Homeआपकी बातवित्तीय समावेशन में भारत की भूमिका ।

वित्तीय समावेशन में भारत की भूमिका ।

वित्तीय समावेशन के तहत यह सुनिश्चित किया जाता है कि समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को आर्थिक विकास के लाभों से संबद्ध किया जाए, कोई भी व्यक्ति आर्थिक सुधारों से वंचित न हो। वित्तीय समावेशन की उपादेयता के दायरा को बढ़ाते हुए भारत सरकार ने “डिजिटल भारत अभियान” की शुरुआत किया था। भारत को डिजिटल रूप से सशक्त बना कर समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का उन्नयन करना है।” कमजोर वर्गों और निम्न निम्न आय वर्ग के लोगों को उनकी आवश्यकतानुसार करने योग्य लागत पर समय से वित्तीय सेवाएं तथा आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराने की एक प्रक्रिया है”। संसार की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशन योजना प्रधानमंत्री जन – धन योजना( पीएमजेडीवाई) है। इसकी शुरुआत 28 अगस्त 2014 को संपूर्ण देश में किया गया था।

वित्तीय समावेशन के मौलिक उद्देश्य है कि जिन लोगों तक बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध नहीं है, उनतक बैंकिंग सेवाएं प्रदान करना है।वित्तीय समावेशन से व्यक्ति ,सरकार और बैंकिंग क्षेत्र को लाभ मिला है। संसार की सभी एजेंसियों ने भारत को सबसे तेजी से बढ़ने वाले अर्थव्यवस्था माना है ,जिसकी विकास दर वित्तीय वर्ष 2023 में 6.5 से 7.0% रहेगी । साल 2014 के पश्चात देश की जीडीपी लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 2023 में 3.75 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंची है ।वित्त मंत्रालय के अनुसार भारत संसार की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है ।मौजूदा वित्तीय वर्ष में भारत की जीडीपी 3737 अरब डालर है ।2015-16 में डिजिटल ट्रांजैक्शन जहां जीडीपी का केवल 4.4% था ,वह 2022 – 23 में बढ़कर 76.1% तक पहुंच चुका है। इसके उपादेयता के कारण वैश्विक स्तर के कई देश भारतीय डिजिटल ढांचे को मॉडल के रूप में अपनाने को उत्सुक हैं ।वित्तीय समावेशन की शुरुआत के बाद से 2010 में इसे जी-20 समूह के एजेंडे में शामिल किया गया था ।इसकी सफलता को देखकर भविष्य में इसके और अधिक व्यापक होने की उम्मीद की जा सकती है।

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