Home Blog Page 66

पीयूष पाण्डेयः देश के सुरों को मिलाने वाला सुर अनंत में खो गया

विज्ञापन जगत की जानी मानी हस्ती पीयूष पांडेय अब हमारे बीच नहीं रहे। वह 70 साल के थे।   पीयूष पांडे एक महीने से कोमा में थे और गंभीर संक्रमण (इंफेक्शन) से जूझ रहे थे. पीयूष पांडे ने ‘हमारा बजाज’, ‘फेविकॉल का जोड़’, ‘कैडबरी का कुछ खास है’, ‘दो बूंद जिंदगी की’ पोलियो अभियान और ‘अबकी बार मोदी सरकार’ जैसे आइकॉनिक विज्ञापनों से भारतीय विज्ञापन को नई पहचान दी.    उनकी आवाज, सोच और भारतीय अंदाज ने आधुनिक भारतीय विज्ञापन की दिशा तय की। पीयूष पांडेय, ओगिलवी के वर्ल्डवाइड चीफ क्रिएटिव ऑफिसर और इंडिया के एग्जिक्यूटिव चेयरमैन थे। ग्लोबल ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री में वह जाना-माना नाम थे। उन्हें एलआईए लेजेंड अवॉर्ड (2024) और पद्म श्री (2016) सहित कई सम्मान मिल चुके थे।

पीयूष पांडेय को भारतीय विज्ञापन जगत में एक अलग और खास आवाज देने के लिए जाना जाता था। उन्होंने इंडस्ट्री को पश्चिमी अंदाज से दूर कर देश की भाषा, संस्कृति और भावना से जोड़ने का काम किया।

5 अगस्त 1988 का दिन था. पूरा देश आजादी की वर्षगांठ हर्षोल्लास के साथ मना रहा था. ये वो दौर था जब मनोरंजन के साधन सीमित थे. दूरदर्शन ही वो जरिया था जहां से मनोरंजन की डोज हमें मिलती थी. उस पर आने वाली फिल्में, समाचार, गीत और यहां तक कि विज्ञापन भी कुछ खास मायने रखते थे. इस दिन प्रधानमंत्री का संबोधन खत्म होने के बाद दूरदर्शन पर राष्ट्रीय एकता के एक गीत ने दस्तक दी. इसके बोल, इसमें नजर आने वाली हस्तियां और पूरा माहौल बेमिसाल था. संगीत, खेल और सिनेमा जगत समेत कई क्षेत्रों की नामचीन हस्तियों को इस अंदाज में देखना नया अनुभव था. यह गीत कुछ इस तरह से जेहन में उतरा कि देश की धड़कन बन गया. इसके शब्द हर किसी की जुबां पर चढ़ गए. इस गीत के मायने इतने गहरे थे कि आज भी प्रासंगिक हैं. हम बात कर रहे हैं विविधता में एकता की मिसाल समेटे ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ गीत की. इस मशहूर गीत को लिखा था पीयूष पांडे ने और इसका म्यूजिक कंपोज किया था पंडित भीमसेन जोशी और अशोक पटकी ने.

ये गीत आज भी लोगों के मन में भारतीयता के तार झनझना देता है…
‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ के बोल…
मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
सुर की नदियाँ हर दिशा से बहते सागर में मिलें
बादलों का रूप ले कर बरसे हल्के हल्के
मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
मिले सुर मेरा तुम्हारा …
मिले सुर मेरा तुम्हारा …

इस गीत  को 14 भारतीय भाषाओं हिंदी, असमी, तमिल, तेलुगू, कश्मीरी, पंजाबी, सिन्धी, उर्दू, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला, ओडिया, गुजराती और मराठी में गाया था. इसमें अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती, हेमा मालिनी, तनूजा समेत कई सिनेमा जगत की कई हस्तियां इस गीत में नजर आईं. उनके अलावा खिलाड़ियों में सुनील गावस्कर, पीटी उषा, कपिल देव, प्रकाश पादुकोण और मिल्खा सिंह जैसे कई दिग्गज दिखे. पहली बार राष्ट्रीय एकता के संदेश को इस खूबसूरती के साथ पिरोया गया था.

राजस्थान के जयपुर में जन्मे पीयूष पांडे बचपन से ही रचनात्मक सोच के लिए जाने जाते थे. उनके घर का माहौल कलात्मक था उनके भाई प्रसून पांडे फिल्म निर्देशक बने और दोनों ने मिलकर रेडियो जिंगल्स में अपनी आवाज दी. ओगिल्वी इंडिया से 1982 में जुड़ने से पहले, पीयूष क्रिकेट खेलते थे लेकिन असली पहचान उन्हें विज्ञापन की दुनिया में मिली, जहां उन्होंने हर विज्ञापन में भारतीयता और भावनाओं को जगह दी. पीयूष पांडे का जन्म 1955 में जयपुर में हुआ था और उनके परिवार में नौ बच्चे थे – सात बेटियाँ और दो बेटे। उनके भाई-बहनों में फिल्म निर्देशक प्रसून पांडे और गायिका-अभिनेत्री इला अरुण शामिल हैं । उनके पिता राजस्थान राज्य सहकारी बैंक में काम करते थे।  उन्होंने राजस्थान राज्य के लिए रणजी ट्रॉफी खेली। उन्होंने चाय चखने का काम भी किया।  पीयुष पांडे ने जयपुर के सेंट जेवियर्स स्कूल से पढ़ाई की और दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की । उनका विवाह नीता पांडे से हुआ था।
पीयूष पांडे कुल 9 भाई-बहन थे, 7 बहनें और 2 भाई।

जब उन्होंने करियर की शुरुआत की, तब विज्ञापन जगत में अंग्रेज़ी और पश्चिमी स्टाइल का बोलबाला था. लेकिन पीयूष पांडे ने इस ढर्रे को तोड़ दिया. उन्होंने ऐसे विज्ञापन बनाए जो आम भारतीय की ज़ुबान में बात करते थे. उनके यादगार प्रोजेक्ट्स में शामिल हैं एशियन पेंट्स का हर खुशी में रंग लाए, कैडबरी का कुछ ख़ास है, फेविकोल का मजेदार एग एड, और हच का प्यारा व्हेयरएवर यू गो, आवर नेटवर्क फॉलोज वाला पग विज्ञापन. ये सिर्फ विज्ञापन नहीं, लोगों की भावनाओं और यादों का हिस्सा बन गए.

विज्ञापन के क्षेत्र में उनका सफर वर्ष 1982 में शुरू हुआ, जब उन्होंने ओगिलवी में क्लाइंट सर्विसिंग एग्जिक्यूटिव के रूप में काम शुरू किया। उनके शुरुआती प्रोजेक्ट्स में से एक था डिटर्जेंट ब्रैंड सनलाइट। छह साल में ही वह क्रिएटिव डिपार्टमेंट में आ गए, जहां उनकी कहानी कहने की कला ने सभी को मंत्रमुग्ध किया। इसके बाद उन्होंने लुमो, फेविकोल, कैडबरी और एशियन पेंट्स जैसे ब्रैंड्स के लिए यादगार कैंपेन बनाए।

पीयूष पांडेय के विज्ञापन हमेशा सादगी, भावना और भारतीय संस्कृति का मिश्रण दिखाते थे।

उनके प्रसिद्ध कामों में शामिल हैं-
फेविक्विक और फेविकोल: ‘तोड़ो नहीं, जोड़ो’, फेविकोल सोफा, और ‘बस फंस गया फेविकोल में’ वाला विज्ञापन

पॉंड्स–’गूगली वूगली वूश!!’

कैडबरी डेयरी मिल्क–’कुछ खास है’

वोडाफोन–जूजू

एशियन पेंट्स–’हर घर कुछ कहता है’

बजाज–’हमारा बजाज’

एयरटेल–’हर एक फ्रेंड जरूरी होता है’

राजनीतिक विज्ञापन, जैसे बीजेपी का 2014 का अभियान ‘अबकी बार मोदी सरकार’

अमिताभ बच्चन के साथ पोलियो अभियान ।

पीयूष पांडे को केवल एक विज्ञापन विशेषज्ञ के रूप में ही नहीं बल्कि ऐसी शख्सियत के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने भारतीय विज्ञापन को उसकी अपनी भाषा और आत्मा दी. भाजपा को ‘अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा उन्होंने ही दिया था. इतना ही नहीं, मिले सुर मेरा तुम्हारा से भी वह जुड़े थे.भारतीय विज्ञापन जगत में उन्हें महान कहा जाता है. उन्हें पद्मश्री से नवाजा जा चुका था.

पीयूष पांडे का जन्म 1955 में जयपुर में हुआ था. उनके परिवार में नौ बच्चे थे, जिनमें सात बहनें और दो भाई शामिल थे. उनके भाई प्रसून पांडे फिल्म निर्देशक हैं, जबकि बहन ईला अरुण गायिका और अभिनेत्री थीं. उनके पिता राजस्थान राज्य सहकारी बैंक में कार्यरत थे. उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की और 1982 में विज्ञापन जगत में कदम रखा और ओगिल्वी इंडिया में क्लाइंट सर्विसिंग एक्जीक्यूटिव के रूप में शामिल हुए.

उनका पहला प्रिंट विज्ञापन सनलाइट डिटर्जेंट के लिए लिखा गया. छह साल बाद वे क्रिएटिव विभाग में आए और लूना मोपेड, फेविकोल, कैडबरी और एशियन पेंट्स जैसे ब्रांड्स के लिए कई प्रसिद्ध विज्ञापन बनाए। इसके बाद उन्हें क्रिएटिव डायरेक्टर और फिर राष्ट्रीय क्रिएटिव डायरेक्टर बनाया गया. 1994 में उन्हें ओगिल्वी इंडिया के निदेशक मंडल में भी स्थान मिला. उनके नेतृत्व में ओगिल्वी इंडिया ने लगातार 12 वर्षों तक भारत की नंबर 1 एजेंसी का दर्जा हासिल किया.

पीयूष पांडे द्वारा बनाए गए विज्ञापन आज भी लोगों की यादों में बसे हुए हैं. उन्होंने एशियन पेंट्स के लिए ‘हर खुशी में रंग लाए,’ कैडबरी के लिए ‘कुछ खास है,’ फेविकोल के लिए आइकॉनिक ‘एग’ विज्ञापन और हच के पग वाले विज्ञापन जैसी रचनाएं तैयार कीं. इसके अलावा, उन्होंने 2014 में भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनावी नारा ‘अबकी बार, मोदी सरकार’ दिया. उनका योगदान केवल व्यावसायिक विज्ञापन तक सीमित नहीं था. उन्होंने राष्ट्रीय एकता गीत ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ लिखा और कई सामाजिक अभियान जैसे पोलियो जागरूकता और धूम्रपान विरोधी अभियानों में भी सक्रिय भूमिका निभाई.

पीयूष पांडे को उनके योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उन्हें 2016 में पद्म श्री से नवाजा गया और 2024 में एलआईए लीजेंड अवार्ड दिया गया. इसके अलावा, उन्हें क्लियो लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, मीडिया एशिया अवार्ड्स और कान्स लायंस में कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल चुके हैं. उनके नेतृत्व में ओगिल्वी इंडिया को वैश्विक स्तर पर सबसे रचनात्मक कार्यालयों में से एक माना गया. उनकी रचनात्मकता, सहजता और भारतीय विज्ञापन को दी गई दिशा उन्हें हमेशा यादगार बनाएगी.

टूटी सायकिल से 7 हजार किलोमीटर की यात्रा करके उसने प्रेमिका का दरवाजा खटखटाया और फिर

वर्ष 1975 में नई दिल्ली की एक व्यस्त सड़क पर, प्रद्युम्न  कुमार महानंदिया, जिन्हें लोग प्यार से ‘पीके’ कहते थे, अपना जीवन यापन करने के लिए राहगीरों के चित्र बनाते थे। वह कोई साधारण कलाकार नहीं थे, बल्कि उनकी उंगलियों में एक जादू था और उनकी आँखों में एक ऐसे व्यक्ति की कहानी थी जो भारतीय समाज में उडीसा की एक पिछड़ी आदिवासी जनजाति से संबंध रखता था, फिर भी जीवन में पिछड़े रहने से इनकार करता था।
एक दिन वह प्रतिदिन की तरह किसी का चित्र बना रहे थे तभी उनके सामने सुनहरे बालों और नीली आँखों वाली एक विदेशी लड़की रुकी। वह चार्लोट वॉन शेडविन थीं, जो एक स्वीडन के एक कुलीन परिवार से थीं और भारत की आध्यात्मिक यात्रा पर आई हुईं थीं। उन्होंने एक ऐसे कलाकार के बारे में सुना था जो जीवित लोगों के चित्र बनाता था और इसलिए उन्होंने उनके सामने बैठने और अपना चित्र बनवाने का फैसला किया।
जैसे-जैसे पीके रेखाएँ बनाते गए, उनके बीच एक और प्रकार की रेखाएँ बनने लगीं। एक नज़र, फिर एक मुस्कान, फिर एक शर्माती हुई बातचीत, और एक ऐसा प्यार जो एक ड्राइंग शीट पर कोयले की राख से पैदा हुआ था। जो हुआ उसमें कोई तर्क नहीं था, लेकिन वह सच्चा था। कुछ ही हफ्तों में, उन्होंने खुले आसमान के नीचे और पेड़ों की पत्तियों के नीचे भारतीय परंपराओं के अनुसार शादी कर ली।
लेकिन यह खुशी स्थायी नहीं थी, क्योंकि चार्लोट के लिए अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए स्वीडन लौटने का समय हो गया। उन्होंने पीके से साथ चलने का प्रस्ताव रखा और उन्हें एक हवाई टिकट खरीदने की पेशकश की। लेकिन पीके ने विनम्रता से इनकार कर दिया और कहा: “मैं अपने तरीके से तुम्हारे पास आऊँगा…तुम मेरा इंतज़ार करना।”
उसके बाद उन्होंने जो किया, वह सिर्फ एक वादा नहीं, बल्कि एक किंवदंती बनी जो इतिहास में दर्ज है।
1978 की शुरुआत में, पीके ने अपने परिवार और दोस्तों को अलविदा कहा, अपना सबकुछ बेचकर एक पुरानी साइकिल खरीदा, जिसपर एक छोटा बैग बाँधा और नई दिल्ली से स्वीडन तक  की अपने जीवन की यात्रा पर निकल पड़े। जी हाँ, एक पुरानी साइकिल पर!
वह पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, यूगोस्लाविया, जर्मनी, और फिर डेनमार्क से होते हुए खतरनाक रास्तों से गुज़रे… उनके पास कोई डिजिटल नक्शा नहीं था, कोई फोन नहीं था, बस, प्यार, विश्वास और कागज पर लिखे पते थे। वह कभी-कभी सड़कों पर सोते थे, कभी-कभी दान में मिले भोजन से खाते थे, और जारी रखने के लिए पर्याप्त पैसा कमाने के लिए राहगीरों के चित्र बनाते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
चार महीने और 7000 किलोमीटर की यात्रा के बाद वह आखिरकार अपनी मंजिल पर पहुँच गए… और जब उन्होंने चार्लोट के घर का दरवाज़ा खटखटाया, तो वहाँ कोई शब्द नहीं थे… सिर्फ आँसू थे।चार्लोट ने उनका स्वागत किया जैसा कि उन्होंने वादा किया था और उनके जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ। आधिकारिक तौर पर शादी करके वह स्वीडन में रहने लगे, जहाँ उनके बच्चे हुए और उनका प्यार आज भी जारी है।
जहाँ तक पीके की बात है, वह एक सम्मानित कलाकार और स्वीडिश समाज के सदस्य बन गए और उनकी कहानी को अब आधुनिक इतिहास में सबसे महान प्रेम और चुनौती की कहानियों में से एक के रूप में बताया जाता है।
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। यह एक सच्ची कहानी है जो हमें एक बात बताती है: जब दिल सच्चा होता है और प्यार असली होता है… तो एक साइकिल महाद्वीपों को पार कर सकती है और एक सपना वफादारी से भरा रास्ता बन सकता है। पीके स्वीडिश सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के सलाहकार हैं।

तीन तरफ दरगाहों से घिर चुका है अयोध्या का पौराणिक मणि पर्वत

सर्व धर्म समभाव वाली रही अयोध्या
अयोध्या सप्तपुरियों में एक है। हिंदू, , सिख, जैन, बौद्ध कौन इस पर नहीं रीझा। सिखों का पवित्र ब्रह्मकुंड यही पर है। जैन धर्म के छह तीर्थांकरों की जन्मभूमि भी यहीं है। बौद्ध दार्शनिक अश्वघोष यहीं पैदा हुए थे। महात्मा बुद्ध ने कई चतुर्मास यहां व्यतीत किए थे। पतित पावनी मां सरयू और उनके पावन घाट की छटा ही निराली है। यही पर रामजन्मभूमि है, हनुमानगढ़ी है, कनक भवन है, दशरथ महल है, अशर्फी भवन है। मणि पर्वत, कुबेर टीला, सुग्रीव किला और मत गयन्द का स्थान आदि प्रमुख स्थान हैं। अपने धार्मिक महत्व के अलावा, अयोध्या एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मूल्य वाला शहर है। शहर ने विभिन्न सभ्यताओं को उभरते और गिरते देखा है, जो वास्तुकला और परंपराओं पर अपनी छाप छोड़ते हैं। गुप्त काल के प्राचीन खंडहरों से लेकर अवध के नवाबों द्वारा निर्मित सुंदर मंदिरों और अन्य धर्मस्थलों तक।अयोध्या भारत के समृद्ध और विविध अतीत का उदाहरण है। न जाने कितने ऐसे स्थल है जों अपने में सदियों का इतिहास समेटे हुए है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची में एक साथ तीन स्मारकों को दर्ज किया गया है जिसमें पहला मणि पर्वत, दूसरा कुबेर पर्वत व तीसरा सुग्रीव पर्वत है। तीनों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की प्रक्रिया चल रही है जिससे इन मंदिरों के आसपास समुचित पर्यटन का विकास हो सके और कोई वैधानिक अड़चन ना आने पाए।

बदल गया है मणि पर्वत का स्वरूप
अयोध्या धाम जंक्शन से 3 किमी की दूरी पर, मणि पर्वत अयोध्या के कामीगंज मोहल्ले में स्थित एक छोटी पहाड़ी है। इस टीले या पहाड़ी को मणि पर्वत के नाम से जाना जाता है। मणि पर्वत एक पौराणिक तीर्थ है। जो एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा, जिसने 1902 में अयोध्या के 148 तीर्थ स्थलों को चिन्हित किया था, जिसकी सूची में क्रम संख्या 52 पर इसे दर्ज कर रखा है। मणि पर्वत सुग्रीव किला (पर्वत) नामक एक अन्य पहाड़ी के करीब ही स्थित है। जो एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा, जिसने 1902 में अयोध्या के 148 तीर्थ स्थलों को चिन्हित किया था,  जिसे सूची में क्रम संख्या 13 पर इसे दर्ज कर रखा है। उस समय कम आबादी के कारण ये दोनों स्थान बहुत दूर नहीं थे। गणेश कुंड, अयोध्या में मणि पर्वत के दक्षिण में स्थित एक पौराणिक तीर्थ है। एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा, जिसने 1902 में अयोध्या के 148 तीर्थ स्थलों को चिन्हित किया था, की सूची में क्रम संख्या 59 पर इसे दर्ज कर रखा है। यहां भी अनेक नई संरचनाएं बनती देखी जा सकती हैं।

मणि पर्वत है एक एतिहासिक धरोहर
यह 80 फिट ऊंचा मणि पर्वत ऐतिहासिक धरोहर है। जिसकी सुरक्षा और संरक्षण भारत सरकार द्वारा संचालित पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किया जाता है। इस क्षेत्र के 100 मीटर के परिधि के आसपास खुदाई या निर्माण कार्य भारत सरकार के द्वारा प्रतिबंधित किया गया है। यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं लेकिन इस जर्जर टीले की मिट्टी बरसात के दिनों में धसकने और उसके कारण दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। इस स्मारक का छत संरक्षण के अभाव में टूटा फूटा है और कटीले तार से प्रतिबंधित किया गया है। मन्दिर को और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से इस संरक्षित स्मारक को जिला प्रशासन की ओर से निर्माण वर्जित किया गया है। जिला प्रशासन ने भी मणि पर्वत को संरक्षित स्मारक की सूची से बाहर करने की अपनी संस्तुति भी पहले से दे रखी है।

मणिपर्वत का है पौराणिक महत्त्व
मणिपर्वत को भी त्रेतायुगीन माना जाता है। इसका इतिहास रुद्रयामल और सत्योपाख्यान में वर्णित है। उसके अनुसार  भगवान राम जब शादी के लिए जनकपुर गए थे, तब कैैकेई मां ने कनक भवन बनवाने का हठ किया था। कैकेई ने कनक महल जानकी को उपहार में दे दिया था। उसने इंद्राणि से मिली मणि भगवान राम को दे दी। लेकिन राम या उनके अन्य किसी भाई ने इस मणि को धारण नहीं किया। बाद में यह मणि जानकी के चरणों में अर्पित कर दी गयी। मणि का जोड़ा न होने के कारण भगवान राम ने इसे ग्रहण नहीं किये थे। बाद में जानकी की इच्छा पूर्ति के लिए जनकपुर के राजा ने यहां मणियों का अंबार लगा दिया था । राजा जनक ने इसे पुत्री का धन मानते हुए अयोध्या भेज दिये थे । यही मणियां अयोध्या के रामकोट के दक्षिण दिशा में रख दी गईं। जो एक योजन ऊंचे पहाड़ जैसी बन गयीं। यही वर्तमान समय का मणिपर्वत कहलाता है। धीरे धीरे पहाड़ घिस कर छोटा होता गया।

जनक द्वारा दिया गया था
अकूत मात्रा में सोना
इस क्षेत्र में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं जो मणि पर्वत की उत्पत्ति का वर्णन करती हैं।
इसका इतिहास त्रेतायुग के समय का है. वहां पर एक जनौरा नाम का गांव था जहां पर महाराज जनक ने निवास किया था. उस जगह को जनकौरा भी कहा जाता है क्योंकि महाराज जनक ने यहां पर कौर (भोजन) खाया था.उसी के उपहार स्वरूप महाराज जनक ने राजा दशरथ को बहुत सी मणियां भेंट की थीं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि देवी सीता के पिता राजा जनक ने भगवान राम से विवाह करने पर सीता को बहुत सारा सोना और जवाहरात उपहार में दिए थे। यद्यपि राजा दशरथ सीता के साथ मिले धन के लालची नहीं थे और उन्होंने आदेश दिया कि इसे रामकोट के दक्षिण दिशा में  विद्या कुंड के पास रखवा दिया था. मणि इतनी ज्यादा थीं कि वहां मणियों का धीरे-धीरे पहाड़ बन गया. आज उसी प्राचीन धरोहर को लोग मणि पर्वत के नाम से जानते हैं. रत्नों की मात्रा इतनी अधिक थी कि वे एक पहाड़ी की शक्ल में बदल गए और इस पहाड़ी को मणि पर्वत के रूप में जाना जाने लगा। मणि एक ऐसी धातु है जो अपने आप में विलक्षण है अपने आप में प्रकाशमान है।

सावन महीने में होता है
मणिपर्वत पर भव्य आयोजन
एसी मान्यता है कि इसी मणि पर्वत पर भगवान राम ने माता सीता के साथ सावन महीने में तृतीया तिथि के दिन झूला झूलते थे। त्रेतायुग की यह परंपरा आज भी कलयुग मे चलती आ रही है। मणि पर्वत पर भगवान झूला झूलते हैं तो वहीं हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदिरों में झूला उत्सव का आनंद लेते हैं, पूजा अर्चन व दर्शन करते हैं। वे अपने जीवन को सफल बनाने के लिए कामना करते हैं।

यही से शुरू होता है सावन मेला
राम जन्मभूमि से एक किलो दूर मणि पर्वत पर सावन मेला आयोजित किया जाता है। रामनगरी का बहुप्रतीक्षित सावन झूला मेला का श्रीगणेश मणिपर्वत के झूलनोत्सव से ही होता है। इस अवसर पर यहां प्रतिष्ठित कनक भवन, दशरथ राज- महल, बड़ा स्थान, रंगमहल, रामवल्लभा- कुंज, मणिराम छावनी, राम हर्षण कुंज, जानकी महल, हनुमत निवास, सद्गुरु सदन, विहुति भवन व रामसखी मंदिर सहित दर्जनों मंदिरों में विराजमान भगवान को यहां शोभायात्रा के रूप में लाकर झूले पर झुलाया जाता है और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं और मणि पर्वत पर स्थित मंदिर में दर्शन करते हैं। आज भी अयोध्या और आसपास के गाँवों में मणिपर्वत से जुड़े लोकगीत महिलाओं द्वारा गए जाते हैं। इन्हीं में से एक लोकगीत के बोल हैं –
“झलुआ पड़ा मणि पर्वत पय।
हम सखि झूलय जाबय ना।”
अर्थात ‘मणिपर्वत पर झूला पड़ा है और मैं अपनी सहेलियों के साथ वहाँ झूलने जाऊँगी।’ इसे इस लिंक से और आसानी से देखा जा सकता है –

त्रेता में था मणियों का पहाड़
धार्मिक ग्रंथों में मान्यता है कि भगवान राम जब विवाह के उपरांत माता सीता को अयोध्या लेकर आए थे, तब महाराज जनक ने महाराज दशरथ को उपहार स्वरूप मणियों की श्रृंखला उन्हें भेट की थी, जिसको राजा दशरथ ने विद्या कुंड के पास रखवा दिया था। मणि इतनी ज्यादा थीं कि वहां मणियों का धीरे-धीरे पहाड़ बन गया था। इसलिए इस टीले को आज भी मणि पर्वत के नाम से जाना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मणि पर्वत पर भगवान राम ने माता सीता के साथ श्रावण मास में तृतीया तिथि (हरियाली तीज) के दिन झूला झूले थे। त्रेतायुग की यह परंपरा कलयुग में भी चली आ रही है।

एक अन्य संदर्भ में कहा गया है कि माता सीता ने एक बार प्रभु श्री राम से आग्रह किया कि वे उन्हें एक ऐसी जगह प्रदान करें जहाँ वे अपनी सखियों (सहेलियों) के साथ घूम सकें। बदले में, श्री राम ने गरुड़ से वैकुंठ पर्वत से एक पहाड़ी का एक हिस्सा लाने के लिए कहा। अपने गुरु के आदेश के अनुसार, गरुड़ वैकुंठ पर्वत से एक छोटी पहाड़ी लाए और उसे अयोध्या में रख दिया। इस पहाड़ी का उपयोग तब राजा जनक द्वारा सीता को उपहार में दिए गए सभी रत्नों को रखने के लिए किया गया था और इसे मणि (गहने) पर्वत (पहाड़ी) के रूप में जाना जाने लगा। यह स्थान सीता देवी की रुचि की बताई जाती है।

मणिपर्वत सीता देवी का रत्नपर्वत है
मणि पर्वत (एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा सूची क्रम संख्या 58 पर दर्ज) का निर्माण जनकपुर में सीता देवी के आशीर्वाद से प्राप्त मणियों से हुआ था। सीताकुंड       (एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा क्रम संख्या 52 पर दर्ज)मणि पर्वत के पास ही अवस्थित है। जहां सीता जी स्नान किया करती थी। यह भी कहा जाता है कि भगवान राम को सीता देवी से विवाह के बाद रानी कैकेयी ने कुछ मणियाँ भेंट की थीं, लेकिन वे भी अप्रत्यक्ष रूप से सीता देवी तक पहुँच गईं। भगवान राम की सनातन पत्नी होने के नाते, भगवान राम की पूजा में सीता देवी का आशीर्वाद महत्वपूर्ण है। मणि पर्वत हमें सदैव सीता देवी और सभी जीवों पर उनकी कृपा की याद दिलाता है।
स्कंद पुराण में मणि पर्वत को महा रत्न तीर्थ के रूप में महिमा पंडित किया गया है। इस स्थान पर स्नान करने से महान आध्यात्मिक लाभ मिलता है। पवित्र पौराणिक तिलोदकी नदी मणि पर्वत के पास से ही गुजराती है।तिलोदकी नदी, जिसे प्राचीन तिलोदकी गंगा, त्रिलोचना या तिलैया गंगा भी कहा जाता है, अयोध्या में स्थित एक पौराणिक नदी है। यह ऋषि रमणक की तपोभूमि से निकली है, इसका उद्गम स्थल सोहावल के पास पंडितपुर गांव में ऋषि रमणक की तपस्थली को माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार, ऋषि रमणक की तपस्या से इस नदी का आविर्भाव हुआ था। कुछ मान्यताओं के अनुसार, राजा राम ने सिंधु देश के घोड़ों के पानी पीने के लिए इसका निर्माण कराया था। यह नदी लगभग 25 किलोमीटर लंबी है, और सरयू नदी में मिलती है। नदी के कई हिस्से लुप्त हो गए थे, लेकिन वर्तमान में इसके पुनरुद्धार का काम तेजी से चल रहा है।

भगवान बुद्ध से भी जुड़ा हुआ है
ये स्थान
भगवान बुद्ध की प्रमुख उपासिका विशाखा ने बुद्ध के सानिध्य में अयोध्या में धम्म की दीक्षा यही पर ली थी। इसी के स्मृति स्वरूप में विशाखा ने अयोध्या में मणि पर्वत के समीप बौद्ध विहार की स्थापना करवाई थी। यह भी कहते हैं कि बुद्ध के महा परिनिर्वाण के बाद इसी विहार में बुद्ध के दांत रखे गए थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान बुद्ध ने अयोध्या में अपने छह साल के प्रवास के दौरान मणि पर्वत से धर्म के नियम के बारे में अपने उपदेश दिए थे। इस पहाड़ी पर सम्राट अशोक द्वारा निर्मित एक स्तूप और एक बौद्ध मठ भी है।
सनातन धर्म की महत्ता के कारण बुद्ध ने भी इस स्थान को महत्व दिया था और बाद में मुस्लिम आक्रांताओं ने भी अपने- अपने धर्म स्थल यहां बनाए हैं।

मणि पर्वत का सौंदर्यीकरण
सन् 1902 में अयोध्या धाम के ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिये एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का गठन किया गया था, जिसने अयोध्या के 148 जगहों को चिह्नित कर उन पर एडवर्ड तीर्थ विवेचनी के पत्थर लगाए थे, ताकि भविष्य में इन धरोहरों को संरक्षित किया जा सके।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1998-99 में उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग ने मणि पर्वत के सौंदर्यीकरण के लिये 88 लाख रुपए के प्रस्तावों को मंज़ूरी दी थी, जिसके अंतर्गत रामकथा पार्क के लोकार्पण के साथ मणि पर्वत की सौंदर्यीकरण योजना का शिलान्यास तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने किया था, किंतु इस योजना पर काम नहीं हो सका और पर्यटन विभाग ने योजना की आवंटित धनराशि सरेंडर कर दिया।

मणि पर्वत की पौराणिकता को संरक्षित करने के लिये पुरातत्व विभाग द्वारा 45 लाख रुपए आंबटित किये गए हैं। जीर्णोद्धार के पहले चरण में मणि पर्वत के गर्भगृह तक पहुँचाने वाली सीढ़ियों का मिर्ज़ापुर के लाल पत्थरों से नवीनीकरण किया गया है। दूसरे चरण में मंदिर के मुख्य द्वार से लेकर अन्य परिसरों की मरम्मत कब की जाएगी या नहीं की जाएगी ? इसका कोई अनुमान नहीं है।

मणिपर्वत पर भयंकर
जेहादी अतिक्रमण :-
इस लिंक से इतने महत्वपूर्ण स्थल का भूगोल बदलने की पूरी तैयारी षडयंत्र के रूप में काफी दिनों से हो रही है –
https://share.google/aj8If6Ppn2qwL9Uup

तीन तरफ दरगाहों से घिर चुका है
यह पौराणिक स्थल
मणि पर्वत की चोटी के तीन तरफ दरगाहें, मजारे, और मस्जिदें दिनोबदिन बनती जा रही हैं। प्रतीत होता है श्री राम जन्म भूमि  मामले में मात खाने के भय की प्रतिपूर्ति के लिए ये समाज काफी समय पूर्व से ही प्रयासरत हो गया था। उन्हें लग रहा था की एक न एक दिन उनका कमजोर पक्ष उन्हें दूर खड़ा कर देगा और भी अयोध्या में अपनी पकड़ कमजोर कर देंगे। इसी की पूर्ति के लिए कई सौ साल पहले से ही  यहां लैंड जेहाद के नाम पर धार्मिक संरचनाएं मनमाने तरीके से बनाई जाने लगी हैं। वहां एक वर्ग विशेष के धार्मिक कार्यक्रम किए जाने लगे और लोगों को मन्नते और दुआएं देने का सिलसिला शुरू कर दिया गया। आम लोग उनके कार्यक्रम से जुड़ते गए उन्हें तत्काल लाभ भी मिला होगा और वे किसी तरह का विरोध भी नहीं कर सके। सरकारी तंत्र भी अयोध्या नगरी के मुख्य राम जन्मभूमि तथा आस पास के कुछ खास स्थानों तक ही अपनी पहुंच बना पाया । मणि पर्वत क्षेत्र यह एकांत और निर्जन में होने के नाते प्रशासन की पहुंच से दूर हटता गया। यद्यपि वह कागज में एक राष्ट्रीय संरक्षित धरोहर है लेकिन मौके पर उसका कुछ और ही नजारा देखा जा सकता है।
मणि पर्वत दरगाहों के निर्माण और दीवारों पर पेंट को देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था कि ये इमारतें हाल ही में बनी हैं। इसके अलावा, हम देख सकते हैं कि कई नई कब्रों और दरगाहों का निर्माण भी चलता रहता है, जहां आस- पास की कई प्राचीन इमारतों पर कंक्रीट की कब्रें भी देखीं जा सकती हैं।

1.दक्षिण में हज़रत शीश अलैहिस्सलाम की दरगाह
हज़रत शीश अलैहिस्सलाम दरगाह मणि पर्वत में मंदिर के दक्षिणी किनारे पर स्थित है। हजरत आदम ने 1050 साल की लंबी उम्र पाई थी। करीब सौ वर्ष वहां गुजारने के बाद वे परिवार सहित अयोध्या की पवित्र धरती पर पहुंचे और यहां करीब नौ सौ साल तक रहे। आदमियत के प्रचार- प्रसार के सिलसिले में उनका अंतिम समय तो अरब देशों में गुजरा, पर उनके पुत्र और दूसरे पैगंबर अयोध्या के ही होकर रहे और यहीं वे पर्दानशीं भी हुए।  मणिपर्वत के पृष्ठ में हजरत शीश की मजार आज भी है। यह मजार छह गज लंबी है। इस्लामिक आख्यानों के अनुसार हजरत शीश 70 गज के थे और उनकी मजार भी इतनी ही लंबी थी। इस स्थान को प्राचीन दर्शाने के लिए हजरत शीश का समीकरण श्रीराम के पूर्वज और अयोध्या के अनादिकालीन राजा इक्ष्वाकु से स्थापित किया जाता है।
यह दरगाह इस पवित्र स्थल से सरकार द्वारा प्रतिबंधित सौ मीटर से भी कम दूरी पर है।यह स्थान मणि पर्वत मंदिर की चारदीवारी से लगभग सटा हुआ है। इसके अलावा मुख्य सड़क पर दरगाह का नाम और दिशा- निर्देश वाला साइनबोर्ड भी देखा जा सकता है।

बाउंड्री में आधे दर्जन से अधिक मजार
इन कब्रों पर हजरत बाबा जलील नक्शबंदी, नजीरुद्दीन कादरी , बगदादी की मजार, ईरान की राज कुमारी हजरत बीवी सैयदा जाहिदा की मजार, हजरत शीश मजार, हजरत शीश की बेगम और उनके बच्चों आदि के नाम खुदे हुए हैं।
यह भी प्रतीत होता कि अरब देश का पैसा और मार्ग निर्देशन भी यहां के लोगों को मिल रहा है।

2.हज़रत शीश की दरगाह को
प्राचीन संरचना कहा जा रहा है :-
मध्यकालीन इस दरगाह को  सृष्टि के निर्माण के समय से ही जोड़ा जा रहा है। हज़रत शीश अपने पैगम्बर हज़रत आदम के तीसरे बेटे और मानव जाति के पहले इंसान हैं। हज़रत शीश की ऊंचाई सत्तर गज (210 फीट) थी जो मणि पर्वत से भी ढाई गुना बड़ा कहा जा रहा है। हजरत शीश की कब्र मणि पर्वत जितनी पुरानी भी कही जा रही है। दरगाह परिसर में हजरत शीश की पत्नी बीबी हुरैमा, उनके पांच बेटों और हजरत शीश की मुरीद ईरान की शाहजादी बीबी जाहिदी की भी मजार है।

3.पूरब में कोतवाल बाबा की दरगाह
मणिपर्वत के पूर्वी इलाके में  एक और दरगाह बनी है । यह दरगाह एक पेड़ को ढँककर बनाई गई थी। उन्होंने एक ऊँचा चबूतरा बनाया था और उस पर कंक्रीट की कब्र रखी थी। कोतवाल बाबा की दरगाह नाम दिया गया था। कोतवाल बाबा एक भूतपूर्व पुलिस अधिकारी थे, जो अयोध्या कोतवाली में तैनात थे। ये अयोध्या के बड़ी बुवा के आंखों के सौंदर्य पर मोहित हो गए थे। फलस्वरूप बुवा जी ने अपनी आँखें निकाल इन्हें दे दी थी। इससे कोतवाल हैरान रह गया। बड़ी बुआ ने सावधान करते हुए कहा, “याद रखो कि फैज़ाबाद में अब ना कोई आलिम रहेगा ना जालिम।” कहते हैं उसी के बाद फैजाबाद से उजड़ाना शुरू हुआ और नवाब आसफुद्दौला फैजाबाद की जगह नोएडा को अपनी राजधानी बना लिया था यह महसूस करते हुए कि बीबी कोई साधारण महिला नहीं हैं, बल्कि खुदा की सच्ची भक्त हैं, कोतवाल साहब ने बड़ी बीबी के चरणों में गिर गए और दया की भीख माँगी। अजीबो-गरीब सी खामोशी पसरी नजर आई थी। तभी से फैजाबाद को दुर्दिन झेलने को मजबूर होना पड़ा था।
सूफी संत खातून ‘बड़ी बुआ’ की कब्र एवं यतीमखाना और मदरसा बेनीगंज इलाके में आईटीआई के सामने स्थित है । यह आचार्य नरेंद्र नगर रीड गंज के पुराने रेलवे स्टेशन से लगभग 1.12 किलोमीटर दूर है। जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा संरक्षित भी है।

4. सैयद शाह बाबा
कोतवाल बाबा की दरगाह के बगल में सैयद शाह बाबा नाम से एक और मजार भी बनाई गई है। इस नाम के और मिलते जुलते नाम के अनेक धार्मिक संरचनाएं पूरे देश में देखी जा सकती हैं। मणि पर्वत अयोध्या स्थित इस दरगाह की देखभाल एक मुस्लिम महिला करती है। जो उत्तर प्रदेश सरकार की विधवा पेंशन होल्डर भी है।

5.उत्तरी किनारे शमशुद्दीन शाह बाबा
मणि पर्वत के उत्तरी किनारे पर हज़रत अली सैयद शमशुद्दीन शाह बाबा नामक एक और दरगाह है। यह दरगाह भी एक पेड़ के चारों ओर बनी हुई है। यह दरगाह मणि पर्वत से उतरने वाली सीढ़ियों के नीचे स्थित है। यह एक ऊँचे सीमेंटेड प्लेटफ़ॉर्म पर बनी है और इसे हरे रंग से रंगा गया है। ऊँचे सीमेंटेड प्लेटफ़ॉर्म तक जाने के लिए सीढ़ियाँ हैं।

6.एक और अनाम दरगाह
एक ऊंचे ढांचे पर बने मकबरे को हरे रंग की चादर से ढका गया है। दरगाह हज़रत अली सैयद शमशुद्दीन शाह बाबा के बगल में खुली जगह में एक और दरगाह बनाई गई है। हालाँकि इस विशेष दरगाह का नाम बोर्ड दिखाई नहीं देता है, लेकिन यह अच्छी तरह से बनाए रखा हुआ दिखाई देता है।

7.सैकड़ों पक्की सामूहिक कब्रें
उपरोक्त तीनों दरगाह- शीष, शमशुद्दीन और कोतवाल बाबा के बीच में सैकड़ों कब्रें मौजूद हैं। इन कब्रों पर ऊपर हाल ही में पक्का निर्माण किया गया है। नीचे प्राचीन काल की ईंटें दिखाई देती हैं। पक्की कब्रों पर अरबी भाषा में कुछ लिखा गया है। नव निर्माणों को हरे रंग से कलर किया जा रहा है। पता चला है कि
आज भी वहाँ आसपास के मुस्लिमों को दफनाया जाता है। मणि पर्वत के पश्चिमी और दक्षिणी कोने के हिस्सों में सामूहिक कब्रों का अम्बार लगा हुआ है।

पीएसी से निगरानी भी नहीं हो पा रही
मणि पर्वत प्रवेश द्वार के पास  पीएसी की एक टुकड़ी कैंपिंग कर रही है,लेकिन उसकी कोई रुचि इस स्मारक और धरोहर को संरक्षित करने के लिए नहीं है। वह अपना समय पास कर रही है क्योंकि उसे कोई ऊपरी तरह से सरकारी निर्देश नहीं  हैं। इस प्रकार मणि पर्वत तीन तरफ से मुस्लिम संरचनाओं से घिरता चला जा रहा है और आज भी उसे पर नए-नए अतिक्रमण होते जा रहे हैं। झाड़ियों के अंदर अभी और भी कई मजार देखे गए हैं। इन मजारों के पास गणेश कुंड और विद्याकुंड जैसे पवित्र और पौराणिक धर्मस्थल भी मौजूद हैं, जिनका संबंध सीधे भगवान राम और उनकी अयोध्या नगरी से है। ये सभी अयोध्या मुख्य तीर्थ क्षेत्र अथवा धर्मनगरी इलाके में ही आते हैं। इन मजारों से एकदम सटकर उत्तर प्रदेश पुलिस की PAC विंग का बड़ा-सा कैम्प है। इस कैम्प में जवानों के आवास, वाहनों की पार्किंग के साथ-साथ उनके हथियारों को भी रखा जाता है। तीन तरफ मजारों से घिरा यह क्षेत्र न सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी काफी संवेदनशील है।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।
(वॉट्सप नं.+919412300183)

आज का युग अनिश्चितता और पूनर्मूल्यांकन का युग है

भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी कहते हैं,संघ प्रमुख डॉ मोहन भागत कहते हैं और सबसे बड़ी बात विश्व पंचायत,यूएन की रिपोर्ट कहती है कि आज का युग युवाओं का युग है।आज पूरे विश्व का अस्तित्व युवाओं की सकारात्मक सोच और बहु आयामी हुनर पर टिका हुआ है।

हिन्दू धर्म,बौद्ध धर्म,जैन धर्म और सिख धर्म तथा इनके धर्मगुरुओं आदि का भी यह मानना है कि कालांतर में युग की अनिश्चितता और स्व पूनर्मूल्यांकन को अपनाकर ही भारत को विकसित मनाया जा सकता है।

अनिश्चितता तो पल-पल देखने को मिलती है। जिस प्रकार परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है ठीक उसी प्रकार मनुष्य जीवन में प्रतिपल परिवर्तन होते ही रहते हैं।और अपने आचार-विचार,संस्कार और व्यवहार में बदलाव लाकर वर्तमान के साथ चलना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने विजयादशमीः2025 को अपना 100वां स्थापना दिवस  हर्षोल्लास के साथ मनाया। वह पवित्र दिवस संघ के लिए ही नहीं हमसभी के लिए संकल्प दिवस था।गौरतलब है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का त्यागी राजा का जीवन शाश्वत जीवन मूल्यों पर आधारित जीवन था जिन्होंने दुराचारी रावण का वधकर यह संदेश दिया है कि यह विजय न किसी एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति पर और न ही किसी देश की दूसरे देश पर विजय थी परन्तु यह विजय धर्म की अधर्म पर, नीति की अनीति पर, सत्य की असत्य पर, प्रकाश की अंधकार पर और न्याय की अन्याय पर विजय थी जिसकी आवश्यकता आज भारतीय समाज को है।

विजयादशमी का दिवस आज हमारे लिए सतत स्फूर्ति का दिवस है।विजयादशमी का  दिवस सतत आत्मगौरव,नई ऊर्जा आत्ममूल्यांकन के साथ पूनर्मूल्यांकन का भी दिवस है।अगर भारतवर्ष की गौरवशाली परम्पराओं को देखें तो भारत एक आत्मनिर्भर समृद्धिशाली, शक्तिशाली और सभी राष्ट्रों के लिए हितकारी राष्ट्र रहा है।यह भारतराष्ट्र का समाज संस्कारी है,समरस है और आज के युग में शक्तिशाली भी है।

आज के भारतीय समाज में रामराज्य जैसा अमन-चैन अगर लाना है तो सबसे पहले अपने आपको चरित्रवान बनाना होगा,अनुशासित और शिष्टाचारी बनाना होगा।और इसके लिए सबसे पहले स्व की समीक्षा करनी होगी जिससे संस्कारी भारतीय परिवार बने और उससे  सशक्त भारतीय समाज तैयार हो सके।

अगर राष्ट्रपिता बापू के अमर संदेशा को भारत में पुनः प्रतिष्ठ करना है तो सबसे पहले आज के युग में हमसभी भारतवासी को  स्व के भाव के साथ-साथ स्व निरीक्षण-परीक्षण का समय बनाना होगा।स्वदेशी विचार अपनाना होगा, भारतीय संस्कृति,इसकी शाश्वत परंपरा और उसके गौरव को पुनः प्रतिष्ठित करना होगा और यह दायित्व आज सिर्फ और सिर्फ देश के युवाओं को परिवर्तन को अपनाकर स्व का पूनर्मूल्यांकन करके ही संभव है।उन्हें अपने व्यवहार और आचरण में भारतीयता को आत्मसात करना होगा।भारत के सौंदर्यबोध तथा शक्तिबोध को आज के परिपेक्ष्य में समझ-बुझकर अपनाना होगा।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का कहना है कि जब कमल खिलता है तो वहां पर भंवरे स्वतः आ जाते हैं। अगर आज के पश्चिमी सभ्यता के चकाचौंध तथा आणविक संकट के युग से भारत को बचाना है तो हम देश के युवाओं को स्व मूल्यांकनकर और उसी के अनुसार अपने आजार-विचार-संस्कार और संस्कृति को अपनाना होगा।

हमारे सप्त ऋषिगणःमहर्षि अगस्त्य,महर्षि अत्रि,महर्षि वसिष्ठ,महर्षि विश्वामित्र,महर्षि जमदग्नि-परशुराम,महर्षि भृगु और यहां तक कि महर्षि दुर्वासा आदि ने भी परिवर्तन के साथ स्व समीक्षा तथा स्व मूल्यांकन को अपनाने का संदेश दिया है।

शांतिदूत भगवान श्रीकृष्ण ने भी महाभारत युद्ध में महापराक्रमी अर्जुन को परिवर्तन के दौर को स्वीकार करते हुए स्व के पूनर्मूल्यांकन का अमर संदेश दिया है।

अपने बाल्यकाल में परम जिज्ञासु स्वामी विवेकानंद ने भी परिवर्तन के क्रम में स्व मूल्यांकनकर पूरे विश्व को जगतगुरु के रुप में स्व मूल्याकन तथा परिवर्तन को अपनाने का संदेश दिया है।

राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर ने अपने पूरे  जीवन में भारतीय संस्कृति और भारतीय इतिहास का गुणगान किया परन्तु उनके जीवन का सच तो यह है कि उन्होंने भी अपने जीवन के आखिरी समय में परिवर्तन की वास्तविकता को स्वीकारकर तथा स्व समीक्षाकर -हारे को हरि नाम-लिख डाला।इसीलिए तो उनके अनुसार  संस्कृति की परिभाषा संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गईं हैं उनसे अपने आपको परिचित करना ही संस्कृति है।और यह हमेशा परिवर्तन के दौर को सहर्ष स्वीकार कर तथा स्व मूल्याकन से ही संभव है।

हाल ही में जैन धर्म के प्रचारक संतमुनि चन्द्र प्रभ जी का यह  संदेश है कि सम्पूर्ण मानवता के भगवान हैं-महावीर और उन्होंने भी  युग अनिश्चितता को स्वीकरने और पूनर्मूल्यांकन के युग में अपना मूल्यांकन स्वहित,परिवारहित,समाजहित और राष्ट्रहित के लिए अनिवार्य बताया है। राजयोगी ब्रह्मकुमार निकुंज का भी हाल ही में यह कहना है कि हमें परिवर्तन से डरना नहीं चाहिए अपितु उसे सहर्ष अपनाना चाहिए।सत्य तो यह है कि आज का युग अनिश्चितता और

पूनर्मूल्यांकन का युग है-विषय निश्चित रूप से शोध का विषय है जिसपर अनवरत शोध की आवश्यकता है और उसी के अनुसार भारतीय जीवन-शैली को अपनाने की आवश्यकता है।

(लेखक भुवनेश्वर में रहते हैं और ओड़िशा की साहित्यिक, सांस्कृतिक धार्मिक व अन्य गतिविधियों के साथ ही विविध विषयों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं) 

एसपी तेजस्विनी गौतम की कोटा को नशामुक्त बनाने की पहल..

नशे की लत से न केवल नशा करने वाला स्वयं अपना जीवन बर्बाद करता है वरन उसके परिवार को भी इसका दंश झेलना पड़ता है। अनेक परवारों में नशे में धुत व्यक्ति घर आ कर अपनी पत्नी और बच्चों से गली गलोच और मारपीट करता है। खुद तो कुछ कमाता नहीं और पत्नी की कमाई छीन कर परिवार को भूखे रहने पर मजबूर कर देता है। ये तो गरीब और मजदूर परिवारों में आम है। इधर आज युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आ चुकी हैं। यही नहीं लड़कियां भी पीछे नहीं हैं। छोटे – छोटे बच्चें तक नशा कर रहे हैं। सिगरेट और शराब को फैशन मान लिया है। पहले चरस बड़ा नशा माना जाता था अब कई और खतरनाक नशे प्रचलन में है।

हाल में में कोटा शहर की एसपी तेजस्विनी गौतम ने एक प्रेसवार्ता में अपना मंतव्य स्पष्ट किया कि वे कोटा को नशा मुक्त बनाने के लिए दृढ़ संकल्पित है। उनका यह विचार स्वागत योग्य है। मैं कुन्हाड़ी में लैंड मार्क सीटी की तरफ निवास करता हूं, मैने सुना भी और देखा भी जब से ये कोटा आई हैं इस क्षेत्र में दुकानदारों का सिगरेट बेचना भारी हो गया है। अच्छा खास खौफ है कब पुलिस आ जाए। बड़ी कार्रवाई भी यहां हुई, नशे की सामग्री जब्त की गई, विक्रेताओं को पुलिस पकड़ कर भी ले गई। शराब माफियाओं के विरुद्ध भी कार्यवाही की गई है।

कोटा में बहुत लंबे समय बाद कोई पुलिस की ऐसी अधिकारी आई है जो मन से अपराधों पर अंकुश लगाने और कोटा शहर को नशा मुक्त बनाना चाहती है। कोटा सिटी एसपी तेजस्विनी गौतम ने कोटा शहर को नशा मुक्त बनाने के लिए ऑपरेशन गरुङव्यूह नाम से पूरे शहर में एक विशेष अभियान की शुरुआत की है। उन्होंने कोटा को नशा मुक्त करने के अभियान को यह कहकर शुरू किया है कि कोटा शहर पुलिस की इस लड़ाई में कोटा की जनता भी कोटा पुलिस के साथ आए ताकि जल्द कोटा शहर को नशा मुक्त बनाया जाए।

सिटी एसपी ने कोटा के नागरिकों से अपील की है कि कोटा शहर के किसी भी कोने में अवैध नशे की बिक्री हो रही है तो वह मोबाईल नंबर 9530443144 पर जानकारी दे, जानकारी देने वाले का नाम गुप्त रखा जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि कोई चाहता है कि ऐसे मामले पर पुलिस की स्पेशल टीम कार्यवाही करें तो यह भी दर्ज किया जाए।

ऐसा नहीं है कि इनके द्वारा की गई पहल कोई पहला प्रयास है। डॉ. आर. सी . साहनी ने अकेले अपने दम पर स्कूलों में जा – जा कर युवा संगोष्ठी और प्रदर्शनियों के माध्यम से लंबे समय तक प्रयास किया। कई समाजसेवियों और मीडिया ने पूर्ण समर्थन दिया। मनोरोग चिकित्सक डॉ. एम. एल. अग्रवाल ने भी नशा मुक्ति के लिए दीर्घकाल तक प्रयास किए। कोटा में संभागीय आयुक्त आए तपेंद्र कुमार, उन्होंने तो नशे के खिलाफ एक जंग छेड़ दी। समाजसेवी, धर्मगुरुओं, राजनीतिज्ञों, गैर सरकारी संगठनों, मीडिया आदि समस्त वर्गों को जोड़ कर पूरे शहर में व्यापक जागरूकता रैली निकाल कर न केवल शहर में, पूरे हाड़ौती में वातावरण बनाया जिसकी गूंज प्रदेश भर में पहुंची। लंबे समय तक जागरूकता गोविधियां और नशा मुक्ति शिविरों का आयोजन किया। हजारों लोगों ने नशा मुक्ति का संकल्प भी लिया। इस अभियान को स्मैक के विरुद्ध केंद्र में रख कर चलाया गया। पुलिस ने भी अभियान में प्रभावी कार्यवाही करते हुए बड़े पैमाने पर नशीले पदार्थ जब्त किए और विक्रेताओं के विरुद्ध भी कार्रवाई की। उनके जाने के बाद कुछ लोगों और संस्थाओं ने अपने स्तर पर कुछ प्रयास किए।

किसी भी सामाजिक बुराई – प्रथा को समाप्त करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होती है। दीर्घकाल तक जागरूकता प्रयास करने होते हैं। छुआछूत, पर्दा प्रथा, बाल विवाह कुछ ऐसी सामाजिक कुरितियां हैं, जो आजादी के बाद से किए जा रहे जागरूकता प्रयास के बावजूद इनके बीज विद्यमान हैं।

नशा मानव वृति भी चिरकाल से चली आ रही है। अनेक फिल्मों नशा सामग्री बनाने और बेचने वालों के संगठित लोगों पर बनी है, जिनका उद्देश्य लोगों को जागरूक करना था। सवाल यह है हम जागरूकता अभियान तो खूब चलाते हैं पर असली जड़ मादक पदार्थ बनने से रोक नहीं लगाते। करोना बीमारी के लोक डाउन में छूट मिलते ही कोटा में ही पहले दिन ही करोड़ों रुपए की शराब की बिक्री का तथ्य समाचार पत्रों की सुर्खी बना। सरकार को नशे से बड़े पैमाने पर राजस्व प्राप्त होता है।

खैर नशे से कई कड़ियां जुड़ी हैं। इसके कारण हम नशा छोड़ने के लिए जागरूक करने के अपने दायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकते हैं। इस तमाम परिवेश और संदर्भों के बीच कोटा की एसपी तेजस्विनी गौतम की हिम्मत, इच्छा शक्ति से शुरू किए गए प्रयासों का स्वागत करते हुए समाज के सभी लोगों और संगठनों को स्वयं आगे आकर उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर नशे के विरुद्ध इस अभियान में सहयोग करना चाहिए। उन्हें भी विभिन्न संगठनों के साथ बैठक ले कर उनकी सहभागिता के लिए प्रयास करने होंगे। केवल अपील करना ही पर्याप्त नहीं है।

मैं मीडिया से जुड़ा होने से उनसे शीघ्र संपर्क करूंगा और उन्हें वांछित सहयोग प्रदान करूंगा। आप भी संकल्प और सेवा भावना के साथ आगे आएं………

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक और पत्रकार, कोटा

मारवाड़ी युवा मंच भुवनेश्वर ने मनाया गोवर्धन पूजा और अन्नकूट

स्थानीय बायोबाबा मठ में सायंकाल मारवाड़ी युवा मंच की अध्यक्ष गीतांजलि अग्रवाल के नेतृत्व में गत वर्ष की तरह इस वर्ष भी गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव मनाया। सबसे पहले विधिवत गोवर्धन पूजन हुआ। अन्नकूट प्रसाद निवेदित हुआ। गौरतलब है कि आयोजन को सफल बनाने में  गीतांजलि केजरीवाल,शीतल सिंघानिया, मुन्ना लाल अग्रवाल, अभिषेक राटेरिया,मनीष केजरीवाल, सपना जैन,राजेश केजरीवाल,अमित सिंघानिया, वर्षा मित्तल आदि ने योगदान दिया। अवसर पर आगत सभी ने अन्नकूट प्रसाद सेवन किया।

बिहार चुनावः मुद्दों एवं मूल्यों से दूर भागती राजनीति

बिहार में चुनावी रणभेरी बज चुकी है। हर दल अपने-अपने घोषणापत्र, नारों और वादों के साथ जनता को लुभाने में जुटा है। मंचों पर भाषणों की गरमी है, प्रचार रथ दौड़ रहे हैं, लेकिन इस शोर में सबसे बड़ी कमी है- जनता के असली मुद्दों की आवाज़। राजनीति का यह शोर विकास की असली जरूरतों को दबा रहा है। बिहार जैसे राज्य में जहां गरीबी, बेरोजगारी, अपराध, और सामाजिक पिछड़ापन अब भी विकराल रूप में मौजूद हैं, वहां चुनावी विमर्श का इनसे विमुख होना चिंताजनक है। यह लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व चुनाव का विरोधाभास ही नहीं, दुर्भाग्य है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर क्यों बिहार चुनाव में कोई भी दल उन मुद्दों को ईमानदारी से नहीं उठा रहा जो सीधे-सीधे जनता के जीवन से जुड़े हैं? क्यों शराबबंदी, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, अपराध-माफिया शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे वास्तविक सवाल राजनीतिक एजेंडे से गायब हैं?

बिहार में शराबबंदी एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा रहा है। यह मुद्दा केवल कानून का नहीं, बल्कि नैतिकता, सामाजिक सुधार और जनजीवन की स्थिरता से जुड़ा हुआ है। शराबबंदी की सफलता या विफलता को लेकर जनता के मन में अनेक प्रश्न हैं, क्योंकि इस नीति ने जहां कई परिवारों को विनाश से बचाया, वहीं भ्रष्टाचार, अवैध तस्करी और पुलिसिया मनमानी को भी जन्म दिया। दिलचस्प यह है कि इस बार के चुनाव में लगभग सभी प्रमुख दल इस मुद्दे से दूरी बनाए हुए हैं। एनडीए खेमे के नेता खुलकर इस पर बोलने से बच रहे हैं। केवल प्रशांत कुमार जैसे कुछ नेता हैं जो पूर्ण शराबबंदी की पुनः स्थापना का नारा उठा रहे हैं। यह सवाल उठता है, अगर शराबबंदी सचमुच जनता के हित में थी, तो सत्ता पक्ष इससे डर क्यों रहा है? क्या यह स्वीकारोक्ति है कि कानून तो बनाया गया, लेकिन उसका क्रियान्वयन असफल रहा? शराबबंदी क्यों जरूरी है, उस महिला से पूछिये, जिसकी बिछुए शराब पीने से लिये उसके पति ने बेच दी। ऐसी त्रासद घटनाएं बिहार के जन-जन में देखने को मिलती है।

वैसे तो हर एक का जीवन अनेकों विरोधाभासों एवं विसंगतियों से भरा रहता है। हमारा हर दिन भी कई विरोधाभासों के बीच बीतता है। आज तो हमारी सारी नीतियों में, हमारे सारे निर्णयों में, हमारे व्यवहार में, हमारे कथन में विरोधाभास स्पष्ट परिलक्षित है। लेकिन बिहार चुनाव ऐसे विरोधाभास के कारण कथनी करनी के अंतर का अखाड़ा ही बनते हुए प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि हमारे जीवन में सत्य खोजने से भी नहीं मिलता। राजनेताओं एवं राजनीतिक दलों का व्यवहार दोगला हो गया है। उनके द्वारा दोहरे मापदण्ड अपनाने से हर नीति, हर निर्णय समाधानों से ज्यादा समस्याएं पैदा कर रहे हैं। चुनाव एवं चुनावी मुद्दें समस्याओं के समाधान का माध्यम बनने चाहिए, लेकिन वे समस्याओं को बढ़ाने का जरिये बनते रहे हैं। यही कारण है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, महिला-सुरक्षा, अपराध-नियंत्रण की प्राथमिकता के नारे हमारे लिए स्वप्न ही बने हुए हैं।

ये तो कुछ नमूने हैं जबकि स्वतंत्रता के 78 वर्ष बाद भी हमें अहसास नहीं हो रहा है कि हम स्वतंत्र हैं। राजनीतिक विरोधाभासों और विसंगतियों से उत्पन्न समस्याओं से हम आज़ाद नहीं हुए हैं। हमारे कर्णधारों के चुनावी भाषणों में आदर्शों का व्याख्यान होता है और कृत्यों में भुला दिया जाता है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि हम हर स्तर पर वैश्वीकरण व अपने को बाजार बना रहे हैं। अपने को, समय को पहचानने वाला साबित कर रहे हैं। पर हमने अपने आप को, अपने भारत को, अपने बिहार को, अपने पैरों के नीचे की जमीन को नहीं पहचाना। नियति भी एक विसंगति का खेल खेल रही है। पहले जेल जाने वालों को कुर्सी मिलती थी, अब कुर्सी पाने वाले जेल जा रहे हैं। यह नियति का व्यंग्य है या सबक? पहले नेता के लिए श्रद्धा से सिर झुकता था अब शर्म से सिर झुकता है। जिन्दा कौमें पांच वर्ष तक इन्तजार नहीं करतीं, हमने 15 गुना इंतजार कर लिया है। यह विरोधाभास नहीं, दुर्भाग्य है, या सहिष्णुता कहें? जिसकी भी एक सीमा होती है, जो पानी की तरह गर्म होती-होती 50 डिग्री सेल्सियस पर भाप की शक्ति बन जाती है। बिहार इस नियति से कब मुक्त होगा, यही इस चुनावों में विमर्श का सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए।

बिहार की सबसे बड़ी त्रासदी बेरोजगारी है। लाखों युवाओं के पास न काम है, न अवसर। हर चुनाव में इस पर वादे किए जाते हैं, लेकिन परिणाम लगभग शून्य रहते हैं। प्रदेश के नौजवान पलायन को मजबूर हैं, मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। चुनावी सभाओं में नौकरियों का झांसा तो मिलता है, लेकिन ठोस योजनाएं और नीतियां कहीं दिखाई नहीं देतीं। राजनीतिक दलों के पास न तो रोजगार सृजन की दीर्घकालिक योजना है, न शिक्षा और कौशल विकास को जोड़ने की कोई ठोस रणनीति। चुनावी भाषणों में ‘बिहार के विकास’ की बातें होती हैं, लेकिन युवा भविष्य की वास्तविक चिंता कहीं नहीं झलकती। बिहार में महिला सुरक्षा, अपराध और माफिया तंत्र का प्रश्न भी उतना ही ज्वलंत है। हाल के वर्षों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में लगातार वृद्धि हुई है। भूमि विवादों, रंगदारी और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधियों की गतिविधियाँ अब भी जारी हैं। मगर किसी भी दल की ओर से इन पर कोई ठोस नीति या वचन नहीं दिखाई देता।

राजनीतिक दल जानते हैं कि इन विषयों पर बात करना असुविधाजनक है, क्योंकि यह सीधा शासन व्यवस्था की विफलता को उजागर करता है। इसलिए वे इन पर मौन साधे हुए हैं। अपराध और महिला सुरक्षा पर चुप्पी बताती है कि सत्ता प्राप्ति की होड़ में संवेदनशीलता की कोई जगह नहीं बची है। बिहार की राजनीति आज भी जातीय समीकरणों और तुष्टिकरण की जकड़ में फंसी हुई है। विकास और सुशासन की बातें केवल नारों तक सीमित हैं। उम्मीदवार चयन से लेकर प्रचार तक, हर जगह जातीय गणित प्राथमिकता में है। परिणाम यह है कि मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं और वोट बैंक की राजनीति सर्वोच्च स्थान पा लेती है। विकास के नाम पर किए गए बड़े-बड़े दावे चुनाव बीतते ही धुंधले पड़ जाते हैं। गांवों में आज भी सड़कें टूटी हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, और प्रशासनिक तंत्र भ्रष्टाचार से ग्रस्त है। ऐसे में जब राजनीतिक दल मुद्दों पर संवाद करने के बजाय केवल आरोप-प्रत्यारोप में व्यस्त हों, तो जनता का विश्वास कमजोर पड़ना स्वाभाविक है।

आज बिहार को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो चुनाव को जन-कल्याण के दृष्टिकोण से देखे, न कि केवल सत्ता प्राप्ति की दौड़ के रूप में। शराबबंदी, रोजगार, अपराध-मुक्ति, महिला सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे बिहार राज्य की आत्मा हैं। इन्हें नज़रअंदाज़ करना, बिहार के भविष्य को अंधेरे में धकेलने जैसा है। विकास का अर्थ केवल सड़कें और पुल नहीं, बल्कि मानव विकास है, जहां हर व्यक्ति सुरक्षित, शिक्षित, रोजगारयुक्त और सम्मानजनक जीवन जी सके। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनता अब केवल नारों से नहीं, परिणामों से प्रभावित होती है। बिहार चुनाव हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या राजनीति अब केवल सत्ता का खेल बनकर रह गई है? क्या लोकतंत्र का मूल उद्देश्य जनसेवा अब खो गया है? जब जनता के असली मुद्दे, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा और सामाजिक न्याय, चुनावी भाषणों से गायब हो जाएं, तब यह लोकतंत्र के क्षरण का संकेत है।

जरूरत है कि राजनीतिक दल फिर से उन बुनियादी प्रश्नों पर लौटें, जिन पर बिहार का वर्तमान और भविष्य निर्भर करता है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो बिहार की जनता का यह चुनाव एक बार फिर केवल चेहरों और गठबंधनों का उत्सव बनकर रह जाएगा, जहाँ जनहित और जनसरोकार फिर से पीछे छूट जाएंगे। बिहार को नारों नहीं, नीतियों की राजनीति चाहिए और यह तभी संभव है, जब मुद्दों पर बात करने का साहस राजनीति में लौट आए।


(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

गोवर्ध्दन पूजा पशुधन, पर्यावरण, संस्कृति और समाज को बचाने का संदेश देती है

मुझे गोवर्द्धन पूजा का यह नाम बड़ा अच्छा लगता है। इसमें श्लेष अलंकार है। पर्वत की भी बात है और गौओं की भी। भारतीय प्रज्ञा पर्वत और गायों को एक दूसरे के विरोध में नहीं देखती, उनकी सहचारिता में देखती है। गो-वर्धन गायों का भी वर्धन है। भागवत में कृष्ण कहते हैं: ‘वार्ता चतु‌र्विधा तत्र वयं गोवृत्तयो’ कि आजीविका चार तरह की हैं:- कृषि, वाणिज्य, ब्याज और गोवृत्त। हमारी आजीविका गोवृत्त है- गाय के इर्द गिर्द घूमती है। कृष्ण कहते हैं कि हम तो ‘वनशैल निवासिनः’ हैं- वन और पर्वत ही हमारे घर हैं। फिर क्या होता है: गोधनानि पुरस्कृत्य गिरिं चक्रः प्रदक्षिणम् – गौओं को आगे करके गिरिराज की प्रदक्षिणा की जाती है।

गोवर्धन पर्वत भी भारत के उसी पवित्र भूगोल का हिस्सा है जिसमें गोचारण होता था। यह sacred geography हमारी संस्कृति की विशेषता है जिसमें नदियाँ पर्वत सब एक दिव्यत्व की आभा से जगमगाते हैं। एक पर्वत के रूप में गोवर्धन को गिरिराज कहा गया और हमारी संस्कृति हमें कभी गोवर्धन की तो कभी कामदगिरि की परिक्रमा सिखाती है। पर्वत हमारा पोषण करते हैं, इसीलिए गोवर्धन पूजा को अन्नकूट भी कहते हैं।

गोवर्धन पूजा की भागवत में आई कथा सिर्फ कृष्ण की चामत्कारिक शक्ति की कथा नहीं है। उस एलीगरी है जिसे आध्यात्मिक, नैतिक, पर्यावरणीय और आस्तिविक मनीषा की कितनी ही लेयर्स ने मिलकर बुना है। ईश्वर की एक उंगली अकेले ब्रज के लिए क्या, सारी दुनिया को बचाने के लिए पर्याप्त है। जब तक ईशानुकंपा का छत्र है, जीवन के सारे तूफानों और आपदाओं के विरुद्ध आपको एक शरण्य है। गोवर्धन उसी शरण्य का प्रतीक है, तब आप के अस्तित्व का भार, आपका योगक्षेम ईश्वर ही वहन करेगा। कृष्ण का यही अभिवचन है, हमारे कर्म- पर्वत को वही उठायेंगे।

यह प्रसंग यह भी संदेश देता है कि वर्षा आकाशीय कृपा से नहीं, अपनी पृथ्वी के पेड़-पर्वतों और पर्यावरण का सत्कार करने से होती है। आज जब हम देखते हैं कि हमारे पर्वतों का क्षरण हो रहा है, स्वयं गोवर्धन का क्षरण हो रहा है, लैंड स्लाइड्स हो रहे हैं, पर्वतों के पेड़ काट काट कर हमने उन्हें नंगा कर दिया है, क्लाउड बर्स्ट हो रहे हैं, तब हमें गोवर्धन पूजा के माध्यम से रेखांकित किये जा रहे संदेश की गंभीरता को समझना चाहिए। पर्वत पृथ्वी का गौरव हैं, वे सिर्फ geographical temenity नहीं हैं, वे पृथ्वी का स्वप्न हैं, पृथ्वी की महत्त्वाकांक्षा हैं।

राजेश जोशी जी की एक कविता है:
स्वप्न अगर आसमान में थे/ तो पहाड़ों के सबसे करीब थे / स्वप्न अगर लुककर बैठ गये थे / तो हमें विश्वास था/ वे पहाड़ों में कहीं छुपे होंगे/ हम स्वप्नों की खोज में गये थे/ पहाड़ों की ओर/ और हम जानते थे/ पहाड़ दोगले नहीं हुए हैं/ वे हमारी हिफाजत करते रहेंगे।

तो गोवर्धन ने ब्रजवासियों की रक्षा की थी। यह एक ग्रीन रिलेशनशिप है, हरित रिश्तेदारी। धर्मो रक्षति रक्षितः की तरह। आप पर्वतों की रक्षा करें, पर्वत आपकी करेंगे। कृष्ण ने इंद्र की पूजा की जगह गोवर्धन की पूजा की बात की – रिचुअलिज़्म की जगह नेचुरलिज़्म की। इंद्र अमूर्त हैं, intangible हैं, पर्वत प्रत्यक्ष हैं, पड़ोसी हैं।

विलियम ब्लेक की एक कविता थी:
Great things are done when men and mountains meet
This is not done by jostling in the street.

यह प्रसंग प्रकृति के साथ हार्मनी का प्रसंग है। यहां environmental stewardship को एक sacred duty माना गया। यह प्रसंग बताता है कि यूनिटी इन कम्युनिटी क्या होती है और कृष्ण की शरण्य से कैसे एक कलेक्टिव बांड पैदा होता है, तब जात-प्रतिष्ठा सब के भेद छोड़कर एक ईश्वर की छत्रछाया में सब जाते हैं। आज भारत की सामाजिक एकता का जो फ्रेग्मेंटेशन करने की कोशिश हो रही है, तब हमें कृष्ण की उस एक उँगली की शक्ति पर भरोसा करना है।

इस प्रसंग में कृष्ण भी हैं तो बाल गोपाल है, इसकी अबोधता ही, इसकी मासूमियत, इसकी निर्दोषता इन्द्र की cosmic forces पर भी भारी पड़ती है। बाल कृष्ण खेल खेल में गोवर्धन उठा लेते हैं, इसे ही जैसे बाल सीता ने खेल खेल में शिवजी का धनुष उठा लिया था। मतलब यह कि approach God as play, not puzzle.

अनिल कपूर की एक फिल्म भाई थी वे सात दिन। पर ब्रज के इन सात दिनों पर कोई फिल्म नहीं बनी है। कृष्ण लीला का यही तो आनंद है। एक उँगली minimal effort का प्रतीक है पर वह पहाड़ का भी बोझ उठा लेती है। जो असंभव था, ब्रजवासियों का प्यार और विश्वास उसे संभव बना देता है, उसे ईशकृपा संभव बना देती है, प्यार का प्रतिदान संभव बना देता है।

मैं गौ पूजक और कुकुर पूजक संस्कृति में लॉक और रूसो की सैद्धान्तिकी का द्वंद्व देखता हूँ। कुकुर पूजक संस्कृति में हर व्यक्ति के बारे में प्रारंभिक उपकल्पना एक चोर की, एक संदिग्ध व्यक्ति की है। कि वह inherently selfish, violent, competitive, nasty, brutish है जब तक कि अन्यथा नहीं प्रमाणित कर दिया जाता। प्रवेश करते ही कुत्ता सूँघ सूँघ कर बताता है कि आप निरापद हो। गौपूजक संस्कृति में अतिथि देवता है तो आप उसका स्वागत दूध और उससे बने द्रव्य या मिठाई से करते हो। यह रूसो की तरह है जो मनुष्य को inherently good, free, and compassionate मानता था।

आज का दिन गौपूजा का है।

(लेखक मप्र के चुनाव आयुक्त हैं और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं। वे धार्मिक विषयों पर वैज्ञानिक विवेचन के साथ कई पुस्तकें लिख चुके हैं)
 

भाई-बहन को समर्पित एक भावनात्मक त्यौहार

भ्रातृ द्वितीया (भाई दूज) कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक पर्व है जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं। यह दीपावली के दो दिन बाद आने वाला ऐसा पर्व है, जो भाई के प्रति बहन के स्नेह को अभिव्यक्त करता है एवं बहनें अपने भाई की खुशहाली के लिए कामना करती हैं। आज जबकि समाज रिश्तों की गर्माहट से दूर होता जा रहा है, जब व्यक्तिगत स्वार्थों और भौतिक लिप्साओं ने मानवीय संबंधों को हाशिये पर पहुँचा दिया है, तब भाई दूज का पर्व हमें रिश्तों की आत्मीयता, समर्पण और सुरक्षा के शाश्वत मूल्यों की याद दिलाता है। यह पर्व केवल एक पारंपरिक रिवाज नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस भावना का प्रतीक है, जहाँ भाई और बहन का संबंध केवल रक्त का रिश्ता नहीं, बल्कि आत्मीयता, श्रद्धा और अटूट विश्वास का जीवंत स्वरूप है। इस दिन भाई का बहन के घर भोजन करने का विशेष महत्व एवं लाभ है, उसे उत्तम भोजन समेत धन, सुख एवं खुशहाल जीवन की प्राप्ति भी होती रहती है। क्योंकि इसी तिथि को यमुना ने यम को अपने घर भोजन कराया था। कोई बहन नहीं चाहती कि उसका भाई दीन-हीन एवं तुच्छ हो, सामान्य जीवन जीने वाला हो, ज्ञानरहित, प्रभावरहित हो।

हिन्दू धर्म एवं परम्परा में पारिवारिक सुदृढ़ता, सांस्कृतिक मूल्य एवं आपसी सौहार्द के लिये त्यौहारों का विशेष महत्व है। इस त्यौहार को मनाने के पीछे की ऐतिहासिक कथा भी निराली है। पौराणिक आख्यान के अनुसार भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था। उनकी कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। यमुना ने अपने भाई यमराज को आमंत्रित किया कि वह उसके घर आकर भोजन ग्रहण करें, किन्तु व्यस्तता के कारण यमराज उनका आग्रह टाल जाते थे। यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसकी इच्छा को पूरा करना मेरा धर्म है। बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर उत्तम भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर दिया कि जो भी इस दिन यमुना में स्नान करके बहन के घर जाकर श्रद्धापूर्वक उसका सत्कार ग्रहण करेगा उसे व उसकी बहन को यम का भय नहीं होगा। तभी से लोक में यह पर्व यम द्वितीया के नाम से प्रसिद्ध हो गया। भाइयों को बहनों टीका लगाती है, इस कारण इसे भातृ द्वितीया या भाई दूज भी कहते हैं।

यह पर्व केवल यम और यमुनाजी की कथा तक सीमित नहीं है। भैया दूज भारत में कई जगह अलग-अलग नामों के साथ मनाई जाती है। बिहार में भिन्न रूप में मनाया जाता है, जहां बहनें भाईयों को खूब कोसती हैं फिर अपनी जबान पर कांटा चुभाती हैं और क्षमा मांगती हैं। भाई अपनी बहन को आशीष देते हैं और उनके मंगल के लिए प्रार्थना करते हैं। गुजरात में यह भाई बीज के रूप में तिलक और आरती की पारंपरिक रस्म के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट्र और गोवा के मराठी भाषी समुदाय के लोग भी इसे भाई बीज के तौर पर मनाते हैं। यहां बहने फर्श पर एक चौकोर आकार बनाती हैं, जिसमें भाई करीथ नाम का कड़वा फल खाने के बाद बैठता है। आज जब रिश्ते औपचारिकता बनते जा रहे हैं, भाई दूज हमें यह स्मरण कराता है कि सगे संबंधों को जीवित और प्रगाढ़ बनाए रखने के लिए केवल व्हाट्सएप संदेश या उपहार काफी नहीं होते, बल्कि आत्मीय मिलन, संवाद और सम्मान जरूरी है।

इस पूजा में भाई की हथेली पर बहनें चावल का घोल लगाती हैं। उसके ऊपर सिन्दूर लगाकर कद्दू के फूल, पान, सुपारी मुद्रा आदि हाथों पर रखकर धीरे-धीरे पानी हाथों पर छोड़ते हुए मंत्र बोलती हैं कि ‘गंगा पूजे यमुना को यमी पूजे यमराज को, सुभद्रा पूजा कृष्ण को, गंगा यमुना नीर बहे, मेरे भाई की आयु बढ़े’। एक और मंत्र है- ‘सांप काटे, बाघ काटे, बिच्छू काटे जो काटे सो आज काटे’। इस तरह के मंत्र इसलिए कहे जाते हैं क्योंकि ऐसी मान्यता है कि आज के दिन अगर भयंकर पशु भी काट ले तो यमराज भाई के प्राण नहीं ले जाएंगे। संध्या के समय बहनें यमराज के नाम से चौमुख दीया जलाकर घर के बाहर रखती हैं। इस दिन एक विशेष समुदाय की औरतें अपने आराध्य देव चित्रगुप्त की पूजा करती हैं। स्वर्ग में धर्मराज का लेखा-जोखा रखने वाले चित्रगुप्त का पूजन सामूहिक रूप से तस्वीरों अथवा मूर्तियों के माध्यम किया जाता हैं। वे इस दिन कारोबारी बहीखातों की पूजा भी करते हैं। यदि कोई बहन न हो तो गाय, नदी आदि स्त्रीत्व का ध्यान करके अथवा उसके समीप बैठ कर भोजन कर लेना भी शुभ माना जाता है।

भाई दूज रक्षाबंधन से इस मायने में भिन्न है कि जहाँ राखी में बहन रक्षा की कामना करती है, वहीं भाई दूज में वह अपने घर बुलाकर भाई की सेवा करती है और उसे भोजन कराती है। यह सेवा-संस्कृति भारतीय परिवार व्यवस्था की आत्मा रही है। यह उस अहं को तोड़ता है जो अक्सर पुरुष प्रधान मानसिकता से जन्म लेता है। यह उस संबंध को पुनः प्रतिष्ठित करता है जो केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि संवेदनात्मक और परस्पर समर्पित है। भैया दूज के बारे में प्रचलित कथाएं सोचने पर विवश कर देती हैं कि कितने महान उसूलों और मानवीय संवेदनाओं वाले थे वे लोग, जिनकी देखादेखी एक संपूर्ण परंपरा ने जन्म ले लिया और आज तक बदस्तूर जारी है। आज परंपरा भले ही चली आ रही है लेकिन उसमें भावना और प्यार की वह गहराई नहीं दिखायी देती। अब भैया दूज में भाई-बहन के प्यार का वह ज्वार नहीं दिखायी देता जो शायद कभी रहा होगा। इसलिए आज बहुत जरूरत है दायित्वों से बंधे भैया दूज पर्व का सम्मान करने की।

भाईदूज की परम्परा बताती हैं कि पहले खतरों के बीच फंसे भाई की पुकार बहन तक पहुंचती तो बहन हर तरह से भाई की सुरक्षा के लिये तत्पर हो जाती। आज घर-घर में ही नहीं बल्कि सीमा पर भाई अपनी जान को खतरे में डालकर देश की रक्षा कर रहे हैं, उन भाइयों की सलामती के लिये बहनों को प्रार्थना करनी चाहिए तभी भैया दूज का यह पर्व सार्थक बन पड़ेगा और भाई-बहन का प्यार शाश्वत एवं व्यापक बन पायेगा। भाईदूज की परंपरा उन परिवारों में भी संबंधों को फिर से जोड़ने का अवसर देती है जहाँ समय, दूरी या विचारों के मतभेद से भाई-बहन के रिश्ते कमजोर पड़ गए हैं। भोजन केवल स्वाद या अनुष्ठान नहीं है, बल्कि एक ऐसा माध्यम है जो भाई-बहन के बीच संवाद को फिर से शुरू करता है, पुराने किस्सों की स्मृति को ताजा करता है, और दिलों को जोड़ता है।

आज की पीढ़ी को यह समझने की जरूरत है कि पर्व केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय समाज की आत्मा हैं, जो रिश्तों को अर्थ देती हैं, संबंधों में संवाद पैदा करती हैं और संस्कृति को पीढ़ियों तक जीवित रखती हैं। भैया दूज यानी भाई-बहन के प्यार का पर्व। एक ऐसा पर्व जो घर-घर मानवीय रिश्तों में नवीन ऊर्जा का संचार करता है। भाई दूज केवल रस्म नहीं, रिश्तों का पुनर्जन्म है। आज जब समाज टूटन, तनाव और अलगाव से गुजर रहा है, भाई दूज जैसे पर्व रिश्तों के लिए एक सेतु बन सकते हैं — जो न केवल एक दिन का उत्सव हों, बल्कि जीवनभर के लिए संबंधों में स्थायित्व, मिठास और सुरक्षा भर दें।


(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

दीपावली के त्यौहारी मौसम में भारतीय अर्थव्यवस्था को लगे पंख

वैसे तो प्रतिवर्ष ही भारत में धनतेरस एवं दीपावली के शुभ अवसर पर भारतीय नागरिकों द्वारा विभिन्न उत्पादों विशेष रूप से स्वर्ण एवं चांदी के आभूषणों की खरीद को शुभ माना जाता है। अतः इस त्यौहारी मौसम में विभिन्न उत्पादों की भारत में बिक्री बहुत बढ़ जाती है। परंतु, इस वर्ष तो केंद्र सरकार द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों के चलते भारतीय बाजार में सोने एवं चांदी सहित विभिन्न उत्पादों की बिक्री में बेतहाशा वृद्धि दर्ज हुई है।

 

केंद्र सरकार द्वारा आयकर योग्य राशि की सीमा को बढ़ाकर 12 लाख कर दिया गया है। यदि आज किसी नागरिक की आय 12 लाख रुपए तक प्रतिवर्ष है तो उसकी आय पर आयकर नहीं लगने वाला है। साथ ही, वस्तु एवं सेवा कर की दरों को भी तर्कसंगत बनाया गया है जिसे जीएसटी2.0 का नाम दिया जा रहा है। अब 95 प्रतिशत से अधिक उत्पादों पर केवल 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत की दर से ही वस्तु एवं सेवा कर लागू होगा। पूर्व में, 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत एवं 28 प्रतिशत की दरें लागू होती थी। अब 12 प्रतिशत एवं 28 प्रतिशत की दरों को समाप्त कर दिया गया है। इससे उपभोक्ताओं को वस्तु एवं सेवा कर की दरों में लगभग 10 प्रतिशत तक का लाभ मिला है। चार पहिया वाहनों पर तो लगभग 60-70,000 रुपए प्रति वाहन तक  की बचत हुई है। इस तरह, इस वर्ष दीपावली के त्यौहारी मौसम में भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़े हुए उपभोग का सहारा मिला है।

भारतीय इतिहास में, दीपावली के त्यौहारी मौसम में, इस वर्ष सबसे अधिक रिकार्ड कारोबार सम्पन्न हुआ है। भारत में नागरिक अब बाजार में दुकानों पर आकर उत्पादों की पूछ परख कर ही उत्पादों की खरीद करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसी कारण से इस वर्ष के दीपावली त्यौहारी मौसम में भारतीय बाजारों में दुकानों पर बहुत अधिक भीड़ दिखाई दी है। कनफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) द्वारा सम्पन्न किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत के 35 नगरों के वितरण केंद्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस वर्ष लगभग 5.4 लाख करोड़ रुपए का व्यापार दीपावली के त्यौहारी मौसम में सम्पन्न हुआ है। वर्ष 2021 में इसी त्यौहारी मौसम में 1.25 लाख करोड़ रुपए, वर्ष 2022 में 2.50 लाख करोड़ रुपए, वर्ष 2023 में 3.75 लाख करोड़ रुपए एवं वर्ष 2024 में 4.25 लाख करोड़ रुपए का व्यापार सम्पन्न हुआ था। इस वर्ष अभी आगे आने वाले समय में गोवर्धन पूजा, भाई दूज, छठ एवं तुलसी विवाह आदि त्यौहार भी उत्साह पूर्वक मनाए जाने हैं। ऐसा अनुमान किया जा रहा है कि इस वर्ष इस दौरान भी लगभग 80,000 करोड़ रुपए का व्यापार सम्पन्न होने की प्रबल सम्भावना है। इस प्रकार इस वर्ष भारत में त्यौहारी मौसम में कुल व्यापार का आंकड़ा 6 लाख करोड़ रुपए से अधिक होने की प्रबल सम्भावना है, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में सम्पन्न हुए व्यापार के आंकडें की तुलना में 41 प्रतिशत अधिक है।

इस वर्ष भारत के नागरिकों में स्वदेशी उत्पाद खरीदने की होड़ सी रही हैं। इसी प्रकार, एक अनुमान के अनुसार, इस वर्ष धनतेरस त्यौहार के दौरान सोने चांदी के गहनों, सिक्कों एवं अन्य वस्तुओं के कारोबार का स्तर भी 60,000 करोड़ रुपए के आसपास रहा है। बाजार में हालांकि इस वर्ष सोने एवं चांदी के भाव आसमान छू रहे हैं। वर्ष 2024 की दीपावली पर सोने का भाव लगभग 80,000 रुपए प्रति 10 ग्राम था, जो इस वर्ष बढ़कर 130,000 रुपए प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया है, अर्थात लगभग 62 प्रतिशत अधिक। चांदी का भाव भी वर्ष 2024 में 98,000 रुपए प्रति किलोग्राम था जो इस वर्ष बढ़कर 180,000 रुपए प्रति किलोग्राम हो गया है, अर्थात लगभग 83 प्रतिशत अधिक। एक अन्य अनुमान के अनुसार, दीपावली के इस त्यौहारी मौसम में भारत में स्वर्ण एवं चांदी के आभूषणों की कुल मिलाकर 1.35 लाख करोड़ रुपए की बिक्री हुई है। भारतीय बाजारों में लगभग 46 टन सोने की बिक्री हुई है।

दीपावली के पावन पर्व पर इस वर्ष 600,000 वाहन एक दिन में बिके हैं। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शा रहा है। इससे यह भी सिद्ध हो रहा है कि है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत ही तेज गति से आगे बढ़ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डॉनल्ड ट्रम्प कह रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था डेड है, भारतीय अर्थव्यवस्था में लगातार तेज हो रही विकास दर अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों को झुठला रही है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 की प्रथम तिमाही, अप्रेल-जून 2025, में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.3 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर हासिल की है। जबकि, द्वितीय तिमाही जुलाई-सितम्बर 2025 में एवं तृतीय तिमाही अक्टोबर-दिसम्बर 2025 में भी भारतीय अर्थव्यवस्था के रिकार्ड स्तर पर आर्थिक विकास दर हासिल करने की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं। भारत में द्वितीय तिमाही में प्रारम्भ हुए त्यौहारी मौसम (दुर्गा उत्सव, दशहरा, धनतेरस एवं दीपावली, आदि) में विभिन्न उत्पादों की रिकार्ड वृद्धि दर्ज होती हुई दिखाई दी है। यह प्रवाह तीसरी तिमाही में भी जारी रहने की प्रबल सम्भावना दिखाई दे रही है क्योंकि त्यौहारी मौसम अभी इस अवधि  में भी जारी रहेगा जो 25 दिसम्बर (क्रिसमस) एवं 31 दिसम्बर (नव वर्ष) तक जारी रहेगा। साथ ही, शादियों का मौसम भी आने वाला है, इस मौसम में भारत में लाखों की संख्या में शादियां सम्पन्न होती हैं, और शादियों के इस मौसम में विभिन्न उत्पादों (स्वर्ण, चांदी, कार, टीवी, रेफ्रीजरेटर, एसी, आदि) की मांग में बेतहाशा वृद्धि दर्ज होती है। इस बीच भारत में धार्मिक पर्यटन भी अपने उच्चत्तम स्तर पर पहुंच गया है। अयोध्या, वाराणसी, चार धाम, वैष्णो देवी, महाकाल मंदिर, तिरुपति बालाजी, मीनाक्षी मंदिर आदि में लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। भारत में लगातार बढ़ रहे धार्मिक पर्यटन से भी उत्पादों का उपभोग बढ़ रहा है, जो अर्थव्यवस्था को गति देने में सहायक हो रहा है एवं रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित कर रहा है।

भारत में अब देश में ही निर्मित उत्पादों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, इस कार्य में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वदेशी अपनाने की अपील पर भारतीय नागरिक अपना भरपूर सहयोग कर रहे हैं। भारत में ही निर्मित उत्पादों के उपभोग का स्तर सकल घरेलू उत्पाद के 60-70 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसी कारण से भारत को देशीय उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था कहा जा रहा है। भारत में आंतरिक उपभोग के लगातार मजबूत होने के चलते भारत अब दुनिया के कई देशों के निवेशकों के लिए निवेश के केंद्र के रूप में उभर रहा है, क्योंकि भारत की 140 करोड़ आबादी इन निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। भारत में ही निर्मित किए जाने वाले उत्पादों के लिए भारत में ही बहुत बड़ा बाजार उन्हें उपलब्ध है। आगे आने वाले समय में भारत के वित्तीय एवं बैंकिंग क्षेत्र में 50,000 करोड़ रुपए से अधिक का विदेशी निवेश भारत में आने जा रहा है। अमेरिकी कम्पनी  ऐपल अपना पूरा उत्पादन सिस्टम भारत में ला रहा है एवं स्मार्ट मोबाइल फोन का भारत में उत्पादन कर उसे विश्व के अन्य देशों को भारत से निर्यात किया जाएगा।

भारत के विशाल बाजार को देखते हुए आज विश्व के कई देश भारत के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न करने के लिए लालायित दिखाई दे रहे हैं। भारत का अभी हाल ही में ओमान, कतर, यूनाइटेड किंगडम और यूरोप के चार देशों के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न हुआ है। यूरोपीयन यूनियन के साथ भी द्विपक्षीय व्यापार समझौता के सम्बंध में वार्ताएं सफलता पूर्वक आगे बढ़ रही हैं एवं इसके शीघ्र ही सम्पन्न होने की सम्भावना है। साथ ही, भारत और अमेरिका के बीच भी द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता नवम्बर 2025 तक सम्पन्न होने की सम्भावनाएं अब दिखाई देने लगी है। सम्भव है कि नवम्बर 2025 माह में अमेरिका के राष्ट्रपति डानल्ड ट्रम्प भारत आकार इस समझौते की घोषणा करें।

रूस के राष्ट्रपति श्री बलादिमिर पुतिन भी शीघ्र भारत आ रहे हैं और रूस के भारत के साथ व्यापार बढ़ाने पर जोर दिए जाने की प्रबल सम्भावना है। भारत अभी रूस से भारी मात्रा में कच्चे तेल का आयात कर रहा है एवं रूस को भारत से निर्यात होने वाले उत्पादों की मात्रा अभी बहुत कम है। इस तरह भारत का रूस के साथ व्यापार घाटा बहुत अधिक हो गया है। चीन के साथ भी भारत का व्यापार घाटा बहुत अधिक मात्रा में है, जिसे कम करने के लिए चीन के साथ भी भारत की बातचीत चल रही है।

कुल मिलाकर आगे आने वाले समय में भारत की आर्थिक विकास दर के तेज होने की प्रबल सम्भावना है, जो 10 प्रतिशत प्रतिवर्ष तक के आंकडें को भी छू सकती है।

 

प्रहलाद सबनानी

सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,

भारतीय स्टेट बैंक

के-8, चेतकपुरी कालोनी,

झांसी रोड, लश्कर,

ग्वालियर – 474 009

मोबाइल क्रमांक – 9987949940

ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com