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चीन में नया कानून संवेदनशील मुद्दों पर बोलने के लिए डिग्री जरुरी

चीन में अब सोशल मीडिया पर कंटेंट बनाना पहले जैसा आसान नहीं रहेगा। 25 अक्टूबर से लागू हुए नए “इन्फ्लुएंसर कानून” के तहत अब जो लोग चिकित्सा, कानून, शिक्षा या वित्त जैसे संवेदनशील विषयों पर कंटेंट बनाएंगे, उन्हें इन क्षेत्रों में औपचारिक योग्यता या डिग्री दिखानी होगी।

यह नियम चीन की साइबरस्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (CAC) ने जारी किया है। प्रशासन का कहना है कि इस कानून का मकसद गलत जानकारी (misinformation) को रोकना और आम लोगों को झूठे या हानिकारक सुझावों से बचाना है। लेकिन दूसरी तरफ, कई लोग इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी और सेंसरशिप के लिए खतरा भी मान रहे हैं।

नए नियमों के अनुसार, जो इन्फ्लुएंसर रेगुलेटेड या संवेदनशील विषयों पर बात करेंगे, उन्हें अपनी विशेषज्ञता का प्रमाण देना होगा- जैसे डिग्री, लाइसेंस या प्रोफेशनल सर्टिफिकेट। प्लेटफॉर्म जैसे Douyin (चीन का TikTok), Bilibili और Weibo पर अब यह जिम्मेदारी होगी कि वे अपने क्रिएटर्स की डिटेल्स की जांच करें और सुनिश्चित करें कि उनका कंटेंट सही जानकारी और डिस्क्लेमर के साथ हो।

उदाहरण के लिए, अगर कोई वीडियो किसी शोध या अध्ययन पर आधारित है, तो क्रिएटर को यह बात साफ तौर पर बतानी होगी। साथ ही, अगर किसी वीडियो में AI-generated सामग्री है, तो उसे भी स्पष्ट रूप से उल्लेख करना होगा।

CAC ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए मेडिकल प्रोडक्ट्स, सप्लीमेंट्स और हेल्थ फूड्स के विज्ञापनों पर रोक लगा दी है, ताकि लोग “शैक्षिक वीडियो” के नाम पर छिपे प्रचार से बच सकें।

हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह कानून रचनात्मकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचा सकता है। उनका तर्क है कि अगर सिर्फ “योग्य” लोगों को ही कुछ विषयों पर बोलने की इजाजत होगी, तो सरकार स्वतंत्र आवाजों और आलोचनात्मक विचारों को दबा सकती है।

कई लोगों को डर है कि “विशेषज्ञता” की परिभाषा इतनी सीमित बना दी जाएगी कि अधिकारी उन लोगों को भी चुप करा सकेंगे जो सरकारी नीतियों या विचारों पर सवाल उठाते हैं।

वहीं, कुछ लोग इस कानून का समर्थन भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह कदम संवेदनशील विषयों पर सही और भरोसेमंद जानकारी फैलाने में मदद करेगा। उनका कहना है कि चिकित्सा या वित्त जैसे विषयों पर सिर्फ क्वालिफाइड प्रोफेशनल्स को ही बोलने का अधिकार होना चाहिए ताकि गलत सूचना से जनता को नुकसान न पहुंचे।

गौरतलब है कि इन्फ्लुएंसर कल्चर के बढ़ने के साथ अब लोग पारंपरिक विशेषज्ञों की बजाय सोशल मीडिया क्रिएटर्स पर भरोसा करने लगे हैं। लेकिन जब यही क्रिएटर गलत या अधूरी जानकारी फैलाते हैं, तो उसका असर गंभीर हो सकता है। ऐसे में चीन की सरकार का मानना है कि यह नया कानून ऑनलाइन जिम्मेदारी और पारदर्शिता बढ़ाने में मदद करेगा।

श्री पुनीत गोयनका ने कहा मीडिया और मनोरंजन उद्योग भारत की सांस्कृतिक शक्ति के रूप में बढ़ रहा है

जी एंटरटेनमेंट के एमडी और सीईओ पुनीत गोयनका ने 16 अक्टूबर 2025 को आयोजित कॉन्फ्रेंस कॉल में कंपनी के वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही और पहले छमाही के प्रदर्शन पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने सभी शेयरधारकों और कर्मचारियों को त्योहारों की हार्दिक शुभकामनाएं दीं और इस महीने को कई कारणों से विशेष बताया, जिसमें सैटेलाइट टीवी और जी की 33वीं वर्षगांठ भी शामिल है।

पुनीत गोयनका ने कहा कि मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री भारत की सांस्कृतिक शक्ति के रूप में लगातार बढ़ रही है। इस बीच, जी कंपनी अपने भविष्य के विकास के लिए मजबूत नींव बनाने के लिए ठोस कदम उठा रही है। उन्होंने बताया कि भविष्य के लिए निवेश अक्सर कठिन निर्णय और निरंतर कार्य की मांग करता है।

उन्होंने कहा कि इस तिमाही में कंपनी के प्रदर्शन से यह स्पष्ट होता है कि रणनीतिक निवेश और फैसले व्यवसाय की नींव मजबूत करने और सभी शेयरधारकों के लिए स्थायी मूल्य निर्माण के लिए किए गए हैं। डिजिटल व्यवसाय, खासकर ZEE5 की प्रगति में लगातार सुधार हो रहा है। पिछले तिमाही में सात भाषाओं में पेश किए गए विशेष सब्सक्रिप्शन प्लान ने यूजर्स से सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त की है, जिससे सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू में बढ़ोतरी हुई है।

पुनीत गोयनका ने कहा कि कंपनी इस हिस्से में आने वाली तिमाहियों में लाभप्रदता हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी बताया कि लीनियर बिजनेस में कंटेंट को मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों का असर 18.2% बाजार हिस्सेदारी में देखा गया। जी मीडिया के सात चैनल्स ने अपनी-अपनी मार्केट में लीडरशिप हासिल की। नए शो और लोकप्रिय प्रॉपर्टीज ने व्युअरशिप में बढ़ोतरी की है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कंटेंट की लागत बढ़ी है, लेकिन यह व्युअरशिप और मार्केट शेयर में बढ़ोतरी के संतुलित दृष्टिकोण से देखी जानी चाहिए। नए शो लॉन्च और प्रमोशन खर्च में भी मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन आने वाले समय में ये खर्च स्थिर होंगे और ऐडवर्टाइजिंग व सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू बढ़ाने में मदद करेंगे।

ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू की बात करते हुए पुनीत गोयनका ने कहा कि FMCG कंपनियों द्वारा खर्च बढ़ने के कारण इस तिमाही में ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में मामूली बढ़ोतरी देखी गई। जीएसटी सुधारों और त्योहारों के मौसम से सकारात्मक रुझान बन रहा है। कंपनी मध्यकाल में ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू की वृद्धि के लिए आशावादी दृष्टिकोण रखती है।

भविष्य के विकास की रणनीति के तहत कंपनी ने शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट जैसे नए क्षेत्रों में प्रवेश भी किया है। पुनीत गोयनका ने कहा कि इन व्यवसायों की क्षमता कंपनी के दर्शक आधार को बढ़ाने और मनोरंजन व तकनीक को जोड़ने के अनुभव देने में मदद करेगी। इसके लिए जी ने Ideabaaz Tech Private Limited के साथ साझेदारी की है और नया शो Ideabaaz लॉन्च किया गया है। यह शो देश के स्टार्ट-अप इकोसिस्टम को बढ़ावा देगा।

साभार- https://www.samachar4media.com/ से

श्रीमती राजश्री बिड़ला की ‘गुरुदक्षिणा’ ने दिया एक शानदार साहित्यिक अवदान

प्रदीप गुप्ता व देवमणि पाण्डेय

मुंबई ऐसा शहर है जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों आयोजन पाँचसितारा होटलों से लेकर छोटे मोटे स्थानों पर होते है। लेकिन कुछ आयोजन ऐसे होते हैं जो यादगार होने के साथ ही अपनी एक अलग छाप छोड़ जाते है।

आज जब मुंबई के बड़े कॉर्पोरेट घराने विभिन्न आयोजनों के नाम पर पश्चिमी सभ्यता को पोसने वाले कार्यक्रम कर करोड़ो रुपये खर्च कर देते हैं वहीँ बिड़ला उद्योग समूह की श्रीमती राजश्री बिड़ला ने हिंदी कवियों और हिंदी पुस्तक को समर्पित एक ऐसा आयोजन किया जिसकी सुरभि हिंदी साहित्य जगत को बरसों तक महकाती करती रहेगी। सबसे बड़ी बात ये है कि इस कार्यक्रम में श्रीमती राजश्री बिड़ला, उनके पुत्र कुमार मंगलम बिड़ला और उनका परिवार पूरे समय मौजूद रहा। यह अपने आप में एक दुर्लभ दृश्य था कि हिंदी साहित्य के किसी कार्यक्रम में देश के इतने बड़े उद्योगपति का परिवार इतने सम्मान और भाव से पूरे समय उपस्थित रहे।

समारोह अध्यक्ष पद्मभूषण राजश्री बिरला ने अपने वक्तव्य के ज़रिए साबित किया कि उन्हें कला, साहित्य और संस्कृति से गहरा अनुराग है। 97 वर्ष के ग़ज़लकार नंदलाल पाठक ने पुरस्कार के औचित्य पर प्रकाश डाला। सभागार में नंदलाल पाठक के कई चुनिंदा शेरों को ख़ूबसूरत पेंटिंग की तरह पेश किया गया था।  कार्यक्रम की भव्यता किसी कॉर्पोरेट कंपनी के आयोजन जैसी थी मगर रचनात्मकता किसी साहित्य उत्सव जैसी थी।

इस कार्यक्रम के माध्यम से दो नए पुरस्कारों की शुरुआत के साथ मुंबई में एक नए रचनात्मक माहौल का आगाज़ हुआ। दीपावली अवकाश और छठ उत्सव की दस्तक के बावजूद जिस उमंग और उत्साह के साथ इस पुरस्कार समारोह में श्रोताओं ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई वह अविस्मरणीय है। इनमें कला, साहित्य और व्यवसाय से जुड़े प्रमुख लोग थे यानी हर श्रोता अपने आप में विशिष्ट था। बिड़ला उद्योग समूह की श्रीमती राजश्री बिड़ला की प्रेरणा से स्थापित  साहित्यायन फाउंडेशन मुंबई का यह प्रथम आयोजन था। हिंदी काव्य साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए वरिष्ठ ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी को नंदलाल पाठक साहित्य पुरस्कार (₹ पांच लाख) और युवा ग़ज़लकार अभिषेक कुमार सिंह को नंदलाल पाठक प्रतिभा पुरस्कार (₹ एक लाख) मुम्बई में आयोजित एक साहित्य समारोह में मुख्य अतिथि सुधांशु त्रिवेदी (सांसद) ने दोनों रचनाकारों को पुरस्कार प्रदान करके सम्मानित किया।

ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी ने “ग़ज़ल दुष्यंत के बाद” (चार खंड) संकलन का संपादन किया है जिसमें एक हज़ार से अधिक ग़ज़लकार शामिल हैं। यह एक महत्वपूर्ण कार्य है। दूसरी तरफ़ पिछले 16 सालों से लगातार ग़ज़ल कुंभ का आयोजन करके उन्होंने ग़ज़ल के पक्ष में अच्छा माहौल बनाया है। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि वे पुरस्कार राशि का उपयोग निजी हित के लिए नहीं बल्कि ग़ज़ल के हित के लिए करेंगे।

अपने दो ग़ज़ल संग्रहों के ज़रिए ग़ज़लकार अभिषेक ने बेहतर संभावनाओं का संकेत दिया है। फ़िलहाल हम जिन वैश्विक चुनौतियों, वैचारिक संक्रीणताओं, धार्मिक उन्माद और प्रकृति के प्रकोप का सामना कर रहे हैं उनका प्रतिबिंब अभिषेक की ग़ज़लों में दिखाई देता है। अभिषेक ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ग़ज़ल के विकास के लिए सामूहिक प्रयास की ज़रूरत है।

इस अवसर पर पाठक जी का ग़ज़ल संग्रह “जीवन एक ग़ज़ल है” का भी लोकार्पण  हुआ जिसके लिए वाणी प्रकाशन के मुखिया अरुण माहेश्वरी भी मौजूद थे। कार्यक्रम के समपान के बाद पाठकजी की पुस्तक की खरीदी के लिए उमड़ी भीड़ से ऐहसास हुआ कि पाठकजी और उनका रचनाकर्म मुंबई के साहित्यप्रेमियों के लिए क्या महत्व रखता है।

 श्री नंदलाल पाठक ने कहा कि देश में बिड़ला परिवार ने साहित्य संस्कृति, धर्म और परोपकार की ऐसी मिसालें कायम की है जिसका लाभ कई  पीढ़ियों से लोगों को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि बिड़ला परिवार जो मंदिर बनवाता है उसमें देवता की मूर्ति का पता तो तब चलता है जब कोई मंदिर तक पहुँचता है लेकिन दूर से देखने वाले उसे बिड़ला मंदिर ही कहते हैं, कोई समाज किसी उद्योगपति को ऐसा सम्मान दे तो समझा जा सकता है कि उस उद्योगपति का समाज के प्रति क्या भाव है।

वर्ली के फोर सीज़न्स होटल के बैंक्वेट हाल में आयोजित इस भव्य व गरिमामयी कार्यक्रम में हिंदी ग़ज़ल न सिर्फ़ दिखाई दी बल्कि सुनाई भी दी। इसे साहित्य की छोटी मोटी घटना मान कर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

बिड़ला परिवार शीर्ष व्यवसायी होने  के  साथ ही  स्वतन्त्रता   आंदोलन से लेकर धर्म, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में जो योगदान है उसी क्रम में श्रीमती राजश्री बिड़ला ने एक अध्याय साहित्य का भी जोड़ दिया है और अपने गुरू और हिंदी के जानेमाने ग़ज़लकार नंदलाल पाठक के नाम से सम्मान और पुरस्कार का सिलसिला शुरू किया है।

बीजेपी के फायरब्रांड प्रवक्ता  व कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सांसद सुधांशु त्रिवेदी के रूप में उद्बोधन में एक अलग ही अंदाज़ में नज़र आए. सारगर्भित बात करके ताली बटोर कर ले गए। उन्होंने अपनी प्रत्युत्पन्नमति, संस्कृत श्लोकों, हिंदी कविताओं और गजलों से ऐसा समाँ बांधा कि उपस्थित श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहे। अपने सुदीर्घ वक्तव्य में आचार्य मम्मट, वाल्मीकि, सुमित्रानंदन पंत, अटल बिहारी वाजपेई और नंदलाल पाठक की काव्य पंक्तियों को उद्धृत किया- “ज़हर पीता हुआ हर आदमी शंकर नहीं होता/ न जब तक आदमी इंसान हो शायर नहीं होता।”

सुधांशु जी को -” राष्ट्रीयता के आयाम” पर अपने विचार व्यक्त करना थे। अपने वक्तव्य को पूर्णता प्रदान करते हुए उन्होंने इस विचार को रेखांकित किया कि राष्ट्र जीवंत चेतना का प्रतीक होता है जिसे न काटा जा सकता है और न बांटा जा सकता है। उन्होंने ऐतिहासिक व आज के मौजूद प्रमाणों के साथ कहा कि पूरी दुनिया में चीन से लेकर कंबोडिया और इंडोनेशिया व जापान तक हिंदू संस्कृति के चिन्ह आज भी जीवित हैं और हम दावे से कह सकते हैं कि ये देश हमारी संस्कृति के अंग हैं।

 इस अवसर पर प्रो नंदलाल पाठक के ग़ज़ल संग्रह “जीवन एक ग़ज़ल है” का लोकार्पण किया गया।

बात संचालन की की जाए तो देवमणि पाण्डेय ने अपने अभिनव अंदाज व सटीक गजलों के माध्यम से पूरे कार्यक्रम को एक रसभरी शाम में बदल दिया।

इस अवसर पर आयोजित ग़ज़ल संध्या में सुश्री पूनम विश्वकर्मा, सुमन जैन, अभिषेक कुमार सिंह, देवमणि पांडेय, दीक्षित दनकौरी और नंदलाल पाठक ने अपनी ग़ज़लों का पाठ किया। प्रतिष्ठित गायिका वृषाली बियानी ने नंदलाल पाठक की दो ग़ज़लों की संगीतमय प्रस्तुति की। अंत में वाणी प्रकाशन के निदेशक अरुण माहेश्वरी ने आभार व्यक्त किया। इस ग़ज़ल पाठ के श्रोताओं में कई लेखकों, पत्रकारों और कलाकारों के साथ उद्योगपति कुमार मंगलम बिरला, उद्योगपति सुश्री किरण बजाज और सांसद सुधांशु त्रिवेदी भी मौजूद थे।

इस नोबेल पुरस्कार की जड़ें हिंदू संस्कृति से जुड़ी है

वर्ष 2025 के लिए अर्थशास्त्र विषय में नोबेल पुरस्कार की घोषणा की गई है। इस वर्ष यह पुरस्कार श्री जोएल मोक्यर, फिलिप एगियन और श्री पीटर हाविट को “सृजनात्मक विनाश (क्रीएटिव डेस्ट्रक्शन)” एवं “नवाचार संचालित आर्थिक संवृद्धि की व्याख्या” विषय पर शोद्ध करने के लिए संयुक्त रूप से दिया गया है।

श्री फिलिप एगियन और पीटर हाविट ने सृजनात्मक विनाश के माध्यम से सतत संवृद्धि के सिद्धांत साझा किए हैं। आपने सृजनात्मक विनाश की व्याख्या करने के लिए एक गणितीय मॉडल तैयार किया है। सृजनात्मक विनाश के अनुसार, जब बाजार में नए और बेहतर उत्पाद आते हैं, तो पुराने उत्पाद बेचने वाली कम्पनियां अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता खो देती हैं या बाजार से बाहर हो जाती है। इसे सृजनात्मक कहा जाता है, क्योंकि यह नवाचार पर आधरित है। यद्यपि यह विनाशकारी भी हैं, क्योंकि पुराने उत्पाद अप्रचलित हो जाते हैं और अपना वाणिज्यिक मूल्य खो देते हैं। इस प्रकार बाजार में नई इकाईयों का पदार्पण होता है एवं पुरानी इकाईयों का विनाश हो जाता है। इसे ही सृजनात्मक विनाश की संज्ञा दी गई है।

ऐसा आभास हो रहा है कि उक्त सिद्धांत की जड़ें हिंदू सनातन संस्कृति से ही निकलती हैं। जिस किसी जीव ने इस धरा पर जन्म लिया है उसे एक दिन तो अपने जीवन का परित्याग करना ही है। मानव जीवन की प्राप्ति भी कुछ उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए होती है, उन उद्देश्यों की प्राप्ति के पश्चात इस मानव जीवन को छोड़ना ही होता है। उसी प्रकार, सृजनात्मक विनाश के सिद्धांत में भी एक समय सीमा के पश्चात उत्पादों के विनिर्माण हेतु बाजार में जब नयी पीढ़ी की इकाईयों का पदार्पण होता है तो पुरानी पीढ़ी की विनिर्माण इकाईयों को बाजार से बाहर हो जाना होता है।

हिंदू सनातन संस्कृति से सम्बंधित वेदों, पुराणों एवं धार्मिक ग्रंथों में यह वर्णन मिलता है कि मानव जीवन की प्राप्ति, 84 लाख योनियों के चक्र के पश्चात प्राप्त होती है। साथ ही, यह भी माना जाता है कि मानव जीवन की प्राप्ति पिछले जन्मों में किए गए कर्मों को भोगने, भविष्य का निर्माण करने एवं 84 लाख योनियों के चक्र से बाहर निकलकर मोक्ष की प्राप्ति करने के लक्ष्य को हासिल करने के अवसर के रूप में मिलती है। अब, यह इस मानव जीवन में किए गए कर्मों पर निर्भर करता है कि हमें मोक्ष की प्राप्ति होगी अथवा 84 लाख योनियों के चक्र में एक बार पुनः फंसे रहेंगे। यदि हम अपने कर्मों को लगातार धर्मानुसार करते हैं तो मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है। इसी आधार पर ही यह कहा भी जाता है कि मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से ही देवता भी मानव जीवन को प्राप्त करने की कामना करते हैं।

मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से मिले इस मानव जीवन को संवारने की दृष्टि से विद्वान संत महात्मा उपदेश देते हैं कि काम एवं अर्थ से सम्बंधित की जाने वाली गतिविधियों को धर्म आधारित होना चाहिए ताकि अंत में मोक्ष की प्राप्ति सम्भव हो सके। अतः काम एवं अर्थ को धर्म एवं मोक्ष के बीच स्थान दिया गया है। धर्म का आशय यहां प्रभु परमात्मा की भक्ति अथवा पंथ (रिलीजन) से कतई नहीं हैं बल्कि धर्म से आश्य यह है कि किसी भी प्रकार के कार्य को सम्पन्न करने में इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि किए जाने वाले कार्य से किसी  भी जीव जंतु अथवा मानव की हानि नहीं हो इसके ठीक विपरीत हमारे द्वारा किए जाने वाले कार्यों से समाजजनों की भलाई हो। अर्थात, निर्धारित नियमों का अनुपलान करते हुए व्यक्तिगत एवं सामाजिक कार्यों को सम्पन्न करना ही हमारा धर्म है और यदि हम लगातार धर्म के अनुसार कार्य करते रहेंगे तो मोक्ष की प्राप्ति सम्भव हो सकेगी।

इस प्रकार, हिंदू सनातन संस्कृति के अनुसार पुनर्जन्म में विश्वास किया जाता है। किसी भी प्राणी का अहित करना तो दूर, बल्कि इसके बारे में कभी सोचा भी नहीं जाता है। समस्त जीवों में प्रभु परमात्मा का वास माना जाता है और सभी जीवों में एक ही आत्मा का निवास मानकर आपस में एकाकार माना जाता है। “वसुधैव कुटुम्बकम”, “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” “सर्वे भवंतु सुखिन:” की भावना का जन्म भी उक्त सिद्धांत के आधार पर ही हुआ है। प्रभु परमात्मा द्वारा निर्धारित की गई उम्र को प्राप्त करने के पश्चात इस जीव को अपना मानुष चोला त्यागकर, इस जीवन में किए गए कर्मों के आधार पर नयी योनि में जन्म लेना होता है और इसे ही सृजनात्मक विनाश की संज्ञा दी जा सकती है।

हिंदू सनातन संस्कृति का अध्ययन करने पर ध्यान में आता है कि स्व-सृजक प्रक्रिया एवं रचनात्मक विनाश का सिद्धांत तो भारतीय संस्कृति में पूर्व से ही अंतर्निहित है। भगवान शिव जब तांडव नृत्य करते हैं तो बुरे विचारों का नाश होकर नए विचार जन्म लेते हैं जो प्रकृति का सृजन कर प्रकृति को नई ऊंचाई पर ले जाने में सहायक होते हैं। भगवान शिव भी तांडव नृत्य इस सिद्धांत के आधार पर करते हैं ताकि पृथ्वी पर आवश्यक विनाश हो सके एवं नयी प्रकृति का पुनर्निर्माण हो सके। “शिव तांडव के सृजनात्मक विनाश सम्बंधी सिद्धांत” को ही अर्थशास्त्र में लागू करते हुए कहा गया है कि प्रत्येक उत्पादन इकाई की अपनी एक उम्र तय होती है और इस खंडकाल में सामान्यतः नवाचार होने के चलते पुरानी इकाईयां बंद हो जाती हैं और यहां यह कहा गया है कि इन पुरानी इकाईयों को नष्ट होने देना चाहिए ताकि नवाचार के साथ नई उत्पादन इकाईयों को स्थापित कराया जा सके। यह सिद्धांत शिव तांडव की तरह विभिन्न क्षेत्रों में लगातार चलता रहता है।

श्री जोएल मोक्यर ने तकनीकी प्रगति के माध्यम से सतत आर्थिक संवृद्धि के लिए आवश्यक पूर्व शर्तों की पहचान की है और उन्होंने उन तंत्रों का वर्णन किया है जो वैज्ञानिक सफलताओं और उनके व्यावहारिक अनुप्रयोगों को एक दूसरे को बढ़ाने तथा एक स्व-सृजक प्रक्रिया बनाने में सक्षम बनाते हैं। उन्होंने सतत संवृद्धि के लिए आवश्यक कारकों की पहचान की हैं। इनमें शामिल हैं – उपयोगी ज्ञान का सतत प्रवाह  – जिसमें (1) प्रस्तावात्मक ज्ञान (प्रोपोजीशनल नोलेज), जो दर्शाता है कि कोई व्यक्ति काम क्यों करता है,(2) निर्देशात्मक ज्ञान (प्रेसक्रिप्टिव नोलेज) जो वर्णित करता है कि किसी व्यक्ति द्वारा काम करने के लिए क्या आवश्यक है, शामिल है। इसी प्रकार वाणिज्यिक ज्ञान द्वारा विचारों को वाणिज्यिक उत्पादों में बदला जाता है और इस परिवर्तन के प्रति सामाजिक खुलापन होना चाहिए जो पुराने उत्पादों के स्थान पर नए उत्पादों को स्वीकार करने की इच्छा रखते हों।

इसी प्रकार स्व-सृजक प्रक्रिया के अंतर्गत यह कहा जा सकता है कि हिंदू सनातन संस्कृति में मनुष्य का इस धरा पर जन्म 84 लाख योनियों से अपने आप को मुक्त करने के उद्देश्य से होता है अतः उसे ज्ञान रहता है कि उसे किस प्रकार के कर्म इस मानुष जीवन में करना हैं और क्यों करना है। इन निर्धारित कर्मों को करते हुए मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करने हेतु सदैव ही प्रयासरत रहता है। इस ही स्व-सृजक प्रक्रिया कहा जा सकता है।

प्रहलाद सबनानी
प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

संस्कृतियों का संगम : जगनेर किला

ब्रजभूमि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ताजनगरी आगरा से करीब 40 किलोमीटर दूर जगनेर एक छोटा सा शहर और एक नगर पंचायत है। जहां लगभग 1000 वर्ष पुराना जगनेर का ऐतिहासिक किला है।

यह शहर एक पहाड़ी किले के चारों ओर फैला हुआ है। जो पत्थर के खदान और सरसों तेल निकासी के लिए भी प्रसिद्ध है। जगनेर का किला जमीनी स्तर से ऊपर 122 मीटर की दूरी पर एक तेज़ पहाड़ी पर स्थित और बाहर की ओर फैला हुआ है। अरावली के पर्वतों के बीच ऊंचे टीले पर निर्मित इस विशाल दुर्ग को आज

काफी कुछ समय के थपेड़ों ने धूमिल कर दिया है।

 

ग्वाल बाबा मन्दिर व छतरी:-

किले में एक जाग मन्दिर है जो जहाँ राजस्थान के भाट-चारण परम्परा का जाग जाति की बहुल्यता का बोध कराती है।

यह एक लोकप्रिय तीर्थ स्थल है, जहां ग्वाल बाबा की समाधि है। सदियों पहले गुफा में रहते के नाम पर इस घर का नाम पर ‘’ग्वाल बाबा’’ नाम रखा गया है । जहां ग्वाल बाबा का मशहूर मंदिर भी है। यह आगरा जिले के दक्षिण राजस्थान में की नोक पर  आगरा शहर से ही लगभग 57 किमी दूर स्थित है। किले में ही राजा जयपाल सिंह ने संत ग्वाल बाबा की छत्री और समाधि का निर्माण करवाया था जो आज भी यहां मौजूद है और हर वर्ष संत ग्वाल बाबा की याद में यहां ब्राह्मण समाज द्वारा मेले का अयोजन कराया जाता है, जिसमें सभी वंश, कुल धर्म के लोग श्रद्धा से ग्वाल बाबा के समाधि पर मत्था टेकते है।

 

एतिहासिक किला:-

जगनेर का एतिहासिक किला-राजस्थान सीमा से लगा आगरा जनपद का सीमावर्ती कस्बा आगरा से कागारौल के रास्ते में तांतपुर जाने वाली सड़क पर बना है जो आगरा से लगभग 36 मील दूरी पर स्थित है। ‘आल्ह खंड’ रचयिता राजा जगन सिंह का नाम पर जगनेर बसा है। किले के भग्नावेष की प्रथम दृष्टि डालते ही ऐसा लगता है कि यह किला अपने अन्दर कोई बड़ा इतिहास छुपाये बैठा है। किले की सुनियोजित वास्तु- प्रणाली कर दिग्दर्शन से ऐसा लगता है कि महोबा नरेश आल्हा-ऊदल के मामा राजा राव जयपाल ने 12वीं शताब्दी में इसे बहुत ही सुरुचि पूर्ण ढंग से इसे बनवाया था। यहां लाल पत्थर की शिला पर उत्कीर्ण है कि इसे जगन पंवार ने बनवाया था। इसकी पुष्टि कर्निघंम की पुस्तक पूर्वी राजस्थान के यात्रा वृत्त से भी होती है।

इस दुर्ग की निर्माणशैली कुछ कुछ राजस्थान के सिरमौर गढ़ चित्तौड़ से मिलती जुलती है। पश्चिम छोर से पहाड़ी पर चढ़ा जा सकता है जहाँ एक बावड़ी भी है। अन्य दिशाओं से दुरगम्य प्रतीत होता है। जगनेर बस्ती की ओर से लम्बी घुमावदार पत्थर की अनगढ़ सीढि़यों की श्रृंखला प्रतीत होती है। हिन्दू भवननिर्माण शैली की विशेषताओं से युक्त इस किले में मन्दिर के अतिरिक्त शासकीय आवास, सैन्य गृह एवं सैन्य सामग्री प्रकोष्ठ के भग्नावेष भी देखे जा सकते हैं ।

 

एतिहासिकता

इस दुर्ग का की नींव 12वीं शताब्दी में चंद्रवंशी क्षत्रिय अहीर राजा जयपाल सिंह ने रखी थी। अहीर संस्कृत शब्द आभीर का प्राकृत रूप है जिसका अर्थ निडर होता है। जो हर तरफ से डर को दूर कर सकता है। आभीर ( निडर ) व्यापारी होते है। अहीर महाराज यदु के वंशज हैं जो एक ऐतिहासिक चंद्रवंशी क्षत्रिय राजा थे।

यह आल्हा और ऊदल के सगे मामा श्री भी थे। आल्हा और ऊदल का समय 12वीं शताब्दी का माना जाता है, जो राजा परमाल के शासनकाल में चंदेल राजाओं के सेनापति थे। आल्हा चन्देल राजा परमर्दिदेव (परमल ) के एक महान सेनापति थे, जिन्होंने 1182 ई० में पृथ्वीराज चौहान से लड़ाई लड़ी थी, जो “आल्हा-खण्ड” ग्रन्थ में अमर हो गए। आल्हा ऊदल का, असली मामा श्री उनके राजा जयपाल सिंह थे जो बहुत उदार थे।

 

विभिन्न जातियों का वर्चस्व

जब देश में राजपूत शासकों के छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों का अभ्युदय हुआ था इससे पूर्व यदु जन-जाति के वंशजों के अधीन था। यदु राज्य कभी स्वतंत्र और कभी केन्द्रीय सत्ता के अधीन रहे। राजपूत शासकों के समय जगनेर परमारों और चंदेलों के अधिकार में था। किन्तु जगनेर के स्वतंत्र शासक बैनीसिंह ने पृथ्वीनाथ चैहान निरन्तर युद्ध किया । गुर्जर प्रतिहारों के पतन के पश्चात् परमारों और चन्देलों का अभ्युदय हुआ। उनकी शक्ति प्रतिदिन बढ़ती गयी। निरन्तर युद्ध और प्रतिस्पर्धा का शिकार जगनेर का किला भी बना रहा। मेवाड़ के शासकों ने परमार को पराजित कर बिजौली की ओर खदेड़ कर उनके द्वारा पुनः अधिकार करने का प्रयास किया।

कुतुबद्दिन ऐबक और इल्तुमिश ने राजस्थान पर विजय कर जगनेर के शासक को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। किन्तु यहाँ के वीर राजपूत अपनी अस्मिता के लिए निरन्तर युद्धरत् रहे। 1510 ई0 में इसे मुगलों ने जीत कर अकबर ने जगनेर के दुर्ग पर मुस्लिम सूबेदार नियुक्त किया। जिसके द्वारा इस किले में ‘लाल पत्थर का मेहराबदार द्वार’ बनवाया। किले में उत्कीर्ण एक लेख से ज्ञात होता है कि अकबर ने राजस्थान विजय के लिए केन्द्र जगनेर को ही बनाया। यहाँ पर्याप्त मात्रा में अस्त्र-शस्त्र सैनिक एवं खाद्य सामग्री रखी जाती थी। यह किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में है।जगनेर किला को राजा जगन सिंह ने बनाया था। उसने वर्ष 1550 में राज्य स्थापित किया और किला वर्ष 1573 में बनकर तैयार हुआ। मुगलों ने 1603 में राजा जगन सिंह को मरवा दिया। उसके बाद से यह किला मुगलों के कब्जे में ही रहा।

अरावली पर्वतमाला

यह क्षेत्र की अरावली पर्वतमाला शाखा से घिरा है। आज भी यहां के तांतपुर गांव में पत्थर मंडी मशहूर है। मुगल साम्राज्य के पश्चात जगनेर के दुर्ग ने जाट, मराठे और अग्रेजों का सत्ता-सघर्ष देखा। आल्हा ऊदल की माताश्री रानी देवल के ही सगे ज्येष्ठ भ्राता श्री थे जयपाल सिंह रहे। कहा जाता है कि शिकार खेलने ग्वालियर से आगरा आए जयपाल सिंह ने आगरा के वातावरण से प्रभावित हो यहीं पर अपने निवास हेतु एक किले के निर्माण कराया और किले के परकोटे के बीच में ही अपने छोटे से राज्य की नगरी बसाई।इस किले को पहले जयगढ़ के नाम से भी जाना जाता था।

बाद में जब राजाजयपाल सिंह की पीढ़ी में प्रतापी राजा जगन सिंह ने जन्म लिया तब उनके शासन में यह किला जगनेर कहलाया। जगनेर नाम राजा “जगन सिंह” के नाम पर पड़ा है, जो 13वीं शताब्दी के शासक थे। उनकी पत्नी का नाम रानी जमुना कंवर था। वह आगरा के आसपास है कि समय की बहुत सुंदर रानी थी।‘आगरा गजेटियर’ के अनुसार जगनेर को पहले इस क्षेत्र को ऊँचाखेड़ा कहते थें।कर्नल टाड के अनुसार ‘नेर’ का अर्थ है चारों ओर से प्राचीरबद्ध नगर जैसे बीकानेर, सांगानेर, चंपानेर, अजमेर, बाड़मेर अत्यंत संरक्षित नगर थे और जिन्हें बाद में किले का स्वरुप प्रदान किया।

यादव राजवंश के पश्चात इस दुर्ग पर चंदेल, परमार, मुग़ल आदि कई राजवंशों की सत्ता रही।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

वॉट्सप नं.+919412300183

संस्कृति के सँवरते रंग काव्य संग्रह का विमोचन

कोटा  / कवियित्री साधना शर्मा के प्रथम काव्य संग्रह ” संस्कृति के सँवरते रंग” का विमोचन शनिवार 25 अक्टूबर को एक होटल में समारोहपूर्वक हुआ। मुख्य वक्ता विख्यात कथाकार और समीक्षक  विजय जोशी ने कहा कि संस्कृति के सँवरते रंग” काव्य- संग्रह के रूप में देख कर सुखद अनुभूति करती हुई कि कवयित्री साधना शर्मा अपनी रचनाओं में गीतों की सरगम एवं कविता के मर्म को सरल और सहज भाषा में उजागर कर सृजनशील परिवेश को समृद्ध कर रही हैं । इस दिशाबोधक अभिव्यक्ति के साथ कि – तीज त्योहर सभी देखें हम/ और देखें आध्यामिक रंग/ देश भक्ति का भाव जगाएँ/ आओ देखें संस्कृति के रंग।
   श्री  जोशी ने कहा वे पाठक और लेखक के मध्य सेतु अख़बार पर भी अपनी अनुभूति को प्रकट करती है –  दुनिया की खोज खबर रखूँ, मैं आसमान छू जाऊँ/ मैं सुबह-सुबह हर आँगन में, अपनी दस्तक दे जाऊँ/ मैं प्रभात की ज्ञान किरण हूँ, जीवन का आनंदित क्षण हूँ/ मेरे बिन जीवन है अधूरा, समाज का सच्चा दर्पण हूँ/लोकतंत्र का प्रहरी बन, सबकी राह आसान बनाऊँ। यही नहीं मानव बेचारा में उन्होंने मनुष्य के तीन पक्ष रखे हैं एक सामान्य वर्ग जिसे स्टेटस ने मारा, एक भिखारी का जो रुखा – सूखा खाना चाहते हुए भी उसे गरीबी ने मारा तो खाने से हारे को डायबिटीज जैसी बीमारी ने मारा। कवयित्री ने सामाजिक सन्दर्भों की वास्तविकताओं, सामाजिक संस्कारों,  संस्कृति के विविध आयामों के साथ सामाजिक जीवन को अपनी रचनाओं के माध्यम से उजागर किया है।
उन्होंने कहा कि जीवन का प्रकृति के साथ समन्वय और प्रकृति की जीवन को संवारने की प्रकृति दोनों के समन्वित भाव और संवेदनाओं का पुँज इन रचनाओं का प्रतिपाद्य है जिसमें रचनाकार ने अपने संस्कार और संस्कृति को अनुभवों के साथ उकेरा है। इस संग्रह में संस्कृति के रंग महकते नजर आते हैं, कहीं आध्यात्मिक रंग है, तो कहीं देशभक्ति का रंग, कहीं त्योहारों की छटा है, तो कहीं नदियों का संगम, कहीं नारी की महिमा, कहीं मन भावन सावन, कहीं लीलाधर की लीला, तो कहीं साँझ की बेला, कहीं बसंत ऋतु, तो कहीं पावस ऋतु का नजारा, कहीं राजस्थान के दुर्ग, तो कहीं राजस्थान की हस्तशिल्प कला, कहीं रिश्ते महकते हैं, तो कहीं शगुन की बातें होती हैं, कहीं बुजुर्गों की दुआएँ हैं, तो कहीं माटी के अनेक रूप देखने को मिलते हैं।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही ने कहा कि बिना स्त्री शक्ति के कहां संवरती है संस्कृति।  हाड़ौती अंचल की गीत परंपरा में सबसे बड़ी कवयित्री के रूप में शकुंतला रेणु हमारे सामने आती है। उसके बाद डॉ वीणा अग्रवाल अग्रवाल एक बड़ी कवयित्री के रूप में सामने आती हैं। छंद विधान की कवयित्रियों में सावित्री व्यास, प्रमीला आर्य, निर्मला आर्य आती हैं। लेकिन देशभक्ति और आध्यात्मिक स्वर को लेकर शकुंतला रेणु के बाद वैसे ही तेवर लेकर साधना शर्मा उपस्थित होती है यह प्रशंसनीय है।
समारोह अध्यक्ष स्नेहलता शर्मा, विशिष्ठ अतिथि डॉ. प्रभात कुमार सिंघल, रेखा पंचोली और रीता गुप्ता ने अपने विचार रखते हुए कृति को साहित्य में महिला चेतना की उड़ान बताया। लेखिका साधना शर्मा ने सभी का स्वागत कर विचार रखे। नमो नारायण शर्मा  ने भी विचार रखे। अतिथियों ने सरस्वती की तस्वीर के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। वंदना शर्मा ने सरस्वती वंदना के साथ गीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन विदुषी साहित्यकार डॉ. वैदेही गौतम ने करते हुए अतिथियों का परिचय करवाया। डाॅ. प्रियदर्शी शर्मा ने आभार व्यक्त किया।
लेखिका के परिवारजन गिरिराज गौतम,  ब्रज भूषण गौतम, निशांत गौतम, नेहा शर्मा, डाॅ. निधि शर्मा सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित रहें। कार्यक्रम की विशेषता रही कि पर कार्यक्रम कृति पर ही केंद्रित रहा और वक्ताओं ने इसी के संदर्भों को उजागर करते हुए लेखिका की भूरी-भूरी प्रशंसा की।
अनुनाद का विमोचन :
साधना शर्मा ने उन पर केंद्रित अक्टूबर माह के अनुनाद ई बुलेटिन का ई डिजिटल फॉर्म में मोबाइल पर बटन दबा कर विमोचन किया। संस्कृति,साहित्य,मीडिया फोरम द्वारा साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर इस ई बुलेटिन का प्रकाशन डॉ. प्रभात सिंघल और विजय जोशी द्वारा किया जाता है।
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प्रेषक : डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

राजस्थान कांग्रेसः जिलाध्यक्षों की जंग में एक अनार सौ बीमार!

राजस्थान कांग्रेस के बीते कई सालों के ज्ञात इतिहास में, पहली बार ऐसा हुआ है कि जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के लिए सीधे नाम तय करने के बजाय जिलों से समर्थन आधारित आवेदन मांगे गए हैं। परंपरागत रूप से अब तक कांग्रेस आलाकमान ही जिलाध्यक्षों की सीधी नियुक्ति करता रहा है, परंतु इस बार संगठन में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आभास देने की कोशिश की गई है। प्रदेश के लगभग 50 जिलों से करीब 3,000 कांग्रेसजनों ने जिलाध्यक्ष बनने के लिए आवेदन जमा किए हैं। हालात, एक अनार सौ बीमार वाले हैं। इतनी बड़ी यह संख्या भले ही पार्टी की आंतरिक सक्रियता दिखाती है, लेकिन साथ ही यह भी सवाल खड़ा करती है कि इतने इच्छुक उम्मीदवारों में से किसे चुना जाए। और सवाल यह भी है कि जिसे चुना जाएगा, क्या बाकी सारे उसके साथ रहेंगे?

संगठन में खींचतान ज्यादा

 अखिल भारतीय कांग्रेस के महासचिव सचिन पायलट और राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रहे दिग्गज नेता अशोक गहलोत के समर्थक अपने-अपने नेता के आशीर्वाद से जिलाध्यक्ष पद पाने की उम्मीद में जुटे हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा भी निश्चित रूप से इसी तरह से अपने लोगों को पद पर लाना चाहते ही होंगे। हर गुट चाहता है कि उसके नजदीकी चेहरे को संगठन में स्थान मिले। इसी कारण यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक कम और गुटीय शक्ति प्रदर्शन अधिक लगने है, जिससे संगठन में समरसता व आंतरिक लोकतंत्र की बजाय खींचतान की संभावना ज्यादा बढ़ती दिख रही है।

जिलों में प्रक्रिया पूर्ण, दिल्ली में अंतिम चरण की बैठकों का दौर

राजस्थान कांग्रेस में जिलाध्यक्ष चयन की प्रक्रिया अब दिल्ली पहुंच गई है। राज्य स्तर पर सभी जिलों में कार्यकर्ताओं से आवेदन और समर्थन जुटाने का दौर समाप्त हो चुका है। अब यह पूरा प्रस्ताव अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के पास है। वे 25 अक्टूबर को नई दिल्ली में प्रदेश नेतृत्व व प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा के साथ बैठक कर चुके हैं, जिनमें संभावित नामों पर गहन मंथन होना बताया गया है। पार्टी नेतृत्व इस बार ऐसा संतुलन साधने की कोशिश में है, जिससे संगठन में सभी खेमों का प्रतिनिधित्व हो सके। हालांकि प्रदेश के बड़े नेता, विशेषकर गहलोत, डोटासरा और पायलट के बीच की आंतरिक प्रतिस्पर्धा चयन प्रक्रिया पर स्पष्ट रूप से प्रभाव डाल रही है, ऐसा माना जा रहा है। दिल्ली में बैठकों का दौर यह संकेत देता है कि कांग्रेस संगठन अपनी जमीनी और शीर्ष दोनों परतों के बीच संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अंतिम सूची जारी होते ही असंतोष के स्वर उठने तय माने जा रहे हैं।

 

गहलोत के बयान का मतलब

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जिलाध्यक्षों के चयन को लेकर ‘नेताओं को पंचायती न करने’ की सलाह दी है। गहलोत का यह बयान साधारण नहीं माना जा रहा। राजस्थान कांग्रेस में गहलोत का कद सबसे ऊंचा है और उनका हर वक्तव्य संगठन में संदेश की तरह लिया जाता है। दरअसल, गहलोत यह संकेत दे चुके हैं कि जिलाध्यक्षों की नियुक्ति पूरी तरह संगठन की सामूहिक सोच पर आधारित होनी चाहिए। लेकिन यह बात भी उतनी ही स्पष्ट है कि गहलोत खेमे के कई नेता जिलाध्यक्ष पद के लिए जोरशोर से सक्रिय हैं। उनके इस बयान का सीधा अर्थ यह हैं कि यह पार्टी में एकता का संदेश है, तथा संगठन जो करेगा वही सही होगा। माना जाता है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डोटासरा मूल रूप से गहलोत के समर्थक हैं। अतः गहलोत विरोधी खेमे में यह भी कहा जा रहा है कि गहलोत अपने प्रतिद्वंद्वी गुटों, विशेषकर पायलट खेमे को अप्रत्यक्ष रूप से चेतावनी दे रहे हैं कि संगठन के फैसले में ज्यादा दखल न दें। उनके शब्दों का असर संगठन के अंदर गहराई तक है और यही कारण है कि जिलाध्यक्षों की नियुक्ति अब शक्ति-संतुलन की बड़ी परीक्षा बन गई है।

एक पद 50 उम्मीदवार

 कांग्रेस में हर जिले से औसतन 50 से अधिक नेताओं ने जिलाध्यक्ष बनने के लिए आवेदन दिए हैं। यह आंकड़ा बताता है कि पार्टी में स्थानीय स्तर पर महत्वाकांक्षा बहुत ज्यादा बढ़ी हुई है, लेकिन उत्साह भी बहुत है। हालांकि, हर जिले में कम से कम 10 से 15 ऐसे कांग्रेसजनों ने भी आवेदन किए हैं, जिनके साथ जिले भर में 10 कार्यकर्ता भी नहीं है। फिर भी बहुत बड़ी संख्या में लोगों के जिलाध्यक्ष बनने की मंशा पालने की यह स्थिति संगठनात्मक चुनौती भी बन रही है। एक जिले में जब इतने दावेदार होंगे, तो अंतिम चयन के बाद बाकी दावेदारों का समर्थन मिलना बेहद मुश्किल होगा। राजनीति विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि जिस नेता को पद नहीं मिलता, वह अक्सर मौन असंतोष का हिस्सा बन जाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या चुना गया जिलाध्यक्ष अपने ही जिले के कार्यकर्ताओं का विश्वास जीत पाएगा? हालांकि, कांग्रेस में यह पहली बार नहीं हो रहा, लेकिन इस बार विरोध की संभावनाएं कहीं ज्यादा हैं, क्योंकि सबको खुलकर अध्यक्ष पद के लिए आवेदन का मौका दिया गया है। परिहार कहते हैं कि बहुत संभव है कि जब किसी एक का नाम सामने आएगा, तो असंतोष के स्वर हर जिले से सुनाई देंगे। यह स्थिति संगठन की एकजुटता के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकती है।

संगठनात्मक चुनौती

 राजस्थान कांग्रेस पहले से ही गुटबाजी की मार झेल रही है। अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहते हुए सचिन पायलट ने जिस तरह से 5 साल तक लगातार विरोध किया और खेमेबाजी को हवा दी, उसके बाद से खींचतान जगजाहिर है। पायलट की इसी गुटबाजी को हवा देने तथा खींचतान की वजह से कम से कम 15 सीटों पर हार जाने से कांग्रेस को सरकार से बाहर होना पड़ा।

वरिष्ठ पत्रकार हरि सिंह राजपुरोहित कहते हैं कि ऐसे हालात में, जिलाध्यक्षों की नियुक्ति की इस नई लोकतांत्रिक पद्धति के जरिए, कांग्रेस ने, इस अंतर्विरोध को और गहरा करने का जोखिम उठा लिया है। कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति के जानकार वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर मानते हैं कि परंपरा से हटकर आवेदन-आधारित प्रक्रिया को अपनाना कांग्रेस में लोकतांत्रिक कदम कहा जा सकता है, लेकिन इससे संगठनात्मक अनुशासन पर सवाल उठे हैं। सोनवलकर कहते हैं कि इस प्रक्रिया से हर जिले में अनेक धड़े सक्रिय हो सकते हैं, जो कि पहले से ही हैं, और जिलाध्यक्ष पद पर आने वाले व्यक्ति के निर्णयों से असंतुष्ट होकर जिलाध्यक्ष के विरोध की अलग राह भी पकड़ सकते हैं। वरिष्ठ पत्रकार हरि सिंह राजपुरोहित का मानना है कि यदि असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया, तो यह आने वाले चुनावों में कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। संगठन के मजबूत करने की ईमानदार भावना की जगह यदि आंतरिक प्रतिस्पर्धा हावी रही, तो यह पूरी प्रक्रिया पार्टी के लिए लाभ की बजाय हानि का सौदा साबित हो सकती। यही वजह है कि राहुल गांधी के निर्देशों के कारण नई प्रक्रिया तो अपना ली गई है, लेकिन कांग्रेस आलाकमान इस बार संतुलित और रणनीतिक फैसले लेने के दबाव में है,  क्योंकि, युवक कांग्रेस के संगठन का हाल – बदहाल वह भुगत ही रही है।

  (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

राजस्थानी भाषा की पहली महिला उपन्यासकार, पहली लोरी लेखिका एवं दूसरी व्यंग्यकार हैं बसंती पंवार

राजस्थानी और हिन्दी दोनों भाषाओं में समान रूप से सकारात्मक चिंतन प्रस्तुत कर विपुल साहित्य रचने वाली सशक्त हस्ताक्षर का नाम है बसन्ती पंवार। साहित्य की ऐसी कोई विधा नहीं जिस पर इन्होंने कलम न चलाई हो। आपको राजस्थानी भाषा की पहली महिला उपन्यासकार, पहली लोरीकार और सशक्त व्यंग्यकार का गौरव मिला। पहली बार मिलने पर कोई कह नहीं सकता कि यही बहुचर्चित लेखिका और स्वयंसिद्धा बसन्ती पंवार हैं।
बड़ी-सी लाल बिन्दी और भावपूर्ण चेहरा बोलती आँखें और मृदुभाषी बसन्ती जी को नजरअंदाज करना कतई आसान नहीं है। सहज सरल स्वभाव वाली बसन्ती जी का बात करने का सलीका, इनकी तहजीब और तरीका अनायास ही मन मोह लेता है। अब तक करीब पच्चीस पुस्तकें लिख चुकी बसन्ती जी की रचनाएँ, पुस्तकें बोधगम्य हैं। अनुभवों की आँच में तपी इनकी कविताएँ, कहानियाँ, लघुकथाएँ, आलेख सब कुछ सारगर्भित, सार्थक तो हैं ही, साथ ही सकारात्मक चिंतन को दिशा देने वाले हैं। बसन्त पंचमी के शुभदिन जन्मी बसन्ती जी पर माँ सरस्वती की असीम कृपा है।
जयपुर से प्रकाशित अनुकृति जुलाई  सितंबर 2025 में इनके बारे में लिखा कि स्कूली वार्षिक पत्रिका में लिखी इनकी रचनाएँ लेखिका के रूप में इनकी शुरुआत थी। पहला उपन्यास ‘सौगन’ 1997 में राजस्थानी भाषा में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास पर इन्हें “सांवर दैया पेली पोथी पुरस्कार” 1998 में मिला। उसके बाद सम्मान और पुरस्कारों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो अब तक 60 की संख्या पार हो गई है। अभी सिलसिला जारी है।
साहित्यकार अपने युग का प्रतिनिधि होता है। युग की प्रवृत्तियों, भावनाओं और आशा-आकांक्षाओं को ही वह अपनी रचनाओं से मूर्त रूप प्रदान करता है। साहित्यकार वही बात कहता है जो सब लोगों के अनुभव में दिन-रात आती है।” उपरोक्त पंक्तियों की लेखिका ने अक्षर-अक्षर इन्हीं भावों को साहित्य रचते समय आत्मसात किया है। इनकी साहित्यिक यात्रा वाकई अद्भुत है, अनुपम है।
इनके संघर्ष, नौकरी और घर-परिवार में संतुलन बनाते हुए शिक्षा और सपनों की, मौन से मुखर होने तक की तमाम जद्दोजेहद को समझने और जानने का मौका मिला। साधारण से असाधारण प्रतिभा की धनी बसन्ती जी के जीवन के विविध पहलुओं से साक्षात्कार करने के बाद मैं दावे से कह सकती हूँ कि इनके पूरे जीवन में हार, थकान, निराशा जैसे शब्दों की गुंजाइश नहीं है।
स्त्री जीवन की त्रासदी, विडम्बनाएँ और स्वयं सिद्धा बनने तक की चुनौतियों को बड़ी शिद्दत से इन्होंने रचनाओं में कलमबद्ध किया है। वे कहती हैं, “किसी को सातों सुख नहीं मिलते लेकिन फिर भी जीवन में मुझे जो भी मिला, प्रभु और बड़ों के आशीर्वाद स्वरूप खूब मिला। संतुष्ट हूँ मैं अपने जीवन से। अब तो कुछ भी आकांक्षा या इच्छा नहीं है हाँ हर माँ की इच्छा होती है कि उसका परिवार, उसके बच्चे फले-फूलें…. बड़े प्रेम से मिल-जुलकर रहें यही मैं भी चाहती हूँ।”
साहित्य संबंधित कुछ अधूरे काम हैं जैसे ‘हिन्दी से राजस्थानी भाषा में शब्दकोश का निर्माण’ एवं ‘उपनषिद का राजस्थानी भाषा में अनुवाद’ ये दोनों कार्य पूरे हो जाएँ। ईश्वर उनकी दोनों अभिलाषा पूर्ण करें, यही दुआ है। बहुत खूबसूरत संदेश उनका यहाँ दे रही हूँ- ‘मैं चाहती हूँ कि घर-परिवार, समाज, देश-दुनिया में निस्वार्थ प्रेम का साम्राज्य हो, सभी दूध और पानी की तरह मिलकर रहें। जानती हूँ मेरी यह इच्छाएँ असम्भव हैं लेकिन चाहत का कोई क्या करे….” नवोदित लेखिकाओं के लिए बसन्ती जी का संपूर्ण जीवन और उनका सार्थक लेखन प्रेरक बनेगी।
 बसन्ती जी कागज और कलम को अपने अभिन्न मित्र मानती हैं। जिन्होंने उन्हें साहित्य जगत में पहचान दिलाई और उनके भावों को आत्मसात किया। उम्मीद है हमेशा की तरह अनुकृति का यह अंक आप लोगों को पसंद आएगा।
“मुझे मिटानी हैं
नफरत, ईर्ष्या… द्वेष की भावनाएँ
लड़ाई…. झगड़े….खून-खराबा…. दरिंदगी
फिर खो जाना है
मिल जाना है पंचतत्वों में….
ऐसे ही मेरा खो जाना
हो जाएगा सार्थक
इसलिए, मुझे खो जाना है एक दिन
प्रकृति की गोद में….।”
परिचय :
विदुषी साहित्यकार बसन्ती पंवार का जन्म  5 फरवरी 1953 को बीकानेर में पिता स्व.   राणालाल पंवार एवं माता  रूकमा देवी  के परिवार में हुआ। आपने एम. ए. (राजस्थानी भाषा),  बी. एड. की शिक्षा प्राप्त की। आप राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर की पूर्व सदस्य हैं ।महिलाओं की साहित्यिक संस्था सम्भावना की अध्यक्ष, खुशदिलान-ए-जोधपुर एवं अन्य संस्थाओं की सक्रिय सदस्य हैं।  राजस्थानी भाषा में आपकी  सौगन का दूसरा संस्करण,  अैड़ौ क्यूॅं ? दो उपन्यास, जोऊं एक विस्वास कविता संग्रह, नुवौ सूरज कहानी संग्रह, खुशपरी बाल कहानी संग्रह,  धरणी माथै लुगायां’हिन्दी से राजस्थानी में अनूदित काव्य संग्रह, इंदरधनख’’ (संपादित गद्य संग्रह,  हूंस सूं आभै तांई (अनुवाद हिन्दी से राजस्थानी में-संस्मरणात्मक निंबध,राधा रौ सुपनौ कहानी संग्रह, चूंटिया भरुं ?’ व्यंग्य संग्रह,कमाल रौनक रौ बाल कहानी संग्रह,  हालरियौ हुलरियौ बाल लोरी संग्रह,म्हैं बावळी काव्य संग्रह कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं।
राजस्थानी भाषा में आपकी  कृतियां हारूंली तो नीं डॉ. पद्मजा शर्मा के हिन्दी काव्य संग्रह का राजस्थानी भाषा में अनुवाद , उपनिषद का राजस्थानी भाषा में अनुवाद ,हिन्दी से राजस्थानी शब्दकोष और मोनोग्राफ प्रकाशनाधीन हैं।
हिन्दी भाषा में आपकी कब आया बसंत कविता संग्रह,  नाक का सवाल व्यंग्य संग्रह,
नन्हे अहसास काव्य संग्रह, तलाश ढाई आखर की’कहानी संग्रह, फाॅर द सेक ऑफ नोज  अंग्रेजी में अनुवाद,  अपना अपना भाग्य राजस्थानी आत्मकथा का हिन्दी में अनुवाद,
संस्कारों की सौरभ पत्र शैली में बाल निबंध,  बचा रहे धरती का ऑंचल  प्रकृति काव्य और अहसासों की दुनिया काव्य संग्रह कृतियां का प्रकाशन हुआ है। प्यार की तलाश में प्यार उपन्यास, एक व्यंग्य संग्रह और एक काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन कृतियाँ हैं।
राजस्थानी और हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं साझा संकलनों में कहानियाँ, कविताएँ, लेख, व्यंग्य, लघुकथाएँ, संस्मरण, पुस्तक समीक्षा आदि का लगातार प्रकाशन । आकाशवाणी जोधपुर, जयपुर दूरदर्शन से वार्ता, कहानी, कविता, व्यंग्य आदि का प्रसारण । राजस्थानी भाषा के ’’आखर’’ कार्यक्रम (जयपुर) में और जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर, राजस्थानी विभाग के ’गुमेज’ कार्यक्रम में भागीदारी  ।
आप राजस्थानी भाषा की पहली महिला उपन्यासकार, पहली लोरी लेखिका एवं दूसरी व्यंग्यकार । राजस्थान विश्व विद्यालय, जयपुर से शोधार्थी सुमन वर्मा द्वारा बसन्ती पंवार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर पीएचडी हो रही है  ।  केन्द्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से पुरस्कृत उपन्यास के राजस्थानी भाषा में अनुवाद का कार्य, केन्द्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा सौंपा गया है  । यूट्यूब पर मैं बसंत  नाम से चेनल है। आपके पुरस्कारों और सम्मान की लंबी सूची हैं आपको देश भर की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं द्वारा 5 दर्जन से अधिक अलंकरण और सम्मान प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है।
संपर्क : बसंती पंवार, मो,
 मो. 9950538579

बिस्वास, भुवनेश्वर द्वारा आयोजित छठ महापर्व मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण मांझी के संबोधन के साथ संपन्न

भुवनेश्वर। स्थानीय मंचेश्वर न्यू बाली यात्रा प्रदर्शनी मैदान के समीप से बहुत हुई पवित्र नदी कुआखाई छठघाट पर समारोह के मुख्य अतिथि ओडिशा के मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण मांझी के सपत्नीक भोर के अर्घ्य दान के साथ संपन्न हो गया। अर्घ्य उनकी पत्नी श्रीमती प्रियंका मरांडी ने भी दिया।अपने संबोधन में मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी ने बताया कि उनका पैतृक गांव केन्दुझर जिले में पड़ता है जो बिहार से सटा हुआ है।वे अपने बाल्यकाल से ही बिहार की लोक संस्कृति से जुड़े हुए हैं और आज बिस्वास भुवनेश्वर के निमंत्रण पर यहां सपत्नीक पधारकर तथा छठव्रतियों से मिलकर बहुत खुश हैं। उन्होंने यह भी बताया कि भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने उनको ओडिशा के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी है जिसे वे पूरी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के साथ निभा रहे हैं। उनके कार्यकाल के विगत 500दिन प्रदेश के उत्तरोत्तर और सतत विकास के लिए उल्लेखनीय, प्रशंसनीय और लोक हितकारी रहे हैं।उनको ओडिशा की साढ़े चार करोड़ लोगों का जनसमर्थन प्राप्त है जिसके बदौलत वे ओडिशा को एक विकसित राज्य बनाने हेतु संकल्पित भाव से दिन-रात कार्य कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री का स्वागत बिस्वास भुवनेश्वर के अध्यक्ष राजकुमार ने किया जबकि आभार व्यक्त किया सचिव अशोक कुमार भगत।पूरे कार्यक्रम का सफल संचालन किया अशोक पाण्डेय ने। आयोजन को सफल बनाने में अजय बहादुर सिंह,संजय झा, चन्द्रशेखर सिंह, विद्या मिश्रा, मणिशंकर ठाकुर, बिस्वास भुवनेश्वर की महिला समिति  , बिस्वास भुवनेश्वर युवा शाखा समेत बिस्वास भुवनेश्वर के सभी सहयोगी, बड़े बुजुर्ग और सभी हितैषी। राजकुमार ने अपने आभार में ओडिशा के मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण मांझी जी,उनकी पत्नी श्रीमती प्रियंका मरांडी जी, स्थानीय शीर्ष पुलिस पदाधिकारियों,उनके सहयोगियों, स्थानीय प्रशासन एवं स्थानीय एलोक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया के आगत सहयोगियों को दिया। छठघाट से वापस लौट थे समय सभी ने छठ का ठेकुआ प्रसाद ग्रहण किया। गौरतलब है पिछले 25 वर्षों के बिस्वास भुवनेश्वर के सामूहिक छठ पूजा के आयोजन में ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी जी पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने छठघाट पर आकर संस्कृति, प्रकृति और संस्कार के चार दिवसीय महापर्व के आयोजन को अपने अभिभाषण और सूर्यदेव को अर्घ्य देकर सभी आयोजकों को नई ऊर्जा प्रदान किए।

एसआईआर की सार्थक पहल का विरोध नहीं, स्वागत हो

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बिहार के बाद अब देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष ग्रहण पुनरीक्षण (एसआईआर) की शुरुआत करने की घोषणा करके चुनाव विसंगतियों एवं कमियों को दूर करने का सराहनीय एवं साहसिक कार्य किया है। यह पहल न केवल तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रिया भर है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत करने की एक निर्णायक कोशिश है। लोकतंत्र की आत्मा उसके निर्वाचन तंत्र की निष्पक्षता और पारदर्शिता में बसती है और चुनाव आयोग का यह कदम उसी दिशा में एक ठोस, सकारात्मक और आवश्यक प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए। बिहार की एसआईआर प्रक्रिया से सबक लेते हुए इस बार आयोग ने प्रक्रिया के लिए अधिक समय दिया है, ताकि बिहार जैसी जल्दबाजी और अफरातफरी से बचा जा सके। आधार कार्ड को एक सहायक दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाएगा, जिससे प्रक्रिया सरल बनेगी।
निश्चित ही इस बार 12 राज्य संख्या में ज्यादा हैं तो चुनौती भी उसी हिसाब से ज्यादा बड़ी है। उम्मीद कर सकते हैं कि बिहार में पुनरीक्षण प्रक्रिया में आई दिक्कतें अब आयोग के लिए अनुभव का काम करेंगी और वहां जैसी परेशानी बाकी जगहों पर लोगों को नहीं उठानी पड़ेगी। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने एसआईआर के शिड्यूल का ऐलान करते हुए कहा कि प्रक्रिया यह सुनिश्चित करेगी कि कोई भी योग्य मतदाता छूट न जाए और कोई भी अयोग्य मतदाता लिस्ट में शामिल न हो। जिन राज्यों को दूसरे चरण में चुना गया है, उनमें उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, गोवा, केरल, पुडुचेरी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप हैं, इनमें से केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं।
असम में भी अगले ही साल विधानसभा चुनाव है, लेकिन उसे दूसरे चरण से बाहर रखा गया। आयोग ने इस बार आधार कार्ड को लेकर रुख पहले ही साफ कर दिया है कि यह जन्म, नागरिकता या निवास प्रमाण पत्र के रूप में मान्य नहीं होगा, लेकिन एसआईआर में इसे एक डॉक्युमेंट के रूप में पेश किया जा सकेगा। यह स्पष्टता इसलिए जरूरी थी, क्योंकि बिहार में पहले चरण के दौरान आधार कार्ड का मसला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया था। दस्तावेज ऐसे होने चाहिए, जो अधिकतम आबादी की पहुंच में हों और आधार आज पहचान का सबसे सरल जरिया है।
मतदाता सूची की सटीकता, पारदर्शिता एवं निष्पक्षता लोकतंत्र की रीढ़ है। भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में मतदाता सूची की सटीकता सबसे बड़ी चुनौती है। इसलिये एक निश्चित अन्तराल के बाद एसआईआर की प्रक्रिया होते रहना अपेक्षित है। इसके पहले एसआईआर करीब दो दशक पहले किया गया था। कम से कम अब तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि एसआईआर में इतना अंतराल न आने पाए, क्योंकि अब लाखों लोग नौकरी-पेशे के चलते अन्यत्र चले जाते हैं। इनमें से अधिकांश वहीं बस जाते हैं। कई बार देखा गया है कि मृत व्यक्तियों के नाम सूची में बने रहते हैं, वहीं नये पात्र नागरिकों के नाम दर्ज नहीं हो पाते। ग्रामीण इलाकों से लेकर महानगरों तक, इस विसंगति के चलते मतदान प्रतिशत प्रभावित होता है और चुनावी परिणामों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगता है। एसआईआर का मकसद किसी की नागरिकता तय करना या ज्यादा से ज्यादा लोगों को वोटर लिस्ट से बाहर करना नहीं है। इसे इतना सरल होना चाहिए, जिससे लोग वोटर बनने के लिए प्रेरित हों और उनमें लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व के लिए उत्साह जगे। मुख्य चुनाव आयुक्त की यह पहल-इन खामियों को दूर करने की दिशा में एक संगठित और वैज्ञानिक लोकतांत्रिक प्रयास है। यदि यह कार्य धरातल पर ईमानदारी से लागू हुआ, तो यह मतदाता सूची की पवित्रता और लोकतंत्र की गरिमा दोनों को बढ़ाएगा।
भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिये यह बहुत जरूरी है, इसके लिये राजनीतिक दलों की भूमिका एवं सहयोग अपेक्षित है, वे इस प्रक्रिया को सकारात्मक दृष्टि से लें। इस सराहनीय एवं नितांत अपेक्षित उपक्रम के लिये विपक्षी दलों के द्वारा विरोध का वातावरण बनाना एवं आस्तीनें चढ़ाना उनकी विश्वसनीयता एवं जिम्मेदारी पर प्रश्न खड़ा करता है। अक्सर देखा गया है कि जब चुनाव आयोग सुधारात्मक कदम उठाता है, तो विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने हितों के अनुसार प्रतिक्रिया देते हैं। परंतु लोकतंत्र का स्वास्थ्य तब ही सुदृढ़ होगा जब सभी दल ‘पारदर्शिता’ को ‘राजनीतिक लाभ-हानि’ से ऊपर रखेंगे। विपक्ष को चाहिए कि वह इस पहल का विरोध करने की बजाय स्वागत करे और इसे सही दिशा में लागू कराने में सहयोग दे, न कि शंका और अविश्वास के चश्मे से देखे। बहरहाल, राजनीतिक पार्टियों की यह महती जिम्मेदारी है कि वे सिर्फ दोषारोपण करने तक सीमित न रहें, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया में अपनी जिम्मेदारियां निभाएं। इसी तरह, नागरिक संगठनों के लिए भी यह सक्रिय होने का समय है। उनकी निगरानी बीएलए के काम को अधिक सरल व सटीक बना सकती है। कुल मिलाकर पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने का सपना दिखाने वाले चुनाव आयोग के सामने अभी अपनी इस प्राथमिक जिम्मेदारी को ही निर्विवाद रूप से पूरा करने की चुनौती है।
डिजिटल युग में चुनाव सुधार केवल मानव संसाधन या प्रशासनिक इच्छाशक्ति का नहीं, बल्कि तकनीकी पारदर्शिता का भी प्रश्न है। बायोमेट्रिक सत्यापन, ऑनलाइन नामांकन और डेटा क्रॉस-वेरिफिकेशन जैसे उपाय अब आवश्यक हो चुके हैं। विशेष ग्रहण पुनरीक्षण इस दिशा में आधारभूत कार्य करेगा यानी चुनावी डाटा की सफाई और पुनर्गठन। भारत की चुनावी प्रक्रिया विश्व में सबसे बड़े लोकतांत्रिक अभ्यास के रूप में जानी जाती है। लेकिन यह गौरव तभी सार्थक होगा जब मतदाता सूची, मतदान केंद्रों की निष्पक्षता और आचार संहिता के पालन में कोई संदेह न रहे। चुनाव आयोग की यह पहल उसी लक्ष्य की ओर एक ठोस कदम है। लोकतंत्र केवल मतों की गिनती नहीं, बल्कि विश्वास की गिनती है और यह विश्वास चुनाव आयोग की ईमानदारी, पारदर्शिता और सक्रियता पर टिका है। जन-प्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 21 चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयार करने और उनको संशोधित करने का अधिकार देती है। मतदाता सूचियों को दुरुस्त करना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार ही नहीं, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की अनिवार्य आवश्यकता भी है। विडंबना यह है कि कुछ दलों को इस आवश्यकता की पूर्ति किया जाना रास नहीं आ रहा है। उन्होंने बिहार में एसआईआर को लेकर आसमान सिर पर उठाया और वोट चोरी के जुमले के सहारे सड़कों पर उतरने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया। मगर उनकी दाल न सुप्रीम कोर्ट के समक्ष गली और न ही बिहार की जनता के बीच तो इसीलिए कि वे कोरा दुष्प्रचार कर रहे थे।
ज्ञानेश कुमार की यह पहल केवल तकनीकी संशोधन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति में नवीनीकरण का संदेश है। चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि जनविश्वास की परीक्षा भी है। यदि यह अभियान ईमानदारी और जनसहभागिता के साथ पूरा होता है, तो यह भारत के लोकतंत्र को और परिपक्व बनाएगा। अब जिम्मेदारी केवल चुनाव आयोग की नहीं, बल्कि हर नागरिक और राजनीतिक दल की भी है कि वे इस सुधारात्मक पहल का स्वागत करें और लोकतंत्र के इस महापर्व को निष्कलंक बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाएं। क्या यह विचित्र नहीं कि विपक्षी दल मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों की शिकायत भी करते हैं और उनके पुनरीक्षण का विरोध भी? हालांकि उनके दुष्प्रचार की पोल खुल चुकी है, फिर भी चुनाव आयोग को इसके लिए तैयार रहना होगा कि विपक्ष शासित राज्य एसआईआर की प्रक्रिया का विरोध कर सकते हैं। उसे इसके प्रति सतर्क रहना होगा कि मतदाता सूचियों को ठीक करने की प्रक्रिया में किसी तरह की गलती न होने पाए, क्योंकि विपक्षी दल छोटी-छोटी बातों को तूल देकर इस संवैधानिक प्रक्रिया को श्रीहीन करने की चेष्टा कर सकते हैं।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
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