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लोकमान्य तिलक पर चले उस ऐतिहासिक मुकदमें का आँखों देखा हाल

हिंदी में जासूसी लेखन के जनक कहे जाने वाले गोपाल राम गहमरी की तिलक पर दर्ज एक मुकदमे पर सुनवाई की यह रिपोर्ट 119 साल पहले प्रकाशित हुई थी

1897 के आसपास की है ये बात. उन दिनों मैं मध्य प्रदेश स्थित जबलपुर जनपद के पाटन अंचल के जमींदार जानकीप्रसाद-शंकर प्रसाद गुरु के यहां उनके मुख्तार-आम के रूप में कार्यरत था. काम निश्चित ही प्रतिष्ठा का था लेकिन साहित्य सेवा से दूर हो जाने की वजह से उसमें मेरा मन बिलकुल ही नहीं लग पाया. सन 1893 में जब मैं दोबारा ‘मुंबई व्यापार सिंधु’ का संपादक नियुक्त होकर मुंबई पहुंचा तो श्री वेंकटेश्वर प्रेस के मालिक सेठ खेमराज जी ने मुझसे कहा था, ‘तुमने हिंदी में जिस समाचार पत्र के प्रकाशन का सुझाव मुझे दिया था, उसे जल्दी ही निकालने कि व्यवस्था मैं कर रहा हूं.’ और इसके कुछ ही बरसों बाद सन 1897 में उन्होंने सचमुच ही ‘श्री वेंकटेश्वर समाचार’ नामक पत्र प्रकाशित करना प्रारंभ कर दिया.

‘श्री वेंकटेश्वर समाचार’ के निकलने का समाचार मिलते ही मैंने सेठ खेमराज से संपर्क स्थापित किया. उन्होंने तत्काल ही अपने साथ काम करने के लिए मुझे मुंबई बुला भेजा. और इस तरह अपनी मुख्तारी से इस्तीफा देकर मैं फ़ौरन ही वहां के लिए निकल पड़ा. मैं जुलाई की तपती गर्मी के मध्य मुम्बई पहुंचा. पहुंचते ही जो पहला समाचार मुझे मिला वह यह था कि गिरगांव डाकखाने के पीछे रहने वाले दाजी खेर नामक वकील के घर पर पिछली रात सवा ग्यारह बजे पुलिस सार्जेंट द्वारा लोकमान्य तिलक को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है और मुझे श्री वेंकटेश्वर समाचार के लिए उस पूरे मामले की रिपोर्टिंग करनी है.

पुणे में फैले प्लेग और अकाल के संबंध में शासन की कटु आलोचना करते हुए तिलक के जो अग्रलेख उनके मुखपत्र ‘केसरी’ में प्रकाशित हुए थे, इन्हीं के विरोध में अंग्रेज सरकार ने उनके ऊपर राजद्रोह का मुकदमा चलाया था

पुणे में फैले प्लेग और अकाल के संबंध में शासन की कटु आलोचना करते हुए तिलक के जो अग्रलेख उनके मुखपत्र ‘केसरी’ में प्रकाशित हुए थे उनसे तत्कालीन अंग्रेज सरकार बौखला उठी थी और उनके विरुद्ध राजद्रोह का यह मुकदमा उसी के पार्श्व में चलाया गया. गिरफ्तार होने पर सार्जेंट के साथ पुलिस कमिश्नर के यहां रवाना होने के पूर्व तिलक ने वकील दाजी खेर जी से कह रखा था कि वह जमानत पर उनको छुड़ाने की पूरी तैयारी रखें. लेकिन जब दाजी खेर को अनेकानेक प्रयत्न करने पर भी तिलक को जमानत पर छुड़ाने में किंचित सफलता नहीं मिल पाई तो वे पुलिस कमिश्नर के बंगले में स्थित उस कमरे का द्वार खटखटाने पहुंच गए जहां तिलक महाराज आराम के साथ खर्राटे लेते हुए निद्रालीन थे. उनको पता चल गया था कि जमानत की व्यवस्था नहीं हो पाई है और इसलिए वह पूरे इत्मीनान के साथ अपनी नींद पूरी करने में लगे हुए थे.

प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट मामले की जांच में लगा हुआ था. उसका नाम था स्लेटर और उसने 28 जुलाई 1897 को अपनी पड़ताल शुरू की थी. बैरिस्टर रसल और माधवराव बोर्ड्स के साथ स्वयं दाजी खेर मुक़दमे की पैरवी कर रहे थे. मुक़दमा सेशन में भेजने का समय आया तो एक बार फिर जमानत की अर्जी पेश की गई. लेकिन पहले की तरह उसे पुनः पूरी तरह अस्वीकृत कर दिया गया. इस निर्णय से क्षुब्ध होकर दाजी खेर ने स्लेटर के फैसले के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील कर दी. वहां गोविंद महादेव रानाडे और पार्संस न्यायमूर्ति की जोड़ी न्यायासन पर तहसीन थी.

न्यायमूर्ति-द्वय ने स्लेटर के निर्णय को इस आधार पर बहाल रखा कि चूंकि दो दिन बाद ही अभियोग की सुनवाई शुरू होने वाली है अतः त्वरित रूप से उसपर विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है. अगर मुकदमा शुरू होने में विलम्ब हुआ तो उस अर्जी पर विचार कर लिया जाएगा. प्रारंभिक जांच की दूसरी पेशी 31 जुलाई को हुई थी. उस दिन तिलक महाराज की ओर से श्री दवार नामक बैरिस्टर खड़े हुए थे. पहली अगस्त को वीरवार होने कि वजह से कोर्ट में अवकाश था, अतः सोमवार, 2 अगस्त को बहस शुरू हो पाई. नजारा अजीब था, उस दिन का. लगता था जैसे सारी बंबई तिलक महाराज की एक झलक पाने के लिए वहां उमड़ पड़ी हो. रास्तों में, सड़कों पर, इतनी भीड़ जमा हो गई थी. द्वार पर अनेक भारतीय सिपाहियों के साथ दो अंग्रेज अधिकारी अपने हाथों में हंटर लिए हुए इस अप्रत्याशित भीड़ को नियंत्रित करने में लगे हुए थे.

सोमवार, 2 अगस्त को बहस शुरू हो पाई. नजारा अजीब था, उस दिन का. लगता था जैसे सारी बंबई तिलक महाराज की एक झलक पाने के लिए वहां उमड़ पड़ी हो

मुक़दमे की रपट लेने मैं वहां पहुंचा हुआ था. लेकिन हंटरों के आतंक से किसी को भी अंदर जाने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी. कुछ पास पहुंचने पर मैंने पाया कि एक हंटरधारी अधिकारी मेरा पूर्व परिचित था. उस अधिकारी का नाम था डब्ल्यूसी जालिफ. नजदीक जाने पर सलाम करने पर उसने अपने हाथों थामे हुए हंटर को कुछ निचे करते हुए मुझसे कहा, ‘वेल बाबू सिडिशन के मामले में एक मराठा पकड़ा गया है, टुम देखेगा क्या?’ और मेरे ‘हां’ कहने पर उसने मुझको अंदर पहुंचा दिया. वहां एक बेंच पर बैठकर मैं दावर साहब की बहस सुनने लगा. सबसे पहले केसरी के संपादक, प्रकाशक और मुद्रक का प्रश्न उठा. तिलक महोदय ने स्वीकार किया कि संपादन, प्रकाशन और मुद्रण तीनों का उत्तरदायित्व उन्हीं पर है. ‘केसरी’ आर्यभूषण प्रेस में छपता था. उसके स्वामी श्री बाल ने बयान देते हुए कहा कि वह प्रेस के मालिक मात्र हैं और केसरी में जो कुछ छपता है उसकी कोई भी जिम्मेदारी उनकी नहीं है.

बैरिस्टर दावर ने अदालत को बताया, ‘केसरी पर मुकदमा चलाने मात्र से उसका प्रकाशन प्रतिबंधित नहीं हो जाता. उसके कार्य-संचालन से संबंधित कागज पत्र चूंकि तब तक व्यवस्थापक को वापस नहीं किये गए हैं, इससे सिद्ध होता है कि निरर्थक आक्रोश के वशीभूत होकर ही सरकार वैसा कर रही है. इस न्याय विरोधी कार्रवाई को अंजाम देने से पूर्व सरकार को सावधान हो जाना चाहिए था.’ दावर की इस जबरदस्त और तर्कशील फटकार को सुनते ही केसरी से संबंधित वह सभी कागजात तिलक जी के सॉलिसिटर को वापस कर दिए गए जो प्रेस की तलाशी लेने के बाद पुलिस ने पुणे से मुंबई भेजे थे.

दो अगस्त को ही लोकमान्य तिलक का मुकदमा हाईकोर्ट भेज दिया गया. न्यायमूर्ति पार्संस और रानाडे द्वारा जमानत की अर्जी खारिज होने के बाद बैरिस्टर दावर ने एक बार पुनः इस संबंध में न्यायालय का ध्यान आकृष्ट करने की चेष्टा की. उन्होंने उपस्थित न्यायमूर्तियों से कहा, ‘जेल में रहने से मेरे मुवक्किल के लिए अपनी सफाई तैयार करने में तो कठिनाई होगी ही साथ ही संबंधित आलेखों के विस्तृत अध्ययन और सबूत पक्ष के कागजातों की अपेक्षित जानकारी के अभाव में उसके लिए किंचित आगे बढ़ पाना सर्वथा असंभव है. जेल में ज्यादा समय तक अभियुक्त के साथ मंत्रणा करना भी कठिन है. सेशन शुरू होने में भी अभी कम से कम एक महीने की देरी है. इसके पहले ऐसे ही मामलों में कलकत्ते के कई अभियुक्तों को जमानत पर छोड़ा जा चुका है. ऐसी अवस्था में तिलक महाराज को भी जमानत पर मुक्ति मिलनी अपेक्षित है.’

न्यायमूर्ति बदरुद्दीन तैयब जी अदालत के आसन से उठकर जब अपनी घोड़ागाड़ी पर सवार हुए तब उनपर इतनी पुष्पमालाओं की वर्षा हुई कि एलिफिंस्टन रोड स्थित अपने घर पहुंचते ही उनकी गाड़ी पूरी तरह फूलों से ढंक गई थी

हाईकोर्ट के न्यायासन पर उस दिन न्यायमूर्ति बदरुद्दीन तैयब जी विराजमान थे. दावरे की बहस ख़त्म होने के पूर्व ही उन्होंने पूछा, ‘आपका मुवक्किल कितने की जमानत दे सकता है?’

दावर साहब ने तैयब जी के पूछते ही उतने ही जोश में जवाब दिया, ‘जितनी भी जमानत आप मांगे, वह हम देने के लिए तैयार हैं.’

हालांकि सरकारी वकील ने दावर और बदरुद्दीन की इस बातचीत में कुछ बाधाएं डालने की कोशिश की थी लेकिन अपने मंतव्य में उसे तनिक भी सफलता नहीं मिल पाई. और जमानत संबंधी वार्तालाप में कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं हो सका.

जमानत कि तैयारियां काफी पहले से की जा रही थीं, मुंबई के सुप्रसिद्ध धनपति सेठ लक्ष्मीदास खेमजी पांच लाख रूपए तक अदालत को देने के लिए प्रस्तुत थे. यह सूचना उन्होंने अपने भांजे द्वारकादास धरमसी के माध्यम से तिलक महाराज के पैरोकारों को दे रखी थी.

लेकिन न्यायमूर्ति तैयब जी ने मात्र पच्चीस-पच्चीस हजार रुपयों की दो जमानतों और पचास हजार के निजी मुचलके पर तिलक महाराज को छोड़े जाने का आदेश सुना दिया. यह धनराशि पूर्ववर्ती बंगवासी केस के मुकाबले दस गुना अधिक थी. अदालत के बहार ज्यों ही यह खबर पहुंची वहां उपस्थित पचास हजार से अधिक व्यक्तियों ने एक स्वर में जो तुमुलनाद किया, उसे कोई अब भी नहीं भूल सकता है. अदालत के आदेश होते ही सेठ द्वारकादास धरमसी और उनके वकील अणे साहब ने 25-25 हजार रुपयों के दो प्रॉमिसरी नोट अदालत में दाखिल कर दिए.

न्यायमूर्ति बदरुद्दीन तैयब जी अदालत के आसन से उठकर जब अपनी घोड़ागाड़ी पर सवार हुए तब उनपर इतनी पुष्पमालाओं की वर्षा हुई कि एलिफिंस्टन रोड स्थित अपने घर पहुंचते ही उनकी गाड़ी पूरी तरह फूलों से ढंक गई थी. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उस समय अपने ताज के साथ न्यायमूर्ति का मात्र सिर लोगों को दिखाई दे रहा था.

उस दिन पूरे मुंबई में इस चर्चा का जोर रहा कि जहां तिलक महाराज को उनके जातिभाई ने जमानत पर छोड़ने से इनकार कर दिया था, वहीं एक विधर्मी मुसलमान न्यायमूर्ति के हाथों उन्हें अपेक्षित मुक्ति मिल गई

उस दिन पूरे मुंबई में इस चर्चा का जोर रहा कि जहां तिलक महाराज को उनके जातिभाई ने जमानत पर छोड़ने से इनकार कर दिया था, वहीं एक विधर्मी मुसलमान न्यायमूर्ति के हाथों उन्हें अपेक्षित मुक्ति मिल गई. यही नहीं एडवोकेट जनरल की अड़ंगेबाजी पर भी उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया.

दूसरे दिन ‘श्री वेंकटेश्वर समाचार’ में मुक़दमे का पूरा विवरण छप गया था. घटना गुरुवार की थी और शुक्रवार को ही उसके प्रकाशित हो जाने पर मुंबई के बड़े-बड़े प्रभावशाली पत्र हाय करके रह गए. सुप्रसिद्ध गुजराती दैनिक ‘मुंबई समाचार’ के मालिक तो स्वयं हमारे कार्यालय में आ धमके. और सेठ खेमराज से सीधे ही सवाल कर डाला, ‘आपके एडिटर कहां हैं?’

समुचित उत्तर पाकर वह महाशय हमारे कमरे में पहुंच गए. आते ही प्रश्न किया, ‘आपने तिलक का जो बयान छापा है, वह आपको आखिर कहां से मिला? हमारा संवाददाता तो न्यायालय तक पहुंच ही नहीं पाया.’

मैंने उनको विस्तार से सब घटनाक्रम सुना दिया. मैंने उन्हें बताया कि कैसे अपने पूर्व-परिचित डब्ल्यूसी जालिफ के माध्यम से मैं उस स्थल तक पहुंचने में सफल हो सका. जहां दावर साहब तिलक महाराज की पैरवी में बोल रहे थे और कैसे मुझे उस पूरे मुकदमे की रिपोर्टिंग करने का मौका सुलभ हो पाया.

‘श्री वेंकटेश्वर समाचार’ समस्त भारत का अकेला ऐसा अख़बार था, जिसमें उस मुक़दमे का विस्तृत विवरण प्रकाशित हुआ था और देश के अन्य समाचार पत्रों ने उसी के साथ आधार पर अपने संवाद तैयार किये थे.

चित्र -साभार -@mumbaiheritage से

साभार-https://satyagrah.scroll.in से

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