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राफेल पर न्यायालय के फैसले का सम्मान हो

राफेल सौदे पर उच्चतम न्यायालय के फैसले पर राजनीति पार्टियां और बौद्धिक तबका जिस तरह क्रूर अट्टहास कर रहा है उससे अगर अंदर से उबाल पैदा होती है तो कलेजा भी फट रहा है। यह कैसा देश है जहां उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियां ही नहीं, उसकी भावनाओं को भी अपनी दुर्भावना और नफरत से रौंदा जा रहा है। फैसला आने के एक घंटे के अंदर ही इसके विरोध में प्रतिक्रियाओं की जिस तरह से बाढ़ आ गई वह विस्मित कर रहा था। यह भारत है, जहां राजनीति अब मर्यादाओं को रौंदने का ही पर्याय हो गया है। कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने इन शब्दों के साथ न्यायालय को नकारा कि हमने पहले कहा था कि राफेल की जांच की जगह उच्चतम न्यायालय नहीं, संयुक्त संसदीय समिति है, शाम को राहुल गांधी ने अपनी पुरानी भाषा और तेवर कायम रखने का साफ संकेत दे दिया। प्रधानमंत्री को जैसे ही उन्होंने चोर कहा उसके बाद तो कोई सीमा रहने की गुंजाइश ही नहीं बची थी।

क्या परिदृश्य है! फैसले की एक, दो या तीन पंक्तियां उद्धृत कर अजीब अर्थ निकाले जा रहे हैं। अब तो कोष्ठक में दिए गए कैग और लोक लेखा समिति संबंधी एक वाक्य को सबसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश हो रही है। उसमें आधी बात तो सही है कि कैग के साथ इसका मूल्य शेयर किया गया है। हां, लोक लेखा समिति ने इसका परीक्षण नहीं किया है लेकिन यह टाइप की गलती लग रही है। वैसे भी न्यायालय के यह फैसले का यह आघार नहीं है। कोई कह रहा है कि न्यायालय ने अपनी सीमायें बता दी हैं तो कोई यह कि उसने कह दिया कि मूल्य की समीक्षा करना न्यायिक सीमा में है ही नहीं। इसके समानांतर उच्चतम न्यायालय का फैसला सुस्पष्ट, याचिका में लगाये गये आरोपों, उसके पक्ष में दिये गये साक्ष्यों और तर्कों का उत्तर तथ्यों के साथ दिया गया है। क्या उच्चतम न्यायालय तीन याचिकाओं में लगाये गये आरोपों से जुड़े तथ्य सरकार से मांगने के बाद बिना जांच-परख के मामला खारिज कर देगा? जो भी राजनीतिक दुराग्रहों से अलग रखकर फैसले को पढ़ेगा वह राफेल सौदे को लेकर संतुष्ट हो जायेगा।

न्यायालय की भाषा देखें तो फैसले के साथ उसमें विवाद करने वालों से परोक्ष अपील भी है कि रक्षा तैयारियों का ध्यान रखते हुए राफेल सौदे की चीड़फाड़ न करें, यह देश के हित में नहीं होगा। यह पंक्ति फैसला में नहीं है, पर भाव यही है। 29 पृष्ठों के फैसले में न्यायालय ने 18 वें पृष्ठ यानी 22 वें पाराग्राफ से निष्कर्ष देना आरंभ किया है। उसके पहले के पृष्ठों में याचिकाओं की अपीलें तथा अपनाई गई न्यायिक प्रक्रिया, रक्षा सौदे की प्रक्रियाओं, सरकारी निविदाओं और सौदों पर आये न्यायालयों के फैसलों को उद्धृत किया गया है।

राफेल सौदे को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चोर कहने वाले राहुल गांधी तीन बातें उठाते रहे हैं और याचिकाओं में भी यही था। ये हैं, खरीद प्रक्रिया का पालन न होना, ज्यादा दाम दिया जाना, अनिल अंबानी की रिलायंस कंपनी को गलत तरीके से ऑफसेट का लाभ मिलना तथा हिन्दुस्तान ऐरानॉटिक्स लिमिटेड या एचएएल को ऑफसेट से बाहर करना। अंतिम पैरा नं 34 में न्यायालय ने लिखा है कि इन तीनों पहलुओं पर हमारी प्राप्तियों के आलोक में तथा पूरे मामले पर विस्तार से सुनवाई करने के बाद हमें ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि न्यायालय भारत सरकार द्वारा 36 रक्षा लड़ाकू विमानों की खरीद के संवेदनशील मुद्दे में अपीलीय प्राधिकारी बनकर हस्तक्षेप करे।

क्या उच्चतम न्यायालय बिना तथ्यों की परख किये ही ऐसा स्पष्ट निष्कर्ष दे दिया है? इसमें यह भी लिखा है कि व्यक्तियों की बनाई गई धारणा न्यायालय के लिए ऐसे मामलों में जांच कराने का आधार नहीं बन सकता। यहां न्यायालय ने अंग्रेजी में फिशिंग एंड रोविंग एन्क्वायरी शब्द का प्रयोग किया है। तो याचिकाकर्ताओं को आइना दिखाया गया है कि आपने जो धारणा बना ली है वह सच नहीं है। ध्यान रखिए, इन याचिकाओं में न्यायालय की देखरेख में मामले की विशेष जांच दल यानी सिट से जांच कराने की अपीलें भी शामिल थीं। न्यायालय का तर्क यही है कि इसमें जांच कराने की आवश्यकता नहीं है। अंतिम निष्कर्ष को उद्धृत करने का हेतु इतना स्पष्ट करना है कि यह प्रचार गलत है कि न्यायालय ने इसमें अपने अधिकारों की सीमायें बता दी हैं।

अब तीनों पहलुओं पर न्यायालय का मत। सबसे पहले खरीद प्रक्रिया। 22 वें पैरा में न्यायालय लिखता है कि हमने सभी सामग्रियों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया है। वायुसेना के उच्चाधिकारियों से भी न्यायालय में खरीद प्रक्रिया से लेकर मूल्य निर्धारण सहित सारे पहलुओं पर सवाल पूछे हैं। हम संतुष्ट हैं कि खरीद प्रक्रिया पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है और यदि थोड़ा व्यतिक्रम हो भी तो यह सौदे को रद्द करने या न्यायालय द्वारा विस्तृत छानबीन का कारण नहीं बनेगा। इसमें बिना नाम लिये कांग्रेस को भी जवाब है कि पहले से सौदे पर चल रही बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची थी और यह सही नहीं होगा कि न्यायालय पूरी खरीद प्रक्रिया के प्रत्येक पहलू की संवीक्षा के नाम पर उसे रोक दे। खासकर तब जबकि हमारे विरोधी चौथी और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान प्राप्त कर चुके हैं।

मूल्य के बारे में न्यायालय ने बताया है कि यह कई कारणों से संवेदनशील पहलू है। पहले हमने इसे न देखने का सोचा लेकिन संतुष्ट होने के लिए मांग कर उसकी ध्यानपूर्वक जांच की, जिसमें मूल विमान तथा उसमें लगाये जा रहे शस्त्रास्त्रों, एक-एक उपकरणानुसार तथा दूसरे विमानों से तुलनात्मक मूल्यों का विवरण भी शामिल है। फिर न्यायाल का निष्कर्ष है कि इस सामग्री को गोपनीय रखना है इसलिए हम इस पर ज्यादा नहीं कह सकते। इसी के पहले उसने कहा है कि यह न्यायालय का काम नहीं है कि हम इस तरह के मामलों में मूल्यों की विस्तार से तुलना करे। इस पंक्ति का उल्लेख कर बताया जा रहा है कि न्यायालय ने कहा है कि हम मूल्यों की जांच कर ही नहीं सकते। यह गलत और शर्मनाक व्याख्या है।

अब आएं सबसे ज्यादा विवाद को विषय बनाये गये ऑफसेट साझेदारी पर। इस पर न्यायालय ने सबसे ज्यादा करीब छः पृष्ठ एवं सात पैराग्राफ खर्च किया हैं। रिलायंस पर विस्तार से बात करते हुए न्यायालय कह रहा है कि हमें रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस तथ्य नहीं मिला जिससे लगे कि यह भारत सरकार द्वारा किसी पार्टी के पक्ष में वाणिज्यिक पक्षपात का मामला है। रक्षा ऑफसेट गाइडलाइन्स 2013 को उद्धृत करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि यह दस्सॉल्ट एवं भारतीय कंपनियों के बीच का वाणिज्यक मामला है और इसे वहीं रहने दिया जाए। यह तय करना हमारा काम नहीं है कि इनकी साझेदारी तकनीकी तौर पर व्यावहारिक है या नहीं। बात ठीक भी है। कोई कंपनी गंवाने के लिए तो अपना निवेश नहीं करेगी।

वैसे भी राफेल विमान दस्सॉल्ट का अकेला उत्पाद नहीं है। यह चार कंपनियों की साझेदारी है जिसमें राफेल का हिस्सा 40 प्रतिशत है। इस 40 प्रतिशत हिस्सा वाली कंपनी ने भारत में अब तक 72 कंपनियों के साथ साझेदारी पर हस्ताक्षर कर लिया है जिसमें से रिलायंस एरोनॉटिक्स एक है। स्वयं दस्सॉल्ट को ही 30 हजार करोड़ रुपया सौदे से नहीं मिलना है तो रिलायंस को साझेदारी में इतना कहां से आ जाएगा? ऑफसेट की बाध्यता तीन साल तक नहीं होती। उसके पहले उसने किसी के साथ साझेदारी करके काम आरंभ किया है तो यह उसका अधिकार है। एचएएल के बारे में न्यायालय ने पाया है कि दस्सॉल्ट की इसके साथ साझेदारी की बातचीत किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रही थी। एचएएल भारत में विमानों के निर्माण में दस्सॉल्ट द्वारा तय मानव घंटों से 2.7 गुणा ज्यादा समय मांग रहा था। वह कम समय में काम पूरा करना चाहता था। मोदी सरकार ने नए सिरे से बातचीत के लिए जो इंडियन निगोसिएशन टीम या आईएनजी बनाई उसने मई 2015 से अप्रैल 2016 तक कुल 74 बैठकें हुईं जिसमें 26 फ्रांसीसी पक्ष के साथ थी। तब तक चीन की रक्षा तैयारियों को देखते हुए चौथी एवं पांचवीं पीढ़ी के रुप में विमान की जरुरत थी। उसके हिंसाब से कीमत तय हुई।

इन सबकी यहां विस्तार से चर्चा संभव नहीं। न्यायालय के फैसले का सीधा अर्थ यही है कि राफेल सौदे को लेकर लगाये जा रहे आरोप पूरी तरह तथ्यों की गलत जानकारी या व्याख्या, झूठ और नासमझी पर आधारित तथा देशहित के विरुद्ध है। न्यायालय तथ्यों और नियमों के आलोक में ही किसी मामले पर अपना मत दे सकता है। आप इसे भ्रष्टाचार का मामला मानते हैं इसलिए न्यायालय भी स्वीकर कर ले ऐसा तो नहीं हो सकता। कायदे से न्यायालय के मत का सम्मान होना चाहिए। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि न्यायालय द्वारा विस्तार से आरोपों का जवाब देने तथा इशारों से यह समझाने के बावजूद कि रक्षा चुनौतियों को देखते हुए राफेल सौदे में मीन-मेख निकालना उचित नहीं है, विरोधी अपना क्रूर हमला बंद नहीं कर रहे।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208



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