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लुटियंस दिल्ली की मायाः जिसे प्रधान मंत्री भी नहीं समझ पाए

प्रधानमंत्री को ‘लुटियंस दिल्ली’ का दिल नहीं जीत पाने का मलाल है। इस शब्द का इस्तेमाल अंग्रेजों की बनाई नई राजधानी में मौजूद सरकारी इमारतों और बंगलों के लिए होता है। एडविन लुटियंस इसके प्रमुख वास्तुकारों में से एक थे लेकिन उनके कई विचारों को लागू नहीं किया गया। लुटियंस शुरू में लाल बलुआ पत्थरों के इस्तेमाल, गोल चक्कर बनाने, पेड़ और झाडिय़ों के पक्ष में नहीं थे और वह रायसीना हिल पर राष्ट्रपति भवन भी नहीं बनाना चाहते थे। सच तो यह है कि नई दिल्ली में बनी अधिकांश इमारतें और बंगले दूसरे वास्तुकारों ने डिजाइन किए थे, लुटियंस ने नहीं। लेकिन यह इलाका लुटियंस दिल्ली ही कहा जाता है।

इस मोदी-विरोधी केंद्र में आखिर कौन लोग रहते हैं? यहां के 19 वर्ग किलोमीटर इलाके में मौजूद करीब 1,000 पुराने बंगलों में से 90 फीसदी सरकार के पास हैं और उनमें मंत्री, सांसद और वरिष्ठ अधिकारी रहते हैं। मोदी के मलाल की वजह ये लोग तो नहीं हो सकते हैं। लेकिन लुटियंस दिल्ली का दायरा अब बढ़कर 28 एकड़ तक जा पहुंचा है जिसमें डिप्लोमेटिक एनक्लेव और गोल्फ लिंक भी शामिल हैं। इन इलाकों की गिनती सर्वाधिक पसंदीदा जगह के तौर पर होती है। राज्यों के मुख्यमंत्री भी यहां बंगले की चाहत रखते हैं। अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद भी सांसद यह इलाका नहीं छोडऩा चाहते हैं। दूसरे शहरों के कारोबारी भी लुटियंस दिल्ली में रिहाइशी आवास खरीदते हैं। फिर भी इसकी कुल जनसंख्या 3 लाख से कम होगी जो 1.6 करोड़ की आबादी वाले शहर के 2 फीसदी से भी कम है। ऐसे में प्रधानमंत्री तो छोडि़ए, कोई भी नेता क्यों फिक्रमंद होगा?

दरअसल असली लुटियंस दिल्ली यहां का वास्तु या निवासी नहीं हैं। असल में यह एक मुहावरा है जो लॉबी करने वालों, वकीलों, सेमिनार में जुटने वाले बुद्धिजीवियों, उद्योग मंडलों के इवेंट मैनेजर, सेवारत एवं सेवानिवृत्त राजनयिक, पत्रकार और इंडिया इंटरनैशनल सेंटर (आईआईसी) को अपने-आप में समेटे हुए है। इसे ‘प्रतिष्ठान’ भी कहा जा सकता है। यह एक ऐसा ‘प्रतिष्ठान’ है जो छोटा और खुद ही अपना चयन करने वाला विशिष्ट समूह है और उसके दीर्घकालिक प्राधिकार भी हैं। इसके लिए ब्रिटेन में ‘ऑक्सब्रिज’ कूटनाम मशहूर था जो देश के शीर्ष शिक्षण संस्थानों से निकले छात्रों के लिए इस्तेमाल होता था। ब्रिटेन में चाहे जो भी सरकार बनाए, शासन और वित्तीय केंद्रों को ऑक्सब्रिज ही चलाते थे। पहली भाषा के तौर पर अंग्रेजी का इस्तेमाल करने वाले और दिल्ली के आधा दर्जन प्रमुख कॉलेजों एवं संस्थानों के पूर्व छात्र भी शैक्षणिक अभिजन की श्रेणी में आते हैं। इनमें से कई लोग किसी न किसी रूप में सरकार का हिस्सा होते हैं और प्रमुख जगहों पर उन्हें आसानी से देखा जा सकता है।

वाशिंगटन में ऐसे लोगों के लिए ‘बेल्टवे’ का जिक्र होता है जो असल में एक रिंग रोड है। बेल्टवे के करीब रहने वाले लोगों के बारे में कहा जाता है कि उनका बाकी देश के राजनीतिक मिजाज से कोई नाता नहीं होता है। वैसे दिल्ली के बारे में ऐसी बात सच नहीं है। उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम से ताल्लुक रखने वाले लोग देशव्यापी रुझान के मुताबिक ही मतदान करते हैं। लेकिन लुटियंस दिल्ली का मामला अलग है। जहां वैचारिक रुख तय करने वाले लोग उदारवाद और धर्मनिरपेक्षता पर चर्चा करते हैं, वहीं मतदाता खेती के असाध्य होने, नौकरियों और अब आवारा पशुओं को लेकर फिक्रमंद हैं जबकि लुटियंस दिल्ली के किसी भी समूह को इनकी चिंता नहीं करनी है। यशवंत सिन्हा कहते थे कि बजट के बाद पूछे जाने सवालों का हजारीबाग में रहने वाले उनके मतदाताओं का कोई लेना-देना नहीं होता है।

मोदी सरकार में भी अरुण जेटली और हरदीप पुरी जैसे लुटियंस दिल्ली वाले लोग मौजूद हैं। लेकिन मोदी का यह मानना सही है कि इस एनक्लेव में प्रभावी विचार उनकी राय से मेल नहीं खाते हैं। फिर उन्हें मलाल किस बात का है? वह शायद यह है कि भाजपा को अब भी सबल्टर्न (कमतर) माना जाता है। उनकी सरकार कुछ पुस्तकों के पुनर्लेखन, एनजीओ की फंडिंग रोकने, सुब्रमण्यन स्वामी और एस गुरुमूर्ति जैसे बौद्धिक हमलावरों को साथ लाने, पूर्व जनरलों को अपने पाले में करने, टीवी चैनलों पर अपनी आवाज बुलंद करने और जेएनयू जैसे संस्थानों पर दबदबा कायम करने में सफल रही है। फिर भी वह ‘प्रतिष्ठान’ का निर्माण नहीं कर पाती है। क्या ये सबल्टर्न अब बैस्टिल पर ही धावा बोलेंगे? विडंंबना है कि इसका फैसला तो मतदाता ही कर सकते हैं।

साभार- https://hindi.business-standard.com/ से



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