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प्यासा, कागज के फूल और हम

10 अक्टूबर: गुरूदत्त जी की पुण्यतिथि

गुरूदत्त जी प्रेम के पुजारी थे, उनकी जीवन प्रेम को समर्पित है। प्रेम की नैसर्गिक आनंद, अनुभूति और आत्मीयता उनके निजी जिंदगी और उनके फिल्म इसकी बात की पुष्टि करता है। गुरूदत्त जी के निजी जिंदगी और उनके फिल्म ‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ दरअसल वर्तमान और आगामी पीढ़ी के लिए एक संदेश ही है कि ‘हमारी जिंदगी प्रेम के इर्द-गिर्द ही गुजरती है’। पवित्र प्रेम सभी रिश्तों में सर्वश्रेष्ठ होता है। किसी से निश्चल प्रेम करना और पाना दोनों ही प्रेम के जड़ को मजबूत करता है। इंसान अपनी प्रेम को ताउम्र साथ ले के चलता है चाहे वह मन में हो या उनके साथ। प्रेम की दुनिया दिखावे की दुनिया से अलग दुनिया है, जहां मन और आत्मा को सुकून-शांति मिलता है।

हमारी जिंदगी भी प्यासा और कागज के फूल फिल्म जैसी ही है। प्यार को पाने के लिए हमारे मन में प्यास रहती है और प्रेम हमें प्यासा बनाती है। कागज के फूल में जैसे खुशबू नहीं आ सकती है ठीक वैसे ही हमारे जिंदगी में प्रेमी-प्रेमिका ही प्रेम का वह फूल हैं, जिनके खूशबू से हमारी जिंदगी खुशनुमा होती है। प्रेमी-प्रेमिका के अलावा किसी और शख्स के साथ जीवन बिताना मानो ऐसा है जैसे फूल नहीं मिलने पर हम कागज के फूल के साथ जिंदगी निभा रहे हो। प्रेमी-प्रेमिका का स्थान कोई अन्य नहीं ले सकता। कागज के फूल वे शख्स हैं जिनके साथ जिंदगी निभाई तो जा सकती है, लेकिन जो खुशबू हमारे मन और आत्मा को चाहिए वह शांति-सुकून उस शख्स से नहीं मिल सकती।

समाज के रीति-रिवाज के अनुसार जिंदगी गुजारा करने के लिए इंसान अपनी विवेक, बुद्धि से जो भी निर्णय लेता है वह उसकी अपनी जिंदगी होती है। चाहे वह अन्य रिश्तों के कर्त्तव्य के आगे अपने प्रेम को समर्पण करने के बाद भी जिंदगी भर मन में प्रेम को संजोए रखता है। रिश्तों की ऊंच-नीच, दुनिया की वास्तविकता, इंसानियत सबको अनुभव करने के बाद प्रेम के निश्चल रूप के आगे इंसान अपना सर झुकाता है और अपनी आत्मा की शांति-सुकून को निश्चल प्रेम में निहारता है। इन्हीं प्रेम की रूपों को गुरूदत्त जी ने अपने निजी जिंदगी में अनुभव किए और उनको फिल्म के माध्यम से दुनिया को प्रेम की इस वास्तविकता का परिचय कराया।

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