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जयललिता के जाते ही राजनीति का खेल शुरू !

मुंबई। जयललिता के जाने के तत्काल बाद ही राजनीति ने अपना खेल शुरू कर दिया है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों तमिलनाड़ु की तस्वीर में अपनी शक्ल फिट करने के सपने देखने लगी हैं। वजह यही है कि जयललिता जैसी करिश्माई नेता के स्वर्ग सिधारने के बाद उनकी पार्टी एआईएडीएमके को राष्ट्रीय राजनीति में कोई तो साथी चाहिए ही। सो, दक्षिण भारत की राजनीति मे अपना अस्तित्व खो चुकी कांग्रेस भी अपने लिए संभावना के सपने देखने लगी है और भाजपा को भी लग रहा है कि वह अपने पुराने साथियों के माध्यम से तमिलनाड़ु में अपना असर बना लेगी। जयललिता के अंतिम दर्शन करने चेन्नई पहुंचे राहुल गांधी के मुकाबले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गले लगकर मुख्यमंत्री पनीर सेल्वम का धार धार रोना नई राजनीतिक संभावनाओं के उभरने का संकेत भी था। उससे पहले जयललिता की सखी और एआईएडीएमके की सबसे मजबूत नेता शशिकला को मोदी की सांत्वना के संकेतों को समझनेवाले जानते हैं कि कांग्रेस चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, लेकिन एआईएडीएमके का रास्ता अब किधर जाएगा।

फिलहाल लोकसभा में जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके उसके पास कुल 37 सांसद हैं। जो कांग्रेस के कुल 44 से सिर्फ 7 ही कम हैं। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में मिला कर उसके सांसदों की कुल संख्या कुल है। वैसे भी एआईएडीएमके बीजेपी के साथ मिल कर चलती है, तो, उसके सामने चुनौती संभव नहीं है। फिर अगर सरकार के विरोध में कांग्रेस के साथ खड़े होना है तो, एआईएडीएमके के ज्यादातर नेताओं की राय में राहुल गांधी की अपरिपक्वता के कारण रास्ता मुश्किल भरा हो सकता है। बीजेपी के रणनीतिकार इस बात पर ज्यादा जोर दे रहे हैं कि पनीरसेल्वम, एम थंबीदुरैई, शशिकला नटराजन और शीला बालकृष्णन की अन्ना डीएमके में बड़ी भूमिका रहने वाली है, सो इन्हें सम्हाला जाए। उधर कांग्रेस के पास न तो कोई नेता है और न हीं कोई राजनीतिक कार्यक्रम, जो एआईएडीएमके के सभी गुटों को साथ लेकर चल सके। साफ लग रहा है कि कांग्रेस इस मामनले में हारी हुई लड़ाई लड़ रही हा। मगर, प्रधानमंमत्री मोदी का करिश्मा इन्हें अपने साथ जोड़े रखने के राजनीतिक संकेत दे रहा है।

राजनीति के संकेत चाहे जो भी हो। लेकिन, दक्षिण के राजनेताओं के प्रति वहां की जनता का जो स्नेह और आकर्षण है, उसके मर्म को राष्ट्रीय पार्टियां शायद कभी नहीं समझ सकती। इतिहास में देखें, तो एक सोची समझी रणनीति के तहत जयललिता अपनी हीरोइन मां का दामन थामकर किसी लाजवंती नायिका की तरह तमिल सिनेमा में आईं थी। और, एमजीआर के नाम से तब के बहुत प्रसिद्ध सुपर स्टार एमजी रामचंद्रन की परमसखी के रूप में चुपचाप छा जाने की रणनीति में कब सफल हो गईं, किसी को पता भी नहीं चल सका। रामचंद्रन राजनीति में आए। वे सुपर स्टार थे, इसलिए उनके नाम से पार्टी चलने लगी। और राजनीतिक कारणों से तो नहीं लेकिन अति आत्मीय और बहुत कुछ श्रृंगारिक कारणों से जयललिता स्वयं को एमजीआर का सच्चा उत्तराधिकारी मानती थीं, जिसमें वे सफल भी रहीं। एमजीआर की बाकायदा धर्मपत्नी होने के बावजूद बेचारी जानकी तो कहीं भी किसी भी परिदृश्य में भी नहीं थी। हर जगह जयललिता ही एमजीआर के साथ दिखतीं। निजी रिश्तों को कभी सार्वजनिक न होने देने की रणनीति को राजनीति का जामा पहनाने में माहिर जयललिता से कांग्रेस का कलह शुरू से ही रहा। लेकिन फिर भी कांग्रेसियों की फाइनेंस की हुई फिल्मों में भी जयललिता ही हीरोइन हुआ करती थी।

अपने धर्मेंद्र के साथ ‘इज्जत’ फिल्म में घायल कर देनेवाला ‘जागी बदन में ज्वाला’ गीत गाकर हिदी सिनेमा में भी अपने जबरदस्त जलवे दिखानेवाली जयललिता का पांच बार तमिलनाड़ु की सीएम बनना कोई हंसी खेल नहीं था। राजनैतिक जीवन के दौरान जयललिता पर सरकारी पूंजी के गबन, गैर कानूनी ढंग से भूमि अधिग्रहण और आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में तो सजा भी हुई और मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। पर वे जीते जी जिंदगी से तो नहीं हारी नहीं, मगर मौत के सामने हार गई। राजनीति में सिर्फ करिश्मा ही नहीं जनता का प्यार पाने के लिए भी अम्मा को बहुत याद किया जाता रहेगा। अपने नेता की मौत के सदमें में कई कई कार्यकर्ताओं के मर जाने के मर्म को समझना वैसे भी कोई सहज खेल नहीं है। लेकिन दक्षिण की राजनीति में देश ने एमजी रामचंद्रन और एनटी रामाराव की मौत पर लोगों को मरते देखा है। और यही हाल जयललिता को जाने पर भी है। यह कैमरे के नायकों के जननायक बनकर लोगों के दिलों पर राज करने का जयललिता सबसे बड़े उदाहरणों में से एक है। राजनीति के खेल चाहे जो हों, लेकिन किसी नेता से उसकी प्रजा मौत को गले लगाने जैसी दीवानगी की हद तक प्यार करे, यह सम्मान पाने के लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनों के नेताओं को नया जन्म लेना पड़ेगा!

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