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इंडियन ऑयल विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2025 में भारत ने जीते 22 पदक जीते जिनमें 6 स्वर्ण, 9 रजत और 7 कांस्य पदक

इंडियन ऑयल विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2025 रविवार को नई दिल्ली में संपन्न हो गई। इसमें 100 से ज्यादा देशों के 2200 से अधिक प्रतियोगियों ने 186 पदकों के लिए स्पर्धाओं में हिस्सा लिया। इस चैंपियनशिप की पहली बार मेजबानी कर रहे भारत ने अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए रिकॉर्ड 22 पदक जीते जिनमें 6 स्वर्ण, 9 रजत और 7 कांस्य शामिल हैं।

खेल जगत की जानीमानी हस्तियां महसूस करती हैं कि भारत विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2025 की मेजबानी करने के साथ ही उस मुकाम पर पहुंच गया जो अभिजात और स्थापित आयोजकों के लिए आरक्षित माना जाता है। सुप्रसिद्ध जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हो चुका है जिसमें पैरा एथलेटिक्स पदक स्पर्धा के रूप में शामिल था। लेकिन अनेक अंतरराष्ट्रीय पैरा एथलीट, विश्व चैंपियन और भारतीय खेलों के धुरंधर मानते हैं कि इस विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप ने किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता को बेदाग ढंग से आयोजित कर एक अलग ऊंचाई तक पहुंचाने की भारत की क्षमता को स्थापित किया है। भारत विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप की मेजबानी करने वाला कतर, संयुक्त अरब अमीरात और जापान के बाद चौथा एशियाई देश बन गया है।

भारत ने दुबई में 2019 में आयोजित विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 9 पदक जीते थे। उसने इस चैंपियनशिप में 2023 में पेरिस में 10 और 2024 में कोबे में 17 पदक प्राप्त किए। पैरालंपिक में भी भारत के पदकों की संख्या में उछाल देखने को मिला है। उसने पैरालंपिक में 2004 में एथेंस में सिर्फ 2 पदक जीते थे। लेकिन उसे 2016 में रियो डी जेनेरो में 4 और 2020 में टोक्यो में 19 पदक मिले। वर्ष 2024 के पेरिस पैरालंपिक में उसने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 29 पदक हासिल किए।

भारतीय पैरा एथलीटों के प्रदर्शन में यह जबर्दस्त सुधार उन्हें सरकार की ओर से मिल रहे सहयोग को प्रतिबिंबित करता है। विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2025 के पदक विजेताओं में सरकार की टारगेट ओलंपिक पोडियम योजना के 15 और खेलो इंडिया कार्यक्रम का एक एथलीट शामिल है। इस चैंपियनशिप में टारगेट ओलंपिक पोडियम योजना से 23 और खेलो इंडिया से 22 एथलीटों ने शिरकत की।

विश्व चैंपियनशिप की 6 बार की स्वर्ण विजेता और पैरालंपिक में तीन दफा पदक जीत चुकीं नीदरलैंड की फ्लूर जोंग ने भारतीय आतिथ्य और मेजबानों की गर्मजोशी की सराहना की। अपने दोनों पैर गंवा चुकीं फ्लूर ने लंबी कूद और 100 मीटर टी 64 श्रेणी में दो स्वर्ण पदक जीते।

फ्लूर जोंग ने कहा, ‘‘भारत में मेरा अनुभव शानदार रहा। अधिकारियों, स्वयंसेवियों, चिकित्साकर्मियों और होटलकर्मियों समेत सभी लोग बेहद खुशमिजाज और मदद के लिए हमेशा तैयार थे। इस चैंपियनशिप का आयोजन बहुत अच्छे ढंग से किया गया। जब भी मौका मिलेगा मैं फिर से भारत आना पसंद करूंगी।’’

पैरालम्पिक खेलों, एशियाई पैरा खेलों और विश्व चैंपियनशिप में अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता और अनुभवी प्रशासक दीपा मलिक ने कहा कि नागरिकों और सरकार दोनों को अब पैरा एथलीटों की उपलब्धियों को स्वीकार करना चाहिए।

दीपा ने आगे कहा कि उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि भारत विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप का इतना अच्छा आयोजन करेगा। उन्होंने आगे कहा, “एक एथलीट और एक प्रशासक के रूप में, मुझे यह कहते हुए बेहद खुशी हो रही है कि भारत ने 100 से ज़्यादा देशों की सफलतापूर्वक मेज़बानी की है और यह भारत में पैरा खेलों का अब तक का सबसे बड़ा समारोह है। यह न केवल भारत बल्कि वैश्विक मानचित्र पर भारतीयों के दिलों में जागरूकता और प्रेम पैदा करने वाला है। पिछली बार  बहु-राष्ट्र टूर्नामेंट में  पैरा स्पोर्ट्स का सबसे बड़ा जमावड़ा 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में हुआ था। आज खेलों के संगठन, अवसंरचना से लेकर आवास, वालंटियर और यात्रा आदि तक की स्थिति बिलकुल अलग है।”

दीपा ने कहा, “हां, भारत 2036 के लिए तैयार है और भारत नया समावेशी विकसित भारत है, जहां पैरा एथलीटों के लिए अपने सपनों को पूरा करने, आगे बढ़ने और अपने देश को गौरवान्वित करने के अपार अवसर हैं।”

विश्व चैंपियनशिप पदक विजेता एकता भयान और धरमबीर को प्रशिक्षित करने वाले पैरालंपिक पदक विजेता और कोच अमित सरोहा ने कहा कि विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप भारत में अब तक का सबसे अच्छा अंतरराष्ट्रीय आयोजन है और हमारा देश अब पैरालंपिक खेलों का आयोजन करने में सक्षम है।

अमित ने इसकी तुलना 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों से की, जब विभिन्न देशों से पैरा-एथलीट आए थे और भारत के खिलाड़ियों के साथ खेले थे। उन्होंने कहा, “यह भारत द्वारा आयोजित सबसे बड़ा पैरा खेल आयोजन है।  चार विश्व चैंपियनशिप और कई पैरालिंपिक खेलों में हिस्सा लेने के नाते, मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि एथलीटों को दी गई बुनियादी सुविधाओं, ठहरने, भोजन और परिवहन सुविधाओं की गुणवत्ता उन सर्वोत्तम सुविधाओं में से एक है जो अंतरराष्ट्रीय एथलीटों ने अन्य देशों में भी अनुभव की होंगी।” उन्होंने कहा, “इन खेलों की सफल मेजबानी के साथ, मुझे लगता है कि हम पैरालंपिक की मेजबानी के लिए पूरी तरह तैयार हैं और दुनिया ने अब यह देख लिया है।”

विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2025 खेलों के दौरान पुरुषों की भाला फेंक एफ64 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले और तीन बार के विश्व चैंपियन सुमित अंतिल ने कहा कि टारगेट ओलंपिक पोडियम योजना (टॉप्स) के माध्यम से मिले समर्थन से भारतीय पैरा एथलीटों की स्थिति में बहुत फर्क पड़ा है।

“टॉप्स की शुरुआत 2014 में हुई और यहीं से भारतीय एथलीटों के लिए सही दिशा में चक्र घूमने लगा। अंतर्राष्ट्रीय अनुभव से लेकर सोनीपत और गांधीनगर स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के केंद्रों में पैरा एथलीटों को सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षण सुविधाएँ देने के साथ साथ, उच्च-स्तरीय प्रशिक्षक, पोषण विशेषज्ञ, आहार और चोट से उबरने के तरीके सिखाये जाते हैं, जो राष्ट्रमंडल खेलों से पहले अनसुने थे। इससे हमारे प्रदर्शन में कई गुना सुधार हुआ है।”

भारत की अधिक प्रशंसा हुई।

लंबी कूद टी64 वर्ग में विश्व चैंपियन, जर्मनी के मार्कस रेहम ने कहा: “मैं भारत में दूसरी बार आया हूँ लेकिन मैंने यहां  हर पल का आनंद लिया। आतिथ्य बहुत अच्छा था और यहाँ के लोग बहुत मिलनसार हैं।”

नई दिल्ली में शॉटपुट स्पर्धा में विश्व चैंपियन जितने वाले कनाडा के ग्रेग स्टीवर्ट  ने कहा “भारतीय संस्कृति कनाडा की संस्कृति से बहुत अलग है लेकिन यहाँ का आतिथ्य अद्भुत है। स्टेडियम हो या शहर, मैं जहाँ भी गया, मुझे हर जगह गर्मजोशी भरा माहौल महसूस हुआ।”

अमेरिका के पैरा लॉन्ग जंपर डेरेक लोकिडेंट, जिन्होंने टी64 स्पर्धा में रजत पदक जीता, ने कहा, ” भारत, नई दिल्ली, में मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा,  मैं यहाँ एक सप्ताह से भी ज़्यादा समय से हूँ। खाने से लेकर पूरे खेलों का आयोजन बेहद शानदार रहा।”

सरकारी गलियारों में 1952 से गायब है भारत का असली कैलेंडर

कितने लोगों को पता है कि राष्ट्रीय प्रतीकों की ही भांति देश की सरकार ने अपना एक कैलेंडर भी मान्य किया है, जोकि अपने देश की प्राचीन पंचांग परंपरा पर आधारित है। पंडित नेहरू द्वारा प्रसिद्ध विज्ञानी मेघनाद साहा के नेतृत्व में बनाई गई कैलेंडर समिति ने अंग्रेजी कैलेंडर के स्थान पर भारत के परंपरागत पंचाग व्यवस्था पर आधारित सौर शक संवत् को अपनाने का सुझाव दिया था। सरकार ने कागजों में तो इसे मान्य कर लिया परंतु व्यवहार में अंग्रेजी संवत् ही प्रचलन में रहा और आज भी है। भारत में ब्रिटिश राज से पूर्व कालगणना के लिये सांवत्सर तथा चांद्र पंचांग दोनों प्रचलित थे। उनके आधार पर सौर मंडल की गतिविधियाँ, महीने, ऋतु, मौसम चक्र, साप्ताहिक हवाएँ, कृषि हेतु कार्य आदि जाने जाते थे। जन सामान्य के लिये चांद्र पंचांग अधिक सरल था क्योंकि चंद्रमा की स्थितियाँ प्रतिदिन देखी जा सकती थीं। यह प्रथा 18वीं शताब्दी तक चलती रही।

ब्रिटिश शासन के बाद देश में अंग्रेजी कैलेंडर लागू किया गया और भारतीय पंचांग को रद्द घोषित किया। अगले दो सौ वर्ष तक अर्थात् लगभग आठ पीढिय़ों तक हमारे व्यवहार ग्रेगॅरियन कैलेण्डर से ही चलते रहे। हालाँकि पंचांगों का गणित और छपाई कायम रहे, लोगों के पर्व-त्यौहार भी पुरानी गणनानुसार ही चलते रहे, लेकिन हर अगली पीढ़ी इसके बारे में थोडा-थोड़ा भूलने लगी थी। स्वयं को आधुनिक मानने वाले लोग पंचांग में निहित वैश्विक गणित को ठुकराने और उसे अंधविश्वास बताने में ही धन्यता मानने लगे। फिर भी देश में एक मण्डली थी जो पंचांगों का अध्ययन करने और अगले वर्ष के अचूक पंचांग को बनाने में कुशल थी। इनसे परे ऐसे सक्षम विद्वान भी थे जो पंचांग के गणित में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों का भान रखते हुए उपयुक्त सुधार कर सकते थे। श्री लोकमान्य तिलक, शंकर बालकृष्ण दीक्षित, माधवचंद्र चट्टोपाध्याय, संपूर्णानंद, पं मदनमोहन मालवीय, आदि ने पंचांगों की काल गणना में कई सुधार किए। इससे ज्ञात होता है कि भारत में पंचांगों की समझ व परंपरा कितनी गहराई से समाहित है।

वर्ष 1947 में ब्रिटिश राज से मुक्त होने पर भारत ने अंगरेजी प्रतीकों को दूर करते हुए राष्ट्रीय प्रतीकों को अपनाया। उदाहरण स्वरूप राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान आदि। उस समय देश का एक अपना राष्ट्रीय कैलेंडर हो, यह विचार भी सामने आया। उन दिनों भारत में लगभग तीस विभिन्न पंचांग पद्धतियाँ थीं। उनका अध्ययन कर पूरे देश के लिये एक राष्ट्रीय कैलेंडर बनाने हेतु संसद ने एक समिति गठित की। इसके पीछे यह भावना थी कि पूरे भारत में एक ही कैलेंडर हो जिसमें भारतीयों की अस्मिता व एकात्मता का दर्शन हो।

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के सुझाव पर सीएसआईआर अर्थात् वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान काउन्सिल ने यह अध्ययन करने हेतु नवंबर 1952 में कैलेंडर सुधार समिति का गठन किया। प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री डॉ मेघनाद साहा इस समिति के अध्यक्ष थे। इसके अन्य सदस्य थे —

1) प्रो. ई सी बनर्जी (इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति)
2) डॉ. ए एल दप्तरी (बी.ए., बी.एल., डी.एल.टी., नागपुर)
3) श्री बी. सी. करंदीकर (संपादक, केसरी, पुणे)
4) डॉ. गोरख प्रसाद (गणित विभाग के प्रमुख, इलाहाबाद विश्वविद्यालय)
5) प्रो आर वी वैद्य (माधव कॉलेज, इलाहाबाद)
6) श्री एन सी लाहिड़ी (पंचांगकर्ता, कलकत्ता)
ये सभी पंचांग से संबंधित विभिन्न मुद्दों के विशेषज्ञ थे।

समिति की सिफारिशों और उनके द्वारा बनाए गए भारतीय सौर कैलेंडर को स्वीकारते हुए भारत सरकार ने इसे 22 मार्च 1957 अर्थात् एक चैत्र 1879 सौर शक इस भारतीय सौर दिनांक से लागू किया। सभी आधिकारिक राजपत्र और राजनीतिक पत्राचार में और विशेष रूप से विदेशों के साथ किए गए समझौतों पर भारतीय सौर दिनांक लिखने पर ही वे वैध माने जाते हैं। रिजर्व बैंक ने भी सभी बैंकों को सौर दिनांक अंगीकार करने हेतु आदेश दिये हैं। यदि आप बैंक लेन-देन में सौर दिनांक का प्रयोग करते हैं तो बैंक उस दस्तावेज को अस्वीकार नहीं कर सकता है। ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब उनके अस्वीकार करने पर रिजर्व बैंक और ग्राहक मंच ने उन पर आर्थिक दण्ड लगाया है।

अब आइए, समिति द्वारा राष्ट्रीय कैलेंडर बनाने हेतु उपयोग में लाये सूत्रों को देखें। समिति पर देश में प्रचलित सारे पंचांगों की जांच करके एक वैज्ञानिक दिनदर्शिका बनाने का दायित्व था। समिति ने विभिन्न पंचागकर्ताओं से और देश की जनता से अपने विचार साझा करने का आग्रह किया। समिति को कुल 60 पंचांग और कई सुझाव प्राप्त हुए। उन सभी का अध्ययन करते हुए समिति ने एक अधिकारिक राष्ट्रीय सौर कैलेंडर बनाया। इसे समझना आवश्यक है।

आकाश में सूर्य के दो भासमान भ्रमण हैं – दैनिक और आयनिक जो पृथ्वी के भ्रमण के कारण हैं। पृथ्वी अपनी धुरी पर रोज एक चक्र पूरा करती है जिस कारण सूर्य रोज पूरब से उगता और संध्या में अस्त होता दिखता है। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर भी एक दीर्घ वृत्ताकार पथ पर परिक्रमा करती है जिससे सूर्य भी आकाश मार्ग में ग्रहों के मध्य भ्रमण करता दिखता है। सूर्य प्रतिदिन एक अंश चलता है और लगभग 365 दिनों में आकाश की एक प्रदक्षिणा पूरी करता है। इसे सूर्य की आयनिक गति तथा भासमान मार्ग को आयनिक वृत्त कहा जाता है। परन्तु दीर्घवृत्त पर परिक्रमा करती पृथ्वी का तल और अक्ष पर घूमती पृथ्वी की धुरी के बीच समकोण न होकर 23 अंश का कोण होता है। इस कारण आयनिक वृत्त और खगोलीय विषुव का वृत्त अलग अलग हैं और वे दोनों एक दूसरे को दो बिंदुओं पर काटते हैं। 22 मार्च व 23 सितम्बर को सूर्य इन बिंदुओं पर आता है, तब पृथ्वी पर दिनमान और रात्रिमान समान अर्थात् 12 -12 घंटो के होते हैं। 22 मार्च को वसंत संपात तथा 23 सितम्बर को शरद संपात कहते हैं। सांवत्सरिक गणना में वसंत संपात या विषुव, अर्थात् 22 मार्च सबसे महत्वपूर्ण है जब दिन और रात्रि समान होते हैं। अत: राष्ट्रीय कैलेंडर में 22 मार्च से वर्षारंभ होता है। चांद्र पंचांगानुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वर्षारंभ होता है जो कि 22 मार्च के आस पास पड़ती है। इसी कारण समिति ने 22 मार्च को सौर चैत्र एक नाम दिया।

आयनिक वृत्त पर चलता हुआ सूर्य 22 मार्च के बाद खगोलीय विषुव की तुलना में उत्तरावर्ती होते होते 22 जून को चरम उत्तर में आता है। उस दिन तक उत्तरायण होता है। वहाँ से सूरज दक्षिण की ओर यात्रा करने लगता है। लेकिन 23 सितम्बर तक वह रहेगा विषुव के उत्तर में ही। 23 सितंबर अर्थात शरद संपात के दिन सूरज फिर से विषुव बिंदु पर आता है जिससे दिन और रात समान होते हैं। वहां से सूर्य विषुव के दक्षिण में यात्रा करता है, और 23 दिसंबर को चरम दक्षिण पहुँचता है। तब फिर से उसकी उत्तरायण यात्रा आरंभ होती है। यदि हम सूर्योदय के समय सूर्य को देखने का स्वभाव बना लें तो हम देख सकते हैं कि 22 मार्चके बाद सूर्य के उगने का स्थान उत्तर की ओर खिसकता है, 22 जून से वह वापस पूरब आने लगता है, 23 सितम्बर तक ठीक पूरब में होगा, वहाँ से दक्षिण की ओर चलता है और 22 दिसम्बर से फिर पूरब की ओर मुडऩे लगता है।

सूर्य की यह नियमित और निरंतर भासमान गति है। उसी को आधार बनाकर सौर कैलेण्डर निर्माण समिति ने इन चार दिनों को महत्वपूर्ण बताया और उन्हीं से चार मासारंभ तथा महीनों के दिन निर्धारित किये।

 इस प्रकार एक चैत्र है 22 मार्च, वसंत संपात। महीनों के दिन चैत्र -30, वैशाख -31, ज्येष्ठ -31
एक आषाढ है 22 जून, दक्षिणायनारंभ । महीनों के दिन आषाढ, श्रावण, भाद्र प्रत्येक के 31
एक अश्विन है 23 सितंबर, शरद संपात। महीनों के दिन आश्विन, कार्तिक, अगहन प्रत्येक के 30
एक पौष है 22 दिसंबर, उत्तरायणारंभ। महीनों के दिन पौष, माघ, फाल्गुन प्रत्येक के 30 दिन।

इस प्रकार उत्तरायण के 185 तथा दक्षिणायन के 180 दिन होंगे। जो अंग्रेजी का लीप इयर होगा, उस वर्ष का चैत्र मास 21 मार्च से आरंभ होगा और उसके 31 दिन होंगे, जैसा इसी वर्ष 2020 में हो रहा है। इस विभाजन के पीछे एक वैज्ञानिक कारण है। पृथ्वी सूर्य की प्रदक्षिणा में दीर्घवृत्त में घूमती है, विशुद्ध गोलाकार वृत्त में नहीं। दीर्घवृत्त में दो केंद्रक बिंदु होते हैं। सूर्य इनमें से एक बिंदु पर स्थित है। अपनी कक्षा में घूमती पृथ्वी जब सूरज के करीब अर्थात उपसूर्य स्थिति में यानी सूर्य के निकट होती है, तो उसकी गति अधिक होती है। जब पृथ्वी अपसूर्य क्षेत्र में (सूर्य से दूर) होती है, तब उसकी गति कम होती है। इसीलिए, वसंत संपात से शरद संपात की यात्रा में पाँच दिन अधिक लगते हैं।

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि नाम पूरे भारत में प्रचलित हैं, इस कारण समिति ने यही नाम अपनाये। कैलेंडर सुधार समिति द्वारा बनाई गई इस नई कालदर्शिका को सरकार ने एक चैत्र 1879 यानी 22 मार्च, 1957 से अपनाया और निम्नानुसार तय किया

1) सभी भारतीय गजेटों में पहले भारतीय दिनांक को व उसके साथ अंग्रेजी तारीख को भी प्रिंट किया जाएगा।
2) आकाशवाणी पर और अब दूरदर्शन पर भी दिनांक की घोषणा में भारतीय व अंगरेजी दोनों की घोषणा होगी।
3) सरकारी कैलेंडर पर भारतीय मिती को बड़े व अंग्रेजी तारीखों को छोटे आकार में प्रदर्शित किया जाएगा।

इस प्रकार संवैधानिक रूप से स्वीकृत कैलेंडर को लागू किये आज 62 वर्ष बीतने पर भी भारतीय मानस में इसका प्रचार बिलकुल नहीं किया गया। इसीलिए कैलेंडर को बनाने का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। भारतीय पंचांग नक्षत्रों, महीनों, ऋतु आदि की शास्त्रीय नींव पर आधारित होता है जिससे प्रकृति संबंधी जानकारियाँ अपने आप जनमानस को पता चल जाती हैं। परन्तु सौर कैलेण्डर के विकल्प में ग्रेगोरियन कैलेंडर का उपयोग करना जारी रखने के कारण राष्ट्रीय सौर कैलेंडर भी वैसा ही उपेक्षित रहा, जैसा अंग्रेजी भाषा के विकल्प के कारण सभी भारतीय भाषाएँ उपेक्षित रहीं। इसे प्रचार में लाने हेतु जनता को जागरूक करने की आवश्यकता है।

कहाँ तो एक ओर राष्ट्रीय दिनदर्शिका की वैज्ञानिकता को समझते हुए डॉ. साहा समिति ने संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से इस कैलेंडर को विश्व स्तर पर फैलाने की इच्छा देश के सम्मुख व्यक्त की थी और कहाँ भारत में ही लोगों को इसके विषय में बताना पड़ रहा है। अत: सौर दिनदर्शिका तभी सार्थक होगी जब सारे भारतीय इसे अपनाने का निर्णय लें।

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(लेखिका सेवानिवृत्त  आईएएस अधिकारी हैं और भारतीयता व संसक्ृति से जुड़े विषयों पर लेखन करती हैं)
 
साभार- https://www.bhartiyadharohar.com/ से

अंतर्राष्ट्रीय काव्य संस्था का राज्य स्तरीय वार्षिकोत्सव सम्पन्न

कोटा 6 अक्टूबर / संस्थापक डॉ नरेश नाज द्वारा स्थापित अंतरराष्ट्रीय काव्य संस्था, महिला काव्य मंच (मन से मंच तक )”की राज्य स्तरीय वार्षिकोत्सव राजस्थान इकाई का  का वार्षिक समारोह रविवार को कोटा में आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि  वैश्विक सलाहकार डॉ सुमन सखी दहिया रही जबकि अध्यक्षता सुनीता अग्रवाल ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ हुआ।
अतिथियों का माला, शाल व श्रीफल से स्वागत किया । श्रीमती वंदना शर्मा ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। भीलवाड़ा इकाई की आरती जोशी द्वारा संस्था का ध्येय गीत प्रस्तुत किया । राजस्थान इकाई की महासचिव श्रीमती स्नेह लता शर्मा द्वारा मंचासीन  अतिथियों का संक्षिप्त परिचय दिया गया ।कार्यक्रम संयोजिका राजस्थान इकाई की अध्यक्ष श्रीमती सुनीता अग्रवाल ने संस्था का परिचय दिया ।

भीलवाड़ा इकाई सदस्यों के द्वारा काव्य पाठ ने हाल में समा बांध दिया। संचालन कोटा इकाई के अध्यक्ष रीता गुप्ता ने किया । जयपुर की इकाई द्वारा काव्य पाठ ने हाल को तालियां से गुंजा दिया ,तो राजसमंद से आई सदस्य ने हाल को वाह वाह कहने पर मजबूर कर दिया । कोटा इकाई की आयोजक ने  काव्य पाठ में खूब दाद बटोरी । मेरी लेखनी में ढूंढे से भी श्रृंगार नहीं पाओगे ,जहां सुलगता प्रश्न खड़े हैं अंगार ही खिल पाएगा,।  नारी तू नारायणी करती दुष्ट संहार ,सौम्यता की प्रतिमूर्ति,क्यों बदलाअपना रूप मेरे देश में छाया है संकट का घना जाल,  कोई तो राम कृष्ण़ बन कर दिखाओ  कमाल–, अंतर्राष्ट्रीय महिला काव्य मंच हमारा , सब मंचों से न्यारा, कोई राम कोई कृष्णा,रावण, कोई देश के प्रति अपने हृदय के भावों को प्रकट कर रहा था इनकी कविताओं से हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था । डॉ .सुशीला जोशी ने “अंतरराष्ट्रीय काव्य मंच हमारा ,क्या मैंने कुछ झूठ कहा” कविता पर खूब तालियां बटोरी। सदस्यों के का पाठ के साथ –  साथ भीलवाड़ा, जयपुर ,राजसमंद और कोटा इकाई के अध्यक्षों का पाठ काव्य पाठ हुआ जिसमें सभी के काव्य पाठक को खूब सराहा गया।
प्रदेश अध्यक्ष सुनीता अग्रवाल ,उपाध्यक्ष राजश्री रतवा, प्रदेश महासचिव स्नेह लता शर्मा, सचिव पुष्पा पालीवाल  के काव्य पाठ के उपरांत सभी प्रतिभागियों को मोमेंटो व प्रमाण पत्र मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष द्वारा प्रदान किए गए।
मुख्य अतिथि सुमन सखी दहिया ने अपने उद्बोधन में कहा नारी घर में रहती है अपने भावों को एकत्र करती रहती है पर उसे कोई नहीं सुनता उन्हें  मंच देना ही हमारे मंच का उद्देश्य है कि महिलाएं अपने मन के उद्गगार को इस मंच पर प्रकट कर के अपने आप को हल्का महसूस करें यही हमारा मुख्य उद्देश्य है।
कार्यक्रम अध्यक्ष  सुनीता अग्रवाल ने ,मेरी वसीयत संस्कारों से भरी पोटली है तुम्हें सोंप जाऊंगी ,बांट लेना सब मिलकर ,कविता सुना कर खूब दाद बटोरी।  इस अवसर पर सुनीता अग्रवाल ने कोटा  इकाई को सर्वश्रेष्ठ इकाई  घोषित किया।
कोटा इकाई की ओर से साहित्य और संस्कृति  पर वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता भी आयोजित की गई।  प्रतियोगिता में 32 महिलाओं ने भागीदारी निभाई। इसमें प्रथम स्थान डॉ मधु सनाढ्य , द्वितीय स्थान डॉ वैदेही गौतम व तृतीय स्थान प्रार्थना के रहने पर उन्हें पुरस्कृत किया गया।
 कोटा इकाई  की अध्यक्ष श्रीमती रीता गुप्ता दने आभार व्यक्त किया ।मंच का संचालन डॉक्टर वैदेही गौतम द्वारा किया गया। इस अवसर पर कोटा इकाई की सभी सदस्यों ने पूर्ण रूप से अपनी भागीदारी निभाई ।

वह बक्से में बंद होकर हवाई जहाज में गया और कई दिन तक गोदाम में पड़ा रहा

1964 में, 19 साल का एक ब्रिटिश नौजवान ब्रायन रॉब्सन, जो ऑस्ट्रेलिया में रहता था वो अपने देश ब्रिटेन वापस लौटन चाहता था, वापसी के लिए उसने एक साहसी और बेहद खतरनाक योजना बनाई। उसके पास हवाई जहाज का टिकट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उसने एक अनोखा हल निकाला उसने खुद को एक लकड़ी के बक्से बंद कर डाक के जरिए घर भेजने का प्लान बनैया। इस काम में उसके दो दोस्तों ने उसकी मदद की उन्होने लकड़ी का एक बड़ा बक्सा बनाया, जिसमें वह फिट हो सके, उसमें जरूरी चीजें रखीं।

एक तकिया, एक छोटा सूटकेस, एक टॉर्च, एक पानी की बोतल, और एक डिब्बा। योजना के अनुसार उसे Qantas की फ्लाइट में लगेज के रूप में सवारी करना था, 36 घंटे की इस यात्रा में उसने अंधेरे और खामोशी को सहन करते हुए यात्रा की।

शुरुआत में योजना काम करती दिखी। रॉब्सन को एक फ्लाइट में लोड कर दिया गया, लेकिन रूट में गलती के कारण वो बॉक्स लंदन के बजाय लॉस एंजिल्स पहुंच गया। लॉंच एंजिल्स में वो बक्सा को कई दिनों तक एक गोदाम में पड़ा रहा। वो जगह बेहद तंग थी, जहां ऑक्सिजन की कमी थी बिना भोजन, ऑक्सीजन के रॉब्सन को बहुत तकलीफ होने लगी।

हाइपोथर्मिया ने उसे जकड़ लिया, पानी की कमी ने उसे कमजोर कर दिया, और असहनीय खामोशी व अंधेरे ने उसकी इच्छाशक्ति को लगभग तोड़ दिया। घंटों तक इस तरह बंद रहने के कारण बेहोशी छाने लगी, ये पक्का नहीं थी की कब उसे मुक्ती मिलेगी। आखिर में गोदाम कर्मचारियों ने बक्सा खोला, तो उन्होंने एक कांपते, लगभग बेहोश एक युवक को पाय वो बहुत हैरान और डरा हुआ था और लेकिन वो भाग्यशाली था वो अभी ज़िंदा था।

पूछताछ के बाद, उन्होंने उसे सख्त चेतावनी के साथ छोड़ दिया गया यह कहानी दुनिया भर में सुर्खियों में छा गई और खासकर लॉस एंजिल्स में तेजी से फैली गई, जहां “बक्से में लड़के” की अजीब कहानी ने जनता को मंत्रमुग्ध कर दिया। आश्चर्यजनक रूप से, रॉब्सन बच गया और अंतत घर लौट आया। वर्षों बाद, उसने अपनी इस रोमांचक यात्रा को द क्रेट एस्केप नामक किताब में बयान किया, जो 20वीं सदी की सबसे विचित्र यात्रा कहानियों में से एक का प्रत्यक्ष विवरण है।

साभार – https://www.facebook.com/share/1DPmDppvrg/ से

शिक्षा युद्ध मानसिकता को बदलने का सशक्त माध्यम बने

विश्व शिक्षक दिवस- 5 अक्टूबर, 2025

विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में मनाया जाता है। इस दिन आध्यापकों को सामान्य रूप से और कतिपय कार्यरत एवं सेवानिवृत्त शिक्षकों को उनके विशेष योगदान के लिये सम्मानित किया जाता है। इसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा साल 1966 में यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की उस संयुक्त बैठक को याद करने के लिये मनाया जाता है, जिसमें शिक्षकों की स्थिति पर चर्चा हुई थी और इसके लिये सुझाव प्रस्तुत किये गये थे। इस दिवस को 1994 के बाद से प्रतिवर्ष लगभग 100 से अधिक देशों में मनाया जा रहा है और इस प्रकार वर्ष 2025 में यह 33वाँ विश्व शिक्षक दिवस होगा। इस साल की थीम है – ‘शिक्षण को सहयोगी पेशे के रूप में फिर से परिभाषित करना।’ इसका मतलब है कि पढ़ाई सिर्फ एक व्यक्ति का काम नहीं होना चाहिए।

शिक्षक आपस में मिलकर अनुभव शेयर करें, नई तकनीकें अपनाएं और मिलकर शिक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाएं। इस तरह शिक्षक न सिर्फ अपने पेशे में संतुष्ट रहेंगे, बल्कि छात्रों को भी बेहतर शिक्षा मिल सकेगी। इस साल का संदेश यही है कि शिक्षा को सुधारने के लिए शिक्षण को व्यक्तिगत प्रयास से ऊपर उठाकर साझेदारी और सहयोग का पेशा बनाना होगा। जब शिक्षक मिलकर विचार साझा करेंगे और जिम्मेदारियां बांटेंगे, तभी शिक्षा अधिक प्रभावी और प्रेरक बन पाएगी। शिक्षक सिर्फ ज्ञान देने वाले नहीं होते, बल्कि वे समाज में नवाचार, समानता और परिवर्तन के बीज बोते हैं। वे बच्चों को सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस सिखाते हैं, शिक्षक ही दुनिया में शांति एवं सह-जीवन का प्रभावी सन्देश दे सकते हैं। शिक्षक को पर्याप्त सम्मान, सहयोग और अवसर मिलें तो शिक्षा के माध्यम से एक आदर्श समाज-व्यवस्था एवं शांति की विश्व-संरचना स्थापित की जा सकती है। 2025 में विश्व शिक्षक दिवस की सबसे बड़ी सभा अदीस अबाबा, इथियोपिया में आयोजित हो रही है।

विश्व शिक्षक दिवस केवल एक औपचारिकता या शिक्षकों का अभिनंदन करने का अवसर भर नहीं है, बल्कि यह अवसर है शिक्षा की दिशा और दशा को लेकर गहन चिंतन करने का। यह अवसर है यह विचारने का कि आज शिक्षा क्या दे रही है और क्या उसे देना चाहिए। यह अवसर है यह पूछने का कि आज की शिक्षा व्यवस्था केवल नौकरी, व्यवसाय और उपभोग की भूख को बढ़ाने का साधन क्यों बन गई है, क्यों उसमें जीवनमूल्य, नैतिकता, शांति, सहअस्तित्व और अहिंसा जैसे आधारभूत तत्व लुप्त होते जा रहे हैं। यदि शिक्षा का ध्येय केवल ज्ञानार्जन या रोजगार प्राप्ति है तो वह अधूरी है। शिक्षा का परम ध्येय है – मनुष्य को मनुष्य बनाना, उसे सह-अस्तित्व, अमन और अयुद्ध की स्थितियों के प्रति उन्मुख करना।

आज दुनिया भय, हिंसा, युद्ध और तनाव के घेरे में है। तकनीक और विज्ञान ने सुविधाएं दी हैं, लेकिन उसके साथ शस्त्र-प्रतिस्पर्धा, परमाणु हथियारों का अंबार, और हिंसक प्रवृत्तियां भी दी हैं। इस भयावह परिदृश्य में शिक्षा का दायित्व केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रह सकता। शिक्षा को एक आंदोलन बनना होगा, एक वैश्विक अभियान बनना होगा, जो शांति, अहिंसा और अयुद्ध की भावना को संस्कार के रूप में हर हृदय में स्थापित करे। आज की शिक्षा व्यवस्था पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति से प्रभावित होकर स्पर्धा, लाभ और अहंकार की मानसिकता पैदा कर रही है। बच्चे स्कूल और कॉलेजों में डिग्री तो प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन उनके भीतर करुणा, दया, सत्य, मैत्री और सहयोग जैसे गुणों का विकास नहीं हो रहा। समाज का ढांचा शिक्षा से निर्मित होता है, यदि शिक्षा अधूरी है तो समाज भी अधूरा रहेगा। अतः एक ऐसी नई शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है, जिसमें विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ अध्यात्म और नैतिकता का संगम हो, जिसमें ‘आत्मा की आवाज़’ सुनी जा सके, जिसमें शिक्षा केवल बुद्धि का पोषण न होकर हृदय और संवेदनशीलता का भी निर्माण करे।

मानवता का सबसे बड़ा संकट युद्ध और हिंसा है। युद्ध केवल सेनाओं के बीच नहीं होता, बल्कि वह हमारे विचारों में, हमारी इच्छाओं में और हमारी संस्कृति में पलता है। शिक्षा का कार्य है इस युद्ध-मानसिकता को बदलना। शिक्षा को बच्चों और युवाओं के मन में यह स्थापित करना होगा कि शक्ति का वास्तविक स्वरूप हिंसा में नहीं, बल्कि अहिंसा में है। युद्ध में नहीं, बल्कि शांति में है। महात्मा गांधी ने कहा था – “यदि हमें शांति चाहिए तो हमें बच्चों को शांति की शिक्षा देनी होगी।” यह शिक्षा केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा न होकर व्यवहार का हिस्सा बने। शिक्षक स्वयं शांति के प्रतीक हों, वे अपने आचरण और जीवन से यह संदेश दें कि संघर्ष का समाधान हथियारों से नहीं, संवाद और सहमति से होता है।

शिक्षा को केवल सरकारी योजनाओं या संस्थागत ढांचे पर नहीं छोड़ देना चाहिए। इसे एक आंदोलन के रूप में चलाने की आवश्यकता है। यह आंदोलन अहिंसा का शिक्षण कराए, संवाद की संस्कृति विकसित करे, मानवता को जाति-धर्म और राष्ट्र की सीमाओं से परे प्राथमिकता दे, पर्यावरण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता पैदा करे और सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करे। यह आंदोलन तभी सफल होगा जब शिक्षक अपनी भूमिका को समझेंगे और केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि जीवन की दिशा दिखाने वाले बनेंगे। वे दीपक की तरह स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश दें। उनके व्यक्तित्व में सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, करुणा और सेवा का भाव झलके। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम न पढ़ाए, बल्कि जीवन पढ़ाए। एक विचारक ने कहा है – “शिक्षक वह नहीं है जो तुम्हें तथ्यों का ज्ञान कराए, बल्कि वह है जो तुम्हें सोचने के लिए प्रेरित करे।” इसके लिये केवल शिक्षा-क्रांति ही नहीं, बल्कि शिक्षक-क्रांति अपेक्षित है।

आज आवश्यकता है कि शिक्षक बच्चों के हृदय को छूने वाले बने, वे केवल करियर बनाने की चिंता न करें, बल्कि चरित्र बनाने का प्रयास करें। शिक्षा रोजगारपरक ही नहीं, जीवनपरक हो। यदि दुनिया में शांति चाहिए, यदि आतंकवाद, हिंसा और युद्ध को समाप्त करना है तो हमें शिक्षा की दिशा बदलनी होगी। शांति और अहिंसा के बीज बचपन में बोने होंगे। अयुद्ध की स्थितियां केवल समझौते से नहीं, बल्कि संस्कार से पैदा होती हैं। शिक्षा को संस्कार की धारा बनना होगा। नए युग की शिक्षा व्यवस्था को यह संकल्प लेना होगा कि वह ऐसे मनुष्य तैयार करेगी जो भौतिक समृद्धि में ही नहीं, आध्यात्मिक ऊंचाई में भी आगे हों। जो हथियार न बनाएँ, बल्कि हाथों में करुणा और सहयोग का दीपक थामें। जो दूसरों के शोषण पर नहीं, बल्कि साझा सुख पर विश्वास करें।

विश्व शिक्षक दिवस हमें यह याद दिलाता है कि शिक्षा केवल शिक्षकों और छात्रों की बात नहीं है, यह समूची मानवता का प्रश्न है। शिक्षा को यदि हम सही दिशा देंगे तो यह दुनिया स्वर्ग बन सकती है। यदि गलत दिशा देंगे तो यह नर्क में बदल सकती है। आज आवश्यकता है एक वैश्विक शिक्षा-आंदोलन के साथ-साथ शिक्षक-आन्दोलन की, जिसमें हर राष्ट्र, हर समाज और हर व्यक्ति की भागीदारी हो। नई शिक्षा व्यवस्था वही होगी जो युद्ध की संस्कृति को बदलकर शांति की संस्कृति स्थापित करे, हिंसा की प्रवृत्तियों को बदलकर अहिंसा की चेतना जगाए, और स्वार्थ की जगह सहयोग को जीवन का मूल मंत्र बनाए। यही शिक्षा का सच्चा उत्सव होगा, यही शिक्षक दिवस का वास्तविक संदेश।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

भारत और नीदरलैंड की लोक-कथाओं का तुलनात्मक विवेचन

डॉ. ऋतु शर्मा ननंनपांडे द्वारा ‘नीदरलैंड की चर्चित कहानियां’ वहाँ की प्रसिद्ध लोककथाओं का संकलन है, जो सन् 2025 में आईसेक्ट पब्लिकेशन्स, भोपाल से प्रकाशित हुआ है। इस संकलन में नीदरलैंड की प्रसिद्ध 13 लोककथाएं हैं, जिससे वहाँ की संस्कृति, रहन-सहन, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व धार्मिक परिवेश से हम परिचित हो सकते हैं तथा अपने देश की लोक-कथाओं एवं लोक-संस्कृति से तुलना कर सकते हैं। इस दृष्टिकोण से, डॉ. ऋतु भारत और नीदरलैंड के बीच सांस्कृतिक समन्वय सेतु बनाने का कार्य कर रही हैं।

इससे पूर्व में, उन्होंने ज्यॉ पॉल सार्त्र के प्रसिद्ध अस्तित्ववादी नाटक ‘नो एग्जिट’ का ‘बंद रास्तों के बीच’ शीर्षक से हिन्दी जगत के प्रसिद्ध नाटककार विवेकानंद के साथ संयुक्त रूप से अनुवाद किया है, जिसका प्रथम संस्करण 2006 में, द्वितीय संस्करण 2023 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। यह नाटक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली के पाठ्यक्रम में है और कई बार इसका सफल मंचन भी हो चुका है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने प्रसिद्ध डच बाल साहित्यकार के बाल-उपन्यास ‘Dieren Beul’ का ‘जानवरों का जानी दुश्मन’ के नाम से हिन्दी में  अनुवाद किया है।

मेरा मानना है कि लोककथाओं पर काम करना इतना सहज नहीं होता है, और अगर विदेश की धरती का मामला हो तो और ज्यादा मुश्किल कार्य है। कुछ वर्ष पूर्व मैंने भी उत्तराखंड की प्रोफेसर प्रभापंत की पुस्तक ‘कुमांऊ की लोककथाओं’ का ‘folklore of Kumayun’ शीर्षक से अँग्रेजी में अनुवाद किया था। इस वजह से लोक कथाओं की उत्पत्ति, भाषा-शैली, मान्यताएं, परपराएं, कल्पन-शक्ति और विषय-चयन की मुझे अच्छी जानकारी है। प्रो॰ प्रभापंत द्वारा संकलित लोककथाएं भारतभूमि की है, जबकि डॉ. ऋतु शर्मा द्वारा संकलित लोककथाएं नीदरलैंड के विभिन्न समुदायों, मान्यताओं, संस्कृति, परंपराओं और मूल्य को दर्शाती है। इस संदर्भ में तमिलनाडु के प्रसिद्ध लोककथाकार ए. के. रामानुजन की पुस्तक ‘फोकटेल्स फ्रॉम इंडिया’ का निम्न उद्धरण याद आता है कि “जहां भी लोग रहते हैं, लोककथाएं बनती हैं, नए चुटकुले, कहावतें, तुकबंदी, किस्से और गीत मौखिक परंपरा में प्रसारित होते हैं। मौखिक लोककथाएं, विशिष्ट शैलियों (जैसे कहावत, पहेली, लोरी, कहानी, गाथागीत, गद्य कथा, गीत), गैर-मौखिक विधा (जैसे नृत्य, खेल, फर्श या दीवार डिजाइन), खिलौनों से कलाकृतियों से लेकर गांवों में बाहरी मिट्टी के घोड़ों तक) और समग्र प्रदर्शन कला (जैसे कि सड़क-छाप  जादू, स्ट्रीट थिएटर की परिकल्पना, विभिन्न स्थानीय वस्तुएं, पोशाक आदि) के सभी अभिव्यंजक शहर, गांव के लोक जीवन के हर पहलू से बुने जाते हैं।”

जिस तरह कुमायूं गढ़वाल नृत्य और संगीत के मामले में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है, ठीक उसी प्रकार नीदरलैंड की अपनी लोक-संस्कृति है, जहां लकड़ी के जूते पहनकर नृत्य किया जाता है (क्लोंपन नृत्य), चुड़ैलों के उत्सव मनाए जाते हैं (कार्निवल और हैक्स), बच्चों को पानी में डुबाने वाला राक्षस (बुलेबाक), बकरी सवार (बॉकेन राइडर्स), भटकाने वाली रोशनियां (ड्वालिच्ट), डच के लोक गीत. (हीर हेलेवाइन), खजाने की रक्षा करने वाली भूतिया आत्माएं (विट्टे वीवेन) आदि से पाठक परिचित हो सकते हैं। प्रसिद्ध आलोचक डॉ. परमानंद चौबे ने प्रभापन्त की लोककथाओं पर  अपनी टिप्पणी में लिखते है कि,  “जीवन उतार-चढ़ाव से भरा है। जीवन में निराशा का अंधेरा हमेशा छाया रहता है। इसके बावजूद, परेशानियों को दूर करने के लिए हमेशा आशा की किरण दिखाई देती है। न्याय और अन्याय के बीच युद्ध है। राजाओं को हमेशा विभिन्न परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। पशु और मनुष्य के बीच स्थायी संबंध है। स्थितियाँ पल-पल बदलती रहती हैं, समस्याएँ नए रूपों में फिर से प्रकट होती हैं। इन सभी चक्रों का सामना करते हुए जीवन की वास्तविकता, लोककथा का वाहन बनती है – जो मानव जीवन को उद्देश्यपूर्ण ढंग से बिताने के लिए बहुत उपयोगी है। यह डॉ. प्रभा पंत द्वारा लिखित ‘फोकटेल ऑफ कुमायूँ’ की सैद्धांतिक अवधारणा है।”

नीदरलैंड को अक्सर हालैंड भी कहा जाता है। जहां समतल भूमि, नदियां, नहरें, सागर भरे हुए हैं। यहां की लोककथाओं में वे जादुई प्राणी, चुडैल आत्माएं, देवतागण और नैतिकता पर आधारित कथानक ज्यादा हैं, जो ईसाईकरण के कारण धीरे-धीरे लोक कहानियों और किंवदतियों में बदल गई। नीदरलैंड में कभी प्राचीन जर्मनिक जनजातियां (जैसे. फ्रिसियन और बैटेवियन) रहा करती थी जो दक्षिणी स्कैंडिनेविया और उतरी जर्मन से आई। फिर शुरू हुई वहाँ, प्रकृति की पूजा, नदी-नालों की पूजा, पेडों की पूजा आदि। अक्सर हम ‘बेनेलेक्स’ शब्द सुनते हैं, जिसका अर्थ होता है – बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्जमबर्ग। अतः नीदरलैंड की लोककथाओं में डच, फ़्लेमिश या क्षेत्रीय भाषा का भरपूर प्रयोग होता है। नीदरलैंड की लोककथाएं व्यावहारिक एवं प्रकृति-केंद्रित होती है- स्कैंडिनेवियाई या आयरिश मिथकों की तुलना में कम भव्य; मगर अधिक वास्तविक। इस वजह से नीदरलैंड की लोककथाएं विश्व में अपना वांछित स्थान नहीं बना पाई और उन्हें ‘फोकलोर ऑफ द लो कंट्रीज’ में गिना जाता है।

कुमायूं की लोककथाओं में भी पहाड़-पर्वत, साधु संत, जादूगर, भूत-प्रेत, तंत्र-टोटका आदि कथानक के रूप में उभरते है। उत्तराखंड में कई संस्कृतियों, परपंराओं, आस्थाओं, संवेदनाओं और मूल्यों का समावेश है, इस वजह से यहाँ की लोककथाओं में विविधता है। लोक-साहित्य, जैसे पंचतंत्र, हितोपदेश, कथासरित्सागर आदि शिक्षा का पुरातन तरीका माना जाता था। यह ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में मौखिक रूप से अग्रसरित हुआ। लोक कथाओं को केवल समय बिताने की सामग्री न मानकर समाज को नई दिशा देने वाला माध्यम मानना चाहिए।

सभ्यता, संस्कृति, भाषा और ज्ञान-भंडार ही तो मानव विकास का मूलाधार है। अनगिनत अनाम लेखकों ने संस्कृति, सभ्यता और मानवता के विकास में अद्वितीय योगदीन दिया, अपने अर्जित अनुभवों, भावनाओं और विचारों के आधार पर लोककथाओं को जन्म देकर। लोक कथाओं की खासियत यह है कि लेखक अज्ञात रहता है और उन कथाओं पर किसी एक का विशेषाधिकार नहीं है, वह समग्र समाज की देन है। जिस तरह प्रो. प्रभापंत कुमायूं के गाँवों में घूम-घूमकर वहाँ के बड़े-बुजुर्गां से लोक कथाएं सुनकर या उनकी आवाज रिकॉर्ड कर अपने घर जाकर उन कथाओं को कागज पर उतारा है, उसी तरह डॉ ऋतु शर्मा ने नीदरलैंड की अधिकांश लोक-कथाओं को स्थानीय लोगों से सुनकर लिखा और कुछ वहाँ की प्रचलित लोककथाओं का विभिन्न डच पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उन कथाओं इस संकलन के लिए अनुवाद किया हैं।

जहां प्रभापन्त कहती हैं – ‘लोक कथाएं संग्रह के दौरान कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो यह कहता है कि उसने वह कहानी लिखी है। ये हमारे पूर्वजों की विरासत है, जिसे बचाए रखना हमारा परम कर्त्तव्य है।’ वहीं पर ऋतु शर्मा भी मानती है कि यदि हम अपनी वैश्विक परंपराओं को पूरी तरह से नहीं जानते हैं तो समग्र मानव-जीवन के भविष्य की प्रगति के बारे हमे नहीं जान पाएंगे।

‘बातों री फुलवारी’ के लेखक प्रसिद्ध राजस्थानी लोक-कथाकार विजयदान देथा लिखते हैं, “मैंने अपनी सभी कहानियों को अपने गांव बोरुंदा से ही इकट्ठा किया है। लोक-गीतों की तरह ही लोक कथाओं का यह खजाना भी मुझे यहाँ की महिलाओं के पास से मिला है। मैंने खुद सुनकर इन कहानियों को अपनी कला और कल्पना के आधार पर उनके पारंपरिक रूपों को फिर से सजाया है।”

पुरवाई पत्रिका, लंदन के संस्थापक-संपादक श्री तेजेन्द्र शर्मा डॉ ऋतु के इस संकलन के आमुख में लिखते हैं कि “ऐसे गिने-चुने प्रवासी भारतीय साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपने अपनाए हुए देश की भाषा में लिखे गए साहित्य को हिन्दी में अनुवाद करके हिंदी जगत के पाठकों को उपलब्ध करवाया हो।”

रामानुजन मानते हैं कि दक्षिण भारत की लोक-कथाएँ संस्कृत-ग्रंथ जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर या पाली जातक, हिंदू और जैन पुराण से सीधे नहीं आई हैं। कभी ये कथाएं मौखिक परंपरा के रूप में थीं और विभिन्न संतों द्वारा दृष्टांतों में बताई गई थीं। रोमांटिक धारणाओं के विपरीत, सहजता या स्वाभाविकता ही लोककथाओं का परिचय हैं। कोई भी लोककथा अपने भीतर सांस्कृतिक संदर्भ समेटे रहती है; जिसका अलग-अलग समय और स्थानों पर कुछ बदलावों के साथ फिर से दोहराया जाता है।

इस आलोच्य-संकलन की सारी कहानियों की थीम अलग-अलग है। कहीं चुड़़ैल है तो कहीं भूत-प्रेत, जादूगरनियां। कहीं पशु-पक्षी, चुहिया, घोड़ा, गधे आदि है तो कहीं सिक्के, पत्थर, लकड़ी का संदूक, झाड़ू आदि को भी लोक कथा का आधार बनाया है। इस संकलन में 13 कहानियां है जैसे कि समझदार आनतुन, जादुई पत्थर, चुहिया की शादी, बिन बुलाए मेहमान, खिलड़न की आत्मकथा, भूतिया हवेली और यान के चीले, भूखड़ ओले-बोले, कुबड़ा, जादुई घोड़ा, बुद्धिमान गधा, लकड़ी का संदूक और समझदार किसान आदि।

डॉ, प्रभापंत की कुमायूं की लोक-कथाओं में हंसावली परी, सात भाइयों की एक बहिन, लिख्खू, भिटौली, पैटीकोट का पैच, राजा विक्रमादित्य, अमरू, सात अप्सराएं, कद्दू की शादी, राक्षस, कुत्री मूयाँ, चिड़िया और जानवरों की भाषा, कलविष्ट, सर्प राजकुमार, गरीब ब्राह्मण, ग्वालदेव, जादुई अंगूठी, खकरमून आदि।

‘समझदार आनतुन’ लोककथा नीदरलैंड के किसी गाँव के जमींदार के परिवार की है। जिसमें तीन बेटे हैं, दो अच्छे खासे पढ़े-लिखे और तीसरा कुछ भोला-भाला, जिसे व्यंग्य में वहाँ के लोग उसे ‘समझदार आनतुन’ कहते हैं। किसी राजा की बेटी के स्वयंवर में जमींदार के बेटे आमंत्रित किए जाते है। एक भाई लैटिन भाषा की डिक्शनरी, समाचार पत्र के सारे संस्करण याद रखने वाला तो दूसरा भाई कानून और राजनीति का अच्छा जानकार। तीसरा भाई इनसे कोसों दूर। दोनों भाई सज-धजकर घोड़े पर बैठकर राजकुमारी के स्वयंवर में जाते है। वे आनतुन को  छोड़कर चले जाते हैं। जब उसे पता चलता है तो वह बकरे पर सवार (बॉकेन राइडर) होकर  वहां पहुंचता है। रास्ते से उसे मरा हुआ कौआ, पुराने लकड़ी के जूते (क्लोंपन), गीली मिट्टी मिलती है, जिसे वह अपनी जेब में भरकर राजमहल जाता है।

स्वयंवर के दौरान राजमहल में अच्छी-खासी गर्मी होती है, इसके बारे में  राजकुमारी कहती है – “आज शाम के खाने के लिए मेरे पिताजी ने यहां मुर्गे भुनवाये हैं।”

किताबी ज्ञान रखने वाले दो बड़े भाई इसका न तो अर्थ समझ पाते हैं और न ही कुछ उत्तर दे पाते हैं। मगर तीसरा भाई हाजिर जबाव; तुरंत उत्तर देता है – ‘क्या मैं अपना कौआ भी भून सकता हूँ ?’ फिर भूनने के लिए बर्तन की बात आती है तो वह पुराने लकड़ी के जूते दिखा देता है और चटनी के बारे में राजकुमारी पूछती है तो दोनों जेब से गीली मिट्टी बाहर निकालता है। आखिरकार आनतुन की प्रत्युत्पन्नमति से राजकुमारी काफी प्रभावित हो जाती है और विवाह के लिए तैयार हो जाती है। यद्यपि यह नीदरलैंड की पृष्ठभूमि है, मगर भारतीय दंतकथाओं में कालिदास और विद्योतमा का विवाह-प्रसंग भी तो इस रूप से देखा जा सकता है। कालिदास द्वारा विद्योतमा एक अंगुली दिखाने से एक आंख फोड़ना समझकर वह दो अंगुली दिखाता है, राजकुमारी की दोनों आँखें फोड़ने के इरादे से। राजकुमारी द्वारा हाथ दिखाने से थपड्ड समझकर उसे मुक्का दिखाता है। गलत संकेतों के भी वांछित भावार्थ समझने से विद्योतमा की कालिदास के साथ शादी हो जाती है। यदि नीदरलैंड की इस लोककथाओं की तुलना करने पर ‘आनतुन’ कालिदास जैसा है और नीदरलैंड की राजकुमारी ‘विद्योतमा’ की तरह।

दूसरा प्रसंग, “हू विल किल द केट इन फर्स्ट नाइट?” कहानी में का है, जिसमें राजकुमारी के स्वयंवर की शर्त में टेबल पर दूध रखा हुआ होता है और उसके पास में पालतू बिल्ली छिपकर बैठी होती है। स्वयंवर में भाग लेने वाले राजकुमारों के लिए शर्त निर्धारित होती है – ‘जो टेबल पर रखा हुआ गिलास उठाकर दूध पीएगा। राजकुमारी उसके साथ शादी करेगी।’

जैसे ही स्वयंवर में भाग लेने वाले राजकुमार दूध का गिलास उठाकर पीने के लिए उद्यत होते है तो बिल्ली आकर दूध गिरा देती है। परिणामस्वरूप, राजकुमार स्वयंवर में विफल। मगर एक सिरफिरा बंदा आता है, उसके पास कटार होती है। जब वह स्वयंवर कक्ष में जाता है और एक हाथ से दूध के लिए गिलास उठाता है तो जैसे ही बिल्ली आक्रमण करने वाली होती है तो दूसरे हाथ से कटार निकालकर उसे मार देता है। ‘मेरी बिल्ली को क्यों मारी?’ राजकुमारी द्वारा पूछने पर वह उत्तर देता है – ‘हमारे बीच में अगर कोई तीसरा आएगा तो वह भी इसी बिल्ली की तरह मारा जाएगा।’

यह उत्तर सुनकर राजकुमारी प्रभावित हो जाती है और उससे शादी कर लेती है। डॉ. ऋतु शर्मा की इस लोककथा में भी आनतुन की स्पष्टवादिता और प्रत्युत्पन्नमति से प्रभावित होकर राजकुमारी शादी कर लेती है।

इस लोककथा में एक और कहानी याद आती है, पंचतंत्र के चार दोस्तों की। तीन दोस्त अच्छे-खासे पढ़े-लिखे, अलग-अलग विद्याओं के ज्ञाता और चौथा दोस्त मूर्ख। वे चारों एक जंगल से गुजर रहे होते हैं। रास्ते में हड्डियों का ढेर दिखाई देता है। पहला दोस्त हड्डियों के ढेर को मंत्र से जोड़ता है, दूसरा दोस्त मंत्र बल से उस पर त्वचा का आवरण पहना देता है, और तीसरा दोस्त उसमें प्राण फूंकने जा रहा होता है कि चौथा दोस्त उसे यह करने के लिए मना करता है क्योंकि वह जानता है की जुड़ी हुई हड्डियों का अस्थि-पंजर शेर की आकृति ले चुका होता है, उसमें जान फूंकने से वह उन सभी को जान से मारकर खा सकता है। लेकिन तीसरा दोस्त उसकी बात को नहीं मानते हैं तो चौथा दोस्त किसी पेड़ पर चढ़ जाता है। तीसरा दोस्त जैसे ही मंत्रबल से जान फूंकता है तो शेर जीवित हो उठता है और तीनों पर आक्रमण कर देता है और उन्हें मार देता है। कहने का अर्थ यह है कि किताबी ज्ञान की तुलना में व्यावहारिक ज्ञान ज्यादा प्रभावी व श्रेष्ठ होता है। ‘समझदार आनतुन’ में दो भाई अपने विषयों के अच्छे-खासे ज्ञाता हैं, मगर जरूरत पड़ने पर कुछ भी नहीं बोल पाते हैं, जबकि तीसरा भाई भोला होते हुए भी तुरंत जवाब दे देता है और राजकुमारी का दिल जीत लेता है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है, कि लोक कथाएं नीदरलैंड की हो या भारत की – सभी में सार्वभौमिक मूल्यों की उपस्थिति सहजता से देखी जा सकती है।

डॉ. ऋतु शर्मा के इस संकलन की दूसरी लोककथा ‘जादुई पत्थर’ में सैनिक मताईस तीन चमत्कारी पत्थरों से सबके लिए सूप तैयार करता है और ‘जादुई घोड़ा’ कहानी में खरौनिंगन शहर का लड़का जादुई घोड़े की वजह से अपनी क्रूर सौतेली माँ से जान बचाता है। इसी तरह डॉ. प्रभापंत की ‘जादुई अंगूठी’ में एक व्यापारी का निष्कासित बेटा विपत्तियों में उस अंगूठी से अपनी रक्षा करता है।

‘चूहिया की शादी’ नीदरलैंड के किसी गाँव के जमींदार परिवार की कहानी है, जिसमें पूर्व और पश्चिम में जाने वाले दो बेटों की शादी योग्य लड़की मिल जाती है, जबकि उत्तर दिशा में जाने वाले तीसरे बेटे डेनियल के लिए केवल रेंडियरों और भेड़ियों की बस्ती में कहां से कोई लड़की शादी योग्य मिल सकती है! उसे एक घर में चुहिया मिलती है। जो उसके लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाती है। लोककथा में बाद में पता चलता है कि एक अभिशप्त राजकुमारी चुहिया की देह में अपना जीवन-यापन कर रही होती है। जब डैनियल उससे प्यार करने लगता है तो वह अपने असली रूप में आ जाती है। भारतीय लोक-कथाओं में एक ऋषि चुहिया को कन्या बना देता है फिर उसकी शादी के लिए बादल, पवन, पहाड़ आदि को प्रस्ताव भेजता है।

बादल कहता है, ‘पवन मुझसे ज्यादा ताकतवर है, इसलिए वह हमें छितर-बितर कर  देती है।’

पवन कहती है,’ पहाड़ हमसे ज्यादा ताकतवर है, जो हमें बहने से रोक देता है।’

पहाड़ कहता है, ‘चूहा हमसे ज्यादा ताकतवर है, वह हमारे भीतर छेद करता है, अपना बिल बनाने के लिए।’

अंत में, उस कन्या को ऋषि फिर से चूहिया बनाकर चूहे से शादी कर देता है। इस कथा का शीर्षक है – ‘पुनर्मूषक भवः’। चूहिया को कन्या और फिर कन्या को चूहिया। नीदरलैंड की कहानी में चुहिया से राजकुमारी बनती है।

प्रोफेसर प्रभापंत की लोककथा ‘सर्प राजकुमार’  में नागिन अपने पति ‘नाग’ के प्रति समर्पण और वफादारी को दिखा रही है, यहां तक कि वह अपना मिशन पूरा करने के बाद उसके पास लौटने का वादा भूल गया था। उसे राजकुमारी के साथ सोते हुए देखकर उसने बदला नहीं लिया। उनके द्वारा किया गया बलिदान अनुकरणीय है और भारत में स्त्री के गुणों को दर्शाता है।

‘नखरीली सुई’ और ‘खिलड़न की आत्मकथा’ लोक-कथाओं में कपड़ा सिलाई करते समय सुई के टूटने, फिर उस पर लाख लगाकर नखरीली सुई को जीवित रखने की कथा है, जिसके आधार पर नीदरलैंड में सिलाई की टोकरी रखने की प्रथा है। उसी तरह ‘खिलड़न की आत्मकथा’ में नीदरलैंड के सिक्के की जेब से निकलकर दूसरे देश की यात्रा के दौरान खोटे  सिक्के के नाम से अपमानित होने पर आधारित लोक कथा है, जबकि खिलडन पर नीदरलैंड के टकसाल की मोहर भी लगी होती है। दूसरे देश में खोटा सिक्का घोषित होने पर उसके बीच में छेदकर किसी बच्चे के गले में लॉकेट की तरह लटका दिया जाता है।

‘बिन बुलाई मेहमान’ कथा नीदरलैंड के अपिंगदाम शहर की कहानी है, जहां एक लेखक श्रीमान माईरमन रहते हैं। वह चुड़ैलों पर मनगंढ़त कहानी लिखने के कारण दो चुड़ैलें  जुलिया और जूटा उसके घर आकर कहती है कि हम चुड़ैलें कुछ भी गलत काम नहीं करते हैं। न तो मकड़ी जाल वाला पैन कैक खाती है, न भेड़ के बच्चों को। न बच्चों के सपनों में आकर डराती हैं, न खंडहरों में नाचती हैं। इसलिए उन पर गलत साहित्य लिखना बंद कर दिया जाए।

‘भूतिया हवेली और यॉन के चीलें’ नीदरलैंड की प्रोफेंसी फ्रिसलैंड के शहर में एक बहुत बड़ी तीन मंजिला हवेली, जो सुनसान है और वहां भूत रहते हैं – के कथानक वाली लोक कथा है। जो प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक अल्फ्रेड हिचकॉक के ‘हाउन्टेड हाउसफुल’ की याद दिलाती है। नीदरलैंड के भूत अच्छे हैं, भारतीय भूतों की तरह लोगों को परेशान नहीं करते हैं और न ही डराते हैं। हैं। यही वजह है कि प्रसिद्ध ओड़िया और अँग्रेजी के लेखक स्वर्गीय मनोज दास को ‘भूतनी की विदाई’ जैसी कहानी लिखने की जरूरत नहीं पड़ती। नीदरलैंड की भूटिया हवेली में यॉन को रूकने के कारण एक भूत धन के तीन घड़ों के बारे में बताता है और ले जाने के लिए कहता है की वह एक घड़ा गरीबों की सेवा, दूसरा घड़ा चर्च के लिए उपयोग में लें, और तीसरा उसके अपने उपयोग के लिए। जबकि भारत में भूत धन का स्थान नहीं बताते, बल्कि देवी-देवता धन की जगह दिखाते हैं, उदाहरण के तौर पर ओडिशा के सम्बलपुर की अधिष्ठात्री समलेई देवी एक आदिवासी महिला सँअरन को हीराकुंड के पास सात हीरों के ढेर को हीराकुड के रेत के टीले के नीचे दबे होने के बारे में बताती है। गरीबी के बुरे दिनों में भी मानवता के प्रति त्याग और सेवा की भावना को दर्शाने वाली प्रभापन्त की ऐसी ही एक लोक-कथा ‘कुत्री मुया’ जीवन के मुख्य पहलू को दर्शाती है।

नीदर लैंड की लोकसभा ‘भूक्खड़ ओले-बोले’ एक पेटू की कहानी है जो भूनी हुई पूरी भेड़, दस रोटियां और बैल भी खा लेता है। उसके बाद भी उसकी भूख खत्म नहीं होती है तो वह रास्ते में मिलने वाली किसी बुढ़िया के आडू और चीज खा जाता है। क्या आपको नहीं लगता हैं कि भारतीय मिथकों में भीम और दुर्वासा मुनि ऐसे ही पात्र है ? महाभारत में एक बार दुर्वासा नहा-धोकर द्रोपदी के पास भोजन की मांग करता है। जितना भी भोजन देने से उसकी भूख खत्म नहीं होती है, ठीक भुक्खड़ ओले-बोले की तरह। अंत में, कृष्ण भगवान द्रोपदी को तुलसी का पत्ता देते हैं, जिसे खाकर दुर्वासा मुनि की भूख शांत हो जाती है। इस तरह भारत और नीदरलैंड की लोक कथाओं में काफी समानता देखने को मिलती है।

‘कुबड़ा’ लिंबर्ग की कहानी है, नीदरलैंड से किसी हिस्से की। इस कहानी में कुबड़ा वायलिन  बजाने वाला कलाकार है। रात में किसी जंगल में वॉयलिन बजाता है तो अप्सराएं उसे सोने के सिक्के इनाम स्वरूप देती है। इस प्रकार कुबड़े की दुरावस्था समाप्त हो जाती है और अप्सराओं की मदद से उसका कुबड भी खत्म हो जाती है। नीदरलैंड की यह लोककथा शेक्सपियर के नाटक ‘मिडसमर नाइट’ज ड्रीम’ की याद दिलाती है। साथ ही साथ, कृष्ण द्वारा कुब्जा के कुबड़ को मिटाने वाली कहानी की भी। ऐसी की एक लोककथा प्रभापन्त ने संकलित की है, ‘कलबिष्ट’ शीर्षक से, जिसमें कल्याण सिंह बिष्ट नमक एक साधारण व्यक्ति के देवता में परिवर्तित होने के बारे में है। गुरु गोरखनाथ की कृपा से कालबिष्ट को दिव्य शक्ति मिलती है।

नीदरलैंड के किसान के बेटे के जीवन पर आधारित ‘बुद्धिमान गधा’ लोक कथा में माँ-बेटी दो चुड़ैलें है, जो झाड़ू पर बैठकर किसी अज्ञात स्थान पर जाती है, नृत्य करने तथा जीवन का आनंद लेने के लिए। मगर नीदरलैंड के ब्राबनद शहर में रहने वाला किसान के बेटे को चुड़ैल की बेटी से प्यार हो जाता है, इसलिए वह उसका पीछा करता है, झाड़ू पर बैठकर उसी की तरह मंत्रोच्चारण के बाद वह उस अज्ञात स्थान पर पहुँच जाता है। बेटी उस स्थान पर आया देखकर उसे गधा बना देती है, जो समय आने पर अपनी बुद्धि से फिर मनुष्य बन जाता है। झाड़ू पर बैठकर उड़ने वाला दृश्य विश्व में बहुचर्चित फिल्म ‘हैरी पोटर’ की याद दिलाती है। और चुड़ैलों द्वारा अपने प्रेमी को गधे में बदलने की प्रक्रिया मन में कहीं-न-कहीं कामाख्या देवी की याद तरोताजा करती है, जहां चुड़ैलें अपनी तंत्र-शक्ति से आदमियों को दिन में जानवर बना देती हैं और रात में फिर से आदमी बनाकर अपनी कामुक इच्छाओं की तृप्ति करती है। ऐसी ही ‘खकरमून’ कहानी प्रभापंत की है, जिसमें छोटी बकरी खकरमून अपनी  चतुराई से न केवल अपनी बल्कि पूरे परिवार की जान बचाती है, रणनीतिक रूप से बाघिन, को मार देती है।

‘लकड़ी का संदूक’ लोककथा में संदूक भानुमती के पिटारे की तरह है, जिसमें टोपी और बांसुरी रखी हुई होती है। पिता की मृत्यु के बाद दोनों बेटों में एक टोपी ले लेता है तो दूसरा बांसुरी। संदूक की ये दोनों चीजें अलाऊद्दीन के चिराग की तरह है, जिसे रगड़ने पर जिन्न पैदा होता है। इस लोक कथा में बांसुरी और टोपी से जिन्न निकलता है। एक भाई किसी राजकुमारी के छलावे में आकर ये दोनों चीजें खो देता है, तो वहां के नाशपाती के माध्यम से फिर से वह प्राप्त कर लेता है। बड़ी नाशपाती खाने से नाक बढ जाता है और छोटी खाने से फिर सामान्य हो जाता है। इसी ट्रिक का फायदा उठाकर वह राजकुमारी से अपनी हड़पी हुई चीजें हासिल कर लेता है। यह नीदरलैंड के जीलैंड की लोककथा है, जहां लोग आज भी नाशपाती खाने से डरते हैं कि कहीं उनकी नाक लंबी न हो जाए। ऐसी ही लोककथा प्रभापन्त की भी है, ‘सात अप्सराएं’, जिसमें उन्होने ब्राह्मण की सादगी और बूढ़ी औरत के डॉ ऋतु के ‘लकड़ी का सन्दूक’ की राजकुमारी की तरह धोखेबाज स्वभाव को दर्शाया है। जिस तरह नीदरलैंड का नवयुवक नाशपाती खाकर अपना जीवन बचाता है, उसी प्रकार करची (करछुल), जादुई चम्मच, जादुई रजाई, उड़ान खटोला और पिटने वाली छड़ी प्रभापन्त के ब्राह्मण को बचाती है। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि डॉ. प्रभा पंत और डॉ ऋतु शर्मा की ये लोक-कथाएँ दैनिक जीवन की व्यावहारिक समस्याओं को हल करने के तरीके के बारे में ‘रेडी रेकनर’ की तरह काम करती है।

इन संकलन की अंतिम कहानी है – ‘समझदार किसान’। इस लोक कथा में किसान की पत्नी बहुत चालाक होती है, और उसके पेट में कोई बात नहीं रह पाती है। पंचतंत्र की कहानी ‘वाचालो लभते नाशम्’ की याद दिलाती है। किसान अपनी पत्नी की इस आदत के कारण खेत में मिले गुप्तधन को बचाने के लिए उसे तरह-तरह की बातें करता है जैसे राजा के बेटे की शादी, मछलियों की बरसात, मीठी रोटी के पेड़ होना आदि। ताकि गुप्त धन के बारे में लोगों को बोलने पर भी, यहां तक कि राजा के पास खबर जाने पर भी वह अपने गुप्तधन को बचा पाएगा, यह कहकर उसने शायद सपना देखा होगा, तभी तो उलटी-सीधी अनर्गल बातें करती है। इस प्रकार वह किसान अपनी समझदारी से गुप्तधन की रक्षा कर लेता है। इससे मिलती-जुलती प्रभपांत की लोक-कथा है ‘गरीब ब्राह्मण’।जिसमें ईश्वर पर अंधविश्वास किए बगैर हमारे जीवन की दरिद्रता को दूर करने के लिए कड़ी मेहनत में विश्वास और समझदारी की आवश्यकता को दर्शाया गया है।

अंत में, नीदरलैंड की लोक-कथाओं का भारतीय लोक-कथाओं के साथ तुलनात्मक विवेचन करने पर यह पता चलता है कि यद्यपि नीदरलैंड की लोक-कथाओं ने भारतीय लोक-कथाओं से समानता होने के बावजूद अभी तक भारत में अपना कोई विशिष्ट स्थान नहीं बनाया है, इस कमी को पूरा करने का सार्थक प्रयास किया है डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे ने, जिनका नाम प्रवासी साहित्यकार के रूप में वैश्विक स्तर पर बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने नीदरलैंड की लोक कथाओं को अनुवाद के माध्यम से हिंदी में लाकर दोनों देश के बीच न केवल सांस्कृतिक भाषायी समन्वय का कार्य किया है, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को प्रतिपादित करते हुए दोनों देशों की एकता को अटूट रखने का संदेश दिया है, जो राम मनोहर लोहिया के ‘विश्वभाषा’, ‘विश्व संविधान’ और ‘विश्व नागरिक’ के पथ को प्रशस्त करता है।

(लेखक ओड़िशा में रहते हैें और हिंदी के आलोचक व लेखक हैं)

इंडोनेशिया – बाली: कण में , रज में, रग में राम!

“राम तुम्हारा चरित स्वयं ही  काव्य है
कोई कवि बन जाए, सहज संभाव्य है!”

बाली की न  बातें खत्म होंगी,न यादें खत्म होंगी. अंतहीन स्मृतियों का कारू का खजाना बन गया है बाली…. आज राम नवमी है  और हाली ही के बरसों में “मंदिरों के महादेस बाली “में एक और अप्रतिम प्रतिमा स्थापित की गई है  ऐसे  पुरुषोत्तम की,जो  अपनी-  माया, मर्यादा और आदर्श के लिए विश्व भर में पूजित और प्रणम्य हैं.  कल देश दशहरा मनाएगा.. राम,  उसे,जो है अनाचारी भी…अहमी भी…दम्भी भी…  है घमंडी भी.. रावण का वध करेंगे!  विजयी होंगे राम..!भूलुंठित होगा रावण…!!

पर रावण की लंका तक का मार्ग था दुर्गम… अछोर सागर… जिसे पार करना भी मुश्किल…लाँघना भी मुश्किल… वहाँ तक पहुंचना  भी मुश्किल… वह असाध्य  भी …दुष्कर भी…राम ने वानर सेना का किया आव्हान…भारी पत्थर, विशाल पहाड़ के पहाड़, शिलाएं भी चट्टाने भी… वानर सेना ने  इन सब का उपयोग कर बनाया पुल…राम सेना पहुंची लंका… किया भीषण युद्ध.. मिली विजय…  राम की जय!

ठीक इसी कथ्य और भावभूमि पर आधारित जन- जन के आराध्य, अभिराम – राम की विशाल प्रतिमा को स्थापित किया है गया है बाली के ” नुसा दुआ ” इलाके के ” तोहफाती ” चौराहे पर.  जी 20.शिखर सम्मेलन की सत्रहवीं बैठक  हुई 15व 16  नवंबर 2022 को  और इसकी मेजमानी की इंडोनेशिया ने, बैठक हुई बाली में. इसी बैठक स्थल के समीप टीलों, पहाड़ियों और चट्टानों को चित्ताकर्षक बनाते हुए इसी पर स्थापित की गई राम की नयनाभिराम पराक्रमी और युयुत्सवा!
( रावण से युद्ध के लिए प्रबलाकांक्षी, पूरी तरह तैयार)
इसी मुख्य प्रतिमा के साथ राम के परम सेवक – हनुमान, सुग्रीव और   उत्साहित वानर सैना की यहाँ सुन्दर -सजीव – सी  मूर्तीयाँ बनाई गई है.  फकत तीन साल पहले बनाई  इन सनातन धर्मावलंबियों के पूजनीय प्रतीकों की यह प्रतिमाएं, इंडोनेशिया के बारे में, इस आशंका को भी मिटा देती है कि इस देश में खास कर बाली में जो हजारों की तादाद में मंदिर बने हैं, वे सदियों पुराने हैं, तब के, जब वहाँ हिन्दू और बुद्ध बहुतायत में रहते थे. अब, जबकि  मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ते हुए तकरीबन नब्बे प्रतिशत से भी ज्यादा हो गई है, हिंदू देवी – देवताओं के मंदिर शायद अब न बने. पर इन कयासों  के कोहरे को काटते -छाँटते, आशंकाओं को निर्मूल करते  हुए
इंडोनेशिया की फिलवक्त राजधानी जकार्ता में सम्पूर्ण एशिया का सर्वाधिक बड़ा और भव्य मंदिर “सनातन  धर्म आलयम ”  का निर्माण इसी वर्ष पूरा हुआ है.
भगवान मुरुगन ( कार्तिकेय ) को समर्पित इस मंदिर का शिलान्यास सन 2020 में किया गया था. दो वर्षो से भी अधिक निर्माणावधि के बाद  इसी साल 2 फरवरी ’25 को मंदिर का भव्य उद्घाटन- आयोजन सम्पन्न हुआ. इंडोनेशिया में इस्लाम कितना भी क्यों बढ़ जाए, जन – जन की रग – रग में बसे राम  के प्रति इस देश की आस्था रहेगी अविरल – अविराम!
मैं पहले ही इस तथ्य को बता चुका हूँ कि रामायण, इंडोनेशिया ( बाली ) की आत्मा है.. अजर.. अमर..और सनातन…
यह जरूर है की  भारत की रामायण और इंडोनेशिया / बाली की रामायण में भाषा और घटनाओं में तनिक भिन्नता है. भारतीय रामायण के रचयिता वाल्मीकि हैं, जबकि इंडोनेशिया / बाली में प्रचलित रामायण के रचयिता कवि योगेश्वर थे.  भारतीय रामायण  में राम की नगरी अयोध्या है तो  वहाँ अयोध्या को ” योग्या ” कहा जाता है. हम भारतीय, लक्ष्मण को  शेषनाग का अवतार मानते हैं जबकि वहाँ नौ सेना अध्यक्ष को लक्ष्मण कहा जाता है.
दशरथ को वहाँ, ” विश्वरंजन ” के तौर उल्लेख किया है सीता को वहाँ  ” सिंता ” उच्चारित किया जाता है.
यह भी पूर्व में उल्लेख कर चुका हूँ कि 1973 में  दुनिया कि सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया ने ही ” अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन ”  आयोजित किया था. इंडोनेशियन रामायण में 26 अध्याय है और इसे ” काकावीन रामायण ” कहा जाता है. इंडोनेशिया के स्वतन्त्रता दिवस – 27 दिसम्बर को यहाँ के युवा,  हनुमान का वेश धारण कर  सरकारी परेड में शामिल होते हैं.  बाली के बारे में अधिकृत सूचनाएं देने वाली लक्ष्मी से जब मेने हाल ही बाली के “उबुद ” इलाके में रामायण  को पत्थरों पर उकेरने  के बारे में जानना चाहा, उसने बताया कि उबुद में  ” आयूंग ” नदी के किनारे पर लगभग एक किलोमीटर लम्बाई में पत्थरों पर  रामायण के प्रसंगों को उकेरा गया है. अनेक पत्थरों पर राम – वनवास, सीता हरण और राम – रावण युद्ध जैसे प्रसंगों को कमनीय और कालात्मक तरीके से उकेरा गया है. इस सम्पूर्ण कला  क्षेत्र का उद्घाटन
2023 में किया गया था.

लक्ष्मी अपनी आँखों को तनिक और चौड़ा बना लेती है जब वह बताती है की बाली में अनेक स्थानों पर रामकथा को कठपुतली-  प्रदर्शन के जरिए प्रस्तुत  किया जाता है. कठपुतली शो को बाली में – ” वेयांग कुलित ” कहा जाता है.   फादर काबिल बुल्के ने रामायण पर बहुत काम किया. उनके मुताबिक  दुनिया में 50 से ज्यादा भाषाओं में राम कथा लिखी गई है. रामायण ही ऐसा महाकाव्य है जिसे आधार बना सबसे ज्यादा लोक कथाएं लिखी गई हैं.
इंडोनेशिया में सबसे ज्यादा प्राचीन “जवानीस  रामायण ”  है. कहते हैं इसे 9वीं शताब्दी में  लिखी जा चुका थी. जावा में रामकथा- प्प्रस्तुति , ” रामायण बेले” के रूप में होती है. जिस मंच पर यह आयोजन होता है उसे – ” वेयांग वॉन्ग ”  कहा जाता है. जावा के ही “योग्यकर्ता ” शहर  के प्राम्बनन मंदिर में प्रतिदिन रामलीला की प्रस्तुतियाँ होती है.यह मंदिर यहाँ का सबसे बड़ा, सबसे भव्य और सर्वाधिक प्रतिष्ठित मंदिर है. इसे युनेसको ने विश्व धरोहर में शुमार किया है.

यूँ पूरा संसार ही राम के नाम और काम से  नित्य ही नतशीष होता है पर इंडोनेशिया / बाली  के बागों- बहारों में, नदियों – कछारों में, सागरों – पहाड़ों में…अँधेरे – उजाले में.. जवालमुखी – मुहानों में…
रज में.. रग में.. कण में.. मानव मात्र के मन में…रमे हैं  राम! …सियाराम मय  सब जग जानी
करहु प्रणाम जोरि जुग पाणी!

पुरुषोत्तम पंचोली
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, कोटा

हम गायों को संरक्षित करेंगे तो गाय हमारी संस्कृति, कृषि और सभ्यता को संरक्षण देगी

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री रामलाल ने कहा कि देश ने गाय को बचाने के लिए कई अंदोलन किए हैं जिसमें कूका विद्रोह प्रमुख है। अंग्रेजों के शासन के पहले पंजाब में गौहत्या पर पाबंदी थी, लेकिन जब वहां गौहत्या पर प्रतिबध हटा तो कूका विद्रोह के माध्यम सै इसका विरोध किया गया। इसमें कई अंग्रेज अधिकारीयों को गौसेवकों ने मार दिया। यह विद्रोह संत समाज द्वारा किया गया था।

इस्कान सभाग्रह में आयोजित एक भव्य समारोह में ईश्वर सृष्टि द्वारा प्रकाशित गौभारती ग्रंथ के विमोचन पर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि गायों को सरकार नहीं बचा सकती इसके लिए समाज को ही आगे आना होगा। हम जब अपने इतिहास में झांकते हैं तो पाते हैं कि हमारी सुदृढ़ अर्थ और कृषिव्यवस्था का मुख्य आधार हमारा गौवंश था।

गौशालाओं को संरक्षित करेंगे तो हम अपने आपको ही संरक्षित करेंगे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने गौसेवा संवर्ध्दन समिति बनाई है जो देश के गौवंश को बचाने व संरक्षित करने का का कार्य कर रही है।

उन्होंने कहा कि स्व. हस्तीमलजी संघ के ऐसे समर्पित कार्यकर्ता थे जो आजीवन गौसेवा करते रहे और गौवंश को बचाने में अपना तन-मन और धन लगा दिया।

इस अवसर पर इस्कॉन खारघर, मुंबई के अध्यक्ष स्वामी सूरदास जी ने तीखे शब्दों में सवाल उठाते हुए कहा कि हम अपनी संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों से कट गए हैं इसलिए गौवंश को बचाने के लिए इस तरह के आयोजन करना पड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब कृष्ण मात्र 7 साल के थे तो गोपाष्टमी के दिन वे अपनी 7 लाख गायों को चराने के लिए जाने की जिद करने लगे तो उनके पिता ने कहा कि तुम पैर में जूते तो पहन लो, इस पर कृष्ण ने कहा कि जब मेरी सब गैयाँ बगेर जूते के जा रही है तो मैं जूते कैसे पहन लूँ, आप इन सब गायों के लिए जूतों की व्यवस्था कर दें।

उन्होंने कहा कि गाय की पूजा करने वाले इस देश में लोग कुत्ते पाल रहे हैं और कुत्ते सीधे बेडरुम तक पहुँच गए हैं। उन्होंने कहा कि हम ब्रह्म संहिता पढ़ेंगे तो अपने गौरवशाली इतिहास और पूर्वजों के बारे में जान सकेंगे। उन्होंने कहा कि मुंबई के वडाला के आईसीटी संस्थान में गौमूत् पर किए गए शोध में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं।

उन्होंने कहा कि गीता, गाय और श्रीमद् भागवत के माध्यम से हम पूरी दुनिया को अपनी बौध्दिक विरासत से अवगत करा सकते हैं। लेकिन हमको शरीर के तल पर जीने की बजाय आत्मा के तल पर जीना होगा।

उन्होंने कहा कि पूज्यप्रभुपाद जी ने गीता के माध्यम से इस्कॉन को 100 से ज्यादा देशों में स्थापित कर कृष्ण की महिमा को पहुँचाया है और दुनिया में 700 कृष्ण मंदिरों की स्थापना की है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में च्वाईस कंपनी के श्री कमल पोद्दार ने कहा कि  तुलसीदास जी ने प्रभु श्री राम के जन्म के महत्व को विप्र, धेनु सुर संत हित लियो मनुज अवतार से रेखांकित किया. यानी श्री राम का जन्म विद्वानों, गाय, देवताओं और मनुष्य के कल्याण के लिए हुआ था इसमें भी गाय को दूसरे क्रम पर रखा गया था। इसीसे हम समझ सकते हैं कि भारतीय संस्कृति में गाय का क्या महत्व है।

उन्होंने गौभारती ग्रंथ के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आप जब इस ग्रंथ को देखेंगे तो पाएंगे कि इसमें गाय की उपयोगिता के कितने आयामों के बारे में बताया गया है। उन्होंने एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद वल्लब पंत को एक गोपनीय पत्र देकर गीता प्रेस गोरखपुर के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार के पास भेजा। जब वो पत्र पोद्दार जी ने खोलकर देखा तो उन्होंने अपनी अस्वीकृति में सिर हिला दिया। तब पंतजी ने उनसे पूछा कि इस पत्र में क्या लिखा है तो पोद्दार जी ने कहा कि राष्ट्रपतिजी मुझे भारत रत्न का अलंकरण देना चाहते हैं जो मुझे स्वीकार्य नहीं। श्री पोद्दार ने कहा कि जो लोग रा,टर् के कार्य में लगे होते हैं उनको किसी तरह का पुरस्कार प्रभावित नहीं करता।

ईश्वरसृष्टि के संस्थापक श्री कमलेश पारीक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पारीक जी ने ईश्वर सृष्टि के माध्यम से भारतीय संस्कृति की एक ऐसी लौ जगाई है जो आने वाले कई वर्षों तक हमारी संस्कृति को आलोकित करती रहेगी।  कमलेश जी ने इस ग्रंथ के माध्यम से हमारे गौवंश को लेकर जो शोधपूर्ण लेख प्रकाशित किए हैं, उनको पढ़कर ही रोमांच और गर्व महसूस होता है।

इस अवसर पर श्री कमलेश पारीक ने बताया कि राजस्थान के सीकर में ईश्वर सृष्टि के माध्यम से एक ऐसा प्रकल्प तैयार किया गया है जिसमें ऋषि-कृषि तंत्र मंत्र और गौसंवर्धन संरक्षण का कार्य किया जाएगा। इसमें आयुर्वेद प्राकृतिक चिकित्सा और गौशाला का प्रारंभ हो चुका है, आने वाले समय में निःशुल्क गुरुकुल के माध्यम से वेदों और संस्कृत को संरक्षित करने का कार्य किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निष्ठावान स्वयं सेवक ईश्वर सृष्टि की स्थापना से लेकर गौभारती ग्रंथ के प्रेरणास्त्रोत रहे हैं। उनकी स्मृति में पहला गौसेवक पुरस्कार मुंबई के समर्पित गौ सेवक श्री

गौ भारती ग्रंथ के संपादक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक ने कहा कि यह ग्रंथ मात्र गाय की महिमा नहीं बताता है बल्कि गाय के माध्यम से हमारी प्राचीन संस्कृति, परंपरा और आने वाले भविष्य के प्रति जागरुक करता है।

इस पूरे आयोजन को सफल बनाने में च्वाईस समूह के श्री सुयश पाटोदिया का विशेष सहयोग रहा।

समारोह में जाने माने उद्योगपति श्री रामप्रकाश बूबना, सुधीर जी विद्वंस, एकल अभियान के श्री सत्यनारायण काबरा अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इसके अतिरिक्त मुंबई शहर की कई संस्थाओं के प्रतिनिधि इस कार्यक्रम के साक्षी बने। कार्यक्रम में सीताराम पारीक, जयचंद शेट्टी, संजय पटेल जैसे समर्पित सेवाभावी लोगों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। जयपुर से पुष्कर उपाध्याय, अहमदाबाद से विजय परसाण, इन्दौर से श्री सुरेन्द्र त्रिपाठी, सीकर से महेश ठाकर इस कार्यक्रम के साक्षी बनने के लिए विशेष रूप से आए। कार्यक्रम का संचालन श्री विनोद मोरवाल ने किया।

ईश्वरसृष्टि के संस्थापक श्री कमलेश पारीक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पारीक जी ने ईश्वर सृष्टि के माध्यम से भारतीय संस्कृति की एक ऐसी लौ जगाई है जो आने वाले कई वर्षों तक हमारी संस्कृति को आलोकित करती रहेगी।  कमलेश जी ने इस ग्रंथ के माध्यम से हमारे गौवंश को लेकर जो शोधपूर्ण लेख प्रकाशित किए हैं, उनको पढ़कर ही रोमांच और गर्व महसूस होता है।

इस अवसर पर श्री कमलेश पारीक ने बताया कि राजस्थान के सीकर में ईश्वर सृष्टि के माध्यम से एक ऐसा प्रकल्प तैयार किया गया है जिसमें ऋषि-कृषि तंत्र मंत्र और गौसंवर्धन संरक्षण का कार्य किया जाएगा। इसमें आयुर्वेद प्राकृतिक चिकित्सा और गौशाला का प्रारंभ हो चुका है, आने वाले समय में निःशुल्क गुरुकुल के माध्यम से वेदों और संस्कृत को संरक्षित करने का कार्य किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निष्ठावान स्वयं सेवक ईश्वर सृष्टि की स्थापना से लेकर गौभारती ग्रंथ के प्रेरणास्त्रोत रहे हैं। उनकी स्मृति में पहला गौसेवक पुरस्कार मुंबई के समर्पित गौ सेवक श्री लक्ष्मीनारायण चाण्डक को प्रदान किया गया ।

गौ भारती ग्रंथ के संपादक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक ने कहा कि यह ग्रंथ मात्र गाय की महिमा नहीं बताता है बल्कि गाय के माध्यम से हमारी प्राचीन संस्कृति, परंपरा और आने वाले भविष्य के प्रति जागरुक करता है।

इस पूरे आयोजन को सफल बनाने में च्वाईस समूह के श्री सुयश पाटोदिया और श्री लक्ष्मीकांत सिंगड़ोदिया का विशेष सहयोग रहा।

समारोह में जाने माने उद्योगपति श्री रामप्रकाश बूबना, सुधीर जी विद्वंस, एकल अभियान के श्री सत्यनारायण काबरा अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इसके अतिरिक्त मुंबई शहर की कई संस्थाओं के प्रतिनिधि इस कार्यक्रम के साक्षी बने। कार्यक्रम में सीताराम पारीक, जयचंद शेट्टी, संजय पटेल जैसे समर्पित सेवाभावी लोगों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। जयपुर से पुष्कर उपाध्याय, अहमदाबाद से विजय परसाण, इन्दौर से श्री सुरेन्द्र त्रिपाठी, सीकर से महेश ठाकर इस कार्यक्रम के साक्षी बनने के लिए विशेष रूप से आए। कार्यक्रम का संचालन श्री विनोद मोरवाल ने किया।

टोपी , रोटी और नींबू का अचार

यह अद्भुत संयोग है कि अपने समय का सर्वाधिक ख़ूंख़ार शासक औरंगज़ेब टोपियां सिलता था , अपनी आजीविका के लिए l आज के समय का एक औरंगज़ेब जेल में नींबू का अचार डाल कर , रोटी अचार खाने लगता है l इस भय से कि कहीं उस के भोजन में धीमा जहर न दे , दे सरकार l मसलन मुख़्तार अंसारी को जेल में ज़हर , धीमा ज़हर देने का इल्ज़ाम लगाता है , यह आज काऔरंगज़ेब l

इस क्रूर औरंगज़ेब को अगर धीमा ज़हर देना ही चाहे कोई सरकार तो रोटी वाले आटे में भी मिला सकती है l नींबू में भी l लेकिन विक्टिम कार्ड खेलने के लिए नींबू का अचार और रोटी का रोड मैप बनाना पड़ता है l सिर्फ़ नींबू अचार खा कर कोई पाँच साल तक स्वस्थ सानंद नहीं रह सकता l इतना कि विष बुझे संवाद बोल-बोल कर अपने गुनाहों की ढाल नींबू अचार को बनाना पड़ जाता है l

भारत माता को डायन बताने वाले , कभी पूरी अभद्रता से जया प्रदा की चड्ढी का रंग बताने वाले , कलक्टर से जूता साफ़ करवाने की हसरत रखने वाले इस क्रूर औरंगज़ेब को लोकतंत्र में नहीं , शरिया में यक़ीन है l समूचे उत्तर प्रदेश को बिना लाइसेंस के बूचड़खाने में तब्दील कर दिया था l मुलायम सिंह यादव को , अखिलेश यादव को बतौर मुख्य मंत्री , अपने इशारे पर नचाने वाले , रामपुर को जहन्नुम बनाने वाले इस आज के औरंगज़ेब को अभी क़ानून में ठीक से यक़ीन दिलाने के लिए अभी बहुत कुछ और करने की ज़रूरत है l इस औरंगज़ेब को नहीं मालूम कि जेल मैनुअल और क़ानून का राज है , देश और उत्तर प्रदेश में l

शुक्रिया है , इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का कि इस औरंगज़ेब की कोर्निश बजाते हुए भी , इसे इस की बात में नंगा कर दिया है l इतना कि नींबू अचार पानी मांगे और टोपियां सिलने के लिए आईना मिल जाए l जब तक सज़ा का ऐलान नहीं होता , तब तक ज़मानत को इंजवाय करो , आज के औरंगज़ेब ! यह क्रूरता , हेकड़ी और अकड़ का जमजम तुम्हारे लिए ही है l

श्याम जी कृष्ण वर्मा: लंदन में अखबार निकाला , अंग्रेजों के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव लाये

4 अक्टूबर 1857 : जन्म दिवस

श्यामकृष्ण जी वर्मा ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जिन्होंने न केवल देश विदेश में अंग्रेजों से मुक्ति का वातावरण बनाया अपितु क्राँतिकारियों की एक पूरी पीढ़ी का मार्ग दर्शन किया। इनमें जिसमें स्वातंत्र्यवीर विनायक सावरकर जी से लेकर मदनलाल ढींगरा तक एक लंबी सूची है । उनका निधन जिनेवा में हुआ था ।

ऐसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और “क्राँति गुरू” कहे जाने वाले श्यामकृष्ण जी वर्मा का जन्म 4 अक्टूबर 1857 को गुजरात प्राँत के कच्छ जिला अंतर्गत ग्राम मांडवी में हुआ था । उनके पिता श्रीकृष्ण वर्मा संस्कृत के विद्वान थे और माता गोमती देवी भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं के अनुरुप जीवनशैली में रची बसी थीं। श्यामजी की आरंभिक शिक्षा अपने गाँव में ही हुई । बालपन में ही उन्हें संस्कृत का अद्भुत ज्ञान हो गया था । उन्होंने घर में भारतीय वाड्मय के संस्कृत ग्रंथों का भी अध्ययन किया । जब वे ग्यारह वर्ष के थे तब माता का निधन हो गया था ।फिर उनकी देखभाल दादी ने की । महाविद्यालयीन शिक्षा के लिये मुम्बई गये ।

संस्कृत ज्ञान और कुशाग्र बुद्धि के कारण पूरे महाविद्यालय में चर्चित हो गये। जिन दिनों श्यामजी कृष्ण वर्मा बम्बई में रह रहे थे तब 1875 में उनकी भेंट स्वामी दयानन्द सरस्वती से हुई । स्वामीजी मुम्बई आये थे । श्यामजी ने प्रवचन सुने । इसी वर्ष मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना हुई । श्यामजी आर्य समाज से जुड़ गये । और आर्यसमाज द्वारा किये जा रहे वेदों के भाष्यानुवाद से भी जुड़ गये । इसी वर्ष ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय लंदन के संस्कृत विभाग के प्रमुख मोनियर विलियम भारत आये थे । वे ऐसे संस्कृत विद्वानों से मिलना चाहते थे जो अंग्रेजी भी जानते हों। युवा श्याम जी की उनसे भेंट हुई ।

श्याम जी की विद्वता से प्रभावित मोनियर जी ने श्याम जी को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय लंदन आमंत्रित किया । इसी बीच हुआ । उनकी पत्नि भानुमति एक सुप्रसिद्ध व्यापारी की बेटी थी । भानुमति के पिता ने उन्हें लंदन भेजने का प्रबंध किया । वे 1878 में इंग्लैड गये । कुछ दिन श्री मोनियर के सहायक के रूप में रहे फिर उनकी अनुशंसा पर 1879 में बी ए करने के लिये बैलियोज कॉलेज में प्रवेश ले लिया। इस महाविद्यालय से अपनी पढ़ाई के साथ निजी स्तर पर संस्कृत का अध्ययन भी निरंतर रहा । उन्होंने 1883 में बी ए किया और संस्कृत में डिग्री भी ।

लंदन में रहकर बी ए करने वाले पहले भारतीय थे । बी ए की डिग्री और संस्कृत ज्ञान के कारण ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अध्यापक पद नियुक्त हो गये । ऑक्सफोर्ड में संस्कृत के साथ वे भारतीय विद्यार्थियों को गुजराती और मराठी भी पढ़ाया करते थे।
प्राध्यापक के रूप में भी उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी और वकालत में प्रवेश ले लिया । बैरिस्टरी की परीक्षा पास करके भारत लौट आये । उन्होंने बम्बई में वकालत शुरु की । पर मन न लगा। वकालत छोड़कर मध्यप्रदेश के रतलाम चले आये । इसका कारण यह था कि मुंबई में छात्र जीवनसे लंदन तक और लौटकर वकालत में भी उन्होंने अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ किया जाने वाला घोर अपमान देखा था । पर उनके सामने कुछ विकल्प न था। इसलिए पहले सब सहा और फिर मुम्बई छोड़कर छोटी जगह चल दिये ।

रतलाम आकर रियासत के दीवान हो गये । कुछ दिन रतलाम रहकर 1893 में राजस्थान के उदयपुर चले गये। वहाँ राज्य कौंसिल के सदस्य बने। उदयपुर में तीन वर्ष रहे। उसके बाद जूनागढ़ चले गये और वहाँ भी दीवान पद पर नियुक्ति मिल गई। किन्तु जूनागढ़ में तैनात अंग्रेज पोलिटिकल एजेंट से विवाद हो गया । तब उन्होंने मन ही मन कुछ संकल्प किया और दीवानी छोड़कर पुनः वकालत करने मुम्बई आ गये । श्यामजी एक संवेदनशील और स्वाभिमानी व्यक्ति थे । भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पण भी अटूट था। उन्होंने हर कदम पर भारतीयों का अपमान देखा था । इसलिए उन्होंने स्वाभिमान रक्षा के लिये समाज को जाग्रत करने का संकल्प किया । सबसे पहले अपने साथी वकीलों का एक समूह बनाया और ऐसे भारतीयों के समर्थन में मुक़दमें लड़ना आरंभ किया । जिनपर पुलिस अत्याचार करती थी । और बिना किसी अपराध के जेल में ठूंस देती थी ।

यह 1898 का वर्ष था । चापेकर बन्धुओं ने पूना में गवर्नर की हत्या कर दी थी। इस घटना की गूँज पूरे देश में हुई । चापेकर बन्धु गिरफ्तार हुये और उन्हें फांसी दे दी गई। उन्हीं दिनों तिलकजी भी गिरफ्तार किये गये । मुम्बई के वकीलों ने तिलक जी गिरफ्तारी का विरोध किया और चाफेकर बंधुओं पर मुकदमा चलाने के तरीके पर भी आपत्ति की । चाफेकर बंधुओं पर चला मुकदमा एक औपचारिकता था । श्यामजी और वकीलों के इस समूह ने महाराष्ट्र कांग्रेस से भी आपत्ति दर्ज कराने का आग्रह किया। काँग्रेस ने आवेदन तो दिया पर विरोध के लिये खुलकर आगे न आ सकी । उन्हीं दिनों स्वामी श्रृद्धानंद मुम्बई आये । श्याम जी की उनसे भेंट हुई और संघर्ष की योजना बनी । इस योजना के अनुसार श्याम जी ने देशभर के उन संघर्षशील नौजवानों को संगठित करने का निर्णय लिया जो अपने स्तर पर स्थानीय तौर पर अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र अभियान चला रहे थे ।

इस अभियान के बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र तीन प्रमुख केन्द्र थे।

श्याम जी ने पंजाब, बंगाल और पूना की यात्रा की उनके संपर्क साँझा किये । पंजाब के क्राँतिकारियों को जो संपर्क बंगाल और महाराष्ट्र से बना था उसमें श्यामजी की भूमिका महत्वपूर्ण थी । इतना करके वे पुनः लंदन रवाना हुये । वे लंदन मेंउन नौजवानों में स्वाभिमान संघर्ष की नींव रखना चाहते थे जिन्हें अंग्रेजों के अपमान जनक व्यवहार की आदत हो गई थी । उन्होनें लंदन में तीन काम आरंभ किये । एक लंदन में रहने वाले सभी भारतीयों को एक सूत्र पिरोने का, दूसरा लंदन में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिये छात्रावास का और तीसरा भारतीयों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिये एक समाचारपत्र निकालने का । उन्होंने फरवरी 1905 को लंदन में “द इंडियन होम रूल सोसाइटी” नाम से एक संस्था का गठन किया । इसके गठन के लिये पहली बैठक उनके हाईगेट स्थित घर पर हुई । श्याम जी सोसायटी के संस्थापक अध्यक्ष बने । इस होमरूल सोसायटी का केन्द्र का नाम “इंडिया हाउस” रखा गया । जो 65, क्रॉमवेल एवेन्यू, हाईगेट में स्थित था । इसे एक छात्रावास का रूप दिया गया जिसमें । 25 छात्रों को रहने की व्यवस्था थी । इसका औपचारिक उद्घाटन 1 जुलाई को सोशल डेमोक्रेटिक फेडरेशन के हेनरी हाइंडमैन द्वारा हुआ । इस अवसर पर दादाभाई नौरोजी , लाला लाजपत राय , मैडम कामा, लंदन पॉज़िटिविस्ट सोसाइटी के श्री स्विनी और श्री हैरी, एसआर राणा , विनायक दामोदर सावरकर, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय और लाला हरदयाल उपस्थित थे ये सभी रूप से जुड़ गये ।

इंडिया हाउस का सारा खर्च श्याम जी स्वयं उठाते थे । इंडिया हाउस भारतीयों की सभा संगोष्ठियों का केन्द्र बन गया था । इन सभाओं में भारत की स्वतंत्रता पर खुलकर बात होती । आगे चलकर भाई परमानन्द और बिट्ठलभाई पटेल भी इंडिया हाउस से जुड़ गये ।इसी वर्ष इंग्लैण्ड से उन्होंने एक मासिक समाचार-पत्र “द इण्डियन सोशियोलोजिस्ट” का प्रकाशन आरंभ किया, जिसे आगे चलकर जिनेवा से भी प्रकाशित किया गया। इंग्लैण्ड का यह इंडिया हाउस क्रान्तिकारी आँदोलन का प्रेरणा केन्द्र बन गया । अनेक क्राँतिकारी नौजवान उनके शिष्य बने इनमें क्रान्तिकारी मदनलाल ढींगरा और स्वातंत्र्यवीर सावरकर उनके प्रिय शिष्यों में थे। सावरकर जी ने श्यामजी के मार्गदर्शन में ही 1857 की क्रांति पर पुस्तक लेखन आरंभ किया था।

1906 में भारत में स्वदेशी आन्दोलन आरंभ हुआ । बंगाल में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी सहित अनेक आँदोलनकारी बंदी बनाये गये । इस पर इंडिया हाउस में सभा हुई और अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध निन्दा प्रस्ताव पारित किया गया । इसकी प्रतियाँ समाचार पत्रों को भी भेजीं गई। इसके साथ श्याम जी ने विभिन्न देशों और नगरों में जाकर संगोष्ठियों में भाग लेना आरंभ किया और अंग्रेज सरकार के विरुद्ध खुलकर बोलते । इसी कड़ी में होलबोर्न टाउन हॉल में आयोजित यूनाइटेड कांग्रेस ऑफ़ डेमोक्रेट्स की संगोष्ठी में पहुँचे । जिसमें वे भारतीय स्वाभिमान पर खुलकर बोले । इस पर उन्हें सराहना भी मिली। श्यामजी के आलेख न केवल उनके समाचार पत्र में अपितु आयरिश, जिनेवा और फ्रांस के कुछ समाचार पत्रों में भी छपने लगे । पर इंग्लैंड के समाचार पत्रों में उनकी गतिविधियों की आलोचना होने लगी । वे ब्रिटिश सरकार की नजर में चढ़े । उनकी गिरफ्तारी होती इससे पहले ही वे लंदन से निकल कर पेरिस पहुँचे । श्यामजी ने अपना मुख्यालय पेरिस बना लिया । इंडिया हाउस का प्रभार सावरकर जी ने संभाला ।

इंडिया हाउस की गतिविधियों में कोई अंतर न आया । श्यामजी 1914 तक पेरिस में रहे। और अपना क्रान्तिकारी अभियान चलाते रहे। ‘इंडियन सोशियोलॉजी’ के कुछ अंक पेरिस से प्रकाशित हुए।

उनकी सक्रियता और क्राँतिकारी गतिविधियों के कारण उनपर पेरिस में भी नजर रखी जाने लगी। पूछताछ भी हुई । तब वे पेरिस छोड़कर जिनेवा आ गये । और जिनेवा में ही उन्होंने 30 मार्च 1930 को अपने जीवन की अंतिम श्वाँस ली ।

जिनेवा में रहने वाले भारतीयों ने उननका दाह संस्कार करके अस्थियाँ जिनेवा की सेण्ट जॉर्ज सीमेट्री में सुरक्षित रख दीं । कुछ दिनों बाद में उनकी पत्नी भानुमती कृष्ण वर्मा का भी निधन हो गया । उनकी अस्थियाँ भी उसी सीमेट्री में रख दी गयीं। उनके निधन के बहत्तर वर्ष बाद 22 अगस्त 2003 को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के अनुरोध पर स्विस सरकार ने श्यामजी और उनकी पत्नी भानुमती जी की अस्थियों को भारत भेज दीं। जब ये अस्थियाँ मुम्बई पहुँची तब मुम्बई से लेकर माण्डवी तक राजकीय सम्मान के साथ भव्य जुलूस के रूप में अस्थि-कलश गुजरात लाये गये। श्याम जी के जन्म स्थान पर क्रान्ति-तीर्थ बनाया गया और इसी परिसर में श्यामजी कृष्ण वर्मा स्मृतिकक्ष बनाकर अस्थियाँ संरक्षित की गई ।

यह मेमोरियल 13 दिसम्बर 2010 को राष्ट्र को समर्पित किया गया। कच्छ जाने वाले सभी देशी विदेशी पर्यटकों के लिये माण्डवी का “क्रान्ति-तीर्थ” एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है।

Ramesh Sharma
(लेखक ऐतिहासिक व्यक्तियों व राष्ट्र के लि़ए समर्पित लोगों के लि़ए शोधपूर्ण लेख लिखते हैं)