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इस घर में जीवित है खान-पान की सनातन संस्कृति

प्लास्टिक के अंधाधुंध बढ़ रहे उपयोग के बारे में समय-समय पर बहुत सारी बातें कही जाती हैं। प्लास्टिक हानिकारक है, यह बात सब जानते हैं, मानते भी हैं।विज्ञान द्वारा भी प्रमाणित हो चुका है कि प्लास्टिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार से शरीर के लिए हानिकारक है।

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने हमें यह सीखाया है कि “समस्या नहीं समाधान की चर्चा करनी चाहिए”।

अतः इस पोस्ट में प्लास्टिक से होने वाले नुकसान की चर्चा की बजाय समाधान की दिशा में हुए एक प्रयास का उल्लेख कर रहा हूं।
पिछले दिनों एक लंबी अवधि तक कर्णावती (अहमदाबाद ) में रहने का अवसर मिला। इस दौरान धर्म शास्त्रों के ज्ञाता ,मौलिक चिंतक आदरणीय शास्त्री जी जयंतीलालजी पानेरी जी के यहां जाने का शुभ अवसर मिला।

मंदिर -गुरुकुल -आश्रम -घर, इन चारों का एक साथ सम्मिलित स्वरूप है उनका निवास। सघन वृक्षारोपण, गौमय से बना हुआ सुंदर हवन कुंड, प्रतिदिन यज्ञ करने की परंपरा, सुंदर सुगंधित पुष्पों और लताओं के बना हुआ अध्ययन कक्ष और पुस्तकालय, अद्भुत और दिव्य बैठक कक्ष ।हमे भी आदरणीय शास्त्री जी के यहां पंच देव अथर्वशीर्ष के मंत्रों के साथ यज्ञ करने का सौभाग्य मिला। 73 प्रकार के पदार्थों से बनी यज्ञ सामग्री, शुद्ध मंत्रोच्चार , हल्का मधुर संगीत, यज्ञाग्नि से प्राप्त हो रही तपन..

अद्भुत अनुभूति। और भी अनेक विशेषताएं। घर के हर कोने में भारतीय ज्ञान परम्परा का साक्षात्कार।
इन सब विशेषताओं में भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है उनका रसोईघर और भोजन कक्ष।
सब प्रकार के परंपरागत बर्तनों से अलंकृत रसोईघर। सारे बर्तन पीतल , तांबा और कांसा के।प्लास्टिक तो छोड़िए रसोई घर में स्टील का भी बिल्कुल उपयोग नहीं है। पीतल और कांसे के बर्तन केवल सजाने के लिए नहीं रखे हैं बल्कि उनका दैनिक उपयोग होता है। भोजन निर्माण एवं भोजन सेवन इन्हीं तांबे कासे और पीतल के बर्तनों में होता है।
अब यह मत कह देना कि यह एक महंगा शौक है क्योंकि कुछ वर्षों पहले तक हम सभी के घर में ऐसे बर्तन उपलब्ध थे।
प्लास्टिक और स्टील के आकर्षण में हमने स्वयं इन बर्तनों को “घर निकाला” दे दिया। इन धातु के बर्तनों की साफ सफाई में विशेष प्रयास करना पड़ता है, परिश्रम करना पड़ता है।आलस्य और प्रमाद वस यह सारे स्वास्थ्यवर्धक बर्तन हमारे घरों से एक-एक कर कम होते चले गए। इन बर्तनों को मिट्टी से, नींबू, इमली, दही आदि खटाई से धोना पड़ता है, इतना परिश्रम कौन करे, इसलिए परिवारों ने भंगार में इन बर्तनों को बेचा है।

अब जागृति आ रही है, तो धातु के बर्तनों का महत्व बढ़ रहा है।
खैर जब जागो तब सवेरा।

आदरणीय शास्त्री जी के परिवार से प्रेरणा लेकर हम सभी अपने घर को प्लास्टिक मुक्त करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। विशेष त्योहारों पर ,दैनिक जीवन में काम आने योग्य धातु के बर्तन खरीदने का प्रयास करें। प्लास्टिक के बर्तनों से बचने का भी प्रयास करना होगा।

पूरा घर नहीं तो कम से कम रसोईघर तो प्लास्टिक मुक्त हो, यही योग्य मार्ग है और यही इस लेखन का उद्देश्य है।

साभार – https://www.facebook.com/100002411838739/posts/4637123843044631/ से

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