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कैसे होगी कश्मीरी पंडितों की वापसी?

अरसे से बेघर कश्मीरी पंडित अपनी जड़ों की ओर लौटें, ऐसा भला कौन नहीं चाहेगा लेकिन उनकी सुरक्षा एक ऐसा यक्ष प्रश्न है, जिसका जवाब अब तक की सरकारें नहीं ढूंढ़ पाई हैं। कश्मीरियत का अभिन्न अंग होने के बावजूद अब तक उनकी हैसियत पर्यटक से ज्यादा नहीं बन पाई है। वादी में पुनर्वास के लिए कश्मीरी पंडित अलग होमलैंड की मांग कर रहे हैं, जबकि कश्मीर के धार्मिक संगठनों को यह मांग कतई मंजूर नहीं है। ऐसे में बीते २५ साल से चला आ रहा उनका लंबा ‘वनवास’ खत्म होता नजर नहीं आ रहा है।

25 सालों से कश्मीरी पंडित अपनी जड़ों से दूर देश के विभिन्न हिस्सों में रिफ्यूजी बनकर रहने को मजबूर हैं। केंद्र और राज्य में तमाम सरकारों ने कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए कई कदम उठाए लेकिन घाटी में उनकी वापसी आज तक संभव न हो सकी। मौजूदा मोदी सरकार ने भी विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए 500 करोड़ रुपये का बजट रखा है लेकिन कश्मीरी पंडित इसे नाकाफी बता रहे हैं।

संसद में जब कश्मीरी पंडितों की वापसी को लेकर टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति) की के. कविता, भाजपा के अनुराग ठाकुर और संजय जायसवाल तथा बीजद के भतृहरि मेहताब ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव रखा तो केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के लिए पूरी प्रतिबद्धता जताते हुए कहा कि ‘कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास तथा घर वापसी राजनीतिक नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय मुद्दा है। यह हिंदू, मुसलमान या जाति पंथ का मामला नहीं है बल्कि यह इंसानियत, इंसाफ और जज्बात का मामला है।’

गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि कश्मीर पंडितों की वापसी एवं पुनर्वास की योजना कौसर नाग की वर्तमान घटना से प्रभावित नहीं होगी। सदन में कश्मीरी पंडितों की कौसर नाग यात्रा को अलगाववादियों के दबाव में रोके जाने का मुद्दा भाजपा के सांसद अनुराग ठाकुर ने जोर-शोर से उठाया है।

कश्मीरी विस्थापित संघर्ष समिति के अध्यक्ष शिव कुमार भट के अनुसार उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा २०१३ में बनाई गई पार्लियामेंट्री सब कमेटी के सामने कश्मीरी पंडितों से संबंधित कई प्रस्ताव रखे थे, जिन पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। २००८ में प्रधानमंत्री के द्वारा जारी किए गए पैकेज का भी अब तक उपयोग नहीं किया जा सका है। इन तमाम मुद्दों पर उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया है।

इन मुद्दों को लेकर वह मानवाधिकार संगठन के भी पास गए लेकिन भट के मुताबिक उनके अधिकार भी कश्मीर में सीमित हैं। ऐसे में ढाई दशक का समय बीत जाने के बाद भी कश्मीरी पंडित शरणार्थी के रूप में जीने के लिए मजबूर हैं। भट के मुताबिक हाल ही में अमरनाथ यात्रा के दौरान बालटाल में और कौसरनाग यात्रा को लेकर जो वाकया सामने आया है, वह इस बात का साफ संकेत देता है कि कश्मीरी पंडितों की वापसी इस माहौल में संभव नहीं है।

पैंथर्स पार्टी के मुखिया प्रो. भीम सिंह के मुताबिक जब तक आप कश्मीर की समस्या का असल कारण नहीं जान पाएंगे तब तक आप कोई समाधान नहीं खोज पाएंगे। उनके अनुसार नेहरू से लेकर इंदिरा तक कश्मीर की बीमारी का कारण जानते थे लेकिन वह उसका इलाज नहीं करना चाहते थे। इसके बाद जितनी भी सरकारें आर्इं, वे जम्मू-कश्मीर को बाबरी मस्जिद की तरह चुनावी हथकडे के रूप में इस्तेमाल करती रहीं। चुनाव आते ही कश्मीर, अधिकृत कश्मीर और कश्मीरी पंडितों से जुड़े मुद्दे उभर जाते हैं। प्रो.भीम सिंह जम्मू-कश्मीर के सांसदों से सवाल करते हैं कि क्या भारत का संविधान जम्मू-कश्मीर पर लागू होता है।

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यदि नहीं तो वे वहां पर गरीब कश्मीरी पंडितों को भेजकर क्यों मरवाना चाहते हैं? उनके अनुसार आज भी कश्मीर में कई जगह उग्रवादी रह रहे हैं। आज भी वहां पर हिंदू औरतों को सिंदूर नहीं लगाने दिया जाता है। ऐसे में कल्पना की जा सकती है कि कश्मीरी पंडितों के बच्चे वहां कैसे रहेंगे? भीम सिंह दावे के साथ कहते हैं कि कश्मीरी पंडित अब कभी कश्मीर वापस न जा सकेंगे और न ही वहां पर पनुन कश्मीर की कल्पना साकार हो पाएगी क्योंकि यह भारत है न कि फिलिस्तीन।

अरसे से कश्मीरी पंडितों के लिए अलग से होमलैंड की मांग करने वाले पनुन कश्मीर के अध्यक्ष अश्विनी च्रंगू कश्मीरी पंडितों की वापसी को एक राजनीतिक मुद्दा मानते हैं। उनके मुताबिक इसे आर्थिक पैकेज के जरिये दूर नहीं किया जा सकता है। च्रंगू के अनुसार मोदी सरकार को कश्मीरी पंडितों के पलायन से संबंधित कारणों से जुड़े सवालों के जवाब ढू़ंढने होंगे। साथ ही कश्मीरी पंडितों से जुड़े संगठनों के साथ बैठकर इस मुद्दे पर गंभीरता से चर्चा करनी होगी। च्रंगू बताते हैं कि उनके संगठन का बीते कई सालों से गृहमंत्रालय की कमेटी के साथ संपर्क बना हुआ है। केंद्र में नई सरकार बनने के बाद इस मुद्दे पर थोड़ी चर्चा भी हुई है, जिसे वह और आगे बढ़ाना चाहेंगे, क्योंकि मौजूदा कश्मीर के ताने-बाने में किसी गैर मुस्लिम व्यक्ति का टिक पाना मुश्किल है।

अश्विनी च्रंगु के अनुसार पिछले 25 सालों में किसी भी सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया। सरकारों को समझना होगा कि कश्मीरी पंडितों ने रुपये-पैसों की वजह से वहां से पलायन नहीं किया था। कश्मीर से कश्मीरी पंडित समुदाय का सफाया इसलिए किया गया था, क्योंकि वह भारत माता की जय-जयकार करता था। वह भारत सरकार पर विश्वास करता था, इसलिए केंद्र सरकार को इसे कश्मीरी पंडितों की नहीं बल्कि राष्ट्रीय समस्या समझकर समाधान खोजने होंगे। उनके लिए जो होमलैंड बनाया जाए, वह केंद्र शासित प्रदेश होना चाहिए। उस पृथक होमलैंड में भारतीय संविधान लागू होना चाहिए। च्रंगू के अनुसार भाजपा ने बीते 25 सालों में कश्मीरी पंडितों की वापसी के मुद्दे को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ देखा है, ऐसे में अब मोदी सरकार से उनकी ढेरों अपेक्षाएं हैं।

ऐसा नहीं है कि कश्मीरी पंडितों की वापसी को लेकर सरकार या फिर कश्मीर स्थित तमाम संगठनों ने अपनी चिंता व्यक्त नहीं की हो। बीते कुछ सालों में सरकार और कुछ संगठनों की कोशिशों के चलते कुछ कश्मीरी पंडित लौटे भी हैं हालांकि उनकी संख्या न के बराबर जरूर है। अमूमन कश्मीरी पंडित विशेष पर्व-त्योहार आदि पर वहां पर्यटक की तरह जाते हैं और दो-चार दिन में ही वापस लौट आते हैं। कश्मीरी पंडितों के अनुसार उनकी वापसी के लिए सरकार एवं अन्य संगठनों की तरफ से कई बार पेशकश की गई है लेकिन सुरक्षा को लेकर कभी उनका जवाब संतोषजनक नहीं रहा है।

गौरतलब है कि हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता तथा कई अलगाववादी नेता समय-समय पर कश्मीरी पंडितों के बगैर कश्मीर अधूरा है की बात कहते हुए उनकी वापसी के लिए निमंत्रण देते रहे हैं लेकिन उनकी सुरक्षा को लेकर वे कश्मीरी पंडितों को आश्वस्त नहीं कर पाए।

दिल्ली के मैदानगढ़ी क्षेत्र में रहने वाली एक कश्मीरी पंडित महिला सीमा कौल (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि पृथक होमलैंड की बात भी सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकती है क्योंकि ऐसा होने पर आतंकियों को उनकी पहचान करना मुश्किल नहीं होगा और वे आसानी से उन्हें निशाना बना सकेंगे। सीमा कौल के मुताबिक उसने अपना अनंतनाग स्थित मकान २००४ में बहुत ही कम दामों में बेंच दिया था, क्योंकि वापस लौटने की कोई उसे न तो पहले ही आस दिखाई दी और न ही अब दिखाई दे रही है।

इस महिला जैसे तमाम कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन के वक्त या फिर पलायन के बाद अपने घर और जमीन को औने-पौने दामों पर बेच दिया था। जिन स्थानों में ये कश्मीरी पंडित रहा करते थे, आज 25 सालों में वहां का पूरा नक्शा ही बदल गया है। नतीजतन अब तमाम कश्मीरी संगठन पृथक होमलैंड की बात कर रहे हैं, जिसकी मुखालफत वहां के धार्मिक संगठन कर रहे हैं।

कश्मीरी पंडितों के लिए अलग से होमलैंड बनाए जाने की बात को सिरे से नकारते हुए जम्मू एवं कश्मीर में धार्मिक संगठनों के समूह मजलिस इत्तिहाद-ए-मिल्लत ने केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि वह पलायन कर गए कश्मीरी पंडितों के लिए अलग से कोई बस्ती न बनाए। समूह के अध्यक्ष और कश्मीर के शीर्ष मुफ्ती बशीरउद्दीन ने ‘शुक्रवार’ से बात करते हुए कहा कि ‘कश्मीरी पंडित हमारे भाई हैं, उनकी मां-बहनें हमारी मां-बहनें हैं, लिहाजा हम उनकी कश्मीर वापसी का स्वागत करते हैं। यहां उनके अपने मकान और अपनी जमीनें हैं, वे उस पर आकर दोबारा से रहें।’ मुफ्ती के मुताबिक कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से एक साजिश के तहत निकाला गया था, न कि उन्हें कश्मीर के मुसलमानों ने निकाला था।

उनके मुताबिक जिन्होंने यह साजिश रची, आज वे खुद यहां से चले गए। ऐसे में सरकार भले ही इस दिशा में कोई कदम उठाए लेकिन यहां के लोग आपसी भाईचारे को कायम रखना चाहते हैं। आज भी कश्मीरी पंडित तमाम पर्वों पर यहां आते हैं, लोगों से मिलते हैं। आज भी यहां की अवाम कश्मीरी पंडितों की शादी-ब्याह से लेकर जनाजे में शामिल होते हैं। कश्मीर ही वह जगह है जिसके बारे में कभी महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत में कहांr अमन की उम्मीद नजर आती है तो वह कश्मीर है, इसलिए मोदी सरकार जज्बातों में कोई ऐसा कदम न उठाए, जिससे यहां का माहौल बजाय सुधरने के खराब हो जाए।

यह बात सच है कि कश्मीरी पंडित कश्मीर की संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग हैं, जिसके बगैर कश्मीर की कल्पना नहीं की जा सकती लेकिन यह उतनी ही हकीकत है कि देश के तमाम हिस्सों में शरणार्थी के रूप में जीवन जी रहे कश्मीरी पंडित आज भी इतने डरे हुए हैं कि वे तमाम सरकारी आश्वासनों के बावजूद, प्रधानमंत्री के कई सौ करोड़ के पैकेज के ऐलान के बावजूद घर वापसी को तैयार नहीं हैं।

निश्चित तौर पर बीते कुछ सालों में वादी की फिजाओं में कुछ बदलाव देखने को मिला है लेकिन इन बदलावों के बाद हालात ऐसे नहीं हुए हैं कि कश्मीरी पंडित वापसी की बात सोच सकें।

साभार-http://www.shukrawar.net/ से

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