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कोलकाता के संस्कृत पुस्तकालय में मिली छठी शताब्दी की रामायण

कोलकाता शहर स्थित एक प्राचीन संस्कृत पुस्तकालय में छठी सदी की एक रामायण मिली है। यह रामायण बाकी रामायणों से काफी अलग है। इसमें राम और सीता के बिछड़ने का विशेष तौर पर वर्णन है। इस रामायण में एक खास फर्क यह है कि यहां राम और सीता को भगवान या किसी अवतार के तौर पर नहीं, बल्कि इंसानों की तरह दिखाया गया है। इस रामायण में राम और सीता के जीवन की घटनाओं का वर्णन बेहद मानवीय तरीके से किया गया है।

रामायण की यह पांडुलिपि संयोग से मिल गई। एशियाटिक सोसायटी पुस्तकालय में विद्वान और विशेषज्ञ छठी सदी के वन्ही पुराण पर काम कर रहे थे। उन्हें उसकी पांडुलिपि अधूरी लगी। इसके बाद पांडुलिपि के बाकी अंश की तलाश करने के लिए लोगों ने पुस्तकालय के पूरे कैटेलॉगरम को खंगालना शुरू किया।

इस कैटेलॉगरम को जर्मनी के एक विद्वान ने तैयार किया था। इसमें विश्व की सभी संस्कृत पांडुलिपियों का ब्योरा दिया गया है। इसको खंगालते समय विद्वानों को महसूस हुआ कि वन्ही पुराण की उस पांडुलिपि से मिलती-जुलती 2 और पांडुलिपियां मौजूद हैं। इनमें से एक तो लंदन स्थित इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी में रखी है और दूसरी कोलकाता स्थित संस्कृत साहित्य परिषद के पुस्तकालय में रखी होने की जानकारी मिली। मालूम हो कि कोलकाता का संस्कृत साहित्य परिषद 100 साल पुराना एक रिसर्च संस्थान है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से इसे फंड भी दिया जाता है।

विद्वानों ने पुरालेखों को खंगालना शुरू किया और उन्हें वन्ही पुराण का पूरा अंश भी मिल गया। जब इस पांडुलिपि को पढ़ा जा रहा था, उसी दौरान विद्वानों की नजर दास गरीब रक्षक चरित्रम वध पर पड़ी। इस किताब का वन्ही पुराण से कोई लेना-देना नहीं है। कुछ समय तक तो विद्वानों को समझ ही नहीं आया कि पुराण के श्लोकों में एकाएक कोई दूसरी कहानी कहां से आ गई। जल्द ही विद्वानों को समझ आया कि यह कहानी किसी और की नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के जाने राम, सीता और रावण की है।

विद्वानों को जल्द ही समझ आ गया कि वह असल में छठी सदी में लिखे गए एक रामायण को पढ़ रहे हैं। उन्होंने पाया कि इस रामायण को काफी अलग तरीके से लिखा गया है। आमतौर पर प्रचलित वाल्मीकि रामायण, जो कि चौथी सदी ईसा पूर्व में लिखी गई थी, ये यह रामायण काफी अलग थी। अनुसूया भौमिक बताती हैं, ‘इस रामायण में केवल 5 कांड हैं। वहीं वाल्मीकि के लिखे रामायण व अन्य रामायणों में आमतौर पर 7 कांड हैं। इस रामायण में बालकांड नहीं है। बालकांड में राम के बचपन का वर्णन है और इसे उत्तरकांड भी कहा जाता है। वहीं, यह रामायण राम और सीता के वनवास से वापस अयोध्या लौटने और राम के सिंहासन पर बैठने की घटना पर ही खत्म हो जाता है।’

एशियाटिक सोसायटी के अध्यक्ष संस्कृत शास्त्री मानवेंदु बंदोपाध्याय ने बताया, ‘रामायण के इस रूप में पति और पत्नी के तौर पर राम-सीता के बिछड़ने की घटना पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। इसमें राम और दशरथ के अलग होने को उतनी प्रमुखता से नहीं दिखाया गया है। वहीं, इस संस्करण में राम को भगवान से ज्यादा इंसान के तौर पर पेश किया गया है। इसके राम को गुस्सा भी आता है और वह कई बार असफल भी होते हैं। कुछ जानकारियां काफी दिलचस्प हैं। इसमें शादी के समय राम और सीता की उम्र और जब सीता का रावण ने अपहरण किया, वे तारीखें भी अलग हैं।’

साभार-टाईम्स ऑफ इंडिया से

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