ताजा सामाचार

आप यहाँ है :

बहुत कुछ सिखा गया, बहुत कुछ दिखा गया अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन

मुंबई में कई लोगों की अपनी पहचान है, फिल्मी दुनिया से लेकर उद्योग और व्यापार जगत में कई लोगों ने अपनी धाक जमा रखी है। लेकिन श्री भागवत परिवार के समन्वयक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक और देश की जानी मानी कंपनी बोनांज़ा पोर्टफोलियो के अध्यक्ष एवँ प्रपबंध निदेशक श्री एसपी गोयल की अपनी एक अलग पहचान है। वीरेन्द्र जी याज्ञिक मुंबई शहर की वह पहचान है जिनकी उपस्थिति ही किसी भी मंच को भागवत, भगवद्गीता, रामायण से लेकर वेद-पुराण की दुनिया से जोड़ देती है। याज्ञिक जी कभी खाली नहीं बैठते। तमाम व्यस्तताओं और अपनी नियमित धार्मिक व अध्यात्मिक जीवनशैली को जीते हुए भी वे समाज को कुछ न कुछ देने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। उन्हें श्रीएसपी गोयल जैसा अनुरागी और बैरागी शिष्य भी मिल गया है जो अपना सारा कारोबार, काम-धाम छोड़कर याज्ञिकजी की सोच को आकार देने में लग जाता है।

मुंबई से लेकर मुंबई के आसपास के वनवासी क्षेत्रों में श्री भागवत परिवार द्वारा कई परोपकारी कार्य किए जाते हैं, जिनमें वनवासियों के सामूहिक विवाह से लेकर वनवासी क्षेत्र में चल रहे स्कूल को गोद लेकर बच्चों को बेहतरीन साधन व सुविधा उलपलब्ध कराने जैसे काम प्रमुख हैं। मुंबई में भी श्री भागवत परिवार की सामाजिक व धार्मिक गतिविधियाँ निरंतर चलती ही रहती है।

लेकिन याज्ञिकजी हर बार कुछ नया और अलग सोचते हैं, और जो भी सोचते हैं परमात्मा पूरी शक्ति से उनकी कल्पना को साकार करता है।

मुंबई विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग इस साल अपनी स्थापना की पचासवीं जयंती मना रहा है। याज्ञिकजी ने इस अवसर को एक ऐसे यादगार अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन के रूप में ऐसे आयोजन में बदल दिया कि रामायण और रामचरित मानस पर हुए विमर्श में दोनों ग्रंथों को लेकर ऐसे ऐसे सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, पारिवारिक और न्यायशास्त्र से जुड़े तथ्य आए कि सम्मेलन में भागीदारी कर रहे विद्वानों से लेकर उपस्थित श्रोता तक दंग रह गए।

इस सम्मेलन को लेकर याज्ञिकजी का मानना था कि अनादि काल से श्री राम की कथा और राम के चरित्र से भारत का जनमानस प्रेरणा लेता चला आ रहा है। राम की कथा भारत के लोकजीवन में इतनी रची बसी है कि उसके बिना भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की कल्पना ही नहीं की जा सकती। राम केवल धर्म, संस्कृति और जीवन मूल्यों के ही पुरोधा नहीं हैं, बल्कि वे एक कुशल प्रशासक, प्रबंधक, तथा समाज के आर्थिक-सामाजिक विकास और सर्वस्पर्शी, सर्वसमावेशी समाज के निर्माता हैं। तभी तो तुलसी ने लिखा है नहिं दरिद्र कोई दुःखी न दीना, नहिं कोई अबुध न कोई लक्षण हीना- अर्थात राम राज्य में न तो कोई दरिद्र था, न कोई दुःखी था, और न ही दीन था, कोई न अबुध अर्थात् बुध्दिहीन था और न ही चरित्रहीन। ऐसे समाज की व्यवस्था को स्थापित करने वाले श्री राम के चरित्र का सांगोपांग अध्ययन और चिंतन आज की महती आवश्यकता तो है ही, इसकी अनिवार्यता भी अनुभव की जा रही है ताकि आज के बदलते सामाजिक संदर्भों और वैयक्तिक जीवन को सही दिशा मिल सके।

इक्कीसवीं सदी का संपूर्ण वैश्विक समाज एक अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है। जीवन की समस्त सुविधाओँ और संसाधनों के बावजूद व्यक्ति हताशा, निराशा और अवसाद से ग्रस्त है। परिवार बिखर रहे हैं और व्यक्ति एकाकी होकर निराशा में भटक रहा है। आधुनिक विज्ञान और टेक्नालॉजी का भस्मासुर मानवीय जीवन को आसान और शांतिपूर्ण बनाने के बजाय अधिक जटिल और भावशून्य बना रहा है और समाज में अशांति, अराजकता और आतंक का वातावरण निरंतर गहरा रहा है। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि समाज में सद्भाव, तथा सहिष्णुता स्थापित करने तथा उसके लिए एक वैचारिक आनेदोलन और अनुशीलन के लिए आने वाली पीढ़ी को सही परिप्रेक्ष्य और युगबोध के अनुसार अवगत कराने के प्रयत्न किए जाएँ। इसके लिए राम के चरित्र से अधिक बेहतर और कोई चरित्र नहीं हो सकता।

इसी दृष्टि से श्री भागवत परिवार विभिन्न विश्वविद्यालयों, शिक्षा संस्थानों, तथा प्रबंधन संस्थानों के साथ मिलकर रामायण के न केवल धार्मिक तथा अध्यात्मिक पक्ष बल्कि, उनके सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षणिक पहलुओं पर भी आज के संदर्भों में विचार करते हुए जन सामान्य का प्रबोधन करना आवश्यक मानता है ताकि समाज को वैचारिक, सामाजिक व सांस्कृतिक दृष्टि से अधिक संपन्न बनाने में कुछ योगदान कर सकें।

याज्ञिकजी कहते हैं, कि राम भारत की मनीषा के केन्द्र बिंदु हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो कुछ अनुकरणीय है, आचरणीय है, तथा उसे संपन्न समृध्द एवँ महिमावान बनाने के लिए अपेक्षित है, वह सब राम के रूप में चरितार्थ और मूर्त हुआ है। सोलहवीं शताब्दी में जब भारत का समाज और उसकी व्यवस्था पूरी तरह से पराभूत और परतंत्रता की जंजीरों से जकड़ी हुई थी, तब तुलसी ने ही समाज को रामचरिचत मानस देकर उसका वैचारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जागरण किया था। आज केवल भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण वैश्विक समाज एवँ मानवता मूल्यहीनता के संकट से ग्रस्त है। अतः आवश्यक है कि वैश्विक स्तर पर राम के चरित्र का सांगोपांग अध्ययन. चिंतन-मनन किया जाए। अतः विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर एक अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव सामयिक और आवश्यक प्रतीत होता है।

समाज प्रबोधन को ध्यान में रखकर यदि रामायण का चिंतन और अनुशीलन होगा तो उसके दूरगामी परिणाम मिलेंगे।

मुंबई विश्वविद्यालय और श्री भागवत परिवार व गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब द्वारा इसी संकल्पना को लेकर आयोजित अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन का उद्धाटन करते हुए राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने कहा, रामायण जीवन का आधार है, रामायण एकता और विश्वबंधुत्व का संदेश देता है। रामायण का अध्ययन प्रेरणादायी है और इसके जरिए हम आदर्श समाज का निर्माण कर सकते हैं। श्री कोश्यारी ने कहा कि नानकदेव समेत अनेक संतों ने अपने प्रवचनों में रामायण का उल्लेख किया है। आज सारा देश रामायण अंगीकार कर रहा था। राज्यपाल ने कहा कि सभी ने अच्छे गुणों को आत्मसात कर लिया तो समाज निश्चित रुप से रामराज्य की ओर बढ़ चलेगा।

उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था, जब राजनीति के कीचड़ में आने के पहले मैं भी रामचरित मानस का नियमित पाठ करता था। मैं मुंबई विश्विद्यालय के हिंदी विभाग एवं श्री भागवत परिवार दोनों ही संस्थाओं को हार्दिक साधुवाद देता हूँ कि उन्होंने इतने बड़े सम्मेलन का आयोजन किया। उन्होंने हिंदी विभाग के 50 वर्ष, महात्मा गांधी के 150 वर्ष एवं गुरुनानक देव के 550 वर्ष के उपलक्ष्य में इस आयोजन को विशेष रूप से उल्लेखनीय बताया।

इस अवसर पर उपस्थित रमेशभाई ओझा ने कहा कि शासक वह नही होता जो सत्ता के पास जाता है बल्कि वह होता है जिसके पास सत्ता स्वयं जाती है। उन्होंने कहा कि राम ऐसे ही शासक थे। जिन्होंने अपने जीवन को लोककल्याण के लिये समर्पित कर दिया।

उदघाटन सत्र का सूत्र संचालन करते हुए मुम्बई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ करुणाशंकर उपाध्याय ने कहा कि रामायण और महाभारत भारतवर्ष के सांस्कृतिक व्यक्तित्व को आकार देने वाले ग्रंथ है। हमारे कवियों ने राम और कृष्ण के रूप में मर्यादा पुरूषोत्तम तथा लीलापुरुषोत्तम जैसे अप्रतिम चरित्रों को गढ़ा है। वें तब तक प्रासंगिक है जब तक यह धरती है। राम शक्ति, शील और सौंदर्य के समन्वित रूप है।

इस अवसर पर श्री वीरेन्द्र याज्ञिकजी के जीवन के सत्तर वसंत पूर्ण होने पर उनके जीवन के विभिन्न आयामों पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ समिधा का लोकार्पण माननीय राज्यपाल व अन्य अतिथियों ने किया।

जापान से आई डॉ. तोमोको किकुची ने जापान में प्रचलित विभिन्न शब्दों की तुलना रामायण के पात्रों, घटनाओं और स्थितियों से करते हुए कहा कि रामकथा जापान में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में कही और सुनी जाती है लेकिन देऎशकाल और परिस्थितियों के हिसाब से पात्रों के नामों में परिवर्तन हो गया है जबकि घटनाओँं में समानता मिलती है।

मुंबई विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ सुहास पेडणेकर, उपकुलपति डॉ रविंद्री कुलकर्णी, दीपक मुकादम, जापान की हिंदी भाषा की जानकार डॉ तोमोको किकुची मौजूद थे। कार्यक्रम में कई देशों और विश्वविद्यालय के हिंदी के जानकार भी उपस्थित हुए।

उदघाटन सत्र के उपरांत’ राम नाम मणि दीप धर’ शीर्षक से मंगलाचरण संपन्न हुआ जिसमें मत्स्यनाथ विश्वविद्यालय के कुलपति उपस्थित थे उन्होंने रामकाव्य धारा के कवियों विशेष रूप से तुलसीदास के योगदान को रेखांकित किया। इस सत्र की अध्यक्षता मॉरिशस से पधारे डॉ राजेन्द्र अरुण ने की। श्री राजेन्द्र अरुण ने रामनाम मणि दीप धर की रोचक व्याख्या प्रस्तुत की।

इस सत्र में प्रमुख अतिथि मस्तनाथ विश्व विद्यालय के कुलपति डॉ. रामसजन पांडेय तथा वक्ता डॉ. किकुचि, डॉ. नादेज्दा (रूस), सुरेश भगेरिया थे। संचालन डॉ. हनुमंत धायगुडे ने किया। प्रख्यात शिक्षाविद और यूनेस्को के परामर्श मंडल में भारतीय प्रतिनिधि डॉ. जगमोहन सिंह राजपूत की अध्यक्षता में पहला सत्र हुआ जिसमें रामकाव्य के साहित्य एवं शैक्षणिक आयाम पर विमर्श हुआ। उन्होंने रामकाव्य को नई एवम पीढ़ी के लिए भी उपयोगी बतलाया। इसी सत्र में डॉ देवसिंह पोखरिया ने रघुवंश शिरोमणि श्रीराम नामक महाकाव्य पर विशेष वक्तव्य दिया। इस अवसर पर डॉ. श्रीनिवास पांडेय, डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय, डॉ. विनोद टिबड़ेवाल तथा सुनील केजरीवाल वक्तव्य दिए।

सतर् को श्री सुनील केजरीवाल ने भी संबोधित किया। इस सत्र का सूत्र संचालन डॉ बिनीता सहाय ने किया। इसी क्रम में रामकाव्य के दार्शनिक आयाम विषय पर अगले सत्र का आरंभ हुआ। इसकी अध्यक्षता डॉ सूर्यप्रसाद दीक्षित ने कि इस सत्र में डॉ जयप्रकाश शर्मा ने रामकाव्य की दार्शनिकता के सारे पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उनका विवेचन किया।

रुस से आए रामेश्वर सिंह ने बताया कि विगत कई दशकों से रूस में रामलीला का मंचन हो रहा है। जब रुस में कम्युनिज़्म था तब वहाँ धार्मिक आयोजन करना मुश्किल था, लेकिन रुसी कलाकारों ने रामलीला का मंचन सामाजिक नाटक के रूप में किया और ये प्रयोग इतना लोकप्रिय हुआ कि रामलीला के मंचन में भाग लेने वाले रुसी कलाकार घर घर में लोकप्रिय हो गए।


जाने माने अभिनेता श्री अखिलेन्द्र मिश्र ने कहा कि बुध्दि के आगे की चेतना ही राम है। उन्होंने कहा कि रामचरित मानस और रामायण को लेकर कुछ लोग जिस तरह से आलोचना करते हैं, ये इस बात का प्रमाण है कि हमारे धर्म ग्रंथों की या तो गलत व्याख्या की जा रही है या हमारी संस्कृति का विध्वंस करने के लिए सुनियोजित प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि रामचरित मानस विश्वविद्यालयों में तो पढ़ाई जाती है लेकिन पहली कक्षा में नहीं पढ़ाई जाती। अगर बच्चे पहली कक्षा से ही रामायण पढ़ेंगे तो बच्चों में संस्कार आएंगे। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि हम हमारे देश पर हमला करने वाले आक्रांताओँ के बारे में तो पढ़ाते हैं मगर अपने पूर्वजों के बारे में नहीं पढ़ाते। उन्होंने कहा कि अगर हमने बच्चों में रामायण के संस्कार नहीं डाले तो एक दो पीढ़ियों के बाद न तो कोई रामायण का नामलेवा बचेगा न कोई रामायण सम्मेलन करने वाला बचेगा।

रामराज्य में कुशल प्रशासन एवं प्रबंधन की संकल्पना पर जयंत कुमार बांठिया की अध्यक्षता में सम्पन्न सत्र में जाने माने उद्योगपति एवँ आर आर काबेल के संस्थापक श्री रामरत्न काबरा ने कहा कि रामायण में राम का 75प्रतिशत जीवन वनवास में बीता। वनवास के इसी जीवन ने राम को राम बनाया। उन्होंने कहा कि तब आतातायिओं के अत्याचारों से देश का वनवासी समाज अपना आत्मविश्वास खो चुका था, राम ने वन में जाकर उस वनवासी समाज के आत्मबल और आत्मगौरव को वापस लौटाया।

श्री सूर्य प्रकाश दीक्षित ने कहा कि रामचरित मानस से हमें शिक्षा मिलती है कि प्रकृति और विकृति के संसोधन से ही संस्कृति बचेगी। रामचरित मानस हमें बहुपत्नीवाद से उपजी समस्या, एक पत्नीवाद की गरिमा के साथ ही कई सामाजिक व नैतिक संदेश देती है।

जाने माने विद्वान एवँ भोपाल के हिंदी भाषा संस्थान के अध्यक्ष श्री कैलाश चन्द्र पंत ने कहा कि कई प्रश्नों का समाधान तो आसान होता है किंतु कई प्रश्न ऐसे भी होते हैं जिनका समाधान बगैर भक्ति या श्रद्दा के नहीं हो सकता। श्रध्दा भक्ति और बोध्दिकता के मिश्रण से जो निष्कर्ष निकलता है वही सच्चा समाधान है। संस्कृति व्यक्ति के संस्कारों से पैदा होती है और वह जब समाज के माध्यम से सामूहिक हो जाती है। उन्होंने जाने माने यूरोपीय चिंतक इलियट का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने कहा था कि मैने अपने 15 सालों के शोध से यह बात समझी है कि हिंदुत्व की संस्कृति ही दुनिया को बचा सकती है। लेकिन आज हिंदुत्व की बात करना सांप्रदायिकता हो गया है।

मोतीलाल ओसवाल समूह के संस्थापक अध्यक्ष श्री मोतीलाल ओसवाल ने कहा कि मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। अब मैं अपने जीवन में राम मंदिर में जाकर भगवान राम के दर्शन कर सकूँगा। उन्होंने कहा कि हम भौतिकता की ओर भाग रहे हैं, जहकि सच्चा सुख अध्यात्मिकता से मिलता है। समाज हमें भौतिकता से जोड़ता है। हमें ये समझना होगा कि हमारी परंपरा और हमारी संस्कृति हमारी धरोहर है और इनको बचाकर रखने की जिम्मेदारी भी हमारी है। हमारे पास रामायण और गीता जैसे ग्रंथ हैं। हमें अपने आप से पूछना होगा कि हम इनकी कितनी कद्र करते हैं। आज जरुरत इस बात की है कि इन ग्रंथों की मार्केटिंग की जाए ताकि इनके ज्ञान को लोगों तक पहुँचाया जा सके। उन्होंने कहा कि हम सफल कंपनियों पर रिसर्च करते हैं और इस रिसर्च में ये बात सामने आई है कि जो कंपनियाँ राम राज्य की संकल्पना पर काम करती है, वे सफल भी हो रही है और लगातार चल भी रही है। देश की 6-7 हजार कंपनियों में से 300-400 कंपनियाँ रामराज्य की अवधारणा पर संचालित हो रही है। इनके कामकाज का फायदा देश को और समाज को मिल रहा है।

इस सत्र में श्री श्यामशंकर उपाध्याय ने कहा कि, ‘राम सही मायने में लोकतांत्रिक शासक थे और भारतीय परम्परा में धर्म और विधि के बीच कोई फ़र्क नही समझा। मानव समाज की संकल्पना विधि के सुचारू शासन के कारण ही लोकप्रिय है। भारतीय सनातन व्यवस्था विधि द्वारा राज्य के संचालन पर आधारित है।

 

भोपाल से आए उद्योगपति एवँ हिंदी मासिक पत्रिका अक्षरा के संपादक श्री सुशील केड़िया ने कहा कि रामचरित मानस में ऐसे कई प्रसंग हैं जो हमें अपने परिवार, समाज और राष्ट्र से जुड़ने की प्रेरणा देते है, हमें अपने कर्त्तव्यों का बोध कराते हैं। राम की सबसे बड़ी सफलता ये थी कि उन्होंने आम लोगों और वनवासियों के बीच जाकर उन्हें हीन भावना से उबारा।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव श्री जयंत बाँठिया ने कहा कि रामचरिच मानस एक बेंच मार्क है जो यह बताती है कि रामराज्य संभव है। उन्होने उदाहरण देते हुए कहा कि मैं महाराष्ट्र के आदिवासी जिले भंडारा में कलेक्टर था। वहाँ मैं गौंड समाज के आदिवासियों से मिला। इन आदिवासियों के गाँवों में न तो स्कूल थे, न अस्पताल थे, न पानी की सुविधा थी न कोई आधुनिक साधन-सुविधाएँ। लेकिन फिर भी ये लोग बेहद प्रसन्न थे। यहाँ तक कि इन लोगों के घरों में दरवाजे तक नहीं होते थे। इनके घर आंगन स्वच्छ थे। न इनके पास टीवी था न मनोरंजन का कोई और साधन। बिजली भी नहीं थी। ये देखकर मुझे लगा कि इन लोगों की जीवनशैली की कल्पना रामराज्य से की जा सकती है।

उन्होंने एक रोचक कहानी सुनाते हुए कहा कि एक बार एक मुख्य मंत्री जी एक ऐसे ही क्षेत्र में चले गए और लोगों से पूछा कि आपको मैं क्या सुविधा दे सकता हूँ। सड़क, बिजली, पानी आपको क्या चाहिए। गाँव के लोगों ने कहा कि हमें कोई सुविधा नहीं चाहिए, हम यहाँ हर हाल में सुखी हैं। लेकिन मंत्री जी नहीं माने और गाँव में लोगों की रक्षा के लिए थाना खुलवा दिया। अब उस गाँव में हर आदमी परेशान है।

उन्होंने कहा कि रामराज्य का बेंच मार्क क्या होना चाहिए। क्या ये संभव है। उन्होंने वर्ल्ड बैंक द्वारा किए गए हैप्पीनेस सर्वे का उदाहरण देते हुए कहा कि भूटान को हैप्पीनेस इंडेक्स में सबसे पहला स्थान मिला है, तो हम कह सकते हैं कि रामराज्य की जो कल्पना है सका प्रमाण भूटान मॆं मिला है। उन्होंने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि हमें इस देश की संस्थाओं को जिस रूप में बनाना था वो हम नहीं बना पाए।

डॉ कैलाशचंद्र पंत के अध्यक्षता में अगला सत्र सम्पन्न हुआ जिसमें सूर्यप्रसाद दीक्षित, प्रख्यात अभिनेता अखिलेन्द्र मिश्र, सत्यनारायण काबरा इत्यादि ने रामकाव्य के संस्कृतिक आयाम को विश्लेषित किया।

सम्मेलन में अलग से कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया था जिसमें रमाकांत शर्मा उद्भ्रांत, माया गोविंद, दीक्षित दनकौरी, बुद्धिनाथ मिश्र, किरण मिश्र तथा बनमाली चतुर्वेदी ने काव्य पाठ किया।

पाँचवे सत्र की अध्यक्षता डॉ रामाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’ ने की।अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि रामकथा में स्त्री विमर्श और दलित विमर्श दोनों के समान सूत्र पाये जाते हैं। डॉ.कुमुद शर्मा ने कहा कि आज के डिजिटल युग के युवाओं को उनकी भारतीय संस्कृति से जोड़ने का कार्य रामकथा द्वारा किया जा सकता है। इस सत्र में लंदन से आई स्वामी सूर्यप्रभा, डॉ.श्वेता दीप्ति नेपाल तथा डॉ. विनोदबाला अरुण ने स्त्री विमर्श के आलोक में रामकाव्य के नारी पात्रों को लेकर कई रोचक, प्रेरक व विचारोत्तेजक जानकारियाँ दी।

श्री प्रमोद कुमार बिंदलिस तथा सी.ए.अनिल गोयल ने भी रामकाव्य के महत्व का प्रतिपादन किया। इस सत्र का संचालन डॉ अंशु शुक्ला ने किया।

इस अवसर पर वन्दे मातरम फाउंडेशन द्वारा जाने माने तबला वादक पं. कालिनाथ मिश्र के निर्देशन में प्रस्तुत नृत्य नाटिका एवम कत्थक नृत्य की संगीतमयी प्रस्तुति ने ज़बर्दस्त प्रभाव छोड़ा। सिध्दहस्त युवा कलाकारों ने जिस परिपक्वता और शास्त्रीय अनुशासन से प्रस्तुतियाँ दी, उससे रामायण सम्मेलन का मंच सार्थक हो गया।

वैश्विक परिदृश्य में रामायण की प्रासंगिकता विषय पर स्वामी श्री धर्मेन्द्रजी महाराज की अध्यक्षता में अंतिम सत्र सम्पन्न हुआ, जिसमें डॉ.सत्यकेतु सांकृत एवं सुरेश चतुर्वेदी, सुरेश खंडेलिया, घनश्याम पहलाजानी तथा अजय याज्ञिक ने अपने विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर श्यामशंकर उपाध्याय की पुस्तक लाइफ एंड लीगेसी का लोकार्पण भी सम्पन्न हुआ। इस सत्र का संचालन हिंदी विभाग के वरिष्ठ सहायक प्राध्यापक डॉ. सचिन गपाट ने किया। इस मौके पर अनेक रामकाव्य प्रेमियों का सम्मान भी किया गया।

मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ.करुणाशंकर उपाध्याय ने कहा कि इस तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन में दस विदेशी विद्वान, पचास आमंत्रित विद्वान तथा 763 आगंतुक शामिल हुए।

तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में अतिथि विद्वान वक्ताओं को सुना तो रामचरित मानस से लेकर रामायण के विभिन्न पहलुओं को लेकर ऐसी रोचक, कोजपूर्ण और तथ्यपूर्ण जानकारियाँ मिली जिनके बारे में एक सामान्य व्यक्ति कल्पना भी नहीं कर सकता है। पूरा रामायण सम्मेलन रामचरित मानस और रामायण का एक ऐसा दस्तावेज बन गया है जिसके माध्यम से राम से लेकर रामराज्य और उस दौर के समाज के बारे में कई जानकारियाँ दर्ज हो गई।

image_pdfimage_print


सम्बंधित लेख
 

Back to Top