ओडिशा के राज्यपाल ने साहित्यकार दिनेश माली भाषा संरक्षक गौरव सम्मान से सम्मानित किया
वन्दे मातरम् की गूंज के 150 वर्ष
भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ इस वर्ष अपनी रचना के 150वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। 7 नवम्बर 2025 का यह दिन केवल एक गीत की वर्षगांठ नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना का उत्सव है जिसने सोए हुए भारत को जगाया था। यह गीत शब्दों से परे एक भावना है—भक्ति और स्वतंत्रता का संगम, जिसने पराधीन भारत में आशा का दीप प्रज्वलित किया। ‘वन्दे मातरम्’ वह अमर स्वर है जो साहित्य की सीमा लांघकर भारत की चेतना बन गया, जिसने जन-जन के हृदय में यह विश्वास जगाया कि मातृभूमि ही सर्वोच्च आराध्या है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर अपने ‘मन की बात’ संबोधन में कहा—“वन्दे मातरम्… इसमें कितनी भावनाएँ, कितनी ऊर्जा समाई है। यह हमें माँ भारती के मातृत्व का अनुभव कराता है। यह हमारे हृदय की तरंगों का उद्गार है, एक ऐसा मंत्र जो 140 करोड़ भारतीयों को एकता की ऊर्जा से जोड़ता है।” उन्होंने देशवासियों से #VandeMataram150 अभियान के माध्यम से इसे जन-जन का उत्सव बनाने का आह्वान किया।
‘वन्दे मातरम्’ दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है। ‘वन्दे’ शब्द संस्कृत धातु ‘वन्द्’ से निकला है, । यह धातु ऋग्वेद मंडल 10, सूक्त 151, मन्त्र 4 में मिलती है— “देवा वन्दे मनुष्याः।” अर्थात् मनुष्य देवताओं की वन्दना करते हैं। यहाँ “वन्दे” का अर्थ श्रद्धा और प्रणाम है, “मातरम्” का अर्थ माँ अर्थात भारत माता। अर्थात—“हे माँ, तुझे प्रणाम,” यह केवल व्याकरणिक नहीं, बल्कि एक गहरी भावनात्मक पुकार है।
1870 के दशक में बंगाल के महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वन्दे मातरम्’ की रचना की और बाद में इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में स्थान दिया। यह कृति संन्यासी विद्रोह की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित थी, जिसने 18वीं सदी में नवाब और ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर उठाया था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने भारत को माँ के रूप में चित्रित किया—एक ऐसी देवी जो “सुजलाम् सुफलाम्” है, नदियों से सिंचित और फसलों से सम्पन्न। उस समय ब्रिटिश शासन ‘God Save Our Queen’ को राष्ट्रगान बनाना चाहता था, पर भारतीयों ने इसका तीव्र विरोध किया। आत्मसम्मान और राष्ट्रीय पहचान की तलाश में ‘वन्दे मातरम्’ भारतीय अस्मिता का प्रतीक बन गया।
इस गीत की पहली धुन जदुनाथ भट्टाचार्य ने तैयार की, जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के राग ‘देश’ पर आधारित थी। बाद में इसके आधुनिक संगीत रूप का श्रेय पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर को दिया गया, जो गंधर्व महाविद्यालय और अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय मंडल के संस्थापक थे। 1896 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (बीटन स्क्वायर) में वन्दे मातरम्’ गाया, जहाँ यह राष्ट्रभावना का प्रतीक बन गया। तमिल कवि सुब्रमण्य भारती ने इसे तमिल में गाया, और पंतलु ने इसे तेलुगु में रूपांतरित किया। 1901 में दक्षिणा चरण सेन ने इसे पियानो की धुन पर प्रस्तुत किया, और 1905 में सरला देवी चौधरानी के गायन ने इसे भारत की स्वतंत्र आत्मा का अमर स्वर बना दिया।
लाला लाजपत राय ने लाहौर से ‘वन्दे मातरम्’ नामक पत्रिका निकाली, जो राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रमुख माध्यम बनी। इसी समय भारतीय सिनेमा के अग्रदूत हीरालाल सेन ने 1905 में भारत की पहली राजनीतिक फिल्म बनाई, जो “वन्दे मातरम्” के उद्घोष के साथ समाप्त होती थी। बंगाल विभाजन के विरोध में जब आंदोलन प्रबल हुआ, तब यह गीत सड़कों, सभाओं और जेलों में प्रतिरोध का स्वर बन गया। 14 अप्रैल 1906 को बरिसाल कांग्रेस अधिवेशन में जब लॉर्ड कर्ज़न का पुतला जलाया गया, तो “वन्दे मातरम्” के नारों से आसमान गुंज उठा। अदालतों में भी जब क्रांतिकारियों पर मुकदमे चले, वे जजों के सामने यही नारा लगाते थे। ब्रिटिश सरकार ने इसे देशद्रोह घोषित किया। खुदीराम बोस और मातंगिनी हाजरा के अंतिम शब्द भी थे—“वन्दे मातरम्!” 1906 में अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने “भारत माता” का चित्र बनाया, जिसे देखकर सिस्टर निवेदिता ने कहा—“यह माँ भारती की आत्मा का साकार रूप है।” यह चित्र और ‘वन्दे मातरम्’ दोनों उस युग की एक ही भावना के दृश्य और श्रव्य रूप बन गए—माँ भारती का उदीपन-गीत, जिसने राष्ट्र की निद्रा तोड़ दी।
1907 में भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में भारत का पहला तिरंगा ध्वज बनाया, जिसकी मध्य पट्टी पर “वन्दे मातरम्” अंकित था। यह ध्वज स्वतंत्रता का प्रतीक बनकर पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर लहराया। श्री अरविन्द घोष ने इसका अंग्रेज़ी अनुवाद “Mother, I bow to thee” शीर्षक से किया, जो 20 नवम्बर 1909 को उनके साप्ताहिक पत्र कर्मयोगिन में प्रकाशित हुआ। इसकी पहली रिकॉर्डिंग 1907 की मानी जाती है। 1952 की फिल्म ‘आनंदमठ’ में हेमंत कुमार ने इसका संगीत तैयार किया, जिसे लता मंगेशकर और के.एस. चित्रा ने स्वर दिया। पंडित रवि शंकर द्वारा ऑल इंडिया रेडियो के संस्करण की धुन रची गई। 2002 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के वैश्विक मतदान में ‘वन्दे मातरम्’ को दुनिया के दस सर्वश्रेष्ठ गीतों में दूसरा स्थान मिला, जिससे यह भारत के गौरव और सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक बन गया।
‘वन्दे मातरम्’ की लोकप्रियता जितनी तेज़ी से बढ़ी, उतना ही विरोध भी उभरा। 1937 में कांग्रेस की समिति, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और अन्य मुखय नेता थे, ने तय किया कि गीत के केवल पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया जाएगा। परंतु मुहम्मद अली जिन्ना ने इसका तीव्र विरोध किया। क़ायदे-आज़म पेपर्स (1938) के अनुसार, जिन्ना ने इसे “मूर्तिपूजक” बताया और कहा कि “भारत को देवी के रूप में चित्रित करने वाला यह गीत मुसलमानों के लिए अस्वीकार्य है।” इसके बावजूद, समिति ने साम्प्रदायिक सौहार्द हेतु दो पदों को ही मान्य किया।
24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में घोषणा की—“वन्दे मातरम् जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसे ‘जन गण मन’ के समान सम्मान मिलेगा।” स्वतंत्रता के बाद भी इसकी प्रासंगिकता ही नहीं बनी रही, बल्कि और अधिक गहरी होती गई। आरिफ मोहम्मद ख़ान ने इसका उर्दू अनुवाद किया। 2019 में दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल हुई जिसमें इसे ‘जन गण मन’ के समान कानूनी दर्जा देने की मांग की गई। 2022 में केंद्र ने दोहराया कि दोनों गीत समान रूप से पूजनीय हैं। 2017 में मद्रास उच्च न्यायालय ने इसके नियमित गायन का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट (2016) ने कहा—“राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का सम्मान केवल औपचारिक नहीं, आत्मिक श्रद्धा का प्रतीक होना चाहिए।”
राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ भारतीय चेतना के रूप में इस प्रकार रचा-बसा है कि इसके स्वर हर आंदोलन और हर संघर्ष में गूंज उठे। यह केवल इतिहास का पन्ना नहीं, बल्कि भारत की जीवित भावना है—एक ऐसा स्वर जिसने प्रतिरोध को एकता में, और भावों को जागरण में परिवर्तित किया। आज, जब भारत का युवा डिजिटल युग में नई पहचान गढ़ रहा है, यह गीत उसे अपनी जड़ों से जोड़ता है, यह स्मरण कराता है कि शब्दों की भी क्रांति होती है—और वह क्रांति है “वन्दे मातरम्।” यह भारत की आत्मा का अमर स्वर है—सुजलाम् सुफलाम्, मलयजशीतलाम्।
(लेखिका दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएच.डी. हैं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं)
आर्यसमाज द्वारा किये गये 150 ऐतिहासिक कार्य
- विधवा विवाह का प्रावधान किया और इसकी शुरुवात आर्यों ने अपने घर में विधवा बहुएँ ला करके उदाहरण उपस्थित किया।
- आर्यसमाज ने बहु विवाह को अवैदिक बताया और इसे स्त्री समाज के विरुद्ध सिद्ध किया।
- आर्यसमाज ने बाल विवाह का प्रतिरोध किया परिणाम स्वरूप अंग्रेजों को परतन्त्र भारत में विवाह की आयु का कानून बनाना पड़ा।
- आर्यसमाज ने परतन्त्र भारत में सर्वप्रथम कन्याओं के लिए विद्यालय खोले और विरोध होने पर अपनी बेटियों का प्रवेश करवाया।
- आर्यसमाज ने स्त्री शिक्षा को अनिवार्य बताया, समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए स्त्री शिक्षा की पुरजोर वकालत की।
- आर्यसमाज ने कन्याओं के लिए परतन्त्र भारत में गुरुकुल खुलवाए और विधर्मी होने से हिन्दू समाज की बेटियों को बचाया।
- आर्यसमाज ने सती प्रथा को अमानवीय बताया और विधवाओं को जीने का अधिकार दिलवाया।
- बाल विधवाओं के पुनरुद्धार के लिए आर्यसमाज ने सामाजिक लडाईयाँ लड़ी।
- बाल विधवाओं की शिक्षा, समाज में उनकी प्रतिष्ठा और उनके पुनर्विवाह के लिए न्यायिक प्रयास किए।
- स्त्रियों को पर्दा प्रथा से निकालकर, शिक्षा, राजनीति और सामाजिक कार्यों में उनकी भूमिका के लिए संघर्ष किया।
- स्त्रियों को नर्क का द्वार बताने वालों को सैद्धान्तिक रूप से पराजित किया। और उन्हें स्वर्ग पदात्री बताया।
- आर्यसमाज ने स्त्रियों को पैर की जूती बताने वालों के मुंह पर तमाचा मारा और बताया कि स्त्रियाँ तो सिर की ताज होती हैं।
- आर्यसमाज ने स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार दिलाया। उनके लिए गुरुकुल खोलकर वेद पढवाया और आज भी पढ़ा रहे हैं।
- आर्यसमाज ने स्त्रियों को गायत्री मंत्र बोलने, पढ़ने और जपने का अधिकार दिलाया।
- आर्यसमाज ने स्त्रियों को कर्मकांड करवाने का अधिकार दिलाया और उन्हें वेदों की विदुषी बनाकर यज्ञ में ब्रह्मत्व के आसन पर प्रतिष्ठित किया।
- आर्य समाज ने संतानों के निर्माण के लिए ‘माता निर्माता भवाति’ के उद्घोष के साथ माता को सबसे पहला शिक्षक बताया।
- आर्यसमाज ने परतन्त्रता के बाद सर्वप्रथम स्त्रियों को व्यासपीठ पर बैठाया और उनको उपदेश देने का अधिकार दिलाया।
- आर्यसमाज ने संसार को बताया की स्त्रियाँ भी ऋषिकायें और संन्यासिनी हो सकती हैं।
- आर्यसमाज ने “स्त्रियों में आधी आत्मा होती है या आत्मा नहीं होती है” इस बात का न केवल खण्डन किया अपितु समाज में पुरुषों के समानान्तर स्त्रियों की प्रतिष्ठा की।
- स्त्रियों को दान देने, बेचने और जडवस्तु मानने वालों को आर्यसमाज ने करारा जवाब दिया।
- आर्यसमाज ने दलित और पीछडे वर्ग की बेटियों के लिए निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था की। उन्हें गुरुकुल में शिक्षित कर मुख्य धारा में जोड़ा।
- सदियों से चली आ रही मन्दिरों की देवदासी प्रथा का आर्यसमाज ने विरोध किया। नारी को दासी नहीं नेत्री बताया।
- आर्यसमाज ने नारियों के स्वाभिमान को जगाया उसको चौके से निकालकर विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढाया।
- आर्यसमाज ने स्त्रियों को यज्ञोपवीत धारण करवाया।
- आर्यसमाज ने स्त्रियों के वेद पढने पर जिह्वा काटने और मन्त्र सुनने पर कान में सीसा पिघलाकर डालने जैसे अत्याचारों से मुक्त करवाया।
- आर्यसमाज ने परतन्त्र भारत में सर्वप्रथम शूद्रों के लिए विद्यालय खोले और सबके लिए समान पढने की व्यवस्था की।
- आर्यसमाज ने शूद्रों को वेद पढने का अधिकार दिलाया।
- आर्यसमाज ने शूद्रों को कर्मणा ब्राह्मण बनाना शुरु किया।
- आर्यसमाज ने कहा कि शूद्र कुल में उत्पन्न होकर भी कोई मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी हो सकता है।
- आर्यसमाज ने कथित रूप से शूद्र कुल में उत्पन्न हुए बच्चों को गुरुकुल में पढाना प्रारम्भ किया।
- आर्यसमाज ने कथित रूप से दलित शूद्र और नीचली जाति के कुल में उत्पन्न हुए बच्चों को वेद पढ़ाना प्रारम्भ किया।
- आर्यसमाज ने निर्धन बच्चों के लिए गुरुकुल में निशुल्क शिक्षा प्रारम्भ की।
- आर्यसमाज ने छुआछूत को मिटाने के लिए बहुत संघर्ष किया।
- आर्यसमाज ने अस्पृश्यता के कलंक धोने के लिए अनेक सामाजिक लडाई लडी।
- आर्यसमाज ने शूद्रों के अतिरिक्त गैर ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए बच्चों को भी वेद न पढ़ने के अभिशप्त से मुक्त करवाया।
- आर्यसमाज ने दबे कुचले लोगों को शिक्षा के साथ सम्मान दिलवाया।
- आर्यसमाज ने वेद के बंद कपाटों को संपूर्ण मानव जाति के लिए खोल दिया।
- आर्य समाज ने दलित उत्थान के लिए उनको उत्पीड़न से बचाने के लिए बहुत सी योजनाएं चलाई।
- आर्यसमाज ने दलितों को मुख्य धारा में लाने के लिए उनको पढ़ाना शुरू किया।
- आर्यसमाज ने दलितों को ईसाइयों के कुचक्र से बचाया।
- आर्यसमाज ने दलितों एवं पिछड़ों को मुस्लिम धर्मान्तरण से बचाया।
- आर्यसमाज ने दलितों के लिए समान शिक्षा और समान कर्मकांड करने की व्यवस्था की।
- आर्य समाज ने दलितों को भारतीय समाज का अभिन्न अंग बताया।
- आर्यसमाज ने बताया कि मनु स्त्रियों और दलितों के विरोधी नहीं है।
- आर्यसमाज ने मनुस्मृति को वेदों के अनुकूल बताया।
- आर्यसमाज ने वर्ण व्यवस्था को कर्म पर आधारित बताया।
- आर्यसमाज में जन्मना वर्ण व्यवस्था को वेद विरुद्ध बताया।
- आर्यसमाज ने कर्मणा व्यवस्था को अपने गुरुकुलों पर और आर्य समाज पर लागू करके उसको वेद आधारित सिद्ध किया।
- आर्यसमाज ने जातिवाद का पुरजोर विरोध किया।
- आर्यसमाज ने विदेशियों द्वारा दिए गए ‘हिन्दू’ शब्द की जगह भारतीय मूल ‘आर्य’ शब्द की वकालत की।
- आर्य समाज ने जातिवाद को भारत के पतन का कारण माना और जातिवाद के मकड़जाल से भारतीय समाज को मुक्त करने के लिए अभी भी संघर्ष कर रहा है।
- आर्यसमाज ने भारतीयों को आर्ष शिक्षा और अनार्ष शिक्षा के भेद को बताया।
- आर्य समाज ने सर्वप्रथम वेदों पर आधारित आर्य शिक्षा के गुरुकुल चलाए।
- आर्यसमाज ने चारों वेदों को वैदिक संस्कृति का मूल माना।
- आर्यसमाज चारों वेदों को ईश्वर का अमृत ज्ञान मानता है उसमें किसी भी प्रकार का इतिहास नहीं मानता।
- आर्यसमाज ने वेदों को शंखचूड़ ले गया है इस भ्रांति का निवारण किया और वेद उपलब्ध कराए।
- आर्य समाज महर्षि पाणिनि द्वारा व्याकरण अनुसार किए गए भाष्य वेदों के सच्चे अर्थों को मानता है।
- आर्य समाज ने बताया कि वेद सृष्टि के आदि के हैं वेदों में सभी सत्य विद्याएं सूत्र रूप में विद्यमान है।
- आर्य समाज ने बताया कि पुराण व्यस्कृत नहीं है और वे वेदों के अनुकूल भी नहीं है।
- आर्य समाज वेद विरुद्ध ईश्वर के अवतारवाद को नहीं मानता।
- आर्य समाज मूर्ति में ईश्वर की पूजा का विधान नहीं मानता, वह ईश्वर को सरल व्यापक मानकर उसकी संध्या करने का विधान मानता है।
- आर्य समाज ने कर्म फल पर आधारित पुनर्जन्म व्यवस्था को बताया।
- आर्य समाज ने ईश्वर एक है और वह निराकार सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक है इसका बहुत प्रचार किया।
- आर्य समाज ने ईश्वर की प्राप्ति के लिए योग के आठ अंग को क्रियात्मक रूप से लोगों को सिखाया।
- आर्यसमाज ने नास्तिकता की आंधी के बीच पुनर्जन्म और मोक्ष के सिद्धांतों का व्यापक प्रचार किया।
- आर्य समाज ने यह बताया कि जीवात्मा कभी ईश्वर में विलीन नहीं होता।
- आर्य समाज ईश्वर और जीव के अलग-अलग अस्तित्व को मानता है।
- आर्य समाज ने बताया कि मुक्ति के पश्चात फिर जीवात्मा लौटता है, मध्यकाल में जीवात्मा को ब्रह्म में विलीन होना मान लिया जाता था।
- आर्यसमाज ने लाखों गृहस्थियों को पंच महायज्ञ सिखाया जो अब पीढियों से इसका पालन कर रहे हैं।
- आर्य समाज ने वेदों पर आधारित आश्रम व्यवस्था की सर्वोपयोगी व्याख्या संसार को बताई।
- आर्य समाज में शरीर की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम को समाज के लिए उपयोगी माना है।
- आर्य समाज ने यज्ञ को मनुष्य के समाज और प्रकृति के लिए सर्वोदयोगी माना और सिद्ध किया।
- आर्यसमाज यज्ञ में हिंसा स्वीकार नहीं करता, आर्यसमाज ने यज्ञ के अंदर में पशु हिंसा का घोर विरोध किया है।
- आर्यसमाज ने यज्ञ के वैदिक स्वरूप को संसार के सामने में उपस्थित किया आज कराने के इच्छुक लोग आर्यसमाज में आते हैं।
- आर्यसमाज ने संसार के उपकार के लिए यज्ञ को विज्ञान के धरातल पर स्थापित किया और इसकी वैज्ञानिकता को सिद्ध किया।
- आर्यसमाज किसी भी प्रकार की बलि प्रथा का विरोध करता आ रहा है।
- आर्यसमाज ने मंदिरों में दिए जाने वाली बलि प्रथा के विरुद्ध बहुत से शास्त्रार्थ किये और विजय प्राप्त की है।
- आर्यसमाज पशु-पक्षियों को मार कर खाने को घोर पाप मानता है और छुडाने के लिए प्रयासरत है।
- आर्यसमाज ने सदैव शाकाहार का समर्थन किया है क्योंकि शाकाहार के द्वारा प्रकृति का सन्तुलन उत्तम होता है।
- आर्यसमाज मांसाहार को वेद विरुद्ध और मनुष्य की प्रकृति के प्रतिकूल मानता है।
- आर्यसमाज जीव हत्या को पाप और प्रकृति के विनाश का कारण मानता है।
- आर्यसमाज ने वेद पर आधारित कर्म फल सिद्धांत का प्रचार किया और इस पर मौलवियों और पादरियों से शास्त्रार्थ किए हैं।
- आर्यसमाज ने इस सिद्धांत का प्रचार किया कि प्रकृति अपने आप संसार का निर्माण नहीं करती इसका बनाने वाला ईश्वर है।
- आर्यसमाज ने अद्वैतवाद और विशिष्ट द्वैतवाद की आंधी में भारतीयों में इस सिद्धांत का भी प्रचार किया कि जीव और ईश्वर दोनों अलग-अलग हैं।
- आर्यसमाज ने बडे अन्तराल के बाद पूरे विश्व को त्रैतवाद के बारे में समझाया कि ईश्वर, जीव और प्रकृति तीन अनादि पदार्थ होते हैं।
- आर्यसमाज सदैव सत्य के प्रचार प्रसार में उद्यत रहता है।
- आर्यसमाज ने पाखंड और अंधविश्वास का विरोध करके समाज को बहुत बड़ी आपदा से रक्षा करता आया है।
- आर्यसमाज जादू, टोना, टोटका इत्यादि का खंडन करता है।
- आर्यसमाज ने गण्डे-ताबीज आदि के प्रपंचों से लाखों लोगों को मुक्त करवाया है।
- आर्यसमाज ने भूत-प्रेत, जादू-टोना, टोटके के भय से समाज की रक्षा की है।
- आर्यसमाज हाथ की रेखाओं में भविष्य को नहीं मानता, इसके लिए लोगों को जागरूक करता आया है।
- आर्यसमाज ने पानी के जहाज की यात्रा को पाप मानने का निवारण कराया, जिससे यात्रा और व्यापार करने में सुगमता हुई।
- आर्यसमाज ने बहुत बडे स्तर पर लोगों को समझाया कि आत्मा कभी नहीं भटकती और किसी को कोई नुकसान नहीं करती।
- आर्यसमाज ने वेद के प्रचार-प्रसार को अपना उद्देश्य माना और इस पर किए जाने वाली भ्रान्तियों का निवारण किया।
- आर्यसमाज ने परतंत्र भारत में आर्ष शिक्षा के पुनः गुरुकुल खोलें, आर्य समाज ने डीएवी स्कूल चलाकर शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किया।
- आर्यसमाज ने कन्याओं के लिए सबसे पहले पृथक पाठशाला खोली।
- आर्यसमाज ने सर्वप्रथम यह बताया कि वेद में केवल जादू, टोना, टोटका के मंत्र नहीं हैं, वेदों मे परा और अपरा दोनों विद्यायें हैं।
- आर्यसमाज ने देश को सपेरो का देश है इस अभिशाप से मुक्ति दिलायी।
- आर्य समाज ने यह बताया कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है वेद कोई गडरियों का गीत नहीं है।
- आर्यसमाज ने ये सिद्ध किया कि वेदों के मंत्र और विज्ञान के सूत्र एक समान हैं।
- आर्यसमाज ने जन्म पत्रिका का घोर विरोध किया और इसे मरण पत्रिका बताया क्योंकि यह वेद विरुद्ध है।
- आर्यसमाज अनेक अनेक ईश्वरवाद का खण्डन किया। एक ही ईश्वर की उपासना रीत सिखलाई जिससे लाखों लोगों का कल्याण हुआ।
- आर्यसमाज ने मनुष्य मात्र के लिए एक जैसी शिक्षा पद्धति और अनिवार्य शिक्षा का पुरजोर प्रचार किया।
- स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले अधिकतर क्रांतिकारी आर्य समाज से प्रेरित थे।
- महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय आर्य समाज को अपनी मां बताते थे।
- पंडित राम प्रसाद बिस्मिल बचपन में आर्य समाज से जुड़ चुके थे, आर्यसमाज के लिए उन्होंने घर तक त्याग दिया था।
- अमर बलिदानी सरदार भगत सिंह का सारा परिवार आर्य समाज से प्रभावित था।
- आर्य समाज के विद्वान पंडित लोकनाथ तर्क वाचस्पति ने सरदार भगत सिंह का यज्ञोपवीत संस्कार करवाया था।
- भगत सिंह के दादाजी अर्जुन सिंह का महर्षि दयानंद सरस्वती ने यज्ञोपवीत कराया था।
- आर्य समाज कलकत्ता 19 विधान सरणी में अमर सरदार भगत सिंह, क्रांतिकारी दुर्गा भाभी के साथ दो बार आकर ठहरे थे।
- आर्य समाज वेद पर आधारित शासन व्यवस्था का अनुमोदन करता है।
- आर्य समाज रामकृष्ण आदि को दिव्य महापुरुष मानकर उनके चरित्र की पूजा करता है।
- आर्य समाज ने मूर्तिपूजा को भारत की अवनति का एक कारण माना और लोगों को समझाने में सफल हुआ है।
- आर्य समाज ने मनुष्य की उन्नति के लिए 16 संस्कारों पर अत्यधिक कार्य किया और इसको संपन्न कराने वाले हजारों पुरोहित तैयार किये।
- आर्य समाज ने हिंदुओं को मृतक श्राद्ध और उसके पाखंड से निकालने के बहुत से प्रयास किए हैं।
- आर्य समाज संस्कृत भाषा को सर्वोपरि मानता है।
- आर्य समाज संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सदैव संलग्न रहता है।
- आर्य समाज महर्षि पाणिनि द्वारा रचित व्याकरण को सर्वोपरी मानता है।
- आर्य समाज चार वेद संहिताओं को ईश्वर कृत मानता है।
- आर्य समाज ने चारों वेदों का अनुसरण करने वाले ग्रन्थों का आर्ष ग्रंथों के रूप में प्रचार-प्रसार किया है।
- आर्यसमाज ने विधर्मियों के द्वारा किए जा रहे आक्रमणों का शास्त्रोक्त तरीके से शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त करके सनातन की रक्षा की है।
- श्याम जी कृष्ण वर्मा महर्षि दयानंद के शिष्य थे जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
- आर्यसमाज ने स्वतंत्रता से पहले भारतीयों के लिए पंजाब नेशनल बैंक खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- आर्यसमाज महर्षि दयानन्द द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश को हिन्दू जाति के लिए सर्वोच्च उपयोगी ग्रंथ मानता है।
- आर्यसमाज अपने साप्ताहिक सत्संग में नित्य सत्यार्थ प्रकाश का स्वाध्याय एवं पठन-पाठन करता है।
- आर्यसमाज ने प्रारंभ काल से ही गौ रक्षा के लिए अनेक आन्दोलन किए और आज भी कर रहा है।
- आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने रेवाड़ी में सर्व प्रथम गौशाला स्थापित की थी और गौ हत्या रोकने के लिये हस्ताक्षर अभियान चलाया था।
- आर्यसमाज ने प्रारंभ से ही भारतीय वेशभूषा और पहनावा को प्रधानता दी है।
- आर्यसमाज हिन्दी को पूरे भारत की जोड़ने की भाषा मानता है। आर्य समाज ने हिंदी के उत्थान के लिए बहुत से ऐतिहासिक कार्य किए हैं।
- आर्यसमाज ने ‘नमस्ते’ को वैश्विक और वैदिक अभिवादन बताया। जिसे आज सम्पूर्ण विश्व स्वीकार कर रहा है।
- आर्यसमाज ने विश्व पटल पर यह सिद्ध किया है कि ‘वैदिक-धर्म’ ही संसार का सबसे प्राचीन और एकमात्र धर्म है।
- आर्यसमाज ने ‘वेद’ को अपना और पूरे संसार का धर्म ग्रंथ मानने में अथक प्रयास किया बहुत कुछ सफलता प्राप्त की है।
- आर्यसमाज एक राष्ट्र, एक भाषा और एक ध्वज और एक संस्कृति की वकालत करता है।
- आर्यसमाज ने यह सर्वप्रथम भारतीयों को बताया कि आर्य कहीं बाहर से नही आए हैं।
- आर्यसमाज प्रत्येक भारतीय में अध्यात्म और देशभक्ति की भावना भरता है।
- आर्यसमाज सनातन का सबसे अच्छा प्रहरी है और यह कार्य उसने अनेकों बार सिद्ध किया है।
- आर्यसमाज से प्रभावित होकर वीर सावरकर ने कहा था कि “आर्य समाज के रहते हुए कोई भी विधर्मी अपनी शेखी नहीं बघार सकता।”
- आर्यसमाज से प्रभावित होकर हिंदुओं के बड़े नेता पं मदन मोहन मालवीय “सत्यार्थ प्रकाश” का वितरण किया करते थे। मालवीय ने कहा था कि “सनातन रूपी खेती की आर्य समाज बाड़ है।”
- आर्यसमाज के सर्वोच्च नेता स्वामी श्रद्धानंद जामा मस्जिद की मीनार से वेद मंत्र कर के द्वारा भाषण करने वाले पहले आर्य संन्यासी और एक मात्र भारतीय थे।
- आर्यसमाज के महापुरुष में पं लेखराम, पं गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज आदि सैंकड़ो अनमोल रत्न थे जो आर्यसमाज की भट्टी से तैयार हुए थे।
- आर्यसमाज ने भारतीय पर्वों को शुद्धता से मनाने की परम्परा को पुनर्जीवित किया।
- आर्यसमाज ने भारतीय महापुरुषों पर उछाले जा रहे कलंकों को धोने का कार्य किया और उनकी उज्ज्वल कीर्ति बनाए रखा है।
- आर्यसमाज ने हैदराबाद सत्याग्रह के विशेष आंदोलन अनेक बलिदान देकर जीता था। हिंदुओं की पूजा पद्धति एवं मंदिरों के लिए लड़ाइयां लड़ी थी।
- आर्यसमाज ने अब तक करोड़ों लोगों को शुद्ध करके उनकी घर वापसी कराई है।
- आर्यसमाज ने “सत्यार्थ प्रकाश” जैसे ग्रन्थ के द्वारा बहुत से लोगों का जीवन परिवर्तन किया है।
- आर्यसमाज जातिवाद, भाषावाद, प्रांतवाद, आपसी फूट को दूर करके एक मानवतावाद का सदैव प्रचारक रहा है।
- आर्यसमाज ने मनुस्मृति, गीता, रामायण, महाभारत आदि पर हो रहे आक्षेपों का सदैव वेदानुकूल उत्तर दिया है और इन ग्रंथो का शोध कार्य किया है।
- आर्यसमाज अपने साप्ताहिक सत्संग में नित्य सत्यार्थ प्रकाश का स्वाध्याय एवं पठन-पाठन करता है।
- आर्यसमाज ने प्रारंभ कल से ही गौ रक्षा के लिए अनेक आन्दोलन किए और आज भी कर रहा है।
- आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने रेवाड़ी में सर्व प्रथम गौशाला स्थापित की थी और गौ हत्या रोकने के लिये हस्ताक्षर अभियान चलाया था।
[यह लेख आचार्य राहुलदेव जी द्वारा समस्त जन साधारण, आर्यजनों एवं सुधीपाठकों की जानकारी एवं ज्ञानवर्धन के लिए प्रस्तुत किया गया है। इस लेख में आर्यसमाज के 150 वर्षों के इतिहास में आर्यसमाज द्वारा किए गए 150 ऐतिहासिक कार्यों को उद्धृत किया गया है।]
#आर्यसमाज
#ऐतिहासिककार्य
पत्रकार बीआर चोपड़ा को आईएस जौहर ने फिल्म निर्माता बना दिया
आज बी.आर.चोपड़ा जी की पुण्यतिथि है। 5 नवंबर 2008 को बी.आर.चोपड़ा जी का देहांत हुआ था। बी.आर. चोपड़ा साहब के पिता चाहते थे कि ये पढ़-लिखकर कोई बड़े सरकारी अफसर बनें। वो खुद भी सरकारी अफसर थे। बीआर चोपड़ा पढ़ने-लिखने में बहुत अच्छे थे। और साथ ही साथ वो खेलकूद में भी खूब हिस्सा लेते थे। ये उन दिनों की बात है जब देश का विभाजन नहीं हुआ था। और बीआर चोपड़ा व इनका परिवार लाहौर में रहता था।
पिता की ख्वाहिश पूरी करने के इरादे से बीआर चोपड़ा ने आई.सी.एस (Indian Civil Service) की तैयारी करनी शुरू कर दी। लेकिन एग्ज़ाम से कुछ ही दिन पहले ये बीमार हो गए। नतीजा, ये उस परीक्षा में फेल हो गए। इनका दिल बहुत दुखा। हालांकि इनके पिता ने इन्हें लंदन जाकर आईसीएस की तैयारी करने का सुझाव दिया था। लेकिन इन्होंने मना कर दिया। ये कहकर कि अगर भगवान को मुझे आईसीएस अफसर ही बनाना होता तो वो यहीं बना देते। बीआर चोपड़ा तय कर चुके थे कि इन्हें अब सरकारी नौकरी करनी ही नहीं है।
एक अच्छी बात बीआर चोपड़ा जी के साथ ये रही कि जब ये बीए कर रहे थे तो इन्हें लिखने का शौक हो गया था। और चूंकि उस ज़माने में इनके आस-पास के लोग सिनेमा के बड़े फैन थे तो इन्हें भी सिनेमा में दिलचस्पी होने लगी थी। ये भी चाहते थे कि किसी दिन इन्हें भी अखबारों के लिए लिखने का मौका मिले। फिर एक दिन इन्होंने कलकत्ता के एक अखबार के लिए अंग्रेजी में एक आर्टिकल लिखा। उस अखबार का नाम था वैरायटीज़ (Varieties)। वो अखबार न्यू थिएटर्स नामक उस वक्त के कलकत्ता के एक बहुत बड़ी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी के सहयोग से निकलता था।
बीआर चोपड़ा के उस आर्टिकल का टाइटल था “Round the Indian Screen”। अपने उस आर्टिकल में बीआर चोपड़ा ने कुछ फिल्मों को क्रिटिसाइज़ करते हुए लिखा कि अब फिल्मों में स्टोरी कुछ भी नहीं है। बस गाने डाले जाते हैं। वो भी बहुत खास नहीं होते। इन्हें यकीन था कि इनका आर्टिकल ज़रूर छपेगा। लेकिन नहीं छपा। इन्होंने फिर से एक नया आर्टिकल लिखकर कलकत्ता भेजा। मगर वो भी अखबार वालों ने नहीं छापा। तब इन्होंने फैसला किया कि अब ये बस एक आर्टिकल और लिखकर कलकत्ता भेजेंगे। अगर वो भी नहीं छपा तो फिर नहीं लिखेंगे।
तीसरा आर्टिकल लिखकर इन्होंने कलकत्ता भेज दिया। और फिर कुछ दिन बाद ये अपने कॉलेज जा रहे थे कि इन्हें एक पार्सल मिला। वो पार्सल उस अखबार के एडिटर की तरफ से आया था। एडिटर ने उसमें लिखा था कि हमें आपके तीनों आर्टिकल्स मिले। और हमें बहुत अच्छे लगे। लेकिन दुर्गा पूजा की छुट्टियों की वजह से हम उन आर्टिकल्स को छाप नहीं सके हैं। लेकिन अब हमने एक ही अंक में तीनों आर्टिकल्स को छाप दिया है। एडिटर ने बीआर चोपड़ा को उस अखबार का लाहौर कॉन्ट्रीब्यूटर बनने का ऑफर भी दे दिया। जिसे इन्होंने स्वीकार भी कर लिया। और देश का विभाजन होने तक ये उस अखबार के लिए लिखते रहे।
विभाजन के बाद जब बीआर चोपड़ा अपने परिवार संग लुधियाना स्थित अपने पुश्तैनी मकान में आकर रहने लगे तो वहां इनकी मुलाकात इनके पिता के कुछ दोस्तों से हुई। उनमें से एक ने इनसे कहा, “बलदेव, क्यों ना हम मिलकर फिल्में बनाएं?” उनकी इस बात के जवाब में बीआर चोपड़ा जी ने कहा कि मैं तो फिल्में बनाना जानता ही नहीं हूं। मैं कैसे फिल्में बना पाऊंगा। तो इनके पिता के वो दोस्त बोले, “करना क्या है। हमें एक कहानी लेनी है। एक्टर्स लेने हैं। डायरेक्टर लेना है और फिल्म बनने में जो पैसा खर्च होगा वो लगाना है। यही तो सब करते हैं।”
आखिरकार बीआर चोपड़ा उनके साथ बॉम्बे आ गए। कुल मिलाकर ये पांच पार्टनर थे। पैसा उन्होंने लगाया था। बीआर चोपड़ा की ज़िम्मेदारी थी कि फिल्म अच्छी बन रही है या बुरी, इसकी खबर रखना। लेकिन मुंबई आने के बाद बीआर चोपड़ा का अपने उन पाचों पार्टनर्स से मतभेद हो गया। इस बात पर कि उन्हें किस तरह की फिल्म बनानी चाहिए। बीआर चोपड़ा चाहते थे कि कोई नई और हटकर कहानी वाली फिल्म बनानी चाहिए। लेकिन अन्य लोगों का मानना था कि वो फिल्म बनानी चाहिए जो आजकल चल रही हैं। चूंकि पैसा वो लोग लगा रहे थे तो बीआर चोपड़ा को चुप होना पड़ा।
फिर बीआर चोपड़ा के उन पार्टनर्स ने जो फिल्म बनाई थी उसका नाम था “करवट”। उस फिल्म में जीवन साहब और लीला मिश्रा जी ने काम किया था। और वो फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई। फिल्म फ्लॉप हुई तो इनके सभी पार्टनर्स लुधियाना वापस लौट गए। लेकिन बीआर चोपड़ा मुंबई में ही रहे। उन्होंने सोचा कि वो यहीं रहकर किसी अखबार में नौकरी कर लेंगे। इत्तेफाक से हिंदुस्तान टाइम्स के उस वक्त के एडिटर इन चीफ दुर्गादास इनके रिश्तेदार थे। उन्होंने बीआर चोपड़ा को आश्वासन दे दिया कि वो इन्हें नौकरी दिला देंगे। साथ ही जब उन्हें पता चला कि बीआर चोपड़ा फिल्ममेकर बनना चाहते हैं तो उन्होंने भी इन्हें इसके लिए काफी प्रोत्साहित किया।
इसके बाद तो बीआर चोपड़ा जी ने नौकरी के साथ-साथ फिल्म बनाने के अपने ख्वाब को पूरा करने के लिए भी हाथ पैर मारने शुरू कर दिए। वो बॉम्बे के एक ऐसे रेस्टोरेंट में जाकर बैठने लगे जहां संघर्षरत फिल्म कलाकार व लेखक आते थे। और इत्तेफाक से वहां इनकी कई लोगों से जान-पहचान भी हो गई। ये फिल्ममेकर बनने के ख्वाब तो देखते थे, लेकिन इन्हें पता ही नहीं था कि इन्हें करना क्या है — कहानी कहां से लेनी है, फाइनेंसर कैसे ढूंढना है।
एक दिन वो उस रेस्टोरेंट में बैठे हुए थे कि एक आदमी इनके पास आया। उस आदमी से इनकी जान-पहचान पहले ही हो चुकी थी। उस आदमी ने इनसे पूछा कि क्या तुम्हारे पास कोई स्टोरी है जिस पर तुम फिल्म बनाना चाहते हो। इन्होंने इन्कार कर दिया। तब वो आदमी इन्हें अपने साथ एक जगह ले गया और उसने इन्हें अपनी लिखी एक कहानी सुनाई। वो कहानी चोपड़ा साहब को बहुत पसंद आई। इन्होंने तय कर लिया कि ये इसी कहानी पर फिल्म बनाएंगे। और उस आदमी को फिल्म में क्रेडिट भी देंगे। वो आदमी था ज़बरदस्त एक्टर और राइटर रहे आई.एस. जौहर साहब। और वो फिल्म जिसकी कहानी उस दिन आई.एस. जौहर ने बीआर चोपड़ा को सुनाई थी, वो थी फिल्म “अफसाना” की कहानी। बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म की कहानी।
भले ही विकिपीडिया पर बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म “करवट” बताई जाती हो, लेकिन वो फिल्म इन्होंने डायरेक्ट नहीं की थी। वो फिल्म एक दूसरे डायरेक्टर प्रकाश ने बनाई थी। पर चूंकि बीआर चोपड़ा उस फिल्म के साथ जुड़े थे तो अक्सर लोग करवट को इनकी पहली फिल्म मान लेते हैं। जो कि सही नहीं है। खैर, आई.एस. जौहर की कहानी तो बीआर चोपड़ा साहब को बहुत पसंद आ गई। लेकिन अब चुनौती थी फिल्म बनाने के लिए किसी ऐसे आदमी को तलाश करना, जो पैसे लगा सके — यानी फाइनेंसर ढूंढना। अब चूंकि बीआर चोपड़ा को तो भेजा ही इस धरती पर फिल्मकार बनने के लिए, तो किस्मत से इनका फिल्म इंडस्ट्री में आने का रास्ता अपने आप बनता चला गया।
उसी रेस्टोरेंट में बीआर चोपड़ा साहब से एक दिन इनका एक पुराना जानकार मिला। उसका नाम था गोवर्धन दास अग्रवाल। बीआर चोपड़ा इन्हें लाहौर से ही पहचानते थे। विभाजन के बाद ये भी मुंबई आ गए थे और अब ये भी फिल्मों में पैसा लगाना चाहते थे। गोवर्धन दास अग्रवाल को जब पता चला कि बीआर चोपड़ा फिल्म बनाना चाहते हैं तो उन्होंने इनसे पूछा कि क्या तुम्हारे पास कोई स्टोरी है। चोपड़ा साहब ने उन्हें आई.एस. जौहर वाली स्टोरी के बारे में बताया। उन्होंने स्टोरी सुनाने को कहा तो चोपड़ा साहब ने उन्हें स्टोरी भी सुना दी। गोवर्धन दास अग्रवाल को भी वो स्टोरी बहुत पसंद आई। उन्होंने वादा किया कि वो इस फिल्म पर पैसा लगाएंगे।
ये सुनकर बीआर चोपड़ा जी बहुत खुश हुए। उन्होंने गोवर्धन दास अग्रवाल से कहा कि चलिए तो कास्ट और डायरेक्टर फाइनल करते हैं। तब गोवर्धन दास अग्रवाल ने कहा कि डायरेक्टर तो तुम ही होगे। तभी मैं पैसा लगाऊंगा। ये मेरी शर्त है। बीआर चोपड़ा बड़े हैरान हुए। क्योंकि वो तो जानते ही नहीं थे कि फिल्म कैसे बनाई जाती है। उन्होंने गोवर्धन दास अग्रवाल को बताया भी कि मैं नहीं जानता फिल्म कैसे डायरेक्ट की जाती है। लेकिन वो अपनी ज़िद पर अड़े रहे। उन्होंने बीआर चोपड़ा साहब से कह दिया कि या तो तुम खुद इस फिल्म को डायरेक्ट करो, या फिर हम इस फिल्म को भूल जाते हैं।
अब बीआर चोपड़ा के पास कोई चारा ना था। उन्होंने तय किया कि वो जानकारी जुटाएंगे और खुद फिल्म डायरेक्ट करेंगे। फिल्म की कास्टिंग शुरू हुई और अशोक कुमार, वीना, जीवन, कुलदीप कौर, प्राण और कुक्कू मोरे जी को फाइनल किया गया। बात जब डायरेक्शन की आई तो बीआर चोपड़ा ने तय किया कि वो किसी कैमरामैन को लेंगे और उसे अपनी ज़रूरत के हिसाब से शॉट बता देंगे। और इस तरह फिल्म कंप्लीट कर ली जाएगी। किसी ने बीआर चोपड़ा से कहा कि कोई अच्छा कैमरामैन हायर कर लो ताकि फिल्म अच्छी बन जाए। लेकिन उन्होंने उस आईडिया को रिजेक्ट कर दिया। क्योंकि उनका मानना था कि अगर अच्छा कैमरामैन लिया गया तो वो फिर अपने हिसाब से काम करेगा। जबकि ये इस फिल्म को अपने मुताबिक बनाना चाहते हैं।
आखिरकार साल 1951 में बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म “अफसाना” रिलीज़ हो गई। जिस दिन इस फिल्म का पहला शो था, बीआर चोपड़ा की पत्नी ने शो पर आने से इन्कार कर दिया था। क्योंकि उन्हें लग रहा था कि फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। और फिल्म लोगों को इतनी बुरी लगेगी कि लोग अंडे और जूते स्क्रीन की तरफ फेंकने लगेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि लोगों ने इस फिल्म को बहुत ज़्यादा पसंद किया। और फिल्म सुपर-डूपर हिट हो गई। यूं इस तरह भारतीय सिनेमा को मिले बी.आर. चोपड़ा — जिन्होंने आगे चलकर एक ही रास्ता, नया दौर, साधना, कानून, गुमराह, हमराज़, दास्तान, धुंध, पति पत्नी और वो, इंसाफ का तराज़ू और निकाह जैसी फिल्में बनाई। कई फिल्में प्रोड्यूस कीं और महाभारत सहित कई नामी व चर्चित टीवी शोज़ भी बनाए।
साभार: https://www.facebook.com/share/p/17ViXpJGLD/
#BRChopra
वेदों के चार काण्ड
वेदों का मुख्य तात्पर्य परमेश्वर ही के प्राप्त कराने और प्रतिपादित करने में है (स. प्र. ८३, ऋ. भू. २१०)। इस लोक और परलोक के व्यवहारों के फलों की सिद्धि और यथावत् उपकार करने के लिए सब मनुष्यों को वेदों के विज्ञान, कर्म, उपासना और ज्ञान इन चार विषयों के अनुष्ठान में पुरुषार्थ करना (ऋ. भू. २६१) चाहिये। क्योंकि इससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि होती है और यही मनुष्य-देह धारण करने का फल है (ऋ. भू. ९८-९९, १४३)। उ. उप. मं. ४- पृ. ३९, यहां तीन काण्ड लिखे हैं।
(१) विज्ञान काण्ड- उसको कहते हैं कि सब पदार्थों का यथार्थ जानना अर्थात् परमेश्वर से लेके तृणपर्यन्त पदार्थों का साक्षात् बोध होना और उनसे यथावत् उपयोग लेना व करना। यह विषय इन चारों में भी प्रधान है, क्योंकि इसी में वेदों का मुख्य तात्पर्य है। परिणामतः विज्ञान दो प्रकार का है-
(क) परमेश्वर का यथावत् ज्ञान और उसकी आज्ञा का बराबर पालन करना।
(ख) उसके रचे हुए सब पदार्थों (=प्राकृतिक वस्तुओं) के गुणों को यथावत् विचार करके उनसे कार्य सिद्ध करना अर्थात् कौन-कौन से पदार्थ किस-किस प्रयोजन के लिए रचे हैं, इसका जानना।
(२) कर्मकाण्ड- यह सब क्रिया प्रधान ही होता है। इसके बिना विद्याभ्यास और ज्ञान पूर्ण नहीं हो सकते। क्योंकि बाह्य व्यवहार तथा मानस व्यवहार का सम्बन्ध बाहर और भीतर दोनों के साथ होता है (ऋ. भू. १००-१०२, १४१)। वह अनेक प्रकार का है, किन्तु उसके दो मुख्य भेद हैं-
एक- परमार्थ भाग। इससे परमार्थ की सिद्धि करनी होती है। इसमें ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना, उसकी आज्ञा पालन करना, न्यायाचरण अर्थात् धर्म का ज्ञान और अनुष्ठान यथावत् करना। मनुष्य इसके द्वारा मोक्ष-प्राप्ति में प्रवृत्त होता है। जब मोक्ष अर्थात् केवल परमेश्वर की ही प्राप्ति के लिए धर्म से युक्त सब कर्मों का यथावत् पालन किया जाय तो यही निष्काम मार्ग है, क्योंकि इसमें संसार के भोगों की कामना नहीं की जाती। इसका फल सुखरूप और अक्षय होता है।
दूसरा मार्ग- लोकव्यवहार सिद्धि। इससे धर्म के द्वारा अर्थ, काम और उनकी सिद्धि करने वाले साधनों की प्राप्ति होती है। यह सकाम मार्ग है, क्योंकि इसमें संसार के भोगों की इच्छा से, धर्मानुसार अर्थ और काम का सम्पादन किया जाता है। इसलिए इसका फल नाशवान् होता है, जन्म-मरण का चक्र छूटता नहीं।
अग्निहोत्र से ले के अश्वमेध (राष्ट्रसेवा, राष्ट्रपालन, देश-रक्षण, राष्ट्र-समृद्धि, राष्ट्रविस्तार) पर्यन्त यज्ञ आदि इसके अन्तर्गत हैं।
विहित और निषिद्ध रूप में कर्म दो प्रकार के होते हैं। वेद में कर्त्तव्यरूप से प्रतिपादित ब्रह्मचर्य, सत्यभाषणादि विहित हैं, वेद में अकर्त्तव्यरूप से निर्दिष्ट व्यभिचार, हिंसा, मिथ्याभाषणादि निषिद्ध हैं। विहित का अनुष्ठान करना धर्म, उसका न करना अधर्म और निषिद्ध का करना अधर्म और न करना धर्म हैं (स. प्र. ४१७, ११ समु.)
(३) उपासना काण्ड- जैसे ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, उनको वैसा जान अपने को वैसा करना, योगाभ्यास द्वारा इनका साक्षात् करना, जिससे परमेश्वर के ही आनन्दस्वरूप में अपने आत्मा को मग्न करना होता है, उसको उपासना कहते हैं। यह कोई यान्त्रिक व ज्ञानरहित क्रिया नहीं, जैसे बिना समझे किसी शब्द का या वाक्य का बार-बार जप करना।
(४) ज्ञान काण्ड- वस्तुओं के साधारण परिचय को ज्ञान कहते हैं (स. प्र. ४४, २ समु.)
(क) उपासना-काण्ड, ज्ञान-काण्ड तथा कर्मकाण्ड के निष्काम भाग में भी परमेश्वर ही इष्टदेव, स्तुति, प्रार्थना, पूजा और उपासना करने के योग्य है। कर्मकाण्ड के निष्काम भाग में तो सीधे परमात्मा की प्राप्ति की ही प्रार्थना की जाती है परन्तु उसके सकाम भाग में अभीष्ट विषय के भोग की प्राप्ति के लिये परमात्मा की प्रार्थना की जाती है।
[स्त्रोत- परोपकारी : महर्षि दयानन्द सरस्वती की उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा का मुखपत्र का अप्रैल द्वितीय २०१९ का अंक]
पुस्तक मेले में भीड़ तो जुटती है, लौटते समय थैले में किताब के कैटेलॉग अधिक होते हैं…
साहित्य को पाठकों का टोटा आजादी के बाद भी था और आज भी है। साहित्यकार हैं, साहित्य भी है पर पाठक कहां हैं? चिंता जाहिर हैं, जन – जन तक साहित्य कैसे पहुंचे? साहित्य और पाठक के इस अंतर्संबंध को शिद्दत से रेखांकित किया वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने। अवसर था 2 नवंबर 25 को दिल्ली के पब्लिक पुस्तकालय में युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच न्यास के 12 वें अखिल भारतीय साहित्य समारोह का आयोजन। मुझे भी बतौर पुरस्कार प्राप्तकर्ता सम्मिलित होने का मौका मिला।
समारोह में विभिन्न साहित्यिक विषयों पर परिचर्चा में विशिष्ठ अतिथि पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के विचार सुने। उन्होंने “समाचार पत्रों से विलुप्त होता साहित्य” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। पत्रकार होने के नाते उनकी साहित्य, समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले साहित्य और पाठक को लेकर अनुभवजनित विचार मेरे मन को भी छू गए।
साहित्य को पाठक नहीं, की चिंता को उनके साथ – साथ मैंने भी महसूस किया और साहित्यिक पत्रकारिता के अंतर्गत पिछले दो वर्ष से कोटा में नई बढ़ती पौध बच्चों में साहित्य की समझ पैदा कर उनमें साहित्य अनुराग जीवित करने का अभियान चला रखा है। उद्देश्य यही है साहित्यकार भी बने और पाठक भी। इसमें कोटा के साथ हाड़ोती अंचल के कुछ साहित्यकार आगे आए हैं और मेरे साथ कंधे से कंधा मिला कर इस मुहिम में सक्रिय हैं।
जब मैं उनके विचार सुन रहा था मुझे वे अपने ही मन की बात नजर आ रही थी। मेरे मन की बात कह रहे थे अरविंद भाई। वे कह रहे थे आज़ादी के समय 1949 में जब करीब आठ हज़ार पत्र और पत्रिकाएं थी तब उनमें साहित्य का प्रकाशन भरपूर होता था। उस समय की पत्रकारिता की खूबी थी कि उस समय के समाचार पत्रों ने कई बड़े लेखकों को जन्म दिया। ज्यादातर साहित्यकार ही समाचार पत्र-पत्रिकाओं के संपादक हुआ करते थे। उन्होंने बताया अज्ञेय से लेकर रघुवीर सहाय तक जैसे अनेक मूर्धन्य साहित्यकारों ने अखबारों में साहित्य का भरपूर प्रकाशन किया। हर समाचार पत्र में एक साहित्य संपादक हुआ करता था, लंबे समय तक यह परम्परा चलती रही और आज साहित्य संपादक की संस्था डगमगा गई है तथा कुछ ही समाचार पत्रों में दिखाई देती हैं। समाचार पत्र से साहित्य का बहुत कम प्रकाशन होना साहित्य संपादक की कड़ी का विलुप्त हो जाना भी है।
उनके इस तथ्य को मैने भी महसूस किया और देखा 70 और 80 के दशकों में एक पूरा पृष्ठ, कभी-कभी दो पृष्ठ साहित्य के नाम होते थे। लेखकों को भरपूर स्थान मिलता था। अच्छे समाचार पत्र कुछ प्रोत्साहन राशि प्रदान कर लेखक के इस अहसास को बल प्रदान करते थे कि मेरी रचना किसी अखबार में छपी है। आज साहित्य का स्थान समाचार पत्रों में या तो विलुप्त हो गया या फिर बहुत सीमित रह गया है। इस सीमित स्थान में भी बड़ी जगह खुद उनके संपादक अथवा विशिष्ठ साहित्यकार के लिए रहती है, साहित्यिक रचनाएं गिनती की होती हैं। धर्म, दर्शन, स्वास्थ्य, फिल्म आदि पर एक पूरा पृष्ठ रहता है परन्तु साहित्य पृष्ठ हाशिए पर आ गया है।
अनुभव बताता है स्वयं साहित्यकारों का भी पाठक के रूप में साहित्य से संबंध निरंतर कम हो रहा है। पठन वृति कम हो रही है, लिखने, छपने, किसी समारोह में अतिथि बनने, सम्मानित होने पर ही जोर दिखाई देता है। जिस कृति को वे स्वयं लोकार्पित कर साथ ले आते हैं, अपवाद को छोड़ कर उसे भी देखते तक नहीं और वह अलमारी की शोभा बन जाती है।
इसी भाव को रेखांकित करते हुए अरविंद ने कहा दिल्ली के पुस्तक मेले में लोग की भीड़ तो बहुत जुटती है परन्तु लौटते समय उनके थैले में किताब के कैटेलॉग अधिक होते हैं। साहित्य के पाठक कम होना चिंता का विषय है और समस्या है की जन-जन तक साहित्य कैसे पहुंचे?
बच्चों को तो हम यह कह कर दोष मढ़ देते हैं कि वे हर समय मोबाइल से जुड़े रहते हैं, कविता, कहानी पढ़ते भी हैं तो इंटरनेट से, अब ऐसे साहित्यकारों को क्या कहें कि किस वजह से ये किताबें नहीं पढ़ते हैं, फिर आम जन से उम्मीद क्यों? बात रुचि की भी है, ऐसे – ऐसे लोग भी हैं जो साहित्यकार नहीं हो कर भी पुस्तकें पढ़ने का शौक रखते हैं। दिल्ली जाने से कुछ दिन की साहित्यकार डॉ. वैदेही गौतम जी के निवास पर जाना हुआ, वहां चर्चा के दौरान ज्ञात हुआ कि उनके पतिदेव संदीप जी जो एक व्यवसायिक हैं और पुस्तकें पढ़ने की जबरदस्त रुचि रखते हैं। कई क्षेत्रों में उनका ज्ञान उस क्षेत्र के ही व्यक्ति से कहीं ज्यादा और पुख्ता है।
प्रतिक्रियाओं को देखें तो साहित्यकार एवं पत्रकार रामकिशोर उपाध्याय इस पर कहते हैं लेखकों की इस शाश्वत चिंता के विकल्प खोजने होंगे। अरविन्द कुमार सिंह के स्वर में स्वर मिलाकर इस चिंता को रेखांकित किया गया है। कोटा के साहित्यकार डॉ. अतुल चतुर्वेदी का कहना है साहित्य और उसके पाठक दोनों कम हुए हैं। जितेंद्र निर्मोही का कहना है हर समारोह एक सीख देता है। झालावाड़ के कवि रूप जी रूप कहते है यदा कदा ऐसे विचार आँखें भी खोलते हैं। कोटा के कथाकार और समीक्षक विजय जोशी इस अभिव्यक्ति पर कहते है कि साहित्यिक सन्दर्भों का गहराई से विश्लेषण करती यह अभिव्यक्ति सप्रसंग सार्थक संवाद को उभारती है तथा साहित्य, साहित्यकार एवं पाठक के अन्तर्सम्बन्धों को विवेचित करती है।
यहां अब इस विमर्श को विराम देते हैं। समाचार पत्रों में साहित्य की कमजोर स्थिति और पाठकों की कमी के रहते हुए भी उम्मीद का दिया जलता रहेगा, नए विकल्प आयेंगे, राज्य सरकारें साहित्यकारों को और अधिक प्रोत्साहन देगी। सार्थक परिचर्चा के लिए मंच अध्यक्ष डॉ. रामकिशोर उपाध्याय जी को साधुवाद।
– डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार, कोटा
महिला क्रिकेट में एक नये युग का आरम्भ
दो नवंबर 2025 का दिन भारतीय महिला क्रिकेट के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। इस दिन भारत की महिला क्रिकेट टीम ने कप्तान हरमनप्रीत कौर के नेतृत्व में विश्व विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया।कप्तान हरमनप्रीत का नाम भी अब उसी प्रकार स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा जिस प्रकार से पुरुष क्रिकेट में कपिल देव का लिखा जाता है। एक समय यह दिवास्वप्न लग रहा था क्योंकि लगातार तीन लीग मैच हारने के बाद भारत के लिए सेमीफाइनल में भी पहुंचना बहुत कठिन था किन्तु भारत की बेटियों ने धैर्य के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ दिया और भारतीय महिला क्रिकेट को यह अभूतपूर्व सफलता मिली।
आज इस महान उपलिब्ध पर घर -घर चर्चा हो रही है। महिला विश्व कप में विजय का उत्सव हर भारतीय ने उसी प्रकार मनाया जिस प्रकार 1983 का पुरुष विश्व कप जीतने के बाद मनाया था। बेटियों के अभूतपूर्व प्रदर्शन पर हर तरफ आनंद ही आनंद बिखरा है, इसका उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार विधानसभा चुनावो की अपनी रैलियों मे भी किया है। विजयी टीम कि सभी बेटियों के संघर्ष की कहानियां मीडिया के माध्यम से समाज के समक्ष राखी जा रही हैं जिससे भविष्य की उन बेटियों को प्रेरणा मिल सके जो क्रीड़ा जगत में कैरियर बनाना चाहती रही हैं। हमारी बेटियों ने महिला क्रिकेट में आस्ट्रैलिया व इंग्लैड जैसे देशों का वर्चस्व ध्वस्त करने मे सफलता प्राप्त की है।
भारत के महिला क्रिकेट को इन ऊचाइयों तक ले जाने में आईसीसी के वर्तमान अध्यक्ष व भारतीय क्रिकेट बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष जय शाह कि दूरदर्शी सोच तथा भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। महिला क्रिकेट को सबसे अधिक बढ़ावा उनके कार्यकाल में ही मिला है। जय शाह के कार्यकाल में पहली बार महिला क्रिकेट खिलाडियों का वेतनमान पुरुष खिलाड़ियों के समकक्ष किया गया। स्मरणीय है कि 2005 में इन्हीं महिला खिलाड़ियों को मैच फीस के रूप में मात्र एक हजार रुपए मिला करते थे। जय शाह के कार्यकाल में महिलाओं के लिए आईपीएल लीग का आरम्भ किया गया। महिला क्रिकेट टीम के लिए अधिक से अधिक खेल व अभ्यास के अवसर उपलब्ध कराने के उददेश्य से दूसरे देशों के साथ द्विपक्षीय श्रृखलाओं की संख्या लगातार बढ़ाई गई। जय शाह की अध्यक्षता में महिला क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिए किए गए प्रयासों का परिणाम अब सामने है। वर्ष 2025 भारतीय महिला क्रिकेट के लिए स्वर्णिम है क्योकि इस वर्ष भारत ने दो विश्व कप जीतकर इतिहस रचा है पहले भारतीय टीम ने अंडर -19 का खिताब जीता और अब यह विश्व कप जीतने मे सफलता प्राप्त की है।
जिन महिला क्रिकेट खिलाडियों को कभी मैच फी भी उनके परिश्रम के अनुरूप नहीं मिलती थी आज उन्हीं पर पुरस्कारों की बरसात हो रही है । बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने बताया कि महिला क्रिकेट टीम को बोर्ड सम्मान के तौर पर 51 करोड़ रुपए नकद इनाम देगा । हिमाचल प्रदेश सरकार ने टीम सदस्य रेणुका सिंह ठाकुर को एक करोड़ रुपए और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है। मध्य प्रदेश सरकार तेज गेंदबाज क्रांति गौड़ को एक करोड़ का नगद पुरस्कार देगी। आईसीसी ने टीम को ट्राफी के साथ 40 करोड़ का पुरस्कार देने की घोषणाकी है। उत्तर प्रदेश सरकार ने विश्व कप में यादगार प्रदर्शन करने वाली दीति शर्मा का प्रमोशन तत्काल प्रभाव से कर दिया है। सूरत के उद्योगपति राज्यसभा सांसद गोविंद ढोलकिया ने भारतीय टीम की सभी सदस्यों को डायमंड ज्वैलरी और सोलर पैनल देने की घोषणा की है ।
ऐसा माना जा रहा है कि इस विजय आने वाले समय में एक बड़ा बदलाव यह भी दिखाई देगा कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए बड़ी कंपनियों के निवेशक व विज्ञापनदाता उपलब्ध हो सकेंगे। भविष्य में नई खेल प्रतिभाएं उभरकर कर सामने आयेंगी। यह विजय एक -एक ऐतिहासिक टर्निग प्वाइंट है तथा आाने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।
विजय कि गाथा में यदि भारतीय महिला टीम के कोच अमोल मजूमदार की बात न की जाए तो यह बात अधूरी रह जाएगी।अमोल की भूमिका अभिनंदनीय है । अमोल का खेल कैरियर 1990 के दशक में उस समय प्रारंभ हुआ था जब राहुल द्रविड, सौरव गांगुली, वीवीएस लक्ष्मण जैसे दिग्गज मैदान पर थे जिस कारण उनका क्रिकेट कैरियर अधिक नहीं बढ़ पाया और वह केवल रणजी तक ही सीमित होकर रह गये। अमोल ने महिला क्रिकेट टीम के कोच के रूप में महिला खिलाड़ियों को लड़ने का साहस, सामर्थ्य और दृढ़ता दी। महिला क्रिकेट टीम ने भी उनको निराश नहीं किया और गुरुदक्षिणा में विश्व विजय की ट्राफी अर्पित कर दी।
विजयोत्सव के इस शोर में कुछ ध्यान रखना तो यह कि विजय के उत्सव कुछ समय बाद फीके पड़ जाते हैं उनका उत्साह और उल्लास बनाए रखने के लिए निरंतर जीत और जीत के प्रयास की आदत डालनी पड़ती है ।

प्रेषक- मृत्युंजय दीक्षित
फोनं. नं. – 9198571540
गुरु नानक देवः मानवता के पथप्रदर्शक विलक्षण संत
गुरु नानक जयन्ती – 5 नवम्बर, 2025
भारत की पवित्र भूमि सदैव से महापुरुषों, संतों और अवतारों की कर्मभूमि रही है। इसी भूमि पर तलवंडी (अब ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में गुरु नानक देव का जन्म हुआ। वे केवल सिख धर्म के प्रवर्तक नहीं थे, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के पथप्रदर्शक, समानता, प्रेम, शांति और सत्य के अमर उपासक थे। उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों, जातिगत भेदभाव और संकीर्णता का विरोध करते हुए एक ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें हर मनुष्य को समान अधिकार मिले और सबके हृदय में करुणा का प्रकाश जले। उनके जीवन की घटनाएं उनकी विलक्षण दृष्टि और दिव्य चेतना का परिचय देती हैं। उनके जन्म दिन को हम प्रकाश पर्व, गुरु पर्व, गुरु पूरब भी कहते हैं। वे अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्म-सुधारक, समाज सुधारक, कवि, देशभक्त एवं विश्वबंधु – सभी गुणों को समेटे हैं। उनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण बचपन से ही दिखाई देने लगे थे। वे किशोरावस्था में ही सांसारिक विषयों के प्रति उदासीन हो गये थे।
गुरुनानक देव एक महापुरुष व महान धर्म प्रवर्तक थे जिन्होंने विश्व से सांसारिक अज्ञानता को दूर कर आध्यात्मिक शक्ति को आत्मसात् करने हेतु प्रेरित किया। उनका कथन है- “रैन गवाई सोई कै, दिवसु गवाया खाय। हीरे जैसा जन्मु है, कौड़ी बदले जाय।” उनकी दृष्टि में ईश्वर सर्वव्यापी है और यह मनुष्य जीवन उसकी अनमोल देन है, इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। उन्हें हम धर्मक्रांति, व्यक्तिक्रांति एवं समाजक्रांति का प्रेरक कह सकते हैं। उन्होंने एक तरह से सनातन धर्म को ही अपने भीतरी अनुभवों से एक नये रूप में व्याख्यायित किया। गुरु नानकजी ने गुलामी, नस्लीय भेदभाव और लिंगभेद की निंदा की। वे कहते थे कि पैसे हमेशा जेब में होने चाहिए, हृदय में नहीं। मनुष्य को लोभ का त्याग करना चाहिए और सदैव परिश्रम से धन कमाना चाहिए। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। आपके स्वभाव में चिंतनशीलता थी तथा आप एकांतप्रिय थे। आपका मन स्कूली शिक्षा की अपेक्षा साधु-संतों व विद्वानों की संगति में अधिक रमता था। बालक नानक ने संस्कृत, अरबी व फारसी भाषा का ज्ञान घर पर रहकर ही अर्जित किया। इनके पिता ने जब पुत्र में सांसारिक विरक्ति का भाव देखा तो उन्हें पुनः भौतिकता की ओर आसक्त करने के उद्देश्य से पशुपालन का कार्य सौंपा। फिर भी नानकदेव का अधिकांश समय ईश्वर भक्ति और साधना में व्यतीत होता था।
गुरु नानकदेव ईश्वर के सच्चे प्रतिनिधि थे। सिख धर्म के दस गुरुओं की कड़ी में प्रथम हैं गुरु नानक। अणु को विराट के साथ एवं आत्मा को परमात्मा के साथ एवं आत्मज्ञान को प्राप्त करने के एक नए मार्ग की परंपरा का सूत्रपात गुरुनानक ने किया है, यह किसी धर्म की स्थापना नहीं थी। उन्होंने परम सत्ता या संपूर्ण चेतन सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करने का मार्ग बताया। यही वह सार्वभौम तत्व है, जो मानव समुदाय को ही नहीं, समस्त प्राणी जगत् को एकता के सूत्र में बांधे हुए हैं। इसी सूत्र को अपने अनुयायियों में प्रभावी ढंग से सम्प्रेषित करते हुए ‘सिख’ समुदाय के प्रथम धर्मगुरु नानक देव ने मानवता एवं सर्वधर्म सद्भाव का पाठ पढ़ाया। उन्होंने समाज में आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ाने के लिए लंगर परंपरा की शुरुआत की थी, जहां गरीब-राजा, ऊंच-नीच सभी लंगर खाते थे। उन्होंने निर्गुण उपासना पर जोर दिया और उसका ही प्रचार-प्रसार किया। वे मूर्ति पूजा नहीं करते थे और न ही मानते थे। ईश्वर एक है, वह सर्वशक्तिमान है, वही सत्य है — इसमें ही नानक देव का पूरा विश्वास था। उनका धर्म और अध्यात्म लौकिक तथा पारलौकिक सुख-समृद्धि के लिए श्रम, शक्ति, भक्ति एवं मनोयोग के सम्यक नियोजन की प्रेरणा देता है। गुरु नानक देव की शिक्षाएं आज अधिक प्रासंगिक हैं क्योंकि उन्होंने मानवता और सत्कर्म को सबसे बड़ा धर्म बताया था। उन्होंने समाज में कई बदलाव लाने का काम किया, उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों के साथ बराबरी का दर्जा दिया और वैवाहिक जीवन को पवित्र माना। उन्होंने कहा कि विद्यालय में सभी धर्म, जाति, और सम्प्रदाय के लोगों को समान रूप से शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्होंने आडंबर और अंधविश्वासों का खंडन किया और ईश्वर की प्रत्यक्ष भक्ति पर ज़ोर दिया। उन्होंने अंतर-धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए संवादों का महत्व बताया और निस्वार्थ सेवा को बढ़ावा देते हुए करुणा, परोपकारिता और ज़िम्मेदारी की भावना को बढ़ावा दिया।
एक बार जब वे सुल्तानपुर में नवाब की नौकरी कर रहे थे, उन्हें अनाज की तौल का कार्य सौंपा गया। वे गिनती करते हुए “एक, दो, तीन” बोलते जा रहे थे, पर जब “तेरह” पर पहुँचे तो वे रुक गए और बार-बार “तेरह, तेरह” कहने लगे। लोग चकित हो उठे। उन्होंने कहा- “तेरा, सब कुछ तेरा” अर्थात इस संसार में कुछ भी मेरा नहीं, सब कुछ ईश्वर का है। यही गुरु नानक की आत्मदृष्टि थी, जहाँ उन्होंने अहंकार से मुक्त होकर ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव किया। यह घटना उनके आध्यात्मिक जीवन का निर्णायक क्षण बनी।
एक अन्य प्रसंग में वे अपने साथी भाई मरदाना के साथ मक्का पहुंचे। थकान से चूर होकर वे विश्राम हेतु लेट गए और उनके पैर काबा की दिशा में हो गए। एक व्यक्ति ने आक्रोश में कहा, “अपने पैर ईश्वर की ओर कैसे फैला दिए?”
गुरु नानक मुस्कराकर बोले, “भाई, मेरे पैर उस दिशा में कर दो जहाँ ईश्वर न हो।” वह व्यक्ति जैसे-जैसे पैर घुमाता गया, काबा उसी दिशा में घूमता प्रतीत हुआ। यह घटना उनके सर्वधर्मसमभाव और सर्वव्यापक ईश्वर की अनुभूति की प्रतीक बन गई। एक बार कुछ लोगों ने गुरुनानक देव से पूछा कि हमें यह बताइए कि आपके अनुसार हिंदू बड़ा है या मुसलमान तो गुरु साहिब ने उत्तर दिया, ‘अवल अल्लाह नूर उपाइया कुदरत के सब बंदे, एक नूर से सब जग उपजया कौन भले कौन मंदे।’ यानी सब इंसान ईश्वर के पैदा किए हुए हैं, न तो हिंदू कहलाने वाला भगवान की नजर में कबूल है, न मुसलमान कहलाने वाला। रब की निगाह में वही बंदा ऊंचा है जिसका अमल नेक हो, जिसका आचरण सच्चा हो। इस तरह गुरुनानक देव सच्चे गुरु एवं परमात्मा स्वरूप हैं।
गुरु नानक का जीवन सरलता, सच्चाई, करुणा और निस्वार्थ सेवा का आदर्श था। उन्होंने कहा- “ना कोई हिन्दू, ना मुसलमान; सब एक ही नूर से उपजे हैं।” वे धर्म को किसी संप्रदाय की सीमाओं में नहीं बाँधते थे, बल्कि मानवता को ही सच्चा धर्म मानते थे। उनके तीन सूत्र- नाम जपो, कीरत करो और वंड छको, मानव जीवन के नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आधार हैं। उनका कहना था कि ईश्वर का स्मरण करो, ईमानदारी से परिश्रम करो और जो कुछ कमाओ उसमें से दूसरों के साथ बाँटो। उनका जीवन इस सत्य का साक्षी है कि धर्म पूजा-पाठ या कर्मकांडों में नहीं, बल्कि आचरण और व्यवहार में बसता है। वे कहते थे, “वह धर्म नहीं जो दूसरों को दुख दे, वह भक्ति नहीं जो केवल पूजा में सीमित रहे।” गुरु नानक ने अहंकार, लोभ, क्रोध और हिंसा से मुक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी और यह बताया कि ईश्वर प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है। उन्होंने कहा- “सबना में जोत, जोत है सोई; तिस दा चानन सब में होई।” यानी हर प्राणी में उसी परमात्मा की ज्योति विद्यमान है, इसलिए किसी से भेदभाव मत करो।
आज जब मानवता पुनः संकीर्णता, हिंसा और विभाजन के दौर से गुजर रही है, तब गुरु नानक देव की शिक्षाएं हमारे लिए दिशा-सूचक दीपक हैं। उनका सन्देश हमें करुणा, एकता, सादगी और सच्चाई की ओर ले जाता है। उन्होंने जीवनभर यह बताया कि सच्चा धर्म वही है जो मानवता को जोड़े, प्रेम को बढ़ाए और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे। “एक ओंकार सतनाम, करता पुरख, निरभउ, निरवैर”- यह उनके जीवन का सार था, जो आज भी विश्व को यह सिखाता है कि ईश्वर एक है, वह सबका है, सबमें है, और सबके लिए है। गुरु नानक देव सचमुच उस विराट चेतना के प्रतीक हैं जो समय, धर्म और सीमाओं से परे होकर मानवता के उजाले की दिशा दिखाती है।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133