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भारत की जनजाति परंपरा और ब्रिटनी के मेगालिथ में गहरी समानता

ब्रिटनी फ्रांस के मेगालिथ एवं प्राचीन भारतीय संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में डॉ. एस. ली गुरिएक का व्याख्यान

भोपाल। भारतीय जनजातीय समाज की ज्ञान परंपरा और फ्रांस के मेगालिथ संरचनाओं में गहरी समानताएं हैं। जनजातीय समाज में कालगणना की जो पद्धति है, उसे मेगालिथ संरचनाओं में भी देखा जा सकता है। इसी तरह सूर्य के परिभ्रमण और मंदिरों की संरचना को लेकर दोनों में एक ही ज्ञान परंपरा देखने को मिलती है। यह विचार विश्वविख्यात मानव विज्ञानी डॉ. सर्जे ली गुरिएक ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के तत्वावधान में ‘प्रकृति के अज्ञात सिद्धाँत’ विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान में कही।

फ्रांस स्थित ब्रिटनी की मेगालिथ संरचनाओं एवं प्राचीन भारतीय हिंदू संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन कर चुके डॉ. गुरिएक ने कहा कि पाइथागोरस ने जिस गणतीय प्रमेय की खोज की थी, वह भारत के जनजातीय समाज में पहले से विद्यमान है और मेगालिथ परंपरा में भी उसी तरह की गणना देखने में आती है। उन्होंने भारत में प्रवास के दौरान छत्तीसगढ़ में एक महिला के शरीर पर गोदना की आकृति देखी थी, ठीक उसी प्रकार की आकृति ब्रिटनी के मेगालिथ संरचनाओं पर भी देखने को मिली। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में जगदलपुर के करीब स्थित दंतेश्वरी माता का मंदिर ज्यामितीय गणना के आधार पर बनाया गया है। मेगालिथ सरंचनाओं को किताब की संज्ञा देते हुए कहा कि यह ज्ञान भारत से ही फ्रांस पहुंचा है। इसके प्रमाण भी मौजूद हैं। उन्होंने आह्वान किया कि भारत में मेगालिथ सरंचनाओं के संरक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि यहाँ जमीन के लिए उन्हें नष्ट किया जा रहा है। तकरीबन दो साल पहले कर्नाटक में जमीन के लिए मेगालिथ संरचनाओं को नष्ट किया जा गया था। डॉ. गुरिएक ने कहा कि यह ज्ञान परंपरा पूरे विश्व में तीन हिस्सों- ईजिप्ट, भारत और मध्य पूर्व में देखने को मिलती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि वर्तमान विज्ञान भौतिकी, रसायन, गणित जैसे अन्य विषयों को अलग-अलग करके देखता है, जबकि इन्हें एकरूप में देखने की आवश्यकता है। इसी से हम प्रकृति को ज्यादा करीब से समझ सकते हैं। भारत की ज्ञान परंपरा में यह दृष्टि पहले रही है। उन्होंने कहा कि यदि हमने प्रकृति के नियमों को नहीं समझा तो दिल्ली जैसी स्थितियाँ सब जगह बनेंगी। उन्होंने बताया कि भारत के जिस जनजातीय समाज को निरक्षर माना जाता है, उसी समाज ने श्रुति परंपरा के माध्यम से ज्ञान को संजोए रखा है। मेगालिथ संरचनाओं में यही बात देखने में आती है। कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा ने डॉ. गुरिएक को स्मृति चिह्न और विज्ञापन एवं जनसंपर्क विभाग के अध्यक्ष डॉ. पवित्र श्रीवास्तव ने स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन संचार शोध विभाग की अध्यक्ष डॉ. मोनिका वर्मा ने किया।

यह है मेगालिथ : फ्रांस के दक्षिणी तट पर स्थित एक छोटे से प्रांत ब्रिटनी में हजारों पाषाणों की क्रमबद्ध श्रृंखलाएँ मानव विज्ञान के लिए सदियों तक एक अबूझ पहेली रही है और आज भी यह किसी रहस्य से कम नहीं हैं। इन विशाल शिलाओं में किसी महान एवं विकसित सभ्यता के संकेत दृष्टिगोचर होते हैं। यह सभ्यता आज से लगभग सात हजार साल पूर्व अज्ञात लोगों ने विकसित की थी। बाद में, यह पूरी तरह विलुप्त हो गई। विशाल पाषाण शृंखलाओं और उन पर उकेरी गई आकृतियों में अपने ज्ञान का संचय करने वाली यह सभ्यता मेगालिथ कहलाती है।

(डॉ. पवित्र श्रीवास्तव)
निदेशक, जनसंपर्क

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