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असमानताओं पर प्रहार, समानता का विस्तारः एक सार्थक पुकार

विश्व सामाजिक न्याय दिवस- 20 फरवरी, 2026

संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिवर्ष 20 फरवरी को मनाया जाने वाला विश्व सामाजिक न्याय दिवस आज के समय में केवल असमानताओं पर प्रहार एवं समानता के विस्तार की एक सार्थक पुकार का अंतरराष्ट्रीय आयोजन ही नहीं, बल्कि वैश्विक चेतना का आह्वान है। वर्ष 2026 में यह दिवस विशेष महत्व ग्रहण कर रहा है, क्योंकि विश्व तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था, तकनीकी संक्रमण, जलवायु संकट, राजनीतिक ध्रूवीकरण और सामाजिक असमानताओं के बीच नई संतुलित व्यवस्था की तलाश में है। इस वर्ष की थीम “समावेश को सशक्त बनानाः सामाजिक न्याय के लिए अंतर को पाटना” हमें यह याद दिलाता है कि विकास तभी सार्थक है जब वह समावेशी हो और समावेशन तभी प्रभावी है जब वह न्यायपूर्ण हो।

सामाजिक न्याय का अर्थ केवल अवसरों की समानता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक व्यवस्था की स्थापना का आग्रह करता है जिसमें संसाधनों, अधिकारों और गरिमा का निष्पक्ष वितरण सुनिश्चित हो। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा की समान उपलब्धता नहीं मिलती, तब तक प्रगति अधूरी है। 2026 की थीम विशेष रूप से उन समुदायों की भागीदारी पर बल देती है जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे हैं-चाहे वे आर्थिक रूप से वंचित हों, सामाजिक रूप से उपेक्षित हों या राजनीतिक रूप से प्रतिनिधित्व से दूर हों। समावेशन का सशक्तिकरण केवल नीतिगत घोषणा नहीं, बल्कि निर्णय-प्रक्रिया में सक्रिय सहभागिता का अधिकार है।

आज वैश्विक स्तर पर असमानताओं की खाई कई रूपों में दिखाई देती है। एक ओर तकनीकी क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता रोजगार के नए अवसर सृजित कर रही है, तो दूसरी ओर पारंपरिक श्रम-आधारित रोजगार असुरक्षित होते जा रहे हैं। डिजिटल विभाजन नई सामाजिक दूरी का कारण बन रहा है। ग्रामीण और शहरी, विकसित और विकासशील, पुरुष और महिला, सक्षम और दिव्यांग-इन सबके बीच संसाधनों की असमान पहुंच सामाजिक तनाव को जन्म देती है। ऐसे समय में सामाजिक न्याय का अर्थ है इन अंतरों को पहचानना और उन्हें पाटने के लिए लक्षित, संवेदनशील और पारदर्शी नीतियों का निर्माण करना। सम्मानजनक कार्य की अवधारणा भी सामाजिक न्याय के केंद्र में है। केवल रोजगार उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं, बल्कि ऐसा कार्य-संस्कृति बनाना आवश्यक है जिसमें उचित वेतन, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियां और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो। आर्थिक विकास तभी टिकाऊ हो सकता है जब वह मानव गरिमा के साथ जुड़ा हो। यदि विकास केवल आंकड़ों में सीमित रह जाए और आम नागरिक के जीवन में राहत न ला सके, तो वह विकास नहीं, केवल विस्तार है।

मजबूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र इस युग की अनिवार्यता बन चुका है। कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि संकट किसी भी समाज को अचानक अस्थिर कर सकता है। बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट और आर्थिक मंदी से निपटने के लिए सामाजिक सुरक्षा जाल का सुदृढ़ होना अत्यंत आवश्यक है। वृद्धजन, दिव्यांग, महिलाएं, बच्चे और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक-इन सभी के लिए संरक्षित ढांचा ही न्यायपूर्ण समाज की नींव है। भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में सामाजिक न्याय का विचार ऐतिहासिक और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों के माध्यम से एक ऐसे समाज की कल्पना की है जहां जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर भेदभाव न हो। आज भी सामाजिक न्याय का प्रश्न केवल आर्थिक असमानता तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक पूर्वाग्रहों, लैंगिक भेदभाव, क्षेत्रीय असंतुलन और सांस्कृतिक असमानताओं से भी जुड़ा है।

समकालीन भारत में सामाजिक न्याय के संदर्भ में विभिन्न सरकारी योजनाओं और पहलों के माध्यम से वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, वरिष्ठ नागरिक और नशा-पीड़ित व्यक्तियों के सशक्तिकरण हेतु अनेक योजनाएं संचालित की गई हैं। सरकार का दृष्टिकोण यह रहा है कि सामाजिक न्याय विभाजन की राजनीति नहीं, बल्कि समावेशन की नीति के माध्यम से स्थापित हो। “संतुष्टिकरण” बनाम “तुष्टिकरण” की अवधारणा इसी दिशा में एक वैचारिक संकेत है, जो समाज को जोड़ने की बात करती है। फिर भी चुनौतियां शेष हैं। महंगाई, बेरोजगारी, पर्यावरणीय संकट और बढ़ती जीवन-यापन लागत आम नागरिक के लिए वास्तविक कठिनाइयां उत्पन्न करती हैं। लोकतंत्र का उद्देश्य केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं, बल्कि जनसंतोष और जनकल्याण सुनिश्चित करना है। यदि नागरिक स्वयं को असुरक्षित, असमान या उपेक्षित अनुभव करें, तो सामाजिक न्याय का आदर्श खोखला प्रतीत होने लगता है।

आज आवश्यकता है कि सामाजिक न्याय को केवल राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व के रूप में देखा जाए। हमने आचरण की पवित्रता एवं पारदर्शिता की बजाय कदाचरण एवं अनैतिकता की कालिमा का लोकतंत्र बना रखा है। ऐसा लगता है कि धनतंत्र एवं सत्तातंत्र ने जनतंत्र को बंदी बना रखा है। हमारी न्याय-व्यवस्था कितनी भी निष्पक्ष, भव्य और प्रभावी हो, फ्रांसिस बेकन ने ठीक कहा था कि ‘यह ऐसी न्याय-व्यवस्था है जिसमें एक व्यक्ति की यंत्रणा के लिये दस अपराधी दोषमुक्त और रिहा हो सकते हैं।’ रोमन दार्शनिक सिसरो ने कहा था कि ‘मनुष्य का कल्याण ही सबसे बड़ा कानून है।’ लेकिन हमारे देश के कानून एवं शासन व्यवस्था को देखते हुए ऐसा प्रतीत नहीं होता, आम आदमी सजा का जीवन जीने को विवश है। सामाजिक न्याय के लिए सामाजिक एकता भंग नहीं की जा सकती। शासन और प्रशासन की प्रत्येक नीति का अंतिम लक्ष्य मानव कल्याण होना चाहिए। यदि शक्ति के स्रोत जनहित में प्रयुक्त न हों, तो वे असंतोष और अविश्वास को जन्म देते हैं। विश्व सामाजिक न्याय दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। क्या हमारा लोकतंत्र समानता का लोकतंत्र है या विभेद का? क्या हमारी स्वतंत्रता सबके लिए समान अवसर लेकर आई है या केवल कुछ वर्गों तक सीमित है? क्या हमारी नीतियां पारदर्शिता और नैतिकता पर आधारित हैं या वे जटिलता और असमानता को बढ़ा रही हैं? इन प्रश्नों का उत्तर ईमानदारी से खोजना ही इस दिवस की सार्थकता है।

सामाजिक न्याय केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं, समाज की भी सामूहिक जिम्मेदारी है। जाति, धर्म, वर्ग और लिंग के भेद से ऊपर उठकर यदि नागरिक परस्पर सम्मान और सहयोग की भावना विकसित करें, तो सामाजिक ताने-बाने को सुदृढ़ किया जा सकता है। शिक्षा संस्थान, नागरिक संगठन, धार्मिक और सांस्कृतिक मंच-सभी को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। नई वैश्विक अर्थव्यवस्था में जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा और डिजिटल नवाचार नए अवसर प्रदान कर रहे हैं, वहीं यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इन अवसरों का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचे। अन्यथा विकास की गाड़ी कुछ लोगों को आगे ले जाएगी और शेष को पीछे छोड़ देगी। समावेशन का सशक्तिकरण इसी असंतुलन को रोकने का प्रयास है। प्रतिदिन कोई न कोई कारण महंगाई को बढ़ाकर हम सबको और धक्का लगा जाता है और कोई न कोई टैक्स, अधिभार हमारी आय को और संकुचित कर जाता है। जानलेवा प्रदूषण ने लोगों की सांसों को बाधित कर दिया, लेकिन हम किसी सम्यक् समाधान की बजाय नये नियम एवं कानून थोप कर जीवन को अधिक जटिल बना रहे हैं। सामाजिक न्याय व्यवस्था तभी सार्थक है जब आम जनता निष्कंटक एवं समस्यामुक्त समानता का जीवन जी सके।

2026 का यह दिवस हमें यह संदेश देता है कि न्याय और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। शांति, स्थिरता और समृद्धि का मार्ग सामाजिक न्याय से होकर ही गुजरता है। यदि समाज का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान, सुरक्षा और अवसर के साथ जीवन जी सके, तभी हम कह सकेंगे कि हमने सामाजिक न्याय के आदर्श को साकार किया है। इस तरह सामाजिक न्याय केवल नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि चेतना का प्रश्न है। यह हमारे विचारों, व्यवहार और निर्णयों में परिलक्षित होना चाहिए। जब नागरिक और शासन दोनों मिलकर समानता, गरिमा और अवसर की संस्कृति का निर्माण करेंगे, तभी विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाने की वास्तविक सार्थकता सिद्ध होगी। समावेश को सशक्त बनाकर और असमानताओं की खाई को पाटकर ही हम एक ऐसे समाज की रचना कर सकते हैं जो अधिक न्यायपूर्ण, अधिक मानवीय और अधिक स्थायी हो।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

आजादी के बाद अयोध्या की राजशाही

विमला देवी “बच्ची साहिबा”अयोध्या की राजमाता

राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह को 12 फरवरी, 1909 को अयोध्या का राजा घोषित किया गया था, और उन्होंने 1955 में उन्मूलन अधिनियम लागू होने तक अयोध्या राज पर शासन किया था। उनका शासन काल 1909 से 1955 तक रहा। राजा जगदंबिका प्रताप की एक ही ही बेटी थीं विमला। उनके पुत्र नहीं था। विमला की शादी डॉ रमेंद्र मोहन मिश्र से हुई थी। बाद में जगदंबिका प्रताप सिंह ने विमला देवी बच्ची साहिबा को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया।अपने दामाद डॉ रमेंद्र मोहन मिश्र बच्चा साहब को गोद लिया था। जिन्होंने स्वतंत्र भारत में अयोध्या राज की कमान संभाली और विधान परिषद के लिए चुने गए। दामाद जी का परिवार भी ब्राम्हण रहा। गोद लेने के बाद ही इस राजपरिवार के सदस्यों के नाम के आगे मिश्रा उपनाम जुड़ा।

 

विमलेंद्र मिश्र ‘पप्पू भइया’ राजसदन के मुखिया

महारानी विमला देवी बच्ची साहिबा के दो पुत्र विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र राजा साहब और शैलेन्द्र मोहन प्रताप मिश्र हुए, जिसमें विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के बड़े होने के कारण उन्हें इस राजवंश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला और उन्हें राजा अयोध्या के रूप में जाना जाने लगा। वे अयोध्या के राज परिवार के मुखिया के रूप में उभरे।

 

राजकुमारी विमला देवी एवं डॉ. रमेन्द्र मोहन मिश्र की तीसरी और चौथी संतान के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। पाँचवीं सन्तान के रूप में डॉ. अपर्णा मिश्र का 12 सितम्बर, 1970 को अयोध्या में जन्म हुआ। हिन्दी साहित्य में डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के उपरान्त उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से ‘हिन्दी रीतिकाव्य का विकास और महाराजा मानसिंह ‘द्विजदेव’ की काव्य-साधना’ विषय पर शोध उपाधि प्राप्त की। आजकल कामता प्रसाद सुन्दरलाल साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अयोध्या में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

 

 

पूर्व उत्तराधिकारी राजा विमलेंद्र मोहन मिश्रा जी को श्री रामजन्म भूमि निर्माण ट्रस्ट का भारत सरकार द्वारा ट्रस्टी और रिसीवर नियुक्त किया गया है। इन्होने इसके लिए पूर्व में श्री रामजन्म भूमि निर्माण ट्रस्ट को दस एकड़ जमीन दान दी।

 

विमलेंद्र अयोध्या राजवंश में कई पीड़ियों के बाद जन्म लेने वाले पुरुष उत्तराधिकारी थे। उनसे पहले तक गोद लिए हुए बेटों को ही राजवंश की विरासत सौंपी जाती रही। यही कारण था कि विमलेंद्र का बचपन कड़ी सुरक्षा में गुजरा। महारानी विमला देवी ने उन्हें बाहर पढ़ाने नहीं भेजा, इसकी बजाए स्थानीय स्कूल में ही उनकी शिक्षा हुई। 14 वर्ष की उम्र तक उन्हें अपनी हम उम्र लड़के साथ खेलने तक की इजाजत नहीं थी।

 

शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा योगदान

राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने अयोध्या में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए. उन्होंने कई डिग्री कॉलेज और इंटर कॉलेजों की अध्यक्षता की और शिक्षा कोबढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए. महाराजा इंटर कॉलेज, महाराजा पब्लिक स्कूल और साकेत महा विद्यालय जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में उनका विशेष योगदान रहा. उन्होंने अयोध्या में शिक्षा की अलख जगाई और विद्यार्थियों को बेहतर भविष्य देने के लिए महत्व पूर्ण पहल की।

 

चुनावी राजनीति में असफल रहे

वैसे राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने 2009 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद संसदीय सीट से बसपा के टिकट पर भाग्य आजमाया था। लेकिन वह यहां जीत हासिल नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने चुनावी राजनीति से दूरी बना ली। बताया जाता है कि महारानी विमला देवी विमलेंद्र के बसपा से चुनाव लड़ने के निर्णय के खिलाफ थीं।हालांकि उन्हें जीत नहीं मिली और कांग्रेस प्रत्याशी निर्मल खत्री ने हराया। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली। प्राचीन दौर में अयोध्या का ये राजपरिवार कांग्रेस पार्टी का करीबी माना जाता था। विमलेंद्र प्रताप मिश्र डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित रहे हैं. वह उत्तर प्रदेश की हेरिटेज योजना की कार्यकारिणी के सदस्य चुने जा चुके थे।

 

राम मंदिर ट्रस्ट के अहम सदस्य

अयोध्या राजा विमल मोहन प्रताप मिश्रा आरंभ से ही राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे। रामघाट स्थित न्यास कार्यशाला में राम मंदिर के लिए पत्थर की तराशी उन्हीं की जमीन पर हुई। जिसे बाद में उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट को दान में दे दिया है।

 

1992 में विवादित ढांचा टूटने के बाद उन्होंने रामलला के विराजमान होने के लिए चांदी का सिंहासन दिया। इसके बाद 5 फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ तो राजा विमलेंद्र मोहन को इसका वरिष्ठ सदस्य बनाया गया। 5 फरवरी 2020 को भूमि पूजन के दौरान राम लला सहित चारों भाइयों के विराजमान होने के लिए उन्होंने पुनः भव्य चांदी का सिंहासन राम मंदिर ट्रस्ट को दान में दिया। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के समय उन्होंने अयोध्या के वरिष्ठ संतो के साथ अयोध्या की विवाद के समाधान का प्रयास किया।

 

राममंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका

जब राम मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, उसके बाद ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी की ओर से सबसे पहले जिस वरिष्ठ सदस्य को चुना गया, वे थे राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र। तब तक श्रीराम जन्मभूमि परिसर के रिसीवर की जिम्मेदारी अयोध्या के कमिश्नर के पास थी, लेकिन जैसे ही ट्रस्ट अस्तित्व में आया, पहला चार्ज औपचारिक रूप से मिश्र को सौंपा गया। इससे पहले यह प्रभार अयोध्या केआयुक्त के पास था।

 

धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित जीवन

उनका जीवन धार्मिक और सामाजिक कार्यों को समर्पित रहा। राजा विमलेन्द्र प्रताप मोहन मिश्र को लोग प्यारसे ‘पप्पू भैया जी’ भी कहते थे। लोग उन्हें अयोध्या का राजा कहकर पुकारने लगे। वहअयोध्या रामायण मेला संरक्षक समिति के सदस्य भी थे। वैसे विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य अकेले ऐसे सदस्य रहे, जिन्हें पक्ष और विपक्ष सभी नेताओं से सम्मान मिलता था। परिवार भले ही राम जन्मभूमि के करीब था लेकिन वह तटस्थ ही रहते थे। यही कारण था कि राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद में दोनों ही पक्षों से उन्हें सम्मान मिलता था। राम मंदिर आंदोलन के दौरान जब विवादित ढांचा गिरा तब विमलेंद्र प्रताप मिश्र के घर से ही रामलला की प्रतिमा स्थल पर पहुंचाई गई। ये प्रतिमा उनके घर में बने अस्थायी मंदिर में विराजमान थी।

 

जनता के बीच लोकप्रिय व्यक्तित्व

राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र हमेशा अयोध्या की जनता के सुख-दुख में शामिल रहते थे. राज परिवार के दरवाजे आम जनता के लिए हमेशा खुले रहते थे. जो भी व्यक्ति राजसदन आता, उसे सम्मानपूर्वक मुलाकात का अवसर दिया जाता है।

 

विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र का निधन

अयोध्या के राजा 75 वर्षीय स्मृति शेष श्री विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने अयोध्या में स्थित राज सदन में अपनी अंतिम सांस ली। हाल ही में उनके रेट की हड्डी का ऑपरेशन हुआ था और लखनऊ में इसे चेकअप भी कराया गया था जो सामान्य रहा फिर भी रात के 11:00 बजे उनका बीपी को हुआ और उन्हें श्री राम हॉस्पिटल अयोध्या दिखाया गया जहां उन्हें मृतक घोषित कर दिया गया। उनका निधन 23 अगस्त 2025 की देर रात हुआ था। उनका अंतिम संस्कार 24 अगस्त 2025 को सरयू तट पर स्थित बैकुंठ धाम में किया गया। उनके ज्येष्ठ पुत्र यतींद्र मिश्र ने उन्हें मुखाग्नि दी थी।

 

अयोध्या के राजा विमलेंद्र प्रताप की अंतिम यात्रा स्थानीय राज सदन से निकली थी। अयोध्या वासियों ने उन्हें गमगीन माहौल में अंतिम विदाई दी थी। अंतिम यात्रा में जिले के प्रभारी मंत्री सूर्य प्रताप शाही, पूर्व प्रदेश सचिव अवनीश अवस्थी, अयोध्या सांसद अवधेश प्रसाद , राम जन्मभूमि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, जिलाधिकारी निखिल टीकाराम फुंडे समेत कई भाजपा नेता, संत-महंत व अयोध्यावासी सम्मिलित हुए। उनके निधन पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दुख जताया था।

लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

अमरीकी सामग्री से देसी भोजन का तड़का

खानपान के विकल्प केवल थाली में परोसे जाने वाले भोजन को ही नहीं गढ़ते। भारत में, वे तेजी से यह भी दर्शाते हैं कि शेफ और उपभोक्ता रसोई में विश्वसनीयता, स्रोत और प्रदर्शन के बारे में कैसे सोचते हैं। सामग्री कहाँ से आती है, पकने पर उनका व्यवहार कैसा होता है, और क्या वे भरोसेमंद परिणाम देती हैं—ये प्रश्न रोज़मर्रा के निर्णयों को आकार दे रहे हैं।

 

यह बदलाव भारतीय रसोईघरों में दिखाई देता है, जहाँ परिचित तकनीकों के साथ अब नए स्वाद जुड़ रहे हैं। लंबे समय से भारतीय बाज़ारों में मौजूद अमेरिकी सामग्री को अब नए नज़रिये से देखा जा रहा है। क्रैनबेरी संतरे के रस में पकती हैं। पेकान आसानी से पनीर में मिल जाते हैं। बतख अपनी ही चर्बी में धीरे-धीरे कुरकुरी होती है। मिलकर, ये संयोजन एक व्यापक कहानी की ओर इशारा करते हैं—ऐसी कहानी जिसमें खानपान विकल्प बाज़ारों और व्यापारिक संबंधों को भी आकार देते हैं।

 

दो खानपान पहलियों के माध्यम से—अमेरिकन कम्युनिटी सपोर्ट एसोसिएशन (अक्सा) में ‘टेस्ट ऑफ़ अमेरिका’ सामग्री प्रशिक्षण और नई दिल्ली के एक रिटेल आउटलेट ‘फ़ूड स्टोरीज़’ में आयोजित अमेरिकी खाद्य कुक-ऑफ़—अमेरिकी दूतावास ने दिखाया कि अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय रसोईघरों में स्वाभाविक रूप से कैसे फिट होते हैं। अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) के नेतृत्व में, इन पहलों का उद्देश्य केवल रेसिपी से प्रेरित करना नहीं था। उनका ध्यान बाज़ारों के विस्तार, पेशेवर आत्मविश्वास के निर्माण और अमेरिकी किसानों व निर्यातकों के लिए दीर्घकालिक आर्थिक विकास के समर्थन पर था।

 

उत्पादों का प्रशिक्षण
‘टेस्ट ऑफ़ अमेरिका’ सामग्री प्रशिक्षण ने अक्सा के सदस्यों, हॉस्पिटैलिटी विद्यार्थियों, और खाद्य एवं पेय पेशेवरों को एक साथ लाया, जहाँ सोर्सिंग, भंडारण और तैयारी पर मार्गदर्शन के साथ व्यावहारिक कुकिंग कराई गई। प्रशिक्षण का नेतृत्व करने वाली शेफ नेहा दीपक शाह कहती हैं कि सत्र को रेसिपी से आगे ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसमें दिल्ली-एनसीआर में पहले से उपलब्ध अमेरिकी कृषि उत्पादों का उपयोग किया गया।

 

वह कहती हैं, “सत्र का ध्यान इन सामग्रियों, उनकी विशिष्ट विशेषताओं, और उन्हें रोज़मर्रा तथा पेशेवर रसोई अनुप्रयोगों में सोच-समझकर शामिल करने की गहरी समझ विकसित करने पर था।”

 

मेन्यू में परिचित भारतीय प्रारूपों को अमेरिकी उत्पादों के साथ जोड़ा गया। उदाहरण के लिए, पनीर टिक्का को अमेरिकी क्रैनबेरी और पेकान के साथ नए रूप में प्रस्तुत किया गया। समोसों में ओरेगन हेज़लनट शामिल थे। बतख और टर्की को भारतीय रसोईघरों में प्रचलित तकनीकों के साथ प्रस्तुत किया गया।

 

शाह जोड़ती हैं, “जो बात वास्तव में उभरकर सामने आई, वह हर सामग्री में गुणवत्ता की उल्लेखनीय स्थिरता और विश्वसनीयता थी। ये शेफ और घरेलू रसोइयों को प्रयोग और नवाचार का आत्मविश्वास देते हैं, साथ ही निरंतर उच्च-गुणवत्ता के परिणाम सुनिश्चित करते हैं।”

हॉस्पिटैलिटी के सायन डोवारी ने इस सत्र को “आँखें खोलने वाला” बताया। वह कहते हैं, “मुझे विभिन्न अमेरिकी स्वादों, मेवों और बेरीज़ के बारे में जानने को मिला। मैं उन बेरीज़ को इन्फ़्यूज़न के रूप में भी इस्तेमाल कर सकता हूँ।”

 

एक अन्य प्रतिभागी, मंसंजम सिंह भाटिया—जो बारटेंडर हैं और सीआईआई इंस्टीट्यूट ऑफ़ हॉस्पिटैलिटी में विद्यार्थी हैं—ने विश्वसनीयता पर ज़ोर दिया। वह बताते हैं, “मेरे लिए जो मायने रखता है वह है निरंतरता। अमेरिकी सामग्री का मतलब है कि हमें पूरे साल एक ही आकार, एक ही आकृति और एक ही स्वाद मिलता है। गुणवत्ता और निरंतरता हमारे काम को बहुत आसान बना देती है।”

 

उपभोक्ताओं के लिए पकाना
फ़ूड स्टोरीज़ में आयोजित रिटेल कुक-ऑफ़ में, चार प्रतिभागियों ने शेफ, ख़रीदारों और उपभोक्ताओं की मौजूदगी में अमेरिकी सामग्रियों का उपयोग करते हुए मौलिक व्यंजन तैयार किए। इस प्रारूप ने उन्हें यह परखने का अवसर दिया कि ये सामग्री भारतीय-प्रेरित पकवानों में कैसे प्रदर्शन करती हैं।

 

ओशीन बंसल ने अपने ‘नूर-ए-कश्मीर ज़ाफ़रानी पुलाव’ के लिए कश्मीरी स्वादों से प्रेरणा ली, जिसमें अमेरिकी क्रैनबेरी को केंद्रीय तत्व के रूप में इस्तेमाल किया गया। वह कहती हैं, “आज से पहले, मैं क्रैनबेरी से कुछ हद तक परिचित थी, लेकिन उन्हें ज़्यादातर मिठाइयों और पेयों में ही इस्तेमाल होते देखा था।”

 

मल्लिका बनाती की विजेता रचना—क्रैनबेरी-ग्लेज़्ड टर्की विद पेकान पुलाव एंड पिस्ता बटर—में अमेरिकी पेकान को पकवान के केंद्र में रखा गया। उनके लिए अमेरिकी पेकान की लचीलेपन की विशेषता सबसे अलग थी। वह कहती हैं, “वे कितने बहुपयोगी हैं—करी से लेकर पाई तक, मीठे और नमकीन दोनों प्रकार की तैयारियों में आसानी से ढल जाते हैं,” और जोड़ती हैं कि अमेरिकी क्रैनबेरी “वह प्रमुख सामग्री थीं जो उस अतिरिक्त जान को जोड़ती हैं।”

 

मेहक आसिफ़ के लिए, कुक-ऑफ़ में टर्की पकाने का यह उनका पहला अनुभव था। उनका व्यंजन—पेकान-वॉलनट सॉस और क्रैनबेरी के साथ भरी हुई टर्की रूलाड—अमेरिकी पोल्ट्री को मेवों और फलों के साथ जोड़ता है।

 

दीपशी सलूजा ने चना कबाब के साथ प्लांट फ़ारवर्ड दृष्टिकोण अपनाया, जिसमें अमेरिकी चनों के साथ पिस्ता, अखरोट, ब्लूबेरी और क्रैनबेरी का उपयोग किया गया। वह कहती हैं, “मुझे सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात की हुई कि बेरीज़ कितनी बहुपयोगी हैं।” भारतीय मसालों के साथ जोड़े जाने पर, वह बताती हैं, वे “आम तौर पर मीठी मानी जाने वाली सामग्री से बदलकर तीखी, नमकीन और गहराई से स्वादिष्ट बन गईं।” सलूजा जोड़ती हैं कि बेरी जेल “इमली की चटनी के आधुनिक विकल्प के रूप में बेहद खूबसूरती से काम करता है।”

 

कुक-ऑफ़ का संचालन करने वाले शेफ अजय चोपड़ा बताते हैं कि अमेरिकी उत्पाद भारत में क्यों अच्छी तरह काम करते हैं। वह कहते हैं, “अमेरिकी सामग्रियों के साथ काम करने का रोमांचक पहलू उनकी बहुपयोगिता, काउंटर-सीज़नैलिटी और उच्च गुणवत्ता है।”

 

“अगर मैं एक क्लासिक लाल स्वादिष्ट सेब काटता हूँ, तो वह रसदार होता है, कुरकुरा होता है, और अपने वादे पर खरा उतरता है। अगर वह अमेरिकी पिस्ता है, तो उसकी ग्रेडिंग इतनी परफ़ेक्ट होती है कि हर पिस्ता लगभग एक ही आकार का होता है।”

 

मात्रा क्यों मायने रखती है
पर्दे के पीछे, मात्रा और सुरक्षा सोर्सिंग के निर्णयों को संचालित करते हैं। भारत में अमेरिकी खाद्य उत्पादों के लंबे समय से प्रचारक सुमित सरन बताते हैं कि शेफ अमेरिकी उत्पादों पर भरोसा क्यों करते हैं।

 

वह कहते हैं, “तीन बड़े स्तंभ हैं: गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति की निरंतरता। अमेरिकी उत्पाद यूएसडीए प्रमाणित होते हैं। अमेरिका में जो किसी ग्राहक के लिए उपलब्ध है, वही बिल्कुल भारत में ग्राहक तक पहुँचता है।”

 

यह एक बड़े बाज़ार में मायने रखता है। वह जोड़ते हैं, “हम छोटे स्तर से शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन जैसे ही मांग बढ़ती है, अमेरिका के पास उस मांग को पूरा करने की क्षमता और निरंतरता होती है।”

ये आँकड़े पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। सरन कहते हैं, “पाँच साल पहले क्रैनबेरी आयात लगभग 60 से 70 टन था। 2025 में, हम 5,000 टन तक पहुँच गए।” वह जोड़ते हैं, “वॉशिंगटन सेब स्वर्ण मानक हैं। आज आयात लगभग 5,00,000 टन के क़रीब है।”

रिटेल प्रमाण
उच्च-गुणवत्ता वाली उपज की इस मांग पर भारतीय ब्रांड भी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। स्नैकिंग ब्रांड नटी ग्रिटीज़ की संस्थापक दिनिका भाटिया बताती हैं कि अमेरिकी सामग्री कैसे विकास को गति देती हैं। वह कहती हैं, “हम जो उपभोग करते हैं, उसमें से लगभग 35 से 40 टन प्रति माह अमेरिकी सामग्री होती है। अमेरिकी सामग्री की वृद्धि 40 प्रतिशत है।”

 

वह इसे सीधे मानकों से जोड़ती हैं, और “गुणवत्ता, निरंतरता, कुरकुरापन और स्वाद” की ओर इशारा करती हैं। अमेरिका में प्रोसेसिंग प्लांट का अध्ययन और दौरा करने का उनका अनुभव उस भरोसे को और मज़बूत करता है। भाटिया बताती हैं, “मानकीकरण, मशीनीकरण, गुणवत्ता नियंत्रण और स्वच्छता—ये सब मैंने सबसे बेहतरीन देखे हैं।”

 

यह भरोसा मांग में तब्दील हो रहा है। पेकान, जो कभी अपरिचित थे, अब उनके सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले उत्पादों में शामिल हैं। वह कहती हैं, “पिछले महीने हमने पेकान में 100 प्रतिशत की वृद्धि देखी।”

 

जैसे-जैसे अधिक शेफ, रिटेलर और उपभोक्ता इन सामग्रियों के साथ काम कर रहे हैं, परिचय आत्मविश्वास में बदल रहा है। जो रसोईघरों में प्रयोग के रूप में शुरू होता है, वह स्थिर मांग, भरोसेमंद आपूर्ति शृंखलाओं और दीर्घकालिक व्यावसायिक संबंधों में तब्दील हो रहा है। इस अर्थ में, भारत में अमेरिकी सामग्रियों की कहानी केवल स्वाद या तकनीक की नहीं है, बल्कि इस बात की है कि रोज़मर्रा के खाद्य विकल्प कैसे चुपचाप व्यापार, विकास और साझा आर्थिक हितों का समर्थन करते हैं।

 

 

सामग्री के बारे में प्रशिक्षण से लेकर रिटेल शेल्फ़ तक, अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय रसोईघरों और बाज़ारों में नई भूमिकाएँ निभा रहे हैं।

Photo: (फूड स्टोरीज के रिटेल कुक ऑफ़ में चार प्रतिभागियों ने अमेरिकी उत्पादों का इस्तेमाल करते हुए मौलिक डिश तैयार कीं और यह दिखाया कि किस तरह से अमेरिकी कृषि उत्पाद स्वाभाविक तौर पर भारतीय रसोईघरों का हिस्सा बन जाते हैं। (फोटोग्राफ: इम्तियाज़ इमाम))

 

साभार: https://spanmag.state.gov/hi/ से

भू-विज्ञान मंत्रालय ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में ‘एआई फॉर ओशन्स ऑफ टुमॉरो: डेटा, मॉडल्स एंड गवर्नेंस’ पर चर्चा की

भू-विज्ञान मंत्रालय ने 16 से 20 फरवरी 2026 तक नई दिल्ली में चल रहे इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के हिस्से के तौर पर “एआई फॉर अवर ओशन्स ऑफ टुमॉरो: डेटा, मॉडल्स एंड गवर्नेंस” विषय पर उच्च-स्तरीय पैनल चर्चा का आयोजन किया।

पैनल में शामिल विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) भारत के समुद्री प्रबंधन, आपदा प्रबंधन, समुद्री आजीविका और नीली अर्थव्यवस्था के विकास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इस सत्र में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, अंतरराष्ट्रीय हस्तियां, वैज्ञानिक, उद्योगपति, स्टार्टअप और वित्तीय विशेषज्ञ समुद्री विज्ञान और नीति के साथ एआई के एकीकरण पर विचार-विमर्श करने के लिए एकत्रित हुए।

मौसम विभाग के महानिदेशक डॉ. एम. महपात्रा ने मुख्य भाषण देते हुए जलवायु नियंत्रण, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, खाद्य सुरक्षा और आजीविका में महासागरों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने महासागर अवलोकन, चक्रवात पूर्वानुमान, समुद्री डेटा प्रणालियों और प्रारंभिक चेतावनी सेवाओं में भारत की मजबूत राष्ट्रीय क्षमताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि तकनीकी प्रगति ने विपरीत मौसम के दौरान होने वाली जानमाल की हानि को काफी हद तक कम कर दिया है। उन्होंने अपने भाषण में विशेष रूप से महासागरों का गर्म होना, अम्लीकरण और समुद्र स्तर में वृद्धि जैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के संदर्भ में पारंपरिक भौतिक मॉडलों के पूरक के रूप में डेटा-आधारित और एआई-सक्षम मॉडलों के महत्व पर बल दिया। इसमें डीप ओशन मिशन को गहरे समुद्र की खोज, अपतटीय ऊर्जा, जैव विविधता संरक्षण और समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग पर केंद्रित एक प्रमुख राष्ट्रीय पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया।

इस सत्र को संबोधित करते हुए भारत में नॉर्वे की राजदूत सुश्री मे-एलिन स्टेनर ने महासागरों और नीली अर्थव्यवस्था में भारत-नॉर्वे के बढ़ते सहयोग पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब एआई को खुले, अंतरसंचालनीय और विश्वसनीय डिजिटल आधारों पर विकसित किया जाता है, तो यह मत्स्य प्रबंधन, जहाजरानी दक्षता, बंदरगाह संचालन और तटीय मजबूती को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ा सकता है। सुश्री स्टेनर ने कहा कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में भारत का अग्रणी होना इसे खुले डेटा, साझा मानकों और जिम्मेदार डिजिटल प्रबंधन पर आधारित एक वैश्विक डिजिटल महासागर ढांचा विकसित करने में सक्षम बनाएगा, जिससे न केवल भारत बल्कि वैश्विक समुदाय को भी लाभ होगा।

सत्र के उत्तरार्ध में सरकार, शिक्षा जगत, उद्योग और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों की एक पैनल चर्चा हुई। पैनल ने विचार-विमर्श किया कि भारत खुले डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) संचालित बुद्धिमत्ता और सुदृढ़ शासन ढांचे को एकीकृत करने वाले डिजिटल महासागर अवसंरचना विकसित करके वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करने के लिए विशिष्ट रूप से सक्षम है। समुद्री आजीविका को बढ़ावा देने, परिचालन लागत को कम करने और नीली अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में समय पर डेटा-आधारित निर्णय लेने में सक्षम बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आवश्यक होगी। बढ़ते डेटासेट के बावजूद, महासागर एक अत्यंत जटिल और डेटा-दुर्लभ क्षेत्र बना हुआ है, जिसके लिए भौतिकी-आधारित एआई और भौतिक इंटेलिजेंस के विकास की आवश्यकता है। महासागर एआई में प्रगति के लिए उन्नत अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, खुले और अंतरसंचालनीय प्रणालियों और साझा डिजिटल सार्वजनिक वस्तुओं की आवश्यकता होगी जो महासागरों की सीमा-पार प्रकृति को दर्शाती हैं। सहायक नीतियों, डेटा तरलता, मिश्रित वित्त और जोखिम-साझाकरण तंत्रों के साथ, नीली अर्थव्यवस्था एक स्थायी दीर्घकालिक विकास इंजन के रूप में उभर सकती है, जो भारत और विकासशील देशों (वैश्विक दक्षिण) के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार और निवेश के अवसर पैदा करेगी।

सत्र का समापन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के वैज्ञानिक जी और सलाहकार डॉ. (कमांडर) पी.के. श्रीवास्तव के संबोधन के साथ हुआ। उन्होंने महासागर से संबंधित कार्यक्रमों में एआई के एकीकरण के लिए एक संरचित मार्ग बनाने के प्रति मंत्रालय की प्रतिबद्धता को दोहराया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पीड़िता की मां ने कहा, न्याय में भरोसा बहाल हुआ

सुप्रीम कोर्ट के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को खारिज करने के बाद खुशी व राहत की सांस लेते हुए नाबालिग पीड़िता की मां ने कहा कि इस आदेश से न्याय में उनका भरोसा बहाल हुआ है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिछले साल मार्च में दिए गए फैसले में कहा था कि नाबालिग पीड़िता के वक्ष पकड़ने व सलवार का नाड़ा खोलने को बलात्कार का “प्रयास” नहीं माना जा सकता और यह सिर्फ बलात्कार की “तैयारी” थी। बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए नागरिक समाज संगठनों के नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) ने हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ तत्काल पीड़िता की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण और आपराधिक दंड विधान के स्थापित सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ करार देते हुए खारिज कर दिया। साथ ही, शीर्ष अदालत ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत दोनों आरोपियों के खिलाफ पहले से लगे बलात्कार के प्रयास के आरोप को भी बहाल कर दिया।

पीड़िता, जो घटना के समय सिर्फ 11 वर्ष की थी, की मां ने कहा, “इस फैसले से मेरा यह विश्वास बहाल हुआ है कि कानून बच्चों व पीड़ितों की सुरक्षा कर सकता है। मुझे उम्मीद है कि अब किसी बच्चे को अपने साथ हुए अत्याचार का विश्वास दिलाने के लिए ठोकर नहीं खानी पड़ेगी और इस फैसले से उन बहुत सारे बच्चों को मदद मिलेगी जो आवाज नहीं उठा पा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि जेआरसी तब उनके साथ खड़ा हुआ जब उन्हें लग रहा था कि वे असहाय हैं और कोई उनकी आवाज नहीं सुनेगा। उनके समर्थन से हम न्याय के लिए संघर्ष जारी रखने की हिम्मत जुटा पाए।

नवंबर 2021 में उत्तर प्रदेश के कासंगज में दो युवक 11 साल की नाबालिग बच्ची को जबरन घसीट कर एक पुलिया के नीचे ले गए और उसके कपड़े उतारने की कोशिश की। बच्ची की चीख पुकार सुन उधर से गुजर रहे दो राहगीर वहां पहुंचे जिसके बाद दोनों आरोपी मौके से भाग निकले। इस मामले में मार्च 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “यह कृत्य सिर्फ बलात्कार की ‘तैयारी’ है और यह स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि यह ‘बलात्कार का प्रयास’ या ‘बलात्कार’ है।” इस फैसले के नतीजे में आरोपों की गंभीरता काफी कम हो गई।

बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी ज्यादा नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए पीड़िता की ओर से शीर्ष अदालत में विशेष अनुमति याचिका दायर की। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इस तरह के मामलों में और अधिक संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश तय करने का अनुरोध भी किया गया।

हाई कोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल को निर्देश दिया कि वह यौन शोषण के संवेदनशील पीड़ितों से संबंधित मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों व न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता विकसित करने के उद्देश्य से एक समग्र व व्यापक दिशानिर्देश तय करने के लिए एक समिति गठित करे। कमेटी से तीन महीने में यह रिपोर्ट तैयार करने व सुप्रीम कोर्ट को सौंपने का अनुरोध किया गया है।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की ओर से पीड़िता की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका ने इसे ऐतिहासिक करार देते हुए कहा, “यह बच्चों की सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक दूरगामी फैसला है। यह एक स्पष्ट संदेश देता है कि न्यायिक विवेचना में पीड़ितों के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव या पूर्वाग्रह की कोई जगह नहीं है। इस फैसले के लिए हम खंडपीठ के आभारी हैं।” शीर्ष अदालत ने दिशानिर्देश तय करने में नेटवर्क से सुझाव भी मांगे हैं।

इसी बीच, जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा, “यह फैसला यौन हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय, गरिमा और संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के हमारे लंबे और दृढ़ संघर्ष का नतीजा है। हम सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हैं जिसने न्यायिक तंत्र में भरोसा बहाल किया है और इस विश्वास को मजबूत किया है कि बच्चों एवं कमजोर व संवेदनशील पृष्ठभूमि के लोगों के खिलाफ अपराधों को गंभीरता और अपेक्षित संवेदनशीलता के साथ देखा जाएगा।”

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जितेंद्र परमार
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चाहे तो शॉर्टकट ले लो या लाँगकट

मराठी के शौकिया रंगमंच पर एकदम नया-नया नाटक आया है- ‘शॉर्टकट लाँंगकट’। नया इन अर्थों में कि उसका पुणे के ‘श्रीराम लागू रंग-अवकाश केंद्र’ पर हालिया प्रयोग पाँचवाँ ही था। पुणे की ‘व्यक्ति’ संस्था ने इसे प्रस्तुत किया, उसे बने भी एक दशक ही हुआ है और जहाँ हुआ वह केंद्र भी लगभग इतना ही पुराना है। सभागार में 150 लोग बैठ सकते हैं और लगभग सभागार पूरी तरह भरा था तो इसे युवा टीम के उत्साह का प्रतिफल कह सकते हैं कि उनकी सराहना करने इतने लोग टिकट खरीदकर आए थे। लेखक-निर्देशक भी अभी चार-पाँच साल पहले ही स्नातक हुए युवा हैं और काम करने वालों की टीम भी एकदम युवा। नए प्रयोग करते हुए नाटक की भाषा त्रिवेणी है मतलब हिंदी के कुछ मौलिक गीत, कुछ मराठी गीत, कुछ अंग्रेज़ी संवाद लेकिन मूलतः इसे मराठी नाटक ही कह सकते हैं क्योंकि बहुतायत में मराठी भाषा में नाटक चल रहा था। एक पंक्ति में इस नाटक को देखें तो कह सकते हैं कि इसका थीम था- कोई शॉर्टकट ले या लॉन्गकट सच्चा प्रेम ईश्वर तक ही पहुँचाता है।

 

मंच पर केवल दो कलाकार थे। मंच से परे पूरी टीम थी। संगीत भी लाइव था, जिसमें पखावज से लेकर कीबोर्ड तक सब था। इस नाटक की जान कह सकते हैं तो वह था इसकी प्रकाश योजना। निखिल मारणे और प्रथमेश जाधव की प्रकाश व्यवस्था उनके भावी कार्यक्षेत्र के उजास को दर्शाती है। पूरा खेल रोशनी का ही था। उस रोशनी के सहारे दो युवा सिंहगढ़ पहाड़ी चढ़ने निकलते हैं। लड़की को अपने प्रेमी के साथ उस पहाड़ी से सूर्योदय देखना है। प्रेमी उसे पहले गर्ल फ्रैंड कहता था लेकिन अब केवल फ्रैंड मतलब सहेली मानता है। पहाड़ी की लंबी चढ़ाई कई पथरीले रास्तों, ऊँचे-नीचे धरातल से गुज़रती है, जैसे उन दोनों का अब तक का जीवन रहा है। चढ़ाई के दौरान दोनों संवाद-विसंवाद, प्रेम-झगड़ा, मस्ती-मजाक करते हैं और अपने दुःखों-परेशानियों, अपनी हौसलों-लक्ष्यों को भी दर्शकों से साझा करते हैं। प्रकृति के चित्र बनाने वाले ख़्यात यूरोपियन लैंडस्केप चित्रकार कैस्पर फ्रेडरिक से लेकर महाराष्ट्र के आराध्य विठोबा (पांडुरंग) और रखुमाई (रुक्मिणी) तक के दर्शन इस यात्रा के दौरान होते हैं।

 

शार्दुल निंबालकर के लेखन और सुयश झुंजरके के नेपथ्य व निर्देशन में यह नाटक खड़ा था। लगभग दो घंटे के नाटक को थोड़ा संपादित किया जा सकता था तो और कसा हुआ प्रयोग होता। नेपथ्य में कुछ लकड़ी के बक्से, कुछ प्लास्टिक शीट्स, साइड विंग ड्रॉप, विंडचाइम का प्रयोग बड़ा अच्छा किया गया था। पूरी कहानी इन चीज़ों में समाहित हो रही थी। शार्दुल के साथ अस्मि देवकुले, हर्ष भोसले, अथर्व बर्दाडे, आदित्य अलोने, अक्षय कुलकर्णी और साईराज पतंगराय ने नेपथ्य को संभाला है, इन्हें वास्तव में परदे के पीछे के कलाकार कह सकते हैं।

 

इस नाटक को चित्रकला, कथा-कविता, संगीत और नाट्य का मेल कहा जा सकता है। साइड विंग ड्रॉप और लकड़ी के बक्से के साथ जिस तरह चित्रों को दिखाया गया वह निर्देशक की कल्पना की उड़ान को दर्शाता है। लक्ष्मण ठाकुर के रंगचित्र कथ्य के साथ एकदम सटीक बैठ रहे थे। इसका दूसरा दमदार पक्ष था यशराज आवेकर का संगीत निर्देशन। वाद्य वृंद में यशराज के साथ हृषिकेश आवेकर व रुतुजा थिटे थीं। गायन समूह में भी यशराज थे और साथ थे रेवा घुले, लक्ष्मण, संस्कृति काडादी।

 

बात करते हैं अभिनय की। साक्षी दिघे के लंबे संवाद, उसकी भूमिका के विभिन्न पहलू और उसे पूरी ताकत से पेश करने का उसका हुनर रेखांकित करने योग्य है। हृषिकेश म्हेत्रे ने भी अपने चरित्र की कशमकश और हताशा को उकेरा है। रेवा घुले और लक्ष्मण अंतिम कुछ दृश्यों में मंच पर आते और अपनी छाप छोड़ जाते हैं। निर्माता किरण ढमाले और महेंद्र मारणे हैं।

लेखिका परिचयः

(स्वरांगी साने एक स्वतंत्र हिंदी अनुवादक, लेखिका और पत्रकार हैं, , उन्होंने विभिन्न भारतीय भाषाओं की फिल्मों, वैज्ञानिक दस्तावेजों और पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है। वह समाचार पत्रों में संपादकीय जिम्मेदारी भी वहन कर चुकी है और वर्तमान में कला, साहित्य व संस्कृति पर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं)

आद्यगुरु शंकराचार्य का शक्ति-तत्त्व से साक्षात्कार और भवानी अष्टकम् की रचना

आदिगुरु श्री शंकराचार्य एक अवसर पर शाक्त-मत के तात्त्विक खंडन के प्रयोजन से कश्मीर की यात्रा पर गए। किंतु कश्मीर पहुँचने पर उनकी देह अत्यन्त दुर्बल हो गई। शरीर में किसी प्रकार की शक्ति शेष न रही। वे एक वृक्ष के समीप भूमि पर शयित हो गए।
उसी समय एक गोवालन (दधि-विक्रेता स्त्री) सिर पर दही का पात्र धारण किए वहाँ से निकली। आचार्य का कंठ अत्यन्त शुष्क था, उदर में दाह हो रहा था। उन्होंने संकेत से उस गोवालन को अपने समीप बुलाकर दही देने का अनुरोध किया।
गोवालन ने कुछ दूरी से ही उत्तर दिया—
“आप यहीं क्यों पड़े हैं? दही चाहिए तो स्वयं यहाँ आ जाइए।”
आचार्य ने क्षीण स्वर में कहा—
“मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि मैं वहाँ तक आ सकूँ। शक्ति के अभाव में गति कैसे संभव है?”
यह सुनकर गोवालन हँस पड़ी और बोली—
“शक्ति के बिना तो कोई एक पग भी नहीं उठा सकता, और आप शक्ति का ही खंडन करने निकले हैं?”
इतना सुनते ही आचार्य की आँखें खुल गईं। उन्हें तत्काल बोध हुआ कि यह साधारण गोवालन नहीं, अपितु स्वयं भगवती आदिशक्ति ही इस रूप में प्रकट हुई हैं। उनके हृदय में शिव और शक्ति के बीच जो बौद्धिक भेद शेष था, वह उसी क्षण विलीन हो गया।
आचार्य ने पूर्ण समर्पण भाव से शक्ति के चरणों में नमन किया और उनके मुख से स्वतः यह वाक्य प्रकट हुआ—
“गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी।”
यही भावपूर्ण स्तवन आगे चलकर “भवानी अष्टकम्” के नाम से विख्यात हुआ।
शिव निश्चल तत्त्व हैं और भवानी उनकी गतिशील शक्ति। दोनों भिन्न प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः अभिन्न हैं—
जैसे दूध और उसकी श्वेतिमा,जैसे दीपक और उसका प्रकाश।
नेत्रों पर अज्ञान का अंतिम आवरण भी माता ने ही हटाया; इसलिए शंकराचार्य ने पूर्ण विनय से कहा—
“माँ, मैं कुछ नहीं जानता।”
॥ भवानी अष्टकम् ॥
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ १॥
भवाब्धावपारे महादुःखभीरु
प्रपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः ।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ २॥
न जानामि दानं न च ध्यानयोगं
न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ३॥
न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्—
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ४॥
कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः ।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ५॥
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् ।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ६॥
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ७॥
अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः ।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रनष्टः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ८॥

संकल्प राम राज्य चैनल से साभार

विकास का संकल्प : ट्रिपल इंजन से बदलेगी दिल्ली की तस्वीर

वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में दिल्ली के लिए 70 हजार करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि का प्रावधान केवल एक आर्थिक घोषणा नहीं, बल्कि राजधानी के भविष्य की रूपरेखा है। सड़क, रेल परिवहन, मेट्रो विस्तार, जल आपूर्ति, स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रदूषण नियंत्रण और पुलिस व्यवस्था जैसे बुनियादी क्षेत्रों पर विशेष ध्यान यह संकेत देता है कि केंद्र सरकार दिल्ली को एक सुव्यवस्थित, आधुनिक और आदर्श महानगर के रूप में विकसित करना चाहती है। ऐसे समय में जब दिल्ली की भाजपा सरकार अपना एक वर्ष पूर्ण कर रही है, यह स्वाभाविक है कि बीते वर्ष के कामकाज का मूल्यांकन किया जाए और देखा जाए कि तथाकथित “ट्रिपल इंजन सरकार” का लाभ दिल्लीवासियों को कितना और कैसे मिला है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपने कार्यकाल के एक वर्ष पूर्ण होने पर सरकार की उपलब्धियों और आगामी संकल्पों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि उनकी सरकार ने न केवल नई योजनाओं की शुरुआत की, बल्कि पूर्ववर्ती सरकारों की लंबित और अधूरी परियोजनाओं को भी गति दी है। ‘दिल्ली लखपति बिटिया योजना’, मुफ्त एलपीजी सिलेंडर, अधूरी पड़ी आधारभूत परियोजनाओं को पूरा करने की पहल, तथा महिलाओं और छात्रों के लिए नई राहतकारी योजनाओं का खाका-ये सब उनके पहले वर्ष के प्रमुख बिंदु रहे। उनका यह भी कहना है कि ट्रिपल इंजन की व्यवस्था-अर्थात केंद्र, राज्य और नगर निकाय में एक ही राजनीतिक नेतृत्व के कारण विकास कार्यों में समन्वय और गति दोनों आई है।

ट्रिपल इंजन सरकार की अवधारणा का सबसे बड़ा लाभ वित्तीय समन्वय के रूप में सामने आया है। दिल्ली सरकार को अब पूंजीगत व्यय के लिए ऋण अपेक्षाकृत कम ब्याज दर पर उपलब्ध हो रहा है। पहले जहां ब्याज दर 13-14 प्रतिशत तक पहुंच जाती थी, वहीं अब लगभग सात प्रतिशत पर ऋण मिलना संभव हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा 21 हजार करोड़ रुपये तक की ऋण सीमा निर्धारित किए जाने से आधारभूत ढांचे के विकास में धनाभाव की आशंका कम हुई है। यही नहीं, प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन तथा पीएम भीम योजना जैसी केंद्रीय योजनाओं की समयावधि बढ़वाने में भी दिल्ली सरकार को सफलता मिली है। आयुष्मान भारत जैसी जनकल्याणकारी योजना का लाभ अब राजधानी के अधिक से अधिक नागरिकों तक पहुंच रहा है, जिससे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा की ठोस गारंटी मिल रही है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के संकेत अवश्य दिखाई दिए हैं। मोहल्ला क्लीनिक मॉडल पर उठे प्रश्नों और अधूरी स्वास्थ्य परियोजनाओं के बीच नई सरकार ने अस्पतालों के आधुनिकीकरण, बेड क्षमता बढ़ाने और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। यदि यह प्रयास निरंतरता से जारी रहा तो दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी के अनुरूप विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी पारदर्शिता और गुणवत्ता सुधार का दावा किया गया है। पिछले वर्षों में शिक्षा मॉडल को लेकर जहां एक ओर प्रशंसा हुई, वहीं भवनों की गुणवत्ता, संसाधनों के उपयोग और परिणामों पर सवाल भी उठे। नई सरकार के लिए यह चुनौती है कि वह शिक्षा को राजनीतिक विमर्श से ऊपर उठाकर वास्तविक गुणवत्ता सुधार की दिशा में कार्य करे।
परिवहन और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी गति लाने का प्रयास हुआ है। मेट्रो नेटवर्क के विस्तार, बस बेड़े के आधुनिकीकरण और सड़कों के सुधार की योजनाएं केंद्र और राज्य के समन्वय से आगे बढ़ रही हैं। दिल्ली मेट्रो पहले से ही राजधानी की जीवनरेखा रही है, अब किराए में राहत या छात्रों के लिए विशेष प्रावधान जैसे कदम यदि लागू होते हैं तो इससे आम जनता को सीधा लाभ मिलेगा। यातायात जाम की समस्या के समाधान के लिए फ्लाईओवर, अंडरपास और स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन प्रणाली पर ध्यान देना आवश्यक है। एक वर्ष में कुछ परियोजनाओं को गति मिली है, किंतु राजधानी जैसे विशाल महानगर में ठोस परिणामों के लिए निरंतर प्रयास अपेक्षित हैं।

सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण और वायु प्रदूषण की है। बीते दशक में दिल्ली विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में गिनी जाने लगी। यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का संकट है। मुख्यमंत्री ने वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए ठोस योजनाओं का उल्लेख किया है-जैसे हरित आवरण बढ़ाना, निर्माण कार्यों पर निगरानी, सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन और पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय। परंतु यह भी सत्य है कि प्रदूषण जैसी जटिल समस्या का समाधान केवल घोषणाओं से संभव नहीं, इसके लिए कठोर क्रियान्वयन, क्षेत्रीय सहयोग और जनसहभागिता की आवश्यकता होगी। यमुना की सफाई भी दिल्ली की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न है। वर्षों से यमुना शुद्धिकरण के नाम पर योजनाएं बनती रहीं, बजट खर्च होता रहा, पर परिणाम संतोषजनक नहीं रहे। वर्तमान सरकार ने यमुना को स्वच्छ और पर्यटन योग्य बनाने का संकल्प दोहराया है। यदि सीवेज प्रबंधन, औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण और नदी तट के पुनर्विकास की योजनाएं समयबद्ध तरीके से लागू होती हैं, तो यह दिल्ली की छवि को नया आयाम दे सकती हैं। यमुना का पुनर्जीवन केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक पुनरुत्थान का भी अवसर है।

महिलाओं और बेटियों के लिए घोषित योजनाएं-जैसे ‘लखपति बिटिया योजना’-सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में सकारात्मक कदम मानी जा सकती हैं। यदि इन योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्रों तक पारदर्शिता से पहुंचता है, तो यह परिवारों की आर्थिक सुरक्षा और शिक्षा के अवसरों को बढ़ा सकता है। मुफ्त एलपीजी सिलेंडर जैसी पहल घरेलू अर्थव्यवस्था में राहत देती है, विशेषकर निम्न आय वर्ग के लिए। किंतु इन योजनाओं की सफलता क्रियान्वयन की गुणवत्ता पर निर्भर करेगी। एक वर्ष की अवधि किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ी नहीं होती, विशेषकर तब जब उसे पिछली सरकारों की अधूरी परियोजनाओं और व्यवस्थागत खामियों को भी दुरुस्त करना हो।

यह भी सच है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच विकास का वास्तविक आकलन कठिन हो जाता है। नई सरकार ने पूर्ववर्ती शासन की कमियों-जैसे कथित भ्रष्टाचार, अधूरी इमारतें, प्रदूषण नियंत्रण में विफलता को सुधारने का दावा किया है। किंतु जनता अब केवल आरोप नहीं, परिणाम देखना चाहती है। आने वाले वर्षों के लिए सरकार के सामने स्पष्ट लक्ष्य होने चाहिए-स्वच्छ वायु, स्वच्छ यमुना, सुगम यातायात, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य और पारदर्शी प्रशासन। राजधानी होने के नाते दिल्ली को केवल भारत का प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि आदर्श शहरी मॉडल बनना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि बजट में आवंटित राशि का पूर्ण और पारदर्शी उपयोग हो, परियोजनाएं समयबद्ध पूरी हों और जनभागीदारी को प्रोत्साहन मिले।

ट्रिपल इंजन सरकार का वास्तविक अर्थ तभी सिद्ध होगा जब समन्वय का लाभ जमीन पर दिखाई दे। केंद्र और राज्य के बीच टकराव की राजनीति के स्थान पर सहयोग की भावना यदि कायम रहती है, तो दिल्ली विकास की नई ऊंचाइयों को छू सकती है। एक वर्ष में कुछ सकारात्मक संकेत अवश्य मिले हैं, परंतु अभी लंबी यात्रा शेष है। सरकार को अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने के साथ-साथ कमियों का ईमानदार आत्ममंथन भी करना होगा। दिल्ली की जनता जागरूक है और अपेक्षाएं भी बड़ी हैं। वह केवल वादों से संतुष्ट नहीं होगी, उसे परिणाम चाहिए। यदि रेखा गुप्ता सरकार अपने संकल्पों को धरातल पर उतारने में सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में दिल्ली सचमुच एक स्वच्छ, स्वस्थ, सुरक्षित और आधुनिक महानगर के रूप में उभर सकती है। यही समय है जब बजट की घोषणाओं को विकास की वास्तविक कहानी में बदला जाए और राजधानी को समस्याओं के प्रतीक से समाधान के मॉडल में परिवर्तित किया जाए।

प्रेषकः


(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज,
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

भारत का सशक्त खेल इकोसिस्टम

केंद्रीय बजट 2026-27 में खेलो इंडिया मिशन की घोषणा की गई जो भारत के खेल इकोसिस्टम को बदलने के उद्देश्य से दीर्घकालिक, परिणाम संचालित ढांचे के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।

बजट में 4,479.88 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ युवा मामले और खेल मंत्रालय के लिए अब तक की सबसे अधिक धनराशि की घोषणा की गयी है जो युवा और खेल विकास को दी जाने वाली निरंतर प्राथमिकता को दर्शाता है।

500 करोड़ रुपये की खेल सामग्री निर्माण पहल घरेलू क्षमता को मजबूत करती है, नवाचार को बढ़ावा देती है और खेलों को रोजगार, कौशल विकास और आर्थिक विकास के केन्द्रीय कारक के रूप में स्थापित करती है।

परिचय
विकसित भारत की ओर देश की यात्रा में खेल युवा विकास, रोजगार सृजन और राष्ट्रीय आकांक्षा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा है। भारत सरकार ने अनुशासित, स्वस्थ और कुशल नागरिकों के निर्माण में खेलों की बदलाव लाने वाली क्षमता को पहचानते हुए, इस क्षेत्र के लिए नीतिगत और संस्थागत समर्थन को लगातार मजबूत किया है।

केंद्रीय बजट 2026-27 दीर्घकालिक राष्ट्रीय क्षमता निर्माण के ढांचे में खेलों को मजबूती से स्थापित करके इस संकल्प की और पुष्टि करता है।

केंद्रीय बजट तीन मौलिक कर्तव्यों द्वारा निर्देशित है:
उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाकर और अस्थिर वैश्विक व्यवस्था के प्रति लचीलापन अपनाकर आर्थिक विकास को गति देना और उसे बनाए रखना।
अपने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना और भारत की समृद्धि के पथ में सशक्त भागीदार के रूप में उनकी क्षमता का निर्माण करना।
यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक परिवार,समुदाय,क्षेत्र और वर्ग को सार्थक भागीदारी के लिए संसाधनों,सुविधाओं और अवसरों तक पहुंच प्राप्त हो।

केंद्रीय बजट भाषण में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा:
“खेल क्षेत्र रोजगार,कौशल विकास और नौकरी के अनेक अवसर प्रदान करता है। खेलो इंडिया कार्यक्रम के माध्यम से शुरू की गई खेल प्रतिभाओं की व्यवस्थित प्रगति को आगे बढ़ाते हुए, मैं अगले दशक में खेल क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए एक खेलो इंडिया मिशन शुरू करने का प्रस्ताव करती हूं।”

यह कदम बजट में उल्लिखित दूसरे कर्तव्य के अनुरूप है। विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग 2026 से प्रेरित,युवा शक्ति पर केंद्रित यह अनूठा बजट युवाओं की ऊर्जा और दृष्टि को विश्व स्तरीय खेल इकोसिस्टम के निर्माण की दिशा में प्रेरित करता है।

केंद्रीय बजट 2026-27: खेलो इंडिया मिशन पर फोकस
केंद्रीय बजट 2026-27 में,सरकार ने अगले दशक में खेल क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए खेलो इंडिया मिशन की शुरुआत की घोषणा की। खेलो इंडिया योजना के तहत पहले से ही शुरू की गई खेल प्रतिभाओं की व्यवस्थित प्रगति को आगे बढ़ाते हुए,यह मिशन देश में खेल विकास के लिए दीर्घकालिक, मिशन-आधारित दृष्टिकोण की ओर एक बदलाव का प्रतीक है।

खेलो इंडिया मिशन के पांच स्तंभ
बजट भाषण में उल्लेख के अनुसार,खेलो इंडिया मिशन निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करेगा:

कुल मिलाकर इन सभी क्षेत्रों का उद्देश्य जमीनी स्तर की भागीदारी से लेकर उच्च स्तरीय प्रदर्शन तक एक सुगम मार्ग बनाना है,साथ ही सभी विधाओं में निरंतरता और व्यापकता सुनिश्चित करना है।

ऐतिहासिक वित्तीय आवंटन: खेल के सपने को साकार कर रहा
2016-17 में शुरू की गई खेलो इंडिया योजना को पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय वित्तीय आवंटन मिला है,जो पूरे भारत में खेलों में व्यापक भागीदारी और उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस योजना का उद्देश्य खेल संस्कृति को बढ़ावा देना और देश भर में खेल उत्कृष्टता हासिल करना है।

यह योजना पूरे देश में खेलों में भागीदारी को प्रोत्साहित करती है और खेलों के जरिये बच्चों और युवाओं के विकास, सामुदायिक विकास, सामाजिक एकता, लैंगिक समानता, स्वस्थ जीवनशैली, राष्ट्रीय गौरव और खेल विकास से संबंधित आर्थिक अवसरों की तलाश को बढ़ावा देती है।

• 2017-18 से 2019-20: योजना में बदलाव के उद्देश्य से तीन वर्षों के लिए 1756 करोड़ रुपये का वित्तीय आवंटन स्वीकृत किया गया।

• 2020-21: एक वर्ष के लिए 328.77 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया।

• 2021-22 से 2025-26: वित्तीय आवंटन को अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ाकर 3790.50 करोड़ रुपये कर दिया गया, जो कई तरह की गतिविधियों को समर्थन देने और खेल अवसंरचना को बढ़ाने के लिए वित्तीय आवंटन में महत्वपूर्ण वृद्धि दर्शाता है।

• 2026-27: 2026-27 के बजट में खेलो इंडिया के लिए 924.35 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, जो दीर्घकालिक,परिणाम संचालित कार्यान्वयन के एक नए चरण में प्रवेश करते हुए योजना के प्रति निरंतर वित्तीय संकल्प को रेखांकित करता है।

खेल सामग्री विनिर्माण: घरेलू क्षमता का निर्माण
खेलो इंडिया मिशन के साथ-साथ,केंद्रीय बजट 2026-27 में खेल सामग्री विनिर्माण के लिए एक समर्पित पहल की घोषणा की गई है, जिसके लिए 500 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। यह पहल उच्च गुणवत्ता वाली, किफायती खेल सामग्री के वैश्विक केंद्र के रूप में भारत की उभरती क्षमता को मान्यता देती है।

रणनीतिक उद्देश्य:
घरेलू विनिर्माण क्षमता को बढ़ावा देना
उपकरण डिजाइन में अनुसंधान और नवाचार को आगे बढ़ाना
खेल उपकरणों के लिए सामग्री विज्ञान में नवाचार को बढ़ावा देना
वैश्विक खेल आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की उपस्थिति को मजबूत करना
विनिर्माण और संबद्ध क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित करना

युवा शक्ति-प्रेरित दृष्टिकोण
केंद्रीय बजट 2026-27 की एक खास विशेषता इसकी युवा-केंद्रित पहचान है। बजट के युवा-केंद्रित स्वरूप पर जोर देते हुए वित्त मंत्री ने रेखांकित किया कि बजट प्रस्ताव युवा सहभागिता पहलों से उभरने वाले विचारों और आकांक्षाओं को दर्शाते हैं।

यह सुनिश्चित करता है कि खेल नीतियां युवा भारतीयों की आकांक्षाओं, नयी सोच और अनुभवों को प्रतिबिंबित करें। ये लोग खेल के इकोसिस्टम से लाभान्वित होंगे और इसका निर्माण भी करेंगे। यह बजट नीति निर्माण में युवाओं को शामिल करके, प्रासंगिकता, उत्साह और पीढ़ियों की आकांक्षाओं के साथ बेहतर तालमेल सुनिश्चित करता है।

माय भारत बजट क्वेस्ट 2026: बजट को समझने में युवाओं को शामिल करना
केंद्रीय युवा मामले एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने युवा-केंद्रित दृष्टिकोण को सुदृढ़ करते हुए,माय भारत बजट क्वेस्ट 2026 का शुभारंभ किया। यह एक राष्ट्रव्यापी पहल है जिसका उद्देश्य केंद्रीय बजट के प्रति युवाओं की समझ को बढ़ाना और बजटीय प्रावधानों को अधिक सुलभ, प्रासंगिक और नागरिक-केंद्रित बनाना है।

इस पहल का लक्ष्य एक सुव्यवस्थित और सहभागी ढांचे के माध्यम से देश भर के कॉलेजों, संस्थानों और कोचिंग केंद्रों के युवाओं को शामिल करके केंद्रीय बजट 2026 को नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन से जोड़ना है।

बजट क्वेस्ट एक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता है जो माय भारत प्लेटफॉर्म पर दो चरणों में आयोजित की जाएगी और पोर्टल पर पंजीकृत युवाओं के लिए खुली है:

पहला चरण (3-17 फरवरी 2026): केंद्रीय बजट 2026 पर एक ऑनलाइन प्रश्नोत्तरी, जिसमें प्रतिभागियों के बजटीय प्रावधानों और उनके निहितार्थों की समझ का परीक्षण किया जाएगा। प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश से शीर्ष प्रदर्शन करने वाले अगले चरण के लिए चुने जायेंगे।

दूसरा चरण (17 फरवरी – 3 मार्च 2026): यह निबंध लेखन का चरण है जिसमें योग्य प्रतिभागी विकसित भारत की परिकल्पना के अनुरूप केंद्रीय बजट से संबंधित 8 विषयों पर अपने विचार और दृष्टिकोण साझा करेंगे कि बजटीय प्रावधान राष्ट्रीय विकास को कैसे प्रभावित करते हैं।

निबंधों का मूल्यांकन 3 से 10 मार्च 2026 के बीच किया जाएगा और राज्य/केंद्र शासित प्रदेश के हिसाब से योग्यता सूची 10 मार्च 2026 को घोषित की जाएगी। विजेताओं को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के साथ विकसित भारत बजट की परिकल्पना पर बातचीत करने का अवसर मिलेगा।

आकांक्षा से उपलब्धि तक
केंद्रीय बजट 2026-27 महज एक वित्तीय विवरण नहीं है बल्कि यह युवा शक्ति द्वारा संचालित खेल क्रांति का एक रोडमैप है। खेल को युवा सशक्तिकरण के केंद्र में रखकर और खेलो इंडिया मिशन की घोषणा करके, सरकार ने भविष्य के लिए तैयार, समावेशी और उच्च प्रदर्शन वाले खेल इकोसिस्टम के निर्माण के प्रति अपने संकल्प को दोहराया है।

दृष्टि स्पष्ट और समयबद्ध है: भारत 2036 तक शीर्ष 10 खेल राष्ट्रों में और 2047 तक शीर्ष 5 में शामिल हो।

खेल क्षेत्र निरंतर वित्तीय सहायता, मिशन-आधारित कार्यान्वयन और एक समग्र इकोसिस्टम दृष्टिकोण के साथ रोजगार सृजन, राष्ट्रीय गौरव और भारत के एक प्रतिस्पर्धी खेल राष्ट्र के रूप में उभरने में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए तैयार है, जो 2047 तक विकसित भारत की परिकल्पना के अनुरूप है।

राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह और बेगम अख्तर

महामहोपाध्याय सर महाराजा प्रताप नारायण बहादुर के. सी.आई.ई के देहावसान पर उनकी दूसरी पत्नी श्रीमती महारानी जगदम्बा देवी उत्तराधिकारिणी हुई। उन्होंने महाराज के वसियतनामे के आधार पर राजा इंचासिंह के कुल से लाल जगदम्बिका प्रतापसिंह को गोद लिया परन्तु महारानी साहिबा के जीते जी वे केवल नाममात्र के राजा रहे हैं।

 

राजा जगदंबिका प्रताप नारायण सिंह को 12 फरवरी, 1909 को राजा घोषित किया गया और 1955 में उन्मूलन अधिनियम लागू करने तक अयोध्या राज पर राज किया। राजा जगदंबिका प्रताप नारायण सिंह बाघों का शिकार किया करते थे। असंख्य कमरों वाले उनके राजमहल में दो कमरे उनकी ट्रॉफियों से भरे हुए हैं। अयोध्या में स्थित कामता प्रसाद सुंदर लाल महाविद्यालय के राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह की स्मृति में एक सभागार भी बना हुआ है ।

 

अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी से खास लगाव

अवधी रवायत बेगम अख़्तर का ज़िक्र बग़ैर यह कहानी अधूरी रहेगी।वह अवध की मशहूर तवायफ थीं। बेगम अख़्तर के नाम से प्रसिद्ध, अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी का समय 7अक्टूबर 1914 से 30अक्टूबर 1974 रहा। वह भारत की एक प्रसिद्ध गायिका थीं, जिन्हें दादरा, ठुमरी व ग़ज़ल में महारत हासिल थी।उन्हें कला के क्षेत्र में भारत सरकार पहले पद्मश्री तथा सन 1975 में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया था। उन्हें “मल्लिका- ए-ग़ज़ल” के ख़िताब से नवाज़ा गया था।

 

बालिका अख़्तरी को बचपन से ही संगीत से कुछ ऐसा लगाव था कि जहाँ गाना होता, छुप छुप कर सुनती और नकल करती। घर वालों ने पहले तो इन्हें रोकना चाहा; पर समुद्र की उत्तुंग तरंगो को भला कौन रोक सकता था! यदि कोई चेष्टा भी करता, तो शायद लहरों का वह सशक्त ज्वारभाटा उसे ही ले डूबता। 2014 की फ़िल्म “डेढ़ इश्क़िया” में विशाल भारद्वाज ने बेगम अख़्तर की प्रसिद्ध ठुमरी “हमरी अटरिया पे” का आधुनिक रीमिक्स रेखा भारद्वाज की आवाज में प्रस्तुत किया है।

उन्होंने दिल के टूटने को भी दिलकश बना दिया था।

 

उसके ही जमाने में महाराज जगदम्बिका प्रताप सिंह अयोध्या के राजा थे। अख्तरी बाई फैजाबाद में बेगम अख़्तर नाम से जानी जाती थी। वह राजा साहब की रक्षिता थीं और अयोध्या राज दरबार की प्रतिष्ठित गायिका भी।जगदम्बिका प्रताप सिंह आज़ादी तक अयोध्या के राजा रहे। राजा साहब बेगम अख़्तर के एक दादरे पर ऐसे फ़िदा हुए कि पचास एकड़ का एक बाग उनके नाम कर दिया था।

 

अख्तरी बाई उनके दरबार की लम्बे समय तक गायिका रही।

 

अख्तरी बाई जब फैजाबाद छोड़ कर जाने लगीं तो वह बाग राजा साहब को लौटाने गयीं। राजा साहब ने मना किया तो वह अड़ गई और कही, “हुज़ूर आपने मेरी वजादारी की । इसके लिए ताउम्र मैं आपकी शुक्रगुज़ार रहूंगी। लेकिन अगर मैं इसे बेचकर जाती हूं, तो फैजाबाद के लोग मेरे बारे में क्या सोचेगें? तवारीख़ मुझे माफ नहीं करेगी कि एक गाने वाली बाई ने राजा के उपहार में दिए बाग का सौदा कर लिया। इसलिए आप इसे रख लें ताकि इतिहास में आपके साथ ही मेरा नाम भी सम्मान के साथ लिया जाय। राजा साहब के मना करने पर उन्होंने राजा साहब के दामाद डा. रमेन्द्र मोहन मिश्र को वह बाग लौटा दिया।

आज भी दस्तावेज़ों में उस ज़मीन का कागज़ अख़्तरी बाई फैजाबादी बनाम डॉ. रमेन्द्र मोहन मिश्र के तौर पर दर्ज है।रमेन्द्र जी, राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह की इकलौती बेटी राजकुमारी विमला देवी जी के पति थे।पद्मभूषण छन्नूलाल लाल मिश्र ने यहीं शागिर्दी कर संगीत में अपनी पहचान बनाई।उनका पानी की तरह हारमोनियम पर चलता हाथ यहीं सधा।वे यहीं पहले बजाते थे बाद में गाने लगे। भारतीय संगीत की दुनिया के कई बड़े नाम चतुर्भुज स्थान में ही पले और बढ़े हुए हैं।

 

अख्तरी बाई की दुखद मौत

30 अक्टूबर 1974 को नीलम गमाडिया, उनकी मित्र, जिन्होंने उन्हें अहमदाबाद आमंत्रित किया था, की बाहों में उनका निधन हो गया , जो उनका अंतिम प्रदर्शन बन गया। 1974 में तिरुवनंतपुरम के पास बलरामपुरम में अपने आखिरी संगीत कार्यक्रम के दौरान , उन्होंने अपनी आवाज़ का स्वर ऊंचा कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि उनका गायन उतना अच्छा नहीं था जितना वे चाहती थीं और वे अस्वस्थ महसूस कर रही थीं। उन्होंने खुद पर जो तनाव डाला, उसके परिणाम स्वरूप वे बीमार पड़ गईं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

 

‘पसंद बाग’ ठाकुरगंज , लखनऊ में समाधि

अख्तरी बाई की समाधि लखनऊ के ठाकुरगंज इलाके में स्थित उनके घर ‘पसंद बाग’ के भीतर एक आम के बगीचे में बनाई गई है । उन्हें उनकी माता मुश्तरी साहिबा के साथ दफनाया गया था। हालांकि, वर्षों से बढ़ते शहर के कारण बगीचे का अधिकांश हिस्सा नष्ट हो गया है और समाधि जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। लाल ईंटों से घिरे संगमरमर के मकबरे को 2012 में पिएत्रा ड्यूरा शैली के संगमरमर जड़े के साथ पुनर्स्थापित किया गया था। लखनऊ के चाइना बाजार में 1936 में बने उनके घर को संग्रहालय में परिवर्तित करने के प्रयास जारी हैं।

लेखक

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)