
मैं मध्यप्रदेश हूँ…देश का ह्दयप्रदेश

प्रो.(डॉ.)मनोज कुमार कैन व डॉ . प्रभात सिंघल सम्मानित होंगे
नयी दिल्ली | युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच ने वर्ष 2025 के शिखर सम्मानों को घोषणा कर दी है | कथा, बाल साहित्य,व्यंग्य ,कविता, लघुकथा, आलोचना ,पत्रकारिता, इतिहास, रिपोर्ताज, हास्य -व्यंग्य सहित हिंदी साहित्य में समग्र लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पूरी पारदर्शिता के साथ चयन प्रक्रिया के माध्यम से आठ साहित्यकारों को दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी,दिल्ली में दो नवम्बर 2025 को प्रातः दस बजे से आयोजित 12 वें अखिल भारतीय सहित्योत्सव, पुस्तक लोकार्पण एवं सम्मान समारोह में देश के कोने -कोने से पधारने वाले प्रबुद्ध साहित्यकारों की गरिमामयी उपस्थिति में विशिष्ट अतिथियों के करकमलों द्वारा प्रदान किए जाएंगे |
इस वर्ष का ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र शीर्षस्थ सम्मान 11000/-रुपये की पुरस्कार राशि सहित गत दो दशकों से अधिक समय से सशक्त लेखनी के माध्यम से हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट मौलिक लेखन, शोध, शिक्षण, आलोचना, सामाजिक कार्य एवं शाश्वत मानवीय मूल्यों के सतत संरक्षण में अप्रतिम योगदान हेतु’ प्रो. (डॉ.) मनोज कुमार कैन ,दिल्ली को लघुकथा ,व्यंग्य एवं कहानी के क्षेत्र में उल्लेखनीय मौलिक सृजन के द्वारा हिंदी भाषा के उत्थान और साहित्य में नारी मूल्यों के संरक्षण में सराहनीय योगदान हेतु ‘महादेवी वर्मा शीर्षस्थ महिला लेखन सम्मान’ 7100/-रुपये की पुरस्कार राशि सहित श्रीमती मृदुला श्रीवास्तव, शिमला, हिमाचल प्रदेश को, ‘श्रद्धेय डी पी चतुर्वेदी स्मृति लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान’ 5100/-रुपये की पुरस्कार राशि सहित कोटा राजस्थान के डॉ. प्रभात कुमार सिंघल को विगत चार दशकों से निरंतर अपने उत्कृष्ट मौलिक सृजन के द्वारा हिंदी भाषा,पत्रकारिता,इतिहास और हिंदी साहित्य के उन्नयन हेतु उल्लेखनीय योगदान हेतु प्रदान किया जायेगा |
वि‘स्व.विनोद झा एवं आकाश झा स्मृति साहित्य सम्मान ’ 5100/-रुपये की पुरस्कार राशि सहित इंदौर, मध्य प्रदेश निवासी श्री चरण सिंह अमी को चार दशकों से निरंतर हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं नाटक, रिपोर्ताज, संपादन, कविता, कहानी, आलोचना, पटकथा लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट मौलिक सृजन हेतु, नवरचनाकारों को हिंदी में काव्य सृजन हेतु प्रेरित एवं प्रोत्साहित करने हेतु स्थापित ‘केदार नाथ शर्मा अमीर ख़ुसरो युवा सम्मान’ 5100/-रुपये की पुरस्कार राशि सहित प्रयागराज, उत्तर प्रदेश निवासी डॉ.प्रभांशु कुमार को उनकी काव्य कृति ‘डॉ.प्रभांशु की कलम से’ के लिए, कथा -कहानी के क्षेत्र में सराहनीय सृजनधर्मिता का प्रदर्शन करने हेतु ‘ देवेन्द्र शर्मा स्मृति मुंशी प्रेमचंद कथा सम्मान’ 5100/-रुपये की पुरस्कार राशि सहित,हैदराबाद,तेलंगाना निवासी डॉ. रमा द्विवेदी को उनके कहानी संग्रह ‘ खंडित यक्षिणी’ के लिए, ‘श्रीमती कमलेश प्रशांत स्मृति बाल साहित्य सम्मान’ 5100/-रुपये की पुरस्कार राशि सहित बस्ती ,उत्तर प्रदेश के श्री लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव को एवं गत पांच दशकों से अधिक हिंदी साहित्य की काव्य तथा हास्य-व्यंग्य विधा में उल्लेखनीय मौलिक सृजन के द्वारा सराहनीय साहित्यिक अवदान करने हेतु प्रथम ‘अनूप श्रीवास्तव स्मृति हास्य -व्यंग्य सम्मान’ पुरस्कार राशि – 5100/- रुपये के साथ दिल्ली निवासी डॉ.ब्रजपाल सिंह संत को प्रदान किया जायेगा |
इसके अतिरिक्त युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच की उत्तर प्रदेश इकाई ,लखनऊ को गत तीन वर्षों से युवा वर्ग में हिंदी साहित्य के प्रति अभिरुचि जगाने एवं हिंदी साहित्य के उन्नयन में उल्लेखनीय अवदान हेतु ‘सर्वश्रेष्ठ संस्था -सम्मान ’ प्रदान किया जायेगा, जिसे इसके अध्यक्ष श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ अपनी इकाई के लिए ग्रहण करेंगे | इस अवसर पर विविध साहित्यिक विषयों पर चर्चा के साथ-साथ काव्य -गोष्टी भी होगी जिसमें देश के अनेक कवि /कवयित्री भाग लेंगी |
संपर्क
रामकिशोर उपाध्याय
अध्यक्ष / युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच
Mob. 936514664
पत्रकार अहिंसा के दूत एवं शांति के प्रचारक बने : आचार्य प्रज्ञसागर
पीयूष पांडे: शब्दों को दिलों में पिरोने वाला जादूगर चला गया
पीयूष पांडे संसार से चले गए, लेकिन संसार की सांसों में रहेंगे, आने वाली कई पीढ़ियों तक। क्योंकि जब भी कोई विज्ञापन दिल को छू जाएगा, वहां कहीं न कहीं पीयूष पांडे की आत्मा ज़रूर महसूस होगी। भारतीय विज्ञापन जगत का नाम लेते ही, जो चेहरा सबसे पहले सामने आता है, वह है पीयूष पांडे। वह शख्स जिसने विज्ञापन की दुनिया को महज़ प्रोडक्ट बेचने का ज़रिया नहीं, उसके प्रचार का साधन भी नहीं, बल्कि भावनाओं की भाषा बना दिया। उनके बनाए विज्ञापनों ने न सिर्फ़ ब्रांड्स को ऊंचाई दी, बल्कि लोगों के दिलों में भी सदा के लिए जगह बनाई। पीयूष पांडे की जिंदगी की कहानी सिर्फ़ एक सफल करियर की नहीं, बल्कि शब्दों से भावनाएं गढ़ने वाले कलाकार की है। उनकी बनाई दुनिया में हर विज्ञापन एक ख्वाब रचता रहा — जो मुस्कान देता है, यादें बनाता है और कहीं न कहीं हमें अपने भीतर झांकने पर मजबूर करता है। पंद्रह बरस पहले की बात है, जब उनके ऑफिस में मिलने जाना हुआ, तो वहां कोई कागज नहीं दिख रहा था और न ही पेन थी। पूछा कि लिखते कैसे हैं, तो बोले – शब्द जादू होते हैं, वे दिमाग में उपजते हैं, और दिल पर अंकित हो जाते हैं, बस…। वे ‘वन लाइनर’ के शहंशाह थे।

पीयूष पांडे के कई विज्ञापन यादगार के रूप में हर जुबान पर हैं। लूना मोपेड स्कूटर के ‘चल मेरी लूना’ के विज्ञापन से पीयूष ने पहली बार अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाई, और विडंबना देखिए कि उन्होंने अपना यह पहला विज्ञापन पहली बार देखा भी तो, अपने पड़ोसी के घर में चल रहे ब्लैक एंड वाइट टीवी सेट पर, और वह भी गली में बाहर खड़े होकर खिड़की से। उनके एशियन पेंट्स के ‘हर घर कुछ कहता है’, विज्ञापन ने घर को सिर्फ दीवारों से नहीं, भावनाओं से जोड़ा। ‘फेविकोल का जोड़, ऐसा जो टूटे ना’ ने साधारण एडहेसिव के विज्ञापन को हास्य और संवेदना से उन्होंने इतना ताकतवर बना दिया कि ब्रांड अमर हो गया। केडबरी का ‘कुछ खास है जिंदगी में’, ने भारतीय उपभोक्ता के जीवन में मिठास और भावनाओं को एक नया अर्थ दिया। इसी तरह ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ ने देश की एकता और विविधता को सुरों में पिरोकर सदा के लिए दिलों में बसा दिया। मोबाइल कंपनी ‘हच’ के लिए लिखा – जहां तुम, वहां हम’
फेवीक्वि के ‘तोड़ो नहीं, जोड़ो’ और पॉन्ड्स के लिए ‘गूगली वूगली वूश’ सहित बजाज स्कूटर के लिए ‘हमारा बजाज’ जैसे उनके हर कैंपेन में एक बात समान रही — ‘भारतीयता, सहजता और भावनात्मक जुड़ाव’।
राजस्थान की गुलाबी जयपुर में एक ब्राह्मण साधारण परिवार में 5 सितंबर 1955 को जन्मे पीयूष पांडे की परवरिश ऐसे माहौल में हुई, जहां भाषा, भावना और संवेदना का परस्पर गहरा असर था। ‘ये फेविकोल को जोड़ है, टूटेगा नहीं’, लिखने वाले पीयूष पांडे की सांसें 24 अक्टूबर की सुबह 5.50 बजे टूट गईं। परिवार का माहौल सांस्कृतिक था, सो बचपन से ही शब्दों के साथ उनका रिश्ता बड़ा गहरा था, शायद यही कारण है कि आगे चलकर उन्होंने शब्दों की जादूगरी का रहस्य जान लिया। पीयूष पांडे कहते थे कि उनका जन्म एक क्रिएटिव फैक्ट्री में हुआ था, जो कि सच भी था। जयपुर में पले – बढ़े पीयूष पांडे नौ भाई-बहनों वाले एक बड़े परिवार से थे, जिनमें कुल सात बहनें और दो भाई थे। छोटे भाई प्रसून पांडे फिल्म निर्माता हैं। बहन इला अरुण जानी मानी अभिनेत्री और गायिका, तृप्ति पांडे नामी लेखिका और रमा पांडे बीबीसी की चर्चित अनाउंसर हैं। सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली से उन्होंने पढ़ाई की और क्रिकेटर के रूप में वे राजस्थान रणजी टीम के कप्तान भी रहे।
पीयूष पांडे के शब्द कभी भारी-भरकम नहीं रहे, बल्कि सहज, सरल होने के बावजूद बेहद असरदार रहे। उनकी भाषा बोलचाल की, और शैली जीवंत है। वे जानते थे कि अच्छा विज्ञापन वही है, जो सीधे दिल में उतर जाए। उनका लेखन किसी कवि की तरह भावनात्मक और बाज़ार की तरह शुद्ध व्यावहारिक था, और यही संतुलन उन्हें अद्वितीय बनाती है। उनके शब्दों में ‘विक्रय’ नहीं, ‘संवाद’ था। उनके विज्ञापन इंसान की तरह सोचते थे, मशीन की तरह नहीं। उनकी इसी सोच ने उन्हें बाकी क्रिएटिव लोगों से सदा ऊपर रखा। चाहे ‘हर घर कुछ कहता है’ हो या कुछ खास है और या फिर भले ही हो गीत ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’, पांडे का हर कैंपेन भारतीयता की मिट्टी से सना हुआ लगता है। ‘अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा उन्होंने लिखा तो सारा देश ‘मोदी – मोदी’ कर उठा।
पांडे ने अपने करियर की शुरुआत 1980 के दशक में ‘ओ एंड एम’ के नाम से मशहूर विज्ञापन कंपनी ‘ऑगिल्वी एड मैदर’ से की। उस दौर में भारतीय विज्ञापन उद्योग पश्चिमी प्रभावों से भरा हुआ था, लेकिन पीयूष पांडे ने उसे भारतीय भावनाओं की जमीन पर उतारा। जीवन के शुरुआती वर्षों में उन्होंने अर्थशास्त्र और मानव मन दोनों को गहराई से समझा, जिसने आगे उनके विज्ञापन लेखन को एक विशेष गहराई दी। उनका मानना था कि अगर भारतीयों से जुड़ना है, तो भारत के दिल की भाषा बोलनी होगी। उन्होंने सिखाया कि विज्ञापन सिर्फ़ सामान बिकवाने का नहीं, लोगों को उससे जोड़ने का माध्यम होते है। इसी सोच ने उन्हें विज्ञापन की दुनिया का ‘एड गुरू’ बना दिया। ‘ओगिल्वी’ ने उनके निधन पर श्रद्धांजलि स्वरूप जो विज्ञापन दिया, वह भी कमाल का है।
पीयूष पांडे को न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी सराहा गया। वे ‘ओगिल्वी वर्ल्डवाइड’ के चीफ क्रिएटिव ऑफिसर बने, यह पद पाने वाले वे पहले भारतीय थे। उन्होंने कई बार ‘कांस लॉयंस’ जैसे प्रतिष्ठित विज्ञापन पुरस्कार जीते। उन्हें ‘पद्मश्री’ से भी सम्मानित किया गया, जो इस क्षेत्र में उनके योगदान की आधिकारिक मान्यता रही। दुनिया पीयूष पांडे को केवल एक विज्ञापन विशेषज्ञ के रूप में नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के रूप में याद रखेगी जिसने भारत की आत्मा को ब्रांड्स के ज़रिए दुनिया तक पहुंचाया। वे कहते थे कि ‘ब्रांड्स को इंसान की तरह पेश करो, तभी लोग उनसे जुड़ेंगे’। आज जब वे इस दुनिया में नहीं है, तो कह सकते हैं कि वे प्रेरणा बनकर उन तमाम युवाओं के दिलों में रहेंगे जो रचनात्मक सोच से समाज में बदलाव लाना चाहते हैं। आज और आने वाले कल में, जब भी कोई विज्ञापन दिल को छू जाएगा, वहां कहीं न कहीं पीयूष पांडे की आत्मा ज़रूर महसूस होगी।

ओडिशा के अनुवादक और आलोचक दिनेश कुमार माली “साहित्य रत्न” की मानद उपाधि से सम्मानित
नैनी / विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान द्वारा आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय साहित्य अधिवेशन के दूसरे दिन सोमवार को संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।
यह कार्यक्रम नैनी स्थित जगतपिता ब्रह्मदेव धर्मशाला देवरख में संपन्न हुआ, जिसमें देशभर के साहित्यकारों को शॉल और सम्मान पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। मुख्य अतिथि मंडलायुक्त डॉ. सुरेन्द्र कुमार पांडेय ने कहा संस्कृत और हिंदी दो अलग भाषाएं नहीं बल्कि एक ही संस्कृति की धारा हैं। अंग्रेजी सीखना ठीक है, लेकिन हिंदी की कीमत पर नहीं।
विशिष्ट अतिथि डॉ. एनबी सिंह ‘हरियाली गुरु’ ने पर्यावरण संरक्षण पर चिंता जताते हुए कहा, जब पेड़ नहीं लगाए जाते थे तब भी पेड़ थे। लेकिन आज जब लाखों वृक्ष लगाए जा रहे हैं तब भी हरियाली नहीं दिखती। यह हमारी सोच और क्रियान्वयन के बीच अंतर को दर्शाता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ओम प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी के विकास और संरक्षण के लिए जमीनी स्तर पर ठोस प्रयास आवश्यक हैं।
इस अवसर पर विख्यात अनुवादक और आलोचक दिनेश कुमार माली को उनकी शोध पुस्तक “सौंदर्य जल में नर्मदा : एक पर्यावरणीय आलोचना” पर साहित्य रत्न संस्थान की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। उनकी इस पुस्तक को पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी का भी विशिष्ट आशीर्वाद प्राप्त है। इस पुस्तक का विमोचन विगत वर्ष केरल की महाराजा कॉलेज में देश की प्रख्यात पर्यावरणविद मेधा पाटकर के कर-कमलों से किया गया था। ज्ञात हो, इससे पूर्व भी दिनेश कुमार माली को उनके हिंदी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए हिंदी साहित्य अकादमी, गांधीनगर एवं अखिल भारतीय हिंदी साहित्य संस्थान, गुजरात अहमदाबाद के संयुक्त अधिवेशन में “साहित्यालंकार” की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान के इस त्रिदिवसीय संगोष्ठी के मौके पर सम्मानित होने वालों में देश के कोने कोने से पधारे साहित्यकारों में डॉ. जुगुल किशोर सारंगी, डॉ. वंदना अग्निहोत्री, डॉ. विजयलक्ष्मी, डॉ. सुमा, डॉ. सीमा वर्मा, डॉ. गीता त्रिपाठी, संतोष कुमार झा, डॉ. कृष्णा मणि, अनिल कुमार त्रिपाठी, फरहत उन्नीसा, रणजीत सिंह अरोरा, डॉ. रश्मि चौबे, रजनी प्रभा, मुक्ता कौशिक, रतिराम गढ़वाल, संतोष शर्मा, लक्ष्मीकान्त वैष्णव, राणा प्रताप, अनीता सक्सेना, माधुरी त्रिपाठी, विजय कृष्ण त्रिपाठी प्रमुख हैं। डॉ. एनबी सिंह को विशेष रूप से “पर्यावरण श्री” सम्मान से नवाजा गया।
संस्थान के सचिव डॉ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी ने आभार ज्ञापन किया। संचालन डॉ. सीमा वर्मा, रश्मि चौबे और संयोजन पुष्पा श्रीवास्तव ने किया।
वे आठ सूत्र जिनकी वजह से भारत विश्व गुरु था और विश्व गुरू बन सकता है
हमारा वैदिक साहित्य मात्र धर्म, संस्कृति और जीवन जीने का ज्ञान नहीं देता है बल्कि उसमें युध्द नीति से लेकर कूटनीति, राजनीति और शासन-प्रशासन चलाने से लेकर राष्ट्र धर्म, राजधर्म, लोकनीति, अर्थशास्त्र, व्यापार, विदेशी नीति के तमाम ऐसे सूत्र हैं जिनकी वजह से हमारा देश विश्व गुरु था और आज भी अगर हम हमारे वैदिक वांग्मय के 8 सूत्रों को अपना लें तो हम दुनिया भर में अपनी धाक जमा सकते हैं।
ये विचार हिंदू मैनिफेस्टो के लेखक वर्ल्ड हिंदू फाउंडेशन (WHF) के संस्थापक व अध्यक्ष तथा विश्व हिंदू परिषद (VHP) के संयुक्त महासचिव स्वामी विज्ञानानंदजी ने एनएसई के भव्य सभागार में आयोजित हिंदू मैनिफेस्टो के लोकार्पण कार्यक्रम में व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता एनएसी के सीईओ श्री आशीेष चौहान ने की।
कार्यक्रम का संटालन श्रीमती दीपा सिंह ने किया व अंत में आभार श्री शैलेष त्रिवेदी ने माना।
पुस्तक का लोकार्पण स्वामी विज्ञानानंद जी व श्री आशीष चौहान के साथ हिंदू इकानामिक फोरम के श्री स्वदेश खेतावत व श्री रविकांत मिश्रा ने किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में श्रीमती सपना अमित द्वारा हिंदू मैनिफेस्टो पर व्यक्त किए गए विचारों की वीडिओ का प्रदर्शन भी किया गया। श्रीमती सपना अमित अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से भारतीय वैदिक साहित्य व संस्कृति को आधुनिक परिवेश के साथ प्रचारित करने का कार्य कर रही है।
स्वामी विज्ञानानंद जी ने कहा कि हिंदू मेनिफेस्टो (The Hindu Manifesto) हिंदू सभ्यता के पुनरुद्धार के लिए एक क्रांतिकारी ब्लूप्रिंट है, जो प्राचीन हिंदू शास्त्रों से प्रेरित होकर आधुनिक समाज, शासन और नैतिकता की चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक केवल एक घोषणा-पत्र नहीं, बल्कि एक सक्रिय आह्वान है—जो व्यक्तियों, समुदायों और राष्ट्रों को हिंदू सिद्धांतों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है, ताकि न्यायपूर्ण, समृद्ध और सामंजस्यपूर्ण विश्व का निर्माण हो सके।
यह पुस्तक वर्षों के गहन शोध का परिणाम है, जिसमें वेद, रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र, शुकनीतिसार और मनुस्मृति जैसे दर्जनों पवित्र ग्रंथों से उद्धरण लिए गए हैं। स्वामी जी ने इसे “सभ्यता पुनरुत्थान का ब्लूप्रिंट” बताते हुए कहा कि ये पुस्तक हिंदू परंपरा को पश्चिमी पूंजीवाद या समाजवाद से अलग एक संतुलित आर्थिक-सामाजिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करती है।

इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नेशनल स्टॉक एक्स्चेंज (एएसई) के सीईओ श्री आशीष चौहान ने कहा कि हमारी भारतीय जीवन शैली में हमारी सफलता के सारे राज छुपे हैं। उन्होंने कहा कि अगर देश के सभी हिंदू चाहें तो पुरी दुनिया में अपनी हिंदी पहचान बना सकते है। यह पुस्तक इसी सोच को कई आयामों के साथ प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि विदेश यात्रा के दौरान हमें कई बार अपना शाकाहारी भोजन नहीं मिल पाता है, यदि हिंदू लोग चाहें और संकल्प लें तो पूरी दुनिया में हिंदी भोजन की मांग पैदा कर इसे एक पहचान दे सकते हैं।
उन्होंने कहा कि आज देश के सफल व दूरदर्शी नेतृत्व की वजह से पूरी दुनिया में भारत की एक सम्मानजनक पहचान बनी है। हिंदू मैनिफेस्टो जैसी पुस्तक हर घर में पहुँचना चाहिए और हर व्यक्ति को अपने मित्र या साथी को ये पुस्तक भेंट में देकर हिंदू समाज की शक्ति को घर-घर पहुँचना चाहिए।

स्वामी विज्ञानानंद जी ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा कि यह पुस्तक हिंदू सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में पुनर्व्याख्या करती है, ताकि वैश्विक चुनौतियों का सामना हो सके। स्वामी जी कहते हैं, “हिंदू विचार हमेशा वर्तमान की आवश्यकताओं को संबोधित करता है, लेकिन ऋषियों के सूत्रों में निहित शाश्वत सिद्धांतों पर दृढ़ रहता है।” स्वामी जी ने पुस्तक के महत्वपूर्ण सूत्रों को रेखांकित करते हुए कहा,“धर्म” को यहाँ सिर्फ धार्मिक कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं माना गया। यह जीवन में कर्तव्य, नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव है।
- शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन नहीं बल्कि चरित्र निर्माण, राष्ट्रीय प्रेम, वैज्ञानिक दृष्टि और भारतीय संस्कृति-स्वाभिमान के बीच समन्वय होना चाहिए। India Today
- रक्षा-सुरक्षा को सिर्फ सैन्य दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि “सभ्याता-रक्षा”, “संस्कृति-रक्षा”, “मानव-साध्यता-रक्षा” के रूप में देखा गया है।
- सामाजिक व्यवस्था में भेदभाव-विरोधी दृष्टिकोण है — जाति, वर्ण-विभाजन आदि मूल रूप से हिंदू परंपरा में भेदभाव नहीं बल्कि समान-मानवता थी।
- पर्यावरण, मातृभूमि, प्रकृति को सिर्फ संसाधन नहीं बल्कि पवित्रता-का अनुभव देने वाला आयाम माना गया है।

इसमें आठ संस्कृत सूत्र (प्रमुख सिद्धांत) प्रस्तुत किए गए हैं, जो धर्म-केंद्रित राज्य की कल्पना करते हैं। ये सूत्र समृद्धि, न्याय, शासन, शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव जैसे आधुनिक मुद्दों को हिंदू दर्शन से जोड़ते हैं।ये सूत्र राम राज्य की अवधारणा पर आधारित हैं, जहां शासन न्यायपूर्ण, समावेशी और धर्म-आधारित हो। ये सूत्र हिंदू समाज को पुनः संरक्षित करने का आह्वान करते हैं, जहां पर्यावरण संरक्षण, महिलाओं की गरिमा और सामाजिक सद्भाव प्राथमिक हैं।सामाजिक: जाति-आधारित भेदभाव की गलतफहमियों को दूर कर एकता बढ़ाती है।
हिंदू मैनिफेस्टो में भारतीय वांगमय के जिन आठ प्रमुख सूत्रों को आधार बनाया गया है वे हैं-
- धर्मार्थकाममोक्षसिद्धये
आर्थिक समृद्धि (अर्थ),नैतिक जीवन (धर्म),इच्छापूर्ति (काम) और आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) को संतुलित करना। हिंदू सभ्यता में धन सृजन को पवित्र माना गया है।
समृद्धि के लिए सभी का विकास: आर्थिक समृद्धि (अर्थ), नैतिक जीवन (धर्म), इच्छापूर्ति (काम) और आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) को संतुलित करना। हिंदू सभ्यता में धन सृजन को पवित्र माना गया है।
2. राष्ट्ररक्षायां प्रथमं प्रयत्
राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रथम प्रयास करें। शत्रु की पहचान और संरक्षण पर जोर। हिंदू इतिहास से उदाहरण देकर सैन्य शक्ति और रणनीति को मजबूत करने का आह्वान किया गया है।
3.विद्यया संस्कारयते जनः
शिक्षा से जन को संस्कारित किया जाए। गुणवत्ता वाली शिक्षा: ज्ञान-आधारित समाज का निर्माण, जहां शिक्षा बौद्धिक और आध्यात्मिक उत्कृष्टता प्रदान करे। पश्चिमी मॉडल से अलग, हिंदू ग्रंथों पर आधारित हो।
4.धर्मेन राज्यं प्रशासति
धर्म से राज्य का प्रशासन करें। जिम्मेदार लोकतंत्र: राम राज्य जैसा शासन, जहां नेता धर्म (नैतिकता) से निर्देशित हों। समावेशी और न्यायपूर्ण निर्णय प्रक्रिया हो।
5.स्त्रीषु सम्मानं विधीयते
स्त्रियों में सम्मान स्थापित हो। हिंदू ग्रंथों में स्त्री को देवी माना गया है।
6.सामाजिकं सद्भावना रक्षति
सामाजिक सद्भावना की रक्षा करें। सामाजिक सद्भाव: वर्ण और जाति के गलत अर्थों का खंडन किया गया है। गरिमा, समानता और एकता पर आधारित समाज, जहां कोई भेदभाव न हो।
8. प्रकृतिं पवित्रं मंथति
प्रकृति को पवित्र मानकर संरक्षित करें। प्रकृति की पवित्रता: पर्यावरण संरक्षण को धर्म का हिस्सा माना गया है। सतत और सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली, वेदों से प्रेरित है।
- स्वकीयं संस्कृतिं संनादति
अपनी संस्कृति का सम्मान करें। अपनी विरासत का सम्मान हो। हिंदू पहचान, वैश्विक हिंदू एकता और सांस्कृतिक कूटनीति से भारत को आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र बनाना।
ये सूत्र न केवल आदर्श हैं, बल्कि कार्यान्वयन का आह्वान भी करते हैं। पुस्तक में इन्हें आधुनिक संदर्भों (जैसे अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और वैश्विक हिंदू एकता) से जोड़ा गया है। स्वामी जी के अनुसार, ये सूत्र “धर्मिक राष्ट्र” की नींव रखते हैं, जहां हिंदू सिद्धांत सभी के लिए समृद्धि और न्याय सुनिश्चित करें।
स्वामी विज्ञानानंदजी के बारे में
स्वामी जी विश्व हिंदू फाउंडेशन (WHF) के संस्थापक एवं वैश्विक अध्यक्ष हैं, साथ ही विश्व हिंदू परिषद (VHP) के संयुक्त महासचिव हैं। एक आईआईटी स्नातक होने के बावजूद, उन्होंने आध्यात्मिक जीवन अपनाया और हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के लिए वैश्विक मंच जैसे वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस और वर्ल्ड हिंदू इकोनॉमिक फोरम की स्थापना की।
पुस्तकः द हिंदू मेनिफेस्टो (The Hindu Manifesto: A Blueprint for Civilizational Resurgence)
लेखक: स्वामी विज्ञानानंद
प्रकाशक: BluOne Ink
पृष्ठ संख्या: 448 (पेपरबैक संस्करण)
ISBN: 9789365474978
उपलब्धता: अमेज़न (भारत और अंतरराष्ट्रीय), हिंदू एशॉप आदि पर उपलब्ध।
श्री आशीष चौहान के बारे में
श्री आशीष चौहान नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हैं। वह बीएसई के पूर्व एमडी और सीईओ भी रह चुके हैं और उन्हें भारत में आधुनिक वित्तीय डेरिवेटिव्स के जनक के रूप में जाना जाता है। चौहान को सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त और बाजार संरचना में विशेषज्ञता हासिल है, और वह एनएसई के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। वह उस टीम का हिस्सा थे जिसने मूल रूप से एनएसई की स्थापना की थी और जिसे अब एनएसई माना जाता है। उन्होंने भारतीय स्टॉक मार्केट को आधुनिक बनाने में सबसे ज्यादा योगदान दिया है. वे भारतीय फाइनेंशियल डेरिवेटिव्स के जनक हैं. चौहान बीएसई की कमान संभाल चुके हैं और रिलायंस इंडस्ट्रीज में भी बड़े पद पर काम कर चुके हैं. उन्हीं के नेतृत्व में बीएसई दुनिया का सबसे तेज एक्सचेंज बना दिया।
जीवनशैली में आ रहे बदलाव और तनाव मानसिक रोग का बड़ा – डॉ. अग्रवाल
कोटा / मनोचिकित्सक डॉ. एम. एल. अग्रवाल ने कहा कि जीवनशैली में आ रहे बदलाव तनाव और मानसिक रोग का बड़ा कारण है।
रोटरी क्लब राउंड टाउन, होप सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को इंडस्ट्रियल एरिया स्थित होटल में मानसिक स्वास्थ्य पर रविवार को आयोजित सेमिनार में मनोचिकित्सक डॉ. एम. एल. अग्रवाल ने यह बात कही। उन्होंने कहा मानसिक रोगियों को अंधविश्वासों से बचाकर उनका उपचार कराया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि अकारण ही उदासी, हताशा, एकांतवास, निद्रा का अभाव, रोने की इच्छा तथा याददाश्त में कमी के साथ आत्महत्या का विचार मन में आना आदि मानसिक रोगों के प्रमुख लक्षण हैं।
मनोचिकित्सक डॉ. इंद्रा शर्मा ने कहा कि सोशल मीडिया पर छाए रहने की सनक युवाओं को मनोरोगी बना रही है। नए जमाने की ये नई समस्या गंभीर बीमारी का रूप ले रही है। डॉ. कल्पना श्रीवास्तव ने कहा कि मेंटल डिसेबिलिटी से ग्रस्त व्यक्ति को स्पेशल अवेयरनेस की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि शरीर को तभी सेहतमंद और फिट रखा जा सकता है, जब आप मानसिक तौर पर पूरी तरह से स्वस्थ होंगे। रोटरी क्लब जिला 3056 की प्रांतपाल प्रज्ञा मेहता ने कहा कि मेंटल हेल्थ को लेकर बहुत भ्रांतियां हैं, इसे ब्रेन हेल्थ माना जाना चाहिए।
डॉ. गीता बंसल ने कहा कि मित्रों के बीच समय बिताना और परिवार के लिए समय निकालना जरूरी है। डॉ. अरुणा अग्रवाल ने कहा कि बच्चे या महिला के व्यवहार में बदलाव अधिक समय तक दिखे तो यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है। डॉ. वनिता मित्तल ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य आज वैश्विक समस्या बन चुका है। मानसिक अस्वस्थता से जूझ रहे 85 प्रतिशत लोग इलाज को आगे ही नहीं आते हैं।
इस अवसर पर संस्थाओं, प्रश्नोत्तरी में विजेताओं व सबसे ज्यादा उपस्थिति वाले रोटरी क्लब को भी सम्मानित किया गया। सेमिनार में सेकेट्री रामगोपाल अग्रवाल, रोटरी क्लब राउंड टाउन के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल, डॉ. अविनाश बंसल, असिस्टेंट गवर्नर डॉ. रोशनी मिश्रा, सेकेट्री होस्ट क्लब डीसी जैन, जोन चेयरमैन सुरेन्द्र अग्रवाल, प्रिया अग्रवाल, रश्मि अग्रवाल, पुष्पा अग्रवाल, नीरा अग्रवाल आदि उपस्थित रहे।
ये ब्राह्मण ही थे, जिनके आगे अंग्रेजों की मनमानी नहीं चली
ब्राह्मणों ने न केवल अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह/ संग्राम का बार बार नेत्तृत्व किया था बल्कि उनका अंग्रेजों से विरोध इस हद तक था कि यदि वे डिप्टी कमिश्नर/ कलेक्टर भी हों तो भी रसोई के लिए पुरोहित के रूप में ब्राह्मण अपनी सेवाएँ देने राज़ी न हुए।
दरिद्र से दरिद्र ब्राह्मण ने भी देश को गुलाम बनाने वालों को खाना खिलाने से स्पष्ट इन्कार कर दिया।
ब्राह्मणों के इस भीतरी विरोध पर ध्यान दिया ही नहीं गया है। बल्कि इसे यों प्रस्तुत किया गया कि उच्च जाति के हिंदू (ब्राह्मण, क्षत्रिय) गोमांस, सुअर का मांस, या शराब को छूने की उन वर्जनाओं के कारण यूरोपियनों के लिए खाना बनाने से बचते थे, जो ब्रिटिश आहार में आम थीं। यह कार्य “अपवित्र” और निम्न-स्थिति का माना जाता था। इसलिए, रसोइए आमतौर पर शूद्र (श्रमिक) या “अछूत” (दलित/परिया) समुदायों से, या गैर-हिंदू जैसे गोवा के कैथोलिक या मुस्लिम होते थे। शूद्र, हिंदू समाज में चौथा वर्ण, सेवा व्यवसायों से जुड़े थे और औपनिवेशिक भारत में घरेलू श्रम का मुख्य स्रोत थे।
मेमसाहिब्स एंड देयर सर्वेंट्स इन नाइनटीन्थ-सेंचुरी इंडिया (1994) पढ़िये तो पता चलेगा कि निम्न जाति के हिंदू” या “अछूत” रसोई के लिए पसंद किए जाते थे ताकि मिश्रित मांस और शराब को समायोजित किया जा सके। कास्ट, फूड एंड कोलोनियलिज्म (2024) में बताया गया है कि मद्रास प्रेसीडेंसी (तुलनीय प्रशासकीय क्षेत्र) में, परिया (अछूत) रसोइए “अंग्रेजी, फ्रांसीसी और इतालवी पुडिंग” बनाने की अपनी क्षमता का विज्ञापन करते थे। हू इज (नॉट) अ सर्वेंट, एनीवे? (2020) में यह बताया गया है कि ये रसोईये दो तीन तरह के और भी काम कर लेते थे।
अंग्रेजी शासन काल में एक हजार से ज्यादा डिप्टी कमिश्नर/ कलेक्टर हुए। सबने कथित शूद्र रसोइये रखे। ये अधिकारी, अक्सर 20–30 वर्ष की आयु के युवा आईसीएस अधिकारी, एकांत बंगलों में रहते थे और स्थानीय भारतीय घरेलू कर्मचारियों पर बहुत अधिक निर्भर रहते थे, जिसमें खाना पकाने जैसे कार्य भी शामिल थे, क्योंकि उष्णकटिबंधीय जलवायु और स्थानीय भोजन तैयार करने की अपरिचितता थी। कहा यह गया कि cultural friction से British comfort न प्रभावित हो जाये, इसलिए यह हुआ और यह सिर्फ कलेक्टर स्तर की बात न थी, हर ब्रिटिश अधिकारी का यही तौर तरीका था। After Five Years in India पुस्तक में Anne C. Wilson (1895) ने एक ब्रिटिश अधिकारी के घर के हाल बताए हैं। उससे भी इसकी पुष्टि होती है।
भारत में ब्रिटिश घरों, जिसमें डीसी के घर शामिल थे, में औसतन 10–20 नौकर काम करते थे, जो सस्ते श्रम और औपनिवेशिक जीवनशैली के “प्रतिष्ठा” पर जोर के कारण संभव था। रसोइए (बावर्ची या खानसामा) आवश्यक थे, क्योंकि ब्रिटिश अधिकारी करी जैसे भारतीय भोजन के साथ-साथ यूरोपीय शैली के व्यंजनों (जैसे रोस्ट, पुडिंग) को पसंद करते थे। मेमसाहिबों के गाइड (उदाहरण के लिए, फ्लोरा एनी स्टील की The Complete Indian Housekeeper and Cook (1888)) और संस्मरणों में रसोइए पुरुष गैर ब्राह्मण भारतीय थे। वे इस पुस्तक में इस बात पर दुख जताती हैं कि जातीय प्रतिबंधों (caste restrictions) ने servant versatility को सीमित कर दिया। अंग्रेजों ने इस आधार पर यह अवधारणा भी बनाई कि भारत के लोग lazy होते हैं और काम करने से मना करने के बहाने बनाते हैं।
Servants’ Pasts: Late-Eighteenth to Twentieth-Century South Asia (2019) में नितिन शर्मा और नितिन वर्मा भी अंग्रेजों के इस दृष्टिकोण से सहानुभूति रखते प्रतीत होते हैं :
“The Europeans in India incessantly complained of being forced to hire innumerable servants because of the alleged caste taboos that defined work. Tied to this was the idea that servants were characteristically lazy, who often gave the excuse of caste prohibitions in order not to perform certain tasks. In this orientalising mix of caste and essentialised native character, where does the possibility of recovering agency on the part of servants lie?” (pp. 34–35).
उत्सा रॉय अपनी किताब Culture of Food in Colonial Bengal (2009) में भी इसका उल्लेख करती हैं कि ब्राह्मण कैसे इस कार्य को करने से इन्कार करते रहे। पंचकारी बंदोपाध्याय और महेंद्रनाथ दत्ता के विवरण भी यही बताते हैं कि “Brahmins never took up cooking at other people’s houses… [it was seen as] disrespectful.” तनिका सरकार Caste–ing Servants in Colonial Calcutta नामक अपने लेख में 19वीं सदी की सैनिटेशन रिपोर्ट्स का हवाला देकर इस तरह के caste avoidance की पुष्टि करती हैं।
ब्राह्मणों की इस अवज्ञा ने caste reinforcement में क्या भूमिका निभाई होगी? क्या अंग्रेज अधिकारी ब्राह्मणों के द्वारा किये जा रहे इस रिजेक्शन के वास्तविक अर्थ नहीं समझ रहे होंगे? क्या वे इससे अपमानित नहीं महसूस करते होंगे? क्या ब्राह्मणों को उन्होंने इसका सबक न सिखाना चाहा होगा? और इसलिए ब्राह्मिनिज्म के विरोध में उन्होंने अपना मानस दृढ़तर बना लिया?
क्या अस्पृश्यता के सवाल को कभी सामाजिक दमन की जगह शुद्धता और पवित्रता के इस आग्रह से कभी देखा गया? कि ब्राह्मण प्रभुता के निरंकुशत्व से सम्पन्न अंग्रेजों के साथ छुआछूत बरत रहे थे। और इसलिए ब्राह्मण इसकी कीमत चुकाते रहे और अंग्रेजों से ब्राह्मणों से अपनी घृणा का स्थानांतरण भारतीय समाज के दूसरे वर्गों में करने के लिए वे नैरेटिव्स बोने शुरू कर दिये जिसकी फसल आज भी काटी जा रही है।

नया सैन्य गठजोड़ भारत के लिये चुनौती
हाल ही में पाकिस्तान समेत संयुक्त अरब अमीरात, कतर और अज़रबैजान के बीच बन रहे सैन्य गठजोड़ की खबरें भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं।
यह घटनाक्रम न केवल दक्षिण एशिया बल्कि मध्य एशिया और खाड़ी क्षेत्र के भू-राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर रहा है। पाकिस्तान लगातार अपनी रक्षा और कूटनीतिक स्थिति को मज़बूत करने की दिशा में सक्रिय हुआ है और वह ऐसे देशों से निकटता बढ़ा रहा है जो भारत के रणनीतिक हितों के लिए चुनौती बन सकते हैं। भारत को इस नए उभरते गठजोड़ को केवल एक सामान्य रक्षा समझौते के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे एक दीर्घकालिक रणनीतिक प्रयास के रूप में समझना चाहिए, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को सुधारना और भारत पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाना है। भारत की विदेश नीति और सुरक्षा के मद्देनजर इस तरह के गठबंधन बड़ी चुनौती के लिहाज देखे जाने चाहिए।
पिछले महीने पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए ऐतिहासिक सैन्य समझौते, जिसके तहत एक देश पर हुआ हमला दूसरे देश पर भी माना जाएगा, की तर्ज पर ही इस सैन्य गठजोड़ का विचार सामने लाया गया है। हालांकि इन चार देशों के बीच अभी कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ है, लेकिन माना जा रहा है कि अगले कुछ महीनों में इसकी घोषणा हो जाएगी। गौरतलब है कि तुर्किये, पाकिस्तान और अजरबैजान का त्रिपक्षीय गठबंधन, जिसे थ्री ब्रदर्स के नाम से जाना जाता है, एक मजबूत सैन्य साझेदारी का रूप ले चुका है। इसके अतिरिक्त, इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन (आईएमसीटीसी) भी है, जिसका संस्थापक सऊदी अरब है और जिसमें चालीस से अधिक सदस्य देश शामिल हैं। इन देशों के बीच सैन्य अभ्यास, हथियार सौदे और कश्मीर जैसे मुद्दों पर इनका स्वाभाविक सामूहिक रुख भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। इससे पाकिस्तान अपनी कुचालों का जायज ठहराने एवं अपनी रक्षा की गुहार लगाते हुए भारत पर दबाव बनाना चाहता है। नहीं भूलना चाहिए कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद जब भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया, तब ज्यादातर मुस्लिम देशों ने तटस्थ रुख अपनाया था, लेकिन तुर्किये और अजरबैजान दो ऐसे मुल्क थे, जो पूरी तरह से पाकिस्तान के समर्थन में खड़े थे। दरअसल, तुर्किये के राष्ट्रपति तैयब अर्दोआन की इस्लामिक दुनिया के मॉडर्न खलीफा बनने की सनक का पाकिस्तान समर्थन करता है, इसी वजह से तुर्किये ने संयुक्त राष्ट्र में भी कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख का खुला समर्थन किया है।
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ हालिया रक्षा समझौता इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान अब अपनी सुरक्षा रणनीति को क्षेत्रीय स्तर पर फैलाने में सफल हो रहा है। यह समझौता इस सिद्धांत पर आधारित है कि अगर किसी एक देश पर हमला होता है तो दोनों की संयुक्त प्रतिक्रिया होगी। यह बात भारत के लिए सीधे तौर पर खतरे की घंटी है क्योंकि इससे पाकिस्तान को रक्षा सहायता, प्रशिक्षण, संसाधन और राजनीतिक समर्थन प्राप्त हो सकता है। इसी तरह पाकिस्तान अज़रबैजान, यूएई और कतर जैसे देशों के साथ भी अपने संबंधों को मजबूत करने में जुटा है।
इन देशों के साथ पाकिस्तान का यह बढ़ता सामरिक सहयोग उसके लिए आर्थिक और तकनीकी लाभ भी लेकर आ सकता है, जिससे भारत के लिए क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना कठिन हो सकता है। भारत को इन परिस्थितियों में अपनी विदेश नीति को अधिक सशक्त और लचीला बनाना होगा। अब वह समय बीत चुका है जब भारत केवल पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता और सीमित क्षेत्रीय चिंताओं के आधार पर नीति बनाता था। आज की दुनिया में भू-राजनीति बहुस्तरीय हो चुकी है, जहां आर्थिक संबंध, तकनीकी साझेदारी और रक्षा सहयोग एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। भारत को चाहिए कि वह अपने खाड़ी देशों से संबंधों को और सुदृढ़ करे।
यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध पहले से ही मजबूत हैं, पर उन्हें रक्षा सहयोग के स्तर पर भी विस्तारित करने की जरूरत है। भारत यदि इन देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाता है तो पाकिस्तान को क्षेत्रीय स्तर पर अलग-थलग करने में मदद मिल सकती है।
साथ ही भारत को यह भी समझना होगा कि पाकिस्तान केवल सैन्य ताकत पर नहीं, बल्कि कूटनीतिक चालों और मीडिया नैरेटिव के माध्यम से भी अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में भारत को न केवल रक्षा मोर्चे पर बल्कि कूटनीतिक और सूचनात्मक मोर्चे पर भी सक्रिय रहना होगा। भारत की नीति प्रतिक्रियात्मक न होकर सक्रिय, दूरगामी और अग्रदर्शी होनी चाहिए। भारत को यह दिखाना होगा कि वह केवल अपनी सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक शांति का भी एक भरोसेमंद संरक्षक है। भारत ही दुनिया से आतंकवाद को समाप्त करने की मुहिम छेड़े हुए है। भारत के लिए यह भी जरूरी है कि वह अपने मित्र देशों के साथ सामूहिक सुरक्षा दृष्टिकोण विकसित करे। जिस तरह अमेरिका और यूरोपीय संघ सामूहिक रक्षा नीति पर चलते हैं, उसी तरह भारत को भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, एसोसिएशन ऑफ साउथईस्ट एशियन नेशंस देशों और मध्य पूर्व में सहयोगी नेटवर्क को सुदृढ़ करना चाहिए। यह केवल सैन्य दृष्टि से नहीं बल्कि कूटनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी भारत की स्थिति को मजबूत करेगा।
पाकिस्तान की नई विदेश नीति की दिशा साफ है – वह भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है, चाहे वह चीन के साथ सीपेक परियोजना के माध्यम से हो या अब मध्य-पूर्व के देशों के साथ रक्षा सहयोग के जरिए। भारत को इस घेराबंदी को तोड़ने के लिए तीन दिशा में एक साथ काम करना होगा – अपनी रक्षा क्षमता को आधुनिक बनाना, विदेश नीति में सक्रियता लाना, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सकारात्मक छवि को और प्रखर बनाना। यह स्थिति भारत के लिए केवल एक चुनौती नहीं बल्कि अपनी सामरिक दूरदर्शिता को सिद्ध करने का अवसर भी है। भारत यदि समय रहते अपने पड़ोस में बढ़ते इस सैन्य गठजोड़ की गंभीरता को समझ लेता है और सक्रिय कदम उठाता है, तो वह न केवल पाकिस्तान की कूटनीतिक चालों को निष्प्रभावी बना सकता है, बल्कि दक्षिण एशिया को स्थिरता और सहयोग के नए मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
इन चार राष्ट्रों का सैन्य गठबंधन भारत के लिए एक चेतावनी है कि भू-राजनीति में देशों के बीच धार्मिक एकजुटता नए रूप में सामने आ रही है, ऐसे में क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा बनी रहे, इसके लिए भारत को अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करते हुए कूटनीतिक मोर्चे पर भी सक्रिय बने रहना होगा। भारत पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान, तुर्की और अजरबैजान को काउंटर करने के लिए अलग-अलग रणनीतियों पर काम कर रहा है। इनमें इन तीनों देशों के दुश्मनों की मदद से लेकर इन्हें आर्थिक तरीके से चोट पहुंचाना भी शामिल है। पाकिस्तान के खिलाफ भारत के कदमों से हर कोई परिचित है। अब बात करते हैं तुर्की की। भारत ने तुर्की को काउंटर करने के लिए उसके सबसे बड़े दुश्मन ग्रीस के साथ रक्षा संबंधों को मजबूत किया है। इसके अलावा भारत ने साइप्रस के मुद्दे को भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना शुरू किया है, जिसकी जमीन पर तुर्की ने अवैध रूप पर कब्जा जमाया हुआ है। वहीं, भारत ने तुर्की को अपने बाजार में प्रवेश को लेकर भी सख्तियां बरती हैं।
इस सैन्य गठजोड़ के हकीकत बनने की सूरत में भारत के लिए जरूरी होगा कि वह आर्मेनिया, ग्रीस और साइप्रस के साथ अपने संबंध मजबूत करे और यूएई के साथ भी द्विपक्षीय रिश्तों को और प्रगाढ़ बनाए, जो भारत का बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा है और आम तौर पर इस्लामिक मुद्दों पर तटस्थ रुख रखता है। आज भारत को यह मानना होगा कि “सुरक्षा” अब केवल हथियारों का मामला नहीं है, यह अर्थव्यवस्था, कूटनीति, और तकनीक का समन्वित प्रश्न बन चुका है। पाकिस्तान की नई चालें एवं कुचालें हमें केवल सतर्क रहने की नहीं, बल्कि सजग, सक्रिय और रणनीतिक रूप से एक कदम आगे रहने की प्रेरणा देती हैं। भारत यदि अपनी नीति में इस नए दृष्टिकोण को शामिल करता है, तो यह गठजोड़ उसके लिए खतरा नहीं बल्कि आत्मसुधार और आत्मसशक्तिकरण का अवसर साबित हो सकता है।
ZebPay ने भारत में बिटकॉइन निवेश के 11 साल पूरे किए; नई ब्रांड पहचान का अनावरण
मुंबई। भारत के अग्रणी डिजिटल एसेट एक्सचेंज में से एक, ZebPay ने 21 अक्टूबर को अपनी 11वीं वर्षगांठ मनाई जो एक दशक से भी अधिक समय से डिजिटल इनोवेशन के माध्यम से वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दे रहा है। 2014 में स्थापित ZebPay भारत की बिटकॉइन क्रांति में अग्रणी रहा है जो नियामक अनुपालन सुनिश्चित करते हुए इनोवेशन को बढ़ावा दे रहा है व राष्ट्र के डिजिटल एसेट परिदृश्य को साकार करने के लिए ग्राहकों में भरोसा बना रहा है।
ZebPay ने इनोवेशन के 11 साल पूरे करते हुए कंपनी ने एक नए लोगो और नई ब्रांड पहचान का अनावरण किया है। यह कदम उनके विकास और बिटकॉइन को सभी के लिए सुलभ, भरोसेमंद और सशक्त बनाने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। नवीनीकृत पहचान में “बिटकॉइन में प्रो” टैगलाइन प्रस्तुत की गई है, जो ZebPay की विचारधारा और विरासत को दर्शाती है जो अपने यूज़र्स को बिटकॉइन अर्थव्यवस्था में आत्मविश्वास से भाग लेने में सक्षम बनाती है, चाहे वे पहली बार निवेश करने वाले हों या अनुभवी ट्रेडर।
नवीनीकृत लोगो और टैगलाइन भारत में बिटकॉइन निवेश में ZebPay के नेतृत्व और डिजिटल एसेट्स की दुनिया को सरल बनाने के सतत मिशन का प्रतीक है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को बदलने के लिए बिटकॉइन के 17 साल पूरे होने पर, ZebPay की 11 साल की यात्रा इस विकास को दर्शाती है जिसने लाखों भारतीयों को बिटकॉइन से परिचित कराने से लेकर नियामक अनुपालन, शिक्षा और इनोवेशन के माध्यम से विश्वास बनाने तक का काम किया है। इन वर्षों में, ZebPay ने न केवल एक निवेश मंच प्रदान किया है, बल्कि वित्तीय साक्षरता को भी बढ़ावा दिया है, सुरक्षित निवेश को प्रोत्साहित किया है और बिटकॉइन को भारत के प्रत्येक घर में एक जाना-पहचाना नाम बना दिया है।
अपनी 11वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में ZebPay ने विशेष कम्युनिटी कैंपेन और ऑफर की एक श्रृंखला शुरू की है जैसे एक विशेष निशुल्क ज़ीरो-फीस दिवाली मुहूर्त ट्रेडिंग सेशन, उच्च-वॉल्यूम वाले स्पॉट ट्रेडर्स के लिए गोल्ड रिवार्ड्स, फ्यूचर्स पर उच्चतम ट्रेडिंग वॉल्यूम के लिए बिटकॉइन-आधारित पुरस्कार और एक विशेष ऑफर जो मौजूदा उपयोगकर्ताओं को नए क्रिप्टो डिपॉजिट करने पर पुरस्कृत करता है। ये सीमित अवधि के ऑफर ZebPay की 11 साल की यात्रा का जश्न मनाने के लिए पेश किए गए हैं, जो इसकी लॉयल कम्मयुनिटी को पुरस्कृत करते हैं व विभिन्न निवेश माध्यमों में सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करते हैं।
इसके अतिरिक्त ZebPay ने बिटकॉइन निवेश को सरल व अधिक सुलभ बनाने के लिए कई नई पहलें शुरू की हैं। इसका प्रमुख उत्पाद CryptoPacks विशेष तौर पर बनाए गए थीम-आधारित निवेश बंडल प्रदान करता है जो उपयोगकर्ताओं को आसानी से अपने पोर्टफोलियो को विविध बनाने में मदद करता है। इन-पर्सन सत्रों के माध्यम से आयोजित बिटकॉइन मास्टरक्लास पहल एक जिम्मेदार निवेश मानसिकता पर जोर देती है और प्रतिभागियों को बिटकॉइन, ब्लॉकचेन व समग्र रूप से क्रिप्टो एसेट्स की मूल बातें समझने में मदद करती है जिसका मुख्य उद्देश्य सोच-समझकर निवेश निर्णय लेना है। अब तक दो सफल सत्रों के साथ कार्यक्रम का उद्देश्य क्रिप्टो लर्निंग को सभी के लिए सुविधाजनक और व्यावहारिक बनाना रहा है एवं नए सत्रों की योजना भी तैयार की गई है। एक्सचेंज ने पूरे भारत में वित्तीय और फिनटेक इवेंट्स में भी सक्रिय रूप से भाग लिया है, जिससे कम्मयुनिटी के साथ जुड़कर बिटकॉइन के बारे में जागरूकता फैलाई जा सके, साक्षरता को बढ़ावा दिया जा सके और डिजिटल एसेट इकोसिस्टम में सूचित भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा सके। यह बिटकॉइन अर्थव्यवस्था में ज्ञान और आत्मविश्वास के साथ उपयोगकर्ताओं को सशक्त बनाने के अपने मिशन को मजबूत करता है।
ZebPay के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Rahul Pagidipati ने कहा, “भारत के बिटकॉइन और क्रिप्टो इ
ZebPay के मुख्य परिचालन अधिकारी Raj Karkara ने बताया, “यह उपलब्धि उस अविश्वसनीय विश्
एक्सचेंज विभिन्न निवेश समाधानों के साथ एक विविध पोर्टफोलियो के माध्यम से खुद को अलग व बेहतर बनाना जारी रखता है जिसमें Spot और Perpetual Futures trading से लेकर CryptoPacks जैसे लक्ष्य-आधारित निवेश विकल्प शामिल हैं। ZebPay अपने मोबाइल ऐप, वेब प्लेटफॉर्म और APIs पर तत्काल fiat और crypto deposits और withdrawals की पेशकश करके एक सुगम उपयोगकर्ता अनुभव सुनिश्चित करता है। उपयोगकर्ता Quick Trade सुविधा के माध्यम से तुरंत crypto खरीद या बेच सकते हैं जिससे लेनदेन पहले से कहीं अधिक तेज और अधिक सुविधाजनक हो जाता है।
Financial Intelligence Unit – India (FIU-IND) के साथ एक पंजीकृत इकाई और Digital Economy Council of Australia के सदस्य के रूप में, ZebPay ने भारत के बिटकॉइन परिदृश्य को आकार देने में अपने स्थान को लगातार मजबूत किया है। इसकी यात्रा सुरक्षा, इनोवेशन और समावेशिता पर एक मजबूत ध्यान केंद्रित करती है जिसमें सभी को सशक्त बनाने के लिए डिज़ाइन की गई सुविधाएँ और पहलें सामने लाई गई हैं।
ZebPay के बारे में
ZebPay भारत के सबसे पुराने बिटकॉइन एक्सचेंजों में से एक है जिसके 6 मिलियन से अधिक रजिस्टर्ड उपयोगकर्ता हैं। 2014 में स्थापित इस प्लेटफार्म उद्देश्य एक प्रमुख blockchain asset solution provider और crypto space में भारतीयों के लिए नंबर-1 वित्तीय सलाहकार बनना है। कंपनी का मिशन अपने सदस्यों को Web3 इकोनॉमी में वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने में मदद करना है। ZebPay एक FIU-registered digital asset exchange है, जो zebpay.com के साथ-साथ एंड्राइड प्ले स्टोर व एप्पल एप स्टोर के माध्यम से भी उपलब्ध है। ग्राहक Bitcoin, Ethereum, BAT और 300+ अन्य crypto pairs में निवेश कर सकते हैं व crypto-fiat और crypto-crypto दोनों की ट्रेडिंग कर सकते हैं। ZebPay OTC, उच्च-वॉल्यूम वाले क्लाइंट्स के लिए एक bespoke ट्रेडिंग डेस्क है, जो व्यक्तियों और संस्थानों दोनों की आवश्यकताओं को पूरा करता है।
अधिक विवरण के लिए, कृपया विज़िट करें: zebpay.com.
ZebPay के सुरक्षा उपायों से संबंधित विवरण के लिए, कृपया सुरक्षा पृष्ठ पर जाएँ।