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राहुल सांस्कृत्यायनः उस दुर्लभ ग्रंथ को पाने के लिए अपनी पत्नी को छोड़ आए

हिंदी के प्रख्यात जनकवि बाबा नागार्जुन ने राहुल सांकृत्यायन के बारे में लिखा था, ‘‘ हिंदी में एक ऐसा आदमी है जो किसान सभा का सभापति बनता है, जिसे प्रगतिशील लेखकों ने अपना पथ प्रदर्शक चुना और हिंदी साहित्य सम्मेलन भी अपना सभापति उसे बनाता है।’’

राहुल सांकृत्यायन हिंदी के पहले लेखक हैं जो आज़ादी की लड़ाई में जेल गए। प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी भी पिकेटिंग करते हुए गिरफ्तार हुईं और मैथिलीशरण गुप्त 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार हुए थे। लेकिन राहुल जी अपने जीवन काल में 7 वर्ष जेल में रहे। पहली बार असहयोग आंदोलन के दौरान, दूसरी बार 1925 में। पटना संग्रहालय के तब निदेशक के.पी. जायसवाल हुआ करते थे। उन्होंने राहुल जी को फटकारा “आप यही धरना देने, जेल जाने के लिए बने हैं आपको स्कॉलरली और विद्वतापूर्ण काम करना चाहिए।’’

1937 में के.पी. जायसवाल की मृत्यु के बाद राहुल जी स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में चले किसान आंदोलन में शामिल होते हैं। इसी वर्ष डोमिनियन स्टेटसस के तहत चुनावों में कांग्रेस को सरकार चलाने का अवसर मिलता है। 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना होती है।

राहुल जी के.पी. जायसवाल से थोड़ा डरते थे। वे उनको आंदोलन के बजाय बौद्धिक-वैचारिक काम को अधिक तरजीह देने के लिए थोड़ा कहा करते थे। के. पी. जायसवाल, राहुल के संबंध में बहुत ऊंची राय रखते थे। जब 1937 में के.पी. जायसवाल की मौत हो गयी तब राहुल जी पर रोक लगाने वाला कोई नहीं बचा। उसके बाद ही वे किसान आंदोलन में आये। बिहार के अमवारी में जब वो ईख के खेत में फसल काटने गए तो जमींदार के हाथी पर सवार गुमाश्ता ने उनको पीछे सिर पर मारा और उन्हें खून बहने डाला। इस पर मनोरंजन प्रसाद सिन्हा की मशहूर कविता है-

राहुल के सिर से खून गिरे,

फिर क्यों वह खून उबल न उठे,

साधु के सिर से शोणित बहे

फिर सोने की लंका क्यों न जल उठे

अंतिम दिनों में जब राहुल जी का स्मृति लोप हो गया था और वे ‘क’ और ‘ख’ में अंतर तक नहीं कर पाते थे तब दक्षिण पंथी लोग राहुल जी पर कटाक्ष किया करते कि गाय के मांस खाने का परिणाम है स्मृति लोप। जबकि इसका मेडिकल कारण जमींदार के कारिंदा के लाठी की सिर पर लगी वो पुरानी चोट थी। राहुल सांकृत्यान को अमवारी में कमर में रस्सा बांधकर ले जाया गया। ये तस्वीर उस समय के अखबारों में प्रकाशित हो गयी। तब कांग्रेस की सरकार थी। ये 1939 की बात है।

गांधी-नेहरू के स्तर के व्यक्ति को हमने अकादमिक कार्यों में लगा दिया : के.पी. जायसवाल

तब सोशलिस्ट अखबार ‘जनता’ के संपादक रामवृक्ष बेनीपुरी ने के.पी जायसवाल का राहुल जी पर पूर्व में लिखा आलेख पुनः प्रकाशित कर दिया। उस लेख में के.पी. जायसवाल ने राहुल जी को गांधी से अधिक जनप्रिय नेता बताया जिसकी तरफ जनता स्वाभाविक रूप से आकर्षित होती थी। जायसवाल जी ने राहुल जी को गांधी व नेहरू के समकक्ष का नेता बताते हुए खुद को दोष देते हुए कहा ‘‘ गांधी-नेहरू के स्तर के व्यक्ति को हमने अकादमिक कार्यों में लगा दिया। ये हमने क्या किया?’’ के.पी. जायसवाल ने तो राहुल जी की तुलना बुद्ध और ईसा से कर डाली थी। वो इस अर्थ में कि राहुल जी में प्रणिमात्र के प्रति, मनुष्य के प्रति जैसी करूणा व दया है वैसी हिंदुस्तान में किसी अन्य व्यक्ति के पास नहीं है।

रेडियो में कार्यक्रम देने अंग्रेज़ी में कॉन्ट्रेक्ट होने के कारण नहीं गए

हिंदी के प्रति राहुल सांकृत्यायन की प्रतिबद्धता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि वे रेडियो में कोई कार्यक्रम देने आजीवन सिर्फ इसलिए नहीं गए कि उसका कॉन्ट्रेक्ट पेपर अंग्रेज़ी में होता था। जब राष्ट्रभाषा का सवाल उठ खड़ा हुआ तो राहुल सांकृत्यान ने हिंदी-उर्दू मिश्रित हिंदुस्तानी जबान के बजाय हिंदी का समर्थन किया। वे कहा करते थे कि जो लोग आज हिंदुस्तानी जबान की पैरोकारी राजनीतिक कारणों से कर रहे हैं, वे हिंदी-मुसलमान की एकता चाहते हैं। जबकि वे हिंदी के इस कारण समर्थक थे कि हिंदी सबसे पुरानी जबान है। हिंदी 850 ईस्वी से बोली जाती है। उन्होंने सरहपा को ढूंढ निकाला। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना के लिए उन्होंने पुरानी मगही के सरहपा के दोहों का तिब्बती से हिंदी अनुवाद किया था। राहुल जी का मत था कि यदि हिंदी का आगे विकास बढ़ना है तो हिंदी की प्रमुख बोली ‘कौरवी’ को समझना होगा। उन्होंने एक दिलचस्प बात यह कही कि हिंदी के कथाकारों में जो अधूरा चरित्र-चित्रण मिलता है उसका मुख्य कारण है कौरवी भाषा न समझ पाना। इसलिए हमें वैसे साहित्यकार चाहिए जो लोटा-डोरी लेकर ‘कौरवी’ की तरफ जाएं। ताकि जो हिंदी की लोकोक्तियां हैं, मुहावरें हैं उसको समझ सके।

राहुल सांकृत्यायन लोकभाषाओं – मगही, भोजपुरी, मैथिली, ब्रज, अवधी, मालवी – के बड़े समर्थक थे। कम्युनिस्ट पार्टी की आलोचना यह करते हुए की, कि उसकी सबसे बड़ी कमजोरी रही वे लोग लोकभाषाओं में अपने साहित्य को नहीं ले गए। उन्होंने पांचवीं तक की शिक्षा मातृभाषा में शिक्षा देने की वकालत की थी क्योंकि बच्चा उस उम्र में लिपि नहीं समझ पाता।

सैर कर दुनिया के ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहां

राहुल जी यात्रा साहित्य के जनक थे। कहा जाता है कि उनके नाना सेना में थे जिनको घूमने की आदत थी। नाना उनकी नानी को जो कहानी सुनाया करते थे इससे उनको प्रेरणा मिली। बचपन में सुने गए एक शेर ने भी उन्होंने घुमक्कड़ी के लिए प्रेरित किया।

सैर कर दुनिया के ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहां

ज़िंदगानी फिर रही तो नौजवानी फिर कहां

इन पंक्तियों ने राहुल जी को इतना प्रेरित किया कि वो घर से मात्र 11 साल की उम्र में भागे। भागने के बाद आर्यसमाजी बने। छपरा के परसा मठ के महंथ बने। उस वैष्णव मठ में उनका नाम हुआ ‘ राम उदार दास’। फिर वे बौद्ध बने, फिर उसे भी छोड़ मार्क्सवादी बने। ये उनकी वैचारिक यात्रा थी।

परसा मठ से उनका मोहभंग हुआ क्योंकि जिन साधु-संन्यासी लोगों के बीच रहा करते थे, ये लोग खुद को त्यागी-तपस्वी कहा करते थे। राहुल जी कहते हैं कि “ ये साधु-संन्यासी रसगुल्ले और लड्डू के लिए आपस में मारपीट और हिंसा तक उतारू हो जाया करते थे।’’ उसके बाद आर्यसमाज की तरफ उनका झुकाव हुआ। जब वे लाहौर में थे उसी समय गांधी जी ने ‘रॉलेट एक्ट’ के खिलाफ अपमान दिवस का आह्वान किया तa राहुल जी भी आंदोलन में कूद पड़े। इसी दरम्यान वो बौद्ध धर्म के प्रभाव में भी आने लगे।

उसके बाद राहुल सांकृत्यान लगातार घूमते हैं उनकी एक किताब ही है ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ । कहा जाता है कि बुद्ध छह साल तक घूमे, महावीर बारह साल तक और नानक इक्कीस साल तक। महात्मा गांधी ने भी आंदोलन प्रारंभ करने के पूर्व , गोखले की सलाह पर, पूरे देश का भ्रमण किया। राहुल सांकृत्यायन ने घुमक्कड़ी के बारे में कहा है ‘‘जो घूमता नहीं है वो तार्किक नहीं हो सकता, वो उर्ध्वगामी नहीं हो सकता, वो मानवीय नहीं हो सकता। इसलिए हे भावी घुमक्कड़ों सारी दुनिया तुम्हारा बाहें फैलाये तुम्हारा इंतजार कर रही है।’’

‘प्रमाणवार्तिक’ की खोज

घूमते-घूमते पहुंचे तिब्बत। तिब्बत का कौन सा रास्ता उन्होंने अपनाया? जिस रास्ते को कठिन चढ़ाई के अभ्यस्त नेपाली लोग भी सकुचाते रहे वैसे दुर्गम व मुश्किल रास्ते को अपनाया। उन्होंने तिब्बत की चार यात्रायें की। कहा जाता है अंतिम यात्रा में उन्हें कुछ नहीं मिला। लेकिन तीन यात्राओं में उन्होंने एक ऐसा ग्रंथ खोजा ‘प्रमाणवार्तिक’ जो नालंदा विश्विद्यालय जलाये जाने के बाद, यानी ग्यारहवीं सदी से, भारत में अनुपलब्ध था। नालंदा विश्विद्यालय जलने के दौरान कुछ बौद्ध लोग जो कुछ महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ व सामग्री लेकर तिब्बत भागे उसमें ‘प्रमाणवार्तिक’ भी था। इसके रचनाकार थे महान दार्शनिक धमकीर्ति। इस बहुमूल्य ग्रंथ को सारी दुनिया के विद्वान ढ़ूंढ रहे थे। ये ग्रंथ वैसे तो मूल संस्कृत में था पर संस्कृत में नष्ट हो जाने के कारण तिब्बती भाषा में मौजूद था। इस ग्रंथ के लिए राहुल जी की बेचैनी इस हद तक थी कि जिस मंगोलियन स्कॉलर महिला एलेने रोब्सकाया से उन्होंने रूस में विवाह किया था, विवाह के मात्र 23 दिन बाद उसे छोड़ कर चले गए थे क्योंकि पहली यात्रा में उन्हें उस ग्रंथ का आधा हिस्सा ही मिल पाया था। लेकिन इस यात्रा में उन्हें पूरा मूल ग्रंथ ही मिल गया। ज्योंहि ‘प्रमाणवार्तिक’ मिला, सारी दुनिया में हंगामा हुआ कि ‘प्रमाणवार्तिक’ को ढ़ूंढ़ निकाला गया। इस ग्रंथ पर अंतराष्ट्रीय सम्मेलन करने की बात हुई। एक जापानी विद्वान ने राहुल जी बारे में टिप्पणी की ‘‘ राहुल सांकृत्यायन और कुछ न करते तो भी सिर्फ इस खोयी हुई किताब को खोजने के लिए उनका धन्य मानना चाहिए।’’

उस ग्रंथ को खोजने के लिए पूरी दुनिया के जर्मन, फ्रेंच भाषा के भारतविद् विद्वान तिब्बती लोगों के संपर्क में थे। लेकिन सफलता मिली राहुल जी को। उसकी प्रमुख वजह थी कि राहुल जी ने खुद को तिब्बती जनजीवन से, उनके रहन-सहन, भाषा से खुद को जैसा एकाकार किया वैसा दूसरे विद्वान नहीं कर पाया थे। राहुल जी ने तिब्बती सीखी यहां तक कि तिब्बती-हिंदी शब्दकोश भी बनाया। ‘प्रमाणवार्तिक’ के रचनाकार धर्मकीर्ति के विषय में राहुल जी ने ‘वोल्गा से गंगा’ में लिखा है, ‘‘अंधकार में एक व्यक्ति अंगारे फेंक रहा है और उसका नाम है धर्मकीर्ति।’’ प्रमाणवार्तिक में कहा गया है कि प्रमाण क्या है? प्रमाण क्या है? प्रत्यक्ष जो दिखता है वो प्रमाण है? या अनुमान प्रमाण है? भारत के कई सौ वर्षों तक चले इस दार्शनिक वाद-विवाद में भौतिकतावादी दार्शनिक की भाववादी दर्शन से जो पराजय हुई उसमें इस अनुमान या अनुमति का बहुत बड़ा योगदान है। जैसे भौतिकवादी कहते थे कि आत्मा दिखती तो है नही तो कैसे मान लें? भाववादी लोग कहते थे कि भले प्रत्यक्ष में कई चीजें नहीं दिखती लेकिन उसकी मौजूदगी से इंकार नहीं किया जा सकता। जैसे आप कहीं धुआं देखते है तो अनुमान लगाते हें कि वहां आग है भले आपने आग देखी न हो। आप आग तो देखते नहीं है फिर भी आप अनुमान लगाते हैं। उसी प्रकार आत्मा भले प्रत्यक्ष न दिखे उसकी उपस्थिति से हम इंकार नहीं कर सकते। ‘प्रमाणवार्तिक’ इस प्रश्न को उठाता है कि सच तक पहुंचने की आपकी पद्धति कितनी प्रमाणिक है।

ईश्वर के अस्तित्व से इंकार

राहुल जी बुद्ध के पास गए तो उसका मुख्य आकर्षण था ईश्वर के अस्तित्व से इंकार। बल्कि उन्होंने यहां तक कहा कि ‘‘ बौद्ध धर्म को दूसरे धर्मों से जो चीज भिन्न बनाती है वो है ईश्वर के अस्तित्व से पूरी तरह इंकार। ईश्वर के आगे-पीछे तो बड़े-बड़े दर्शन खडे़ किए गए, बड़े-बड़े पोथे लिखे गए। दुनिया के सारे धर्म दूसरी बातों में आपस में कट मरें पर ईश्वर, महोवा या अल्लाह के नाम पर सभी सिर नवाए और अक्ल बेच खाने को तैयार हैं। सिर्फ बौद्ध ही ऐसा धर्म है जिसमें ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। ईश्वर से मुक्ति पाए बगैर बुद्धि पूरी तरह मुक्त नहीं होती।’’

राहुल जी का यह प्रसिद्ध कथन है ‘‘ बुद्ध और ईश्वर साथ-साथ नहीं रह सकते। प्रत्यक्ष से इतर किसी अदृश्य ताकत को मैं नहीं मानता।” यही चीज राहुल जी को बुद्ध में सबसे अधिक पसंद थी। ये किताब बेहद महत्वपूर्ण है इस किताब को बाइस खच्चरों पर लाद कर, अठारह हजार फीट की ऊंचाई पर, उनको टायफायड होने के बावजूद वो तिब्बत से लाद कर सारी सामग्री ले आये। वो सारी सामग्री आज पटना संग्रहालय में रखी है।

देखिए क्या दुर्भाग्य है देश का जो आदमी बाइस खच्चरों पर लाद कर ले आए लेकिन जब बाद में वे उन सामग्रियों का इस्तेमाल करना चाहते थे तो उनको इजाजत नहीं दी गयी थी। तिब्बत यात्रा की कठिनाइयों से भरी खतरनाक यात्रा के संबंध में राहुल जी के साथ रहे फोटोग्राफर फेनी मुखर्जी ने कहा है ‘‘ भारतवासियों के लिए तिब्बत एक बहुत ही रहस्यपूर्ण देश है जहां का वातावरण एवं रहन-सहन हमारे देश से भिन्न है। यहां सबसे अधिक ध्यान अपनी प्राण रक्षा की ओर रखना पड़ता है। जरा सी भूल-चूक में यहां मिनटों में आदमी की जान चली जाती है।’’

राहुल जी पर लिखे अपने संस्मरणों में फेनी मुखर्जी अक्सर राहुल जी के साथ होने वाले बहसों का जिक्र करते हुए बताते हैं कि ‘‘ राहुल जी अमूमन कहा करते थे कि भारत की तरक्की के दो ही रास्ते हैं गाय का गोश्त खाओ और लाल झंडा उठाओ।’’

विचार पर उतरने के लिए है, ढोने के लिए नहीं

तिब्बत में राहुल सांकृत्यायन को बुद्ध के ‘मज्झिम निकाय’ की ये पंक्तियां मिली तो उछल से पड़े कि यही तो पंक्तियां थी जिसको मैं ढूंढ रहा था।

कल्लुपम देसेस्यामि भुक्खम धम्म

तरूणोत्थाय नो गृहनोत्थाय

( ‘हे भिक्षुओं मैं तुम्हें ये छोटी सी नौका दे रहा हूं, पार उतरने के लिए, पार उतरने के बाद उसे ढोने के लिए नहीं।’ )

राहुल जी पर ये आरोप लगाया जाता था कि वे एक जगह स्थिर नहीं रहते कभी आर्यसमाज, कभी परसा मठ, कभी बौद्ध और अंततः मार्क्सवादी। वैचारिक रूप से कभी स्थिर नहीं रहते एक जगह। जबकि राहुल जी के अनुसार जो विचार पुराने पड़ जाएं उसे छोड़ते हुए आगे बढ़ते जाना है।

इसी से मिलती-जुलती पंक्तियां रवींद्र नाथ ठाकुर ने भी बंग्ला में लिखी हैं-

ठाईं नाईं, ठाई नाईं, छोटो ये तरी

आमारि सोनारी गाछि गिए छी भरी

(‘यानी हमारी नौका बहुत छोटी है, सोने के धान से भरी हुई फालतू चीजों के लिए इस नाव में जगह नहीं है। यानी जो सबसे कीमती विचार है हम उसे ही ढोकर ले जायें बेकार चीजों के लिए जगह नहीं है।’)

जातिवाद के कारण भारत गुलाम बना

जातिवाद से भारत को हुए घातक नुकसान के संबंध में राहुल जी ने सटीक बहादुर हेमचंद का उदाहरण दिया है। हेमचंद शेरशाह के वंशजों में था वो लगभग गद्दी पर बैठ गया था। जिसको हेमू भी कहा जाता है, जिसकी आंख में तीर लगा था। लोग कहने लगे ये तो बनिया है, बनिया कैसे हमलोगों पर शासन करेगा? राहुल जी सोचने को विवश करते हुए पूछते हैं कि आखिर क्यों नेपाल 1814 तक गुलाम न हुआ, बर्मा 1874-75 तक गुलाम न हुआ, अफगानिस्तान आज तक गुलाम नहीं हुआ है। भारत क्यों ग्यारवीं सदी में ही गुलाम हो गया? क्योंकि आप जाति-पाति में बॅंटे थे, आपस में लड़ते रहते थे एक दूसरे के खिलाफ। ये बहुत बड़ी सीख है जो उन्होंने इतिहास से सीखने के संबंध में की।

“कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बने बगैर मेरी मृत्यु हो जाती तो मेरा दुभार्ग्य होता”

राजनीतिक जीवन में राहुल जी के कम्युनिस्ट पार्टी में आने का रास्ता वही था जो सुंदरैया, ई.एम.एस नंबूदिरीपाद आदि का रास्ता था। यानी पहले कांग्रेस, फिर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और अंत में कम्युनिस्ट पार्टी। बाद में कम्युनिस्ट पार्टी से भी उनका मतभेद हुआ। रूस प्रवास के ढाई साल बाद लौटे और भगवान दास जैसे बड़े दिग्गज को पराजित कर हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष बने। अध्यक्ष के रूप में उनका भाषण, जो हिंदी भाषा और इस्लाम के ऊपर था, कम्युनिस्ट पार्टी से अलग होने का कारण बना। लेकिन बाद में उन्होंने यह भी कहा कि “कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बने बगैर मेरी मृत्यु हो जाती तो मेरा दुभार्ग्य होता।”

राहुल जी को भारत में कहीं भी प्रोफेसर नहीं बनाया गया

इतने बड़े विद्वान के साथ देश ने क्या सलूक किया। जो छत्तीस भाषायें जानता था जिसने डेढ़ सौ से अधिक किताबें लिखीं लेकिन हिंदुस्तान के किसी एक विश्वविद्यालय ने उनको प्रोफेसर बनाना तो दूर उनको एक लेक्चर देने तक के लिए आमंत्रित नहीं किया। उनको प्रोफेसर बनाया गया श्रीलंका के विद्यालंकर विश्विद्यालय में और रूस में। रूस में राहुल जी को जोसेफ स्टालिन के काल में प्रोफेसर बनाया गया था। अपने रूस प्रवास के संबंध में राहुल जी कहते हैं कि ‘रूस में हम पर रुपयों की बरसात होती थी।’ संस्कृत और भारतविद् के रूप में वहां उनको तमाम सुखःसुविधायें प्रदान की जाती थीं।

हमारे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू, राहुल जी के बारे में कहा करते थे कि ‘‘आखिर हमारे विश्विद्यालय राहुल सांकृत्यान सरीखे विद्वान क्यों नहीं पैदा करते?’’ लेकिन आज़ादी के बाद जब राहुल जी को चीन जाने की इच्छा हुई तो उन्होंने राजेंद्र बाबू को लिखा कि हम चीन जाकर माओ से मिलना चाहते हैं। राजेंद्र बाबू ने पत्र नेहरू के पास भेज दिया। नेहरू ने उनको चिट्ठी लिखी कि पासपोर्ट वगैरह बनवा दीजिए लेकिन ज्यादा मदद नहीं करिएगा। ये नेहरू का कथन था।

बिहार के वयोवृद्ध वामपंथी नेता गणेश शंकर विद्यार्थी ने राहुल जी के संबंध में बताया था ‘‘ हमलोग पटना विश्विद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर के पास राहुल जी जैसे महापंडित को पढ़ाने देने का आग्रह लेकर गए तो उन्होंने टके सा जवाब दे दिया कि उनके पास जब डिग्री नहीं है तो कैसे पढ़ाने का अवसर मिल सकता है? जबकि डिग्री के बगैर, वहीं, शिवपूजन सहाय को पढ़ाने दिया गया था।’’

हम लोग एक गीत गाया करते थे-

तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत में यक़ीन कर,

अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर’

राहुल सांस्कृत्यान कहा करते ‘तुम अगर पृथ्वी पर स्वर्ग बना दो तो आकाश का स्वर्ग, खुद ब खुद, ढह जाएगा।’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

साभार- https://mayday.leftword.com/से

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