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मोदीजी संयुक्त राष्ट्र संघ में दो टूक कहें, भारत नया इस्लामी राष्ट्र नहीं बनने देगा

हां, दुनिया की आंख से आंख मिला कर पूछने का वक्त है! यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितंबर 2019 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में इस्लाम की पाकिस्तानी हल्लेबाजी पर दो टूक जवाब नहीं दिया तो ऐतिहासिक अवसर को गंवाना होगा। मैं नरेंद्र मोदी का बतौर प्रधानमंत्री आलोचक हूं। नोटबंदी के बाद से आर्थिकी, नीतिगत फैसलों के साथ हिंदुओं को मूर्ख बनाने की राजनीति का विरोधी हूं। बावजूद इसके अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के फैसले का समर्थक हूं तो इस दो टूक सोच से है कि मैं हिंदू हूं और जहां मैं जन्मा हूं, वह मेरी कर्म-धर्म की वह भूमि है, जहां का कण-कण आदि-अनादि काल से हिंदू अणु में गुंथा हुआ है। इस पृथ्वी पर जब से मानव चेतना की प्राणवायु है तब से अफगानिस्तान से ले कर अरूणाचल वाला दक्षिण एशिया उस जीव की मिट्टी है, जिसके डीएनए में हिंदू स्मृति है, इतिहास है, आस्था है और दुनिया भर में फैले कोई सौ करोड़ हिंदुओं का जीना इसी मिट्टी के मनोविश्व से बना हुआ है। हिंदु सभ्यता, संस्कृति, आचार-विचार की यह आस्था भूमि, पुण्य भूमि, मातृ भूमि, पितृ भूमि, स्वर्ग भूमि, नरक भूमि सब कुछ है।

और हां, इस सबका प्रमाण ज्ञात इतिहास का हर वह उत्खनन, वह दास्तां, वह स्मृति है, जिसे अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत में कश्मीर से केरल के हर कोने याकि पूरे उपमहाद्वीप की मिट्टी में दबे डीएनए से दुनिया को प्राप्त है। अफगानिस्तान में, पाकिस्तान में हड़प्पा व भारत में हाल का राखीगढ़ी (हरियाणा) उत्खनन याकि चार-पांच हजार साल पहले के भी प्रमाण में आस्था के शिव, नंदी, वृक्ष, प्रकृति आदि के वे तमाम चिन्ह, डीएनए के लक्षण दुनिया के आगे बतौर हकीकत यह पेश हैं कि यही उपमहाद्वीप सनानती हिंदू धारा की जड़ लिए मालिकाना मिट्टी है।

तब क्यों न मुझे, हमें, दुनिया को चिंता करनी चाहिए कि सवा सौ करोड़ हिंदुओं का भूभाग उनका बना रहे, भूभाग उनके लिए, उनकी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहे? आप किसी भी भाव, किसी भी व्याख्या में हिंदू को बूझें, उसे ढालें मतलब हिंदू को धर्म माने या हिंदू को जीने की पद्धति या हिंदू सेकुलर या धर्मांध। हिंदू कैसा भी हो इस नाम के मानव की जमीन, उसका बापी पट्टा तो यहीं उपमहाद्वीप है!

और पृथ्वी के इस भूभाग में ठीक सौ साल पहले 1919 में अमानुल्ला खान द्वारा अफगानिस्तान को स्वतंत्र घोषित करने से ले कर 1947 में पाकिस्तान निर्माण, 1971 में बांग्लादेश निर्माण की तीन हकीकत वैश्विक प्रमाण है कि इस्लाम की जिद्द से इस उपमहाद्वीप में तीन इस्लामी देश हैं! दुनिया को यह तथ्य पता है कि पाकिस्तान बनने के तुरंत बाद उसने 1947 में ही जम्मू कश्मीर का विवाद बना एक और इस्लामी देश की भूमिका बनाई! उसी जिद्द में आज फिर इमरान खान, बाजवा, कुरैशी कुतर्क कर रहे हैं कि कश्मीर घाटी में मुसलमान बहुसंख्या में हैं तो उनका खास दर्जा रहे और खास दर्जा खत्म होना मतलब ‘नरसंहार और नस्लीय सफाई’ की तैयारी है व हमें ‘हिंदुस्तान के हिटलर’ को रोकना है!

इस लहजे और इस्लामी कट्टरपंथियों (वे जो अल्प मुस्लिम संख्या वाले देशों याकि दारूल हरब इलाके को इस्लामी देश याकि दारूल-इस्लाम में कन्वर्ट करवाने के धर्मादेश में जिहादी बनते हैं।) के हल्ले में मसला मानवाधिकार का नहीं, बल्कि इस्लामी झंडे का नया दारूल इस्लाम बनवाने का है। इस मंशा का प्रधानमंत्री मोदी को संयुक्त राष्ट्र में भंडाफोड़ करना चाहिए। 14 अगस्त 1947 में आजादी के बाद पाकिस्तान ने, उसके जिन्ना और लियाकत अली ने जम्मू कश्मीर में कबायली भेजे, हैदराबाद के रजाकारों को हवा दी या जूनागढ़ के नवाब को भड़काया तो पीछे क्या ‘दारूल हरब’ बनाम ‘दारूल-इस्लाम’ वाली सोच नहीं थी?

कहने का मतलब है कि न चाहते हुए भी हिंदुओं ने, गांधी-नेहरू ने अपनी मिट्टी, अपनी जमीन का धर्म के नाम पर बंटवारा माना लेकिन बावजूद इसके इस्लाम ने नई जिद्द बना ली। बंटवारे से बने ‘दारूल-इस्लाम’ ने अगली फतह के लिए जम्मू कश्मीर को चुना। क्या यह हकीकत दुनिया नहीं जानती?

तभी दुनिया से पूछा जाए कि इस इस्लामी जिद्द, मनोदशा का हिंदू क्या करें? इस्लाम को, मुसलमान को पाकिस्तान लेकर भी चैन नहीं आया! पाकिस्तान बनवा कर वहां सब कुछ इस्लामी बना लिया। हिंदू को जीने नहीं दिया। उन्हें कन्वर्ट होने को, भागने को, गुलामी की दशा में जीने को मजबूर किया।

आप सोच सकते हैं मैं अतिवादी हो रहा हूं! पर दिल पर हाथ रख कर विचार करें कि क्या यह सब पिछले 72 साल की सच्चाई, इतिहास और तथ्य नहीं है? और जरा उपमहाद्वीप से बाहर निकल दुनिया में और जगह के भी अनुभव याद करें। क्या यह हकीकत नहीं है कि ‘दारूल-इस्लाम’ में गैर-मुस्लिम का जीना मुश्किल है तो गैर-मुस्लिम देश में यदि प्रदेश व इलाके विशेष में मुस्लिम आबादी बढ़ कर अधिक हो गई तो मुसलमान धर्म के नाम पर जिहाद छिड़ेगा, विशेषाधिकार, अलग देश की मांग करेगा!

और गंभीरता से इस तथ्य को गांठ बांधे कि पिछले सौ सालों में दुनिया में किसी भी राष्ट्र, कौम या सभ्यता (ईसाई, हान) ने अपनी मातृभूमि में दूसरे धर्म का (इस्लामी) राष्ट्र नहीं बनने दिया। सोवियत संघ जब एक था तो उसने मध्य एशिया के मुसलमानों को अनुशासित नागरिक बना कर रखा। रूस व पुतिन अपनी नैसर्गिक भू सीमा रेखा में चेचेन्या के मुसलमानों को आज दबा कर रख रहे हैं। चीन ने मुस्लिम बहुल शिनजियांग प्रांत में रोजे रखने जैसी बातों पर भी पाबंदियां लगा कर मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बना रखा है। अमेरिका ने इस्लाम को रोकने के लिए 9/11 के बाद से किलेबंदी की है। डेनमार्क, फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों में मस्जिद न बनने देने से ले कर हिजाब पर रोक जैसे फैसले हुए पड़े हुए है।

क्यों? इसलिए कि हर कौम विशेष में, धर्म विशेष की जन्मभूमि में यह निश्चय है कि उसे अपनी मातृ-पितृ-पुण्य-राष्ट्र भूमि को, अपनी मूल जड़ों को बनाए-बचाए रखना है। ऐसी जिद्द सऊदी अरब याकि इस्लामी देशों की भी है। इस्लामी देश हों या बौद्ध (म्यांमार, श्रीलंका) सब अपनी मूल आबादी, मूल धर्म, मूल प्रकृति की चिंता में अपने आपको अपने धर्म में बांधे हुए हैं और धर्म-संस्कृति-सभ्यता के हित की चिंता में गैर-मुस्लिम या मुसलमान को दबा कर रखते हैं तो यह सहज मानवीय वृति है, नेचुरल है। विकास की आधुनिक अवधारणाएं हों, लोकतांत्रिक सोच हो सबका मूल तो आखिर क्षेत्र याकि राष्ट्र-राज्य विशेष बहुमत की राय में गुंथा हुआ होता है।

यहा मेजोरिटेरियन याकि बहुसंख्यावाद को पाप करार दिया जा सकता है। यह दलील इसलिए बेतुकी है क्योंकि इस्लामी देशों के संगठन के मुस्लिम बहुल पचास जो सदस्य देश हैं उनका भी तो स्वरूप इस्लामी देश और मुस्लिम बहुलता के कारण गैर-मुस्लिम को ईशनिंदा जैसी जकड़नों से मारने का है। इसलिए वैश्विक पैमाने पर इस्लामी देश अपने धर्म, दारूल इस्लाम के मिजाज में यदि जी रहे हैं तो वह उनका हक है तो साथ में ईसाई-हान-यहूदी-हिंदू सभ्यता के देश यदि अपने धर्म, अपनी सभ्यता में जी रहे हैं तो इन्हें भी हक और वैधता है।

दिक्कत तब है जब इस्लाम के बंदे कहें और खास कर सऊदी अरब का वहाबीपना यह जंगलीपना बनवाए कि सर्व भूमि दारूल इस्लाम की! इस जंगलीपने को इस पृथ्वी पर किसी ने यदि सर्वाधिक झेला है तो वे हिंदू है, जिनके कंधार से ले कर पूर्वोत्तर और हिंदमहासागर के जल, जंगल और जमीन वाले उपमहाद्वीप में हिंदुओं ने अपनी बहुसंख्या के बावजूद पिछले सौ सालों में अल्पमत वाले मुसलमानों के तीन राष्ट्र बनने दिए!

क्या यह हकीकत नहीं है? क्या हकीकत नहीं है कि 1947 में आजादी के वक्त भी कुल आबादी में बहुमत के बावजूद हिंदुओं ने अल्पसंख्या वाले मुसलमानों के लिए पाकिस्तान मंजूर किया। मुझे तो ध्यान नहीं आता दुनिया का ऐसा कोई कोना, जहां मूल आबादी ने, अपनी बहुसंख्या के बावजूद बाहरी धर्म के आधार पर अलग राष्ट्र बनने दिया! (कोई उदाहरण हो तो बताएं)। यूगोस्लाविया (याद रखे सर्बिया) के दो टुकड़े या साइप्रस का दो हिस्सों में धर्म के आधार पर बंटना जोर जबरदस्ती और ईसाई व मुस्लिम आबादी का लगभग बराबर-बराबर होने की बदौलत था। यह बात भी जानना चाहिए कि अफ्रीका महाद्वीप में भी सूडान, चाड, मोजांबिक, इथियोपिया, मध्य अफ्रीकी गणराज्य जैसे कुछ देश दारूल-इस्लाम की जिद्द के आगे कलह, गृहयुद्ध के शिकार हुए या है तो यह सब यूगोस्लाविया व साइप्रस जैसे अनुभव के बीच हैं। मतलब मुस्लिम आबादी बराबर हुई या बढ़ी नहीं कि जिहाद!

लब्बोलुआब? भारत वैश्विक बिरादरी से पूछे कि पृथ्वी का दूसरा कौन सा इलाका है, जहां मुसलमान के प्रति हिंदुओं जैसी उदारता हुई? तीन इस्लामी देश बनने देने के बाद भी हिंदू जम्मू कश्मीर को कैसे इस्लामी बहुसंख्या पर आजादी की, उसके विशेष दर्जे की मांग माने? यदि धर्म ही वैश्विक फैसले की कसौटी है तो दुनिया पाकिस्तान से कहे कि तब वह 1947 रीविजिट करे और अपने दारूल इस्लाम में भारत की मुस्लिम आबादी को न्योते व उन्हे वही बसाएं! मुसलमानों के लिए ही उसे बनाया गया था तो उपमहाद्वीप के सभी मुसलमानों को अपने यहां बसाए। 1947 में यदि हिंदुओं ने अपनी जमीन का बंटवारा मान इस्लाम के लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) मंजूर किया था तो वह अंतिम है या नहीं? क्या इस्लाम भारत के बहुसंख्यक हिंदुओं को आगे भी डिक्टेट करता रहेगा कि उसे कश्मीर को, मुसलमानों को याकि राज्य-प्रदेश-इलाकेवार मुस्लिम बहुमत को कैसे रखना है?

हां, मसला मानवाधिकार का नहीं है, बल्कि पाकिस्तान के इस्लामी झंडे की मंशा का है तो भारत की चाहना केवल राष्ट्र-राज्य की एकता-अखंडता और सनातनी हिंदू माटी के भविष्य की सुरक्षा व हिंदूहित धर्म से है। हिंदूहित के धर्म में नेहरू-गांधी ने सेकुलर एप्रोच बनवाई तो वह हिंदू की वैधानिक सोच थी, उसकी मनमर्जी थी तो मोदी-शाह ने उसकी जगह नई एप्रोच अपनाई है तो वह भी वैधानिक और हिंदूहित धर्मी है इसलिए कि भारत राष्ट्र-राज्य, उसकी मिट्टी का मूल बहुसंख्यक हिंदू है। क्या नहीं?

साभार- https://www.nayaindia.com/ से

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