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लखनऊ में रीता जैन के उपन्यास ‘काला सूरज’ का विमोचन

लखनऊ। रीता जैन द्वारा लिखित संस्मरणात्मक उपन्यास काला सूरज का विमोचन गोमती नगर स्थित आई एम आर टी कालेज में हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व पुलिस महानिदेशक महेशचंद्र द्विवेदी ने की। मुख्य अतिथि सिटी मांटेसरी स्कूल के प्रबंधक और शिक्षाविद जगदीश गांधी थे। सम्मानीय अतिथि आई एम एम आर टी के संस्थापक डी आर बंसल थे। विश्रुत मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम विश्रुत के जन्म-दिन के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया। सिंगापुर में शानदार कैरियर वाले विश्रुत दर्जनों निर्धन बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और रहने का खर्च उठाते थे।ख़ास कर निर्धन लड़कियों का।कई सारे बच्चे डाक्टर, इंजीनियर और अन्य सेवाओं में आ गए हैं। विश्रुत डाक्टर ए के जैन और रीता जैन के सुपुत्र हैं। तीन साल पहले अपने संरक्षण में विकसित हो रही लड़कियों से मिलने काठमांडू गए थे, तो वहीं दिल का दौरा पड़ने से उन का निधन हो गया। विश्रुत के कई सारे और भी सामाजिक सरोकार थे। जिसे अब डाक्टर ए के जैन और रीता जैन विश्रुत मेमोरियल ट्रस्ट बना कर जारी रखे हुए हैं।अपने इन्हीं संघर्ष और जद्दोजहद को आधार बना कर रीता जैन ने काला सूरज उपन्यास लिखा है।

काला सूरज के विमोचन के अवसर पर मुख्य वक्ता और विशिष्ट अतिथि दयानंद पांडेय ने कहा कि महादेवी वर्मा और शिवानी ने भी कई संस्मरणात्मक कहानियाँ लिखी हैं।पर रीता जैन का यह उपन्यास दुःख को विगलित करने के लिए लिखा गया है। इस उपन्यास में पठनीयता बहुत है। चुंबक है जैसे इस में। इस नाते इसे एक सिटिंग में भी पढ़ा जा सकता है। उन्हों ने कृष्ण बिहारी नूर का एक शेर कोट करते हुए कहा कि, मैं तो तेरी याद में चुपचाप बैठा था/ घर के लोग कहते हैं कि सारा घर महकता था।विश्रुत की याद हमारे बीच उसी तरह महक रही है। उन्हों ने कहा कि श्रवण कुमार की कहानी हम ने बहुत सुनी है पर मीरा की तरह दीवानी बेटे को गाती मां हम अब देख रहे हैं रीता जैन के इस उपन्यास में। ऐसे माता-पिता हम ने और नहीं देखे जो अपने पुत्र के प्रेम में इस कदर सामाजिक सरोकार में समर्पित हो जाएं। उन्होंने कहा कि इस उपन्यास के सभी पात्र विश्रुत और उनके आत्मीय जन हैं तथा स्वयं दयानंद जी साढ़े तीन दशकों से उनके परिचित और आत्मीय रहे हैं। मुख्य वक्ता दयानंद ने इस कृति को विश्रुत के सुनहरे सपने की चमक की कथा बताया है।

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की प्रधान संपादक अमिता दुबे ने कहा कि रीता जैन ने अपने पुत्र विश्रुत की स्मृति को समर्पित उपन्यास काला सूरज रच कर जीवन से मृत्यु की ओर जाने वाले निराशा के मार्ग को सृजनात्मकता से आशा की ओर मोड़ने का सुंदर प्रयास किया है।यह उपन्यास ममत्व की पराकाष्ठा का चित्रांकन है। विशिष्ट अतिथि डा अमिता दुबे ने कहा कि रीता जी ने अपनी रचना के माध्यम से व्यक्ति से समष्टि की ओर ले गयीं। अपने वक्तव्य का अंत उन्होंने रीता जी की इसी कृति की एक कविता प्रस्तुति तथा अपनी कविता ” जो चले गये ,उनका कोई पता बताये ,ऐसा मन करता है” से किया।

विशिष्ट अतिथि अलका प्रमोद ने कहा कि लेखिका ने इस कृति की रचना कर एक साथ कई लक्ष्य साधे हैं।एक ओर कृति के माध्यम से विश्रुत को अमर कर दिया, समाज को उसके मानवता को समर्पित विचारों के बारे में बता कर प्रेरित किया, अपने असह्यय दुख को निसृत करने की राह दी तथा ऐसे भुक्त भोगी लोगों को जीवन में सकारात्मक रहने की प्रोत्साहित किया।अलका प्रमोद ने भी उनकी रीता जी की कृति से एक कविता प्रस्तुत की तथा अपनी इन पंक्तियों से वाणी को विराम दिया-“जीवन तो आना जाना है,जो सुख दुख हो सह जाना ,आगत का स्वागत ही विधि है,नवसंचार ही जीवन निधि है….”

मुख्य अतिथि जगदीश गांधी ने विश्रुत, जो उनके ही स्कूल के छात्र थे, का स्मरण करते हुए उनके अभिभावकों द्वारा दिये गये सुसंस्कारों को सराहा और कहा “बच्चे में संस्कार तो माता-पिता देते हैं हम तो उसके बाद ही कुछ सिखाते हैं।” महेशचंद्र द्विवेदी ने काला सूरज की कथा को रेखांकित करते हुए पुस्तक के कुछ अंश प्रस्तुत करते हुए लेखिका की कृति के लिये भूरि-भूरि उनकी प्रशंसा की। महेशचंद्र द्विवेदी ने काला सूरज की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सूरज, तारे वास्तव में काले ही होते हैं।

डाक्टर ए के जैन ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए काला सूरज शीर्षक को कवर दिखाते हुए रेखांकित करते हुए कहा कि सूरज काला ज़रूर है पर पर उस का प्रकाश सुनहरा है।मेरा पुत्र चला गया, यह हमारे जीवन का काला पक्ष है।पर उस की याद और उस के काम सुनहरा पक्ष है। अतिथियों का स्वागत डा अरुण जैन ने , वंदना प्रस्तुति वी एम सी टी के छात्र एवं छात्राओं ने तथा कुशल संचालन अंजना मिश्र ने किया।

विश्रुत जैन के जन्मदिन के पावन अवसर पर , उनकी स्मृति में यह कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें उनके माता-पिता रीता जैन और डाक्टर अरुण जैन सहित सभी ने उनको स्मरण करते हुए श्रद्धासुमन अर्पित किये और उनके संस्मरणों पर आधारित लोकार्पित कृति “काला सूरज” पर चर्चा की। इस अवसर पर डा पी. आर. मिश्रा ,रत्ना कौल, साधना जग्गी, कुंजश्री आदि अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे।

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