Friday, July 19, 2024
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भवाई नृत्य कला को देश – विदेश में पहचान दिवाने वाले धन्ना लाल ‘ हरिहर बाबा ‘

राजस्थान के हाड़ोती अंचल कोटा निवासी धन्ना लाल ‘ हरिहर बाबा ‘ भवाई नृत्य के एक ऐसे जनप्रिय लोक कलाकार हैं जिन्होंने अपने भवाई नृत्य से न केवल देश में वरन रूस, सिंगापुर,लंदन और अमेरिका जैसे विदेशों में भी अपनी नृत्य कला के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय पहचान बना कर प्रदेश की लोक संस्कृति के संवाहक बने हैं। कोटा की तहसील दीगोद के छोटे से गांव मंडोला में जन्में इस लोक कलाकार की कोटा से विदेशों तक की कला यात्रा दिलचस्प है।

राजस्थान में प्रचलित लोक नृत्य भवाई अमूमन महिलाओं द्वारा सर पर 8 या 9 मिट्टी अथवा धातु के मटके रख कर किया जाता है। कुछ ही पुरुष कलाकारों के बीच धन्ना लाल ‘ हरिहर बाबा ‘ ने इस नृत्य को अपने सिर पर 51 मटकों के पिरामिड के साथ प्रदर्शित कर नए आयाम स्थापित किए। जैसे -जैस नृत्य आगे बढ़ता हैं मटकों की संख्या बढ़ती जाती है और 51 मटकों तक पहुंच जाती है। सर पर एक कांच के गिलास पर रखे मटकों के साथ जब कलाकार अपने पैरों को कांच के गिलास पर टिका कर संतुलन बनाता है तो दर्शकों में आश्चर्य की सीमा नहीं रहती और वे कोतुक के साथ देर तक तालियां बजा कर कलाकार का हौंसला अफजाई करते हैं। और जब यह कांच के गिलास पर केवल एक पैर से दोनों हाथ ऊपर उठा कर अंतुलन बनाता है तो आश्चर्य और बढ़ जाता है तथा दर्शकों की तालियां थमने का नाम नहीं लेती है। गिलास से उतर कर कलाकार जब मंच पर नृत्य करते हुए दर्शकों के बीच जा कर नृत्य करने लगता है तो दर्शक भी भावतीरेक हो झूम उठते है। ऐसा है हरिहर बाबा के भवाई नृत्य का जादू और चमत्कार।

यह अग्नि भवाई नृत्य करने में भी अपनी सानी नहीं रखता है। इस नृत्य के बारे में बताते हैं की सर पर पानी में भीगा हुआ कपड़ा और इस पर भीगी हुई गेहूं की रोटी रख कर केरोसिन से भीगी हुई गोल चूमली (हिंडोनी) रखते हैं। इस बेस पर तीन मटके और ऊपर एक कलश रखे जाते हैं। मटकों की गर्दन पर केरोसिन से भीगा कपड़ा बांधते है। दोनों हाथों में जलते हुए दीपक ले कर नृत्य किया जाता है। यह नृत्य मंच के साथ – साथ तलवारों, कांच के टुकड़ों, लौटों और परांत के किनारों पर भी किया जाता है। ढोलक, ढोल, मजीरें और हरमोनियम प्रमुख वाद्य होते हैं और साथ – साथ गायन चलता है। वादन,गायन और नृत्य का अनूठा संगम है यह नृत्य जो आश्चर्जनक होने के साथ – साथ संतुलन का जादुई सम्मोहन लिए है।

उन्होंने जब प्रथम बार अग्नि भवाई दशहरे मेले कोटा के मंच पर किया तो खूब दाद पाई और अगले दिन यह नृत्य सभी समाचार पत्रों की सुर्खियों में था।

हरिहर बाबा बताते हैं इस नृत्य में कृष्ण, माता देवी और अन्य देवताओं के मुखड़े शामिल होते हैं। जब मंच पर जाते हैं तो , ” कृष्ण तू मत जानजे,तू बिछड़ा मोई मोई चैन, जैसे जल बिन माछली, मैं तड़पत हूं दिन रैन” गीत गाया जाता है। इसके पूरा होते होते कलाकार मंच पर पहुंच जाता है। कृष्ण का एक भजन ” नथ म्हारी गुम गई सा बृज का वासी, सब सखियां छ जी उदासी” विशेष रूप से गया जाता है। कलाकार बगलबंडी और चौगा वेशभूषा धारण कर नृत्य करता है। वेशभूषा कांच की कलाकारी युक्त चमकीली होती है।

अपने इस खास भवाई लोक नृत्य की वजह से देश – विदेश में धूम मचाने वाले लोक कलाकार की इस नृत्य को सीखने की कहानी बचपन से गांव में भजन – कीर्तन में ढोलक बजाने और नृत्य करने से शुरू होती है। जब ये कोटा आए तब आजकी मशहूर पार्श्व गायिका रेखा राव के दल के साथ पूर्वांचल राज्यों में गए, वहां पहली बार दल के कलाकार का भवाई नृत्य देखा। यहीं से प्रेरणा ले कर लौटने पर छत्र विलास उद्यान में जा कर नियमित अभ्यास किया। जब नृत्य में आत्मविश्वास पैदा हुआ तो प्रथम सफल प्रस्तुति दशहरा मेला मंच पर की ,और आज तक पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके पश्चात राजस्थान के सभी मेलों, गुजरात,बैंगलुरु, कोलकाता, मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, महाबलीपुरम, ऊटी, कोडाईकनाल, भारत के समस्त नासिक, हरिद्वार, उज्जैन, प्रयाग और आठ ज्योतिलिंग प्रमुख स्थानों के साथ – साथ कई अन्य शहरों में अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन कर ढेरों पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किए। नृत्य में सहायक के रूप में शान्ति लाल प्रजापति पिछले 24 वर्षो से इनके साथ हैं।

यही नहीं कलाकार ने अपनी नृत्य कला को सरकारी योजनाओं और जनजागृति के लिए माध्यम बना कर करीब 17 वर्ष पूर्व ” रसरंग लोक कला मंडल” संस्था का गठन किया। इसके माध्यम से गांव – गांव में साक्षरता का महत्व, बालविवाह की रोकथाम, छोटा परिवार, टीकाकरण का महत्व, जल संरक्षण, दहेज निषेध, स्वयं सहायता समूह का महत्व , नशा मुक्ति जैसे अनेक विषयों पर सरकारी विभागों और संस्थाओं के साथ मिल कर जागरूकता कार्यक्रम कर चेतना जगाई। इनके कई कार्यक्रमों में जन संपर्क अधिकारी के नाते मुझे भी जाने का मौका मिला। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से इन विषयों पर रोचक गीतों से संदेश आम जन तक पहुंचाने में पूर्ण सिद्धहस्त हैं। एक बानगी देखिए…….
” जल बिन काम नहीं चाले रे
जल बिना जगत में पत्तो तक नहीं हाले रे ”
जल संरक्षण के इस संदेश के साथ एक और प्रभावी संदेश का नमूना……..
” पढ़ी लिखी और समझदार गांव में धन्नो काकी/ छीतर लाल चाल तो रोकयो म्हारी बात समझता जा जो छोरा छीतर लाल/ दूजो टाबर में रखानजे तीन साल को छेटो/ लड़की हो तो भाग्य समजे छोरा छीतर लाल..!

परिचय : देश -विदेश में लगभग एक हज़ार से अधिक भवाई नृत्य के कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले अंतर्राष्ट्रीय कलाकार धन्ना लाल ” हरिहर बाबा ‘ का जन्म 8 मई 1959 को कोटा जिले के गांव मंडोला में पिता स्व.पुष्प चंद और माता स्व. पांखी बाई के आंगन में हुआ। पिता काश्तकार और गांव के पटेल थे। आपने 10 वीं कक्षा तक पढ़ाई की। बताते हैं गांव में काफी दूर कुएं से पानी लाना पड़ता था। ये स्वयं ही सर पर दो – तीन धड़े रख कर पानी लाते थे। उस समय लडकियां इनको चिड़ाती थी हाथ छोड़ कर चलों तो जाने। उनका यह प्रसंग मटकों से प्रेम भी भवाई नृत्य की वजह बन गया और मेरी मां ही मेरी गुरु बन गई। आज आप 5 वर्ष से दिल्ली राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और 2 वर्ष से सांस्कृतिक क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र में विशेषज्ञ के रूप में जुड़े हैं। संस्कृति और सांस्कृतिक गतिविधियों के संस्कार भारती के चितौड़ प्रांत के पिछले पांच वर्ष से आप अध्यक्ष भी हैं। आप सीनियर सेकेंडरी बालिका विद्यालय नयापुरा कोटा से मई 2019 में सहायक कर्मचारी से सेवा निवृत हैं और मौका मिलने पर अपना भवाई नृत्य का कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं।
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(लेखक कोटा में रहते हैं और ऐतिहासिक, साहित्यिक , लोक कला ,पर्यटन आदि विषयों पर लेखन करते हैं)

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