Saturday, February 24, 2024
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लाक्षागृह के बहाने इस्लामी पाखंड और वक्फ की हड़पनीति को समझिए

लाक्षागृह का नाम शायद आपने सुना हो। स्त्री विरोधी, छुपे हुए वामी टुकड़ाखोर, जो जुमला उछालते हैं कि स्त्रियों (द्रौपदी) की वजह से महाभारत हो गयी, उनके लचर-कमजोर तर्क को तोड़ने वाला शब्द है इसलिए लाक्षागृह की बात कम ही होती है। द्रौपदी के विवाह से काफी पहले ही लाक्षागृह भेजने के षडयंत्र दुर्योधन कर चुका था, इसलिए द्युत नहीं भी हुआ होता, तो महाभारत में युद्ध तो होता ही। जहाँ पर पांडवों के लिए लाक्षागृह बनाया गया था, उस जगह का नाम वर्णाव्रत बताया जाता है। आज को उत्तर प्रदेश है, उसके बागपत जिले में कृष्णी और हिंडोन नदी के संगम पर बरनावा नाम के गाँव में एक टीला और करीब सौ बीघे की जमीनें हैं, जिनके बारे में ये माना जाता है कि यही वर्णाव्रत था, जहाँ कभी महाभारत की ये घटना हुई थी। इस इलाके पर इस्लामिस्ट अपना दावा ठोक रहे थे। जैसा कि आमतौर पर होता है, यहाँ उन्होंने एक किसी सूफी बदरुद्दीन शाह की मजार घोषित कर दी थी।

पुराने जमाने में ये इलाका कभी मेरठ होता था और यहाँ का 1920 का अर्चेओलोगिकल सर्वे ऑफ इंडिया का एक सर्वेक्षण भी उपलब्ध था। फ़िलहाल ये एएसआई द्वारा संरक्षित क्षेत्रों में से है, तो जाहिर है कि हिन्दू या भारतीय पुरातात्विक महत्व की चीजों की उन्होंने दुर्दशा कर रखी होगी। अब कोई हुमायूँ का मकबरा तो ये है नहीं न कि एएसआई उसके रखरखाव और सौन्दर्यीकरण पर लाखों-करोड़ों खर्च दे? शेखुलरिज्म नाम की भी कोई चीज होती है भाई! तो हुआ यूँ कि 1970 में यहाँ की तथाकथित कब्रिस्तान के रखवाले (मुतवल्ली) मुकीम खान ने मुकदमा किया कि ये वक्फ बोर्ड की जमीन है और हिन्दू पक्ष इसपर कब्जा कर रहा है। हिन्दुओं के पक्ष से कृष्णदत्त महाराज ने मुकदमा लड़ना शुरू किया और अपना पक्ष रखा। पूरे 54 वर्ष खर्च करने के बाद बागपत के सिविल कोर्ट (जूनियर डिवीज़न) ने ये फैसला दिया है कि जमीन हिन्दुओं की ही है। जाहिर है अभी मामला ऊपर की अदालतों में भी 100-50 साल के लिए जाएगा ही।

इस्लामिस्ट जो दावा कर रहे थे कि ये कब्रिस्तान और वक्फ संपत्ति है, उसका कोई प्रमाण ही नहीं है। किसी “शाह” ने छह सौ साल पहले ये जमीन वक्फ की हो, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता क्योंकि उस काल में ये इलाका किसके शासन में था, ये तक इस्लामिस्ट पक्ष को पता नहीं। दिसम्बर 12, 1920 का जो सरकारी गैजेट है, उसमें भी किसी कब्रिस्तान के यहाँ होने का कोई उल्लेख नहीं। गौर करने लायक ये भी है कि बागपत में ही वो सिनौली का क्षेत्र भी आता है जहाँ 2005 में हड़प्पा काल के अवशेष मिले थे। यहाँ एक परत के नीचे इतिहास की दूसरी परत मिलती है। इन क्षेत्रों से 2018 में जो बर्तनों के अवशेष मिले, वो सिनौली की खोज करने वाले प्रो. केके शर्मा के मुताबिक बिलकुल वैसे ही होते हैं जैसे मथुरा, मेरठ और हस्तिनापुर कहलाने वाले क्षेत्रों में मिल चुके हैं। ये सभी वो क्षेत्र हैं जो करीब-करीब इन्हीं नामों से महाभारत में भी मिल जाते हैं।

ये हमें हाल के दौर में चर्चा में आये वक्फ बोर्ड एक्ट पर ले आता है। दिल्ली का एक बड़ा इलाका कथित रूप से वक्फ संपत्ति बताया जाता है। अम्बानी के मकान पर वक्फ अपनी संपत्ति होने का दावा ठोकता है। भारत छोड़कर जो लोग पाकिस्तान चले गए थे, उनकी जमीनों को वक्फ अपनी संपत्ति बताकर उसपर कब्जा जमाने की कोशिश में एक लम्बे समय से है। मौजूदा कानून (जो कि कांग्रेसी कारकूनों ने गढ़े थे) वक्फ को ऐसे अधिकार देते हैं कि वो खुद ही किसी जमीन को अपनी संपत्ति घोषित कर ले और फिर जमीन के असली मालिकों को अपील भी उसी के पास करनी पड़े! पचास-पचास साल चलने वाले फौजदारी के मुकदमों में वक्फ का एक बड़ा योगदान होगा लेकिन चूँकि मीडिया और सरकारें हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक मानती हैं, इसलिए इस बात पर कोई शोध नहीं होता कि इस तरह बेईमानी से वक्फ के नाम पर कितनी संपत्ति भारत भर में हथिया रखी गयी है।

भारत को अपने कानूनों पर पुनः विचार करना होगा। जब हिन्दुओं के मंदिरों की संपत्ति का किसी भी शेखुलर काम के लिए इस्तेमाल करने का सरकार बहादुर को अधिकार होता है तो फिर किन्हीं और विशेषे समुदायों को विशेषाधिकार कब तक मिलते रहेंगे? हिन्दुओं को सेकंड रेट सिटीजन मानना तो बंद करना होगा!

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