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निर्मला आर्य की पुस्तक नैवेद्य का लोकर्पण

कोटा । अखिल भारतीय साहित्य परिषद कोटा इकाई की वरिष्ठ साहित्य कारा श्री मती निर्मला आर्य की पुस्तक नैवैद्य कविता संग्रह का लोकार्पण दिनांक रविवार को मौजी बाबा धाम कोटा में किया गया । कार्यक्रम की मुख्य वक्ता मुख्य ब्लाक शिक्षा अधिकारी स्नेह लता शर्मा ने कृतिकार और कृति का परिचय देते हुए बताया कि पुस्तक में लिखी गई कविताएं विभिन्न विषयों के साथ साथ लोक कल्याण, तमस का नाश, सामाजिक विकृति दूर करने का संदेश देती है । लेखिका ने अपनी रचित कविता ” नारी संकल्प ” का पाठ किया ।
कार्यक्रम अध्यक्ष पूर्व महापौर महेश विजय , विशिष्ठ अतिथि चित्तौड़ प्रान्त के अध्यक्ष विष्णु शर्मा ‘हरिहर’ तथा विशिष्ट रामेश्वर शर्मा रामू भैया ने अपने विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर कई सहित्यकार भगवती प्रसाद गोतम, जीतेन्द्र, निर्मोही, डॉ. प्रभात सिंघल , योगी राज योगी, नन्द किशोर अनमोल , काली चरण राजपूत, प्रेम शास्त्री, महेश पंचोली, रेखा पंचोली, अनुराधा, पल्लवी न्याती दरक, डॉ. इंदु बाला एवं कई अन्य साहित्यकार तथा सेवा निवृत प्राचार्य उपस्थित रहे । अंत में सहित्य परिषद कोटा इकाई के महा मंत्री राम मोहन कौशिक ने सभी आगन्तुकों का धन्यवाद अर्पित किया ।

अमेजन के ग्लोबल लीगल हेड डेविड ए. ज़ापोल्स्की का कीट-कीस दौरा

डेविड ए. ज़ापोल्स्की को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित

भुवनेश्वर। कीट डीम्ड विश्विद्यालय ने अमेज़न (यूएस) के चीफ ग्लोबल अफेयर्स एवं लीगल ऑफिसर डेविड ए. जापोस्की को एक विशेष समारोह में कीट प्रतिष्ठित लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया। इस अवसर पर कीट-कीस-कीम्स के संस्थापक महान् शिक्षाविद् प्रोफेसर अच्युत सामंत तथा अमेज़न इंडिया के अनेक वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

कीट के कुलपति प्रो. सरनजीत सिंह के साथ विस्तृत संवाद में श्री ज़ापोल्स्की ने भारत में अमेज़न की बढ़ती भागीदारी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की परिवर्तनकारी क्षमता पर प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि अमेज़न ने भारत में अब तक लगभग 40 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया है, जिसमें डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और क्लाउड कंप्यूटिंग में बड़े निवेश शामिल हैं। कंपनी के डेटा सेंटर मुंबई और हैदराबाद में संचालित हो रहे हैं। पिछले वर्ष ही भारत में अपनी उपस्थिति को और सुदृढ़ करने के लिए अतिरिक्त 35 बिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश की प्रतिबद्धता जताई गई।

उन्होंने कहा, “AI के वैश्विक विमर्श को दिशा देने में भारत अग्रणी भूमिका निभा रहा है। भारत ने स्पष्ट रूप से बताया है कि वह AI के माध्यम से क्या हासिल करना चाहता है। हमारी भूमिका उस महत्वाकांक्षा को समर्थन देने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना है।”

4 करोड़ छात्रों तक AI एवं STEM शिक्षा

श्री ज़ापोल्स्की ने भारत सरकार के साथ अमेज़न की साझेदारी की घोषणा की, जिसके तहत देशभर के 4 करोड़ सरकारी स्कूलों के छात्रों तक AI और STEM शिक्षा पहुंचाई जाएगी। इस पहल का उद्देश्य अगली पीढ़ी को AI-सक्षम कार्यबल के रूप में तैयार करना है।

उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) पहल को कंपनी की मूल दक्षताओं से जोड़ना चाहिए। अमेज़न अपनी तकनीकी और लॉजिस्टिक क्षमताओं का उपयोग आपदा राहत, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास में करने के लिए प्रतिबद्ध है।

AI गवर्नेंस पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यद्यपि AI का पूर्ण प्रभाव अभी समझा जाना बाकी है, फिर भी संतुलित और विचारशील नियमन आवश्यक है। मजबूत अनुपालन ढांचे के माध्यम से तकनीक का नैतिक और जिम्मेदार उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

अपने व्यक्तिगत जीवन की चर्चा करते हुए — जहाँ वे एक वैज्ञानिक और संगीतकार बनने की आकांक्षा से लेकर ब्रुकलिन में अभियोजक और बाद में अमेज़न के शीर्ष कार्यकारी बने — उन्होंने छात्रों को केवल प्रतिष्ठा या वेतन के पीछे न भागने की सलाह दी।

उन्होंने कहा-“अपने मन की आवाज़ सुनिए। वही कीजिए जो आपको खुशी दे। जब आप अपने जुनून का अनुसरण करते हैं, तो अवसर स्वयं आपके पास आते हैं।” उन्होंने छात्रों को निरंतर सीखते रहने और जिज्ञासु बने रहने का संदेश दिया।


विश्व के सबसे बड़े आदिवासी आवासीय विद्यालय की परिसर का भ्रमणः

अपने ऐतिहासिक दौरे के दौरान श्री ज़ापोल्स्की ने कीस परिसर का भी भ्रमण किया और छात्रों से आत्मीय संवाद किया। उन्होंने संस्थान की उल्लेखनीय प्रगति और आदिवासी सशक्तिकरण के क्षेत्र में उसके योगदान की सराहना की।

यह दौरा कीट-कीस के वैश्विक नेतृत्व के साथ बढ़ते संबंधों का एक महत्वपूर्ण उदाहरण सिद्ध हुआ।

1898 में हुए पूर्ण सूर्यग्रहण के लिए जाने माने वैज्ञानिक जब बिहार के छोटे से गाँव डुमराँव में आए

“The Indian Eclipse 1898” एक वैज्ञानिक प्रकाशन है, जिसे British Astronomical Association (BAA) ने 1898 के भारत में दिखाई दिए पूर्ण सूर्यग्रहण के अध्ययन के आधार पर प्रकाशित किया था। यह पुस्तक 22 जनवरी 1898 को भारत में हुए पूर्ण सूर्यग्रहण (Total Solar Eclipse) के विस्तृत अवलोकनों और अनुसंधानों पर आधारित है।

यह ग्रहण भारत के मध्य और उत्तरी हिस्सों से होकर गुज़रा। इसे स्पष्ट रूप से डुमराँव में ही देखा गया था और यह मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि क्षेत्रों में भी दिखाई दिा था। ब्रिटेन और यूरोप के कई वैज्ञानिक दल विशेष रूप से भारत आए, क्योंकि पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सूर्य का कोरोना (Corona) स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह पुस्तक 19वीं सदी के अंत की खगोल विज्ञान तकनीकों का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उस समय फोटोग्राफी और स्पेक्ट्रोस्कोपी नई तकनीकें थीं—इस ग्रहण ने उनके उपयोग को आगे बढ़ाया।

भारत उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन था, इसलिए ब्रिटिश वैज्ञानिकों के लिए यहाँ अभियान आयोजित करना संभव हुआ।

“The Indian Eclipse 1898” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि 19वीं सदी के खगोल विज्ञान के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसने सूर्यग्रहण अध्ययन, सौर कोरोना की समझ और खगोलीय फोटोग्राफी के विकास में योगदान दिया। 1898 के पूर्ण सूर्यग्रहण के भारत में सामाजिक प्रभाव और उस अभियान में शामिल प्रमुख वैज्ञानिकों के बारे में जानकारी इस पुस्तक में दी गई है।

19वीं सदी के भारत में सूर्यग्रहण को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता था। बहुत से लोग गंगा-स्नान, मंत्र-जाप और दान-पुण्य करते थे। कई स्थानों पर लोग भोजन त्याग देते थे और ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान करते थे। वैज्ञानिक दृष्टि और पारंपरिक मान्यताओं के बीच यह एक दिलचस्प समय था।

इतने वैज्ञानिकों के एक छोटे से गाँव में एकत्र हो जाना डुमरांव गाँव के लिए ही नहीं बल्कि आसपास के सैकड़ों गाँव के लेगों के लिए ये कुतुहल और रोमांच का विषय था।

ब्रिटिश वैज्ञानिकों के बड़े अभियान ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया।  इस सूर्यग्रहण की वजह से भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर आधुनिक उपकरणों (कैमरा, टेलीस्कोप, स्पेक्ट्रोस्कोप) का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ।  इससे शिक्षित वर्ग में खगोल विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ी।  उस समय के अंग्रेज़ी और भारतीय समाचार पत्रों में ग्रहण की व्यापक रिपोर्टिंग हुई।

प्रसिद्ध ब्रिटिश खगोलशास्त्री नॉर्मन लॉकयर  (Norman Lockyer) सूर्य के स्पेक्ट्रम और “हीलियम” तत्व की खोज से जुड़े।  1898 के ग्रहण अध्ययन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। स्पेक्ट्रोस्कोपी के अग्रणी वैज्ञानिकों में से एक विलियम हगिंस ( William Huggins) ने सूर्य के रासायनिक तत्वों का अध्ययन किया।  तब के भारत के जाने माने खगोलशास्त्री  केडी. नाएगामवाला (Kavasji Dadabhai Naegamvala)  भी इस दल के प्रमुख सदस्य थे।

यह अभियान अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग का उदाहरण बना।  भारत खगोलीय अनुसंधान के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल के रूप में उभरा।  1898 का सूर्यग्रहण केवल खगोलीय घटना नहीं था, बल्कि धार्मिक मान्यताओं और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद का क्षण था और  भारत में वैज्ञानिक चेतना बढ़ाने का अवसर बना। 1898 के पूर्ण सूर्यग्रहण के समय बिहार के डुमराँव (Dumraon) क्षेत्र का विशेष महत्व था, क्योंकि पूर्ण ग्रहण की पट्टी वहाँ से भी गुज़र रही थी। उस समय डुमराँव रियासत के शासक थे।

महाराजा राम रणविजय सिंह  डुमराँव राज, वर्तमान बिहार के बक्सर ज़िले में स्थित है।  महाराजा ने ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय वैज्ञानिकों का राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया।उनके ठहरने की व्यवस्था डुमराँव राजमहल या उसके आसपास की गई।  शाही आतिथ्य (भोजन, सुरक्षा, सेवक) उपलब्ध कराए गए।

ग्रहण देखने के लिए खुले और साफ़ मैदान की आवश्यकता थी। महाराजा ने अपने क्षेत्र में उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराया। वैज्ञानिकों को टेलीस्कोप, कैमरा और अन्य उपकरण स्थापित करने में स्थानीय सहयोग मिला।

उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, इसलिए स्थानीय रियासतों का सहयोग बहुत महत्वपूर्ण था। महाराजा ने परिवहन, संचार और सुरक्षा की व्यवस्था में मदद की। स्थानीय जनता को अनुशासित रखने और वैज्ञानिक कार्य में बाधा न आने देने के निर्देश दिए गए।

19वीं सदी के अंत में भारतीय रियासतों के लिए ब्रिटिश वैज्ञानिकों का स्वागत करना एक प्रतिष्ठा का विषय था। इससे डुमराँव रियासत की छवि एक प्रगतिशील और सहयोगी राज्य के रूप में उभरी। यह घटना परंपरा और आधुनिक विज्ञान के मिलन का प्रतीक बनी। डुमराँव जैसे छोटे रियासत क्षेत्र ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अभियान की मेजबानी की। इससे स्थानीय स्तर पर विज्ञान के प्रति जिज्ञासा और जागरूकता बढ़ी। यह घटना आज भी क्षेत्र के इतिहास में गौरवपूर्ण मानी जाती है।

कोरोना (Corona) का अध्ययनः पूर्ण ग्रहण के दौरान सूर्य की बाहरी परत “कोरोना” दिखाई देती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि कोरोना की आकृति सूर्य की सौर गतिविधि (Sunspot cycle) से जुड़ी होती है।1898 के अवलोकन ने यह पुष्टि की कि कोरोना की संरचना स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील है।

स्पेक्ट्रम विश्लेषण (Spectroscopy)ः स्पेक्ट्रोस्कोप से सूर्य के प्रकाश को विभिन्न रंगों में विभाजित किया गया। इससे कोरोना में उपस्थित गैसों के संकेत मिले। हीलियम जैसे तत्वों के अध्ययन में भी यह तकनीक उपयोगी रही।

19वीं सदी के अंत में खगोलीय फोटोग्राफी नई तकनीक थी। लंबा एक्सपोज़र (Exposure) देकर कोरोना की तस्वीरें ली गईं। ग्रहण के फोटो के लिए काँच की प्लेट (Glass Plate Negatives) का उपयोग किया गया। यह उस समय की सबसे उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों में से एक थी।

इस सूर्य ग्रहण का वैज्ञानकों को कोरोना की संरचना पर महत्वपूर्ण डेटा मिला। सूर्य के वातावरण के बारे में नई समझ विकसित हुई। भविष्य के ग्रहण अभियानों के लिए तकनीकी मार्गदर्शन मिला।

सूर्य का सौर चक्र चक्र = लगभग 11 साल में पूरा होता है। 1898 का ग्रहण वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे कोरोना, सौर गतिविधि सौर धब्बों की संख्या के बढ़ने व -घटने का अध्ययन हुआ। इसकी पूर्णता की पट्टी भारत के महत्वपूर्ण भागों से गुज़री।

डुमराँव राज का विस्तृत इतिहास
डुमराँव (वर्तमान बक्सर ज़िला, बिहार) एक ऐतिहासिक रियासत थी।
स्थापना और वंशः डुमराँव राज, उज्जैनिया राजपूत वंश से संबंधित माना जाता है।
यह वंश स्वयं को परमार (Paramara) वंश की शाखा मानता है।
16वीं–17वीं सदी में इस क्षेत्र में इनका प्रभाव स्थापित हुआ।

डुमराँव के शासक मुगल शासन के अधीन ज़मींदार/राजा के रूप में कार्य करते थे।
बदले में उन्हें कर देना पड़ता था, लेकिन स्थानीय प्रशासन पर उनका नियंत्रण रहता था।
1764 की Battle of Buxar के बाद बिहार पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण स्थापित हुआ।
डुमराँव राज ब्रिटिश शासन के अधीन एक ज़मींदारी रियासत बन गया।
19वीं सदी में यह एक समृद्ध और प्रभावशाली ज़मींदारी थी।

महाराजा राम रणविजय सिंह 19वीं सदी के प्रमुख शासक थे।
डुमराँव संगीत परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध रहा। प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का जन्म डुमराँव में हुआ था।
स्वतंत्रता के बाद 1950 के बाद ज़मींदारी प्रथा समाप्त हुई।
डुमराँव राज की प्रशासनिक शक्ति खत्म हो गई, लेकिन ऐतिहासिक महत्व बना रहा।

गुरुकुलों की राख पर आरक्षण का महाभोज

जब शिक्षा मंत्रालय अपने आँकड़ों की स्वर्णिम थाली बजाता है और कहता है, “देखो! समावेशन का सूर्य उदित हो चुका है”। तभी धरती के किसी भूले-बिसरे ग्राम में एक जर्जर पाठशाला अपनी अंतिम साँस लेती है। पाँच वर्षों में अठारह हज़ार से अधिक (18,000+) गुरुकुल-सदृश विद्यालय लोक से विलुप्त हो गए, मानो किसी अदृश्य यज्ञ में उनकी आहुति दे दी गयी हो। एक दशक में तिरानबे हज़ार से अधिक (93,000+) शिक्षालय विलय के नाम पर निगल लिए गए। जैसे, शिक्षा नहीं, राज्य का कोई भूगोल सुधारा जा रहा हो।

उधर, निजी विद्यापीठों की इंद्रसभा में पुष्पवृष्टि हो रही है! एक ही वर्ष में आठ हज़ार से अधिक नवीन शुल्क-देवालय अवतरित हुए। जहाँ प्रवेश का मंत्र “फीस स्वाहा” है और ज्ञान की देवी का वाहन अब ईएमआई है। यह कलियुग का नया उपनिषद है, “जो देयकं ददाति, सः विद्यां लभते” या “यः शुल्कं ददाति, स एव विद्यां प्राप्नोति”।

इधर आरक्षण पर महासमर छिड़ा है। यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने आदेश दिया है, कि हर विद्यापीठ में शिक़ायतों की समितियाँ बनें। मानो धर्मराज की न्यायसभा उतर आयी हो। सोशल मीडिया के क्षत्रिय की-बोर्डों पर शस्त्र उठाए खड़े हैं; कोई 15%, कोई 7.5%, कोई 27% का शंखनाद कर रहा है। संविधान के श्लोकों में अनुसूचित जाति को 15% और अनुसूचित जनजाति को 7.5% का वरदान मिला, फिर मंडल के महामंत्र से अन्य पिछड़े वर्गों को 27% का कवच प्राप्त हुआ। कुल मिलाकर अर्धशतक की मर्यादा। जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने “लक्ष्मण-रेखा” कहकर अंकित कर दिया। फिर 2019 में 10% का एक और वर, ‘आर्थिक रूप से दुर्बल सवर्णों के लिए’ मानो देवताओं की सभा में एक अतिरिक्त आसन जोड़ दिया गया हो।

परन्तु, हे नीति-पुरुषों! प्रश्न यह नहीं कि स्वर्ग के द्वार पर कितने प्रतिशत का पुष्पचिह्न अंकित है? प्रश्न यह है, कि पृथ्वी पर वह पगडंडी ही कहाँ है जो स्वर्ग-द्वार तक ले जाये? जब मूल विद्यालय ही बंद हो जाएँ, जब ग्राम की सरस्वती-धारा ही सूख जाये, तब ‘आरक्षण का अमृत-पात्र’ किसे और कहाँ प्रदान करोगे?
आप कहते हो, “देखो! भागीदारी बढ़ी है; 3.85 करोड़ से 4.13 करोड़ तक पहुँच गयी!” अहो, अद्भुत! किंतु, जिनके गाँव की पाठशाला विलीन हो गयी, जिनके घर से निकटतम विद्यालय अब सात कोस दूर हैं, जिनकी जेब में बस किराये का भी वरदान नहीं, उनके लिए यह संख्या-पुराण किस काम का? वह तो अभी वर्णमाला के द्वार पर ही खड़े हैं; तुम उन्हें विश्वविद्यालय के सिंहासन का स्वप्न दिखा रहे हो!
यह वैसा ही है, जैसे किसी वनवासी को कहो, “तुम्हारे लिए राजमहल में आधा आसन सुरक्षित है” …और उसी क्षण उसका वन ही नीलाम कर दो। पहले बीज छीनो, फिर फल पर वाद-विवाद करो; पहले गुरुकुल गिराओ, फिर ‘प्रवेश-प्रतिशत’ पर धर्मयुद्ध छेड़ दो! कलियुग की यह लीला अद्भुत है!
अंततः आरक्षण का प्रश्न तो महाभारत का चक्रव्यूह है; कौन भीतर जाए? कौन बाहर रहे? परंतु, उससे भी बड़ा प्रश्न यह है, कि अभिमन्यु को युद्धभूमि तक पहुँचने का रथ मिला भी या नहीं? जब मूल शिक्षा ही विलुप्त हो रही हो, तब प्रतिशतों की यह बहस ऐसे है, जैसे शून्य में राजसूय यज्ञ; धुआँ बहुत, अग्नि नहीं; घोष बहुत, प्रकाश नहीं!

डॉ स्वाति चौधरी #drswatichoudhary के फेसबुक पेज https://www.facebook.com/share/p/1CRqUuCGN3/ से साभार

नर्मदाप्रसाद उपाध्याय और अतुल तारे को मिला ‘हिन्दी गौरव अलंकरण 2026’

इंदौर। ‘मातृभाषा उन्नयन संस्थान’ द्वारा प्रेस क्लब में हिन्दी गौरव अलंकरण समारोह आयोजित किया गया। आयोजन में वर्ष 2026 के हिन्दी गौरव अलंकरण से वरिष्ठ साहित्यकार नर्मदा प्रसाद उपाध्याय व वरिष्ठ पत्रकार श्री अतुल तारे को विभूषित किया गया।

समारोह के मुख्य अतिथि हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल विष्णु सदाशिव कोकजे व अध्यक्षता देवी अहिल्या विवि, इंदौर के कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई ने की। इस मौके पर भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी विशेष अतिथि थे।

स्वागत उद्बोधन डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’ एवं संचालन डॉ. अखिलेश राव ने किया।

हिन्दी गौरव अलंकरण समारोह में काव्य साधकों में नागदा से कमलेश दवे, माण्डव से डॉ. पंकज प्रसून चौधरी, उज्जैन से निशा पण्डित, बड़नगर से पुष्पेंद्र जोशी पुष्प और भोपाल से शिवांगी प्रेरणा को काव्य गौरव अलंकरण प्रदान किया गया।

मुख्य अतिथि श्री कोकजे ने कहा कि ’प्राथमिक पढ़ाई मातृभाषाओं में होगी, तब ही प्रगति सम्भव होगी। इच्छाशक्ति के बलवान होने से भाषाओं का विस्तार होगा।’

कुलगुरु प्रो. सिंघई ने कहा कि ‘भविष्य की चिंताओं के बीच भी हिन्दी ज़िंदा रहेगी। और हिन्दी के साथ-साथ देवनागरी का साथ चाहिए।’

प्रोफेसर (डॉ.) संजय द्विवेदी ने कहा कि ‘भाषा और भारतीयता की चिंता आवश्यक है। भाषा नहीं बची तो हम भी नहीं बचेंगे।
उन्होंने कहा कि वैचारिक आत्मदैन्य से मुक्ति जरूरी है, इसने हमारे आत्मविश्वास को समाप्त कर दिया है। प्रोफेसर द्विवेदी ने कहा उपनिवेशवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि आजादी के आठ दशकों बाद भी भारतीय भाषाओं का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है।

सम्मान मूर्ति नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने कहा कि ‘लोक से हिन्दी समृद्ध है, इसी बीच साहित्य और कला के अंतरसंबंध मज़बूत होंगे और इनके बीच आज अन्तरानुशासन की आवश्यकता है।’

सम्मान मूर्ति अतुल तारे ने कहा कि ‘हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में समाचार पत्रों की अहम भूमिका रही है। आभासी दुनिया यानी एआई का युग है, इसमें अपनी भाषा से जुड़ाव स्व का बोध करवाता है।’

आयोजन में साहित्यकार संध्या राणे के कविता संग्रह ‘शुभम् करोति’ का लोकार्पण भी हुआ।

इस अवसर पर अरविंद तिवारी, पुरुषोत्तम दुबे, योगेन्द्रनाथ शुक्ल, डॉ. पद्मा सिंह, जयंत भिसे, हरेराम वाजपेयी, जय सिंह रघुवंशी उपस्थित रहे।

कई फलों की मिठास और फूलों की महक से सराबोर है श्री सुरेश प्रभु का व्यक्तित्व

मुंबई। मुंबई शहर ऐसे तो आयोजनों का शहर है प्रतिदिन यहाँ सैकड़ों आयोजन होते हैं, जिनमें कॉर्पोरेट से लेकर फिल्म, साहित्य और संस्कृति से जुड़े आयोजन सब शामिल हैं। लेकिन कुछ ही आयोजन ऐसे होते हैं जो हर दृष्टि से यादगार रह जाते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सुरेश प्रभु पर मराठी में लिखी गई पुस्तक ध्येयधुंद (धुन के पक्के) के विमोचन का कार्यक्रम ऐसा ही एक यादगार रोमांचक और भावनाओं से भरा हुआ आयोजन था।

विशेष उल्लेखनीय रहा कि समारोह के केंद्रबिंदु होते हुए भी सुरेश प्रभु मंच पर न बैठकर श्रोताओं के बीच शांतिपूर्वक कार्यक्रम सुनते रहे, जबकि हाल में बैटे श्रोता श्री सुरेश प्रभु को मंच पर ना पाकर हैरान थे कि प्रभुजी मंच पर नहीं हैं तो कहाँ हैं।

श्री सुरेश प्रभु के बारे में कुछ रोचक लेख

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दादर स्थित सावरकर सभागृह के खचाखच भरे हाल में ये कार्यक्रम संपन्न हुआ और लगातार तीन घंटे तक चला।

द इनविज़िबल रूट्स: एक मालवणी आत्मा, वैश्विक व्यक्तित्व में – श्री सुरेश प्रभुइस समारोह में रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग का कोकण कोहिनूर सावरकर स्मारक में आलोकित हो उठा हो। हमारे प्रभु-प्रेमी मित्र नकुल पार्सेकर ने “ध्येयधुंद” पुस्तक तो लिखी, पर विषय कौन? हमारे ही सुरेश प्रभु साहब।

प्रभु का जीवन मानो दौड़ती लोकल ट्रेन का डिब्बा हो।

और भला कालनिर्णय के कर्ता-धर्ता जयराज साळगावकर वहाँ उपस्थित न होते, यह कैसे संभव था? साळगावकर के ‘कालनिर्णय’ ने हमें उपवास का दिन बताकर भोजन से दूर रखा, लेकिन जब प्रभु और साळगावकर साथ बैठते हैं, तो मालवणी अंदाज़ में जो बातचीत की चटपटी फुहार उड़ती है, उसका कोई मुकाबला नहीं।

साळगावकर द्वारा सुनाया गया मच्छिंद्र कांबली का किस्सा सुनकर तो हँसी के मारे पेट में बल पड़ गए। श्री साळगावकर ने बताया—एक बार प्रभु ने मच्छिंद्र कांबली से कहा, “अरे मच्छिंद्र, कभी गाँव में घर पर खाने आना।” इस पर मच्छिंद्र ने तुरंत जवाब दिया, “अरे सुरेश, पहले तुम चार दिन अपने ही घर पर खाना खा लो, तब पाँचवें दिन मैं तुम्हारे घर खाने आऊँगा!”

वास्तव में, प्रभु के घर भोजन के लिए जाना मानो मृगतृष्णा के पीछे दौड़ने जैसा है। जिस व्यक्ति का घर ही मानो भारतीय रेल या एयर इंडिया बन गया हो, वह स्वयं घर पर कब भोजन करेगा और अतिथियों को कब बुलाएगा? देशसेवा में स्वयं को समर्पित कर देना ही उनका सबसे बड़ा ‘व्यसन’ है—और जब वह व्यक्ति मालवणी हो, तो बात वहीं समाप्त हो जाती है।

आप एक मालवणी व्यक्ति को सिंधुदुर्ग से बाहर ले जा सकते हैं, लेकिन मालवणी आभा को उस व्यक्ति से कभी अलग नहीं कर सकते।

पर आश्चर्य इस बात का है कि इतना बड़ा वैश्विक व्यक्तित्व होने के बावजूद उनका स्वभाव बिल्कुल अपने मोहल्ले के भजी की दुकान पर बैठकर सहज गपशप करने वाले किसी अपने जैसे ही सरल व्यक्ति जैसा है। सावरकर स्मारक के उस गरिमामय वातावरण में, दिग्गजों की उपस्थिति के बीच, सावंतवाड़ी के एक सामान्य लेखक द्वारा एक असाधारण व्यक्तित्व पर पुस्तक लिखना—यह अपने आप में “सादा जीवन, उच्च विचार” का सजीव उदाहरण है।

मानो स्वयं सरस्वती ने व्यास से कहा हो—“अब आप थोड़ा विश्राम कीजिए, अगला अध्याय मैं लिखती हूँ।” और दृश्य भी कितना अनोखा—मंच पर सभी मान्यवर विराजमान, “सत्कार मूर्ति” के रूप में सुरेश प्रभु का सम्मान, लेकिन स्वयं प्रभु साहब मंच पर न बैठकर सामने दर्शकों की कुर्सी पर शांतिपूर्वक बैठे हुए! यह लेखक और जिस पर लिखा गया है—दोनों के ही सादगी के भाव का सीमोल्लंघन था।

अब नकुल से बस एक ही कहना है—पार्सेकर जी, दूसरा खंड जल्द प्रकाशित कीजिए। नहीं तो ऐसा न हो कि तब तक सुरेश प्रभु किसी दूसरे ग्रह पर “इंटर-गैलेक्टिक कमिटी” बनाने निकल जाएँ और आपको जानकारी जुटाने के लिए सीधे इसरो के चक्कर लगाने पड़ें!

— अनिकेत रविंद्र वालावलकरी

कार्यक्रम की अध्यक्षता महाराष्ट्र प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने की। विशेष अतिथि के रूप में एबीपी माझा के कार्यकारी संपादक राजीव खांडेकर उपस्थित थे।

पुस्तक के लेखक अधिवक्ता नकुल पार्सेकर का कहना था कि सुरेश प्रभु के व्यक्तित्व, उनके राष्ट्रनिर्माण के प्रति समर्पण, सकारात्मक ऊर्जा और समाजाभिमुख कार्यशैली ने उन्हें सदैव प्रेरित किया। श्रीमती उमा प्रभु के मार्गदर्शन ने भी इस पुस्तक की संकल्पना को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, “सुरेश प्रभु जैसे बहुआयामी व्यक्तित्व पर लिखना हिमालय पर एक झाड़ी के बोलने जैसा साहस है,” फिर भी आठ महीनों के अथक परिश्रम से यह पुस्तक तैयार की गई।

बेहद अनुशासन व गरिमामयी ढंग से संपन्न इस आयोजन में उपस्थित वक्ताओं ने श्री सुरेश प्रभु को लेकर ऐसे ऐसे संस्मरण प्रस्तुत किए कि उनको बरसों से जानने वाले लोग भी रोमांचित हो गए।  कई बार तो ऐसा लगा जैसे परीकथा के किसी सर्वशक्तिमान  नायक की कोई कथा कही जा रही है या किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में बात हो रही है जो इस समाज की दुनिया से एक अलग तल पर जीता है।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने सुरेश प्रभु के बहुआयामी व्यक्तित्व, उनके दूरदर्शी नेतृत्व और राष्ट्रसेवा के प्रति उनके समर्पण की प्रशंसा की। लेखक नकुल पार्सेकर ने अपने प्रास्ताविक में पुस्तक लेखन के पीछे की प्रेरणा और अनुभव साझा किए।

समारोह में महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों सहित राज्य के बाहर से भी बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन के साथ राष्ट्रगान किया गया।

अपने संबोधन में  विशेष अतिथि के रूप में एबीपी माझा के कार्यकारी संपादक राजीव खांडेकर  ने   वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में सुरेश प्रभु की विशिष्ट कार्यशैली पर प्रकाश डाला तथा पुस्तक के द्वितीय संस्करण की आवश्यकता व्यक्त की। श्री  राजीव खांडेकर ने कहा—जब भी मैं सुरेश प्रभु से मिलता हूँ, वे या तो किसी वैश्विक बैठक से लौट रहे होते हैं या किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए रवाना हो रहे होते हैं। उनके पासपोर्ट पर लगे मुहरों की गिनती करनी हो तो शायद एक स्थायी टैली ऑपरेटर रखना पड़े।

वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेटं सतीश मराठे ने भारत सरकार की नई राष्ट्रीय सहकार नीति समिति के अध्यक्ष के रूप में सुरेश प्रभु के कार्यों की सराहना की।सारस्वत बैंक के चेयरमैन गौतम ठाकुर ने बताया कि मात्र 37 वर्ष की आयु में बैंक की जिम्मेदारी संभालते हुए प्रभु ने संस्थान की मजबूत नींव रखी।

काल निर्णय कैलेंडेर के संस्थापक श्री  जयराम साळगावकर ने अपने पिताश्री स्व. जयंत साळगावकर के साथ प्रभु के आत्मीय संबंधों का उल्लेख किया। वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेट श्री  प्रफुल्ल छाजेड ने उन्हें अद्वितीय दूरदर्शी नेता बताया और उपस्थित जनसमूह से खड़े होकर सम्मान व्यक्त करने का आग्रह किया, जिस पर सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

वरिष्ठ चार्टर्डएकाउंटेंट श्री शैलेष हरिभक्ति व नाबार्ड के अध्यक्ष व रिज़र्व बैंक के निदेशक मंडल के सदस्य केवी शिवाजी ने श्री सुरेश प्रभु के साथ की बरसों की यात्रा के रोचक संस्मरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनके जैसा दूरदृष्टि वाला राजनीतिक व्यक्ति आज के दौर में दुर्लभ है। श्री केवी शिवाजी ने कहा कि अगर सुरेश प्रबुजी पर अंग्रेजी में पुस्तक प्रकाशित हुई तो पूरी दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष इस कार्यक्रम में आएँगे और म्ंच  से लेकर श्रोताओं की जगह राष्ट्राध्यक्षों से ही भर जाएगी। उन्हौंने कहा कि पूरी दुनिया के तमाम राष्ट्रपतियों और प्रधान मंत्रियों से लेकर हर राजनीतिज्ञ से श्री सुरेश प्रभु ने जो रिश्ते बनाए उसीका नतीजा था कि प्रधान मंत्री के शेरपा के रूप  में उन्होंने जी-जैसे विराट आयोजन में पूरी दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष भारत आए।

अपने संक्षिप्त उद्बोधन में  श्री सुरेश प्रभु ने विनम्रतापूर्वक कहा कि जीवित रहते उन पर पुस्तक लिखे जाने से उन्हें यह जानने का अवसर मिला कि लोग उनके कार्यों के बारे में क्या सोचते हैं। उन्होंने कहा कि मेरा ध्येय रहा है कि  बिना किसी लाभ की अपेक्षा निरंतर कार्य करते रहना, और मैं सतत् इसी भाव से जीता हूँ। इस पुस्तक को उन्होंने अपने सामाजिक व सार्वजनिक जीवन की पूँजी बताया।

समारोह में महाराष्ट्र सहित कोलकाता, पटना, गोवा और सिंधुदुर्ग से अनेक गणमान्य व्यक्ति, सामाजिक कार्यकर्ता, उद्योगपति, शिक्षाविद, पत्रकार एवं विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।  पूरे समय सभागार पूर्णतः भरा रहा और अंत में पुस्तक पर हस्ताक्षर एवं छायाचित्रों के लिए उत्साहपूर्ण प्रतिसाद देखने को मिला।

कार्यक्रम के मुख्य संयोजक डॉ. अमेय देसाई एवं श्री रविंद्र वाडेकर सहित आयोजन समिति के सभी सदस्यों के प्रयासों से यह समारोह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। सुप्रसिद्ध मंच संचालक स्मिता गावाणकर के प्रभावी संचालन ने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की।

इस आयोजन में वक्ताओं ने तो अपनी बात मन से कही, लेकिन श्रोताओं में बैठे लोगों में एक एक व्यक्ति ऐसा था जो सुरश प्रभुजी के बारे में कुछ न कुछ कहना चाहता था, जिनमें कॉर्पोरेट से लेकर बैंकिंग, राजनीति, सामाजिक व साहित्यिक जगत के जाने माने लोग शामिल थे ।

एक श्रोता का कहना था,कई फूलों की मिठास और फूलों की महक से सराबोर है श्री सुरेश प्रभु का व्यक्तित्व, वो अकेले एक ऐसे बगीचो के समान हैं कि आप उनके बारे में जितना जानो और जितना कहो वह आधा अधूरा रहेगा।

एक अन्य श्रोता ने कहा कि अगर हाल में बैठे सब लोगों को बोलने का मौका दिया जाता तो ये कार्यक्रम की दिन चलता और लोग हिलते भी नहीं । राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय रहते हु़ए किसी व्यक्ति के बारे में किसी आम आदमी का ये सोचना ही इस बात का प्रमाण है कि सुरेश प्रभु जैसे लोग जिस क्षेत्र में रहेंगे अपने कार्यों से उस क्षेत्र की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता बढ़ा देंगे ।

पुस्तक का प्रकाशन स्वामीराज प्रकाशन के श्री रजनीश राणे तथा वर्धमान श्रुतगंगा ट्रस्ट के श्री संजय शहा के सहयोग से समय पर संपन्न हुआ।

इसके पूर्व  महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपने निवास ‘वर्षा’ पर पूर्व दिवस पुस्तक का अनावरण  किय़ा।
 लोकभवन में राज्यपाल के करकमलों से भी पुस्तक का विमोचन हुआ।

भारत के ईशान्य कोण की अष्टलक्ष्मी आपको बुला रही है

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और इससे जुड़े तमाम संगठन विगत सौ वर्षों से किस ध्येय, संकल्प और समर्पण के साथ राष्ट्र के कार्य में लगे हैं इसका प्रत्यक्षनअनुभव तभी होता है जब संघ या विश्व हिंदू परिषद् के कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद होता है।

मुंबई के बोनांजा पोर्टफोलियो के श्री एसपी गोयल की पहल पर श्री भागवत परिवार द्वारा आय़ोजित एक ऐसे ही संवाद में विगत कई वर्षों से पूर्वोत्तर भारत में सेवा कार्य कर रहे विश्व हिंदू परिषद् के श्री दीपक जोशी से सीधे संवाद में उनके द्वारा दी गई चौंकाने वाली  जानकारी ने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने बताया कि यहाँ के लोगों की राष्ट्र व धर्म निष्ठा इतनी प्रबल रही है कि मिशनरियों को पहला इसाई बनाने में 63 साल लग गए।

कार्यक्रम में उपस्थित दिल्ली के चार्टर्ड एकाउंटेंट व पूर्वोत्तर क्षेत्र में बरसों से सेवा कार्य कर रहे श्री सत्य प्रकाश मंगल ने यादगार व रोचक प्रसंग बताकर सबको चौंका दिया।

उन्होंने बताया कि इटानगर क्षेत्र में हतानू नाम का एक इसाई व्यक्ति है, जिसकी 6 पत्नियाँ और 24 लड़के -लड़कियाँ हैं। उस व्यक्ति से लगातारा संपर्क में रहने के बावजूद से भारत माता की जय बोलने में 4 साल लगे। और फिर गौ माता की जय बोलने में दो साल लगे। जब उसने इसाई धर्म छोड़क हिंदू धर्म ग्रहण कर लिया तो उसकी चारों इसाई पत्नियों ने उसे अपने सपने की घटना सुनाते हुए कहा कि प्रभु इशु हमारे सपने में आए और कहा कि उन्होंने कहा है कि तुम्हारे हिंदू बनने से वो नाराज हो गए हैं। इस पर दो दिन बाद हतानू ने अपनी पत्नियों को कहा कि इशु मेरे भी सपने में आए ते और कह रहे थे कि मैं ही शिव हूँ, तुमने जो किया वो ठीक किया। आज उस व्यक्ति ने एक विशाल पहाड़ खरीदकर वहाँ शिव मंदिर बनाने का संकल्प लिया है और वो जी जान से इस काम में लगा है।

दूसरी घटना बताते हुए उन्होंने कहा कि एक दिन कुछ आतंकवादियों ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में मेरा अपहरण कर लिया, और मुझे एक अंधेरी झोपड़ी में कैद कर दिया। वहाँ पूरे समय एक एके 56 लिए व्यक्ति मेरी निगरानी करता रहा। मैं जरा भी हिलूं तो वह मुझ पर एके 56 तान देता था। मैं कृष्ण भक्त हूँ और मैने कृष्ण जी को याद किया, अचानक उस व्यक्ति के पेट में ऐसा तेज दर्द शुरु हुआ कि उसने एके 57 रख दी और अपना पेट पकड़कर बैठ गया। मैने उससे कहा कि मैं तुम्हारा दर्द ठीक कर देता हूं और कृष्णजी का नाम लेकर उसकी हथेली पर एक्यूप्रेशर देने लगा, ये चमत्कार ही था कि थोड़ी ही देर में सका दर्द दूर हो गया तो उसने खुश होकर मुझसे कहा कि तुम भागकर सड़क पर चले जाओ। मैं भागकर सड़क के किनारे गया तो एक जीप वाले ने मुझे लिफ्ट दी और मैं सुरक्षित निकल आया।

एक अन्य किस्सा बताते हुए उन्होंने कहा कि नागालैंड के पर्यटन मंत्री और मैं एक होटल में साथ ही ठहरे थे, उन्होंने मुझसे मिलने की जिज्ञासा जताई उनसे मिलने के बाद मैंने उनको धोती पहनाने की पेशकश की तो उसने कहा कि मैं तो क्रिश्चियन हूँ, इस पर मैने कहा कि क्रिश्चियन में कृष्ण ही है ये धोती कृष्ण की निशानी है, वो प्रसन्न हो गए और धोती पहन ली। फिर उन्होंने मुझे नागालैंड के हॉर्नोबिल उत्सव में आमंत्रित किया तो मैने कहा कि इस उत्सव में तो आप गौमांस खाते हो, हम ऐसी जगह नहीं आसकते। बाद में उन्होंने मुझे सूचित किया कि इस बार इस उत्सव में केवल शाकाहारी खाना रहेगा।

श्री दीपक जोशी ने पूर्वोत्तर क्षेत्र के अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा जिसे प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अष्टलक्ष्मी नाम दिया है, की संस्कृति और जीवनशैली को लेकर कई रोचक, चौंकाने वाली और रोमांचित करने वाली जानकारियाँ साझा की। उन्होंने बताया कि हजारों सालों से ये सबी क्षेत्र भारत की संस्कृति और परंपारओं का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। हमारे कई पौराणिक व वैदिक तीर्थ व मंदिर इन क्षेत्रों में हजारों सालों से हैं। लेकिन विगत तीन सौ वर्षों में हमारा ध्यान इन क्षेत्रों पर नहीं गया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने पहली बार 1948 में मधुकर लिमये को वहाँ प्रचारक बनाकर भेजा और इसके बाद संघ के समर्पित प्रचारकों की एक लंबी श्रृंखला रही जो उस तक्षेत्र में सेवा कार्य करने जाते रहे जो आज तक अनवरत जारी है। संघ के कई प्रचारकों और कार्यकर्ताओं की वहाँ हत्या तक कर दी गई। लेकिन संघ ने अपने सेवा कार्य और वहाँ के लोगों को राष्ट्र से जोड़ने का काम जारी रखा।

उन्होंने बताया कि इसाई मिनशनरी अंग्रेजों के समय ये ही इन सात राज्यों को तोड़कर एक अलग देश बनाने का षड़यंत्र करती रही, लेकिन वहाँ के आदिवासी समुदाय की अपने समाज व राष्ट्र के प्रति निष्ठा से उनका ये षड़यंत्र सफल नहीं हो पाया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को छोड़कर वहाँ कोई ऐसी शक्ति नहीं थी जो लोगों में राष्ट्र प्रेम की धारा को जीवित बनाए रखती।

हमारे लिए ये अष्टलक्ष्मी प्रदेश प्रारंभ से ही आस्था व श्रध्दा के केंद्र रहे हैं। असम का कामख्या का मंदिर तंत्र का सबसे प्रसिध्द व जाग्रत शक्तिपीठ है। गोहाटी में नवग्रह मंदिर व वशिष्ठ जी का आश्रम है। मेघालय में जयंती भद्रकाली का जयंती मंदिर है, जहाँ के पुजारी देशमुख महाराष्ट्र से गए थे और आज उनकी 29वीं पीढ़ी इस मंदिर में पूजा अर्चन का कार्य देख रही है। त्रिपुरा में त्रिपुर सुंदरी का मंदिर है, जो एक प्रमुख शक्ति पीठ है। इंफाल में गोविंददेवजी का मंदिर है और हजारों प्राचीन मंदिर आज भी हैं। मिजोरम का संबंध राम से है। वहाँ पोलाशिव मंदिर है। नागालैंड में खाटू श्याम व हिडिंबा का मंदिर है, जो महाभारत कालीन है। यहाँ परशुराम का भी स्थान है।

उन्होंने कहा कि श्री नरेंद्र मोदीजी के आव्हान पर अष्टलक्ष्मी क्षेत्र के जागरण का जो कार्य प्रारंभ हुआ है उससे पूरे देश की चेतना इस क्षेत्र से जुड़ी है। राजनीतिक दृष्टि से वर्ष 2014 के बाद इस क्षेत्र पर सरकार का ध्यान गया। मोदी सरकार आने के बाद इस क्षेत्र में विकास को एक नई गति मिली।

उन्होंने बताया कि विश्व हिंदू परिषद् और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कई प्रकल्प अष्टलक्ष्मी क्षेत्र में सैकड़ों सेवा कार्य कर रहे हैं। एकल अभियान व विद्याभारती द्वारा 9 हजार स्कूल और 150 छात्रावास संचालित किए जा रहे हैं। इन स्कूलों से निकले हुए सैकड़ों बच्चे अच्छे संस्थानों में व सरकारी नौकरी कर रहे हैं। यहाँ सक्रिय सैकड़ों उग्रवादी संगठनों से जुड़े हजारों युवा उग्रवाद छोड़कर आज पुलिस व सेना से लेकर विभिन्न सरकारी व निजी संस्थानों में नौकरी कर रहे है। कई लोग खेती में भी लगे हैं।

श्री दीपक जोशी ने बताया कि मोदी सरकार के आने के बाद इस क्षेत्र में 18 एअरपोर्ट बने और 7  नए अएरपोर्ट और बन रहे हैं। सड़कों का जाल तेजी से बिछाया जा रहा है। असम के तिनसुखिया में ऐसी सड़क बनाई गई है जिस पर युध्दक विमान तक सफलतापूर्वक उतर चुके हैं। उन्होंने बताया कि देश के सीमावर्ती राज्य से पूर्वोत्त्र की दूरी मात्र 22 किलोमीटर है। उन्होंने बताया कि वहाँ दृश्य तेजी से बदल रहा है और देश के लोगों का भी पूर्वोत्तर क्षेत्र में पर्यटन व धार्मिक स्थलों पर जाने का आकर्षण बढ़ा है।

कार्यक्रम के आरंभ में श्री वीरेन्द्र याज्ञिक ने श्री दीपक जोशी को श्री भागवत परिवार द्वारा प्रकाशित ग्रंथ अप्रतिम भारत की एक प्रति भेंट की।

कार्यक्रम का विशेष आकर्षण श्री एसपी गोयल का पौत्र नंदन रहा जिसने अपने बाल सुलभ भाव से कहानी व कविता सुनाकर सबको रोमांचित कर दिया
कार्यक्रम में श्री भागवत परिवार के मार्गदर्शक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक, श्री भागवत परिवार के अध्यक्ष श्री सुनील सिंघल, श्री सत्यनारायण पाराशर, श्री दिनेश गग्गड़. श्री पीसी श्रीमाली, श्री अनंत रूंगटा, श्री बीपी बिंदलिश, श्री सुशील शर्मा, श्री पंकज टिबड़ेवाल, श्रीमती शालू गोयल के अलावा लेखक पत्रकार श्री प्रदीप गुप्ता, श्री जयंत बागरेचा, श्री पंकज बागरेचा आदि उपस्थित थे।

खतरनाक ड्रग के नेटवर्क की पड़ताल

सिंथेटिक ड्रग्स की शुरुआत सड़कों पर नहीं होती। उनकी शुरुआत उससे कहीं पहले, कारखानों, गोदामों और उन शिपिंग कंटेनरों में होती है जो हर दिन रसायनों को सीमाओं के पार ले जाते हैं। इनमें से कई रसायन कानूनी हैं और फार्मास्यूटिकल तथा अन्य उद्योगों में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं। लेकिन जब तस्कर इन्हें दूसरे रास्ते ले जाते हैं, तो यही पदार्थ उन सिंथेटिक ड्रग्स के निर्माण की नींव बन जाते हैं जो समुदायों और सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाते हैं। ड्रग एनफोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डीईए) में सहायक विशेष एजेंट-इन-चार्ज केटी डोराइस बताती हैं कि प्रीकर्सर रसायनों को नियंत्रित करना अमेरिकी सरकार की प्राथमिकता क्यों है। डीईए, एक फेडेरल कानून प्रवर्तन एजेंसी है जो तस्करों को इन रसायनों को हानिकारक नशीले पदार्थों में बदलने से रोकने के लिए काम करती है।

प्रीकर्सर क्या होते हैं? डोराइस कहती हैं, “प्रीकर्सर रसायन वे आवश्यक घटक होते हैं जिनका उपयोग मेथामफेटामीन और फेंटानिल जैसे नियंत्रित पदार्थों का अवैध रूप से निर्माण करने में किया जाता है,” और यह भी जोड़ती हैं कि इनमें से कई रसायनों के वैध उपयोग भी होते हैं।

समस्या का पैमाना अत्यंत विशाल है। वह कहती हैं, “2024 में, डीईए ने फेंटानिल -मिश्रित 6 करोड़ से अधिक नकली गोलियाँ और लगभग 8,000 पाउंड फेंटानिल पाउडर जब्त किया।” “ये जब्तियाँ फेंटानिल की 38 करोड़ से अधिक घातक खुराकों के बराबर हैं।” ये आँकड़े दर्शाते हैं कि अमेरिकी सरकार प्रीकर्सर नियंत्रण को केवल एक नियामक मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का प्रश्न क्यों मानती है।

2025 के अंत में, डीईए ने फेंटानिल फ्री अमेरिका नामक एक अभियान शुरू किया, जिसका उद्देश्य फेंटानिल की आपूर्ति और मांग दोनों को कम करना है। डोराइस कहती हैं, “डीईए अमेरिकी जीवन और समुदायों को फेंटानिल के विनाशकारी प्रभावों से बचाने के लिए प्रतिबद्ध है। फेंटानिल फ्री अमेरिका का अर्थ रोकथाम, शिक्षा और साझेदारी है।”

शृंखला को तोड़ना
क्योंकि इन रसायनों के वैध उपयोग भी होते हैं, तस्कर अक्सर सबकी नजरों के सामने छिपे रहते हैं। डोराइस एक सामान्य तरीके की ओर इशारा करती हैं जिसे ट्रांसशिपमेंट कहा जाता है। वह कहती हैं, “इस प्रणाली में आयात/निर्यात से जुड़े ऐसे छिद्र हैं जिनसे निपटना कठिन है।” आपराधिक समूह कमज़ोर निगरानी वाले बंदरगाहों के माध्यम से रसायनों को स्थानांतरित करते हैं और फिर उन्हें आगे भेज देते हैं। वह जोड़ती हैं, “यह प्रक्रिया प्रारंभिक निर्यातक देश के लिए कागजी रिकॉर्ड को साफ-सुथरा दिखाती है।”

डीईए के लिए इस चरण पर दुरुपयोग को रोकना अत्यंत महत्वपूर्ण है। डोराइस कहती हैं, “डीईए प्रीकर्सर रसायनों के नियंत्रण को प्राथमिकता देता है, जिससे ड्रग तस्करों के लिए नशीले पदार्थ बनाने हेतु कच्चा माल प्राप्त करना कठिन हो जाता है।”

एक और सामान्य तरीका, गलत घोषणा (मिस-डिक्लेरेशन), किसी शिपमेंट की वास्तविक प्रकृति या गंतव्य को छिपाने से जुड़ा होता है। वह समझाती हैं, “प्रीकर्सर रसायन ऑनलाइन खरीदे जाते हैं और आयात/निर्यात के दौरान उनकी गलत घोषणा की जाती है।”

इस जोखिम से निपटने के लिए, डीईए कंपनियों के साथ नो योर कस्टमर (केवाईसी) प्रथाओं पर काम करता है। डोराइस बताती हैं, “केवाईसी का सिद्धांत यह है कि कोई रासायनिक या फार्मास्यूटिकल कंपनी ऐसी नीतियाँ लागू करे जिससे ज्ञात प्रीकर्सरों की बिक्री केवल उन ग्राहकों तक सीमित रहे जिन्हें वास्तविक माना जाता है।”

उभरते जोखिमों की पहचान में वैज्ञानिक विश्लेषण भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डोराइस बताती हैं, “संयुक्त राज्य अमेरिका में डीईए की प्रयोगशाला प्रणाली सिंथेटिक ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई में अग्रणी है।” “यह जब्त किए गए रसायनों—जैसे पाउडर, तरल और गोलियाँ—का विश्लेषण करती है। वर्षों में, डीईए ने प्रीकर्सर सिग्नेचर, संश्लेषण मार्गों, अशुद्धता प्रोफाइल और उभरते एनालॉग्स का एक विशाल डेटाबेस तैयार किया है।” तस्करों द्वारा रणनीतियाँ बदलने के साथ सरकारों को भी अनुकूलन करना पड़ता है। वह कहती हैं, “एआई और डेटा एनालिटिक्स दूसरे रास्ते भेजे गए हुए प्रीकर्सर रसायनों का पता लगाने में शक्तिशाली उपकरण हैं।” डेटा एनालिटिक्स किसी भी एजेंसी को रसायनों की खरीद की मात्रा, शिपिंग जानकारी, आयात और निर्यात डेटा जैसी विसंगतियों की पहचान करने में सक्षम बनाता है। ये उपकरण जांचकर्ताओं को उच्च-जोखिम वाले शिपमेंट पर रियल-टाइम अलर्ट लगाने या किसी कंपनी द्वारा असामान्य गंतव्य पर बड़ी मात्रा में प्रीकर्सर रसायन बेचने की पहचान करने में मदद कर सकते हैं।

भारत के साथ काम
डीईए भारत के साथ सहयोग के महत्व पर जोर देता है। डोराइस कहती हैं, “भारत वैध प्रीकर्सर रसायनों के दुनिया के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है, इसलिए साझेदारी आवश्यक है,” और बताती हैं कि डीईए भारत की सेंट्रल रेवेन्यूज़ कंट्रोल लेबोरेटरी (सीआरसीएल) के साथ प्रीकर्सर रसायनों और सिंथेटिक ओपिओइड्स की पहचान पर काम कर रहा है।

डीईए का नई दिल्ली कार्यालय भारत के नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस और सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स के साथ भी जानकारी साझा करने और संयुक्त जांचों के समर्थन के लिए निकटता से काम करता है।

अगस्त 2025 में, डीईए ने वर्जीनिया के स्टर्लिंग स्थित स्पेशल टेस्टिंग एंड रिसर्च लेबोरेटरी से दो रसायनज्ञों को भारत में समकक्षों के साथ रासायनिक विश्लेषण और सर्वोत्तम प्रथाओं पर चर्चा करने के लिए भेजा। डीईए 2026 में सीआरसीएल के साथ अतिरिक्त कार्यक्रमों की उम्मीद करता है ताकि बदलते ड्रग रुझानों की निगरानी और सूचना साझा करना जारी रखा जा सके।

अमेरिकी सरकार के कार्यक्रमों और कूटनीतिक सहभागिता से समर्थित यह सहयोग, वैध व्यापार का समर्थन करते हुए निगरानी को मज़बूत करता है। रोकथाम, निगरानी और साझेदारियों पर ध्यान केंद्रित करके, डीईए का लक्ष्य खतरनाक ड्रग्स को अमेरिकी समुदायों तक पहुँचने से पहले ही रोकना है।

(lचित्र परिचयःअमेरिका में डीईए की प्रयोगशाला प्रणाली जब्त किए गए रसायनों—जैसे पाउडर, तरल पदार्थ और गोलियाँ—का विश्लेषण करती है। वर्षों के दौरान, इसने प्रीकर्सर संकेतों, संश्लेषण मार्गों, अशुद्धता प्रोफाइल और उभरते एनालॉग्स का एक विशाल डेटाबेस तैयार किया है। (फोटोग्राफ © मार्क शीफ़ेलबाइन / एपी))

साभार: स्पैन https://spanmag.state.gov/hi/ से

छत्रपति शिवाजी की अमर विरासत और आधुनिक भारत की दिशा

19 फरवरी भारत के इतिहास का वह गौरवपूर्ण दिवस है, जब हम छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती मनाते हैं। यह केवल एक जन्मतिथि का स्मरण नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उस अद्भुत अध्याय का उत्सव है, जिसने पराधीनता के अंधकार में स्वराज्य का दीप प्रज्वलित किया। सत्रहवीं शताब्दी में जब भारत का बड़ा भूभाग मुगल सत्ता, विशेषतः औरंगजेब के कठोर शासन के अधीन था, तब सह्याद्रि की पर्वतमालाओं से एक युवा योद्धा ने यह उद्घोष किया कि “हिंदवी स्वराज्य” केवल स्वप्न नहीं, बल्कि संकल्प है-और उस संकल्प को साकार कर दिखाया।

शिवाजी महाराज का जन्म 1630 में शिवनेरी दुर्ग पर हुआ। उनका नाम भगवान शिव पर नहीं, बल्कि देवी शिवई के नाम पर रखा गया-यह तथ्य ही बताता है कि उनके जीवन की प्रेरणा शक्ति और साहस की आराधना में निहित थी। उनकी माता जीजाबाई ने उन्हें रामायण, महाभारत और पुराणों की कथाओं के माध्यम से धर्म, नीति और राष्ट्रधर्म का संस्कार दिया। दादाजी कोंडदेव के मार्गदर्शन में उन्होंने शास्त्र और शस्त्र दोनों का संतुलित ज्ञान प्राप्त किया। यही संतुलन आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता बना-वे केवल तलवार के धनी नहीं, बल्कि नीति और दूरदर्शिता के भी अद्वितीय उदाहरण थे।
शिवाजी महाराज का सबसे बड़ा योगदान हिंदू साम्राज्य की स्थापना है, जिसे उन्होंने “हिंदवी स्वराज्य” कहा। यह किसी एक संप्रदाय का राज्य नहीं था, बल्कि भारतीय जनमानस की स्वतंत्रता और सम्मान का प्रतीक था। उन्होंने छोटे-छोटे किलों से शुरुआत कर एक संगठित मराठा शक्ति का निर्माण किया। तोरणा, रायगढ़, प्रतापगढ़ जैसे दुर्ग केवल पत्थरों की संरचनाएँ नहीं थे, बल्कि स्वराज्य के प्रहरी थे। गुरिल्ला युद्धकला में उनकी दक्षता अद्भुत थी। मुगल सेनापति उन्हें “पहाड़ी चूहा” कहकर उपहास करना चाहते थे, परंतु वही रणनीति मुगलों की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। वे भूगोल को अपनी शक्ति में बदलने की कला जानते थे-तेजी से आक्रमण, अचानक प्रहार और सुरक्षित वापसी उनकी युद्धनीति का आधार था।

उनकी वीरता का शिखर तब दिखाई देता है जब उन्होंने औरंगजेब की विशाल साम्राज्यवादी शक्ति को खुली चुनौती दी। आगरा में बंदी बनाए जाने के बाद उनका साहसिक पलायन केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि मुगल सत्ता के अहंकार पर करारा प्रहार था। इसके पश्चात उन्होंने 1674 में रायगढ़ में विधिवत राज्याभिषेक कर स्वयं को “छत्रपति” घोषित किया। यह घटना केवल राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक पुनस्र्थापन का भी प्रतीक थी-सदियों बाद किसी हिंदू राजा का वैदिक विधि से राज्याभिषेक हुआ था।

शिवाजी महाराज की शासन व्यवस्था भी उतनी ही प्रभावशाली थी जितनी उनकी युद्धनीति। उन्होंने अष्टप्रधान मंडल की स्थापना की, जिसमें विभिन्न विभागों के मंत्री नियुक्त थे। प्रशासन में पारदर्शिता, न्याय और जनकल्याण को प्राथमिकता दी गई। भूमि राजस्व व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया गया ताकि किसानों पर अत्याचार न हो। महिलाओं के सम्मान की रक्षा उनके शासन का मूल सिद्धांत था-युद्ध में पकड़ी गई महिलाओं को सम्मानपूर्वक उनके घर भेजने की परंपरा उन्होंने स्थापित की। धार्मिक सहिष्णुता उनके शासन की आधारशिला थी, उनकी सेना और प्रशासन में मुस्लिम अधिकारी भी महत्वपूर्ण पदों पर थे। उन्होंने किसी भी मस्जिद या पूजा स्थल को क्षति पहुँचाने की अनुमति नहीं दी। इस प्रकार उनका हिंदू स्वराज्य संकीर्ण नहीं, बल्कि उदार और समावेशी था।

शिवाजी महाराज भारत के उन शुरुआती शासकों में थे जिन्होंने समुद्री शक्ति के महत्व को समझा। उन्होंने एक सशक्त नौसेना का निर्माण किया और कोंकण तट की सुरक्षा सुनिश्चित की। विदेशी आक्रमणकारियों-विशेषतः पुर्तगालियों और सिद्धियोंकृके विरुद्ध यह रणनीति अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई। यह दूरदर्शिता दर्शाती है कि वे केवल तत्कालीन संघर्षों तक सीमित नहीं थे, बल्कि भविष्य की चुनौतियों को भी भांपने की क्षमता रखते थे।

भारतीय संस्कृति और अस्मिता के लिए उनका त्याग अतुलनीय है। उन्होंने विलासिता का जीवन त्यागकर कठिन संघर्ष का मार्ग चुना। निरंतर युद्ध, षड्यंत्र और चुनौतियों के बीच भी उन्होंने राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि रखा। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि स्वराज्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान का भी प्रश्न है। उन्होंने जनमानस में यह विश्वास जगाया कि विदेशी सत्ता अजेय नहीं है और संगठित प्रयास से स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकती है।
आधुनिक संदर्भ में यदि हम इस विरासत को देखें, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आज के भारत में शिवाजी के आदर्श कितने प्रासंगिक हैं। वर्तमान समय में जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका सुदृढ़ कर रहा है, तब राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सुशासन की अवधारणाएँ पुनः केंद्र में हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने आत्मनिर्भरता, सशक्त रक्षा नीति और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण पर विशेष बल दिया है। यहाँ तुलनात्मक विवेचना की जा सकती है, यद्यपि दोनों युगों की परिस्थितियाँ भिन्न हैं।

शिवाजी महाराज ने स्वदेशी सैन्य शक्ति पर भरोसा किया और स्थानीय संसाधनों के माध्यम से साम्राज्य खड़ा किया। आधुनिक भारत में आत्मनिर्भर भारत अभियान उसी भावना का आधुनिक रूप प्रतीत होता है, जहाँ रक्षा उत्पादन और आर्थिक सशक्तिकरण पर बल दिया जा रहा है। शिवाजी ने किलों और नौसेना के माध्यम से सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की, आज भारत आधुनिक तकनीक और रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहा है। शिवाजी का प्रशासन जनकल्याण और पारदर्शिता पर आधारित थाय समकालीन शासन में डिजिटल पारदर्शिता, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और भ्रष्टाचार-नियंत्रण की पहलें उसी आदर्श की झलक देती हैं।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दृष्टि से भी समानता देखी जा सकती है। शिवाजी महाराज ने हिंदू परंपराओं और प्रतीकों को पुनस्र्थापित कर जनमानस में आत्मगौरव जगाया। आज भी भारत में सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, तीर्थस्थलों के विकास और ऐतिहासिक विरासत के पुनरोद्धार पर बल दिया जा रहा है। अंतर केवल इतना है कि शिवाजी का संघर्ष प्रत्यक्ष सैन्य टकराव का था, जबकि आधुनिक भारत का संघर्ष वैश्विक प्रतिस्पर्धा और कूटनीतिक संतुलन का है।

फिर भी, तुलनात्मक विवेचना करते समय यह स्मरण रखना चाहिए कि शिवाजी महाराज का युग पूर्णतः भिन्न राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों में था। वे एक उभरते हुए स्वराज्य के संस्थापक थे, आज का भारत एक स्थापित लोकतांत्रिक गणराज्य है। अतः समानताओं को प्रेरणा के रूप में देखना चाहिए, न कि पूर्ण समानता के रूप में। शिवाजी की सबसे बड़ी सीख है-साहस, संगठन, दूरदर्शिता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना। यही मूल्य किसी भी युग में प्रासंगिक रहते हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि राष्ट्र निर्माण केवल तलवार से नहीं, बल्कि नीति, नैतिकता और जनविश्वास से होता है। उन्होंने दिखाया कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि नेतृत्व दृढ़ हो तो असंभव भी संभव हो सकता है।

आज आवश्यकता है कि हम उनके आदर्शों को केवल उत्सव तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने आचरण और राष्ट्रीय जीवन में उतारें। भारतीय अस्मिता का अर्थ किसी के प्रति द्वेष नहीं, बल्कि अपने स्वत्व का सम्मान है-और यही संदेश शिवाजी महाराज के जीवन से हमें मिलता है। उनकी 394वीं जयंती पर उन्हें नमन करते हुए हम संकल्प लें कि स्वराज्य की उस भावना को, जिसे उन्होंने सह्याद्रि की घाटियों से जगाया था, हम आधुनिक भारत की प्रगति और वैश्विक नेतृत्व में रूपांतरित करेंगे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
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डिजिटल युग में मातृभाषाओं को बचाना बड़ी चुनौती

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस- 21 फरवरी, 2026

21 फरवरी को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस केवल मातृभाषा संस्कृति को बचाने का अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि मानवता की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव है। वर्ष 2026 में इसकी मुख्य थीम “बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की आवाज़” है, जो यह संकेत देती है कि भविष्य की भाषाई दिशा युवा पीढ़ी तय करेगी। यह वर्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस दिवस की 25वीं वर्षगांठ-रजत जयंती का प्रतीक है। वर्ष 1999 में यूनेस्को द्वारा इसकी घोषणा की गई और 2000 से इसे वैश्विक स्तर पर मनाया जा रहा है।

इस वर्ष का फोकस 13 से 18 वर्ष के युवाओं को भाषाई विविधता के संरक्षण, मातृभाषा में शिक्षा के विस्तार और डिजिटल युग में भाषाओं की भूमिका पर सक्रिय संवाद के लिए प्रेरित करना है। मातृभाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती, वह मनुष्य के मन, मस्तिष्क और संवेदनाओं की प्रथम अभिव्यक्ति है। बच्चा जब जन्म लेता है तो वह किसी औपचारिक शिक्षा से पहले अपनी माँ की ध्वनियों, लोरियों और संवादों के माध्यम से भाषा का संस्कार ग्रहण करता है। यही भाषा उसकी सोच, उसकी रचनात्मकता और उसकी पहचान का आधार बनती है। शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने पर बच्चों की समझ, विश्लेषण क्षमता और आत्मविश्वास में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। फिर भी वैश्विक स्तर पर लगभग 40 प्रतिशत बच्चों को उस भाषा में शिक्षा नहीं मिलती जिसे वे बोलते या समझते हैं।

इस दिवस का ऐतिहासिक संदर्भ हमें 21 फरवरी 1952 की उस त्रासदी की याद दिलाता है जब पूर्वी पाकिस्तान में अपनी मातृभाषा बांग्ला के सम्मान के लिए छात्रों ने आंदोलन किया और गोलीबारी में अनेक युवा शहीद हो गए। बाद में यही पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र होकर बांग्लादेश बना। उन शहीदों की स्मृति में यह दिवस भाषाई अधिकारों और अस्मिता का प्रतीक बन गया। यह हमें सिखाता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता का आधार है। वर्ष 2026 की थीम युवाओं की भागीदारी को केंद्र में रखती है। आज का युवा डिजिटल संसार में जी रहा है। सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऑनलाइन शिक्षा उसके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मातृभाषाओं के लिए पर्याप्त स्थान है? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक ओर तो विलुप्तप्राय भाषाओं के शब्दकोश, ध्वनि-संग्रह और अनुवाद प्रणाली विकसित कर उन्हें पुनर्जीवित कर सकता है, वहीं दूसरी ओर यदि तकनीक कुछ सीमित भाषाओं तक सिमट जाए तो भाषाई असमानता और गहरी हो सकती है। इसलिए युवाओं को तकनीक का उपयोग मातृभाषा सशक्तिकरण के लिए करना होगा-ऐप, ब्लॉग, पॉडकास्ट, यूट्यूब चैनल और डिजिटल पुस्तकालयों के माध्यम से अपनी भाषाओं को वैश्विक मंच देना होगा।

यूनेस्को का मानना है कि स्थायी समाज के लिए सांस्कृतिक और भाषाई विविधता बहुत जरूरी है। शांति के लिए अपने जनादेश के तहत यह संस्कृतियों और भाषाओं में अंतर को बनाए रखने के लिए काम करता है जो दूसरों के लिए सहिष्णुता और सम्मान को बढ़ावा देते हैं। बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक समाज अपनी भाषाओं के माध्यम से अस्तित्व में रहते हैं जो पारंपरिक ज्ञान और संस्कृतियों को स्थायी तरीके से प्रसारित और संरक्षित करते हैं। भाषाई विविधता लगातार खतरे में पड़ती जा रही है क्योंकि अधिकाधिक भाषाएं लुप्त होती जा रही हैं। मातृभाषा जीवन का आधार है, यह एक ऐसी भाषा होती है जिसे सीखने के लिए उसे किसी कक्षा की जरूरत नहीं पड़ती। जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं, वही व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है। लेकिन मानव समाज में कई दफा हमें मानवाधिकारों के हनन के साथ-साथ मातृभाषा के उपयोग को गलत भी बताया जाता रहा है।

भारत जैसे बहुभाषी देश में यह चुनौती और अवसर दोनों है। पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार पिछले कुछ दशकों में सैकड़ों भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। यह केवल शब्दों का खो जाना नहीं, बल्कि परंपराओं, लोककथाओं, लोकगीतों और जीवनदृष्टि का विलुप्त होना है। यदि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से विमुख हो जाएगी तो सांस्कृतिक जड़ों से उसका संबंध कमजोर हो जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहन मिले, स्थानीय साहित्य और लोकसंस्कृति को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाए, और युवाओं को अपनी भाषा में अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान किए जाएँ। आज एक बड़ा भ्रम यह है कि केवल विदेशी भाषा ही विकास का मार्ग है। निस्संदेह वैश्विक संपर्क के लिए अन्य भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है,

परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी मातृभाषा की उपेक्षा करें। मातृभाषा में शिक्षा से ही मौलिक चिंतन और नवाचार संभव है। भारत की नई शिक्षा नीति 2020 ने भी प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने पर बल दिया है। यह निर्णय वैज्ञानिक दृष्टि से भी उचित है, क्योंकि जब विद्यार्थी अपनी सहज भाषा में सीखता है तो वह केवल जानकारी ग्रहण नहीं करता, बल्कि उसे आत्मसात करता है।
हमारे देश में मातृभाषाओं के प्रति अनेक प्रकार के भ्रम फैले हैं, जिनमें एक भ्रम है कि अंग्रेजी विकास और ज्ञान की भाषा है। जबकि इस बात से यूनेस्को सहित अनेक संस्थानों के अनुसंधान यह सिद्ध कर चुके हैं कि अपनी भाषा में शिक्षा से ही बच्चे का सही एवं सर्वांगीण मायने में विकास हो पाता है। इस दृष्टि से मातृभाषा में शिक्षा पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है।

युवाओं में मातृभाषा के प्रति आकर्षण कैसे बढ़ाया जाए? पहला उपाय है-भाषा को बोझ नहीं, गौरव के रूप में प्रस्तुत करना। जब हम अपने साहित्यकारों, वैज्ञानिकों और महापुरुषों की उपलब्धियों को मातृभाषा से जोड़कर बताते हैं, तो युवाओं में स्वाभिमान जागृत होता है। दूसरा उपाय है-रचनात्मक मंच उपलब्ध कराना। कविता-पाठ, नाटक, वाद-विवाद, ब्लॉग लेखन और डिजिटल कंटेंट निर्माण के माध्यम से युवा अपनी भाषा में सृजन करें। तीसरा उपाय है-परिवार की भूमिका। घर में यदि संवाद मातृभाषा में होगा तो बच्चे में स्वाभाविक अनुराग उत्पन्न होगा। भाषाई विविधता के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। भारत में सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ हैं; प्रत्येक भाषा अपने साथ एक विशिष्ट जीवनदर्शन लेकर आती है। हमें यह समझाना होगा कि किसी भी भाषा को छोटा या बड़ा कहना अनुचित है। सभी भाषाएँ समान रूप से सम्माननीय हैं। हिन्दी राजभाषा है, परंतु अन्य भारतीय भाषाएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। संस्कृत हमारी प्राचीन ज्ञान-परंपरा की धरोहर है, तो तमिल, बांग्ला, मराठी, गुजराती, उड़िया, असमिया, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी, कश्मीरी और अन्य भाषाएँ अपनी-अपनी सांस्कृतिक संपदा से राष्ट्र को समृद्ध करती हैं।

डिजिटल युग में युवाओं को यह संकल्प लेना चाहिए कि वे अपनी मातृभाषा में कम से कम एक रचनात्मक कार्य अवश्य करेंगे-चाहे वह एक ब्लॉग हो, एक कहानी, एक गीत या एक शैक्षिक वीडियो। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद उपकरणों और भाषा मॉडल्स का उपयोग करके वे अपनी भाषा की सामग्री को वैश्विक पाठकों तक पहुँचा सकते हैं। इससे न केवल भाषा का संरक्षण होगा, बल्कि आर्थिक अवसर भी बढ़ेंगे। स्थानीय भाषाओं में स्टार्टअप, ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल प्रकाशन नए रोजगार के द्वार खोल सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2026 हमें यह संदेश देता है कि भाषाई विविधता ही मानवता की वास्तविक समृद्धि है। यदि हम सतत विकास का लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं तो समावेशी शिक्षा आवश्यक है, और समावेशी शिक्षा का आधार मातृभाषा है। युवाओं की आवाज़ जब बहुभाषी शिक्षा के समर्थन में उठेगी, तभी समाज में व्यापक परिवर्तन संभव होगा। आज आवश्यकता है एक सामूहिक संकल्प की-हम अपनी मातृभाषा का सम्मान करेंगे, उसे डिजिटल मंचों पर प्रतिष्ठित करेंगे और आने वाली पीढ़ियों तक उसकी विरासत पहुँचाएँगे। भाषा हमारी आत्मा है; उसे जीवित रखना हमारा दायित्व है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर यही संदेश गूंजना चाहिए कि युवा ही भाषाई भविष्य के प्रहरी हैं। जब युवा अपनी जड़ों से जुड़ेंगे, तभी विश्व अधिक समावेशी, सहिष्णु और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनेगा।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133