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अंग्रेजी लेखकों ने भारत को शूद्रविरोधी बता दिया और हमने मान लिया

कोई भी वर्ण छोटा या बड़ा नहीं है तथा यह पूर्णतः कर्म आधारित व्यवस्था थी | इसमें किसी के भी बच्चे कर्मो के अनुसार दूसरे वर्णों में जा सकते थे |

प्रस्तावना :

आज भारत में विदेशी पैसे से कई आन्दोलन ऐसे चल रहे हैं जिनका काम सिर्फ दलित और उच्च वर्ग के लोगों के बीच वैमनस्य की भावना को बढ़ाना है |

[i] पता नहीं क्यों मगर यह सभी आन्दोलन यह मान कर बैठे हैं के अंग्रेजों द्वारा बनाये गए एस.सी. / एस.टी. ही दलित हैं तथा दलित ही शूद्र हैं | इन सभी आन्दोलनों में गरीब भोले भाले हिन्दुओं को यह बताया जाता है के तुम शुद्र हो तथा तुम इसलिए गरीब हो क्योंकि भारत के उच्च जाती के लोगों ने तुम पर अत्याचार किये तथा तुम्हारा पैसा लूटा है | इसके बाद बड़ी खूबसूरती से यह एनजीओ इन सभी का इल्जाम हिन्दू धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर लगा देते हैं तथा गरीबो से कहते हैं के हिन्दू धर्म छोड़ दो तभी तुम्हारा विकास संभव है | इस तरह हिन्दू धर्म के नाम से यह लोग पूरी भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता और मान्यताओं पर भी चालाकी से कुथाराघात कर देते हैं तथा भोले भाले गरीब लोगों को अपने ही देश के बाकी लोगों के खिलाफ खड़ा कर देते हैं | इसीका फायदा दूसरे विदेशी मजहब भी उठाते है तथा इन गरीबो का मत परिवर्तन कर देते हैं | यही खेल अंग्रेजों के समय से भारत में चल रहा था , मगर अब इसके कारण भारत में लड़ाई झगडे तथा नफरत बढती जा रही है | इसीलिए मैंने इस लेख में इन प्रश्नों का जवाब ढूंढने का प्रयास किया है :

क्या भारत सच में शूद्र विरोधी था ?
क्या एस.सी. / एस.टी. ही दलित और शुद्र हैं ?
क्या शूद्र जन्म से होते हैं ?
क्या हिन्दू धर्म या पौराणिक भारतीय पुस्तकों में दलित विरोधी शिक्षा दी गयी थी ?

प्राचीन इतिहास :

अधिकतर लोग अंग्रेजों की पढाई हुई या लिखी हुई पुस्तकों को पढ़कर यह निष्कर्ष निकालते हैं के भारत शुद्र विरोधी था और उन्ही पुस्तकों को पढ़कर लिखी गयी वामपंथियों या अंग्रेजी क्लास के लोगों की पुस्तके अधिकतर लोग प्रयोग में लाते हैं हिन्दू विरोधी दुष्प्रचार करने के लिए | पर मैंने प्रयास किया के मै मूल ग्रंथो से सामग्री उठाऊंगा तथा जो भारतीय मानस में जिए हैं उन लोगो के साहित्य से तथ्य उठाऊंगा ना की विदेशियों के द्वारा लिखे गए कपोलकल्पित साहित्य को उपयोग करूँगा |

वैदिक काल :

यदि प्राचीन काल से साहित्य उठाया जाए तो ब्रह्मा से या मनु से सभी लोग पैदा हुए | इन दोनों ही बातो में सभी लोग एक ही व्यक्ति से निकले हैं तो कौन छोटा और कौन बड़ा की कल्पना नहीं की जा सकती | अब बात करते हैं ऋग वेद [ii]पुरुषसुख्त दसवे मंडल की जिसमे दुनिया या समाज को एक जमीन पर लेटे हुए व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है | इसमें बताया गया है के हर समाज को चलाने के लिए चार प्रकार के कर्मो की आवश्यकता है तथा इसमें यह कहा गया है के दुनिया तथा एक व्यक्ति को भी जीवन चलाने यही चार कर्म आवश्यक हैं |

शुद्रो को वेदों में वह स्थान दिया गया है के उनके ऊपर सारा समाज निर्भर करता है |

‘अब पहला कर्म बताया गया है “ब्राह्मण” मतलब वो जो समाज के लिए सोचेंगे , शिक्षक बनेगे, वैज्ञानिक बनेगे या समाज किस तरह कार्य करेगा उसकी समस्याएं कैसे हल होंगी यह सोचने वाला हर व्यक्ति ब्राह्मण है | चूँकि सोचते दिमाग से हैं इसलिए इसको ‘लेटे हुए व्यक्ति’ के सर के रूप में दर्शाया गया है |’

‘दूसरा कर्म बताया गया है क्षत्रिय जिसका अर्थ है सेना, प्रशासनिक सेवा, रक्षण करना आदि जिस तरह व्यक्ति अपने हाथो से अपनी रक्षा करता है तथा उसकी छाती से उसका बल पता चलता है | उसी प्रकार इस तरह के कर्म को ‘लेटे हुए व्यक्ति’ की छाती के रूप में दर्शाया गया है |’

‘तीसरा कर्म है वैश्य अर्थात हर समाज को धन उपार्जन तथा व्यापार , लेन – देन इत्यादि की आवश्यकता पढ़ती है | इसी कर्म को व्यक्ति के पेट से दर्शाया गया है क्योंकि हम पेट से अन्न ग्रहण करते हैं उसीके अन्दर सारे शरीर में उर्जा प्रवाह की क्षमता होती है | वैसे ही वैश्य पैसे तथा मुद्रा आदि से पूरी इकोनोमी को नियंत्रण करते हैं |’

‘अंत में चौथा कर्म बताया गया है शुद्र | समाज में कई युवा या व्यक्ति ऐसे होते हैं जो बहुत विद्वान नहीं होते या लड़ाई करना भी उनके स्वाभाव में नहीं होता तथा व्यापार चलाने की शातिरता भी उनके भीतर नहीं होती | यह लोग भोले होते हैं किन्तु यह कलाकार होते हैं इनमे कुम्हार, लोहार, बढ़ई , सुतार आदि आते हैं जिनमे कला के क्षेत्र का अद्भुत ज्ञान होता है | यही नहीं यह लोग ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य, आदि के औजार बनाते हैं तथा इनके हर काम में सहयोग करते हैं | वह शुद्र वर्ण में आते हैं | इन्हें ‘लेटे हुए व्यक्ति’ के पैरों के रूप में दर्शाया गया है क्योंकि यदि व्यक्ति के पैर ना हों तो हाथ, छाती और सर सब जमीन पर गिर पड़ते हैं तथा भीख मांगने पर मजबूर हो जाते हैं | अतः शुद्रो को वेदों में वह स्थान दिया गया है के उनके ऊपर सारा समाज निर्भर करता है |’

इन्ही चार कर्मो को वर्ण कहा गया है | इसमें कोई भी छोटा या बड़ा नहीं है तथा यह पुर्णतः कर्म आधारित व्यवस्था थी | इसमें किसी के भी बच्चे कर्मो के अनुसार दूसरे वर्णों में जा सकते थे |

महाभारत में वेदव्यास ने द्रोणाचार्य की गलती ही बतायी है तथा इसे उपयुक्त नहीं माना है , जो की यह दर्शाता है के भारत के आदर्श सही का साथ देने वाले थे |

रामायण काल :

अब आते हैं रामायण पर , रामायण का मूल ग्रन्थ लिखने वाले वाल्मीकि हैं जो की स्वयं शुद्र वर्ण से थे | तथा रामायण में श्री राम ने शबरी के हाथो से बेर खाए तथा केवट की नाव में सफ़र किया दोनों ही शुद्र वर्ण के थे अतः एक क्षत्रिय और शुद्र में भेद कहीं नहीं दिखा | यही नहीं आज जिन्हें आदिवासी कहा जाता है उन्ही की पूरी सेना जिसमे जामवंत, सुग्रीव आदि सभी लोग थे , के साथ श्री राम ने पूरी लड़ाई लड़ी तथा उनके ऊपर कब्ज़ा करने की जगह सुग्रीव को राजा बनाकर आये | यह हिन्दू धर्म की परंपरा रही है | यही नहीं एक ब्राह्मण वर्ण के रावण ने जब गलती की तो उसे अपनी जान गंवानी पड़ी | राम ने न्याय करते हुए वर्ण या जाती नहीं देखी |[iii]

महाभारत काल :[iv]

इसी तरह महाभारत को जिन्होंने लिखा है वह हैं वेदव्यास| वह भी शुद्र थे | इसमें कुछ लोग एकलव्य को शुद्र बताने का प्रयास करते हैं | जबकि एकलव्य भी भील राजा का बेटा था तथा बाद में सेना में लड़ा भी था | सवाल है इसको द्रोणाचार्य के ना सिखाने का तो उसके पीछे द्रोणाचार्य की शपथ थी के वो अर्जुन को सर्वश्रेठ धनुर्धर बनायेंगे | इसके बाद भी महाभारत में वेदव्यास ने द्रोणाचार्य की गलती ही बतायी है तथा इसे उपयुक्त नहीं माना है , जो की यह दर्शाता है के भारत के आदर्श सही का साथ देने वाले थे | ऐसे ही कुछ लोग कर्ण को शुद्र बताने का प्रयास करते हैं जबकि वो पांडवो का ही भाई था | अब यदि मान भी लें वो शुद्र जाती के पिता के साथ था तो यदि एक क्षत्रिय अर्जुन ने उसे दुत्कारा तो दुसरे क्षत्रिय दुर्योधन ने उसे अंग प्रदेश का राजा बना दिया | इससे यह सिद्ध होता है के यह अर्जुन और कर्ण की निजी लड़ाई थी ना की कोई जातिगत दुर्व्यवहार |

अब आते हैं संतो पर तो कबीर, रविदास, रैदास , वाल्मीकि आदि कई संत भारत में हुए हैं जो शुद्र वर्ण में पैदा हुए थे[v] बाद में कर्म से ब्राह्मण हुए | इसके पहले एक ब्राह्मण चाणक्य ने एक शुद्र वर्ण के बालक चन्द्रगुप्त को उठाकर क्षत्रिय वर्ण का राजा बना दिया था | ऐसे कई उदाहरण हमारे इतिहास में भरे पढ़े हैं जिनसे यह सिद्ध होता है के आज अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी एस.सी./एस.टी कास्ट की कई जातियां पहले क्षत्रिय राजा हुआ करती थी | अब सवाल यह आता है के यदि यह राजा थे तो इतनी बुरी हालत में कैसे आये |

संदर्भ-

[i] भारत विखंडन – राजीव मल्होत्रा

[ii] ऋग्वेद

[iii] वाल्मीकि रामायण

[iv] महाभारत – गीता प्रेस – वेद व्यास

[v] कल्चरल नेशनालिस्म एंड दलित – संजय पासवान

साभार- https://www.pgurus.com/ से

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