।

 

 

अशोक गहलोत आज के दौर में, कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं, जबकि राज्यपाल बनने से पहले ओमप्रकाश माथुर भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकार रहे हैं। गहलोत और माथुर दोनों की छवि अपने अपने स्तर पर वैचारिक रूप से बेहद दृढ़ नेता की रही हैं। एक जन्म से संघ परिवार का स्वयंसेवक, तो दूसरा सदा से गांधीवादी। सामान्यतः राजनीति में ऐसे नेताओं के बीच संबंध औपचारिक या स्पष्ट दूरी भरे होते हैं। परंतु गहलोत और माथुर दोनों की की विशेषता यही रही है कि वे विचारधारा से परे जाकर इंसानियत और आत्मीयता को प्राथमिकता देते हैं। यही कारण है कि वे विरोधी दल के नेताओं से भी सद्भाव बनाए रखते हैं। उनके भीतर एक ‘राजनीतिक सज्जनता’ की वह परंपरा जीवित है, जो अब धीरे-धीरे राजनीति से गायब होती जा रही है। राजस्थान की राजनीति के जानकार वरिष्ठ पत्रकार हरिसिंह राजपुरोहित का मानना है कि अशोक गहलोत की यही सहजता उन्हें न केवल अपनी पार्टी में, बल्कि विपक्ष के नेताओं के बीच भी सम्मान दिलाती है। राजपुरोहित कहते हैं कि माथुर और गहलोत की यह मुलाकात भले ही विवाह के आमंत्रण के लिए थी, लेकिन असल में, यह दोनों के एक दूसरे के प्रति सहज, सरल और सुदृढ़ मानवीय दृष्टिकोण का विस्तार है।

 

 

राजस्थान की राजनीति में यह कोई रहस्य नहीं कि गहलोत के लगभग सभी दलों के नेताओं से आत्मीय संबंध रहे हैं। माथुर की गहलोत से मुलाकात के बहाने बीजेपी के बड़े नेताओं की बात करें, तो भैरोंसिंह शेखावत से उनके स्नेहपूर्ण संबंध रहे। वसुंधरा राजे के साथ भी गहलोत का संवाद सदा सौहार्दपूर्ण रहा है। गुलाबचंद कटारिया की फकीरी के गहलोत भी कायल हैं, तो डॉ सतीश पूनिया से भी उनका अपनापन रहा है। इसी तरह से शेखावत, राजे, कटारिया, पूनिया और माथुर के मन में भी गहलोत के प्रति कभी कटुता नहीं रही। ओमप्रकाश माथुर, जो भले ही वर्तमान में राज्यपाल हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के संगठनात्मक स्तंभ रहे हैं, उनका केंद्र भी सदा राजस्थान ही रहा है। यही साझा भूमि गहलोत और माथुर को जोड़ती रही है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी माने जाते हैं और उनकी राजनीति की गहराई को जानते भी हैं। परिहार बताते हैं कि गहलोत की यह सदा से मान्यता रही है कि राजनीतिक विचारधाराएं भले अलग हों, मगर आपसी सम्मान में कभी कमी नहीं आई आनी चाहिए। वे बताते हैं कि राजनीति में विचारधारा के चलते राजनीतिक आलोचना भले ही करे, लेकिन गहलोत किसी के भी प्रति राजनीतिक तौर पर व्यक्तिगत कटुता कभी नहीं रखते।

 

 

सियासत में संबंध सौदेबाजी से नहीं, बल्कि सदाशयता से बनते हैं। अशोक गहलोत इस कला में निपुण हैं। गहलोत के तीन बार के मुख्यमंत्रित्व काल के 15 वर्षों के दौरान अनेक अवसर आए, जब उन्होंने विरोधी दलों के नेताओं के सुझावों को भी दिल खोल कर अपनाया। वरिष्ठ पत्रकार हरिसिंह राजपुरोहित कहते हैं कि उदयपुर में झीलों के जल संकट को सुलझाने के लिए मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने धुर विरोधी, भाजपा नेता गुलाबचंद कटारिया के आग्रह पर देवास द्वितीय प्रोजेक्ट के लिए 50 करोड़ रुपए एक पल में ही मंजूर कर दिए। यह निर्णय किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं था, बल्कि जनता के हित और रिश्तों के सम्मान का प्रतीक था। राजपुरोहित कहते हैं कि गहलोत की यही कार्य शैली बताती है कि राजनीति यदि मानवीय दृष्टिकोण से की जाए, तो विरोध भी सहयोग में बदल सकता है। यही संवेदनशीलता उन्हें आज भी राजस्थान की राजनीति में एक अलग पहचान देती है। वैसे भी, राजनीति की भाषा चाहे बदल जाए, लेकिन ऐसी आत्मीय मुलाकातें हमें याद दिलाती हैं कि विचारधारा अलग हो सकती है, मगर विचारशीलता और विनम्रता ही राजनीति की असली पहचान है।

 

 

दरिया दिल कहे जाने वाले दो दिग्गज नेताओं, अशोक गहलोत और ओमप्रकाश माथुर की मुलाकात ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि राजनीति सिर्फ सत्ता की जंग नहीं, बल्कि उसके साये में रिश्तों और संवेदनाओं का भी संसार सदा विकसित होता रहता है। राजनीतिक विश्लेषक संदीप सोनवलकर कहते हैं कि गहलोत और माथुर की इस मुलाकात ने, न केवल सियासत को एक नई सोच दी, बल्कि लगातार टुच्चेपन और ओछेपन से सराबोर होती सियासत के किरदारों यह भी याद दिलाया है कि संवाद और सद्भाव ही राजनीति की असली आत्मा हैं। साथ ही दोनों नेताओं की यह की मुलाकात उस परंपरा का भी प्रतीक है, जहां सियासी सीमाएं इंसानी रिश्तों के आगे सीमित पड़ जाती हैं। सच्चे नेता वही हैं जो सत्ता से परे इंसानियत के रिश्तों को निभाते रहें।

(लेखक राजस्थान की समझ रखने वाले निवेश सलाहकार हैं)

कोटा के डॉ. प्रभात कुमार सिंघल को मिला लाइफ टाइम्स अचिवमेंट्स अवॉर्ड

कोटा /  राजस्थान में कोटा के लेखक एवं पत्रकार डॉ. प्रभात कुमार सिंघल को युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच न्यास, नई दिल्ली द्वारा रविवार को दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी में लाइफ टाइम्स अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।  संस्था के 12 वें अखिल भारतीय साहित्य समारोह में डॉ. सिंघल को डी.पी.चतुर्वेदी स्मृति में लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान पांच हजार एक सौ रुपए राशि के पुरस्कार से अतिथियों द्वारा सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें विगत चार दशकों से निरंतर अपने उत्कृष्ट मौलिक सृजन के द्वारा  हिंदी भाषा,पत्रकारिता,इतिहास, कला, संस्कृति और हिंदी साहित्य के उन्नयन हेतु  उल्लेखनीय योगदान हेतु प्रदान किया गया। इनके साथ – साथ देश के 8 साहित्यकारों को भी  विविध विधाओं में मौलिक सृजन के लिए पुरस्कृत कर सम्मानित किया गया।
  समारोह के प्रमुख मुख्य अतिथि पूर्व आइए एस विनोद प्रकाश गुप्ता, मुख्य अतिथि महेश दिवाकर, अध्यक्ष शैलेन्द्र कपिल एवं अन्य अतिथियों ने माला  पहना कर, शाल ओढ़ा कर सम्मान पत्र एवं पुरस्कार राशि प्रदान कर साहित्यकारों का सम्मान किया। संस्था अध्यक्ष  रामकिशोर उपाध्याय ने सभी का स्वागत किया। अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर समारोह का शुभारंभ किया। समारोह में साहित्यिक विषयों पर परिचर्चा, रामकिशोर उपाध्याय की पुस्तक लालटेन सहित कई लेखकों की पुस्तकों और संस्था की वार्षिकी का विमोचन और काव्य गोष्ठी का आयोजन भी किया गया।

भारत की गौरवशाली समुद्री सीमाएँ

भारत के व्यापार का परिमाण के लिहाज से लगभग 95 प्रतिशत और मूल्य के हिसाब से तकरीबन 70 प्रतिशत हिस्सा समुद्री मार्गों के जरिए होता है। इससे भारत की अर्थव्यवस्था और प्रतिस्पर्धिता में इस क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका का पता चलता है।
मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 में 3-3.5 लाख करोड़ रुपए के अनुमानित निवेश से 150 से ज्यादा पहलकदमियों को शामिल किया गया है। इसके अलावा जलपोत निर्माण के लिए हाल ही में 69725 करोड़ रुपए का पैकेज दिया गया है।
वित्त वर्ष 2024-25 में प्रमुख बंदरगाहों के जरिए 85.5 करोड़ टन माल की ढुलाई हुई जिससे समुद्री व्यापार और बंदरगाह कार्यकुशलता में ठोस वृद्धि का संकेत मिलता है।
भारतीय समुद्री मार्ग की यात्रा

 

भारत की आर्थिक शक्ति का प्रवाह समंदरों से होता है। भारत के व्यापार का परिमाण के लिहाज से लगभग 95 प्रतिशत और मूल्य के हिसाब से तकरीबन 70 प्रतिशत हिस्सा समुद्री मार्गों के जरिए होता है। वास्तव में समुद्र भारत के वाणिज्य की प्राणशक्ति है। कच्चे तेल और कोयले से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा और कृषि उत्पादों तक देश के आयात और निर्यात का बड़ा हिस्सा व्यस्त बंदरगाहों से होकर गुजरता है। ये बंदरगाह भारत को विश्व भर के बाजारों से जोड़ते हैं।1 वैश्वीकरण से आपूर्ति श्रृंखला की अंतरनिर्भरता गहरी होने और भारत के प्रमुख मैनुफैक्चरिंग और ऊर्जा केंद्र के रूप में उभरने के साथ ही बंदरगाहों और जहाजरानी की कार्यकुशलता राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धिता को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।

भारत ने खुद को वैश्विक समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से साहसिक कदम उठाते हुए मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 (एमआईवी 2030) की शुरुआत की।2 वर्ष 2021 में शुरू किए गए इस परिवर्तनकारी रोडमैप में 150 से ज्यादा रणनीतिक पहलकदमियों को शामिल किया गया है।3 इस विजन का उद्देश्य संवहनीयता और कौशल विकास को केंद्र में रखते हुए बंदरगाहों का आधुनिकीकरण, जहाजरानी क्षमता का विस्तार और अंतर्देशीय जलमार्गों का सुदृढ़ीकरण है। एमआईवी 2030 सिर्फ माल ढुलाई का खाका होने के बजाय व्यापार, निवेश और रोजगार का उत्प्रेरक भी है। यह भारत के आर्थिक विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धिता के मार्ग को प्रशस्त करता है।

एमआईवी 2030 की केंद्रीय विषयवस्तु

मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 उन 10 प्रमुख विषयों की पहचान करता है जो वैश्विक समुद्री शक्ति और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में अग्रणी बनने की ओर भारत की यात्रा को आकार देंगे।

 

इंडिया मैरीटाइम वीक 2025: आगे बढ़ती समुद्री महत्वाकांक्षा

इंडिया मैरीटाइम वीक 2025 (आईएमडब्ल्यू 2025) वैश्विक समुद्री कैलेंडर की एक प्रमुख घटना है। इसका आयोजन 27 से 31 अक्टूबर तक मुंबई के नेस्को प्रदर्शनी केंद्र में किया जा रहा है।5 इसमें जहाजरानी, बंदरगाह और परिवहन समुदायों से जुड़े प्रमुख हितधारक हिस्सा लेंगे। आईएमडब्ल्यू 2025 विचार-विमर्श, सहयोग और व्यवसाय विकास का एक रणनीतिक मंच होगा। इसमें 100 से ज्यादा देशों के 1 लाख से अधिक प्रतिनिधियों, बंदरगाह संचालकों, निवेशकों, नवोन्मेषकों और नीति निर्माताओं के भाग लेने की संभावना है।6 इस 5 दिवसीय कार्यक्रम में 500 प्रदर्शक, विषय से संबंधित पैविलियन, प्रौद्योगिकी प्रदर्शन तथा बंदरगाह आधारित विकास, जलपोत निर्माण समूह और डिजिटल कॉरिडोर से संबंधित सत्र होंगे।7

 

समुद्री परिवर्तन का एक दशक: 2014 से 2025

भारत का समुद्री क्षेत्र आर्थिक विकास के एक नए मार्ग पर चलते हुए बंदरगाहों, तटीय जहाजरानी और अंतर्देशीय जलमार्गों में रिकॉर्ड प्रदर्शन के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा है। इस क्षेत्र की प्रगति राष्ट्र को मजबूत करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करती है।

भारतीय बंदरगाहों ने स्थापित किए नए मानदंड

  • भारत के बंदरगाह क्षेत्र ने जबर्दस्त परिवर्तनकारी छलांग लगाई है। बंदरगाहों की कुल क्षमता 140 करोड़ मीट्रिक टन से दोगुना होकर 276.2 करोड़ मीट्रिक टन हो गई है। क्षमता में यह वृद्धि आधुनिकीकरण और अवसंरचना विकास में बड़े निवेश को प्रतिबिंबित करती है।8
  • माल ढुलाई का परिमाण भी प्रभावशाली ढंग से बढ़ते हुए 97.2 करोड़ मीट्रिक टन से बढ़ कर 159.4 करोड़ मीट्रिक टन हो गया है।9 इससे समुद्री व्यापार और बंदरगाहों की कार्यकुशलता में जबर्दस्त वृद्धि का संकेत मिलता है। वर्ष 2024-25 में प्रमुख बंदरगाहों के जरिए 85.5 करोड़ टन माल की ढुलाई हुई। वर्ष 2023-24 में इन बंदरगाहों के जरिए सिर्फ 81.9 करोड़ टन माल की ढुलाई हुई थी।10
  • संचालन में काफी सुधार होने के परिणामस्वरूप जलपोतों के फेरों का औसत समय 93 घंटे से घट कर सिर्फ 48 घंटे रह गया है। इससे समग्र उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धिता में बढ़ोतरी हुई है।11
  • इस क्षेत्र की वित्तीय सुदृढ़ता में भी उछाल आया है। क्षेत्र का शुद्ध वार्षिक सरप्लस 1026 करोड़ रुपए से तेजी से बढ़ते हुए 9352 करोड़ रुपए हो गया जिससे राजस्व अर्जन और व्यय प्रबंधन में सुधार का पता चलता है।12
  • कार्यकुशलता के संकेतक भी मजबूत हुए हैं। संचालन अनुपात 73 प्रतिशत से सुधर कर 43 प्रतिशत हो जाना संवहनीय और लाभकारी बंदरगाह संचालनों की ओर एक बड़ा कदम है।13

भारतीय जहाजरानी में बेड़े, क्षमता और कार्यबल का विस्तार

  • भारत का जहाजरानी क्षेत्र लगातार विकास के मार्ग पर अग्रसर है। भारतीय ध्वज वाले जलपोतों की संख्या 1205 से बढ़ कर 1549 हो गई जो राष्ट्र की विस्तृत होती समुद्री उपस्थिति का परिचायक है।
  • भारतीय बेड़े की कुल टनधारिता भी 1 करोड़ सकल टन से बढ़ कर 1.35 करोड़ सकल टन हो गई है। इससे ज्यादा मजबूत और सक्षम जहाजरानी क्षमता का पता चलता है।
  • तटीय जहाजरानी में भी काफी गति दिखाई दी है। इसके जरिए माल ढुलाई 8.7 करोड़ मीट्रिक टन से बढ़ कर 16.5 करोड़ मीट्रिक टन हो गई है। इससे परिवहन के कार्यकुशल, किफायती और पर्यावरण के अनुकूल तरीकों की ओर झुकाव को बल मिलता है।14

भारत के अंतर्देशीय जलमार्गों का विकास

  • भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) ने 2025 में रिकॉर्ड 14.6 करोड़ मीट्रिक टन माल ढुलाई की जानकारी दी। यह अंतर्देशीय जल परिवहन क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक घटना है।15 यह वृद्धि 2014 के 1.8 करोड़ मीट्रिक टन की तुलना में 710 प्रतिशत अधिक है।16
  • मौजूदा समय में चालू जलमार्गों की संख्या 3 से बढ़ कर 29 हो गई है। इससे भारत के अंतर्देशीय परिवहन नेटवर्क में बड़ी वृद्धि का पता चलता है।17
  • आईडब्ल्यूएआई ने हल्दिया मल्टीमोडल टर्मिनल (एमएमटी) को आईआरसी नेचुरल रिसोर्सेस के हाथों सौंप दिया है। यह सरकार और निजी क्षेत्र की साझीदारी से अंतर्देशीय जलमार्ग अवसंरचना के उन्नयन और बहुविध परिवहन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। विश्व बैंक की सहायता से निर्मित पश्चिम बंगाल के इस टर्मिनल की क्षमता वार्षिक 0.30 करोड़ मीट्रिक टन है।18
  • यात्री जलयान और रो-पैक्स (सवारी और वाहन ढोने वाले जहाज) की लोकप्रियता में भी काफी इजाफा हुआ है। इनके जरिए 2024-25 में 7.5 करोड़ से ज्यादा सवारियों ने यात्रा की। इससे पता चलता है कि सुरक्षित और कार्यकुशल यात्रा के लिए लोग जल आधारित परिवहन को तेजी से अपना रहे हैं।19

महज एक दशक में भारत में “समुद्री कामगारों की संख्या 1.25 लाख से बढ़कर 3 लाख से अधिक हो गई  है, जो अब वैश्विक समुद्री कामगारों का 12% है।20 अब देश प्रशिक्षित नाविकों के मामले में दुनिया के शीर्ष तीन आपूर्तिकर्ताओं में से एक बन गया है और देश तथा विदेश में नौवहन, जहाज संचालन, रसद और संबद्ध समुद्री उद्योगों में व्यापक अवसर पैदा हो रहे हैं।21

 

समुद्री परिवहन विकास के लिए वित्तपोषण: समर्थन और नवोन्मेष

एम्आईवी 2030 में बंदरगाहों, नौवहन और अंतर्देशीय जलमार्गों में कुल 3-3.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश का अनुमान है।22 जहाज निर्माण को बढ़ावा देने और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने के लिए हाल ही में घोषित 69,725 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक पैकेज के साथ, भारत वैश्विक समुद्री मानचित्र पर खुद को मजबूती से स्थापित करने के लिए अपनी विशाल तटरेखा का लाभ उठाने का एक रणनीतिक मार्ग तैयार कर रहा है।23 लक्षित आवंटन और रणनीतिक पहल समग्र दृष्टिकोण के साथ सहजता से जोड़े गए हैं, जिससे प्रस्तावित निवेश को कार्यान्वित करने के उपाए किये जा रहे हैं ।

25,000 करोड़ रूपए की राशि के साथ, समुद्री विकास कोष (एमडीएफ) भारत की नौवहन क्षमता और जहाज निर्माण क्षमता के विस्तार के लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त, 24,736 करोड़ रूपए24 के परिव्यय वाली संशोधित जहाज निर्माण वित्तीय सहायता योजना (एसबीएफएएस) घरेलू लागत संबंधी नुकसानों से निपटने और जहाज़-तोड़ने को बढ़ावा देने के लिए है, जबकि 19,989 करोड़ रूपए के परिव्यय के साथ जहाज निर्माण विकास योजना (एसबीडीएस) ग्रीनफील्ड क्लस्टर, यार्ड के विस्तार और जोखिम कवरेज को प्रोत्साहित करती है।25 इसके अलावा, विशाखापत्तनम में 305 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित भारतीय जहाज प्रौद्योगिकी केंद्र (आईएसटीसी) जहाज डिजाइन, अनुसंधान एवं विकास, इंजीनियरिंग और कौशल विकास के लिए एक राष्ट्रीय केंद्र के रूप में उभरेगा।26

पूर्वोत्तर भारत में अंतर्देशीय जलमार्ग अवसंरचना के विकास में 1,000 करोड़ रूपए से अधिक का निवेश किया गया है, जो देश के नदियों के नेटवर्क के माध्यम से परिवहन और व्यापार को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस निवेश में से, लगभग 300 करोड़ रूपए मूल्य की परियोजनाएँ पहले ही पूरी हो चुकी हैं और शेष परियोजनाएँ भी पूरी होने वाली हैं, इससे कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय व्यपार को बढ़ावा मिलेगा। इस क्षेत्र में पर्यटन को भी बड़े पैमाने पर लाने की तैयारी की जा रही है। कोलकाता के हावड़ा स्थित हुगली कोचीन शिपयार्ड में 250 करोड़ रूपए के संयुक्त निवेश से दो लग्ज़री क्रूज़ जहाज बनाए जा रहे हैं। 2027 में शुरू होने वाले ये जहाज ब्रह्मपुत्र नदी में चलेंगे, जिससे सरकार के क्रूज़ भारत मिशन के तहत असम के नदी पर्यटन परिदृश्य में बदलाव आने की उम्मीद है।27

सागरमाला कार्यक्रम, भारत को वैश्विक समुद्री केंद्र में बदलने की एक प्रमुख पहल है। यह समुद्री भारत विजन 2030 और समुद्री अमृत काल विजन 2047 का एक प्रमुख स्तंभ है। इस कार्यक्रम को लॉजिस्टिक्स लागत में कटौती करने, व्यापार दक्षता को बढ़ाने और हरित परिवहन नेटवर्क के माध्यम से रोजगार सृजन पर केंद्रित किया गया है।28   इसके अंतर्गत 2035 तक 5.8 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली 840 परियोजनाएं क्रियान्वित की जाएँगी जिनमें 1.41 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली 272 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं तथा 1.65 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली 217 परियोजनाओं का कार्य प्रगति पर है।29

भविष्य की ओर अग्रसर

 

भारत का समुद्री क्षेत्र एक निर्णायक दशक में प्रवेश कर रहा है, जहाँ नए कानून, बड़ी परियोजनाएँ और वैश्विक निवेश महत्वाकांक्षाएँ मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 को आकार दे रही हैं। हरित प्रौद्योगिकियों और डिजिटल नवोन्मेष पर ज़ोर देते हुए, भारत न केवल अपनी व्यापारिक माँगों को पूरा करने की तैयारी कर रहा है, बल्कि एक समुद्री क्षेत्र में अग्रणी के रूप में उभरने की भी तैयारी कर रहा है। इसी को ध्यान में रख कर समुद्री अमृत काल विज़न 2047 तैयार किया जा रहा है, जो भारत के समुद्री पुनरुत्थान का एक दीर्घकालिक रोडमैप है, जिसमें बंदरगाहों, तटीय नौवहन, अंतर्देशीय जलमार्गों, जहाज निर्माण और हरित नौवहन पहलों के लिए लगभग 80 लाख करोड़ रुपये का निवेश निर्धारित किया गया है। सरकार हरित गलियारे स्थापित करके, प्रमुख बंदरगाहों पर हरित हाइड्रोजन बंकरिंग शुरू करके और मेथनॉल-ईंधन वाले जहाजों के उपयोग को बढ़ावा देकर संवहनीय समुद्री संचालन को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है।30  300 से अधिक कार्यान्वयन योग्य पहलों को रेखांकित किया गया है। यह पहलें  स्वतंत्रता के सौ साल पूरे होने तक भारत को विश्व की शीर्ष समुद्री और जहाज निर्माण शक्तियों में से एक के रूप में स्थापित करेंगी।

भारत के समुद्री परिदृश्य को नया आकार देने वाले इस विज़न को युगांतकारी  पहलों के माध्यम से आगे बढ़ाया गया है। इस यात्रा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि सितंबर 2025 में हासिल की गई जिसके अंतर्गत “समुद्र से समृद्धि-भारत के समुद्री क्षेत्र में परिवर्तन” कार्यक्रम के दौरान  27 समझौता ज्ञापनों (एमओयू) का आदान-प्रदान हुआ, जिससे 66,000 करोड़ रूपए से अधिक की निवेश संभावनाएँ बढ़ीं और 1.5 लाख से अधिक नौकरियों का मार्ग प्रशस्त हुआ। ये समझौते बंदरगाह अवसंरचना, नौवहन, जहाज निर्माण, संवहनीय गतिशीलता, वित्त और विरासत को केंद्र में रख कर किये गए हैं, जो देश को वैश्विक समुद्री और जहाज निर्माण का केंद्र बनाने के लिए भारत के एकीकृत दृष्टिकोण को दर्शाता है।

उल्लेखनीय परियोजनाओं में ओडिशा के बाहुदा में 150 मिलियन टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) क्षमता वाला ग्रीनफील्ड बंदरगाह जिसमें लगभग 21,500 करोड़ रुपये के  निवेश का अनुमान है, दूसरा पटना में लगभग 908 करोड़ रुपये मूल्य की इलेक्ट्रिक नौकाओं का उपयोग करते हुए जल मेट्रो परियोजना है। इसके आलावा विदेशी बेड़े पर निर्भरता कम करने और भारत में निर्मित जहाजों को बढ़ावा देने के लिए शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया  और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों  के बीच जहाज का स्वामित्व रखने वाली एक संयुक्त उद्यम कंपनी भी शामिल है। इसके साथ ही, पांच राज्यों में जहाज निर्माण समझौता ज्ञापन, प्रमुख शिपयार्ड निवेश, वित्तीय समझौते और गुजरात के लोथल में राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर में 266 करोड़ रुपये का लाइटहाउस संग्रहालय का निर्माण जैसे कदम, भारत को  2047 तक दुनिया के शीर्ष जहाज निर्माण देशों में शुमार होने के लक्ष्य को और मजबूत करतें हैं।

न्यू मैंगलोर पोर्ट अथॉरिटी (एनएमपीए) के तहत हाल ही में आठ महत्वपूर्ण समुद्री विकास परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनमें विदेशी पर्यटकों के लिए एक समर्पित क्रूज गेट का निर्माण और  107 करोड़ रुपये के निवेश के साथ सरकारी और निजी क्षेत्र की साझेदारी के तहत 150 बिस्तरों वाले मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल की स्थापना शामिल हैं। ये कदम  समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को भविष्य के लिए तैयार करने की प्रतिबद्धता को दर्शातें हैं जो व्यापार, पर्यटन और आर्थिक रूप से बढ़ावा देने के लिए जरुरी हैं।

विज़न से समुद्र यात्रा तक

भारत अपनी विशाल तटरेखा को संभावनाओं के कैनवास में बदल रहा है। मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 के साथ, देश न केवल बंदरगाहों का निर्माण कर रहा है, बल्कि भविष्य का निर्माण भी कर रहा है, लाखों लोगों को रोज़गार, कौशल और संवहनीय विकास से सशक्त बना रहा है। यह भारत के लिए विश्व में समुद्री क्षेत्र में अग्रणीय के रूप में उभरने का समय है, यह विज़न साबित करता है कि रणनीति और संकल्प समुद्री लहरों को समृद्धि के रास्ते पर ला सकते हैं। दुनिया भर के तेल और मालवाहक जहाजों में, भारत एक यात्री के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के नाविक के रूप में अपनी जगह सुरक्षित करने के लिए कृतसंकल्प है। समुद्री अमृत काल विज़न 2047 इस यात्रा को और आगे बढ़ाता है। हरित बंदरगाहों और टिकाऊ समुद्री जहाज से लेकर स्मार्ट लॉजिस्टिक्स और सांस्कृतिक विरासत परियोजनाओं तक, भारत आर्थिक विकास को पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी और वैश्विक नेतृत्व के साथ जोड़ रहा है। जहाँ विश्व मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं और स्वच्छ ऊर्जा बदलावों की ओर देख रहा है, वहीँ भारत का समुद्री क्षेत्र न केवल राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए तैयार है, बल्कि आने वाले दशकों में वैश्विक व्यापार की दिशा को भी आकार देने के लिए तैयार है।