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सुरेश प्रभु की सक्रियता ने यात्रियों में विश्वास पैदा किया

भारतीय अभिनेता सनी देओल की आज से करीब 22 साल पहले 30 अप्रैल,1993 को फिल्म ‘दामिनी’ रिलीज हुई थी, जिसमें एक संवाद था -‘तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख!!’ इस डायलॉग की खासियत यह रही कि बीते जमाने को तो छोड़िए, आज की नई पीढ़ी के मुख से भी इसे परेशानी के दिनों में सीधे तौर पर सुना जा सकता है। फिल्म में दामिनी की भूमिका निभाने वाली मीनाक्षी शेषाद्री के लिए सन्नी देओल न्याय दिलाने और सहयोग देने के लिए किसी अवतार से कम नहीं नजर आते हैं। इस फिल्म की तरह वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अच्छी बात यह है कि भारतीय रेलवे को भी एक सन्नी देओल मिल गया है, जो दामिनी बनी रेलवे को हर संभव सहायता दे रहा है। कहना होगा कि रेलवे का यह अभिनेता कोई और नहीं, बल्कि स्वयं इस विभाग के मुखिया यानी देश के रेल मंत्री सुरेश प्रभु हैं, जो कि हर तारीख पर रेलवे में सफर कर रहे देशवासियों के लिए अपने ट्वीटर संदेश के जरिए सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से मदद कर रहे हैं।

यहां हम कितनी तारीख गिनाएं, हर दिनांक पर बतौर रेल मंत्री सुरेश प्रभु लोगों की मदद करते दिखाई देते हैं। वास्तव में यह देश का वर्तमान सुखद पहलू है कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पड़ोसी देशों से चहुंमुखी विकास की शर्त पर संबंध सुधारने के लिए यहां तक करते हैं कि वे बीच रास्ते में अपना कार्यक्रम परिवर्तित कर देते हैं, सीधे पाकिस्तान पहुंच जाते हैं। दुनिया को इसकी खबर वे स्वयं ही देते हैं, वह भी ट्वीटर के जरिए। वहीं, दूसरी ओर उनके मंत्री मण्डल के सदस्य सुरेश प्रभु हैं, जो इन दिनों अपने ट्वीट से रेलवे में सफर करने वालों को सीधे मदद पहुंचा रहे हैं।

तारीख 3 जनवरी 2016, प्रभु को आए ट्वीट से बच्चे को मिला दूध। तारीख 1 जनवरी 2016, रेल मंत्री को किया ट्वीट, बच गई दो साल की बच्ची की जान। तारीख 16 दिसंबर 2015 ‘सर, मेरे बच्चे को बहुत तेज बुखार है, प्लीज मदद कीजिए’ और पहुंच गई सहायता। तारीख 11 दिसंबर 2015, प्रभु को किया ट्वीट, तो मिला भूखे बच्चे को दूध। तारीख 9 दिसंबर 2015, एक ट्वीट पर ‘प्रभु’ ने भिजवा दिया बच्चों के लिए खाना। तारीख 3 दिसंबर 2015, ट्वीट पर युवती को रेल मंत्री ने दिला दी सुरक्षा। इस प्रकार और भी तारीखें गिनाई जा सकती हैं, जब सुरेश प्रभु के हस्तक्षेप के बाद सहायता सीधे चलती ट्रेन में जरूरतमंद तक तुरंत पहुंचाई गई है।

निश्चित ही इसे राजनीति के सुखद बदलाव का आरंभ भी माना जा सकता है। जब कोई राजनेता अपने क्षेत्र विशेष या अपने मंत्रालय से संबंधित कार्यों में सिर्फ कागजी कार्य और सहयोग प्रदान नहीं कर रहा, बल्कि यथार्थ धरातल पर सीधे-सीधे रोजमर्रा के जीवन में अटक से कटक तक, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, भारत के इतने बड़े भू-भाग वाले रेलवे फलक को नई सूचना प्रौद्योगिकी तकनीक का सहारा लेकर एक साथ चिंता कर रहा है।

भारतीय रेलवे के बारे में यह बहुत कम लोगों को विदित होगा कि यह प्रतिदिन 11 हजार 500 से ज्यादा गाड़ियों का संचालन करती है, जिनमें तकरीबन 8 हजार 200 यात्री गाड़ियां हैं। यहां आज सुरेश प्रभु के नेतृत्व में रेलवे प्रशासन के कामों में बेहतर कार्यकुशलता लाने, चालू परियोजनाओं के क्रियान्वयन में गति लाने, ग्राहकों की बेहतर संभाल करने, महाप्रबंधकों आदि का कार्यभार कम करने के उद्देश्य से कार्य किया जा रहा है। इसके लिए भारतीय रेलवे ने वर्तमान जोन के स्तर पर अन्य क्षेत्रीय स्तर पर रि-एडजस्टमेंट करते हुए सात नए जोन पर कार्य करना शुरू कर दिया है। यही नहीं तो निश्चित समय-सीमा के भीतर महत्वपूर्ण परियोजनाओं को पूरा करने के उद्देश्य से, रेलवे के विकास के लिए एक गैर-बजटीय निवेश की शुरुआत भी की गई है। इस स्कीम के तहत निवेश के माध्यम से रेलवे नेटवर्क के नाजुक सेक्शनों में क्षमता संबंधी कमियों को दूर किया जा रहा है।

सुरेश प्रभु की सक्रियता के कारण भारतीय रेलवे प्रतिदिन यात्रा करने वाले 13 मिलियन से ज्यादा यात्रियों की सुरक्षा की प्रति पहले से गंभीर हुआ है। इसके लिए अधिकतम नवीनतम प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल और सुरक्षा मानकों को बढ़ाने के लिए अपनी जनशक्ति को प्रशिक्षित करने में इस समय रेलवे नेटवर्क काम कर रहा है। महिला यात्रियों की सुरक्षा और सहायता के लिए महिला पुलिस बल तैनात किए गए हैं। रेल सुरक्षा बल और राजकीय रेलवे पुलिस की लगातार ताकत बढ़ाई जा रही है, जिससे कि सुरक्षा में होने वाली चूक को कम से कम किया जा सके।

रेलवे सूचना प्रणाली केंद्र की मदद से ऑनलाइन टिकटिंग सुविधा को यात्रियों के लिए निरंतर और अधिक सुगम बनाया जा रहा है। प्रभु के रेलमंत्री बनने के बाद 245 नए स्थलों पर कंप्यूटरीकृत आरक्षण केंद्र खोले जा चुके हैं। आटोमेटिड टैलर मशीन द्वारा मासिक और त्रैमासिक टिकटें जारी किए जाने की एक पायलट परियोजना मुंबई में शुरू हो चुकी है, जिसमें मासिक और त्रैमासिक सीजन टिकटें स्मार्ट कार्ड के माध्यम से भी खरीदी जा रही हैं। माल परिचालन सूचना प्रणाली, रेक प्रबंधन प्रणाली के क्रियान्वयन से रेलवे द्वारा माल परिचालन का कंप्यूटरीकरण कर लिया गया है। रेलवे ने अपना स्वयं का इन्ट्रा-नेट ‘रेलनेट’ स्थापित कर लिया है, जो कि रेलवे बोर्ड, क्षेत्रीय मुख्यालयों, मंडलीय मुख्यालयों, उत्पादन इकाइयों, प्रशिक्षण केंद्रों आदि के बीच सफलतापूर्वक नेटवर्किंग की व्यवस्था कर रहा है।

सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा प्रशंसनीय कार्यनिष्पादन रेलवे के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, विशेषकर इरकॉन और राइट्स लगातार दे रहा हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन प्रतिष्ठित संस्थानों से विदेशी मुद्रा आमदनी में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, इस समय इरकॉन मलेशिया, बांग्लादेश और इंडोनेशिया इत्यादि देशों के साथ विभिन्न परियोजनाओं पर काम कर रहा है। रेलवे का वैल्यू एडिड टूर पैकेज प्रोग्राम प्रतिवर्ष कई हजार पर्यटकों को सतत् लाभ पहुंचा रहा है। कोंकण रेल निगम के भिड़ंत-रोधी उपस्कर सहित तमाम अधुनातन देशी प्रौद्योगिकी के इस समय गहन फील्ड परीक्षण किए जा रहे हैं, जो कि रेलगाड़ियों के बीच होने वाली भिड़ंत को रोक पाने में सक्षम है तथा निकट भविष्य में सर्वाधिक तेज गति की रेलगाड़ी चलाने में रेलवे की मदद करेगा और रेलपथों को अधिक सुरक्षित और अबाधित बनाएगा।

वस्तुत : ऐसे अन्य अनेक कार्य और भी गिनाए जा सकते हैं, जिनमें कि सुरेश प्रभु के रेलवे मंत्री बनने के बाद सक्रियता आई है। निश्चित ही यात्रियों के अनुरोध पूरे करने के लिए प्रभु की टीम को भारी मशक्त करनी पड़ती होगी, यह सहज समझा जा सकता है, उन्हें स्वयं भी अपनी टीम के साथ देर रात तक जागना पड़ता होगा। पर यह जो हो रहा है, वह हर मायने से अच्छा ही है, क्योंकि आज इसके कारण ही पूरा रेलवे तंत्र जाग गया है। अब जीएम से लेकर डीआरएम तक, स्टेशन मास्टर से लेकर टीटीई तक सभी एलर्ट मोड में रहते हैं। इससे ऊपर से नीचे तक जवाबदेही पैदा हुई है।

वैसे भी सुरेश प्रभु की छवि भारतीय राजनीति में जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा हो, उस समय में भी एक ईमानदार जननेता की है। अत: सुरेश प्रभु के लिए कहा जा सकता है कि वे अपने उस वक्त के दौर से गुजर रहे हैं, जहां राजनीति में सुचिता का जीवन निर्वाह करना सबसे अधिक कठिन माना जाने लगा है। वस्तुत: यह भारतीय राजनीति के लिए भी सुखद पक्ष माना जा सकता है, क्योंकि सुरेश प्रभु जैसे लोग आज भी लोकतंत्र और राजनीति के प्रति जनमानस के चित्त में भरोसा कायम करने में सफल होते हैं। खासतौर से वह विश्वास यह है कि प्रजातंत्र में जनता का चुना हुआ प्रत्येक प्रतिनिधि उनके सुख- दु:ख के प्रति पूरी तरह जवाबदेह है, वह जनता का प्रधान या दूसरा, तीसरा, चौथा ही क्यों न हो, वह आखिर सेवक ही है।

साभार-http://viratpost.com/ से

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