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गुड्डू रंगीला (हिंदी ड्रामा )

दो टूक : ज़िंदगी दो बातों से चलती है।एक या तो आप उसे काबू कर लें या फिर उसके काबू में हो जाएँ। बस इतनी सी बात कहती है अरशद वारसी, अमित साध, अदिति राव हैदरी, अमित स्याल, रोनित रॉय, विरेदनृ सक्सेना, संदीप गोयल, अमित स्याल, अरुण वर्मा, विशाल शर्मा,  दिव्यन्दु भट्टाचार्य, राजीव गुप्ता श्री स्वरा  गुप्ता और  बिजेंद्र काला के अभिनय वाली  निर्देशक सुभाष कपूर की नयी फिल्म गुड्डू रंगीला।

कहानी : फिल्म की कहानी हरियाणा के एक  गांव में रहने वाले गुड्डू (अमित साध) और रंगीला ( अरशद वारसी) नाम के ममेरे भाइयों की है। अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए दोनों भाई ऑर्केस्ट्रा चलाते हैं लेकिन एक केस के लिए पैसा जोड़ने वाले दोनों भाई अपनी आकेस्ट्रा पार्टी चलाने के साथ-साथ छोटे-मोटे डकैत गिरोहों के लिए मुखबिरी भी करते हैं। इसकी वजह है कि  रंगीला पिछले कई सालों से एमएलए और खाप पंचायत के सरगना बिल्लू (रोनित रॉय) के खिलाफ केस लड़ कर रहा है।  दूसरी जाति की लडकी बबली (श्री स्वरा गुप्ता) से शादी करने के जुर्म में  बिल्लू ने सरेआम उसके मामा को जिन्दा जल दिया था। रंगीला और गुड्डू बिल्लू से बदला लेना चाहते हैं लेकिन उनकी ये मुहीम तब और तेज हो जाती है जब बिल्लू की साली ( अदिति राव हैदरी) गोरा बंगाली (दिव्यन्दु भट्टाचार्य) जैसे लोग भी उनसे जुड़ जाते हैं। इस लड़ाई में राजीव गुप्ता और बिजेंद्र काला जैसे अभिनेताओं के कुछ अच्छे  और कुछ बुरे नए पात्र भी आते जाते रहते हैं।

गीत संगीत : फिल्म में इरशाद कामिल के लिखे गीत हैं और संगीत अमित त्रिवेदी का है।  फिल्म का एक गाना कल रात माता का मुझे ई मेल आया है, माता ने मुझे फेसबुक पर बुलाया है पहले ही लोकप्रिय हो चुका है और आप चाहे तो सुइयां सुइयां जैसा गीत सुन सकते हैं। हाँ, एक बात और हितेश सोनिक का पाश्र्व संगीत भी फिल्म के शिल्प को अद्भुत परिदृश्य देता है.

अभिनय : दरअसल फिल्म में गौर किया जाए तो बस दो ही  लोग हैं.  एक अरशद और एक रोनित रॉय। अरशद अब मंजे हुए अभिनेता हो गए हैं।अपने रंगीला के पात्र और उसके चरित्र पर उनका वर्चस्व देखने वाला है।वो उसकी भाषा और शारीरिक भाषा के साथ भी न्याय करते हैं।  अमित साध अब  निराश नहीं करते लेकिन अरशद के सामने वो बहुत कुछ नहीं कर पाते।  रोनित अपने बिल्लू के पात्र को  क्रूर और हिंसक बनाने के साथ ही आक्रामक और अमानवीयता भरा भी बनाते हैं और उसे थर्राने वाला भी। अदिति रॉव  को बहुत ज्यादा मौका नहीं मिला और श्री स्वरा ताजा चेहरा लगती है लेकिन संवाद अदायगी में मार खा जाती है। दिब्येन्दु भट्टाचार्य जमते हैं लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं राजीव गुप्ता। एक भृष्ट हवलदार के चरित्र में उन्होंने एक भृष्ट थानेदार अमित स्याल कर साथ जान फूंक दी है। बृजेन्द्र काला, संदीप गोयल, वीरेंदर सक्सेना, पुजारी बने विशाल ओ शर्मा, मनोज बक्शी, अशोक शर्मा, धीरेन्द्र गुप्ता, दाऊद शेख अपने छोटे छोटे चरित्रों में निराश नहीं करते.

निर्देशन : लगता है गाँव फिर से फिल्मों में लौट रहा है। लेकिन अब वो खाप पंचायत, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बैकग्राउंड वाला है जिनकी पृष्ठभूमि  में खाप, राजनीति के अपराधीकरण, ऑनर किलिंग और धार्मिक कुरीतियों को भी कहानी का हिस्सा बनाया जा रहा है। सुभाष कपूर की कहानी भी ऐसी ही है बस उन्होंने उसे अपने कथ्य और शैली के साथ पटकथा और और संवाद बुनकर उसे देखने लायक बना दिया है। फंस गए रे ओबामा और जॉली एलएलबी के बाद हालांकि वो कुछ हिंसक हुए हैं और उनके यहां इस बार पात्रों का जमावड़ा भी है लेकिन उन्हें सलीके से बरतते हुए वो फिल्म को कुछ धीमी गति के साथ ही सही पर ठीक ठाक सफर पर ले गए हैं। मुझे क्लाइमेक्स में कुछ असहजता जरूर हुई पर बुरा नहीं लगा।

फिल्म क्यों देखें: एक अच्छे विषय पर बनी फिल्म है।
फिल्म क्यों न देखें: नहीं जरूर देखें।ऐसी फ़िल्में कम बनती हैं। 

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