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उज्जैन का ही नहीं पूरे देश का गौरव है युवराज लायब्रेरी

उज्जैन के बीचोंबीच स्थित युवराज जनरल लायब्रेरी अपने आप में एक इतिहास समेटे हुए है। कई दुर्लभ ग्रंथो व इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों को समेटे हुए ये लायब्रेरी आज भी अपना महत्व सिध्द कर रही है।

समय के प्रवाह में सौ वर्षों का भले ही कोई महत्व न हो, किन्तु एक सार्वजनिक संस्था के लिए उपलब्धि ही है, संस्थाएं बनती हैं मिटती है, कभी आन्तरिक कलह और कभी प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण किन्तु संस्था के जीवन दीप वे सेवाभावी कार्यकर्ता होते हैं जो स्वयं मिटकर संस्थाओं को जीवित रखते हैं उतार चढाव संघर्ष हर संस्था का नसीब है श्री युवराज जनरल लाइब्रेरी में भी ऐसे दौर कई बार आए किन्तु कर्मठ सेवाभावी सदस्यों ने उन पर सदा विजय पाई।

सन् 1913 माधव कालेज उज्जैन के एक अध्यापक मुन्शी प्रभुलाल गौड “अशहर “उर्दू अरबी फारसी के विद्वान होने के साथ ही उर्दू के उस्ताद शायरों में शुमार थे (उज्जैन में उर्दू शायरी का आगाज अशहर और बशर उज्जैनी से ही माना जाता है) देश गुलाम था, और अशहर की शायरी जनचेतना को झकझोर रही थी पर शायद यह काफी नहीं था शायद इसीलिये इस ख्यातनाम शायर ने अपने ही बैठक खाने में दो डेस्क दो लेम्प और चार अखबार रख पड़ोसियों को पढ़वाना आंरभ किया जब भीड बढ़ने लगी तो दानाआपा की सीढी पर कमरा किराए पर लिया। पर बात बनी नहीं, तब पटनीबाजार में एक किराए का कमरा लेकर फ्री रीडिंग रुम का आगाज किया वही घर के डेस्क लैम्प और अखबार ये बातें कुछ लोगों को हंसने का मौका देतीं , मगर ध्येयनिष्ठ लोग बाधाओं से कहां डरते हैं ।

ये वो जमाना था जब अखबार पढ़ना भी हिम्मत की बात थी, लिहाजा “अशहर “साहब ने पान सुपारी के बहाने नगर की बौद्धिक मनीषा को आमंत्रित किया परिणाम उत्साह वर्धक रहा वह दिन था 2फरवरी 1913का आमंत्रित अतिथियों के समक्ष उनका सारगर्भित भाषण, और परिणाम स्वरूप उसी दिन व्यवस्थापिका समिति चुनी गयी इस मैनेजिंग कमेटी के अध्यक्ष स्वयं अशहर सा. हुए और मंत्री उनके सहकर्मी अध्यापक श्री पाद्येष । प्रथम कार्यसमिति में श्री जालंधरी मेनेजर अमृतसर बैंक श्री त्र्यंबक दामोदर पुस्तके, वकील मीर बक्शीश अली, व मुन्शी इमदाद अली लिये गये संस्था का पहला बजट था 10आने का ।

सफर प्रारंभ हो चुका था और शुरू हुआ सफलता का अभियान उज्जैन के जनमानस को राष्ट्रीय संचेतना से सिक्त करने में संस्था के योगदान को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त श्री नरेश मेहता ने रेखांकित किया चार अखबार दो डेस्क दो लेम्प से प्रारंभ होकर चली इस संस्था में आज 50,000से अधिक हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, संस्कृत, उर्दू, अरबी फारसी के ग्रंथ है कुछ अत्यंत दुर्लभ हैं। ग्वालियर रियासत के जमाने से सन 2000तक के गजट संस्था की विशेषता है । यहाँ प्रतिदिन 60 से अधिक स्थानीय, प्रादेशिक, साप्ताहिक, मासिक वपाक्षिक दैनिक समाचार पत्र व पत्रिकाएँ आती हैं इसमें देश की महत्वपूर्ण पत्र पतरिकाऐ सम्मिलित हैं

पठन पाठन की इस परंपरा ने देश व प्रदेश की कयी विभूतियों को तराश कर उनका स्थान दिलाया कुछ इस संस्था से जुडे तो कुछ के जीवन की आधारशिला भी इसी संस्था द्वारा रखी गयी मध्य भारत के शिक्षा मंत्री पं, काशीनाथ जी त्रिवेदी अपने अध्ययनकाल में लायब्रेरियन थे मूर्धन्य कवि व प्रेमचंद पीठ के अधिष्ठाता रहे कयी आकाशवाणी केन्द्रो में निदेशक रहे हरीनारायणजी व्यास को तो लायब्रेरियन के प्रशिक्षण के लिए बडौदा भेजागया था। पद्मभूषण स्व. सूर्य नारायण जी व्यास, डॉ. प्रभाकर माचवे, पं रमाशंकर शुक्ल हृदय, पं गोपीकृष्ण जी शास्त्री, मध्यभारत उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री हिरवे, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री शंकर प्रसाद भार्गव, गोवर्धनलाल जी ओझा, विधायक वी वी अयाचित, राज्य सभा सदस्य कन्हैयालाल जी मनाना, केन्द्रीय मंत्री प्रकाश चंद्र जी सेठी,संगीत मर्मज्ञ धुण्डीराजकृष्ण आष्टेवाले, उद्योग पति लालचंद जी सेठी, तेजकुमार जी सेठी, वरिष्ठ कवि मोहन सोनी, शिव चौऋषिया, शायर अहमद कमाल परवाजी,मेयर स्व श्यामलाल जी गौड, अखिल भारतीय बार परिषद के अध्यक्ष स्व, लक्ष्मण प्रसाद जी भार्गव स्वतंत्रता संग्राम सैनानी स्व अवंती लाल जी जैन जैसे कई दिग्गजों की एक लंबी सूची है जिन्होंने अपने पुरुषार्थ, सेवा और समर्पण से इस लायब्रेरी की पवित्रता, गरिमा और यहाँ उपलब्ध हजारों दुर्लभ ग्रंथों की रक्षा कर इसके ऐतिहासिक महत्व को कम नहीं होने दिया।

(श्री सुभाष गौड़ युवराज लायब्रेरी के अध्यक्ष हैं)

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