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कोहाट दंगे: खिलाफ़त आंदोलन के लिए हुई ‘डील’ ने कैसे करवाया था हिंदुओं का सफाया?

कोहाट दंगों की शुरुआत कैसे हुई…

पाकिस्तान में हिंदुओं पर होते अथाह अत्याचार की हकीकत आज सबके सामने है। लोगों को लगता है कि ये सब पिछले कुछ सालों में शुरू हुआ वरना उससे पहले मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदुओं के साथ सब कुछ ठीक था। कुछ लोग ऐसी भयावह स्थिति के लिए विभाजन को भी जिम्मेदार मानते हैं और कुछ को लगता है कि ये कट्टरपंथ का नतीजा है।

इसके अलावा हो सकता है कुछ मत और भी हों या कुछ अनुभव अलग भी हों। लेकिन आज मुद्दा ये नहीं है कि पाकिस्तान में वर्तमान स्थिति क्या है। मुद्दा आपको ये बताना है कि पाकिस्तान में बसे इलाकों में हिंदुओं की हालत विभाजन से पहले भी इतनी ही दर्दनाक थी। ये मारकाट, हत्या, धर्मांतरण कोई आज की तस्वीर नहीं है। भले ही उस समय वह क्षेत्र भारत का हिस्सा थे, लेकिन अल्पसंख्यक होने के कारण हिंदू फिर भी इस्लामी कट्टरपंथ की बलि चढ़ने को मजबूर था।

आगे 1924 में कोहाट का दंगा और उसके ईर्द-गिर्द हुई घटना उक्त बातों को साफ कर देगा। …वैसे तो कोहाट पाकिस्तान में बसा एक शहर है और इसका जिक्र बौद्धों के इतिहास से लेकर बाबरनामा तक में पढ़ने को मिलता है। इसके बाद दुर्रानी शासन काल में, फिर पीर मोहम्मद की शिकस्त और महाराजा रणजीत सिंह की जीत में भी कोहाट शामिल है। मगर, इतिहास में इतना पीछे न जाते हुए सिर्फ 1924 में हिंदुओं पर हुए अत्याचार और उस समय के आस पास घटित हो रही घटनाओं पर बात करते हैं। (इस क्रम में 1919 से 1922 में मध्य भारत में चला खिलाफत आंदलोन भी चर्चा में रहेगा, जिसका उद्देश्य मुस्लिमों के मुखिया माने जाने वाले टर्की के ख़लीफ़ा के पद की पुन: स्थापना कराने के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालना था।)

500 साल तक इस्लामी सत्ता के तले दबे कोहाट की आबादी में हिंदू 1924 में कथिततौर पर केवल 6 प्रतिशत थे। बाकी सब मुस्लिम। महाराजा रणजीत सिंह ने अपने जीते जी इस क्षेत्र के हिंदुओं पर आँच तक नहीं आने दी थी। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद तस्वीर बदल गई। कोहाट पर ब्रिटिश सत्ता आई और हिन्दुओं की हालत और कमजोर होती गई। मुस्लिम आबादी उन पर हावी हो रही थी जिसके कारण उन्होंने खुद को बचाने के लिए सनातन धर्म सभा का गठन किया।

94 फीसद आबादी के सामने 6 फीसद आबादी कब तक टिक पाती वो भी उस दौर में जब देश को आजादी दिलाने के नाम पर कॉन्ग्रेस पार्टी ही मुस्लिम लीग से हाथ मिला ‘डील’ करके खिलाफत आंदोलन को समर्थन दे रही थी। अजीब बात ये थी कि गाँधी उस दौर में खुद असहयोग आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे लेकिन उनके ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ के साथ स्वतंत्रता पाने के सपने ने उन्हें मुस्लिम लीग से हाथ मिलाने को मजबूर किया।

लाहौल में प्रकाशित हुई हिंदू विरोधी कविता

1922 में खिलाफ़त का आंदोलन फीका पड़ा और हिंदू मुस्लिम एकता के मुखौटे के नीचे सांप्रदायिक तनाव पैदा होता नजर आने लगा। उधर कोहाट के हालात संवेदनशील थे। वहाँ मुस्लिम लगातार हिंदुओं को दबाने में लगे थे। कुछ घटनाएँ हो रही थीं जिनसे माहौल साम्प्रदायिक होता जा रहा था।

अंतत: 1924 में एक दिन ऐसा आया कि मुस्लिम समाचार पत्र में एक हिंदू विरोधी कविता प्रकाशित कर दी गई, जिसे देख सनातन धर्म सभा के सचिव जीवन दास भड़क गए और एक पैम्पलेट के जरिए अपनी प्रतिक्रिया दी। विवाद बढ़ा लेकिन बाद में सभा ने इस पर्चे की बाबत 2 सितंबर को क्षमा प्रस्ताव पारित कर दिया।

कृष्णा संदेश में प्रकाशित कविता

बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी इतने से शांत कहाँ होने वाली थी। उनका नेतृत्व करने वाले मौलवी अहमद गुल ने पुलिस को अंजाम भुगतने की धमकी देते हुए जीवन दास की गिरफ्तारी की माँग की। साथ ही कहा कि उन्हें हिरासत में तब तक रखा जाए जब तक कि वो 10 हजार का बॉन्ड नहीं देते। इसके बाद जीवन गिरफ्तार हुए और 8 सितंबर को जाकर कहीं उन्हें बेल मिली।

कोहाट की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी इस रिहाई को देख आग बबूला हो गई और उलेमा व कई मस्जिद अपने भड़काऊ भाषण देने के काम पर लग गए। धमकी दी गई कि या तो दास को सजा हो या फिर वो उसे शरीयत के मुताबिक सजा देंगे। 9 सितंबर की सुबह तक का वक्त मौलवियों ने दिया था। इस बीच एक हाजी बहादुर के मस्जिद के मौलवी ने कसम खा ली कि अगर वो अपने मजहब की रक्षा न कर पाया तो बीवी को तलाक दे देगा। रात होते होते कई अन्य मुस्लिम इस कसम को खाते देखे गए।

इसके बाद 9 सितंबर को पहले 1000-1500 की भीड़ उप आयुक्त के पास गई और माँग पूरी करवाने का दबाव बनाया, लेकिन सुनवाई न होने पर उसी दिन दोपहर में हिंदुओं पर हमला हुआ। खुलेआम मुस्लिम बहुल आबादी ने वहाँ के तमाम हिंदुओं की दुकानों को लूटा और जलाना शुरू किया। मिट्टी की दीवारें ढहाई गईं और लूटपाट के बाद आगजनी को अंजाम दिया गया। हिंदू क्वार्टर आग की लपटों से धुआं छोड़ रहे थे, जिन्हें देख कोई भी कह देता कि ये कोई प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक गहरी साजिश की परिणाम था।

हिंदुओं की संपत्ति तहस-नहस करने में अधिकतर दूसरे समुदाय का युवा वर्ग शामिल था। उन्होंने एक मुस्लिम लड़की के साथ भागने वाले सरदार के घर, बागान सबको जला दिया था। इस बीच हालत देख हिंदुओं ने डर कर इन लोगों पर गोली चलाई जिसके कारण एक पत्थरबाज मर गया और कई घायल हुए।

इस घटना ने जैसे दूसरे समुदाय को हिंदुओं को मारने का पास दे दिया। नतीजन दंगा शाम तक चलता रहा। कानून के सहारे जब तक स्थिति को संभाला गया तब तक दूसरे चरण की मारकाट शुरू हो गई थी। 10 सितंबर 1924 को करीबन 4000 मुस्लिमों ने 3000 हिंदुओं को इतना मजबूर कर दिया कि उन्हें भाग कर मंदिर में शरण लेनी पड़ी। इस बीच जो पीछे छूटे उन्हें मुस्लिम सुमदाय के लोगों ने काट डाला, बाकी भागे हिंदुओं के घरों को लूटा और आग में झोंक दिया।

कथिततौर पर 1 हफ्ते के अंदर हिंदू मोहल्ला राख हो चुका था। बचे हुए हिंदुओं ने भाग कर पंजाब के रावलपिंडी में शरण ली। आधिकारिक तौर पर कहते हैं कि कुल 115 लोग हताहत हुए थे। इनमें 12 मरे थे, 13 घायब हुए थे और 86 को चोट आई थी। लेकिन, इन आँकड़ों के साथ ही अनुमान ये भी लगता है कि उस समय दूसरे समुदाय के जितने लोग हताहत हुए उससे तीन गुना हिंदू मारे गये थे।

इस आपाधापी और इतने भय वाले माहौल ने हिंदुओं को घर छोड़ने को मजबूर कर दिया। हिंदुओं की वापसी दोबारा 1925 में जाकर शुरू हुई जब NWFP चीफ कमिश्नर एचएन बॉल्टन ने हिंदू मुस्लिम नेताओं में नाम का समझौता कराया लेकिन फायदा दूसरे पक्ष को हुआ। इसके तहत मुस्लिमों के ख़िलाफ़ सभी आपराधिक केसों को वापस ले लिया गया सिर्फ जीवन दास के ऊपर से ईशनिंदा का केस नहीं हटा। साथ ही हिंदुओं को 5 लाख रुपए का मुआवजा भी नहीं दिया गया।

कोहाट दंगों से पहले 23 जुलाई को लॉर्ड रीडिंग ने ब्रिटिश सेक्रेट्री को कुछ लिखा था जिससे ये साफ था कि हिंदू मुस्लिम के बीच की खटास उन्हें दिख रही थी। उन्होंने कहा था “ये गाँधी का आंदोलन कभी भी इतना मजबूत नहीं होता लेकिन सेवर्स की संधि (treaty of sevres) जिसने मुसलमानों को इतना कट्टर बनाया कि उसके कारण वह कुछ समय के लिए हिंदुओं से जुड़े। अब सबसे बड़ी परेशानी ये है कि हिंदू-मुस्लिम के गलों को एक दूसरे से बचाया जा सके जो कि मुझे लगता है ब्रिटिश ही कर सकते हैं। विशुद्ध रूप से भारतीय विचारों से, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि शांति [तुर्की के साथ] हमें भारत में 60 या 70 मिलियन मुसलमानों के बीच चरमपंथियों को छोड़कर सभी के समर्थन का आश्वासन देगी और भारत में ब्रिटिश स्थिति को मजबूत करने के लिए भौतिक रूप से मदद करेगी।”

पैट्रिक मैकग्रा ने ऐसी स्थिति के लिए खिलाफत आंदोलन और उसके बाद के परिणामों को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने बताया था कि कैसे खिलाफत के दौरान मुस्लिम समुदायों में कट्टरता बढ़ी। इस दौरान उलेमा राजनैतिक गतिविधियों में शामिल हुए और इस बीच उनकी कट्टरता ने मुस्लिम समुदाय पर गहरा प्रभाव छोड़ा और साम्प्रदायिक मुद्दे इस बीच बड़ा मुद्दा बनकर उभरे।

आज मौजूदा तथ्यों और कोहाट दंगों के इर्द-गिर्द घटी ऐतिहासिक घटनाओं को एक दूसरे से जोड़ते हुए हम कह सकते हैं खिलाफत आंदोलन ही वह प्रमुख आंदोलन था जिसने भारत के विभाजन की बीज बोई और मजहब के आधार पर पाकिस्तान की माँग को उठाया। इस खिलाफत आंदोलन के आसपास दो बड़े हिंदू नरसंहार हुए। एक 1921 में मोपला में और दूसरा 1924 में कोहाट में। दोनों ही समय इस्लामी कट्टरपंथियों का भयावह चेहरा देखने को मिला था। लेकिन राजनैतिक समर्थन के कारण इन्हें बल मिला। शायद आगे यही वजह थी कि विभाजन के बाद भी ये कट्टरपंथ का बीज सींचा जाता रहा जिसने 90 के दशक में कश्मीरियों पंडितों के नरसंहार की कहानी लिखी।

साभार- https://hindi.opindia.com/ से

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