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धनतेरस और दिवाली की पूजा, मुहुर्त एवँ महत्व

इस बार 27 अक्टूबर को देश भर में दिवाली मनाई जाएगी। दिवाली पर लक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व होता है। कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावस्या को धन प्रदात्री ‘महालक्ष्मी’ एवं धन के अधिपति ‘कुबेर’ का पूजन किया जाता है। हमारे पौराणिक आख्यानों में इस पर्व को लेकर कई तरह की कथाएँ हैं। भारतीय परंपरा में हर पर्व और त्यौहार का संबंध प्रकृति की पूजा, हमारे सुखद जीवन, आयु, स्वास्थ्य, धन, ज्ञान, वैभव व समृद्धि की उत्तरोत्तर प्राप्ति से है। साथ ही मानव जीवन के दो प्रभाग धर्म और मोक्ष की भी प्राप्ति हेतु विभिन्न देवताओं के पूजन का उल्लेख है। आयु के बिना धन, यश, वैभव का कोई उपयोग ही नहीं है। अतः सर्वप्रथम आयु वृद्धि एवं आरोग्य प्राप्ति की कामना की जाती है। इसके पश्चात तेज, बल और पुष्टि की कामना की जाती है। तत्पश्चात धन, ज्ञान व वैभव प्राप्ति की कामना की जाती है। विशेषकर आयु व आरोग्य की वृद्धि के साथ ही अन्य प्रभागों की प्राप्ति हेतु क्रमिक रूप से यह पर्व धन-त्रयोदशी (धन-तेरस), रूप चतुर्दशी (नरक-चौदस), कार्तिक अमावस्या (दीपावली- महालक्ष्मी, कुबेर पूजन), अन्नकूट (गो-पूजन), भाईदूज (यम द्वितीया) के रूप में पाँच दिन तक मनाया जाता है। धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, नया साल और भैयादूज या भाईदूज ये पाँच उत्सव पाँच विभिन्न सांस्कृतिक विचारधाराओं प्रतिनिधित्व करते हैं।

लक्ष्मी जी का स्थायी निवास अपने यहाँ बनाये रखने के लिये दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के लिये दिन के सबसे शुभ मुहूर्त समय को लिया जाता है।

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त इस प्रकार से रहेगा:

दीपावली / लक्ष्‍मी पूजन की तिथि: 27 अक्‍टूबर 2019
अमावस्‍या तिथि प्रारंभ: 27 अक्‍टूबर 2019 को दोपहर 12 बजकर 23 मिनट से
अमावस्‍या तिथि समाप्‍त: 28 अक्‍टूबर 2019 को सुबह 09 बजकर 08 मिनट तक
लक्ष्‍मी पूजा मुहुर्त: 18:42 से 20:11

प्रदोष काल- 17:36 से 20:11

वृषभ काल- 18:42 से 20:37

पूजन के लिए आवश्यक सामग्री : 

धूप बत्ती (अगरबत्ती), चंदन , कपूर, केसर , यज्ञोपवीत 5 , कुंकु , चावल, अबीर, गुलाल, अभ्रक, हल्दी , सौभाग्य द्रव्य-मेहंदी, चूड़ी, काजल, पायजेब, बिछुड़ी आदि आभूषण। नाड़ा (लच्छा), रुई, रोली, सिंदूर, सुपारी, पान के पत्त , पुष्पमाला, कमलगट्टे, निया खड़ा (बगैर पिसा हुआ) , सप्तमृत्तिका, सप्तधान्य, कुशा व दूर्वा (कुश की घांस) , पंच मेवा , गंगाजल , शहद (मधु), शकर , घृत (शुद्ध घी) , दही, दूध, ऋतुफल, (गन्ना, सीताफल, सिंघाड़े और मौसम के फल जो भी उपलब्ध हो), नैवेद्य या मिष्ठान्न (घर की बनी मिठाई), इलायची (छोटी) , लौंग, मौली, इत्र की शीशी , तुलसी पत्र, सिंहासन (चौकी, आसन) , पंच-पल्लव (बड़, गूलर, पीपल, आम और पाकर के पत्ते), औषधि (जटामॉसी, शिलाजीत आदि) , लक्ष्मीजी का पाना (अथवा मूर्ति), गणेशजी की मूर्ति , सरस्वती का चित्र, चाँदी का सिक्का , लक्ष्मीजी को अर्पित करने हेतु वस्त्र, गणेशजी को अर्पित करने हेतु वस्त्र, अम्बिका को अर्पित करने हेतु वस्त्र, सफेद कपड़ा (कम से कम आधा मीटर), लाल कपड़ा (आधा मीटर), पंच रत्न (सामर्थ्य अनुसार), दीपक, बड़े दीपक के लिए तेल, ताम्बूल (लौंग लगा पान का बीड़ा) , धान्य (चावल, गेहूँ) , लेखनी (कलम, पेन), बही-खाता, स्याही की दवात, तुला (तराजू) , पुष्प (लाल गुलाब एवं कमल) , एक नई थैली में हल्दी की गाँठ, खड़ा धनिया व दूर्वा, खील-बताशे, तांबे या मिट्टी का कलश और श्रीफल।

 

वास्तु सम्मत लक्ष्मी पूजन कैसे करें?

कमलासना की पूजा से वैभव:

गृहस्थ को हमेशा कमलासन पर विराजित लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। देवीभागवत में कहा गया है कि कमलासना लक्ष्मी की आराधना से इंद्र ने देवाधिराज होने का गौरव प्राप्त किया था। इंद्र ने लक्ष्मी की आराधना ‘ú कमलवासिन्यै नम:’ मंत्र से की थी। यह मंत्र आज भी अचूक है।

दीपावली को अपने घर के ईशानकोण में कमलासन पर मिट्टी या चांदी की लक्ष्मी की प्रतिमा को विराजित कर, श्रीयंत्र के साथ यदि उक्त मंत्र से पूजन किया जाए और निरंतर जाप किया जाए तो चंचला लक्ष्मी स्थिर होती है। बचत आरंभ होती है और पदोन्नति मिलती है। साधक को अपने सिर पर बिल्व पत्र रखकर पंद्रह श्लोकों वाले श्रीसूक्त का जाप भी करना चाहिए।

लक्ष्मी पूजन

लक्ष्मी का लघु पूजन (सही उच्चारण हो सके, इस हेतु संधि-विच्छेद किया है।) महालक्ष्मी पूजनकर्ता स्नान करके कोरे अथवा धुले हुए शुद्ध वस्त्र पहनें, माथे पर तिलक लगाएँ और शुभ मुहूर्त में पूजन शुरू करें। इस हेतु शुभ आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके पूजन करें। अपनी जानकारी हेतु पूजन शुरू करने के पूर्व प्रस्तुत पद्धति एक बार जरूर पढ़ लें।

पूजा सामग्री का शुध्दिकरण :
बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की अनामिका से निम्न मंत्र बोलते हुए अपने ऊपर एवं पूजन सामग्री पर जल छिड़कें-

ॐ अ-पवित्र-ह पवित्रो वा सर्व-अवस्थाम्‌ गतोअपि वा ।
य-ह स्मरेत्‌ पुण्डरी-काक्षम्‌ स बाह्य-अभ्यंतरह शुचि-हि ॥
पुन-ह पुण्डरी-काक्षम्‌ पुन-ह पुण्डरी-काक्षम्‌, पुन-ह पुण्डरी-काक्षम्‌ ।

आसन का शु्ध्दिकरण :
निम्न मंत्र से अपने आसन पर उपरोक्त तरह से जल छिड़कें-
ॐ पृथ्वी त्वया घता लोका देवि त्वम्‌ विष्णु-ना घृता ।
त्वम्‌ च धारय माम्‌ देवि पवित्रम्‌ कुरु च-आसनम्‌ ॥

आचमन कैसे करें:
दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें-

ॐ केशवाय नम-ह स्वाहा,
ॐ नारायणाय नम-ह स्वाहा,
ॐ माधवाय नम-ह स्वाहा ।

अंत में इस मंत्र का उच्चारण कर हाथ धो लें-
ॐ गोविन्दाय नम-ह हस्तम्‌ प्रक्षाल-यामि ।

दीपक :
दीपक प्रज्वलित करें (एवं हाथ धोकर) दीपक पर पुष्प एवं कुंकु से पूजन करें-
दीप देवि महादेवि शुभम्‌ भवतु मे सदा ।
यावत्‌-पूजा-समाप्ति-हि स्याता-वत्‌ प्रज्वल सु-स्थिरा-हा ॥
(पूजन कर प्रणाम करें)

स्वस्ति-वाचन :
निम्न मंगल मंत्र बोलें-
ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्ध-श्रवा-हा स्वस्ति न-ह पूषा विश्व-वेदा-हा ।
स्वस्ति न-ह ताक्षर्‌यो अरिष्ट-नेमि-हि स्वस्ति नो बृहस्पति-हि-दधातु ॥

द्-यौ-हौ शांति-हि अन्‌-तरिक्ष-गुम्‌ शान्‌-ति-हि पृथिवी शान्‌-ति-हि-आप-ह ।
शान्‌-ति-हि ओष-धय-ह शान्‌-ति-हि वनस्‌-पतय-ह शान्‌-ति-हि-विश्वे-देवा-हा

शान्‌-ति-हि ब्रह्म शान्‌-ति-हि सर्व(गुम्‌) शान्‌-ति-हि शान्‌-ति-हि एव शान्‌-ति-हि सा
मा शान्‌-ति-हि। यतो यत-ह समिहसे ततो नो अभयम्‌ कुरु ।
शम्‌-न्न-ह कुरु प्रजाभ्यो अभयम्‌ न-ह पशुभ्य-ह। सु-शान्‌-ति-हि-भवतु॥
ॐ सिद्धि बुद्धि सहिताय श्री मन्‌-महा-गण-अधिपतये नम-ह ॥

(नोट : पूजन शुरू करने के पूर्व पूजन की समस्त सामग्री व्यवस्थित रूप से पूजा-स्थल पर रख लें। श्री महालक्ष्मी की मूर्ति एवं श्री गणेशजी की मूर्ति एक लकड़ी के पाटे पर कोरा लाल वस्त्र बिछाकर उस पर स्थापित करें। गणेश एवं अंबिका की मूर्ति के अभाव में दो सुपारियों को धोकर, पृथक-पृथक नाड़ा बाँधकर कुंकु लगाकर गणेशजी के भाव से पाटे पर रखें व उसके दाहिनी ओर अंबिका के भाव से दूसरी सुपारी स्थापना हेतु रखें।)

संकल्प :
अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, अक्षत, द्रव्य आदि लेकर श्री महालक्ष्मीजी अन्य ज्ञात-अज्ञात देवीदेवताओं के पूजन का संकल्प करें-

हरिॐ तत्सत्‌ अद्यैत अस्य शुभ दीपावली बेलायाम्‌ मम महालक्ष्मी-प्रीत्यर्थम्‌ यथासंभव द्रव्यै-है यथाशक्ति उपचार द्वारा मम्‌ अस्मिन प्रचलित व्यापरे उत्तरोत्तर लाभार्थम्‌ च दीपावली महोत्सवे गणेश, महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली, लेखनी कुबेरादि देवानाम्‌ पूजनम्‌ च करिष्ये।
( अब जल छोड़ दें।)

श्रीगणेश-अंबिका पूजन
हाथ में अक्षत व पुष्प लेकर श्रीगणेश एवं श्रीअंबिका का ध्यान करें।

धनतेरस

दिवाली पर्व की शुरुआत 25 अक्टूबर धनतेरस यानी ‘धनत्रयोदशी’ से हो जाएगी। माना जाता है कि इस दिन समुद्र मंथन के दौरान, अमृत का कलश लेकर धनवंतरी प्रकट हुए थे. तभी से इस दिन को धनतेरस के रूप में मनाया जाने लगा. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, धनवंतरी के प्रकट होने के ठीक दो दिन बाद मां लक्ष्मी प्रकट हुईं थीं. यही कारण है कि हर बार दिवाली से दो दिन पहले ही धनतेरस मनाया जाता है. इस दिन स्वास्थ्य रक्षा के लिए धनवंतरी देव की उपासना की जाती है. इस दिन को कुबेर का दिन भी माना जाता है और धन संपन्नता के लिए कुबेर की पूजा की जाती है.

इस बार धनतेरस के दिन शुक्र प्रदोष और धन त्रयोदशी का महासंयोग बन रहा है। इस दिन बह्म व सिद्धि योग रहेगा। ज्योतिषाचाार्यों के अनुसार, इस दिन जो भी शुभ कार्य या खरीददारी की जाएगी वह समृद्धिकारक होगी। घरों में पूजन का उत्तम मुहूर्त वृष लग्न में शाम 6 बजकर 12 मिनट से 8 बजकर 28 मिनट रहेगा।

धनतेरस पर पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 07 बजकर 8 मिनट से रात्रि 8 बजकर 14 मिनट तक चलेगा.
– जातक के पास धनतेरस की पूजा शुभ समय में करने के लिए 1 घंटा 06 मिनट का ही समय होगा.
– प्रदोष काल में की गई पूजा भी शुभ फल देने वाली मानी जाती है. धनतेरस पर प्रदोष काल शाम 5 बजकर – 39 मिनट से 8 बजकर 14 मिनट तक रहेगा।

वृष लग्न- शाम 07:00 से 08:56 बजे तक रहेगा।
गुली मुहूर्त- सुबह 07:09 से 08:44 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 11:11 से 11 :56 बजे तक
स्थिर लग्न – प्रात: 07:07 से 09:15 बजे तक

धन्वंतरि देव का पौराणिक मंत्र
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:
अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
श्री धन्वंतरि स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥

राशि के अनुसार धन तेरस पर सामान खरीदी का मुहुर्त
मेष – चांदी या तांबा के बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक सामान
वृष – चांदी या तांबे के बर्तन
मिथुन – स्वर्ण आभूषण, स्टील के बर्तन, हरे रंग के घरेलू सामान, पर्दा
कर्क – चांदी के आभूषण, बर्तन
सिंह – तांबे के बर्तन, वस्त्र, सोना
कन्या -गणेश की मूर्ति, सोना या चांदी के आभूषण, कलश
तुला- वस्त्र, सौंदर्य या सजावट सामग्री, चांदी या स्टील के बर्तन
वृश्चिक – इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सोने के आभूषण, बर्तन
धनु – स्वर्ण आभूषण, तांबे के बर्तन
मकर – वस्त्र, वाहन, चांदी के बर्तन
कुम्भ – सौंन्दर्य के सामान, स्वर्ण, ताम्र पात्र, जूता-चप्पल
मीन – स्वर्ण आभूषण, बर्तन

गोवर्द्धन पूजा तिथि और शुभ मुहूर्त
गोवर्द्धन पूजा / अन्‍नकूट की तिथि: 28 अक्‍टूबर 2019
प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: 28 अक्‍टूबर 2019 को सुबह 09 बजकर 08 मिनट से
प्रतिपदा तिथि समाप्‍त: 29 अक्‍टूबर 2019 को सुबह 06 बजकर 13 मिनट तक
गोवर्द्धन पूजा सांयकाल मुहूर्त: 28 अक्‍टूबर 2019 को दोपहर 03 बजकर 23 मिनट से शाम 05 बजकर 36 मिनट तक
कुल अवधि: 02 घंटे 12 मिनट

भैयादूज का शुभ मुहूर्त
भैयादूज / यम द्वितीया की तिथि: 29 अक्‍टूबर 2019
द्वितीया तिथि प्रारंभ: 29 अक्‍टूबर 2019 को सुबह 06 बजकर 13 मिनट से
द्व‍ितीया तिथि समाप्‍त: 30 अक्‍टूबर 2019 को सुबह 03 बजकर 48 मिनट तक
भाई दूज अपराह्न समय: दोपहर 01 बजकर 11 मिनट से दोपहर 03 बजकर 23 मिनट तक
कुल अवधि: 02 घंटे 12 मिनट

भाई-दूजः बहन के निश्छल प्यार का प्रतीक
खगोलीय दृष्टि से दिवाली का महत्व
मुस्लिम शायरों ने भी खूब कलम चलाई है दिवाली पर
दिवाली और महावीर के महानिर्वाण का संयोग
राम की शक्ति पूजा

लक्ष्मीजी की आरती
ओम जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

दुर्गा रुप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ओम जय लक्ष्मी माता॥

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