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हिंदी के विदेशों में प्रसार में हिंदी फ़िल्मों के योगदान की अनसुनी गाथा

आज हमारे मित्र राकेश माथुर के चार्टर हाउस वाले घर में अजीत राय से मुलाक़ात हुई. वे हिंदी की महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं के सम्पादक, रिपोर्टर – पत्रकार रह चुके हैं और अपने नए अवतार में अंतर-राष्ट्रीय सिनेमा के जाने माने विशेषज्ञ और समीक्षक बन चुके हैं . फ़िल्मों को ले कर उनकी पुस्तक “बालीवुड की बुनियाद” शीघ्र ही बाज़ार में आ रही है . इसमें बालीवुड को अंतरराष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने में हिंदुजा बंधुओं के योगदान की अनसुनी कहानी कही गई है.

अजीत जनसत्ता जैसे समाचार पत्र में राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते रहे, उनकी खोजी पत्रकारिता ने राजनीतिक परिदृश्य पर काफ़ी हलचल पैदा की थी , कई रिपोर्ट पर संसद में खूब चर्चे भी हुए. फिर अचानक एक दिन अजीत ने यह सोच कर कि युवाओं को भारत में पढ़ाई की अंधी प्रतियोगिता और नौकरी की मारा मारी के कारण एक-रेखिए विकास हो पाता है , देसी भाषा में अन्य विधाओं से सम्बन्धित जानकारी ही नहीं मिल पाती , बस तय कर लिया कि आगे से सब कुछ छोड़ कर नौजवानों के लिए हिंदी में सिनेमा , कला और संस्कृति पर ही अपना ध्यान फ़ोकस कर के लिखेंगे .

वे बताते हैं ,“यह वाक़या 2007 का है . तब से पूरा ध्यान विश्व सिनेमा पर लगा दिया .”
“फ़्रांस के कांस , स्विट्ज़रलैंड के लुकारनो से ले कर तमाम देशों के फ़िल्म महोत्सवों में नियमित रूप से भाग ले रहा हूँ . मैं हिंदी में लिखने वाला संभवतः अकेला फ़िल्म पत्रकार हूँ जो हर वर्ष नियमित रूप से विश्व भर के सभी महत्वपूर्ण फ़िल्म महोत्सव में प्रदर्शित महत्वपूर्ण फ़िल्मों और फ़िल्मों के पीछे के लोगों के बारे में लिखता हूँ . “

“कुछ अपनी नई पुस्तक के बारे में बताइए “.
“मेरी यह पुस्तक हिंदी फ़िल्मों के कुछ कम ज्ञात तथ्यों को उद्घाटित करने जा रही है .”
“यह बात बहुत कम लोगों को पता होगी कि अबसे पचास वर्ष पूर्व ईरान में फ़ारसी में डब की हुई “संगम” फ़िल्म के प्रदर्शन ने लगातार हाउस फुल के झंडे गाड़ दिए थे , यह फ़िल्म वहाँ लगातार तीन साल तक चली थी . यह सब हिंदुजा बंधुओं के प्रयासों के कारण सम्भव हुआ था .संगम फ़िल्म के तेहरान में प्रदर्शन के सिलसिले में फ़िल्म के कलाकार आमंत्रित किए गए थे . मुख्य कलाकारों को प्रशंसकों ने इस बुरी तरह से घेर लिया था कि उन्हें भीड़ से बचाने के लिए जेल वैन का इस्तेमाल करना पड़ा था . यही नहीं हिंदुजा बंधुओं के प्रयासों के कारण ही महबूब खान की “मदर इंडिया” , रमेश सिप्पी की “शोले “ भी लगातार एक साल तक ईरान में चली थी . सन 55 से लेकर 85 तक हिंदुजा बंधुओं ने 1200 से भी अधिक हिंदी फ़िल्में केवल पश्चिमी एशियाई देशों में ही नहीं पूरी दुनिया भर में प्रदर्शित कीं.”

अजित राय बताते हैं कि एक ज़माना वो भी था कि लंदन में हिंदी फ़िल्मों का सिनेमा घरों में प्रदर्शन नहीं हुआ करता था . हिंदुजा बंधुओं ने संगम की रिलीज़ के वक्त जब कोशिश की कोई सिनेमा हाल का प्रबंधन तैय्यार नहीं था . बड़ी मुश्किल से एक सिनेमा हाल का मालिक राज़ी हुआ , मगर उसकी शर्त बड़ी अजीब थी , जब तक के लिए भी हाल बुक करना है प्रदर्शक को सारे के सारे टिकट के आधे दाम की अग्रिम क़ीमत चुकानी होगी , हिंदुजा ने इस चुनौती को स्वीकार किया . और बाद में एक इतिहास रच गया यह फ़िल्म कई हफ़्ते हाउस फ़ुल चली . उसी के बाद लंदन के सिनेमा मालिकों को भरोसा हुआ कि हिंदी फ़िल्मों में दम खम है और यहाँ चल सकती हैं . फिर तो एक के बाद एक हिंदी फ़िल्में यहाँ रिलीज़ होती गयीं . अगर देखा जाए तो मनोरंजन के ज़रिए देश के बाहर हिंदी के प्रचार प्रसार की यह कहानी अभी तक लोगों को पता ही नहीं है.

अजीत भाई ने अपनी पुस्तक के लिए शोध के लिए काफ़ी समय पिछले साल मुंबई में लगाया और ऐसे रोचक क़िस्से खोज कर निकाले हैं . पुस्तक का अनुवाद अंग्रेज़ी और आठ अन्य भाषाओं में चल रहा है और जल्दी ही ये संस्करण भी प्रकाशित होंगे. इस सब से उत्साहित हो कर अजीत भाई कई और पुस्तकों के लिखने की योजना बना रहे हैं क्योंकि उनके पास विश्व भर के जाने माने फ़िल्मकारों से जुड़े अनुभवों का ख़ज़ाना भी है .

अजीत भाई दुनिया भर में एक फ़िल्म महोत्सव से दूसरे , तीसरे , चौथे और भी न जाने कितने उत्सवों को कवर करने के लिए घूमते रहते हैं , वे हिंदी भाषी एक मात्र फ़िल्म पत्रकार हैं जिन्हें इतने सारे फ़िल्म उत्सवों से बुलावा मिलता है .

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