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नयी शिक्षा नीति में आचार्य विद्यासागर जी महाराज की सलाह और सन्देश का समावेश भारतीयता का गौरव

राजनांदगाँव। भारत की नयी शिक्षा नीति के मसौदे में विश्व वंदनीय संत-कवि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की सलाह और संदेश का समावेश एक सशक्त कदम है। यह भारत और भारतीयता की जड़ों को सींचने के समान है। इससे नौनिहालों को बुनियादी संस्कार का नया आधार मिलेगा। आचार्य प्रवर के सर्वाधिक चर्चित महाकाव्य मूकमाटी का सांस्कृतिक अनुशीलन कर रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर से डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी की उपाधि अर्जित करने वाले दिग्विजय कालेज के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. चन्द्रकुमार जैन ने इस अभूतपूर्व अवसर को समूची मानवता का विशिष्ट गौरव माना है।

डॉ. जैन ने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रारूप को केंद्र सरकार की कैबिनेट ने स्वीकृति दे दी है। इसके मार्गदर्शक प्रमुख विशेषज्ञों में आचार्य विद्यासागर महाराज को का नाम ड्राफ्ट दस्तावेज के पृष्ठ क्रमांक 455 पर भारत रत्न सीएनआर राव जी के बाद शामिल है। यह नीति अब शिक्षा को रटने की जगह पर जीने की दिशा में आगे बढ़ाएगी। करीब 34 वर्षों के बाद देश की शिक्षा नीति में परिवर्तन हुआ है। ऐसा मानना है नई शिक्षा नीति आगामी कई वर्षों तक देश की अधोसंरचना बनकर देश को समृद्ध बनाएगी। यह अनोखा अवसर है कि एक जैन आचार्य और दिव्य साहित्य सर्जक को देश की शिक्षा नीति की संरचना की महान प्रेरक शक्ति के रूप में सम्मिलित किया गया है।

डॉ. जैन ने स्मरण दिलाया कि कुछ वर्ष पूर्व 2017 में डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजित आचार्य श्री विद्यासागर जी मुनिराज के दर्शन व चर्चा करने पद्मविभूषण ईसरो के पूर्व अध्यक्ष व मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा गठित नई शिक्षा नीति के अध्यक्ष श्री कस्तूरीरंगन जी पधारे थे। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा था कि मैंने पढ़ा व सुना था कि महापुरुष बहुत महान होते हैं। उनकी कथनी व करनी एक होती है। पर जिन्दगी में पहली बार मैं महापुरुष के जीवंत दर्शन कर रहा हूँ।

डॉ. जैन ने बताया कि राष्ट्रपति जी ने कस्तूरीरंगन जी से कहा था कि एक बार जैनाचार्य विद्यासागर जी के पास जरुर जाइएगा। उनसे इस विषय में चर्चा कीजिएगा। तब वह आश्चर्यचकित थे कि यह एक जैन संत के पास हमें क्यों भेज रहे हैं, वो भी शिक्षा से सम्बन्धित कार्य के लिए। पर यहाँ आकर पता चला कि उन्होंने क्यों भेजा। नयी शिक्षा नीति में पूज्य गुरुदेव ने 53 मिनिट में जो बात शिक्षा को लेकर कही थी जिसमें मातृभाषा आदि विषयों की प्रधानता थी। नौ सदस्यीय टीम ने गुरुदेव के संकेतों का पालन कर शिक्षा नीति में बड़े बदलाव किए हैं।

डॉ. चंद्रकुमार जैन धन्यभाव से कहते हैं कि माटी को भी मंगल कलश में ढालने अचूक की कला सिखाने वाले आचार्य श्री की कृपा दृष्टि मानवता के उद्धार के लिए समर्पित है। भारत और भारतीय चेतना के वे प्रखर पक्षधर हैं। आजकल उनके सन्देश के अनुरूप भारत बने भारत अभियान भी चलाया जा रहा है। आचार्य श्री ने अपनी दूरगामी से देश की शिक्षा नीति में बदलाव के लिए आशीर्वाद प्रदान किया है। डॉ. जैन का कहना है कि इससे हमारी नयी पीढ़ियों को बुनियादी संस्कारों से जुड़ने और अपनी माटी, अपनी भाषा और और जीवन व्यवहार के करीब आने के नए अवसर जुटेंगे। यह वास्तव में परम सौभाग्य का प्रसंग है।

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