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मारवाड़ी कारोबारीः दूरदृष्टि, आत्मविश्वास और आस्था का संगम

पिछले दिनों जब कुछ वेबसाइटों ने दावा किया सुजीत सराफ का उपन्यास हरिलाल ऐंड संस दुनिया का पहला मारवाड़ी उपन्यास है तो मैंने झट उसे ऑर्डर कर दिया। सराफ की पिछली किताब द कन्फेशंस ऑफ सुल्ताना डाकू भी बेहतरीन थी। वैसे भी मेरे मन में मारवाड़ी समुदाय को लेकर खास किस्म का आकर्षण रहा है। मारवाड़ी समुदाय ने कारोबारी जगत में जो योगदान दिया है उसके बारे में तो सभी जानते हैं। बिड़ला, गोयनका, बजाज, डालमिया और ऐसे अन्य परिवारों की जीवनगाथा तो तमाम लोगों ने सुन ही रखी है। इन्हें कई बार दोहराया गया है। लेकिन मारवाडिय़ों की एक और श्रेणी है। ऐसे छोटे कारोबारी और दुकानदार जो अपनी पूरी जिंदगी राजस्थान के अपने वास्तविक घर से सैकड़ों मील दूर छोटे गांव कस्बों में अनाज बेचते हुए बिता देते हैं। बंगाल, असम और यहां तक कि अरुणाचल प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में भी इन लोगों को पाया जा सकता है। हरिलाल ऐंड संस ऐसे ही एक कारोबारी की कहानी है।

जो लोग उदारीकरण के पहले के दौर से हैं उनको याद होगा कि एक वक्त पॉप्युलर मीडिया में कारोबारियों की भारी फजीहत होती थी। अधिकांश फिल्मों में उनको जमाखोरी करने वाले के रूप में चित्रित किया जाता था जो हमेशा बुराई के साथ होते। उनकी जिद और प्रतिबद्धता पर किसी का ध्यान नहीं था। यही वजह है कि हरिलाल ऐंड संस एक ऐतिहासिक परिघटना है। आखिरकार एक मारवाड़ी कारोबारी को उसका हक मिला है। यह 20वीं सदी का शुरुआती दौर है जब हरिलाल 12 वर्ष की उम्र में कोलकाता आता है। वह एक प्रमुख मारवाड़ी फर्म में बतौर लिपिक काम शुरू करता है। सट्टेबाजी में उसकी तबीयत लगती है। कुछ समय बाद वह थोड़ा दूरदराज बोगरा इलाके में अनाज की एक दुकान खोलता है। साल बीतने के साथ वह अपने कारोबार में जूट, सिगरेट, कपड़ा और तेल आदि को शामिल करते चला जाता है। विभाजन के बाद वह बिहार के एक अन्य छोटे से कस्बे में चला जाता है जहां वह कुछ और कामों के साथ लीवर ब्रदर्स का एजेंट बन जाता है।

पुस्तक में मारवाड़ी मानसिकता पर गहरी अंतर्दृष्टि देखने को मिलती है। हरिलाल जहां सट्टेबाजी को लेकर खासा तत्पर है, वहीं उसमें यह साहस भी विद्यमान है कि वह दूरदराज स्थित एक अजनबी कस्बे में दुकान खोल सके। वह एक विनम्र व्यक्ति है और कभी अपने वैभव का प्रदर्शन नहीं करता। मैंने इस पुस्तक से सीखा कि एक मारवाड़ी कभी दो हजार दो सौ रुपये नहीं कहेगा बल्कि वह इस राशि को बाइस सौ रुपये कहेगा। कोई मूर्ख ही होगा जो अपनी संपत्ति की जानकारी सार्वजनिक करेगा। इसीलिए वह अपने बेटों के नाम रखता है फकीर चंद और गरीब दास।

मैंने यह भी जाना कि जब कोई मारवाड़ी दाल में पत्थर और आटे में चॉक पाउडर मिलाता है तो ईश्वर दूसरी ओर देखने लगता है। इतना ही नहीं शास्त्र कहते हैं कि किसी बनिया की मुठ्ठी केवल तीन अवसरों पर खुलती है: जन्म, विवाह और मृत्यु। मारवाड़ी व्यावहारिक होते हैं और विवाद में नहीं पड़ते। हरिलाल अपने बेटे को सिखाता है, ‘एक बनिया अपनी गद्दी पर बैठता है और बेचता है।’ हरिलाल गाय की पूजा करता है और इस बात से खासा दुखी रहता है कि बोगरा के नवाब की रसोई के लिए गायों को काटा जाता है। इससे उसकी संवेदनाएं प्रभावित होती हैं लेकिन वह ऐसा कुछ नहीं करेगा जिससे उसके हित प्रभावित हों। वह एक गोशाला बनवा सकता है या गायों को बूचडख़ानों से बचाने वालों को नियमित दान कर सकता है लेकिन कभी खुला विरोध नहीं कर सकता। एक उम्रदराज मारवाड़ी ने हरिलाल को सलाह दी कि लड़ाई लडऩा उनके रक्त में ही नहीं है। राजस्थान में जब कारोबारी अपने कपड़ों में सोना छिपाकर घर लौट रहे होते थे और रास्ते में डाकू उनको पकड़ते तो वे चुपचाप सोना दे देते क्योंकि वह तो दोबारा कमाया जा सकता है लेकिन अगर जान चली गई तो कमाने की क्षमता भी उसके साथ ही चली जाएगी। ‘सम्मान क्या है? जिंदगी रामजी ने दी है और सम्मान लोगों का दिया हुआ है।’

जब उसके एक बेटे ने कहा कि वह दूसरे विश्वयुद्घ के दौरान सेना में शामिल होना चाहता है तो हरिलाल उससे कहता है, ‘युद्घ तो समाप्त हो जाएगा लेकिन तुम्हारे पास एक दुकान होगी जिसे हर सुबह खोलना होगा।’ मारवाड़ी जगत सेठ ने ही 18वीं सदी में बंगाल के नवाब के खिलाफ जंग में रॉबर्ट क्लाइव की मदद की थी। यह युद्घ लडऩे का उनका तरीका था। जब बंगाल में जापानियों के आक्रमण का खतरा उत्पन्न हुआ और लोगो ने बंगाल छोडऩा शुरू कर दिया तो हरिलाल ने कहा, ‘अंग्रेज हों या जापानी, दोनों को अनाज चाहिए, दोनों को सिगरेट चाहिए और दोनों को तेल भी चाहिए।’ आज के समय में भले ही यह अजीब लगे लेकिन यह विशुद्घ व्यावहारिक सलाह थी। कारोबार ऐसे ही खड़े किए जाते हैं।

कारोबारी जगत की सांस्कृतिक पैठ पर विचार करने वाले चुनिंदा लोगों में से एक गौरव डालमिया ने कुछ अरसा पहले बिज़नेस स्टैंडर्ड में लिखा था कि मारवाडिय़ों में अपनी क्षमताओं को लेकर जबरदस्त भरोसा होता है, फिर भी वे अत्यंत विनम्र होते हैं। खपत की तुलना में निवेश को प्राथमिकता देने की उनकी प्रवृत्ति ही संपत्ति निर्माण के मूल में है। वे छोटे मोटे लालच में नहीं पड़ते और अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं। अपनी ऊर्जा बचाकर रखते हैं और उनमें संरक्षण की वृत्ति होती है। समुदाय की मजबूत मारवाड़ी समझ के बारे में भी कुछ कहना आवश्यक है। इसकी बदौलत ऐसे नेटवर्क तैयार होते हैं जिनके आधार पर एक नया व्यक्ति कारोबार शुरू कर सकता है। मारवाडिय़ों की सफलता में विश्वास और वफादारी का भी योगदान है। हरिलाल ऐंड संस मारवाड़ी समुदाय के दिमाग को समझने के लिए बेहतरीन किताब है।

साभार-http://hindi.business-standard.com से



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